Monday, 6 April 2026

नक्सल आंदोलन के समय मध्य बिहार में फसल, बंदूक और परिवर्तन की कहानी

 ● फसल बन्दूक और परिवर्तन ●



नक्सल पर न्यूज ब्रेक में रिपोर्ट

10 दिसंबर 2000 के अंक में प्रकाशित


सशत्र प्रचार दल द्वारा जारी गांवों में प्रचार के क्रम में उसका पीपुल्सवार से टकराव नहीं होगा। लेकिन 26 नवम्बर की रात ‘सेलारपुर’ में पांच पीपुल्सवार समर्थकों की हत्या लिबरेशन ने कर दी। इसके पूर्व गौरीशंकर सिंह के घर को डायनामाइट से 20 नवम्बर को पीपुल्सवार ने उड़ाया था, जिन पर 1995 में पीपुल्सवार के एक प्रमुख नेता रघु उर्फ बीरबल की हत्या में भूमिका निभाने का आरोप है। माले लिबरेशन की हिटलिस्ट जारी कर उन्हें पार्टी के समक्ष शीघ्र ही आत्मसमर्पण करने की चेतावनी भी पीपुल्सवार ने दी है। उधर जहानावाद के ही चिरारी गांव में हथियारों की वापसी के सवाल पर पीपुल्सवार और भाकपा (माले) लिबरेशन के बीच हिंसक टकराव की आशंका है। पीपुल्सवार के पांच हथियार को लेकर तनाव है। फिर औरंगाबाद के मेहदा गांव में भूमि विवाद में दोनों संगठन आमने-सामने हैं। दक्षिण बिहार के गांवों में हिंसा की आशंका की पुष्टि घोंआकोल (गोह,औरंगाबाद) से गिरफ्तार एम.सी.सी. उग्रवादी कइल प्रजापति के बयानों से भी होती है। परासी में नरसंहार के लिए जुटे हुए दस्ते से प्रजापति को गिरफ्तार किया गया। उसके अनुसार एम.सी.सी के निशाने पर एक कांग्रेसी नेता ललित, बरपा, दादर, बरुण, पिसाय परासी एवं सोनडीहा गांव है। खबर है कि एम.सी.सी का ‘दस्ता’ कुर्था एवं करपी (जहानाबाद) थाना क्षेत्र में विगत 10 दिनों से जमा हुआ है। टिकारी (गया), उपहरा (औरंगाबाद) एवं कोंच (गया) के सीमावर्ती इलाके में ‘लाल त्रिकोण’ वाले क्षेत्र में स्वच्छंद होकर घुमते देखा गया है। एम.सी.सी की योजना कुर्था, करपी, उपहरा, कोंच, टिकारी में बड़ी हिंसा की है। इससे इस क्षेत्र के भूमिहार बहुल गांवों में दहशत है। 



० उपेंद्र कश्यप ०

वह दिन भी सामान्य था, लेकिन ‘न्यूजब्रेक’ के इस संवाददाता के लिए खास महत्व का था। बताया गया था- ‘आप तैयार रहेंगे, आपको किसी भी दिन कभी भी ‘लाल क्षेत्र’ में ले जाया जा सकता है। यह बताने वाले कथित धीरज की मैं कई रोज से प्रतीक्षा करता था। लेकिन उस दिन कोई दूसरा अपरिचित चेहरा सुदामा मेरे पास आया। मैं सहज दिखने की कोशिश करते हुए अपना बैग लेकर चल पड़ा। कुछ दूरी तय करने के बाद मेरी स्कूटर को कसी दूसरे अपरिचित ने ले लिया और फिर मेरी आंखों पर पट्टी बांध दी गयी। करीब आधे घंटे बाद मैं एक सुदूरवर्ती अति पिछड़े गांव में था। कौन सा? नहीं बताया गया। किसी नहर के किनारे स्थित उस गांव में मुझे पक्के अर्द्धनिर्मित या निर्माणाधीन बस दो या तीन घर दिखे, बाकी खपरैल या झोपड़ी ही थी। सार्वजनिक चापाकल पर बर्तन मांजती औरतें, कृषि कार्य में व्यस्त बड़े-बुजुर्ग, उछलते-कुदते बच्चे सब कुछ सामान्य गांव की तरह लग रहा था। पहले मिसरी और मिक्चर के साथ पानी दिया गया। बाद में पोठिया मछली और मोटा पंकजवा चावल का भात परोसा गया। पसंद के विपरीत किसी तरह इसे खाया। खाना खिलाने वाले परिवार से सामाजिक- पारिवारिक मुद्दे पर चर्चा होती रही। विडम्बना देखिए! जो  व्यक्ति समाज बदलने की कोशिश में लगा है उसका चचेरा भाई औरंगाबाद समाहरणालय में कार्यरत है। पैसा वाले इस भाई को जब घर से पंकजवा चावल भेजा गया तो उसने टिपपणी की थी- ‘क्या समझता है?  पंकजवा चावल पहुंचा दिया? यह आदमी खाता है? इसे तो गधा खाता है।’  यह दृष्टिकोण समाज बदलने के सपने पर ही चोट है। इस परिवार को इसका दुःख है कि सिर्फ सवर्ण ही नहीं बल्कि कोइरी जैसी पिछड़ी जाति के समृद्ध किसान भी बन (मजदूरी) सही नहीं देते। घटिया चावल देते हैं।



मैं लिबरेशन की मांद में था। वहां मैंने एक मर्यादा बनाये रखी। किसी का नाम नहीं पूछा। वैसे यह स्पष्ट था कि जो नाम बताया भी जाएगा वह या तो गलत होगा या फिर पार्टी का खास नाम। हम गांव से निकलकर जंगल की ओर गये। लोगों ने जंगल की ओर जाते देखा भी होगा। बाजार से लौट रहे ग्रामीण लाल दस्ते को देखकर ‘लाल सलाम’ करते हुए सहजता से आगे बढ़ जाते। मैंने फिर सवाल किया- इन लोगों के देखने से दिक्कत नहीं होगी? सशत्र दस्ते को लगा कि मैं भीतर से सुरक्षा को लेकर चिंतित हूं। कहा गया- ‘पत्रकार साब! आप निश्चिन्त रहो । पुलिस कभी हिम्मत नहीं कर सकती इधर आने के लिए। फिर यदि ऐसा हुआ तो हम उसे तीन घंटे तक रोक सकते हैं। तब तक धुंधला हो जायेगा और तब कोई भी पुलिस बल इस ‘जंगल’ में आने को साहस नहीं करेगा। तब तक आपको सुरक्षित स्थान पर पहुंचा दिया जायेगा।’ पुछा- पुलिस क्यों नहीं मोर्चा ले सकती है! बहुत व्यावहारिक उत्तर था- ‘उसे नौकरी करती है सो जिंदा बचे रहने की कोशिश करती है, जबकि हम अपनी जान पहले ही दे चुके होते हैं। नक्सली आधार वाले गांव में लोग लाल फौज पर भरोसा करते हैं और उसकी इज्जत करते हैं। उसे सुरक्षा देते हैं, पूरा गांव अपने क्षेत्र के ‘लाल दस्ते ’ के सभी सदस्यों से परिचित होता है।



खैर! अंत में इस जंगल से लौटते वक्त साथ आ रहे सुदामा (अपरिचित ) से मैंने एक सवाल किया -दस्ता वाले नहीं लौटे? उत्तर था- हमें गांव से जंगल की ओर जाते देखने वालों में संभव है कोई विरोधी संगठन का भी हो, सो उसे यह ज्ञात नहीं होना चाहिए कि हमारे अंतिम गंतव्य की दिशा क्या है?’ अपने लक्ष्य को छुपाना इनकी आवश्यकता होती है। माले का हथियारबंद दस्ता इलाके में तो घूम ही रहा है, पीपुल्स वार और एमसीसी का भी लाल दस्ता अपने टारगेट की तलाश में है। किसानों की सुरक्षा के नाम पर रणवीर सेना भी  सक्रिय है। जैसा कि खुफिया विभाग का मानना है कि धनकटनी के बाद मध्य बिहार में नरसंहारों का तांता लग सकता है।’ अभी शान्ति है, लेकिन अंदर से स्थिति भयावह है। मध्य बिहार के सैकड़ों गांवों की शाम संगीनों के साये में ढलती है। दिन के उजाले में रणवीर सेना एवं नक्सली संगठनों के सशस्त्र दस्तों की सक्रियता गांवों में बढ़ गयी है। खेतों के मालिक संभावित विरोध से निपटने के लिए प्रयाप्त आदमी और हथियार जुटाने में लग गये हैं। सिर्फ धनकटनी को लेकर ही नहीं बल्कि ‘बैंलेस ऑफ़ टेरर’ एवं इलाका विस्तार की कोशिशों को लेकर भी सशस्त्र दस्तों की सक्रियता बढ़ी है।


खेतों में जब तक धान की फसल लगी रहती है, प्रायः सुदूरवर्ती गांवों में नरसंहार नहीं होते। और जैसे ही फसल कटनी शुरू होती है- ग्रामीण इलाकों में कई मामूली मुद्दों पर तनाव बढ़ना शुरू हो जाता है। धनकटनी के बाद प्रायः मामूली विवाद भी हिंसक रूप अख्तिार कर लेता है। दरअसल तब खेत खाली हो चुके होते हैं, और हमलावर दस्तों को अपेक्षाकृत सुगम मार्ग उपलब्ध हो जाते हैं। यही कारण है कि धनकटनी को लेकर उपजे विवाद आतंक के संतुलन के सिद्धांत और इलाका विस्तार को लेकर जारी संघर्ष के कारण तब हिसंक टकराव की घटनाएं बढ़ जाती हैं। अभी धनकटनी का मौसम शुरू है- तो गांवों में तनाव भी बढ़ चले हैं। खुफिया विभाग ने बिहार सरकार को नवम्बर में प्रेषित अपनी रिपोर्ट में कहा है कि मध्य बिहार के बक्सर, जहानाबाद, पटना, रोहतास, कैमूर,गया, नवादा, और औरंगाबाद जिलों के 60 से अधिक गांवों में हिंसक टकराव की आशंका है। रिपोर्ट में कहा गया है कि उग्रवादी संगठनों ने अपनी सक्रियता बढ़ा दी है और खेतों मे लगी फसल काटने के लिए किसान संभावित खतरे को देखते हुए प्रयाप्त हथियार और आदमी जुटा रहे हैं। गया, जहानाबाद एवं औरंगाबाद के सीमावती क्षेत्रों- जिसे लाल त्रिकोण कहा जाता है- में लाल दस्तों को घूमते देखा गया है। पालीगंज अनुमण्डल के भरतपुरा, सरकुन्ना, सीही, पनसुही आदि गांवों में लिबरेशन एवं पीपुल्सवार के सशस्त्र दस्ते घूम रहे हैं। इन क्षेत्रों में मालिक-मजदूर के रिश्ते में फिर तनाव व्याप्त हो गया है। अभी पुलिस जिला अरवल के चौरम थाना क्षेत्रों में मालिक- मजदूर के रिश्ते में फिर तनाव व्याप्त हो गया है। अभी पुलिस जिला अरवल के चौरम थाना क्षेत्र के डोरा गांव के आसपास नवम्बर के मध्य में पीपुल्सवार के लगभग 100 सशस्त्र लोगों का जमावड़ा लगा था। पुलिस गयी, लेकिन तब तक दस्ता कहीं और जा चुका था। समझा जाता है कि समीपवतीं गांव ‘सरौती’ में विवादित 85 बीघा जमीन को लेकर यह दस्ता इकट्ठा हुआ था। सरौती के सात किसानों पर आर्थिक नाकेबंदी लगा दी गयी है, जिसके तहत इनके खेतों में लगी धान की फसल काटने से मजदूरों को मना कर दिया गया है। इधर औरंगाबाद जिले के गोह थाना क्षेत्र के बहुरिया बरमा (पुराना जहानाबाद का गांव) के भूपति रमा शर्मा की रैयती करीब 45-50 बीघा जमीन पर भाकपा माले कब्जा कर गरीबों में बांट देने का दावा करती है तो वे न्यायालय से अपने पक्ष में डिग्री ले आए हैं। माले का कहना है- न्यायालय से न्याय खरीदा जाता है। 10 वर्षों से यह विवाद जारी है। क्षेत्र में जब रणवीर सेना अपना पैर जमा चुकी है और वह रमा शर्मा को संरक्षण दे रही है। इसका एक कारण तो यह भी है कि ऐसे मामलों में सफलता पाकर रणवीर सेना अपना जनाधार बढ़ाना चाहती है। दोनों इस विवाद को प्रतिष्ठा का प्रश्न बना चुके हैं। उधर, रोहतास जिले के नवलेश सिंह (यदुनाथपुर) और रमेश चौबे (परछा) की जमीनों पर नाकेबंदी जारी है। नालंदा जिले के इस्लामपुर थाना के धमौली गांव में 8 कट्ठा की गैर मजरूआ आम जमीन पर लगी धान की फसल काटने को लेकर मध्य नवम्बर में चार चक्र गोलियां चलीं। धनकटनी को लेकर हुई ताजा घटना में 17 नवम्बर को रोहतास के कोरी गांव में चार चक्र गोली चली जिसमें दो हरिजन मारे गये और तीन घायल हो गये। औरंगाबाद में भी धनकटनी को लेकर तनाव बढ़ना शुरू हो गया है। रोहतास जिले के उच्चाधिकारियों को दी गयी अपनी रिपोर्ट में खुफिया विभाग का मानना है कि दिनारा के दस, काराकाट के आठ एवं नौहट्टा थाना क्षेत्र के दो गांवों सहित जिले के नोखा, करगहर व दिनारा थाना क्षेत्र की सीमा पर अवस्थित लगभग 50 गांवों में धनकटनी को लेकर तनाव है। इस जिले में भाकपा (माले ) रणवीर सेना तथा किसानों के बीच संघर्ष की आशंका है।



बिहार सरकार को दी गयी अपनी रिपोर्ट में खुफिया विभाग ने रणवीर सेना द्वारा जारी एक नोटिस के हवाले से कहा है- ‘रणवीर सेना का कहना है कि बक्सर जिले के कोरान सराय नवानगर, सोनबरसा, डुमरांव, राजपुर,धनसोई एवं बगेन आदि थाना क्षेत्रों में अति वामवादी उग्रवादियों द्वारा निरीह किसानों  को प्रताड़ित करने एवं उनके सामानों को क्षति पहुंचाने तथा धन की फसल को बर्बाद करने का सिलसिला बदस्तूर जारी रखा गया है। जिला प्रशासन द्वारा उग्रवादियों के सामने घुटने टेक देने से रणवीर सेना कार्रवाई को अब अपने हाथ में लेने के लिए विवश है। दूसरी ओर जहानाबाद के हरदिया, पहाड़पुर, बुलाकी बिगहा, पहलेजा, जलवइया, मधुश्रवा, तबकला, कमता समेत तीन दर्जन गांवों में आतंक एवं खौफ का आलम है।



ग्रामीण सूत्रों के अनुसार औरंगाबाद जिले के गोह, खुदवां, ओबरा, नबीनगर, रफ़ीगंज, मदनपुर, टड़वां, हसपुरा गया के टिकारी, गुरारू, गुरुआ, कोंच, जहानाबाद के कलेर मेंहदिया, अरवल, रोहतास के नवहट्टा, दिनारा, चेनारी आदि। थाना क्षेत्रों में धनकटनी को लेकर तनाव बढ़ रहा है। दूसरी ओर इलाका विस्तार और बैलेंस ऑफ़ टेरर को लेकर भी मध्य बिहार के गांवों में तनाव है क्योंकि अपने उद्देश्यों की पूर्ति में नक्सली संगठन और निजी सेना सक्रिय हैं। पालीगंज अनुमंडल के दुल्हिन बाजार थाना क्षेत्र में पीपुल्सवार तथा भाकपा (माले) लिबरेशन के बीच संघर्ष जारी है। दरअसल पीपुल्सवार जहानाबाद से पूर्वोत्तर की ओर पटना के इलाके में अपना विस्तार व  से   चाह रहा है। उसके मार्ग में सवसे बड़ी बाधा लिबरेषन है। इस क्षेत्र में माले (लिबरेषन) का व्यापक जनाधार है जिसकी बजह से दोनों की बंदूकें एक दूसरे के रिुद्ध गरजती रहती है। इस संघ  में गत दिनों में दर्जन भर से अधिक हतथाएं हो चुकी हैं। रोहतास में रेंजर वीर बहादुर राम की नक्सलियों ने हत्या कर दी । इलाके में नक्सलियों का खौफ इतना अधिक है कि पुलिस वाले जब बस में सवार होते हैं तो अपनी वदी बदल लेते हैं। पीपुल्सवार वालों ने रोहतास के कभी समृद्ध रहे गांव दारानगर को अपना मुख्य केंद्र बना लिया है। यहां दिन में जनअदालत लगाकर सजाएं दी जाती हैं। इलाके की कई बंदूकें लूट ली गयीं और हत्याएं की गयीं। अब नक्सलियों ने व्यवसायिों को अपनी दुकाने शाम होने के पुर्व ही बंद कर देने का फरमान जारी कर दिया है। फरमान के कारण अब अधिकांश दुकानें बंद ही रहती है।


 अपने इलाका विस्तार की कोशिश में लगे मार्क्सवादी कम्युनिस्ट सेंटर  (एम.सी. सी.)  ने कोडरमा क्षेत्र के पूर्व एरिया कमाण्डर प्रकाश को चान्हों क्षेत्र की जिम्मेदारी सौंपी है और इसके केन्द्रीय नेताओं के गुपचुप दौरे की सूचनाएं प्राप्त हो रही हैं। उधर मध्य बिहार के गांवों में अपना जनाधार बढ़ाने की कोशिश के तहत भाकपा (माले) लिबरेशन ने ‘सशस्त्र दल ’ का गठन किया है, जो गांव में जा- जाकर ग्रामिणों को वैचारिक रूप् से अपनी नीतियां समझाता है (विस्तृत रिपोर्ट देखें)। फिर इन नक्सली संगठनों में आपसी संघ  भी यदा-कदा हिंसक हो जाता है।


दरअसल इन संगठनों के ग्राम स्तर या पंचायत स्तर की कमेटियों पर इलाका विस्तार के लिए उच्च कमेटियों का दबाव रहता है। इनके आपसी संघ का मूल कारण यही होता है। सैद्धांतिक मतभेद का कारण कम होता हैं फिर ये नक्सली संगठन अपने कोष के लिए भी प्रयास करते हैं। इसमें भी कभी-कभी दोनों के हित टकराते हैं तो हिंसा होती है। इस सब से गांवों में तनाव बढ़ा है। इधर मजदूरों एवं मालिकों के रिश्ते में भी खटास आने की सूचना है। औरंगावाद के गोह थाना के गैनी गांव में गत महीने एक मरी हुई गाय को उठाकर फेंकने के लिए गांव का कोई हरिजन तैयार नहीं हुआ। अंततः प्रभावित पक्ष ने बाहर से मजदूर मंगाकर इसे फेंकवाया। गांवों में इस बात को लेकर भी चर्चा है कि रणवीर सेना या एस.सी.सी. द्वारा धनकटनी के बाद कभी भी नरसंहार किया जा सकता है ऐसा खुफिया विभाग भी मानता है। अक्टूबर महीने के प्रारंभ में बिहार सरकार को दी गयी अपनी रिपोर्ट में विभाग का मानना है कि रामबिलास पासवान के केंद्रीय मंत्री बनने के बाद रणवीर सेना ने दलितों के प्रति नरम रुख अख्तियार करने की योजना बनायी है। यही कारण है कि मध्य बिहार में अभी दलित समुदाय के लोग राहत महसूस रहे हैं। इस दौरान रणवीर सेना और एम. सी. सी. आमन-सामने हैं। रणवीर ‘सेना’ को आशंका है कि उत्पाद एवं मद्य निषेध राज्यमंत्री सुरेंद्र यादव एम. सी. सी के पीछे रहकर उसकी मदद कर रहे हैं। खुफिया विभाग मानता है कि अभी हाल में राजद में गये एक उद्योगपति सांसद उग्रवादी संगठनों को लाखों रुपये से मदद करते है।  दूसरी ओर भाजपा- समता के कई विधायक, सांसद रणवीर सेना की मदद करते हैं। रिर्पाट में माना गया है कि ‘धनकटनी के बाद नरसंहारों का तांता लग जाता है।’   


 



■ माले का सशस्त्र प्रचार दल ■     


भाकपा माले लिबरेशन ने अपनी नीतियों और कार्यक्रम के प्रचार के लिए सशक्त प्रचार दल का गठन किया है। यह दल गांव के गरीबों, हरिजनों, दलितों, शोषितों, वंचितों में राजनीतिक चेतना जागृत करने , उन्हें सम्मान दिलाने तथा बड़े जोतदारों के विरुद्ध संर्घष के लिए सुरक्षा की गारण्टी देते हुए प्रेरित करने का कार्य कर रहा है। किसी नक्सली संगठन के लाल दस्ते या लाल फौज के प्रचलित रूप् से एकदम भिन्न इस ‘सप्रद’ के जिम्मे सिर्फ राजनीतिक कार्य ही सौंपे गये हैं। यह लाल दस्ता से अलग है। भाकपा (माले) लिबरेषन के जिला सचिव कमल ने इसके उद्देश्य के बारे में ‘न्यूजब्रेक’ को बताया- ‘ सामंती तत्व अपने लठैतों एवं हथियारों के बल पर गांवों में राजनीतिक कार्य को बाधित करते है। कहीं- कहीं इसे जबरदस्ती रोका जाता है। इसलिए ऐसे चिहिृत इलाके में सप्रद जाकर राजनीतिक कार्य करता है। वह ग्रामीण जनता को बड़े जोतदारों की तरफ से होने वाले संभावित हिंसक विरोध के प्रति आश्वस्त करता है और उसे इनके विरुद्ध संर्घष जारी रखने के लिए प्रेरित करता है। ये लोग खुले ढंग से गांवों में कार्यक्रम कर अपनी नीतियों का प्रचार करते है। और  जब संर्घष  की आवश्यकता पड़ती  है , ये लोग हथियार उठा लेते हैं। भानू कहता है- ‘ हम गरीबों के सुरक्षा गार्ड हैं, हम धांधली एवं विकास के मुद्दे पर जनता  को जागरूक  कर एकजुट करने की कोशिश करते हैं। ‘ वंचित समाज को उसका हक दिलाने की कोशिश में लगे सप्रद के सदस्य ईमानदारी, निष्ठा, आस्था,  त्याग, उत्तरदायित्वबोध एवं समर्पण भाव के निकष  पर खरा साबित हुए होते हैं। अपनी निष्ठा एवं समर्पण भाव को कई किस्तों में एक पार्टी कार्यकर्ता साबित कर चुका होता है तभी उसे सशस्त्र दस्ते का सदस्य बनाया जाता है। एक तरह से अपना जीवन अपने उद्देष्य की पूर्ति के निमित्त ये लोग दान कर चुके होते हैं। पार्टी को  या समाज को । और इसके बदले में उन्हें कुछ भी भौतिक उपलब्धि प्राप्त नहीं होती। जब कोई घायल हो जाता है तो उसके इलाज के लिए ग्रामीणों के बीच से चंदा मांगा जाता है और कोई मारा जाता है तो उसकी बेवा एवं बच्चों को सिुर्फ दशहरा या होली में कपड़े दिये जाते हैं। माले की ओर से बस इतना ही दिया जाता है। बावजूद इसके सप्रद में आने वाले लोगों की कमी नहीं दिखती। इसके मूल में कहीं न कहीं कोई विवशता है, उत्पीड़न से बचने की छटपटाहट है। बहरहाल, सशस्त्र प्रचार दल गांवों में अपना ‘राजनीतिक कार्य’ जारी रखे हुए है।


Wednesday, 11 February 2026

141 वर्ष में 8225 से बढ़कर हो गयी 75000 जनसंख्या

11.02.2026 को प्रकाशित रिपोर्ट


चार बार की जनगणना में घटी है शहर की आबादी

शहरीकरण की तेज गति से बढ़ रही आबादी

1961-71 के दशक में सबसे तेज जनसंख्या वृद्धि 55.80 प्रतिशत

उपेंद्र कश्यप, जागरण ● दाउदनगर (औरंगाबाद) : वर्ष 1885 में गठित नगर पालिका दाउदनगर की जनसंख्या 141 वर्ष में नौ गुणा हो गयी। कुल चार बार की जनगणना में शहर की आबादी बढ़ने के बजाए घटी है। कारण प्लेग जैसी महामारी बताई जाती है। यह शहर 27 वार्ड में बंटा हुआ है। यह कालांतर में नगर पंचायत और फिर नगर परिषद बना। बिहार जाति आधारित गणना 2022 के उपलब्ध विवरण के अनुसार शहर की आबादी 65543 बताई गई है। 2011 में हुई जनगणना के अनुसार शहर की आबादी 52364 थी। यानी लगभग एक दशक में 13179 लोग शहर में बढ़े। प्रतिशत में यह आंकड़ा 20.10 आता है। अब इसमें लगभग नौ हजार भखरुआं की जनसंख्या जुड़ जाएगी। अर्थात नगर परिषद की आबादी लगभग 75 हजार हो जाएगी। वर्ष 1961-71 के दशक में सबसे तेज जनसंख्या वृद्धि 55.80 प्रतिशत हुई। मतलब वर्ष 1961 में 13320  जनसंख्या थी जो 55.80 प्रतिशत की वृद्धि के साथ  1971 में 20743  हो गयी। वर्ष 2911, 1921, 1941 और 1951 में जनंसख्या घट गई। 




साल -जनसंख्या  -वृद्धि दर प्रतिशत में

1881  -   8225 -   0.00 

1891   -  8730 -    6.13 

1901  -   9744  -   11.61

1911   -  9149  -    -06.10 

1921  -   8511  -    -06.97 

1931 -   11699 -     37.46

1941  -  11133 -     -04.84 

1951  -  10448 -     -06.15 

1961  -  13320 -    27.49 

1971 -   20743 -     55.80

1981  -  24513-     18.74 

1991  -  30331 -    23.80

2001 -   38014-   25.33 

2011  -  52340-   37.67


(ध्यातव्य:- इसके बाद अधिकारिक जनगणना नहीं हुई है।)





8610 मकानों में 11053 परिवार 

प्राप्त विवरण के अनुसार दाउदनगर शहर के सभी 27 वार्डों में कुल 8010 भवन है। जबकि 8610 मकान है। इन मकानों में 11071 परिवार रहते हैं। महत्वपूर्ण है कि आमतौर पर 2011 में बताया गया था कि शहर में 6000 लगभग घर हैं। अब नए सिरे से गृह सर्वे हो रहा है। घरों की संख्या काफी बढ़ने की संभावना है। भखरुआं जुड़ने के बाद यह संख्या और बढ़ेगी। 




नया क्षेत्र विकसित हुआ, पढाईके लिए भी परिवार बढ़े

नगर परिषद की मुख्य पार्षद अंजली कुमारी ने बताया कि बीते एक से दो दशक में नया क्षेत्र खूब विकसित हुआ है। नया इलाका आबाद हुआ है। आबादी भी बढ़ी है और घर मकानों की संख्या भी बढ़ी है। दूसरी वजह यह है कि शहर में बच्चों को पढ़ाने के लिए काफी लोग गांव से आकर रहने लगे हैं। इनमें काफी लोग जमीन लेकर घर बना चके हैं। नौकरीपेशा और सरकारी सेवा में रहने वालों ने सेवानिवृत्त होने के बाद शहर में घर बनाया हुआ है। ताजा सर्वे के बाद शहर में स्थित कुल घरों की संख्या का स्पष्ट विवरण ज्ञात हो सकेगा।




2022 में वार्डवार जनसंख्या

वार्ड संख्या- आबादी

एक-3955

दो-2556

तीन-2617

चार-1931

पांच-2423

छह-2749

सात-2182

आठ-2496

नौ-3570

10-2958

11- 1711

12-2283

13-1857

14-2774

15-1616

16-4467

17-3060

18-2033

19-1394

20-1862

21-1779

22-2243

23-1679

24-1586

25-2732

26-2757

27-2573

कुल-65543


2011 में 23 वार्ड, तब थी इतनी आबादी

वार्ड नंबर- आबादी

एक- 1065

दो- 2234

तीन- 2471

चार- 1075

पांच- 2001

छह- 2267

सात- 1764

आठ- 2280

नौ- 2428

10- 1344

11- 1584

12- 2148

13- 1396

14- 3160

15- 3132

16- 4009

17- 2570

18- 1691

19- 2823

20- 2479

21- 2888

22- 2104

23- 3451

कुल-52364





Sunday, 8 February 2026

कभी “लिखा न पढ़ी, जो कर्मचारी कहे वही सही” का था हालात

 

09.02.2026 को दैनिक जागरण में प्रकाशित रिपोर्ट

पहली बार बजट तैयार करने में बेलने पड़े थे बहुत पापड़ 

कई दशक तक बनाया ही नहीं गया था बजट

सरकार के दबाव व धमकी के बीच बहुत कुछ बदल गया

उपेंद्र कश्यप, जागरण ● दाउदनगर (औरंगाबाद) : वर्ष 1885 में गठित नगर पालिका में पहली बार 1938 में नागरिक समाज से सूरज नारायण सिंह को अध्यक्ष बनाया गया था। वे मनोनीत थे। इसके पहले 1937 तक एसडीओ औरंगाबाद ही अध्यक्ष हुआ करते थे। सूरज नारायण सिंह के बाद 12 वे अध्यक्ष बने परमानंद प्रसाद। वे नौ जून 2007 से 2012 तक और फिर 27 जून 14 से 2017 तक अध्यक्ष रहे। अभी तक मनोनीत या निर्वाचित सभी चेयरमैनों में सर्वाधिक समय तक परमानंद प्रसाद ही अध्यक्ष रहे हैं। उन्होंने नगर परिषद (तब नगर पंचायत) की सबसे बड़ी समस्या को समाप्त किया था। वह बताते हैं कि कार्यालय की स्थिति यह थी कि कहीं लिखा पढ़ी नहीं थी। जो कर्मचारी कहे वही सही मान लिया जाता था। पंजी तक चेयरमैन के सामने नहीं लाते थे। सब खो गया कह दिया जाता था। बजट नहीं था। कर्मचारियों को कोई प्रशिक्षण प्राप्त नहीं था। सभी कर्मियों का 14 महीने का वेतन बकाया था। इधर बिहार सरकार का नगर विकास आवास विभाग तमाम नगर निकायों पर लगातार बजट बनाने का दबाव बना रहा था। इन्होंने कर्मचारियों से इस बाबत बैठक की। इन्हें लगा कि कोई कर्मचारी सहयोग करने को तैयार नहीं है और हर कोई बजट बनाने से बचना चाह रहा है। मूल मुद्दा यह था कि राजस्व की वसूली करने वाले तहसीलदारों ने सैरातों की बंदोबस्ती और गृह कर की वसूली तो की लेकिन वह राशि बैंक में जमा नहीं हुआ। डिमांड पोस्टिंग वर्षों से लटका रहा। कर्मचारियों का बकाया पैसा देने के लिए धन नहीं था। निबंधन कार्यालय से मिलने वाले धन को पटना स्थित महालेखाकार तक दौड़ा लगाकर उन्होंने लाया और कर्मचारियों का वेतन भुगतान हुआ। इसके बाद करारोपण कराया गया। राजस्व की जानकारी ली गई और चाहे जैसे भी हो बजट तैयार करने का विभागीय दबाव के बीच परमानंद प्रसाद ने सभी कर्मचारियों को विश्वास में लिया और बजट बनाने का काम शुरू किया। इधर सरकार लगातार दबाव बनाने के साथ धमकी भी दे रही थी कि अगर बजट नहीं बना तो योजना के लिए राशि नहीं मिलेगी। जनसंख्या के मुताबिक विकास योजना के लिए सरकार राशि देती थी। परमानंद प्रसाद बताते हैं कि सभी कर्मचारियों के साथ बैठक कर वित्तीय अनुशासन लागू करने का लगातार प्रयास किया। सब कार्य बंद कर इस बात पर ध्यान दिया गया कि वित्तीय अनुशासन कायम हो। पंजियों को ढूंढ कर निकलवाया गया। सबको व्यवस्थित किया व करवाया गया। कर्मचारियों को सामूहिक निलंबन और फिर बर्खास्त करने की धमकी दी, तब जाकर बजट बना। लगभग छह महीने की कोशिश के बाद डिमांड पोस्टिंग का काम यानी लेखा पंजी दुरुस्त करने का काम हुआ। पंजीयों का मिलान कराया गया। परमानंद प्रसाद बताते हैं कि बड़ी कोशिश के बाद कार्यालय में अनुशासन आया। सभी को स्थापना से जोड दिया गया। कर्मचारी का दायित्व तय किया गया और काम करने का एक रास्ता बना दिया गया। उनके सामने बड़ी चुनौती नगर निकायों में अपना कार्यपालक पदाधिकारी का नहीं होना था। प्रभार से काम चलता था। इसलिए काम कराने के लिए हर समय पदाधिकारी उपलब्ध नहीं होते थे। पदाधिकारी के पास जाकर दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करवाने की मजबूरी थी। परमानंद प्रसाद के कार्यकाल की सबसे बड़ी उपलब्धि वित्तीय अनुशासन, हर काम के लिए एक रूट मैप तैयार करना और वर्ष 2009 में बजट पारित करना माना जाएगा। इसके बाद ही प्राय प्रत्येक वर्ष (एकाधिक वर्ष छोड़कर) बजट बनाए जाने लगे।


अब बजट के लिए जनसभागिता पर जोर

अब नगर परिषद में बजट बनाने के लिए जन सहभागिता पर जोर दिया जा रहा है। मुख्य पार्षद अंजली कुमारी ने बजाप्ता इसके लिए इंटरनेट मीडिया पर संदेश लिखकर लोगों से सुझाव आमंत्रित किया है, ताकि बजट तैयार करने में जनता के सुझाव और मांग को शामिल किया जा सके। उन्होंने नगरवासियों से वित्तीय वर्ष 2026–27 हेतु बजट निर्माण के लिए  वार्ड, मोहल्ले या नगर के समग्र विकास के लिए किसी भी प्रकार की परियोजना, कार्य प्रस्ताव की मांग की। ताकि विकास योजनाएएं जनभावनाओं के अनुरूप तैयार हो सके। 



Saturday, 7 February 2026

काम हो रहा इसलिए हो रहे विरोध और लग रहे आरोप : अंजली कुमारी

08.02.2026 को दैनिक जागरण में प्रकाशित रिपोर्ट


शैक्षणिक व सामाजिक विकास पर ध्यान केंद्रित

संदेह से देखा तो सम्मान व सहयोग भी मिला

विकास की कई योजनाओं को पूर्णता देना लक्ष्य

उपेंद्र कश्यप, जागरण ● दाउदनगर (औरंगाबाद) : नगर परिषद दाउदनगर अपनी स्थापना का 141 वर्ष जब पूरे कर रहा है तो युवाओं को निखारने के लिए खेलकूद प्रतियोगिता का आयोजन किया जा रहा। यह मुख्य पार्षद अंजली कुमारी के निर्णय का फलाफल है। पहली बार स्थापना दिवस मनाया जा रहा है। अंजली कुमारी ने 27 जून 2023 को पद एवं गोपनीयता का शपथ लिया था। आम जनता से सीधे निर्वाचित वह प्रथम मुख्य पार्षद हैं। आम तौर पर महिला जन प्रतिनिधि से सीधे संवाद मुश्किल होता है। यह बेबाक बोलती हैं। चाहे मंच हो या सदन या बात करने वाला पत्रकार ही क्यों न हो। उनसे विभिन्न मुद्दों पर दैनिक जागरण संवाददाता उपेंद्र कश्यप ने बातचीत की।



■ बतौर मुख्य पार्षद सबसे बड़ी 05 चुनौतियां क्या हैं-

● नगर परिषद के पास संसाधन सीमित हैं, लेकिन जनता की अपेक्षाएं स्वाभाविक रूप से बहुत अधिक रहती हैं। इस संतुलन को साधना सबसे बड़ी चुनौती रही। कई समस्याएं वर्षों से लंबित थीं। यथा-नाला, सड़क, जलनिकासी, भूमि विवाद, जिनका समाधान तत्काल संभव नहीं था। प्रशासनिक प्रक्रियाओं की जटिलता, योजनाओं की स्वीकृति, टेंडर प्रक्रिया, विभागीय समन्वय में समय लगता है, जिससे कार्यों में विलंब होता है। विकास कार्यों के बावजूद राजनीतिक कारणों से आरोप-प्रत्यारोप झेलने पड़े। एक महिला के रूप में नेतृत्व व निर्णय क्षमता के साथ प्रशासनिक दृढ़ता को बार-बार साबित करना पड़ा।


■ नगर परिषद कार्यालय और शहर में दिखी सबसे बड़ी पांच समस्या-


● अव्यवस्थित ड्रेनेज और जलजमाव। जर्जर सड़कें और ट्रैफिक व्यवस्था। सार्वजनिक भवनों और सामुदायिक स्थलों की कमी।युवाओं और बच्चों के लिए खेल व अध्ययन के सीमित संसाधन। कार्यालय में पुराने ढर्रे की कार्यप्रणाली।


■ सबसे बड़े ड्रीम प्रोजेक्ट और उनके लिए किए गए प्रयास-

● नौका विहार,शापिंग कंपलेक्स, का आधुनिक ड्रेनेज, पुस्तकालय और नाला तंत्र। प्राथमिकता सूची बनाकर चरणबद्ध कार्य योजना तैयार की। राज्य सरकार से लगातार पत्राचार व फालो-अप की। सामुदायिक भवन और ई-लाइब्रेरी। वार्ड 14 और 16 में प्रस्ताव तैयार। शैक्षणिक और सामाजिक विकास को केंद्र में रखा। शहर के लिए मोक्षधाम की व्यवस्था। भूमि चिन्हित कर एक वर्ष से लगातार प्रयास। प्रधान सचिव, नगर विकास एवं आवास विभाग से व्यक्तिगत रूप से मिलकर प्रस्ताव को आगे बढ़ाया। खेल अधोसंरचना का विकास। अशोक स्कूल फील्ड में खेल प्रतियोगिताओं का आयोजन।बच्चों के सर्वांगीण विकास का लक्ष्य। बुनियादी शहरी ढांचे का सुदृढ़ीकरण।


■ पांच बड़े लक्ष्य और उन्हें पूरा करने की रणनीति-

● पूरे शहर में स्थायी जलनिकासी समाधान। मास्टर ड्रेनेज प्लान के तहत कार्य। हर वार्ड में मूलभूत सुविधाओं की समान उपलब्धता।वार्ड-वार आवश्यकता आधारित योजना। डिजिटल और पारदर्शी नगर परिषद। कार्यालयी प्रक्रिया को आधुनिक बनाना। महिलाओं और युवाओं के लिए विशेष योजना। कौशल, खेल और शिक्षा पर फोकस।स्वच्छ, सुंदर और सुरक्षित शहर। स्वच्छता अभियान को जन-आंदोलन बनाना।


■ महिला मुख्य पार्षद के रूप में अनुभव-

● नगर परिषद कार्यालय से लेकर पटना स्थित बिहार सरकार के कार्यालयों तक की यात्रा सीख, संघर्ष और आत्मविश्वास से भरी रही।कई बार संदेह की दृष्टि से देखा गया, लेकिन जब योजनाओं की तैयारी और तथ्यों के साथ बात रखी, तो सम्मान और सहयोग दोनों मिला। यह यात्रा मुझे और अधिक दृढ़, जिम्मेदार और संवेदनशील बनाती गई।

■ आपके पूर्ववर्तियों को क्या करना चाहिए था जो वे कर न सके-

● पूर्ववर्तियों ने भी अपने स्तर पर प्रयास किए, लेकिन दीर्घकालिक सोच का अभाव, कुछ बुनियादी मुद्दों को लगातार टालना, और युवाओं-बच्चों पर कम ध्यान देना  शहर के विकास में बाधा बना। मेरा प्रयास रहा कि उन्हीं अधूरे कार्यों को प्राथमिकता दी जाए।


■ विकास कार्यों पर भ्रष्टाचार के आरोप क्यों लगे-

● जब भी जमीनी स्तर पर वास्तविक और बड़े पैमाने पर काम होता है, तो विरोध और आरोप स्वाभाविक होते हैं। सभी कार्य नियम, प्रक्रिया और विभागीय स्वीकृति के तहत हुए। विरोधी भी यह स्वीकार करते हैं कि आधारभूत संरचना पर अभूतपूर्व काम हुआ। आरोप दरअसल काम की गति और प्रभाव से असहजता का परिणाम है, न कि सच्चाई।



18 प्रतिशत आबादी के साथ बढ़ेगा 70 प्रतिशत राजस्व

07 फरवरी 2026 को दैनिक जागरण में प्रकाशित रिपोर्ट

141 वर्ष का : दाउदनगर नगर परिषद :-02


होगा नया परिसीमन तो बनेगा अधिकतम 35 वार्ड 

मानव संसाधन के साथ बढ़ेगा निकाय का राजस्व

गृह कर के रूप में राजस्व प्राप्ति में होगी उत्तरोत्तर वृद्धि

उपेंद्र कश्यप, जागरण ● दाउदनगर (औरंगाबाद) : नगर परिषद का क्षेत्रफल बड़ा होगा, तो वार्डों की संख्या भी बढ़ेगी और इससे नगर निकाय का राजस्व भी बढ़ेगा। 10 फरवरी 1885 को नगर पालिका के रूप में अधिसूचित दाउदनगर में पहली बार वर्ष 1910 में वार्डों का गठन किया गया था। तब चार वार्ड बनाए गए थे। अभी वर्तमान नगर परिषद में 27 वार्ड हैं। क्षेत्र विस्तार के साथ जब परिसीमन होगा तो कार्यपालक पदाधिकारी ऋषिकेश अवस्थी के मुताबिक अधिकतम 35 वार्ड शहर में हो जाएंगे। भखरुआं का जो हिस्सा नगर निकाय में जुड़ेगा उससे लगभग 18 आबादी बढ़ेगी, लेकिन निकाय का राजस्व लगभग 70 तक बढ़ जाएगा। श्री अवस्थी बताते हैं कि गृह कर से वर्तमान नगर परिषद को लगभग 32 लाख रुपया वार्षिक प्राप्त होता है। सर्वे का काम चल रहा है और उम्मीद है कि नगर परिषद के वर्तमान क्षेत्र से लगभग एक से डेढ़ करोड़ रुपये राजस्व की प्राप्ति हो सकेगी। लेकिन जब भखरुआं का हिस्सा इसमें जुड़ जाएगा तो गृह कर के रूप में एक करोड रुपये लगभग और वृद्धि होने का अनुमान है। इस तरह क्षेत्र विस्तार और नए मूल्यांकन के बाद प्राप्त होने वाले गृह कर से लगभग ढाई करोड रुपये वार्षिक राजस्व प्राप्त होने का अनुमान नगर परिषद को है। तब भखरुआं में स्थित दुकान माल, शोरूम, बैंक समेत अन्य सरकारी गैर सरकारी कार्यालयों एवं आवासों से गृह कर के रूप में नगर निकाय को राजस्व की प्रति होनी शुरू होगी। जिससे राजस्व में उत्तरोत्तर वृद्धि की उम्मीद नगर परिषद को है।



चट्टी से नगर निकाय की यात्रा


जब वर्ष 1885 में नगर पालिका का गठन हुआ था उसके पहले भी दाउदनगर मगध और शाहाबाद क्षेत्र में चट्टी के रूप में मशहूर था। कहावत मशहूर है- शहर में सासाराम और चट्टी में दाउदनगर। तब और अब में काफी कुछ महत्वपूर्ण बदलाव हुआ है। वर्ष 2002 में जब दूसरी बार बिहार में नगर निकाय चुनाव प्रारंभ हुआ तो दाउदनगर नगर पंचायत बना। फिर वर्ष 2018 में नगर परिषद। अब कद नहीं क्षेत्र का विस्तार हुआ है।


12 से 22 सौ पर एक वार्ड


नगर निकाय में 1200 से 2200 की आबादी पर एक वार्ड का गठन होता है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार 52000 की आबादी वाले नगर परिषद में 27 वार्ड है। भखरुआं शामिल किए जाने के बाद 9000 की आबादी बढ़ेगी तो नया लगभग पांच वार्ड बनेंगे। कार्यपालक पदाधिकारी ऋषिकेश अवस्थी के अनुसार पूरे शहर का नया परिसीमन होगा। इससे अधिकतम 35 वार्ड शहर में बन सकेंगे।


Thursday, 5 February 2026

141 वर्ष के नगर निकाय से जुड़ी 18 प्रतिशत नई आबादी

 

06.02.2026 को दैनिक जागरण में प्रकाशित रिपोर्ट 

नगर परिषद दाउदनगर में भखरुआं का शामिल होना तय

मंत्रिमंडल की स्वीकृति के बाद डीएम का सरकार को रिपोर्ट 

क्षेत्र विस्तार पर एक भी नहीं मिला दावा आपत्ति 

उपेंद्र कश्यप ● दाउदनगर (औरंगाबाद) : 10 फरवरी 1885 को दाउदनगर कस्बा से शहर बना था। उसे नगर पालिका का दर्जा प्राप्त हुआ था। तब से अब तक 141 वर्ष हो गए। अब शहरी क्षेत्र का विस्तार अवश्यंभावी है। नगर परिषद के वर्तमान स्वरूप में भखरुआं क्षेत्र के हिस्से को जोड़ा जाना तय है। इससे दाउदनगर का इलाका विस्तार होगा। जनसंख्या के लिहाज से वर्तमान जनसंख्या में लगभग 18 प्रतिशत की वृद्धि होनी तय है। नगर विकास एवं आवास विभाग पटना द्वारा चार अक्टूबर 2025 को क्षेत्र विस्तार से संबंधित अधिसूचना जारी की गई थी। इसके बाद दावा आपत्ति के लिए समय का निर्धारण किया गया। तय समय अवधि में एक भी दावा आपत्ति इस संबंध में प्राप्त नहीं हुआ। नतीजा नगर परिषद द्वारा इस संबंध में एक पत्र जिला पदाधिकारी को चार जनवरी 2026 को लिखा गया। इसी पत्र के आलोक में 21 जनवरी 2026 को जिला पदाधिकारी ने परियोजना पदाधिकारी सह अपर निदेशक नगर विकास एवं आवास विभाग पटना को पत्र भेजा है। पत्र में कहा गया है कि नगर परिषद दाउदनगर द्वारा सार्वजनिक स्थलों, सरकारी कार्यालयों में अधिसूचना को चिपकाय गया एवं नगर परिषद का क्षेत्र विस्तार की उद्घोषणा डुगडुगी बजाकर एवं अन्य प्रचार-प्रसार के माध्यम से भी कराया गया है। इससे संबंधित दावा आपत्ति अप्राप्त है। कार्यपालक पदाधिकारी ऋषिकेश अवस्थी ने बताया कि कोई दावा आपत्ति प्राप्त नहीं हुआ है। यह अब तय हो गया है कि क्षेत्र विस्तार संबन्धी कोई अवरोध अब नहीं रहा। 


भखरुआं की नौ हजार आबादी होगी शहरी

भखरुआं तरारी पंचायत का हिस्सा है। थाना नंबर 75, तिवारी मोहल्ला, कुर्बान बिगहा और बाबा जी का बागीचा। पूरे इलाके को मिलाकर वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार 16460 की आबादी है। कार्यपालक पदाधिकारी ऋषिकेश अवस्थी बताते हैं कि भखरुआं के इस हिस्से की लगभग नौ हजार आबादी नगर परिषद क्षेत्र में शामिल होगी।


75000 होगी शहर की जनसंख्या 

बिहार जाति आधारित गणना 2022 के प्रथम चरण के आंकड़े के अनुसार शहर की आबादी 65543 बताई गई है। 2011 में शहर की आबादी 52364 थी। अब इसमें लगभग नौ हजार भखरुआं की जनसंख्या जुड़ जाएगी। अर्थात नगर परिषद की आबादी लगभग 75 हजार हो जाएगी।


पहले हुई थी विस्तार की कोशिश असफल

पहली बार शहरी क्षेत्र के विस्तार की कोशिश सफल हुई है। इसके पहले

जब वर्ष 1972 से 77 तक यमुना प्रसाद स्वर्णकार नगरपालिका के अध्यक्ष थे तो उन्होंने भखरुआं को शामिल करने की कोशिश की थी। लेकिन कुछ लोग पटना उच्च न्यायालय चले गए और एक रणनीति के तहत राष्ट्रीय इंटर स्कूल में बने नए मतदान केंद्र पर किसी ने मतदान नहीं किया। नतीजा तब भखरुआं नगर पालिका का हिस्सा नहीं बना। 


बैक्रहम मूर ऐसे बन गया भखरुआं मोड़

 

दैनिक जागरण में 5 फरवरी 2026 को प्रकाशित


दाउदनगर की हृदयस्थली का नाम है भखरुआं

नील की खेती और नील कोठियों से है रिश्ता

उपेंद्र कश्यप● दाउदनगर (औरंगाबाद) : आधी रात को स्थित गोलंबर के ध्वस्त होने के बाद भखरुआं की चर्चा खूब हो रही है। आमा आवाम से लेकर इंटरनेट मीडिया तक में। ऐसे में यह जानना बड़ा प्रासंगिक होगा कि इस स्थल का नाम भखरुआं क्यों पड़ा। दाउदनगर में कोई भी व्यक्ति भखरुआं मोड़ सुनकर चौंकता जरूर है। उसके मन में यह जिज्ञासा जरूर उठती है कि इस स्थान का नाम इस तरह का क्यों है। यह अटपटा शब्द लगता है। वर्ष 2007 में प्रकाशित स्मारिका उत्कर्ष में इस विषय में पर चर्चा की गई है। दाउदनगर में दो नील कोठियां है। एक बाजार में पटना मुख्य नहर के पास के समीप देवी मंदिर के नजदीक और दूसरा बुधन बिगहा के पास। बुधन बिगहा में जो नील कोठी है, उसी के मैनेजर हुआ करते थे बैक्रहम मूर। जब भारत गुलाम हुआ करता था तब नील की खेती करने और उपज से नील निकालने के लिए बने नील कोठियों का मैनेजर हुआ करते थे मूर। उन्हीं के नाम पर यह स्थल भखरुआं मोड़ कहा जाने लगा। यह शहर का हृदय स्थल है। 

शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय तरार के परिसर में स्थित मंदिर के समीप एक पीपल का पेड़ है। जिसके नीचे दब गया है उनका कब्र। कब्र की कुछ निशानियां बची हुई है। उनके निधन के बाद जब कब्र बनाए गए तो उसके बगल में ही पीपल का पौधा लगाया गया होगा। पीपल का पेड़ विशाल होता गया और कब्र विस्तारित होते पेड़ के दबाव में आकर ध्वस्त हो गया।



बुधन बिगहा से है अंग्रेज अधिकारी मूर का संबंध

बैक्रहम मूर के निवास पर एक नौकर था-बुधन यादव। बुधन बेलाढ़ी के निवासी थे। वह बड़े ही मालिक-सेवी थे। उनके सेवा भाव से प्रभावित हो वैक्रहम मूर जब इंगलैण्ड चले गये तो बुधन को भी साथ लेते गये और घुमाकर ले आये। जब उनकी मृत्यु हुई तो  नील कोठी के पास ही बुधन की पहल पर उनको दफनाया गया। यहां आज भी उस कब्र के अवशेष बचे हुए हैं।