![]() |
| 09.02.2026 को दैनिक जागरण में प्रकाशित रिपोर्ट |
पहली बार बजट तैयार करने में बेलने पड़े थे बहुत पापड़
कई दशक तक बनाया ही नहीं गया था बजट
सरकार के दबाव व धमकी के बीच बहुत कुछ बदल गया
उपेंद्र कश्यप, जागरण ● दाउदनगर (औरंगाबाद) : वर्ष 1885 में गठित नगर पालिका में पहली बार 1938 में नागरिक समाज से सूरज नारायण सिंह को अध्यक्ष बनाया गया था। वे मनोनीत थे। इसके पहले 1937 तक एसडीओ औरंगाबाद ही अध्यक्ष हुआ करते थे। सूरज नारायण सिंह के बाद 12 वे अध्यक्ष बने परमानंद प्रसाद। वे नौ जून 2007 से 2012 तक और फिर 27 जून 14 से 2017 तक अध्यक्ष रहे। अभी तक मनोनीत या निर्वाचित सभी चेयरमैनों में सर्वाधिक समय तक परमानंद प्रसाद ही अध्यक्ष रहे हैं। उन्होंने नगर परिषद (तब नगर पंचायत) की सबसे बड़ी समस्या को समाप्त किया था। वह बताते हैं कि कार्यालय की स्थिति यह थी कि कहीं लिखा पढ़ी नहीं थी। जो कर्मचारी कहे वही सही मान लिया जाता था। पंजी तक चेयरमैन के सामने नहीं लाते थे। सब खो गया कह दिया जाता था। बजट नहीं था। कर्मचारियों को कोई प्रशिक्षण प्राप्त नहीं था। सभी कर्मियों का 14 महीने का वेतन बकाया था। इधर बिहार सरकार का नगर विकास आवास विभाग तमाम नगर निकायों पर लगातार बजट बनाने का दबाव बना रहा था। इन्होंने कर्मचारियों से इस बाबत बैठक की। इन्हें लगा कि कोई कर्मचारी सहयोग करने को तैयार नहीं है और हर कोई बजट बनाने से बचना चाह रहा है। मूल मुद्दा यह था कि राजस्व की वसूली करने वाले तहसीलदारों ने सैरातों की बंदोबस्ती और गृह कर की वसूली तो की लेकिन वह राशि बैंक में जमा नहीं हुआ। डिमांड पोस्टिंग वर्षों से लटका रहा। कर्मचारियों का बकाया पैसा देने के लिए धन नहीं था। निबंधन कार्यालय से मिलने वाले धन को पटना स्थित महालेखाकार तक दौड़ा लगाकर उन्होंने लाया और कर्मचारियों का वेतन भुगतान हुआ। इसके बाद करारोपण कराया गया। राजस्व की जानकारी ली गई और चाहे जैसे भी हो बजट तैयार करने का विभागीय दबाव के बीच परमानंद प्रसाद ने सभी कर्मचारियों को विश्वास में लिया और बजट बनाने का काम शुरू किया। इधर सरकार लगातार दबाव बनाने के साथ धमकी भी दे रही थी कि अगर बजट नहीं बना तो योजना के लिए राशि नहीं मिलेगी। जनसंख्या के मुताबिक विकास योजना के लिए सरकार राशि देती थी। परमानंद प्रसाद बताते हैं कि सभी कर्मचारियों के साथ बैठक कर वित्तीय अनुशासन लागू करने का लगातार प्रयास किया। सब कार्य बंद कर इस बात पर ध्यान दिया गया कि वित्तीय अनुशासन कायम हो। पंजियों को ढूंढ कर निकलवाया गया। सबको व्यवस्थित किया व करवाया गया। कर्मचारियों को सामूहिक निलंबन और फिर बर्खास्त करने की धमकी दी, तब जाकर बजट बना। लगभग छह महीने की कोशिश के बाद डिमांड पोस्टिंग का काम यानी लेखा पंजी दुरुस्त करने का काम हुआ। पंजीयों का मिलान कराया गया। परमानंद प्रसाद बताते हैं कि बड़ी कोशिश के बाद कार्यालय में अनुशासन आया। सभी को स्थापना से जोड दिया गया। कर्मचारी का दायित्व तय किया गया और काम करने का एक रास्ता बना दिया गया। उनके सामने बड़ी चुनौती नगर निकायों में अपना कार्यपालक पदाधिकारी का नहीं होना था। प्रभार से काम चलता था। इसलिए काम कराने के लिए हर समय पदाधिकारी उपलब्ध नहीं होते थे। पदाधिकारी के पास जाकर दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करवाने की मजबूरी थी। परमानंद प्रसाद के कार्यकाल की सबसे बड़ी उपलब्धि वित्तीय अनुशासन, हर काम के लिए एक रूट मैप तैयार करना और वर्ष 2009 में बजट पारित करना माना जाएगा। इसके बाद ही प्राय प्रत्येक वर्ष (एकाधिक वर्ष छोड़कर) बजट बनाए जाने लगे।
अब बजट के लिए जनसभागिता पर जोर
अब नगर परिषद में बजट बनाने के लिए जन सहभागिता पर जोर दिया जा रहा है। मुख्य पार्षद अंजली कुमारी ने बजाप्ता इसके लिए इंटरनेट मीडिया पर संदेश लिखकर लोगों से सुझाव आमंत्रित किया है, ताकि बजट तैयार करने में जनता के सुझाव और मांग को शामिल किया जा सके। उन्होंने नगरवासियों से वित्तीय वर्ष 2026–27 हेतु बजट निर्माण के लिए वार्ड, मोहल्ले या नगर के समग्र विकास के लिए किसी भी प्रकार की परियोजना, कार्य प्रस्ताव की मांग की। ताकि विकास योजनाएएं जनभावनाओं के अनुरूप तैयार हो सके।







