Saturday, 11 July 2026

लोकसंस्कृति के संरक्षण में उपेंद्र कश्यप का ऐतिहासिक योगदान

 लोकसंस्कृति के संरक्षण में उपेंद्र कश्यप का ऐतिहासिक योगदान


■डॉ. कुणाल किशोर, प्राध्यापक-दाउदनगर महाविद्यालय

(संदर्भ-दाउदनगर के जिउतिया को राजकीय दर्जा)



दाउदनगर के ऐतिहासिक जिउतिया पर्व को बिहार सरकार द्वारा राजकीय दर्जा (आवंटन शेष) प्रदान किया जाना इस क्षेत्र की सांस्कृतिक चेतना और लोक परंपरा के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। यह निर्णय केवल एक लोकपर्व की प्रशासनिक मान्यता नहीं, बल्कि दाउदनगर की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को सम्मान देने का प्रयास है। इससे इस पर्व के संरक्षण, संवर्धन और व्यापक प्रचार-प्रसार की नई संभावनाओं के द्वार खुलेंगी।


किसी भी लोकपर्व की प्रतिष्ठा केवल जनआस्था से नहीं बनती, बल्कि उसके इतिहास, सांस्कृतिक महत्व और सामाजिक भूमिका को शोध एवं अकादमिक विमर्श का विषय बनाए जाने से भी सुदृढ़ होती है। दाउदनगर के जिउतिया को इसी स्तर पर स्थापित करने में साहित्यकार और शोधकर्ता उपेंद्र कश्यप का योगदान अत्यंत उल्लेखनीय है।

उपेंद्र कश्यप ने अपने शोध, लेखन और दस्तावेजीकरण के माध्यम से दाउदनगर के जिउतिया की सांस्कृतिक विशिष्टता को व्यापक समाज के सामने रखा। उनकी चर्चित पुस्तक "श्रवण संस्कृति का वाहक-दाउदनगर” और “उत्कर्ष" इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कृति मानी जाती है, जिसमें जिउतिया की परंपरा, लोकविश्वास, सांस्कृतिक विकास और सामाजिक महत्व का गंभीर विश्लेषण मिलता है। यह पुस्तक केवल एक सांस्कृतिक दस्तावेज नहीं, बल्कि लोकजीवन को समझने का महत्वपूर्ण स्रोत भी है।

पुस्तक लेखन के अतिरिक्त उपेंद्र कश्यप ने दैनिक जागरण तथा प्रांतीय व राष्ट्रीय स्तर के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर लेख लिखकर जिउतिया की ऐतिहासिकता, सांस्कृतिक गरिमा और सामाजिक महत्व को जन-जन तक पहुँचाने का कार्य किया। उनके लेखों ने न केवल इस पर्व को व्यापक पहचान दिलाई, बल्कि शोधार्थियों, इतिहासकारों और संस्कृति के अध्येताओं का ध्यान भी इस ओर आकर्षित किया। यह प्रयास इस बात का प्रमाण है कि लोकसंस्कृति का संरक्षण केवल उत्सवों से नहीं, बल्कि गंभीर लेखन और बौद्धिक हस्तक्षेप से भी संभव होता है।

आज जब दाउदनगर के जिउतिया को राजकीय दर्जा प्राप्त हो चुका है, तब उपेंद्र कश्यप जैसे शोधकर्ताओं के योगदान को स्मरण करना आवश्यक है। उनके वर्षों के अध्ययन, लेखन और सांस्कृतिक प्रतिबद्धता ने इस लोकपर्व को अकादमिक पहचान दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण आधार तैयार किया। यह उपलब्धि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी प्रेरणा है कि लोकपरंपराओं का संरक्षण केवल भावनात्मक आग्रह से नहीं, बल्कि शोध, लेखन और दस्तावेजीकरण से भी होता है।

राजकीय दर्जा दाउदनगर के जिउतिया के लिए एक नई शुरुआत है। अब आवश्यकता इस बात की है कि विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों और सांस्कृतिक संगठनों द्वारा इस विषय पर और अधिक अध्ययन, शोध, संगोष्ठियाँ तथा प्रकाशन किए जाएँ। इससे दाउदनगर का जिउतिया केवल बिहार ही नहीं, बल्कि भारतीय लोकसंस्कृति के एक महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में स्थापित होगा। इस दिशा में उपेंद्र कश्यप का योगदान निस्संदेह ऐतिहासिक, प्रेरणादायी और सम्मान का अधिकारी है।



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सांस्कृतिक कैलेंडर में शामिल हुआ दाउदनगर जिउतिया लोकोत्सव

 




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◆ कुछ महत्वपूर्ण पड़ाव-

● पहली बार 1995 में राष्ट्रीय नवीन मेल में आठ कॉलम में एक आलेख उपेंद्र कश्यप की प्रकाशित हुई थी, जिसमें यह बताने का प्रयास किया गया था कि इस लोक उत्सव का आयाम बहुत व्यापक है।

■ वर्ष 2000 सितंबर में न्यूज़ ब्रेक में पहली बार जिउतिया से संबंधित खबरें रंगीन तस्वीरों के साथ चार पेज में छपी और पूरे बिहार में इसकी चर्चा हुई। नतीजा यह हुआ कि तब एशियन न्यूज इंटरनेशनल (एएनआई) के बिहार ब्यूरो प्रशांत झा यहां पहुंचे और पहली बार इंटरनेशनल स्तर पर वीडियो रिपोर्ट प्रसारित हुई। 

■ पटना व दिल्ली से प्रकाशित विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर लिखता रहा।

■ वर्ष 2016 में पहली बार नगर पंचायत द्वारा मेरी पहल पर जिउतिया लोकोत्सव का आयोजन हुआ। तब मुख्य पार्षद परमानंद प्रसाद थे।

■ 09 जुलाई 2026 को बिहार सरकार द्वारा जारी सांस्कृतिक कैलेंडर में चार दिवसीय जिउतिया लोकोत्सव को शामिल किया गया। प्रयास मुख्य पार्षद अंजली कुमारी का सफल हुआ।

■ अब आगे क्या? 

अभी आवंटन नहीं हुआ है। नगर परिषद की मुख्यपार्षद अंजली कुमारी ने 27 लाख रुपये खर्च करने का बजट प्रस्ताव बिहार सरकार को भेजा है। एक अधिकारी के अनुसार 05 लाख का आवंटन पहली बार प्राप्त हो सकता है। बाद में यह राशि बढ़ सकती है। 

■ आवंटन प्राप्त होते ही नगर परिषद की भूमिका सीमित हो जाएगी। प्राप्त आवंटन से खर्च का अधिकार बीडीओ के पास जा सकता है। समन्वय की आवश्यक्ता पड़ेगी।


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सिर्फ सांस्कृतिक कैलेंडर में जिउतिया लोकोत्सव का शामिल होना लक्ष्य नहीं

 



आवंटन स्वीकृत होने समेत अभी कई कार्य होना शेष 


1995 से जारी कोशिश को मिला है एक पड़ाव 

मीडिया की रही है बड़ी भूमिका 

अब होगी आगे की यात्रा आरंभ 

डॉ. उपेंद्र कश्यप 

दाउदनगर (औरंगाबाद) । बिहार सरकार के कला एवं संस्कृति विभाग अंतर्गत सांस्कृतिक कार्य निदेशालय द्वारा जारी सांस्कृतिक कैलेंडर 2026 में दाउदनगर के जिउतिया लोकोत्सव को शामिल किया गया है। बिहार के प्रायः सभी जिलों से किसी ने किसी महोत्सव को इस सूची में शामिल किया गया है। औरंगाबाद जिला से 10 महोत्सव इस सूची में शामिल है और सभी के लिए न्यूनतम दो से अधिकतम 15 लाख रुपए तक का आवंटन प्राप्त हुआ है। सर्वाधिक 15 लाख रुपए देव महोत्सव के लिए आवंटित है। लेकिन दाउदनगर जिउतिया लोकित्सव के लिए अभी राशि का आवंटन नहीं हुआ है। इसके लिए अभी प्रयास करना होगा। सांस्कृतिक कैलेंडर में नाम आ जाना मात्र अंतिम लक्ष्य नहीं है। 1995 से लगातार राजकीय दर्जा दिलाने के साथ बिहार-झारखंड विभाजन के बाद से राज्य की प्रतिनिधि संस्कृति बनाने की मांग हम उठाते रहे। इसमें मीडिया की बड़ी भूमिका रही है। सांस्कृतिक कैलेंडर में शामिल हो जाना तो मात्र एक पड़ाव है। आगे की यात्रा अभी जारी रखनी होगी। कभी लोग हंसते थे। अविश्वसनीय बताते थे, आज जश्न मना रहे हैं लोग। इस लोक उत्सव को लेकर पत्रकारों और लोगों में मात्र इतनी समझ थी कि यह नौ दिन तक मनाया जाने वाला लोक उत्सव है। जिसमें बम्मा माई और भगवान जीमूतवाहन की पूजा होती है। संतान की रक्षा की कामना की जाती है। एक कहावत प्रचलित है कि- खैर मनाव कि मां जितिया की है,  कि जान बच गई। यह कहावत हर उस बार कही जाती थी जब कोई व्यक्ति किसी दुर्घटना या बीमारी में जीवित बच जाता था। लेकिन जितिया लोकोत्सव का आयाम बस इतना भर नहीं था। 


पहली बार 1995 में राष्ट्रीय नवीन मेल में आठ कॉलम में एक आलेख उपेंद्र कश्यप की प्रकाशित हुई थी, जिसमें यह बताने का प्रयास किया गया था की इस लोक उत्सव का आयाम बहुत व्यापक है। यह लोकयान के निकष पर सबसे व्यापक प्रभाव छोड़ने वाला लोकोत्सव है। इसके बाद बिहार (तब झारखंड भी साथ था), दिल्ली से प्रकाशित कई पत्र पत्रिकाओं में लगातार जिउतिया के सांस्कृतिक विशेषताओं पर मेरे लेख छपे। वर्ष 2000 का सितंबर माह काफी महत्वपूर्ण पड़ाव साबित हुआ। जब बिहार से प्रकाशित न्यूज़ ब्रेक में पहली बार जिउतिया से संबंधित खबरें रंगीन तस्वीरों के साथ चार पेज में छपी और पूरे बिहार में इसकी चर्चा हुई। नतीजा यह हुआ कि तब एशियन न्यूज इंटरनेशनल (एएनआई) जिसका लोगो आप प्राय: प्रतिदिन दर्जनों बार विभिन्न न्यूज़ चैनलों पर देखते हैं, के बिहार ब्यूरो प्रशांत झा ने मुझसे संपर्क किया। तब न्यूज़ ब्रेक के संपादक चंदेश्वर विद्यार्थी थे जो अभी जीवित नहीं है। तब इस टीम में नवेन्दु भी शामिल थे। जो आज भी सक्रिय हैं। प्रशांत झा ने तब (मोबाइल का जमाना नहीं था) विवेकानंद स्कूल आफ एजुकेशन बाजार समिति के पास लैंडलाइन पर कॉल किया था। वे दाउदनगर पहुंचे। पहली बार दाउदनगर के जितिया लोकोत्सव का कवरेज कोई टीवी चैनल वाला ग्रुप कर रहा था वह भी इंटरनेशनल लोगो के साथ। इसका व्यापक प्रसारण हुआ। इसके बाद 11 सितंबर 2001 को दैनिक जागरण के अपना प्रदेश परिशिष्ट में - जिउतिया के अवसर पर सांस्कृतिक कार्यक्रम आज भी जीवित- शीर्षक से लगभग आधे पेज का आलेख छपा। आज के ताना-बाना, आउटलुक सप्ताहिक, फारवर्ड प्रेस जैसी बाइलिंगुअल पत्रिका समेत कई में लगातार इस मुद्दे पर लिखता रहा। और या मांग उठाई जाती रही कि जिउतिया को राजकीय दर्जा दिया जाए। लगभग तमाम मंचों पर जनप्रतिनिधियों द्वारा मांग की जाती रही। लेकिन मंच से उतरने के बाद ना उनको जितिया याद था ना घोषणा याद रही। इन महत्वपूर्ण प्रयासों के बाद सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव वर्ष 2016 में आया, जब परमानंद प्रसाद मुख्य पार्षद थे और कौशलेंद्र सिंह उपमुख्यपार्षद। विपिन बिहारी सिंह कार्यपालक पदाधिकारी थे। तब मेरी बात परमानंद प्रसाद ने मानी और दाउदनगर नगर पंचायत कार्यालय परिसर में पहली बार जिउतिया लोकोत्सव के नाम से आयोजन हुआ। तमाम जज तब बाहर के रखें ताकि निर्विवाद रूप से प्रतियोगिता के सफल अभ्यर्थियों का चयन हो सके। जितनी राशि तब के आयोजन में बतौर नगद पुरस्कार बंटी, उतनी राशि आज तक किसी टीम या आयोजकों द्वारा नहीं बांटी गई। इसके बाद परमानंद प्रसाद बतौर अध्यक्ष वापस नहीं लौटे।

इधर नगर पंचायत नगर परिषद के रूप में उत्क्रमित होने से 2017 में चुनाव नहीं हुआ। मैं दाउदनगर छोड़कर डेहरी चला गया था और यहां प्रेशर बनाने में लोग असफल रहे। नतीजा कार्यपालक पदाधिकारी ने परमानंद प्रसाद द्वारा जारी की गई परंपरा को विराम दे दिया। उसके बाद नगर परिषद का चुनाव हुआ। यह दुर्भाग्य रहा परंपरा को आगे नहीं बढ़ा सके लोग। लोक कलाकारों के आंदोलन के बाद मीनू सिंह जब मुख्य पार्षद थी तो आयोजन हुआ। और तब से अब लगातार चल रहा है। मुख्य पार्षद अंजली कुमारी लगातार प्रयास करती रही, तब जाकर एक आरंभिक सफलता यह मिली है कि सांस्कृतिक कैलेंडर 2026 में दाउदनगर लोक उत्सव का नाम शामिल हो गया। इससे होगा यह कि बिहार की सत्ता और प्रशासन की नजर में अब यह स्थाई रूप से दिखाता रहेगा। अब आगे अधिकाधिक राशि आवंटन की लड़ाई चलेगी, ताकि जितिया लोकोत्सव को और भव्यता प्रदान हो सके।


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Thursday, 11 June 2026

ममता बनर्जी और तृणमूल में बिखराव

 ◆ चूहा बोलो या छछूंदर, साथ कौन रहता है? ◆



(संदर्भ- तृणमूल में विखराव और उस पर आयी प्रतिक्रिया) 

 ● डॉ. उपेंद्र कश्यप ●


पश्चिम बंगाल चुनाव परिणाम आने के साथ ही तृणमूल कांग्रेस में बिखराव शुरू हो गया। 28 में 19 सांसद अलग गुट बनाने की अर्जी लोकसभा अध्यक्ष के पास दे चुके हैं। इधर 80 में लगभग 60 विधायक का अलग गुट पश्चिम बंगाल में बन गया है। अब इस घटना के बाद टीएमसी ही नहीं बल्कि आईएनडीआईए गठबंधन के दूसरे नेता भी यह रोना रो रहे हैं कि जो छोड़कर पार्टी गए वह अपने पद से इस्तीफा दें। यानी विधायकी और सांसदी छोड़ दें। इसके बाद फिर जनता के बीच जाएं, चुनाव लड़ें, और तब उनको आटा चावल का भाव पता चल जाएगा। इसके पहले भी लोग टूटते रहे हैं। नेता का तो मतलब ही है कि उगते सूरज के साथ या उगे हुए सूरज के साथ ही रहना। डूबते सूरज के साथ तो कोई नेता रहता ही नहीं। और यही नहीं अगर यह आशंका भी दिख जाए कि उनका शीर्ष नेतृत्व अगर डूबने की स्थिति में है तो सबसे पहले नेता भागते हैं। यह और बात है कि नेता यह प्रलाप करते हैं, कहावत सुनाते हैं कि- जब जहाज डूब रहा होता है तो सबसे पहले चूहे भागते हैं। अपने यहां एक कहावत है- फिसलते में दुलत्ती मार देना। यानी कोई व्यक्ति अगर चिकनी मिट्टी पर फिसल रहा है तो उसे संभालो नहीं लात मार दो कि वह पूरी तरह बर्बाद हो जाए। यही राजनीति में होते रहा है। यही हो रहा है और ऐसा ही होता रहेगा, यह तय है। जब तक राजनीति रहेगी, ऐसी घटनाएं सामने आती रहेंगी।  इसलिए भागने वालों को डूबते जहाज से पहले चूहा भागने की बात कहने वाले भी यह तो मान ही रहे हैं ना कि जहाज अब डूबने वाला है। यह और बात है कि भागने वाले को चूहा ठहरा रहे हैं। लेकिन राजनीतिक शब्दावली में यह चूहे तो नहीं हैं। राजनीतिक शब्दावली में इनके लिए सटीक शब्द मौसम वैज्ञानिक होना चाहिए। ऐसे में एक वैज्ञानिक की आलोचना भला कैसे की जा सकती है? जो उन्होंने दिव्य ज्ञान प्राप्त किया हुआ है, वह अपनी दिव्य दृष्टि से यह देख रहे हैं कि जहाज डूब रहा है, तो वे भाग रहे हैं। अब भला डूबते जहाज पर रहता कौन है। यह शिकायत सिर्फ राजनीतिक बिरादरी से ही क्यों? ऐसा तो सभी करते हैं। और ऐसा करने वाले दुनियावी समझ वाले व्यक्ति कहे जाते हैं। अब उनको आप चूहा कहिए चाहे छछूंदर कहिए, उससे क्या फर्क पड़ता है। राजनीति में कोई किसी का सगा नहीं होता और राजनीतिज्ञों के तो गुण में ही धूर्तता, चाटुकारिता, अवसरवादिता समाहित है। इसके बिना तो कोई नेता बन ही नहीं सकता। इसीलिए हम अक्सर देखते हैं कि जब कोई नेता का कद बढ़ता है तो वह सबसे पहले अपना कद बढ़ाने वाले को ही लात मारता है।


■ हालात बदलने हैं तो यह करना आवश्यक ■


वास्तव में अगर हालात सुधारने हैं तो विवेकाधिकार से काम नहीं चलेगा, इसे खत्म होना चाहिए। कानून की लाठी से ही कुछ उम्मीद की जा सकती है। यह कानून ही बना दिया जाना चाहिए कि जब भी कोई विधायक या सांसद या कोई भी पदधारक अगर पार्टी छोड़ता है, चाहे उसकी संख्या जितनी बड़ी हो, उसकी सदस्यता समाप्त हो जाएगी। ठीक वैसे ही जैसे पार्टी छोड़ने पर विधायकी और सांसदी चली जाती है,जल जबकि पार्टी निकाले तो बची रह जाती है। यह नियम हर संख्या या बड़े समूह पर भी लागू होनी चाहिए। लेकिन इसके साथ-साथ यह भी होना चाहिए कि चुनाव में जो जिसे गलिया रहा है उसके साथ वह चुनाव बाद गठबंधन नहीं करेगा। और जो गठबंधन में चुनाव लड़ेगा वह चुनाव बाद गठबंधन अगले चुनाव आने तक नहीं तोड़ सकता है। इसलिए कि यही अंतिम सत्य है कि चाहे देशहित और जनहित की बात नेता जितना कर ले, सबसे पहले वह स्वहित देखता है। उसके बाद दलहित देखता है, उसके बाद परिवारहित देखता है। उसके बाद जाति का हित देखता है, तब जमात और तब देश का हित देखता है। इसलिए कठोर सुधार की जरूरत है ल। अन्यथा डूबते जहाज छोड़िए, जहाज डूबने की आशंका भी दिखने पर लोग भागेंगे ही भागेंगे। अब उन्हें आप चूहा कहिए या छछूंदर। इससे भला क्या फर्क पड़ता है।


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Thursday, 7 May 2026

हर बार टूटती रही है मंत्रिमंडल में हिस्सेदारी का सपना

 


21 वर्ष में मात्र 22 महीने मिला है-मंत्री-सुख

नौ बार रही है जदयू भाजपा की सरकार 

उपेंद्र कश्यप

दाउदनगर (औरंगाबाद) ।

वर्ष 2005 में दूसरी बार अक्टूबर में हुए बिहार विधानसभा चुनाव के बाद से अब तक भाजपा और जदयू की नौ बार सरकार बन चुकी है। प्रायः हर बार यह उम्मीद रही कि औरंगाबाद जिला को मंत्रिमंडल में हिस्सेदारी मिलेगी। लेकिन 21 साल में मात्र 22 महीने की हिस्सेदारी से ही “मंत्री-सुख” औरंगाबाद जिला के नाम अंकित है। इस बार भी ऐसी उम्मीद थी कि जब औरंगाबाद जिले के छह में पांच विधायक एनडीए से हैं तो शायद जिले की भागीदारी भी हो। लेकिन ऐसा न हो सका। वर्ष 2005 में जदयू भाजपा को तीन, राजद को दो और तब अलग चुनाव लड़ी लोक जनशक्ति पार्टी को एक विधायक मिला था। तब भी सरकार में औरंगाबाद जिले को हिस्सेदारी नहीं मिली। वर्ष 2010 में जिले के मतदाताओं ने जदयू व भाजपा के खाते में पांच और निर्दलीय को एक सीट दिया, तो उम्मीद फिर जगी कि बिहार सरकार के मंत्रिमंडल में किसी को जगह मिलेगी। तब औरंगाबाद से भाजपा के विधायक रामाधर सिंह

बिहार सरकार में सहकारिता मंत्री बनाए गए। लेकिन विवादों की वजह से वह मात्र 22 महीना ही मंत्री रह सके। सिर्फ 26 अगस्त 2011 से 16 जून 2013 यानी लगभग 22 माह। तब से लेकर आज तक औरंगाबाद जिले के किसी भी विधायक को मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिली। वर्ष 2015 में जब नीतीश कुमार राजद के साथ चले गए तो, औरंगाबाद में मात्र दो विधायक भाजपा जदयू से जीते और महा गठबंधन को चार विधायक मिले। वर्ष 2020 में जब चुनाव हुआ तो औरंगाबाद जिला से एनडीए का सुपड़ा साफ हो गया। सभी छह सीट राजद और कांग्रेस के खाते में गए। तब औरंगाबाद के किसी विधायक को मंत्रिमंडल में शामिल करने का प्रश्न ही नहीं था। जब 2025 में विधान सभा का चुनाव हुआ, तो इस जिले में एनडीए को पांच और महागठबंधन को मात्र एक विधायक मिला। जब नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने तो उम्मीद की गई कि इस बार हिस्सेदारी मिलेगी। तब भी निराशा हाथ लगी। और अब जब सात मई 2026 को एनडीए की सरकार चला रहे सम्राट चौधरी मंत्रिमंडल का विस्तार हुआ तब भी कोई हिस्सेदारी नहीं मिली। इस 26 साल में जदयू के हाथ से सत्ता भले ही भाजपा के हाथ चली गई, लेकिन मंत्रिमंडल में हिस्सेदारी का सपना अधूरा ही रह गया।



अंत में एक सवाल:-

नए मंत्रिमंडल विस्तार से एक सवाल उठता है कि क्या औरंगाबाद जातीय समीकरण और क्षेत्रीय संतुलन साधने की राजनीतिक विवशता लायक नहीं है, जो इसकी आकांक्षा पूरी नहीं होती। सवाल इसलिए कि मंत्रिमंडल गठन में हर बार यह तर्क दिया जाता है कि जाति और क्षेत्र का ख्याल रखा जाता है। 


औरंगाबाद जिले में एनडीए के विधायक:-

ओबरा से लोजपा आर के डॉ. प्रकाशचंद्र, औरंगाबाद से भाजपा के त्रिविक्रम नारायण सिंह, नबीनगर से जदयू से चेतन आनंद, रफीगंज से जदयू के प्रमोद कुमार सिंह और कुटुंबा सुरक्षित से हम के ललन राम। 


ओबरा से जगी थी उम्मीद 

वर्ष 2025 के चुनाव में ओबरा में चुनावी सभा को संबोधित करते हुए एलजेपीआर सुप्रीमो चिराग पासवान ने जो संकेत दिया था उससे यह उम्मीद जगी थी कि डा.प्रकाश चंद्र को मंत्रिमंडल में शामिल किया जा सकता है। ऐसा भी नहीं हुआ।

Monday, 4 May 2026

पश्चिम बंगाल में भाजपा की जीत विपक्ष के लिए सबक

 


● जनता, ईवीएम और संवैधानिक संस्थाओं को बख्शे विपक्ष ●

◆ विपक्ष को ले डूबेगा मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति ◆


● उपेंद्र कश्यप ●

लेखक व वरिष्ठ पत्रकार


पश्चिम बंगाल में बीजेपी जीत गई। यह जीत होना बीजेपी के लिए कम, देश की राजनीति और लोकतंत्र के लिए अति आवश्यक था। इसके कारण स्पष्ट हैं। बंगाल की पारंपरिक राजनीति को अगर देखें तो 30 साल लगातार कांग्रेस, 34 साल लगातार वामपंथी और अब 15 साल लगातार तृणमूल कांग्रेस की सत्ता रही। राजनीतिक दलों और उनके समर्थकों की प्रवृत्तियां वामपंथी शासन के जमाने में जो आरंभ हुई थी वह रूढ़ होती हुई तृणमूल कांग्रेस तक चली आयी। नतीजा जनता को विकल्प चुनने के अलावा कोई रास्ता नहीं बच गया था, और वह विकल्प बनी भाजपा और तृणमूल कांग्रेसी कांग्रेस हाशिये पर चली गई। जिस वामपंथ का गढ़ था पश्चिम बंगाल, वहां से वह लगभग खत्म हो गयी, साथ ही इसी दुर्दशा को कांग्रेस प्राप्त हो गयी। ऐसा उनकी नीतियों के कारण हुआ। सत्ता के अहंकार में तृणमूल वामपंथियों की दुर्गति के फलस्वरूप प्राप्त अपनी सत्ता से सबक नहीं ले सकी। वामपंथियों के राज्य में भी कोलकाता में जीना आसान नहीं था और वही हाल तृणमूल ने कर रखी थी। बंगाल में यह आम बात थी कि अगर आपको घर बनाना है तो ईट, सीमेंट के लिए भी तृणमूल के नेताओं को कट मणि देनी होगी। जमीन खरीदनी है तो भी। यानी विकास का छोटा सा भी काम अगर कोई नागरिक कर रहा है तो उसे एक हिस्सा तृणमूल के नेताओं को संतुष्ट करने के लिए खर्च करना पड़ता था। इतना ही नहीं लोकतंत्र की दुहाई देने वाला विपक्ष सेलेक्टिव था और तृणमूल के आतंक के आगे खामोश था। वोट देने से रोका जा रहा था। तृणमूल वोट न देने वालों की हत्याएं की गई। घर जलाए गए। यही सब तो वामपंथी भी करते थे। याद करिए बिहार का वह दौर जब हर चुनाव में हत्याएं होती थी और एक दौर वह आया जब हत्या तो छोड़िए वोट देने से रोकने की घटनाएं तक खत्म हो गई। बिहार में सामाजिक परिवर्तन हुआ। राजनीतिक परिवर्तन हुआ। टीएन शेषण की सख्ती के बीच 1995 में चुनाव हुआ, तब भी लालू यादव ने चुनाव आयोग पर कई गंभीर आरोप लगाए थे, लेकिन 167 सीट लाकर लालू प्रसाद यादव पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने में सफल रहे। वरना बूथ लूट लिए जाते थे। हत्याएं होती थी। यही हाल पश्चिम बंगाल में था। वोट देना है तो पहले वामपंथियों के लिए दो, और उनकी सत्ता चली गई तो फिर तृणमूल के लिए दो, अन्यथा जीना मुहाल हो जाएगा। ऐसे में भाजपा ने रणनीति बनाई। लोहे को लोहा काटता है। ठीक उसी तर्ज पर अमित शाह ने कहा- अन्याय करने वालों को उल्टा लटका दिया जाएगा। चुनाव का परिणाम जो हो लंबे समय तक यहां केंद्रीय पुलिस बल तैनात रहेगी। इसने लोगों को भरोसा दिया। हिम्मत दी। नतीजा लोगों ने वोट दिया। उनको यह विश्वास हुआ कि चुनाव बाद होने वाली हिंसा से बच सकेंगे और सत्ता का परिवर्तन बड़ी आसानी से हो गया। विपक्ष के लिए यह सबक है। सबक कई है और जब तक विपक्ष सबक नहीं सीखेगा उसकी दुर्दशा जारी रहेगी। राज्यों के स्तर पर भी और लोकसभा चुनाव के स्तर पर भी। हर बार जनता को बेवकूफ समझने और बताना विपक्ष के लिए अब भारी पड़ता जाएगा। जहां विपक्ष जीतता है वहां ईवीएम से लेकर चुनाव आयोग तक, ईडी, सीबीआई सब ठीक। जनता भी ठीक और समझदार। और जहां हार होती है वहां जनता को बेवकूफ बनाने का आरोप विपक्ष जब भाजपा पर लगाता है तो सीधे-सीधे जनता को आप बेवकूफ बताते हैं। यह जान लीजिए, जनता किसी भी नेता से अधिक समझदार है और वह अधिक देशभक्त है। इसलिए कि उसका अपना निजी स्वार्थ किसी भी नेता और राजनीतिक दल से कम होता है। दूसरी बात चुनाव हारते ईवीएम का रोना बंद करना होगा। जब आप ईवीएम पर आरोप लगाते हैं तो दरअसल अपनी कमियों से आप मुंह मोड़ लेते हैं। ईडी, सीबीआई, चुनाव आयोग के दुरुपयोग का मामला जब विपक्ष उछालता है तो यह भले ही उनके समर्थकों को ऊर्जा देती हो, उनमें जोश भरता हो और उनका विश्वास दृढ़ करता हो कि उनकी पार्टी अभी हारी नहीं बल्कि हराई गई है, लेकिन इसके उलट अगर देखें तो राजनीतिक दल अपनी कमियों से भी मुंह मोड़ लेते हैं। कोई भी व्यक्ति या संस्था या संगठन जब अपनी खामियों को ढूंढने के बजाय दूसरे को दोषी बताना शुरू करता है तो उसका विकास रुक जाता है। ऋणात्मक गति से उसका ह्रास होना शुरू होता है। भारत में विपक्ष के साथ यही खेल हो रहा है। आजादी के समय से चली आ रही मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति को अब छोड़ना होगा। इस पर लंबी बातें कही और लिखी जा सकती है। यहां ठोस में बस इतना ही कहना चाहूंगा कि मुस्लिम तुष्टीकरण के लिए जब आप बहु संख्यक आबादी की निष्ठा उसकी आस्था पर सवाल उठाते हैं, उसको अपमानित करते हैं, हिंदू देवी देवताओं को आप गाली देते हैं और दूसरी तरफ ठीक उलट मुस्लिम अपराधियों व गुंडो के खिलाफ इसलिए सख्त नहीं होते कि मुस्लिम वोट बैंक गड़बड़ा जाएगा तो आप बहु संख्यकों को ध्रुवीकृत कर रहे होते हैं। जब हिंदू देवी देवताओं और सनातन संस्कृति की बात करते हुए उसकी आलोचना करते हैं, जब उसकी कमियों को सामने रखते हैं, तो आप यह भूल जाते हैं कि जनता यह भी अपेक्षा करेगी कि आप इस्लाम की परंपरा में जो खामियां हैं, उनकी त्रुटियों को भी रखें। लेकिन ऐसा इसलिए नहीं करते हैं कि छह इंच छोट कर दिए जाने का डर सताता है विपक्ष को और वोट बैंक खोने का डर सताता है। अन्यथा जो परिणाम पश्चिम बंगाल में हुआ, वह दिन  बहुत दूर नहीं जब तमिलनाडु और केरल में भी भगवा लहराने लगेगा।

स्वस्थ और मजबूत लोकतंत्र के लिए विपक्ष का सशक्त होना आवश्यक है। दुर्भाग्य यह है कि वर्तमान विपक्ष विहीन है, क्योंकि वह दिशाहीन और आत्ममुग्ध है। 


Sunday, 26 April 2026

बिहार के विजन को यूपी ले जाएगी लोजपा रामबिलास

 



सभी 19 विधायक और पांच सांसद को मिली जिम्मेदारी


नया नारा- यूपी फर्स्ट-यूपी वाले फर्स्ट

30 अप्रैल को विभिन्न जिलों में एमपी, एमएलए करेंगे बैठक


● उपेंद्र कश्यप ●

लेखक/पत्रकार


वर्ष 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में लोक जनशक्ति पार्टी एनडीए से अलग होकर अकेले 135 सीट पर चुनाव लड़ी। नतीजा जदयू अपने सबसे बुरे दौर में पहुंच गई थी। तब इस पार्टी के सुप्रीमो चिराग पासवान ने बिहार फर्स्ट बिहारी फर्स्ट का नारा दिया था। जिसे डॉक्यूमेंट विजन बताया गया था। हालांकि चुनाव अकेले लड़ने को लेकर हुए मतभेद के कारण पार्टी में विभाजन हुआ और वर्ष 2021 में लोक जनशक्ति पार्टी रामविलास का गठन हुआ। जिसके सर्वे सर्वे चिराग पासवान हैं। अब पार्टी बिहार के छह साल पुराने डॉक्यूमेंट विजन को नए रंग ढंग में डालकर उत्तर प्रदेश ले जाने की तैयारी में है। वर्ष 2027 में उत्तर प्रदेश में चुनाव होना है और वहां यह पार्टी सभी 403 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी में है। तैयारी आरंभ हो गई है। पॉलिटिक्स की चाल बड़ी टेढ़ी होती है। शतरंज में घोड़ा भले ढाई चाल चलता है, लेकिन राजनीति की चाल को अंकों में बताना लगभग असंभव है। पार्टी अपना विस्तार करना चाहती है। इसके लिए उत्तर प्रदेश में उसने नारा दिया है - यूपी फर्स्ट- यूपी वाले फर्स्ट। यानी बिहार में जो नारा चिराग पासवान ने  2020 में दिया था, और 2025 में एनडीए के साथ रहकर चुनाव लड़ते हुए इसी नारे को आगे बढ़ाती रही उसका उसे लाभ भी हुआ। अब इसी विजन के साथ वह उत्तर प्रदेश पहुंच रही है। कोशिश यह है कि पार्टी इस तरह के नारे से यूपी वालों को प्रभावित कर सके। भले ही केंद्र में एनडीए का हिस्सा है पार्टी, लेकिन उत्तर प्रदेश में चुनाव अकेले लड़ने की तैयारी है। स्थानीय मुद्दों और सामाजिक समूह विशेष कर दलित और बहुजनों के प्रतिनिधि के रूप में खुद को स्थापित करने की पार्टी कोशिश करती हुई दिख रही है। अब इसमें सफलता कितनी मिलेगी यह वक्त बताएगा। परिणाम आने के लिए अभी लंबा इंतजार करना पड़ेगा। पार्टी की कोशिश यह भी है कि पूर्वांचलियों को प्रभावित किया जाए और अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचा जाए। महत्वपूर्ण यह है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में दलित बहुजन काफी प्रभावशाली जातीय समूह है। इस वोट बैंक पर कई नेताओं के दावे हैं। ऐसे में लोजपा रामविलास की यह कोशिश एनडीए को लाभ पहुंचा सकती है। पार्टी के पिछड़ा अति पिछड़ा प्रकोष्ठ के राष्ट्रीय अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के महाराजगंज जिला प्रभारी बनाए गए ओबरा के विधायक डॉ प्रकाश चंद्र तथा उत्तर प्रदेश के देवरिया जिला के प्रभारी बनाए गए पार्टी के प्रदेश महासचिव सह डेहरी ऑन सोन के विधायक राजीव रंजन सिंह उर्फ सोनू सिंह ने बताया कि संगठन विस्तार के लिए 30 अप्रैल को उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों में समीक्षा बैठक आयोजित की गई है। पार्टी के तमाम विधायक और सांसदों को संगठन विस्तार की जिम्मेदारी दी गई है। महत्वपूर्ण है कि लोक जनशक्ति पार्टी रामविलास के कुल 19 विधायक और पांच सांसद हैं। सभी को संगठन विस्तार की जिम्मेदारी दी गई है ताकि 2027 में होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में पार्टी मजबूती से खड़ी हो सके।

 पोलिटिक्स बहुत टेढ़ी होती है। इसमें जो आज दिखती है, जरूरी नहीं कल वही हो।