Saturday, 7 February 2026

काम हो रहा इसलिए हो रहे विरोध और लग रहे आरोप : अंजली कुमारी

08.02.2026 को दैनिक जागरण में प्रकाशित रिपोर्ट


शैक्षणिक व सामाजिक विकास पर ध्यान केंद्रित

संदेह से देखा तो सम्मान व सहयोग भी मिला

विकास की कई योजनाओं को पूर्णता देना लक्ष्य

उपेंद्र कश्यप, जागरण ● दाउदनगर (औरंगाबाद) : नगर परिषद दाउदनगर अपनी स्थापना का 141 वर्ष जब पूरे कर रहा है तो युवाओं को निखारने के लिए खेलकूद प्रतियोगिता का आयोजन किया जा रहा। यह मुख्य पार्षद अंजली कुमारी के निर्णय का फलाफल है। पहली बार स्थापना दिवस मनाया जा रहा है। अंजली कुमारी ने 27 जून 2023 को पद एवं गोपनीयता का शपथ लिया था। आम जनता से सीधे निर्वाचित वह प्रथम मुख्य पार्षद हैं। आम तौर पर महिला जन प्रतिनिधि से सीधे संवाद मुश्किल होता है। यह बेबाक बोलती हैं। चाहे मंच हो या सदन या बात करने वाला पत्रकार ही क्यों न हो। उनसे विभिन्न मुद्दों पर दैनिक जागरण संवाददाता उपेंद्र कश्यप ने बातचीत की।



■ बतौर मुख्य पार्षद सबसे बड़ी 05 चुनौतियां क्या हैं-

● नगर परिषद के पास संसाधन सीमित हैं, लेकिन जनता की अपेक्षाएं स्वाभाविक रूप से बहुत अधिक रहती हैं। इस संतुलन को साधना सबसे बड़ी चुनौती रही। कई समस्याएं वर्षों से लंबित थीं। यथा-नाला, सड़क, जलनिकासी, भूमि विवाद, जिनका समाधान तत्काल संभव नहीं था। प्रशासनिक प्रक्रियाओं की जटिलता, योजनाओं की स्वीकृति, टेंडर प्रक्रिया, विभागीय समन्वय में समय लगता है, जिससे कार्यों में विलंब होता है। विकास कार्यों के बावजूद राजनीतिक कारणों से आरोप-प्रत्यारोप झेलने पड़े। एक महिला के रूप में नेतृत्व व निर्णय क्षमता के साथ प्रशासनिक दृढ़ता को बार-बार साबित करना पड़ा।


■ नगर परिषद कार्यालय और शहर में दिखी सबसे बड़ी पांच समस्या-


● अव्यवस्थित ड्रेनेज और जलजमाव। जर्जर सड़कें और ट्रैफिक व्यवस्था। सार्वजनिक भवनों और सामुदायिक स्थलों की कमी।युवाओं और बच्चों के लिए खेल व अध्ययन के सीमित संसाधन। कार्यालय में पुराने ढर्रे की कार्यप्रणाली।


■ सबसे बड़े ड्रीम प्रोजेक्ट और उनके लिए किए गए प्रयास-

● नौका विहार,शापिंग कंपलेक्स, का आधुनिक ड्रेनेज, पुस्तकालय और नाला तंत्र। प्राथमिकता सूची बनाकर चरणबद्ध कार्य योजना तैयार की। राज्य सरकार से लगातार पत्राचार व फालो-अप की। सामुदायिक भवन और ई-लाइब्रेरी। वार्ड 14 और 16 में प्रस्ताव तैयार। शैक्षणिक और सामाजिक विकास को केंद्र में रखा। शहर के लिए मोक्षधाम की व्यवस्था। भूमि चिन्हित कर एक वर्ष से लगातार प्रयास। प्रधान सचिव, नगर विकास एवं आवास विभाग से व्यक्तिगत रूप से मिलकर प्रस्ताव को आगे बढ़ाया। खेल अधोसंरचना का विकास। अशोक स्कूल फील्ड में खेल प्रतियोगिताओं का आयोजन।बच्चों के सर्वांगीण विकास का लक्ष्य। बुनियादी शहरी ढांचे का सुदृढ़ीकरण।


■ पांच बड़े लक्ष्य और उन्हें पूरा करने की रणनीति-

● पूरे शहर में स्थायी जलनिकासी समाधान। मास्टर ड्रेनेज प्लान के तहत कार्य। हर वार्ड में मूलभूत सुविधाओं की समान उपलब्धता।वार्ड-वार आवश्यकता आधारित योजना। डिजिटल और पारदर्शी नगर परिषद। कार्यालयी प्रक्रिया को आधुनिक बनाना। महिलाओं और युवाओं के लिए विशेष योजना। कौशल, खेल और शिक्षा पर फोकस।स्वच्छ, सुंदर और सुरक्षित शहर। स्वच्छता अभियान को जन-आंदोलन बनाना।


■ महिला मुख्य पार्षद के रूप में अनुभव-

● नगर परिषद कार्यालय से लेकर पटना स्थित बिहार सरकार के कार्यालयों तक की यात्रा सीख, संघर्ष और आत्मविश्वास से भरी रही।कई बार संदेह की दृष्टि से देखा गया, लेकिन जब योजनाओं की तैयारी और तथ्यों के साथ बात रखी, तो सम्मान और सहयोग दोनों मिला। यह यात्रा मुझे और अधिक दृढ़, जिम्मेदार और संवेदनशील बनाती गई।

■ आपके पूर्ववर्तियों को क्या करना चाहिए था जो वे कर न सके-

● पूर्ववर्तियों ने भी अपने स्तर पर प्रयास किए, लेकिन दीर्घकालिक सोच का अभाव, कुछ बुनियादी मुद्दों को लगातार टालना, और युवाओं-बच्चों पर कम ध्यान देना  शहर के विकास में बाधा बना। मेरा प्रयास रहा कि उन्हीं अधूरे कार्यों को प्राथमिकता दी जाए।


■ विकास कार्यों पर भ्रष्टाचार के आरोप क्यों लगे-

● जब भी जमीनी स्तर पर वास्तविक और बड़े पैमाने पर काम होता है, तो विरोध और आरोप स्वाभाविक होते हैं। सभी कार्य नियम, प्रक्रिया और विभागीय स्वीकृति के तहत हुए। विरोधी भी यह स्वीकार करते हैं कि आधारभूत संरचना पर अभूतपूर्व काम हुआ। आरोप दरअसल काम की गति और प्रभाव से असहजता का परिणाम है, न कि सच्चाई।



18 प्रतिशत आबादी के साथ बढ़ेगा 70 प्रतिशत राजस्व

07 फरवरी 2026 को दैनिक जागरण में प्रकाशित रिपोर्ट

141 वर्ष का : दाउदनगर नगर परिषद :-02


होगा नया परिसीमन तो बनेगा अधिकतम 35 वार्ड 

मानव संसाधन के साथ बढ़ेगा निकाय का राजस्व

गृह कर के रूप में राजस्व प्राप्ति में होगी उत्तरोत्तर वृद्धि

उपेंद्र कश्यप, जागरण ● दाउदनगर (औरंगाबाद) : नगर परिषद का क्षेत्रफल बड़ा होगा, तो वार्डों की संख्या भी बढ़ेगी और इससे नगर निकाय का राजस्व भी बढ़ेगा। 10 फरवरी 1885 को नगर पालिका के रूप में अधिसूचित दाउदनगर में पहली बार वर्ष 1910 में वार्डों का गठन किया गया था। तब चार वार्ड बनाए गए थे। अभी वर्तमान नगर परिषद में 27 वार्ड हैं। क्षेत्र विस्तार के साथ जब परिसीमन होगा तो कार्यपालक पदाधिकारी ऋषिकेश अवस्थी के मुताबिक अधिकतम 35 वार्ड शहर में हो जाएंगे। भखरुआं का जो हिस्सा नगर निकाय में जुड़ेगा उससे लगभग 18 आबादी बढ़ेगी, लेकिन निकाय का राजस्व लगभग 70 तक बढ़ जाएगा। श्री अवस्थी बताते हैं कि गृह कर से वर्तमान नगर परिषद को लगभग 32 लाख रुपया वार्षिक प्राप्त होता है। सर्वे का काम चल रहा है और उम्मीद है कि नगर परिषद के वर्तमान क्षेत्र से लगभग एक से डेढ़ करोड़ रुपये राजस्व की प्राप्ति हो सकेगी। लेकिन जब भखरुआं का हिस्सा इसमें जुड़ जाएगा तो गृह कर के रूप में एक करोड रुपये लगभग और वृद्धि होने का अनुमान है। इस तरह क्षेत्र विस्तार और नए मूल्यांकन के बाद प्राप्त होने वाले गृह कर से लगभग ढाई करोड रुपये वार्षिक राजस्व प्राप्त होने का अनुमान नगर परिषद को है। तब भखरुआं में स्थित दुकान माल, शोरूम, बैंक समेत अन्य सरकारी गैर सरकारी कार्यालयों एवं आवासों से गृह कर के रूप में नगर निकाय को राजस्व की प्रति होनी शुरू होगी। जिससे राजस्व में उत्तरोत्तर वृद्धि की उम्मीद नगर परिषद को है।



चट्टी से नगर निकाय की यात्रा


जब वर्ष 1885 में नगर पालिका का गठन हुआ था उसके पहले भी दाउदनगर मगध और शाहाबाद क्षेत्र में चट्टी के रूप में मशहूर था। कहावत मशहूर है- शहर में सासाराम और चट्टी में दाउदनगर। तब और अब में काफी कुछ महत्वपूर्ण बदलाव हुआ है। वर्ष 2002 में जब दूसरी बार बिहार में नगर निकाय चुनाव प्रारंभ हुआ तो दाउदनगर नगर पंचायत बना। फिर वर्ष 2018 में नगर परिषद। अब कद नहीं क्षेत्र का विस्तार हुआ है।


12 से 22 सौ पर एक वार्ड


नगर निकाय में 1200 से 2200 की आबादी पर एक वार्ड का गठन होता है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार 52000 की आबादी वाले नगर परिषद में 27 वार्ड है। भखरुआं शामिल किए जाने के बाद 9000 की आबादी बढ़ेगी तो नया लगभग पांच वार्ड बनेंगे। कार्यपालक पदाधिकारी ऋषिकेश अवस्थी के अनुसार पूरे शहर का नया परिसीमन होगा। इससे अधिकतम 35 वार्ड शहर में बन सकेंगे।


Thursday, 5 February 2026

141 वर्ष के नगर निकाय से जुड़ी 18 प्रतिशत नई आबादी

 

06.02.2026 को दैनिक जागरण में प्रकाशित रिपोर्ट 

नगर परिषद दाउदनगर में भखरुआं का शामिल होना तय

मंत्रिमंडल की स्वीकृति के बाद डीएम का सरकार को रिपोर्ट 

क्षेत्र विस्तार पर एक भी नहीं मिला दावा आपत्ति 

उपेंद्र कश्यप ● दाउदनगर (औरंगाबाद) : 10 फरवरी 1885 को दाउदनगर कस्बा से शहर बना था। उसे नगर पालिका का दर्जा प्राप्त हुआ था। तब से अब तक 141 वर्ष हो गए। अब शहरी क्षेत्र का विस्तार अवश्यंभावी है। नगर परिषद के वर्तमान स्वरूप में भखरुआं क्षेत्र के हिस्से को जोड़ा जाना तय है। इससे दाउदनगर का इलाका विस्तार होगा। जनसंख्या के लिहाज से वर्तमान जनसंख्या में लगभग 18 प्रतिशत की वृद्धि होनी तय है। नगर विकास एवं आवास विभाग पटना द्वारा चार अक्टूबर 2025 को क्षेत्र विस्तार से संबंधित अधिसूचना जारी की गई थी। इसके बाद दावा आपत्ति के लिए समय का निर्धारण किया गया। तय समय अवधि में एक भी दावा आपत्ति इस संबंध में प्राप्त नहीं हुआ। नतीजा नगर परिषद द्वारा इस संबंध में एक पत्र जिला पदाधिकारी को चार जनवरी 2026 को लिखा गया। इसी पत्र के आलोक में 21 जनवरी 2026 को जिला पदाधिकारी ने परियोजना पदाधिकारी सह अपर निदेशक नगर विकास एवं आवास विभाग पटना को पत्र भेजा है। पत्र में कहा गया है कि नगर परिषद दाउदनगर द्वारा सार्वजनिक स्थलों, सरकारी कार्यालयों में अधिसूचना को चिपकाय गया एवं नगर परिषद का क्षेत्र विस्तार की उद्घोषणा डुगडुगी बजाकर एवं अन्य प्रचार-प्रसार के माध्यम से भी कराया गया है। इससे संबंधित दावा आपत्ति अप्राप्त है। कार्यपालक पदाधिकारी ऋषिकेश अवस्थी ने बताया कि कोई दावा आपत्ति प्राप्त नहीं हुआ है। यह अब तय हो गया है कि क्षेत्र विस्तार संबन्धी कोई अवरोध अब नहीं रहा। 


भखरुआं की नौ हजार आबादी होगी शहरी

भखरुआं तरारी पंचायत का हिस्सा है। थाना नंबर 75, तिवारी मोहल्ला, कुर्बान बिगहा और बाबा जी का बागीचा। पूरे इलाके को मिलाकर वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार 16460 की आबादी है। कार्यपालक पदाधिकारी ऋषिकेश अवस्थी बताते हैं कि भखरुआं के इस हिस्से की लगभग नौ हजार आबादी नगर परिषद क्षेत्र में शामिल होगी।


75000 होगी शहर की जनसंख्या 

बिहार जाति आधारित गणना 2022 के प्रथम चरण के आंकड़े के अनुसार शहर की आबादी 65543 बताई गई है। 2011 में शहर की आबादी 52364 थी। अब इसमें लगभग नौ हजार भखरुआं की जनसंख्या जुड़ जाएगी। अर्थात नगर परिषद की आबादी लगभग 75 हजार हो जाएगी।


पहले हुई थी विस्तार की कोशिश असफल

पहली बार शहरी क्षेत्र के विस्तार की कोशिश सफल हुई है। इसके पहले

जब वर्ष 1972 से 77 तक यमुना प्रसाद स्वर्णकार नगरपालिका के अध्यक्ष थे तो उन्होंने भखरुआं को शामिल करने की कोशिश की थी। लेकिन कुछ लोग पटना उच्च न्यायालय चले गए और एक रणनीति के तहत राष्ट्रीय इंटर स्कूल में बने नए मतदान केंद्र पर किसी ने मतदान नहीं किया। नतीजा तब भखरुआं नगर पालिका का हिस्सा नहीं बना। 


बैक्रहम मूर ऐसे बन गया भखरुआं मोड़

 

दैनिक जागरण में 5 फरवरी 2026 को प्रकाशित


दाउदनगर की हृदयस्थली का नाम है भखरुआं

नील की खेती और नील कोठियों से है रिश्ता

उपेंद्र कश्यप● दाउदनगर (औरंगाबाद) : आधी रात को स्थित गोलंबर के ध्वस्त होने के बाद भखरुआं की चर्चा खूब हो रही है। आमा आवाम से लेकर इंटरनेट मीडिया तक में। ऐसे में यह जानना बड़ा प्रासंगिक होगा कि इस स्थल का नाम भखरुआं क्यों पड़ा। दाउदनगर में कोई भी व्यक्ति भखरुआं मोड़ सुनकर चौंकता जरूर है। उसके मन में यह जिज्ञासा जरूर उठती है कि इस स्थान का नाम इस तरह का क्यों है। यह अटपटा शब्द लगता है। वर्ष 2007 में प्रकाशित स्मारिका उत्कर्ष में इस विषय में पर चर्चा की गई है। दाउदनगर में दो नील कोठियां है। एक बाजार में पटना मुख्य नहर के पास के समीप देवी मंदिर के नजदीक और दूसरा बुधन बिगहा के पास। बुधन बिगहा में जो नील कोठी है, उसी के मैनेजर हुआ करते थे बैक्रहम मूर। जब भारत गुलाम हुआ करता था तब नील की खेती करने और उपज से नील निकालने के लिए बने नील कोठियों का मैनेजर हुआ करते थे मूर। उन्हीं के नाम पर यह स्थल भखरुआं मोड़ कहा जाने लगा। यह शहर का हृदय स्थल है। 

शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय तरार के परिसर में स्थित मंदिर के समीप एक पीपल का पेड़ है। जिसके नीचे दब गया है उनका कब्र। कब्र की कुछ निशानियां बची हुई है। उनके निधन के बाद जब कब्र बनाए गए तो उसके बगल में ही पीपल का पौधा लगाया गया होगा। पीपल का पेड़ विशाल होता गया और कब्र विस्तारित होते पेड़ के दबाव में आकर ध्वस्त हो गया।



बुधन बिगहा से है अंग्रेज अधिकारी मूर का संबंध

बैक्रहम मूर के निवास पर एक नौकर था-बुधन यादव। बुधन बेलाढ़ी के निवासी थे। वह बड़े ही मालिक-सेवी थे। उनके सेवा भाव से प्रभावित हो वैक्रहम मूर जब इंगलैण्ड चले गये तो बुधन को भी साथ लेते गये और घुमाकर ले आये। जब उनकी मृत्यु हुई तो  नील कोठी के पास ही बुधन की पहल पर उनको दफनाया गया। यहां आज भी उस कब्र के अवशेष बचे हुए हैं। 




Thursday, 15 January 2026

सीमा आनंद और शुभंकर मिश्रा बनाम स्त्री-पुरुष सोच

(संदर्भ, चित्र:- चर्चित विवादास्पद पॉडकास्ट) 

● उपेंद्र कश्यप ● 

■ 16 जनवरी 2026 ■

आमतौर पर मैं ऐसे विषयों पर लिखने से बचने की कोशिश करता रहा हूं, मन मारकर, क्योंकि सामाजिक वर्जनाएं अनवाश्यक रूप से प्रेशर बनाती हैं। लेकिन किसी भी व्यक्ति से अधिक अनसोशल बन गए सोशल मीडिया पर जिस तरह की चर्चाएं एक पॉडकास्ट को लेकर हो रही है, उसने मुझे 02 घंटे से भी अधिक लंबा यह विवादित चर्चित पॉडकास्ट देखने के लिए विवश कर दिया। खुद को रोक न सका और पूरा पॉडकास्ट लगातार देख गया। सवाल यह उठता है कि सीमा आनंद गलत क्या कह गयी हैं? पितृ सत्तात्मक समाज में स्त्री द्वारा व्यक्त किए गए विचार को उसके चरित्रहीनता से जोड़ देना आम बात हो गई है। ऐसा करना कतई उचित नहीं है। सीमा आनंद ने उस पॉडकास्ट में वही कहा जो जानने की इच्छा सब कोई रखता है। जो करने की इच्छा सब कोई रखता है। बहुत लोग वैसा ही करते हैं, जैसा सीमा कह रही हैं। यह और बात है कि स्वीकारने का साहस किसी में नहीं है। जो पुरुष ऐसे सच को स्वीकार करने का साहस नहीं रखता, वह सीमा आनंद के चरित्र पर सवाल उठाने का दुस्साहस कर पा रहा है तो सिर्फ इसलिए कि वह पुरुष कमजोर है। उसे डर लगता है कि कोई स्त्री उसके बारे में भी बात करे। पुरुषों को यह आजादी दे दी गई है कि वह स्त्री के चरित्र पर विमर्श करे। शुभंकर ने कुरेद कुरेद कर ऐसे सवाल पूछे कि कई सच सामने आ गए। ऐसा नहीं है कि वह सच पहली बार सामने आए हैं। हां वह सच कोई पहली बार सबके सामने सार्वजनिक तौर पर बता रही (बता रहा-नहीं) है, यह महत्वपूर्ण हो गया है। वरना वह कौन सा सच बता रही है सीमा विश्वास जो आम लोग नहीं जानते, या शुभंकर ने कौन सा ऐसा सवाल पूछ लिया जो जानना कोई नहीं चाहता। और अगर दोनों के पॉडकास्ट फालतू है, बिना मतलब के है, समाज को बिगाड़ने वाला हैं तो उसे देख कौन रहा है? जब विधानसभा में सत्र के दौरान पोर्न देखे जा सकते हैं तो फिर उस पर बात करना गलत कैसे हैं? कितने वयस्क पुरुष हैं जो पोर्न नहीं? देखते नियमित या यदा कदा ही सही, देखते सभी हैं, जिसे भी इसकी जानकारी है। कुछ अपवाद हो सकते हैं। जिस देश में कामसूत्र लिखा गया, जिस देश में खजुराहो के मंदिर बने हैं, जहां काम कलाओं को स्पष्ट तौर पर उकेरा गया है, तो क्या वहां सीमा आनंद और शुभंकर मिश्रा की बातचीत देखना अस्वीकार्य हो सकता है? 


कौन सी नैतिकता की बात की जा रही है? क्या जब आप खजुराहो देखते हैं तो आपके मन में पाप जागते हैं? आपके मन में घृणा का भाव पैदा होता है? उन मूर्तियों के निर्माता के प्रति तो आप आकर्षित होते हैं। आपको आश्चर्य होता है कि एक जमाने में भारत में काम कलाओं को लेकर इतने खुले विचार हुआ करते थे। रति क्रियाओं को सार्वजनिक जगहों पर बजाप्ता मूर्ति के रूप में गढ़े गए, दिखाए गए। पाठ्य पुस्तकों में। उसकी तस्वीरें छपी और पढ़ाई जाती है। लोगों को जागरूक किया गया। जब आप खजुराहो जाएंगे और कोई कुमारी कन्या आपके बगल से गुजर कर मंदिर में पूजा करके लौटती है तब भी आपके मन में पाप नहीं जगता और ना मंदिर दर्शन करने वाली लड़की के बारे में आप चरित्रहीनता का सर्टिफिकेट देते हैं? तो फिर सीमा आनंद जो कह रही है वह गलत कैसे है? 


क्या आपने सिमोन द बोऊवा का द सेकेंड सेक्स (हिंदी में - स्त्रीसाइमन उपेक्षिता- प्रभा खेतान) पढ़ा है। अगर नहीं पढ़ा तो पढ़ लीजिए। आपकी कई भ्रांतियां टूट जाएगी। वह पत्नी के बारे में, स्त्री-पुरुष संबंधों के बारे में क्या कहती है? जब यह जान जाइयेगा तो वास्तविकता की समझ बढ़ जाएगी। 

ओशो ने ठीक कहा था कि य

जहां ऐसे विषय पर चर्चा वर्जित है वहां कई समस्याएं खड़ी होती है। आज तमाम तरह की वर्जनाएं ऐसे विषय की चर्चा पर लाद कर लगभग विमर्श को बंद कर दिया गया है तो उसका नतीजा आप सामने देख रहे हैं। कुंठित समाज उन बच्चियों को भी सामूहिक दुष्कर्म करके मार डालता है जिनको यह तक ज्ञात नहीं होता कि स्त्री पुरुष की शारीरिक संरचना में कैसा और क्या फर्क होता है? जब आप खुलकर बात करेंगे तो आप कुंठा से मुक्त होंगे। और जब कुंठा से मुक्त होंगे तो आप दुष्कर्मी नहीं बनेंगे। दुष्कर्मी पुरुष होता है, बच्चियां नहीं, लेकिन झेलना किसे पड़ता है? दुष्कर्म की शिकार बच्चियों को। युवतियों को। महिलाओं को। क्योंकि पुरुष समाज की सोच बहुत ही घृणित है। वेश्यालय जाने वाला बदनाम नहीं होता, वेश्या बदनाम होती है। क्यों?  क्या किसी पुरुष के बिना कोई वेश्या बन सकती है? अगर देह बेचना गुनाह है तो उसका खरीदार बेगुनाह कैसे हो सकता है?



 अगर रति क्रीड़ा पाप और अपराध है, तो यह संसार चल कैसे रहा है? क्या बिना रति क्रीड़ा के संसार का वजूद बचा रह सकता है? अगर प्रजनन बंद हो जाए, काम क्रिया बंद हो जाए, तो इस पृथ्वी पर मानव का अस्तित्व कितने वर्ष बच सकेगा? सीमा आनंद के भी परिवार हैं, उनके भी पति हैं, उनके भी संतान है। जब समाज खुला होता है तभी कोई सीमा आनंद जैसा बातचीत करने वाली खड़ी होती है, और फिर पॉडकास्ट में तो कई बार सीमा कह चुकी है कि मुझे ट्रोल किया जाएगा। तुम (शुभांकर) मुझको मरवाओगे। लोग पीछे पड़ जाएंगे। कितने तरह के सवाल उठेंगे। क्योंकि सीमा आनंद जानती है कि भारत का समाज अभी उतना खुला नहीं है, इसलिए ऐसा कह रही हैं। पुरुष खुलकर बात कर सकता है, स्त्री नहीं। स्त्री मुस्कुरा दे तो वह चरित्रहीन है। और लड़कियों पर फबती कसने वाला पुरुष भटका हुआ और बिगड़ा हुआ कह दिया जाता है। वह चरित्रहीन नहीं माना जाता है। इसे मर्दों की आदत मानी जाती है। इसमें मर्दानगी दिखता है। जब समाज इस तरह से सोचने लगता है तो फिर वर्जनाएं घृणित रूप से  टूटने लगती है।


विचारों को, विमर्शों को जिंदा रखना ही जीवंत समाज की पहचान है। अन्यथा न मुर्दे चर्चा करते हैं, न मुर्दों की चर्चा होती है।


उपेन्द्र कश्यप 




Friday, 21 November 2025

बुनकरी के लिए मशहूर हुआ करता था दाउदनगर

 


मच्छरदानी, चादर, पितांबरी बनते थे घर घर

तांती तंतवा, पटवा जाति का था खानदानी काम

मुजफ्फरपुर और मानपुर से मंगाते थे कच्चा माल

झारखंड और छत्तीसगढ़ से आते थे रेशम के कोआ

उपेंद्र कश्यप, जागरण ● दाउदनगर (औरंगाबाद) : 16 वीं के शहर दाउदनगर में लगभग उसी वक्त से हथकरघा का काम होने लगा था। तांती, तंतवा और पटवा जातियां यहां बसी हुई थीं। पाट पर जो बुनाई का काम करते थे उसे पटवा कहा जाने लगा। यहां तांत, रेशम का काम जो लोग करते थे, उन्हें तांती कहा जाता है। यह जाति अतीत में विश्वकर्मा पूजा करती रही है। ततवां जाति की आबादी कम है। यह बुनकर जातियां अपने व्यवसाय में निपुण मानी जाती थीं। कच्चा माल भागलपुर और गया के मानपुर से लाते थे। मुजफ्फरपुर के सुत्तापट्टी से सूत लाया जाता था। मानपुर गया से उसे रंगवाया जाता था। भागलपुर से रेशम का कोआ आता था। पलामु और छत्तीसगढ के बोहला (रामानुजगंज) से भी कोआ मंगाया जाता था। गमछा, जनता धोती, साड़ी, पितांबरी (कफन) की बुनाई होती थी। सीताराम आर्य को उनके पिता श्याम लाल आर्य ने बताया था कि जनता धोती प्रचलित ब्रांड बन गया था। कभी शहर में सौ से अधिक घरों में बुनकरी का काम होता था। जब मशीनीकरण का युग प्रारंभ हुआ तो दाउदनगर का हथकरघा उद्योग धीरे धीरे समाप्त होता चला गया। बेसलाल राम वल्द डोमनी राम के घर दो दशक पूर्व तक दो हथकरघा चलता था। कपड़ा बीनने का काम व्यापक पैमाने पर होता था। बरसात के कारण मात्र भादो में आठ दिन काम बंद करना पड़ता था। इस समय खूब मौज मस्ती की जाती थी। बस खाओ-पीओ और मौज करो। शहर में अब बुनकरी का काम नहीं होता है। कभी शहर की मुख्य जाति की समृद्धि के गीत लिखने वाला बुनकरी का काम अब पूरी तरह विलुप्त हो गया है।


बनाये जाते थे दरी, कालीन भी

जब बुनकरी का काम समाप्त हो गया तो बुनकर वर्ग के लोग ठेकेदारी, मजदूरी, अन्य व्यवसाय में उतर गए। शिक्षा नहीं थी लेकिन आज शिक्षित भी हैं, और बडे़ पैमाने पर नौकरी के साथ अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्र में भी सक्रिय हैं। दरी-कालीन एवं कंबल बुनाई का काम भी छोटे स्तर पर यहां होता था। चूंकि बगल के ओबरा में कालीन का उद्योग राष्ट्रीय स्तर पर भदोही के बाद दूसरे पायदान पर काबिज था तो यहां उसकी संभावना कम बन सकी।


महंगाई और गुणवत्ता के कारण काम बंद

कपड़े के व्यवसाय से जुड़े सीताराम आर्य का पूरा खानदान हस्तकरघा का काम करता था। वह बताते हैं कि उनके पिता श्याम लाल और भाइयों लाल बिहारी व अन्य के साथ स्वयं भी करघा चलाते थे। लगभग 25 साल से बुनकारी का काम पूरे शहर में पूरी तरह बंद हो गया है। बताया कि मानपुर से आने वाला धागा तक बाद में काफी महंगा हो गया। हथकरघा से निर्मित कपड़ों की बाजार में मांग कम हो गई। बाहर बड़े मीलों से निर्मित कपड़ों की गुणवत्ता इससे अधिक बेहतर लोगों को लगने लगी। नतीजा बिक्री कम हुई और फिर धीरे-धीरे वह पूरी तरह बंद हो गया। जब उद्योग पर संकट मंडराने लगा तो लोग खादी भंडार से जुड़े। उनके लिए चादर बनाने लगे। लेकिन एक दशक भी यह काम नहीं चला और अंत तक पूरी तरह बंद हो गया।


Thursday, 20 November 2025

40 वर्ष तक चरम पर था कभी बर्तन उद्योग

 


फोटो-बर्तन बनाते भोला प्रसाद कांस्यकार

तीन बेलन मिलों से मिली थी पीतल उद्योग को प्रतिष्ठा

स्वतंत्रता पश्चात बिगड़ती गयी स्थिति, अंततः सब बर्बाद

उपेंद्र कश्यप, जागरण ● दाउदनगर (औरंगाबाद) : कभी शहर में कुटीर उद्योग के रुप में बर्तन निर्माण का कार्य व्यापक पैमाने पर होता था। बीसवीं सदी में जब भारत आजाद हुआ और 1965 में चीन ने हमला किया तब सैनिकों के लिए भी यहां के बने बर्तन भेजे गये थे। इसके पीछे की ताकत थी मशीनीकरण का होना। शुक्रबाजार ठाकुरबाड़ी से लेकर नगरपालिका तक और पूरब में बम रोड तक कसेरा एवं ठठेरा बसे हुए थे। यहां जिस पैमाने पर बर्तन बनते थे उस पैमाने पर सिर्फ मिरजापुर (उत्तर प्रदेश) में ही बनता था। इधर बिहार में आरा के पास परेव में आज भी यह निर्माण कार्य व्यापक पैमाने पर होता है मगर दाउदनगर में मात्र दो, चार परिवार तक यह काम सीमित हो गया है। वजह साफ है। समय के साथ मशीनीकरण की ओर यह इलाका नहीं बढ़ सका। बिहार में दूसरे कल कारखाने भी विकसित नहीं हो सके। आजादी के बाद स्थिति बिगड़ती गई और अंतत: सब कुछ खत्म हो गया। एक जमाना था, खासकर सात दशक पूर्व तक कि बर्तन बनाने से निकलने वाली ठक-ठक की आवाज सोन उस पार नासरीगंज तक सुनाई पड़ती थी। इसका चरम समय था 1920 के बाद से 1960 के दशक तक का। जब यहां तीन बेलन मिल लगाये गये थे। सन 1910 में सिपहां में स्थापित संगम साव रामचरण राम आयल एण्ड राइस मिल ने ये मशीनें लगायीं थीं। शुक्रबाजार में उमाशंकर जगदीश प्रसाद रौलिंग मिल, हनुमान मंदिर के नजदीक (बुद्धा मार्केट) श्रीराम बेलन मिल एवं चावल बाजार में संगम साव राम चरण साव रौलिंग मिल लगाया गया था। तीनों जगह बेलन मिल लगाए जाने से बर्तन निर्माताओं को काफी सहुलियत हुई। 

यहां सर्वाधिक 90 प्रतिशत से अधिक निर्माण पीतल की कठौती बनाने का होता था। पीतल को कोयला की भट्ठी में गलाया जाता था। उसे खोटी (एक प्रकार का बर्तन) में ढाल दिया जाता था। उसे जब ठोस आकार मिल गया तो बडा हथौड़ा जिसे घन भी कहते हैं, से पीट-पीट कर एक मीटर का घेरा में फैलाया जाता था। फिर गहरा बनाया जाता था। उसके बाद उस पर गोल-गोल बिन्दी आकार में चमक लाने के लिए पीटा जाता था। जब बेलन मिल लगा तो मजदूरों की समस्या कम हुई, मगर ठक-ठक होती रही। क्योंकि गहराई और चमक लाने का काम तब भी हाथ से ही किया जाता रहा। मिल सिर्फ खोटी को बेल कर आवश्यकतानुसार आकार दे देते थे। शुरु में मजदूरों को लगा कि मशीनीकरण से इनकी समस्या कम हुई है। यह औद्योगिकीकरण की शुरुआत भर थी, जिसने धीरे-धीरे श्रम की सामूहिक संस्कृति को खत्म किया। भोला प्रसाद कांस्यकार बताते हैं जीविकोपार्जन के लिए बर्तन दुकानदारों के लिये अब कारीगर मजदुरी पर पीतल के हांडी बनाने का काम कर रहे हैं। कारीगरों के पास पूंजी का अभाव है।



अन्य प्रदेश को पलायन मजबूरी

कसेरा टोली निवासी धीरज कसेरा कहते हैं कि आधुनिक एवं नये डिजाइन के वस्तुओं के निर्माण के लिए कोई नई तकनीकी प्रशिक्षण उपलब्ध नहीं है। पूंजी के अभाव के कारण आधुनिक मशीनों की खरीदारी नहीं कर पा रहें हैं कारीगर। यही कारण है कि दाउदनगर से कारीगर अन्य राज्यों में पलायन करते जा रहे हैं।


कांस्यकार समाज का पुश्तैनी कारोबार

कांस्यकार या कसेरा जाति का इस पुश्तैनी धन्धे पर कब्जा था। व्यापक पैमाने पर निर्माण ने घरों को, परिवारों को काफी समृद्ध बनाया। इस जाति समूह से दो जातियां यहां पूरब दिशा से आयीं। कसेरा जो पीतल का काम करते थे और ठठेरा जो कसकूट (लोटा) बनाने का काम करते थे। यहां तमेढ़ा जाति की बसावट नहीं है। यह जाति तांबा का काम करती है। यहां तांबा का बर्तन नहीं बनता था।