दो शताब्दी में पहली बार स्मारिका का प्रकाशन
लोक संस्कृति के संवर्धन व संरक्षण में मील का पत्थर
नबिटा संवाददाता
दाउदनगर (औरंगाबाद) । ई. सन 1860 से पहले दाउदनगर में जिउतिया का आरंभ कब हुआ था, यह ज्ञात नहीं है। लगभग दो शताब्दी में पहली बार जिउतिया लोक उत्सव को लेकर स्मारिका -जिउतिया का उत्कर्ष-का प्रकाशन किया गया। पहली बार बिहार सरकार ने दाउदनगर के जिउतिया को सांस्कृतिक कैलेंडर में शामिल किया। आयोजन के लिए बिहार सरकार के कला एवं संस्कृति विभाग द्वारा तीन लाख रुपये की राशि आवंटित हुई। नगर परिषद कार्यालय परिसर में आयोजन हुआ। इस अवसर पर एक स्मारिका का प्रकाशन किया गया। इस अवसर विधायक कुटुंबा ललन राम, जिलाधिकारी अभिलाषा शर्मा, नगर परिषद दाउदनगर की अध्यक्ष अंजली कुमारी, उप विकास आयुक्त कुमारी अनुपम सिंह, अपर समाहर्ता अनुग्रह नारायण सिंह, एसडीओ अमित राजन, एसडीपीओ चंद्रभूषण, जिला कला संस्कृति पदाधिकारी कुमार पप्पू राज सहित अन्य पदाधिकारी उपस्थित रहे। स्मारिक की संरक्षक जिला पदाधिकारी अभिलाष शर्मा हैं। अपर समाहर्ता अनुग्रह नारायण सिंह, दाउदनगर के अनुमंडल पदाधिकारी अमित राजन और जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी कुमार पप्पू राज संपादक मंडल में शामिल हैं। बतौर लेखक वरिष्ठ पत्रकार उपेंद्र कश्यप और बतौर सहयोगी नगर परिषद की मुख्य पार्षद अंजली कुमारी और कार्यपालक पदाधिकारी ऋषिकेश अवस्थी का नाम इसमें उल्लेखित है। बिहार सरकार के खान एवं भूतत्व विभाग सह कला एवं संस्कृति मंत्री डॉ प्रमोद कुमार, पिछड़ा वर्ग एवं अति पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग तथा जिला की प्रभारी मंत्री रमा निषाद, क्षेत्रीय विधायक डॉ प्रकाश चंद्र, कला एवं संस्कृति विभाग के सचिव प्रणव कुमार, अपर सचिव श्रीमती रूबी और जिला पदाधिकारी अभिलाष शर्मा का शुभकामना संदेश शामिल है। जबकि 10 पेज में- “लोक संस्कृति के आयामों का समुच्चय है-जिउतिया संस्कृति” शीर्षक से जिउतिया लोक संस्कृति के शोधकर्ता एवं कई पुस्तकों के लेखक उपेंद्र कश्यप का आलेख प्रकाशित किया गया है।
सांस्कृतिक यात्रा को दस्तावेज के रूप में संरक्षित करने की कोशिश
खान एवं भू तत्व विभाग के मंत्री डॉ प्रमोद कुमार ने अपने संदेश में कहा है कि यह उत्सव केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि हमारी लोक संस्कृति, परंपरा और सामुदायिक विरासत के संरक्षण एवं संवर्धन का महत्वपूर्ण माध्यम है। बदलते समय में अपनी सांस्कृतिक जड़ों को सहेजना और उन्हें नई पीढ़ी तक पहुंचाना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है। इस तरह से जिउतिया लोक उत्सव का आयोजन विशेष महत्व रखता है। इस स्मारिका का प्रकाशन इस सांस्कृतिक यात्रा को दस्तावेज के रूप में संरक्षित करने की दिशा में एक सराहनीय प्रयास है। इसमें संकलित सामग्री दाउदनगर की लोक परंपरा, सांस्कृतिक विरासत और जिउतिया उत्सव से जुड़े स्मृतियों को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचने में उपयोगी सिद्ध होगी।
पीढ़ियों के लिए उपयोगी संदर्भ बनेगी स्मारिका
अपने शुभकामना संदेश में पिछड़ा वर्ग एवं अति पिछड़ा वर्ग सह प्रभारी मंत्री औरंगाबाद रमा निषाद ने कहा है कि दाउदनगर औरंगाबाद की धरती अपनी विशिष्ट लोक संस्कृति, परंपराओं और सामाजिक समरसता के सदैव समृद्ध रही है। इस सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित, संवर्धित एवं नई पीढ़ी तक पहुंचाने की दिशा में जिउतिया उत्सव 2026 का आयोजन एक सराहनीय फल है। ऐसा आयोजन हमारी लोक परंपराओं को जीवंत बनाए रखने के साथ-साथ स्थानीय कला, लोकगीत, लोक नृत्य एवं सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों को एक सशक्त मंच प्रदान करते हैं। उन्होंने कहा कि स्मारिका उत्सव की गतिविधियों, लोक परंपराओं एवं सांस्कृतिक विरासत का दस्तावेजीकरण करने का महत्वपूर्ण माध्यम बनेंगे। मुझे विश्वास है कि यह स्मारिका आने वाली पीढियों के लिए हमारी समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर को समझने और उसे जोड़ने का उपयोगी संदर्भ बनेगी। क्षेत्रीय विधायक डॉ प्रकाश चंद्र ने अपने संदेश में कहा है कि दाउदनगर की मिट्टी में लोक संस्कृति की गहरी जड़े हैं और जिउतिया पर्व उसके समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रतीक है। पर्व की विशेषता केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है। अपितु स्थानीय कलाकारों द्वारा प्रस्तुत विविध लोक कलाएं जीवंत सांस्कृतिक पहचान को अभिव्यक्त करती है। इस वर्ष जितिया पर्व को राजकीय स्तर पर मनाने की पहल के लिए जिला प्रशासन और सभी सहयोगियों को प्रति हार्दिक आभार। इस गौरवशाली लोक परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुंचाना और सांस्कृतिक गरिमा को बनाए रखना हम सभी का साझा दायित्व है।
स्मारिका का प्रकाशन सराहनीय
इस स्मारिका में प्रकाशित अपने शुभकामना संदेश में कला एवं संस्कृति विभाग के सचिव प्रणव कुमार ने लिखा है कि स्मारिका इस सांस्कृतिक विरासत को शब्दों और दस्तावेजों के रूप में संरक्षित करने की दिशा में एक सराहनीय पहल है। इसमें जिउतिया की परंपरा, दाउदनगर की सांस्कृतिक पहचान और लोक जीवन से जुड़े विविध पक्षों का संकलन आने वाली पीढियों के लिए महत्वपूर्ण सांस्कृतिक धरोहर के रूप में उपयोगी होगी। इसी विभाग की अपर सचिव श्रीमती रूबी ने लिखा कि यह आयोजन हमारी लोक परंपराओं, लोक कला एवं सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण, संवर्धन और नई पीढ़ी तक उनका स्थानांतरण की दिशा में एक सराहनीय पहल है। ऐसे आयोजन हमारी सांस्कृतिक जड़ों को मजबूत करने के साथ-साथ लोक कलाकारों को अपनी कला के प्रदर्शन का अवसर के प्रदान करते हैं। स्मारिका की संरक्षक जिला पदाधिकारी अभिलाष शर्मा ने लखा कि जितिया का उत्कर्ष नाम से प्रकाशित स्मारिका का प्रकाशन किया जा रहा है। जितिया पर्व हमारी समृद्ध लोक परंपरा, आस्था, मातृ स्नेह एवं पारिवारिक मूल्यों का जीवन प्रतीक है। यह पर्व हमारी लोक संस्कृति की उन परंपराओं को अभिव्यक्त करता है जो पीढ़ी दर पीढ़ी समाज को अपनी संस्कृति से जोड़े रखने का कार्य करती है। दाउदनगर के ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक धरती पर जिउतिया लोक उत्सव का आयोजन हमारे लोक विरासत को संरक्षित, संवर्धित एवं नई पीढ़ी तक पहुंचने की दिशा में एक ठोस पहल है। इस अवसर पर प्रकाशित की जा रही स्मारिका भी इस आयोजन की सांस्कृतिक स्मृतियों, लोक परंपराओं एवं क्षेत्र के समृद्ध विरासत को समझने का महत्वपूर्ण माध्यम बनेगी। आशा है कि यह आयोजन लोक कलाकारों, साहित्यकारों एवं कला संस्कृति से जुड़े प्रतिभाओं को प्रोत्साहित करने के साथ-साथ हमारी सांस्कृतिक विविधता और सामाजिक समरसता को भी सुदृढ़ करेगा।
लोक संस्कृति के आयाम को बताता है आलेख
स्मारिका में उपेंद्र कश्यप द्वारा प्रकाशित आलेख -”लोक संस्कृति के आयाम का समुच्चय है जिउतिया संस्कृति”- में इसके धार्मिक, सांस्कृतिक, पारंपरिक और कलात्मक पहलुओं को बखूबी बताया गया है। इसके साथ-साथ यह बताया गया है कि दाउदनगर में जिउतिया के अवसर पर प्रस्तुत कलाओं में लोक संस्कृति के सभी आयामों की प्रचुरता में उपलब्धता है। यह भी बताया गया है कि दाउदनगर की जिउतियां संस्कृति का जुड़ाव महाराष्ट्र की संस्कृति से कैसे है। लोक साहित्य, लोक कला, लोक विज्ञान और लोक व्यवहार के निकट पर दाउदनगर की जिउतिया लोक संस्कृति को परखने की कोशिश उनके आलेख में मिलती है। स्मारिका यह भी बताती है कि दाउदनगर की जिउतिया के कलाकार आखिर ज्ञानचंद उस्ताद समेत अन्य उस्तादों का जयकारा क्यों लगाते हैं। आलेख यह भी बताता है कि जीमूतवाहन के मंदिर में ओखली क्यों रखे जाते हैं, और महिलाएं जो सोने चांदी की जितिया पहनती हैं वह नाव आकार का ही क्यों होता है।









































