Thursday, 11 June 2026

ममता बनर्जी और तृणमूल में बिखराव

 ◆ चूहा बोलो या छछूंदर, साथ कौन रहता है? ◆



(संदर्भ- तृणमूल में विखराव और उस पर आयी प्रतिक्रिया) 

 ● डॉ. उपेंद्र कश्यप ●


पश्चिम बंगाल चुनाव परिणाम आने के साथ ही तृणमूल कांग्रेस में बिखराव शुरू हो गया। 28 में 19 सांसद अलग गुट बनाने की अर्जी लोकसभा अध्यक्ष के पास दे चुके हैं। इधर 80 में लगभग 60 विधायक का अलग गुट पश्चिम बंगाल में बन गया है। अब इस घटना के बाद टीएमसी ही नहीं बल्कि आईएनडीआईए गठबंधन के दूसरे नेता भी यह रोना रो रहे हैं कि जो छोड़कर पार्टी गए वह अपने पद से इस्तीफा दें। यानी विधायकी और सांसदी छोड़ दें। इसके बाद फिर जनता के बीच जाएं, चुनाव लड़ें, और तब उनको आटा चावल का भाव पता चल जाएगा। इसके पहले भी लोग टूटते रहे हैं। नेता का तो मतलब ही है कि उगते सूरज के साथ या उगे हुए सूरज के साथ ही रहना। डूबते सूरज के साथ तो कोई नेता रहता ही नहीं। और यही नहीं अगर यह आशंका भी दिख जाए कि उनका शीर्ष नेतृत्व अगर डूबने की स्थिति में है तो सबसे पहले नेता भागते हैं। यह और बात है कि नेता यह प्रलाप करते हैं, कहावत सुनाते हैं कि- जब जहाज डूब रहा होता है तो सबसे पहले चूहे भागते हैं। अपने यहां एक कहावत है- फिसलते में दुलत्ती मार देना। यानी कोई व्यक्ति अगर चिकनी मिट्टी पर फिसल रहा है तो उसे संभालो नहीं लात मार दो कि वह पूरी तरह बर्बाद हो जाए। यही राजनीति में होते रहा है। यही हो रहा है और ऐसा ही होता रहेगा, यह तय है। जब तक राजनीति रहेगी, ऐसी घटनाएं सामने आती रहेंगी।  इसलिए भागने वालों को डूबते जहाज से पहले चूहा भागने की बात कहने वाले भी यह तो मान ही रहे हैं ना कि जहाज अब डूबने वाला है। यह और बात है कि भागने वाले को चूहा ठहरा रहे हैं। लेकिन राजनीतिक शब्दावली में यह चूहे तो नहीं हैं। राजनीतिक शब्दावली में इनके लिए सटीक शब्द मौसम वैज्ञानिक होना चाहिए। ऐसे में एक वैज्ञानिक की आलोचना भला कैसे की जा सकती है? जो उन्होंने दिव्य ज्ञान प्राप्त किया हुआ है, वह अपनी दिव्य दृष्टि से यह देख रहे हैं कि जहाज डूब रहा है, तो वे भाग रहे हैं। अब भला डूबते जहाज पर रहता कौन है। यह शिकायत सिर्फ राजनीतिक बिरादरी से ही क्यों? ऐसा तो सभी करते हैं। और ऐसा करने वाले दुनियावी समझ वाले व्यक्ति कहे जाते हैं। अब उनको आप चूहा कहिए चाहे छछूंदर कहिए, उससे क्या फर्क पड़ता है। राजनीति में कोई किसी का सगा नहीं होता और राजनीतिज्ञों के तो गुण में ही धूर्तता, चाटुकारिता, अवसरवादिता समाहित है। इसके बिना तो कोई नेता बन ही नहीं सकता। इसीलिए हम अक्सर देखते हैं कि जब कोई नेता का कद बढ़ता है तो वह सबसे पहले अपना कद बढ़ाने वाले को ही लात मारता है।


■ हालात बदलने हैं तो यह करना आवश्यक ■


वास्तव में अगर हालात सुधारने हैं तो विवेकाधिकार से काम नहीं चलेगा, इसे खत्म होना चाहिए। कानून की लाठी से ही कुछ उम्मीद की जा सकती है। यह कानून ही बना दिया जाना चाहिए कि जब भी कोई विधायक या सांसद या कोई भी पदधारक अगर पार्टी छोड़ता है, चाहे उसकी संख्या जितनी बड़ी हो, उसकी सदस्यता समाप्त हो जाएगी। ठीक वैसे ही जैसे पार्टी छोड़ने पर विधायकी और सांसदी चली जाती है,जल जबकि पार्टी निकाले तो बची रह जाती है। यह नियम हर संख्या या बड़े समूह पर भी लागू होनी चाहिए। लेकिन इसके साथ-साथ यह भी होना चाहिए कि चुनाव में जो जिसे गलिया रहा है उसके साथ वह चुनाव बाद गठबंधन नहीं करेगा। और जो गठबंधन में चुनाव लड़ेगा वह चुनाव बाद गठबंधन अगले चुनाव आने तक नहीं तोड़ सकता है। इसलिए कि यही अंतिम सत्य है कि चाहे देशहित और जनहित की बात नेता जितना कर ले, सबसे पहले वह स्वहित देखता है। उसके बाद दलहित देखता है, उसके बाद परिवारहित देखता है। उसके बाद जाति का हित देखता है, तब जमात और तब देश का हित देखता है। इसलिए कठोर सुधार की जरूरत है ल। अन्यथा डूबते जहाज छोड़िए, जहाज डूबने की आशंका भी दिखने पर लोग भागेंगे ही भागेंगे। अब उन्हें आप चूहा कहिए या छछूंदर। इससे भला क्या फर्क पड़ता है।


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Thursday, 7 May 2026

हर बार टूटती रही है मंत्रिमंडल में हिस्सेदारी का सपना

 


21 वर्ष में मात्र 22 महीने मिला है-मंत्री-सुख

नौ बार रही है जदयू भाजपा की सरकार 

उपेंद्र कश्यप

दाउदनगर (औरंगाबाद) ।

वर्ष 2005 में दूसरी बार अक्टूबर में हुए बिहार विधानसभा चुनाव के बाद से अब तक भाजपा और जदयू की नौ बार सरकार बन चुकी है। प्रायः हर बार यह उम्मीद रही कि औरंगाबाद जिला को मंत्रिमंडल में हिस्सेदारी मिलेगी। लेकिन 21 साल में मात्र 22 महीने की हिस्सेदारी से ही “मंत्री-सुख” औरंगाबाद जिला के नाम अंकित है। इस बार भी ऐसी उम्मीद थी कि जब औरंगाबाद जिले के छह में पांच विधायक एनडीए से हैं तो शायद जिले की भागीदारी भी हो। लेकिन ऐसा न हो सका। वर्ष 2005 में जदयू भाजपा को तीन, राजद को दो और तब अलग चुनाव लड़ी लोक जनशक्ति पार्टी को एक विधायक मिला था। तब भी सरकार में औरंगाबाद जिले को हिस्सेदारी नहीं मिली। वर्ष 2010 में जिले के मतदाताओं ने जदयू व भाजपा के खाते में पांच और निर्दलीय को एक सीट दिया, तो उम्मीद फिर जगी कि बिहार सरकार के मंत्रिमंडल में किसी को जगह मिलेगी। तब औरंगाबाद से भाजपा के विधायक रामाधर सिंह

बिहार सरकार में सहकारिता मंत्री बनाए गए। लेकिन विवादों की वजह से वह मात्र 22 महीना ही मंत्री रह सके। सिर्फ 26 अगस्त 2011 से 16 जून 2013 यानी लगभग 22 माह। तब से लेकर आज तक औरंगाबाद जिले के किसी भी विधायक को मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिली। वर्ष 2015 में जब नीतीश कुमार राजद के साथ चले गए तो, औरंगाबाद में मात्र दो विधायक भाजपा जदयू से जीते और महा गठबंधन को चार विधायक मिले। वर्ष 2020 में जब चुनाव हुआ तो औरंगाबाद जिला से एनडीए का सुपड़ा साफ हो गया। सभी छह सीट राजद और कांग्रेस के खाते में गए। तब औरंगाबाद के किसी विधायक को मंत्रिमंडल में शामिल करने का प्रश्न ही नहीं था। जब 2025 में विधान सभा का चुनाव हुआ, तो इस जिले में एनडीए को पांच और महागठबंधन को मात्र एक विधायक मिला। जब नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने तो उम्मीद की गई कि इस बार हिस्सेदारी मिलेगी। तब भी निराशा हाथ लगी। और अब जब सात मई 2026 को एनडीए की सरकार चला रहे सम्राट चौधरी मंत्रिमंडल का विस्तार हुआ तब भी कोई हिस्सेदारी नहीं मिली। इस 26 साल में जदयू के हाथ से सत्ता भले ही भाजपा के हाथ चली गई, लेकिन मंत्रिमंडल में हिस्सेदारी का सपना अधूरा ही रह गया।



अंत में एक सवाल:-

नए मंत्रिमंडल विस्तार से एक सवाल उठता है कि क्या औरंगाबाद जातीय समीकरण और क्षेत्रीय संतुलन साधने की राजनीतिक विवशता लायक नहीं है, जो इसकी आकांक्षा पूरी नहीं होती। सवाल इसलिए कि मंत्रिमंडल गठन में हर बार यह तर्क दिया जाता है कि जाति और क्षेत्र का ख्याल रखा जाता है। 


औरंगाबाद जिले में एनडीए के विधायक:-

ओबरा से लोजपा आर के डॉ. प्रकाशचंद्र, औरंगाबाद से भाजपा के त्रिविक्रम नारायण सिंह, नबीनगर से जदयू से चेतन आनंद, रफीगंज से जदयू के प्रमोद कुमार सिंह और कुटुंबा सुरक्षित से हम के ललन राम। 


ओबरा से जगी थी उम्मीद 

वर्ष 2025 के चुनाव में ओबरा में चुनावी सभा को संबोधित करते हुए एलजेपीआर सुप्रीमो चिराग पासवान ने जो संकेत दिया था उससे यह उम्मीद जगी थी कि डा.प्रकाश चंद्र को मंत्रिमंडल में शामिल किया जा सकता है। ऐसा भी नहीं हुआ।

Monday, 4 May 2026

पश्चिम बंगाल में भाजपा की जीत विपक्ष के लिए सबक

 


● जनता, ईवीएम और संवैधानिक संस्थाओं को बख्शे विपक्ष ●

◆ विपक्ष को ले डूबेगा मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति ◆


● उपेंद्र कश्यप ●

लेखक व वरिष्ठ पत्रकार


पश्चिम बंगाल में बीजेपी जीत गई। यह जीत होना बीजेपी के लिए कम, देश की राजनीति और लोकतंत्र के लिए अति आवश्यक था। इसके कारण स्पष्ट हैं। बंगाल की पारंपरिक राजनीति को अगर देखें तो 30 साल लगातार कांग्रेस, 34 साल लगातार वामपंथी और अब 15 साल लगातार तृणमूल कांग्रेस की सत्ता रही। राजनीतिक दलों और उनके समर्थकों की प्रवृत्तियां वामपंथी शासन के जमाने में जो आरंभ हुई थी वह रूढ़ होती हुई तृणमूल कांग्रेस तक चली आयी। नतीजा जनता को विकल्प चुनने के अलावा कोई रास्ता नहीं बच गया था, और वह विकल्प बनी भाजपा और तृणमूल कांग्रेसी कांग्रेस हाशिये पर चली गई। जिस वामपंथ का गढ़ था पश्चिम बंगाल, वहां से वह लगभग खत्म हो गयी, साथ ही इसी दुर्दशा को कांग्रेस प्राप्त हो गयी। ऐसा उनकी नीतियों के कारण हुआ। सत्ता के अहंकार में तृणमूल वामपंथियों की दुर्गति के फलस्वरूप प्राप्त अपनी सत्ता से सबक नहीं ले सकी। वामपंथियों के राज्य में भी कोलकाता में जीना आसान नहीं था और वही हाल तृणमूल ने कर रखी थी। बंगाल में यह आम बात थी कि अगर आपको घर बनाना है तो ईट, सीमेंट के लिए भी तृणमूल के नेताओं को कट मणि देनी होगी। जमीन खरीदनी है तो भी। यानी विकास का छोटा सा भी काम अगर कोई नागरिक कर रहा है तो उसे एक हिस्सा तृणमूल के नेताओं को संतुष्ट करने के लिए खर्च करना पड़ता था। इतना ही नहीं लोकतंत्र की दुहाई देने वाला विपक्ष सेलेक्टिव था और तृणमूल के आतंक के आगे खामोश था। वोट देने से रोका जा रहा था। तृणमूल वोट न देने वालों की हत्याएं की गई। घर जलाए गए। यही सब तो वामपंथी भी करते थे। याद करिए बिहार का वह दौर जब हर चुनाव में हत्याएं होती थी और एक दौर वह आया जब हत्या तो छोड़िए वोट देने से रोकने की घटनाएं तक खत्म हो गई। बिहार में सामाजिक परिवर्तन हुआ। राजनीतिक परिवर्तन हुआ। टीएन शेषण की सख्ती के बीच 1995 में चुनाव हुआ, तब भी लालू यादव ने चुनाव आयोग पर कई गंभीर आरोप लगाए थे, लेकिन 167 सीट लाकर लालू प्रसाद यादव पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने में सफल रहे। वरना बूथ लूट लिए जाते थे। हत्याएं होती थी। यही हाल पश्चिम बंगाल में था। वोट देना है तो पहले वामपंथियों के लिए दो, और उनकी सत्ता चली गई तो फिर तृणमूल के लिए दो, अन्यथा जीना मुहाल हो जाएगा। ऐसे में भाजपा ने रणनीति बनाई। लोहे को लोहा काटता है। ठीक उसी तर्ज पर अमित शाह ने कहा- अन्याय करने वालों को उल्टा लटका दिया जाएगा। चुनाव का परिणाम जो हो लंबे समय तक यहां केंद्रीय पुलिस बल तैनात रहेगी। इसने लोगों को भरोसा दिया। हिम्मत दी। नतीजा लोगों ने वोट दिया। उनको यह विश्वास हुआ कि चुनाव बाद होने वाली हिंसा से बच सकेंगे और सत्ता का परिवर्तन बड़ी आसानी से हो गया। विपक्ष के लिए यह सबक है। सबक कई है और जब तक विपक्ष सबक नहीं सीखेगा उसकी दुर्दशा जारी रहेगी। राज्यों के स्तर पर भी और लोकसभा चुनाव के स्तर पर भी। हर बार जनता को बेवकूफ समझने और बताना विपक्ष के लिए अब भारी पड़ता जाएगा। जहां विपक्ष जीतता है वहां ईवीएम से लेकर चुनाव आयोग तक, ईडी, सीबीआई सब ठीक। जनता भी ठीक और समझदार। और जहां हार होती है वहां जनता को बेवकूफ बनाने का आरोप विपक्ष जब भाजपा पर लगाता है तो सीधे-सीधे जनता को आप बेवकूफ बताते हैं। यह जान लीजिए, जनता किसी भी नेता से अधिक समझदार है और वह अधिक देशभक्त है। इसलिए कि उसका अपना निजी स्वार्थ किसी भी नेता और राजनीतिक दल से कम होता है। दूसरी बात चुनाव हारते ईवीएम का रोना बंद करना होगा। जब आप ईवीएम पर आरोप लगाते हैं तो दरअसल अपनी कमियों से आप मुंह मोड़ लेते हैं। ईडी, सीबीआई, चुनाव आयोग के दुरुपयोग का मामला जब विपक्ष उछालता है तो यह भले ही उनके समर्थकों को ऊर्जा देती हो, उनमें जोश भरता हो और उनका विश्वास दृढ़ करता हो कि उनकी पार्टी अभी हारी नहीं बल्कि हराई गई है, लेकिन इसके उलट अगर देखें तो राजनीतिक दल अपनी कमियों से भी मुंह मोड़ लेते हैं। कोई भी व्यक्ति या संस्था या संगठन जब अपनी खामियों को ढूंढने के बजाय दूसरे को दोषी बताना शुरू करता है तो उसका विकास रुक जाता है। ऋणात्मक गति से उसका ह्रास होना शुरू होता है। भारत में विपक्ष के साथ यही खेल हो रहा है। आजादी के समय से चली आ रही मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति को अब छोड़ना होगा। इस पर लंबी बातें कही और लिखी जा सकती है। यहां ठोस में बस इतना ही कहना चाहूंगा कि मुस्लिम तुष्टीकरण के लिए जब आप बहु संख्यक आबादी की निष्ठा उसकी आस्था पर सवाल उठाते हैं, उसको अपमानित करते हैं, हिंदू देवी देवताओं को आप गाली देते हैं और दूसरी तरफ ठीक उलट मुस्लिम अपराधियों व गुंडो के खिलाफ इसलिए सख्त नहीं होते कि मुस्लिम वोट बैंक गड़बड़ा जाएगा तो आप बहु संख्यकों को ध्रुवीकृत कर रहे होते हैं। जब हिंदू देवी देवताओं और सनातन संस्कृति की बात करते हुए उसकी आलोचना करते हैं, जब उसकी कमियों को सामने रखते हैं, तो आप यह भूल जाते हैं कि जनता यह भी अपेक्षा करेगी कि आप इस्लाम की परंपरा में जो खामियां हैं, उनकी त्रुटियों को भी रखें। लेकिन ऐसा इसलिए नहीं करते हैं कि छह इंच छोट कर दिए जाने का डर सताता है विपक्ष को और वोट बैंक खोने का डर सताता है। अन्यथा जो परिणाम पश्चिम बंगाल में हुआ, वह दिन  बहुत दूर नहीं जब तमिलनाडु और केरल में भी भगवा लहराने लगेगा।

स्वस्थ और मजबूत लोकतंत्र के लिए विपक्ष का सशक्त होना आवश्यक है। दुर्भाग्य यह है कि वर्तमान विपक्ष विहीन है, क्योंकि वह दिशाहीन और आत्ममुग्ध है। 


Sunday, 26 April 2026

बिहार के विजन को यूपी ले जाएगी लोजपा रामबिलास

 



सभी 19 विधायक और पांच सांसद को मिली जिम्मेदारी


नया नारा- यूपी फर्स्ट-यूपी वाले फर्स्ट

30 अप्रैल को विभिन्न जिलों में एमपी, एमएलए करेंगे बैठक


● उपेंद्र कश्यप ●

लेखक/पत्रकार


वर्ष 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में लोक जनशक्ति पार्टी एनडीए से अलग होकर अकेले 135 सीट पर चुनाव लड़ी। नतीजा जदयू अपने सबसे बुरे दौर में पहुंच गई थी। तब इस पार्टी के सुप्रीमो चिराग पासवान ने बिहार फर्स्ट बिहारी फर्स्ट का नारा दिया था। जिसे डॉक्यूमेंट विजन बताया गया था। हालांकि चुनाव अकेले लड़ने को लेकर हुए मतभेद के कारण पार्टी में विभाजन हुआ और वर्ष 2021 में लोक जनशक्ति पार्टी रामविलास का गठन हुआ। जिसके सर्वे सर्वे चिराग पासवान हैं। अब पार्टी बिहार के छह साल पुराने डॉक्यूमेंट विजन को नए रंग ढंग में डालकर उत्तर प्रदेश ले जाने की तैयारी में है। वर्ष 2027 में उत्तर प्रदेश में चुनाव होना है और वहां यह पार्टी सभी 403 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी में है। तैयारी आरंभ हो गई है। पॉलिटिक्स की चाल बड़ी टेढ़ी होती है। शतरंज में घोड़ा भले ढाई चाल चलता है, लेकिन राजनीति की चाल को अंकों में बताना लगभग असंभव है। पार्टी अपना विस्तार करना चाहती है। इसके लिए उत्तर प्रदेश में उसने नारा दिया है - यूपी फर्स्ट- यूपी वाले फर्स्ट। यानी बिहार में जो नारा चिराग पासवान ने  2020 में दिया था, और 2025 में एनडीए के साथ रहकर चुनाव लड़ते हुए इसी नारे को आगे बढ़ाती रही उसका उसे लाभ भी हुआ। अब इसी विजन के साथ वह उत्तर प्रदेश पहुंच रही है। कोशिश यह है कि पार्टी इस तरह के नारे से यूपी वालों को प्रभावित कर सके। भले ही केंद्र में एनडीए का हिस्सा है पार्टी, लेकिन उत्तर प्रदेश में चुनाव अकेले लड़ने की तैयारी है। स्थानीय मुद्दों और सामाजिक समूह विशेष कर दलित और बहुजनों के प्रतिनिधि के रूप में खुद को स्थापित करने की पार्टी कोशिश करती हुई दिख रही है। अब इसमें सफलता कितनी मिलेगी यह वक्त बताएगा। परिणाम आने के लिए अभी लंबा इंतजार करना पड़ेगा। पार्टी की कोशिश यह भी है कि पूर्वांचलियों को प्रभावित किया जाए और अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचा जाए। महत्वपूर्ण यह है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में दलित बहुजन काफी प्रभावशाली जातीय समूह है। इस वोट बैंक पर कई नेताओं के दावे हैं। ऐसे में लोजपा रामविलास की यह कोशिश एनडीए को लाभ पहुंचा सकती है। पार्टी के पिछड़ा अति पिछड़ा प्रकोष्ठ के राष्ट्रीय अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के महाराजगंज जिला प्रभारी बनाए गए ओबरा के विधायक डॉ प्रकाश चंद्र तथा उत्तर प्रदेश के देवरिया जिला के प्रभारी बनाए गए पार्टी के प्रदेश महासचिव सह डेहरी ऑन सोन के विधायक राजीव रंजन सिंह उर्फ सोनू सिंह ने बताया कि संगठन विस्तार के लिए 30 अप्रैल को उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों में समीक्षा बैठक आयोजित की गई है। पार्टी के तमाम विधायक और सांसदों को संगठन विस्तार की जिम्मेदारी दी गई है। महत्वपूर्ण है कि लोक जनशक्ति पार्टी रामविलास के कुल 19 विधायक और पांच सांसद हैं। सभी को संगठन विस्तार की जिम्मेदारी दी गई है ताकि 2027 में होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में पार्टी मजबूती से खड़ी हो सके।

 पोलिटिक्स बहुत टेढ़ी होती है। इसमें जो आज दिखती है, जरूरी नहीं कल वही हो। 


त्रिवेणी संघ का एक चक्र पूरा तो हुआ लेकिन मेहता के वंशज रहे उपेक्षित

 


● उपेंद्र कश्यप ● 

बिहार में सत्ता हस्तांतरण का खेल पूरा हो गया। कुर्मी नीतीश कुमार ने कुशवाहा सम्राट चौधरी को सत्ता हस्तांतरित कर दी। भाजपा जदयू या एनडीए का राजनीतिक परिप्रेक्ष्य अलग है। हम यहां बात ऐतिहासिक संदर्भ की कर रहे हैं। जिस त्रिवेणी संघ की अब खूब चर्चा की जा रही है और यह कहा जा रहा है कि त्रिवेणी संघ का एक चक्र पूरा हो गया, कुछ हद तक ही यह सही है। लेकिन इससे बड़ा सत्य यह है कि दांगियों की कीमत पर कुशवाहा राज कायम हुआ है। आधुनिक काल में कुशवाहों का कोई ऐतिहासिक आंदोलन सामने नहीं देखा गया है। त्रिवेणी सिंह की बात करते हुए बड़ी ही सहजता से यह कह दिया जाता है कि यह यादव, कुर्मी और कोईरी जाति के एक एक व्यक्ति ने मिलकर दलित और पिछड़ों को राजनीतिक व सामाजिक अधिकार दिलाने के उद्देश्य से लगभग 93 वर्ष पहले 30 मई 1933 को इसका गठन किया था। वास्तविकता यह है कि उसमें यादव और कुर्मी के साथ कुशवाहा नहीं था। सरदार जगदेव सिंह यादव, जाति से यादव थे, तो शिवपूजन सिंह कुर्मी थे। लेकिन चौधरी यदुनंदन प्रसाद मेहता कतई कुशवाहा या कोईरी नहीं थे। बिहार में कोइरी या कुशवाहा समूह में कई शाखा है। जिसमें दांगी, बनाफर, ज़लवार, कन्नौजिया, मगहिया, चिरमैत शामिल है। त्रिवेणी संघ के एक स्तंभ चौधरी यदुनंदन प्रसाद मेहता दांगी थे। यह जाति आज भी एक अलग जातीय पहचान के रूप में कायम है। कुशवाहा समूह में होते हुए भी बिहार सरकार की 2022-23 की जातीय गणना रिपोर्ट के अनुसार, कोइरी (कुशवाहा) पिछड़ा वर्ग - 2 (OBC) में आता है। जबकि दांगी अति पिछड़ा वर्ग - 1 (EBC) में वर्गीकृत किया गया है। आज कुशवाहा के मुख्यमंत्री बनने के बाद जगदेव प्रसाद के पुत्र नागमणि लिखते हैं:- बाबूजी बिहार लेनिन जगदेव प्रसाद और मेरा सपना साकार हो गया। अमर शहीद जगदेव बाबू कह गए थे-

पहली पीढी मारी जाएगी,

दुसरी पीढ़ी के लोग जेल जाएगें,

तीसरी पीढी राज करेगी।


हकीकत यह है कि स्वयं जगदेव बाबू कुशवाहा नहीं थे। वे भी दांगी जाति से थे। 


दरअसल, शकुनी चौधरी ने कोइरी (कोयरी) समूह के साथ 'कुशवाहा' समूह को बिहार सरकार के गजट में शामिल (जुड़वाया) करवाया था, जो कोइरी/कुशवाहा पहचान की राजनीति के प्रमुख स्तंभ माने जाते हैं। उन्होंने कोइरी समाज को एक नई पहचान दिलाने के लिए 'कुशवाहा' उपनाम को आधिकारिक मान्यता दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। ध्यान रहे न तो शकुनी कुशवाहा लिखते हैं, न सम्राट चौधरी। और उपेन्द्र कुशवाहा भी कुशवाहा नहीं लिखते थे। जब कुशवाहा शब्द राजनीति में स्थापित हुई और इसकी ताकत दिखी तब नेता अपने नाम के साथ कुशवाहा लिखने लगे, भले ही वे पहले कुमार लिखते थे या अन्य टाइटल इस्तेमाल करते रहे थे। 

इसके बाद नीतीश कुमार ने लालू प्रसाद यादव के मुस्लिम-यादव जाति के समीकरण को ध्वस्त कर सत्ता पाने के उद्देश्य से लव-कुश की राजनीति शुरू की। उपेंद्र कुशवाहा का कद इसी राजनीति के कारण बढ़ता गया। जिसकी बुनियाद नीतीश कुमार ने रखी थी, उपेंद्र कुशवाहा का कद बढाने के मामले में। लव-कुश की राजनीति ने दांगी शाखा को धीरे-धीरे किनारे कर दिया। अलबत्ता जिस दांगी ने राजनीतिक चेतना इस खेतिहर जातीय समूह में बढ़ाई उसे ही उपेक्षित किया जाने लगा। इसे ऐसे समझिये कि नीतीश कुमार ने एप्ने मंत्रिमंडल में कुशवाहा राजनीति साधने के लिए लव-कुश समीकरण में हर शाखा से मंत्री बनाया। बनाफर, ज़लवार, कन्नौजिया, मगहिया, चिरमैत को प्रतिनिधित्व दिया लेकिन दांगी समाज से किसी नेता को मंत्री नहीं बनाया। सम्राट चौधरी चिरमैत शाखा से हैं तो उपेन्द्र कुशवाहा ज़लवार शाखा से। शायद इसीलिए आज भी दांगी समाज कुश वंशज होने की अवधारणा को पूरी तरह स्वीकार नहीं करता।



सवर्ण, पिछड़े, अति पिछड़े, मुस्लिम, दलित लेकिन वैश्य नदारद


वैश्य समूह की तमाम जातियों या उप जातियों को भाजपा (2005 से एनडीए) के कोर वोटर माने जाते हैं, लेकिन इनको सीएम की कुर्सी कभी नहीं मिली।

श्री कृष्णा सिंह से लेकर सम्राट चौधरी तक मुख्यमंत्री बने लोगों की अगर जाति का विश्लेषण करेंगे तो हम पाते हैं कि चार ब्राह्मण अभी तक मुख्यमंत्री बने हैं। जिसमें विनोदानंद झा, जगन्नाथ मिश्रा, बिंदेश्वरी दुबे और भागवत झा आजाद शामिल हैं। जबकि इतनी ही संख्या में यादव भी मुख्यमंत्री बने हैं। बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल, दरोगा प्रसाद राय, लालू प्रसाद यादव एवं रावड़ी देवी। दो कायस्थ कृष्ण वल्लभ सहाय एवं महामाया प्रसाद सिंह, दो दलित रामसुंदर दास एवं जीतन राम मांझी, एक कुर्मी नीतीश कुमार, एक कुशवाहा सतीश प्रसाद सिंह, दो राजपूत चंद्रशेखर सिंह एवं सत्येंद्र नारायण सिंहा, मात्र एक भूमिहार श्री कृष्णा सिंह और मात्र एक अति पिछड़ा कर्पूरी ठाकुर अभी तक मुख्यमंत्री बने हैं। समेकित वैश्य जातियों की संख्या 32 है। जिनकी कुल जनसंख्या 18.18 प्रतिशत है। बिहार में सबसे अधिक यादव 14.27 प्रतिशत से भी लगभग 04 प्रतिशत अधिक। लेकिन उसके हिस्से मुख्यमंत्री की कुर्सी कब आएगी? इसका इंतजार सबको है।





● बिहार के मुख्यमंत्री और उनकी जाति ●


श्रीकृष्ण सिंह – राजपूत

अनुग्रह नारायण सिन्हा (कार्यवाहक) – कायस्थ

बिनोदानंद झा – ब्राह्मण

कृष्ण बल्लभ सहाय – कायस्थ

महामाया प्रसाद सिन्हा – कायस्थ

सतीश प्रसाद सिंह – कुर्मी

बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल – यादव

दरोगा प्रसाद राय – यादव

कर्पूरी ठाकुर – नाई (अति पिछड़ा वर्ग)

राम सुंदर दास – दलित

जगन्नाथ मिश्रा – ब्राह्मण

चंद्रशेखर सिंह – राजपूत

बिंदेश्वरी दुबे – ब्राह्मण

भागवत झा आजाद – ब्राह्मण

सत्येन्द्र नारायण सिन्हा – राजपूत

लालू प्रसाद यादव – यादव

रबी देवी – यादव

नीतीश कुमार – कुर्मी

जीतन राम मांझी – दलित (महादलित)

Monday, 13 April 2026

‘निकाय-मंत्री’ बनने के लिए धन खर्च की चर्चा

 ‘निकाय-मंत्री’ बनने के लिए धन खर्च की चर्चा



सोशल मीडिया पर वार्ड पार्षद प्रतिनिधि के पोस्ट से चर्चा शुरू 

मामला सशक्त स्थाई समिति सदस्य चुनाव का 

एक ने बताया मजाक तो दूसरे ने कहा दुर्भाग्यपूर्ण उपेंद्र कश्यप / नबिटा संवाददाता 

दाउदनगर (औरंगाबाद) । अब तक चली आ रही व्यवस्था के अनुसार मुख्य पार्षद ही सशक्त स्थाई समिति के सदस्यों को नामित करते थे। आगे ऐसा नहीं होगा। बिहार नगरपालिका (संशोधन) अधिनियम, 2026 के अनुसार अब जनता द्वारा निर्वाचित वार्ड पार्षद सशक्त स्थाई समिति सदस्य का निर्वाचन गुप्त मतदान के जरिए करेंगे। सुविधा के लिए इन्हें ‘निकाय-मंत्री’ कह सकते हैं। दाउदनगर में 27 वार्ड पार्षद हैं, और सभी को तीन-तीन वोट देकर तीन निकाय-मंत्री का निर्वाचन करना है। एक वार्ड पार्षद प्रतिनिधि ने सोशल मीडिया पर निर्वाचन की तिथि तय होते ही लिखा कि 25000 से बयाना शुरू। इस पोस्ट के बाद ही शहर में सशक्त स्थाई समिति सदस्यों के निर्वाचन में राशि खर्च होने की चर्चा शुरू हो गई। इस संबंध में जब मुख्य पार्षद रहे परमानंद प्रसाद से इस संवाददाता ने बात की तो उन्होंने कहा कि वार्ड पार्षद तो चाहेंगे ही कि पैसे का खेल हो, ताकि उन्हें लाभ मिले। सफलता प्राप्त करने के लिए में सशक्त स्थाई समिति सदस्य के लिए चुनाव लड़ रहे वार्ड पार्षद भी धन खर्च कर सकते हैं। लेकिन अगर ऐसा होता है तो यह लोकतंत्र के लिए कतई उचित नहीं है। दूसरी तरफ सशक्त स्थाई समिति सदस्य रहे और संभावित प्रत्याशी डॉक्टर केदारनाथ सिंह कहते हैं कि वार्ड पार्षद प्रतिनिधि द्वारा किया गया पोस्ट मात्र एक मजाक था। हालांकि ऐसा नहीं करना चाहिए था। वहीं दूसरे संभावित प्रत्याशी बसंत कुमार कहते हैं कि ऐसा पोस्ट करना दुर्भाग्यपूर्ण है। यह सोशल मीडिया का गलत इस्तेमाल है। इससे लोकतंत्र, वार्ड पार्षदों और नगर परिषद दाउदनगर की प्रतिष्ठा को चोट पहुंची है। ऐसा कतई नहीं करना चाहिए था। दावे के साथ तो यह कतई नहीं कहा जा सकता कि वोट के लिए लेनदेन हो ही रहा है, लेकिन इतिहास के अनुभव इस तरह की चर्चाओं को पूरी तरह झूठ भी मानने के लिए बाध्य नहीं करते। अगर लेनदेन हो भी रहा होगा या होगा भी तो इसकी पुष्टि नहीं हो सकती और नहीं ऐसे मामलों में पहले कभी पुष्टि हुई है। यह चर्चा सत्य न हो तो ही लोकतंत्र के लिए उचित है।



25000 का मतलब कई लाख का खेल

वार्ड पार्षद प्रतिनिधि के एक पोस्ट के आधार पर अगर वोट की खरीद फरोख्त को लेकर गणित बैठाएं तो प्रत्येक संभावित प्रत्याशी के द्वारा तीन से चार लाख रुपए तक खर्च किए जाने का अनुमान लगाया जा सकता है। प्रत्येक वार्ड पार्षद को तीन वोट देना है यानी अगर 25-25000 का खेल चला तो कम से कम 75000 और अगर अधिक दावेदारों ने क्रॉस वोटिंग के डर से खर्च की तो उनके जेब में जाने वाली राशि बढ़ भी सकती है। इस हिसाब से अगर देखें तो कुल 11 अभ्यर्थी की संभावना व्यक्त की जा रही है। जीत पक्की करने के लिए अधिकतम 14 वोट चाहिए। यानी लगभग तीन से चार लाख रुपए का खेल एक अभ्यर्थी कर सकता है। हालांकि यह मानना संभव नहीं है कि सभी सभी वोट की खरीद बिक्री हो सकती है। 



पोस्ट से सन्देश, प्रतिष्ठा को क्षति

 जिस तरह के पोस्ट किए गए इसमें कोई शक नहीं कि उसने नगर परिषद की प्रतिष्ठा को दांव पर तो लगा ही दिया है। वार्ड पार्षदों और सशक्त स्थाई समिति सदस्य के लिए संभावित अभ्यर्थियों को भी लेकर संदेह की स्थिति बना दी है।

Sunday, 12 April 2026

तीन पदों के लिए भिड़ेंगे 11 वार्ड पार्षद



पहली बार हो रहा है सशक्त स्थाई समिति सदस्यों का चुनाव 

सभी वार्ड पार्षद करेंगे मताधिकार का इस्तेमाल

सबसे अधिक पद दो के लिए मुकाबला 

● उपेंद्र कश्यप 

दाउदनगर (औरंगाबाद) ।

बिहार नगरपालिका (संशोधन) अधिनियम 2026 के तहत पहली बार नगर निकायों में सशक्त स्थाई समिति के सदस्यों का चुनाव वार्ड पार्षद सीधे मतदान के माध्यम से करेंगे। इसे लेकर काफी उत्साह नगर निकायों में देखा जा रहा है। दाउदनगर नगर परिषद में कुल 27 वार्ड पार्षद हैं। यहां सशक्त स्थाई समिति के लिए तीन सदस्य का निर्वाचन वार्ड पार्षदों के द्वारा मतदान के जरिए किया जाना है। इसके लिए 16 अप्रैल की तारीख तय है। शहर में इस बात की चर्चा खूब हो रही है कि कितने वार्ड पार्षद चुनाव लड़ेंगे और कौन-कौन किस पद के लिए प्रत्याशी होंगे। किनकी जीत- हार होगी। प्राप्त विवरण के अनुसार सशक्त स्थाई समिति के पद एक के लिए तीन वार्ड पार्षदों के बीच भिड़ंत होने की संभावना व्यक्त की जा रही है। वार्ड पार्षद केदारनाथ सिंह, बसंत कुमार और भूपेंद्र मिश्रा एक दूसरे के विरुद्ध इस पद के लिए नामांकन कर सकते हैं। पद दो के लिए वार्ड पार्षद गोविंद प्रसाद, सोनी देवी, संगीता देवी, परवीन कौसर और सीमन कुमारी द्वारा नामांकन किए जाने की संभावना है। पद तीन के लिए राधा रमण पूरी, एहसान अहमद और दिनेश प्रसाद द्वारा नामांकन किए जाने की तैयारी है। इनमें तीन वार्ड पार्षद भूपेंद्र मिश्रा परवीन कौसर और दिनेश प्रसाद वर्तमान सशक्त स्थाई समिति के मनोनीत सदस्य हैं। तीनों को मुख्य पार्षद के पक्ष का माना जाता है। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि जब तीनों प्रत्याशी बनेंगे तो इनमें कौन-कौन निर्वाचित होते हैं और कौन नहीं। 


● पांच वार्ड पार्षद रहे हैं पूर्व में भी सदस्य ●


जिन 11 वार्ड पार्षदों के सशक्त स्थाई समिति सदस्य पद के लिए चुनाव लड़ने की चर्चा की जा रही है, उनमें पांच ऐसे हैं जो पहले भी किसी न किसी बोर्ड में सशक्त स्थाई समिति के सदस्य रह चुके हैं। केदारनाथ सिंह मुख्य पार्षद अंजली कुमारी के साथ सशक्त स्थायी समिति के सदस्य रह चुके हैं। इसी तरह इनके अलावा मीनू सिंह के वक्त बसंत कुमार सदस्य रह चुके हैं। भूपेंद्र कुमार मिश्रा, दिनेश प्रसाद और परवीन कौसर वर्तमान बोर्ड में सशक्त स्थाई समिति सदस्य रहे हैं।


◆ 16 अप्रैल को होगा मतदान ◆ 

सशक्त स्थाई समिति के तीन सदस्यों के लिए निर्वाचन की पूरी प्रक्रिया अनुमंडल कार्यालय सभागार में होगी। इसके लिए प्रशासनिक तैयारी की जा रही है। चुनाव संपन्न करने के लिए निर्वाची पदाधिकारी एसडीओ अमित राजन को बनाया गया है। जबकि सहायक निर्वाचन पदाधिकारी बीडीओ मोहम्मद जफर इमाम के साथ श्रम प्रवर्तन पदाधिकारी प्रकाश कुमार एवं प्रखंड सहकारिता पदाधिकारी सतीश राम को बनाया गया है।


13 अप्रैल 2026, सोमवार