■ पत्र, पत्रकार व पत्रकारिता:- 02 ■
● उपेंद्र कश्यप ●
जीवन में हर पल परिवर्तन दिखता है, चाहे वह सकारात्मक हो या नकारात्मक। हम बात कर रहे हैं सकारात्मकता की, जिसमें अतीत भी है, वर्तमान भी और शायद भविष्य का छुपा हुआ बीज भी, जो पता नहीं कितना बड़ा पौधा या वृक्ष बन सकेगा।
बात 1994 की है। अक्टूबर का महीना था। लैंडलाइन के अलावा संचार का कोई दूसरा इलेक्ट्रॉनिक माध्यम तब नहीं हुआ करता था। डेहरी के श्री कृष्णा किसलय भैया (अब स्वर्गीय) से मैं जुड़ा हुआ था। पत्रकारिता का पहला आरंभ भी मैंने इनके द्वारा प्रकाशित “सोनमाटी” से किया था। तब बीएमपी 2 के सहायक समादेष्टा आई ए सिद्दीकी जजिब गाजीपुरी के इंटरव्यू के साथ किया था। इस बीच सूचना यह मिली कि डाल्टेनगंज से राष्ट्रीय नवीन मेल दैनिक अखबार का प्रकाशन हो रहा है। ध्यान रहे तब बिहार झारखंड एक था।
बिहार से प्रकाशित हिंदुस्तान और आज अखबार 12 पेज के ब्लैक एंड व्हाइट 1.90 रुपये मूल्य के साथ बिकते थे, जबकि 12 पेज ब्लैक एंड व्हाइट के साथ ₹02 मूल्य से राष्ट्रीय नवीन मेल आरंभ हुआ था। कृष्ण किसलय भैया ने मुझे कहा कि आप दाउदनगर से रिपोर्टिंग करिए। वर्ष 1994 में ठीक विजयादशमी के दिन इस अखबार का आरंभ तत्कालीन गृह राज्य मंत्री सुबोधकांत सहाय ने किया था। मैं उद्घाटन समारोह में भी शामिल हुआ था। दूसरे दिन से ही मेरी खबरें भी राष्ट्रीय नवीन मेल में प्रकाशित होने लगी। 32 साल बाद अब देश को प्रभावित करने वाली राजनीतिक, सामाजिक, न्यायिक घटनाओं पर लिखना आरंभ किया। तो 31 जुलाई 2026 को एक आलेख- विपक्ष को सत्ता से दूर कर रहा सनातन का अपमान- शीर्षक से आलेख, मेरा कालम- “टेढ़ी पॉलिटिक्स”- के लिए लिखकर माननीय संपादक सुनील बादल सर को भेजा। उनसे मेरा कोई परिचय पूर्व से नहीं था। उनको अपना इतिहास बताया और उन्होंने इस आलेख को संपादकीय पन्ने पर जगह दी। एक अगस्त को प्रकाशित हुआ। फिर 7 अगस्त को -न्यायिक फैसले के लिए जिम्मेदारी तय करने का वक्त- आलेख भेजा, जिसे 8 अगस्त को संपादकीय पेज पर स्थान मिला। इसके लिए संपादक सर को आभार।
एक दूसरी बात मैं कह रहा हूं कि जब आप किसी अखबार के साथ अपनी पत्रकारिता का आरंभ एक प्रखंड रिपोर्टर के रूप में करते हैं और इस अखबार के संपादकीय पन्ने पर जब आप छपने लगते हैं तो इसकी खुशी अलग होती है। इससे न सिर्फ आपकी लेखनी को प्रमाणिकता, विश्वसनीयता, व्यापकता, बहुलता प्राप्त होती है, बल्कि आप उत्साहित होते हैं, प्रेरित होते हैं और एक नई यात्रा आरंभ करने का जज्बा आपमें पैदा होता है। स्वाभाविक है कि राष्ट्रीय नवीन मेल के संपादकीय पन्ने पर छपने से यह सब मुझे भी प्राप्त हो रहा है। हालांकि पहली बार किसी अखबार के संपादकीय पेज पर जो मेरा आलेख प्रकाशित हुआ था उसका शीर्षक था - सवर्ण वादी मीडिया बनाम निकम्मी बहुजनवादी सोच। यह आलेख 17 सितंबर 2018 को बिहार और दिल्ली से प्रकाशित मीडिया दर्शन के संपादकीय पेज पर छपा था। हालांकि इसके छपने के बाद कुछ दुश्वारियां भी झेलनी पड़ी थी। जो फिर कभी अपने कालम- ‘पत्र, पत्रकार और पत्रकारिता’ में लिखूंगा।
फिलहाल में “टेढ़ी पॉलिटिक्स” कालम से संपादकीय पन्नों के लिए आलेख लिख रहा हूं। जिसे बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और दिल्ली समेत कई स्थानों से प्रकाशित विभिन्न अखबारों और वेबसाइटों में जगह मिल रही है। मीडिया मार्ट इंडिया, रांची व डालटनगंज से प्रकाशित राष्ट्रीय नवीन मेल, नई दिल्ली-उत्तरप्रदेश- झारखंड- छत्तीसगढ़ और बिहार से प्रकाशित मीडिया दर्शन, औरंगाबाद से प्रकाशित सीतयोग, रांची-दिल्ली-लखनऊ-पटना से प्रकाशित उजाला पत्रिका में स्थान प्राप्त हो रहा है। पत्रकारिता में यह एक नई यात्रा है। यह बीज जो अंकुरित हुआ है, कितना बड़ा वृक्ष बनता है, मुझे नहीं मालूम।
बस गीता का यह संदेश कि- फल प्राप्ति की चिंता किए बिना सतत काम करते रहिए, पर अमल करते हुए काम करते रहा हूं, करते रहूंगा। उपलब्धि की ऊंचाई या लंबाई कितनी होगी, इसकी चिंता किये बगैर यह यात्रा जारी है।
आप सबका प्यार मिलता रहता है, इसके लिए सभी के प्रति बहुत-बहुत आभार व्यक्त करता हूं।
धन्यवाद, मेरा यह लिखा पढ़ने के लिए।
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