राजनीति का पासा, बबुआ शकुनी मामा की चाल
नेता को देखें तो क्या तब
नहीं थे मुखिया
आहत कुनबा को है विकल्प की
तलाश
काराकाट लोस क्षेत्र से
राजनीति की अपनी चाल होती
है। पासा फेंकने का काम शकुनी मामा करते हैं और जाल में कई धर्मराज युधिष्ठिर फंस
जाते हैं। धर्मराज धर्म के प्रति निष्ठा रखते थे, अब के नेता अपनी पार्टी के आका,
सुप्रीमो या मुखिया जो भी कह लें उनके प्रति निष्ठा रखते हैं। सब के अलग अलग वोट
बैंक हैं। इनके टिकट पर चुनाव लड रहे प्रत्याशी अगर किसी को न भी पुछे, अपमान भी
करे तो इससे क्या फर्क पडता है? वह अपनी निष्ठा का ख्याल करेगा, ऐसा प्रत्याशी
मानता है। विरोध के दलदल में फंसे एक दल के नेता इसी स्थिति से गुजर रहे हैं।
अपमानित कुनबा परेशान है। वह अपने नेता के प्रति निष्ठा होते हुए भी दलीय
प्रत्याशी को वोट देना नहीं चाहता। हांलाकि स्थिति प्रतिकुल ही है, लेकिन खुद को
जीतता हुआ कौन नहीं मानता? साल 2010 में वर्तमान प्रत्याशी ने अतिपिछडा कुनबा के
इस नेता और विधानसभा के दलीय प्रत्याशी के लिए मात्र एक दिन प्रचार किया था। अपनी
जाति का वोट दिलाने का प्रयास तक नहीं किया था। हद यह कि जो लोग लाल झंडे के लिए
वोट मांग रहे थे उसमें से ही एक को अपना प्रतिनिधि बना दिया। पांच साल तक
अतिपिछडों को नहीं पुछे अब प्रत्याशी बने तो कह रहे हैं कि वोट पार्टी नेतृत्व को देख
कर लोग दें। पार्टी कार्यालय में बैठक कर इस तरह के पासे फेंके गए, समझौते का
प्र्यास किया गया। इस आहत कुनबे के लोग इसीलिए सवाल उठा रहे हैं कि फिर क्या यही
तर्क 2005 और 2010 के चुनाव में उचित नहीं था। तब तो प्रत्याशी की जात वाले दल के
नही लाल झंडे के काम कर रहे थे। वाह जनाब, जब आपकी बारी आए तो नेतृत्व देखिए और जब
दलीय साथी की बारी आए तो जाति देखिए। क्या यह प्रपंच महाभारत से सीखा गया है? इस
आहत कुनबा को एक विकल्प की तलाश है, जहां मान भी मिले और सम्मान भी।
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