Sunday, 2 August 2026

विपक्ष को सत्ता से दुर कर रहा सनातन का अपमान

 टेढ़ी पॉलिटिक्स : 




(वर्ष 2014 के बाद भारत का राजनीतिक परिदृश्य बहुत बदल गया है। अब हिंदू और सनातन को अपमानित करके खुद को बड़ा सेकुलर साबित करने का दिन चला गया। यह विपक्ष को समझना होगा। हिंदू और सनातन हित की बात करने वाले को सांप्रदायिक और दूसरे शर्म के अपराधियों के साथ खड़े रहने को धर्मनिरपेक्ष मनाने का दौर नहीं रहा। आम लोगों के पास सूचनाओं और संवादों का विश्लेषण करने का औजार (मोबाइल) उपलब्ध हो गया है। ऐसे में भारत का हर नागरिक राजनीतिक घटनाओं और बयानों को विश्लेषण करने लगा है। जातीय कारणों से कुछ लोग अत्यधिक मुखर होते हैं और वह कुछ भी सोशल मीडिया पर लिख बोल जाते हैं। लेकिन उनकी संख्या बहुत कम है। यह हमेशा याद रखिए। बड़ी संख्या ऐसी है जो सिर्फ वोटो से जवाब देती है। यही कारण है कि विपक्ष की राजनीतिक नौटंकियां उनको सत्ता से दूर रख रही है। अब नकली धर्मनिरपेक्षता चलने से रही। संसद परिसर में जो कुछ हुआ उस घटना के संदर्भ में एक विश्लेषण :- डॉ.उपेंद्र कश्यप 

मो.नं.- 9931852301







लोकसभा परिसर में शनिवार को एक बार फिर सनातन का अपमान करता हुआ सामूहिक रूप से विपक्ष दिखा। जंतर मंतर से उठे आंदोलन में सरकार ने सोनम वांगचुंग और कॉकरोच जनता पार्टी से सरकार के प्रतिनिधि ने लिखित समझौते किया। इसके बाद विपक्षी नेताओं के बीच इसका श्रेय लेने की होड़ दिखी। कांग्रेस और राहुल गांधी इसे पचा नहीं पा रहे थे। इसलिए अमित शाह को टारगेट करने लगे। शनिवार को तो हद ही हो गयी। पप्पू यादव पुजारी बनकर पहुंचे। दान पेटी को देवता बना दिया। खुद बैठ गए और सांसदों से प्रतीकात्मक तौर पर मार खाते रहे। जूते पहन कर राहुल गांधी, धर्मेंद्र यादव और तमाम संसद दान पेटी में दान डालते वीडियो-फोटो बनवाते रहे। राहुल गांधी ने दूसरे संसद से मुफ्त में पैसे लेकर दान पेटी में डाला। डिंपल यादव एवं अन्य दिखे। अखिलेश यादव शायद जानबूझकर कर बचते रहे। अयोध्या से सांसद अवधेश कुमार खड़े रहे। लोग दान देते, पप्पू यादव उनसे झपट कर पैसे ले लेते। इस पूरे नौटंकी में एक बात स्पष्ट दिखी कि इंडी गठबंधन वाले सनातन के अपमान का कोई अवसर नहीं छोड़ते। एक संदेश यह देने की कोशिश भी की गई कि पुजारी पीटे जाने के योग्य है। उन्हें पीटना चाहिए। यानी इंडी गठबंधन के नेता खुद तो नौटंकी कर ही रहे हैं, अपने समर्थकों और कार्यकर्ताओं को भी सनातन के प्रति नफरत का भाव रखने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। पुजारी को मारने पीटने तक की प्रेरणा दे रहे हैं। सनातन का अपमान करने के लिए जानबूझकर किसी ने जूते नहीं उतारे। यहां जो पूरी नौटंकी हुई वह किसी भी सूरते हाल में स्वीकार नहीं हो सकती।  हालांकि दूसरा पक्ष यह है कि कुछ समालोचकों का यह मानना है कि ऐसी नौटंकी ही सनातन की शक्ति है। हजारों वर्षों में तमाम प्रकार के आक्रांताओं ने भारत पर हमले किए लेकिन सनातन सुरक्षित रहा। ऐसी राजनीतिक नौटंकियों से सनातन को कोई खतरा नहीं है। बल्कि यही असली ताकत है। दूसरे किताबी या एकेश्वरवादी धर्म परंपरा से सनातन की तुलना करना सनातन को कमजोर बनाना है। जो लोग ऐसी गतिविधियों की आलोचना करते हैं वास्तव में वे सनातन को कमजोर कर रहे होते हैं। यह कहना मूर्खता पूर्ण बात है कि दूसरे धर्म को लेकर ऐसी नौटंकी कोई क्यों नहीं कर पाता। ऐसा करने से सर से जुदा हो जाने का खतरा होता है, इसलिए यह लोग ऐसा नहीं करते। ऐसा करने के पीछे सिर्फ और सिर्फ अपनी जाति और मुस्लिम समुदाय का वोट हासिल करना ही लक्ष्य होता है। ऐसे लोगों को जवाब देते हुए दूसरा दक्षिणपंथी समूह भी है, जिनके तर्क हैं कि ऐसी नौटंकियों को सनातन की शक्ति बताने वाले यह भूल जाते हैं कि गजवा ए हिंद भी अपना आधा लक्ष्य लगभग पूरा कर चुका है। सनातन का अपमान उसकी ताकत नहीं है। यह लोग भूल जाते हैं कि अफगानिस्तान कभी भारत का हिस्सा था। हिंदू बहुत क्षेत्र था। पाकिस्तान और बांग्लादेश का उदाहरण सामने है, जहां से हिंदू साफ हो गए। भारत में डेढ़ सौ लगभग ऐसे जिले बन गए हैं जहां हिंदू अल्पसंख्यक हैं और वे वहां से पलायन करते हैं।

खैर, लोकसभा परिसर में जो नौटंकी की गई, इसको लेकर दक्षिणपंथी समूह और गैर दक्षिणपंथी समूह जिसमें मध्य मार्ग और वामपंथी तक को शामिल आप कर सकते हैं, की सोच अलग-अलग हो सकती है। परस्पर एक दूसरे का विरोध करती हो, लेकिन क्या इस तरह की नौटंकी किया जाना आवश्यक था। क्या इस तरह की नौटंकी से बचा नहीं जा सकता था। ऐसी ही नौटंकियों के कारण विपक्ष इस देश में भाजपा की सरकार और नरेंद्र मोदी- अमित शाह की जोड़ी के खिलाफ राजनीतिक सफलता प्राप्त नहीं कर पा रहा है। और अपनी लगातार हार का ठीकरा इवीएम पर फोड़ते रहता है। 2014 से लगातार चुनाव को अगर देख लें तो विपक्ष का दायरा सिमटता चला जा रहा है। उनके राज्य की सत्ता भी जा रही है और लगभग लगातार विधायक और सांसदों की संख्या भी घटती जा रही है। (वर्ष 2024 के चुनाव परिणाम को अगर अपवाद माने तो) याद करिए 2014 का लोकसभा चुनाव। बुरी तरह हारने के बाद कांग्रेस ने समीक्षा के लिए एके एंटनी के नेतृत्व में एक समिति बनाई थी। उन्हीने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट कहा था कि कांग्रेस की इतनी बुरी हार सिर्फ एक कारण से हुई। वह यह कि- कोंग्रेस हिंदू विरोधी और मुस्लिम परस्त दिखने लगी है। इस आकलन को कांग्रेस ने एक सिरे से खारिज कर दिया। कांग्रेस हो या दूसरे तमाम विपक्षी राजनीतिक दल, उनकी राजनीति अपनी जाति और मुसलमान का वोट लेकर चुनाव जीतने तक सीमित रह गया है। इसीलिए इस तरह की हरकतें उनके तरफ से प्राय: होती हैं। ऐसे में जब दक्षिणपंथी समूह यह सवाल उठाते हैं कि हिंदुओं का, सनातन प्रतीकों का अपमान करना इनका शौक बन गया है, तो बड़ी आबादी को स्वीकार्य हो जाता है। जबकि जैसे ही वक्फ की संपत्ति की बात आती है, मस्जिदों और मदरसों में गड़बड़ी की बात आती है, मुस्लिम अपराधियों की बात आती हज तो उस पर उनके जुबान तक नहीं खुलती। मत भूलिए कि भारत सभी धर्म का सम्मान करने वाला देश है। लेकिन जब लगातार आप किसी एक धार्मिक समूह को टारगेट करते हैं, उसे अपमानित करते हैं, और दूसरे धर्म के साथ तब भी खड़े दिखते हैं जबकि उसे न्यायिक कार्रवाई कर सजा देने की स्थिति रहती है, उनकी बुराइयों पर आप नहीं बोल पाते, उनकी धांधलियों पर चुप हो जाते हैं तो यह साबित हो जाता है कि इस देश की राजनीति में कभी सेकुलर राजनीति नहीं हुई। आजादी के समय से हमेशा छद्म सेक्युलरिज्म हो राजनीति के केंद्र में रही है। इसके दर्जनों उदाहरण भरे पड़े हैं। धर्मनिरपेक्षता की परिभाषा यह बना दी गई कि जो हिंदुओं को, हिंदू धर्म को जितना अधिक अपमानित करेगा वह उतना अधिक सेकुलर होगा। लेकिन जैसे ही कोई हिंदू हित की बात करेगा, सनातन की बात करेगा तो वह सांप्रदायिक है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण इस देश ने देखा है। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सिखों का खुलेआम कत्लेआम किया गया। राजीव गांधी ने कहा कि-जब बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती है। इसे सेकुलर माना, बताया गया। लेकिन जब गुजरात में दंगे के बाद नरेंद्र मोदी ने कहा कि हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती है तो इसे सांप्रदायिक बयान बताया गया। 

दरअसल, अब राजनीतिक जागरूकता पूर्व की अपेक्षा अधिक बढ़ी है। लोगों के पास सूचनाएं आ रही हैं। सूचनाओं की पुष्टि का तरीका उनके पास उपलब्ध हो गया हैम संवादों के विश्लेषण का औजार मोबाइल के रूप में अब हर हाथ में उपलब्ध है। इसलिए जनता को बरगलाना अब आसान नहीं रहा। ऐसे में विपक्ष का जो ताजा नाटक हुआ, यह अधिक आत्मघाती साबित होगा। उत्तर प्रदेश में सफलता के लिए लोकसभा परिसर में जो नौटंकी की गई समालोचकों का एक बड़ा वर्ग यह मानता है कि इसका लाभ कम और नुकसान अधिक समाजवादी पार्टी और कांग्रेस को होगा। बहरहाल 2014 के बाद जो राजनीतिक स्थिति इस देश में बनी है, उसमें विपक्ष के ऐसे कदम उनको सत्ता से दूर ही करते रहेंगे, इसकी संभावना अधिक है। वनिस्पत इसके कि ऐसी गतिविधियां उनको सत्ता के करीब या सत्ता में बिठा देंगी।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और लेखक हैं)

चुनावी राजनीति को कई सन्देश दे रहा बांकीपुर का बांकपन

■ टेढ़ी पॉलिटिक्स ■



(जाति और दलों के भीतर की राजनीति समझने का अवसर)

डॉ.उपेंद्र कश्यप 

मो.नं.- 9931852301



आज बिहार के चुनावी राजनीति को कई संदेश प्राप्त होने वाले हैं। पटना के बांकीपुर विधान सभा उप चुनाव परिणाम आने के बाद संदेशों का आकलन होगा। लेकिन फिलहाल स्थिति यह है कि सबकी सांस अटकी हुई है। इसने कई संदेश दिए हैं। भाजपा की राजनीति को समझने का एक मौका भी है और बिहार में जो कास्ट पॉलिटिक्स (जाति की राजनीति) है उसको भी। मतदान व्यवहार के संदर्भ में आकलन किया जा सकता है। यहां भाजपा के नीरज कुमार सिंहा, जन सुराज के प्रशांत किशोर के बीच सीधा मुकाबला है। राजद की रेखा गुप्ता मुकाबले में शायद नहीं आ सकेंगी। भाजपा खेमे में अपने प्रत्याशी के जीत को लेकर आश्वस्ति है। किंतु यह भी चिंता है कि 2025 में नितिन नवीन यहां से 51936 वोट से जीते थे, यह मार्जिन क्या आधा से भी कम हो जाएगा। ऐसा है तो क्यों है। दूसरी तरफ जन सुराज के प्रशांत किशोर हैं। उनके पक्ष में सवर्ण का भी मतदान हुआ। विशेष कर भूमिहार समाज का। इसका भी अपना एक संदेश है। प्रशांत किशोर अगर चुनाव जीत भी नहीं सके तो एक बेहतर परिणाम वह देते हुए अवश्य दिख रहे हैं। तेजस्वी यादव तो पूरे चुनाव प्रदेश से ही गायब थे। बहुत अंत समय आये। 


बांकीपुर के बांकपन से कई संदेश मिलते हैं  यहां प्राय: मतदान का प्रतिशत कम रहा है और यह भी कहा जाता है कि सबसे पढ़ा लिखा वोटर बांकीपुर में है। फिर भी वर्ष 2025 की अपेक्षा सात प्रतिशत कम मतदान हुआ। जिससे यह एक बात तो साफ है कि पढ़ा लिखा तबका आज भी मतदान को लेकर बहुत उत्साहित नहीं होता। बांकीपुर के बारे में तो यह भी कहा जाता है कि कायस्थ जिनकी संख्या काफी है, वह मतदान करने भी नहीं निकलते। इस बार भी यह देखा गया कि इस समाज का अधिकतर वोट भले ही जाति पार्टी के कारण नीरज कुमार सिंहा के पाले में गया, लेकिन मतदान को लेकर उत्साह नहीं दिखा। घर मे बैठे रहे। इसका भी प्रभाव परिणाम पर पड़ेगा। खैर जब तक आप यह आलेख पढ रहे होंगे चुनाव परिणाम के रुझान स्पष्ट पता चल गए होंगे। बांकीपुर का बांकपन जाने के लिए हम यहां के मतदाताओं के मतदान व्यवहार का विश्लेषण करेंगे। जिसमें कई संदेश छुपे हुए हैं। भाजपा ने अपने कैंडिडेट यहां बदले। एक नकारात्मक संदेश गया। सबसे प्रमुख फैक्टर तो खुद सम्राट चौधरी रहे, जो बिहार के मुख्यमंत्री हैं। जिन परिस्थितियों में सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री बनाया गया उससे बिहार का सवर्ण तबका नाराज है। जिसमें भरत तिवारी एनकाउंटर का भी एक पक्ष है। छोटे-छोटे कई कारणों से सवर्ण समाज में सम्राट चौधरी को लेकर, कुछ हद तक भाजपा से भी, नाराजगी काफी है। भूमिहार समुदाय ने इसे प्रकट भी किया। सवर्ण समुदाय का वोट टूटा है। यह प्रशांत किशोर के पक्ष में गया है। खुद भाजपा के बड़े नेता मानते हैं कि उसका बड़ा हिस्सा टूटा है। वैश्य समाज जो भाजपा का कोर वोटर माना जाता है, उसका भी एक तबका राजद की रेखा गुप्ता (वैश्य होने के कारण) और साथ-साथ पीके के पक्ष में भी मतदान किया है। यानी स्वर्ण और वैश्य जो भाजपा के आधार वोटर हैं, उसमें टूट भाजपा के वैसे दिग्गज नेता भी मानते हैं, जो इस चुनावी कैंपेन में पूरी तरह शामिल थे। अब सवाल यह उठता है कि सवर्ण इतने नाराज क्यों थे। भाजपा के कुछ नेताओं का स्पष्ट मानना है कि सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने के कारण सवर्ण समुदाय में नाराजगी है। उनका मानना था कि किसी सवर्ण को मुख्यमंत्री मनाया जाना चाहिए था, जबकि पहली बार भाजपा की सरकार बन रही थी। लेकिन भाजपा के दिग्गज नेता का मानना है कि यह संभव ही नहीं था। कुछ सवर्ण नेताओं का नाम लेकर उन्होंने साफ-साफ कहा कि नीतीश कुमार के साथ रहने के लिए उनको गालियां दी गई। अब ऐसे में अगर किसी सवर्ण को मुख्यमंत्री बनाया जाता तो तेजस्वी यादव के हाथ में सत्ता का चेक काट कर सौंपने जैसा होता। कुछ जो सवर्ण नेता मंत्री न बनने के कारण नाराज हैं, उन्होंने इस आग को हवा भी दी। तो क्या इस आग को हवा देने का जो काम किया गया उसे भाजपा के अंदर खाने भी सपोर्ट मिल रहा था। इस मुद्दे पर भाजपा में दो विचार हैं। एक पक्ष का मानना यह है कि भाजपा भी चाहती थी कि जो नाराजगी है उसका प्रकटीकरण अगर हो जाता है तो नाराज समूह का गुस्सा ठंढा पड़ेगा, जो आगे चलकर भाजपा के पक्ष में जाएगा। ऐसा मानने वालों का तर्क है कि भाजपा यह मानकर चल रही है कि जीत सुनिश्चित है। भले ही जीत का अंतर कम हो। लेकिन एक दूसरा पक्ष भी है, जो यह मानता है कि अगर नाराजगी को भाजपा के नेताओं ने अंदर खाने से समर्थन दिया और कहीं यह भारी पड़ गया तो? प्रशांत किशोर जीत गए तो? बिहार ही नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश तक पीके का प्रभाव बढ़ेगा और उनके राजनीतिक गतिविधियों पर से भाजपा को नुकसान हो सकता है। ऐसे भाजपा नेताओं का मानना है कि सवर्ण समुदाय के लोगों को यह समझना होगा कि बिहार की जो वर्तमान राजनीतिक स्थिति है उसमें सवर्ण का सीएम बनना मुश्किल है। दूसरी बात यह थी कि नीतीश कुमार की जाति कुर्मी समाज ने कभी भी दूसरी जातियों को भला बुरा नहीं कहा। हालांकि उसने भी सत्ता का स्वाद कम नहीं चखा है। लेकिन सम्राट चौधरी के पक्ष में कुछ कुशवाहा नेताओं ने अनाप-शनाप बयानबाजी की। आक्रामकता दिखाई। जिससे भी दूसरे लोगों में नाराजगी पैदा हुई है। खुद बांकीपुर में स्मार्ट सिटी के लिए जमीन अधिग्रहण को लेकर उसकी बिक्री पर रोक लगा दी गई। इससे कुर्मी समाज बहुत हद तक प्रभावित हुआ। जिनके पास यहां जमीन अधिक हैं। ऐसे में कुर्मी समुदाय भी नाराज था और इसने भी पीके को कुछ हद तक साथ दिया। बाद में सरकार ने जमीन से ऐसे प्रतिबंध वापस ले लिया। यह सब इसलिए था कि सम्राट चौधरी को सबक सिखाया जाए। भाजपा में जो तानाशाही वाली प्रवृत्ति दिखने लगी है उसे ठंडा करने के लिए इस तरह के काम किए गए। भाजपा के अंदर खाने नेताओं का मानना है कि भाजपा नीरज कुमार सिन्हा की जगह अगर ऋतुराज सिंह को या डॉक्टर अजय आलोक को प्रत्याशी बनाती तो जीत हार का मार्जिन अधिक होता।

Friday, 31 July 2026

खेतों में अब सुनाई नहीं देते रोपनी के गीत

 


न बजते हैं अब बैलों और हलों के घुंघरू 

कभी किसानों को रोपनहार देती थीं गालियां

उपेंद्र कश्यप

नबिटा संवाददाता

दाउदनगर (औरंगाबाद)

कृषि कार्य अभी जोरों पर है। खेतों में रोपनी के कार्य चल रहे हैं। लेकिन कहीं चले जाइए, रोपणहारो के मुंह से अब गीत सुनाई नहीं देते। अपवाद स्वरूप कहीं-कहीं यदा-कदा कुछ पंक्तियां गुनगुनाती रोपणहार दिख जाए तो बात अलग है। लेकिन आमतौर पर अब खेतों में रोपनी करते वक्त गीत गाए जाते हुए सुनाई नहीं पड़ते हैं। दरअसल, खेतों में हल नहीं चलते। जब हल चलते थे तब बैलों और उसके पैरों में बंधे घुंघरू से मधुर आवाज निकलती थी। इससे रोपनहार को गीत गाने में आनंद आता था। अब हल बैल से बंधे घुंघरू की आवाज भी खेतों में सुनाई नहीं पड़ती। दूसरे रोपनहार भी अब विभिन्न प्रदेशों से मंगाए जाते हैं। जो स्थानीय गीत और संस्कृति से भी अनभिज्ञ होते हैं। कई बार दूसरे धर्म के भी श्रमिक होते हैं। अब किसानों को रोपनहार गाली भी नहीं देती। मखरा निवासी सुरेंद्र सिंह यादव बताते हैं कि दरअसल जब खेत पर किसान खड़ा रहते थे तो रोपनहार उन्हें गाली देती थी, ताकि वह भाग जाए। ऐसा इसलिए करती थी ताकि उन्हें कमर सीधा करने का मौका मिले। आम तौर पर ठेहुना से ऊपर उनका कपड़ा रहता है। शंका निवारण करना होता है। ऐसे में जब किसान खड़ा होगा तो दिक्कत होती थी। दूसरे कई रोपनहारों का किसानों से मजाक करने वाला रिश्ता होता था और इसलिए किसान का नाम लेकर कुछ गालियां देती थी, जो रिश्ते में भौजाई लगती थी। अब यह परंपरा भी खत्म हो गई है।


नई पीढ़ी के रोपनहार नहीं जानती गीत

 तरार पांच के मुखिया व किसान शशि भूषण सिंह कहते हैं कि पुराने (वृद्ध) रोपनहार यदा-कदा, कहीं-कहीं गीत गाती दिख जाती हैं। नई पीढ़ी गीतों को भूल चुकी है। वह गीत गाना भी नहीं जानते और ना इसमें कोई रुचि लेती हैं। हालांकि एक परंपरा अभी भी जीवित है कि रोपनहार किसान के घर आती हैं और घर की महिलाएं उन्हें सिंदूर और तेल देती हैं, श्रृंगार के लिए। ठीक वैसे ही जैसे रोपनी को भी किसान धरती का श्रृंगार मानते हैं।


वर्षा और बढ़िया उपज के लिए गाती थी गीत 

मखरा निवासी किसान सुरेंद्र सिंह यादव कहते हैं कि रोपनहार बेहतर वर्षा और उपज के लिए इंद्र भगवान को खुश करने के लिए गीत गाती थी। वे ईश्वर से प्रार्थना करती थी कि वर्षा पर्याप्त हो, फसल की उपज बेहतर हो, इससे किसान समृद्ध होगा तो उनको भी खेतों में काम करने का अवसर मिलेगा और इससे आर्थिक लाभ भी प्राप्त होगा।


#krishigyan #krishi #khetibadi #khet_khalihan #खेत_खलिहान #किसानी #कृषि_परंपरा #रोपनी_परंपरा #रोपनहार #रोपनी #रोपनी_गीत

Thursday, 30 July 2026

टेढ़ी पॉलिटिक्स : भाजपा- संघ के गुंडो को क्यों बचा रहा विपक्ष

 


टेढ़ी पॉलिटिक्स : भाजपा- संघ के गुंडो को क्यों बचा रहा विपक्ष

(मिले कई सबक, लोकतंत्र के लिए खतरनाक स्थिति)

डॉ.उपेंद्र कश्यप 

मो.नं.- 9931852301


जंतर मंतर पर हुए प्रदर्शन के दौरान जब उपद्रव हुए तो उपद्रवी तत्वों चाहे वे छात्र-छात्रा हों, या युवक युवती, कॉकरोच जनता पार्टी के अभिजीत दीपके, उसके प्रवक्ता सौरभ दास या विभिन्न विपक्षी दलों के नेता- प्रवक्ता सबने एक स्वर से कहा कि भाजपा और संघ ने योजनाबद्ध तरीके से अपने गुंडो को भीड़ में छात्र आंदोलन को बदनाम करने के लिए घुसा दिया है। यह गुंडे आरएसएस और भाजपा के हैं। अब सवाल उठ रहा है कि जब गुंडो के खिलाफ सरकार कार्रवाई करने जा रही है तो इनको बुरा क्यों लग रहा है। कांग्रेस के नेता कपिल सिब्बल ने बजाप्ता एक करोड रुपए फंडिंग की, वेबसाइट बनाया जा रहा है कि देश में कहीं भी छात्र आंदोलन में अगर कोई आंदोलनकारी पुलिस या न्यायिक मामले में उलझता है तो उसे मदद किया जाएगा। अब सवाल यह उठता है कि जब वह संघ और भाजपा के गुंडे थे तो उनको बचाने की चिंता यह विपक्ष क्यों कर रहा है? बात आगे बढ़ी तो सुप्रीम कोर्ट ने साफ-साफ कह दिया कि जिनके खिलाफ पहले से प्राथमिकी है, उनके खिलाफ कार्रवाई होगी। जो 18 साल की उम्र तक के युवा हैं, उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होगी। जिनके विरुद्ध पहली बार अगर कोई प्राथमिकी हुई है तो उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई फिलहाल नहीं होगी। हो सकता है आने वाले समय में किसी सेवानिवृत न्यायाधीश के नेतृत्व में जांच कमेटी गठित कर दे सुप्रीम कोर्ट। सब बातें अपनी जगह है। हम इस मुद्दे पर चर्चा कर रहे हैं कि जब आंदोलनकारियों के बीच भाजपा और संघ ने जैसा कि कॉकरोच जनता पार्टी का दावा है, अपने गुंडे भेजे थे, ताकि वह आंदोलन को बदनाम कर सकें तो ऐसे गुंडो को बचाने के लिए कॉकरोच जनता पार्टी या तमाम विपक्षी दल एकजुट क्यों हो गए? क्यों लोग पैसा चंदा करके न्यायिक मदद पहुंचाने की तैयारी कर रहे हैं? क्यों मांग हो रही है कि अगर सभी प्राथमिकियां वापस नहीं ली गई तो एक बार फिर से इसी तरह से जन आंदोलन खड़ा किया जाएगा। इस घटना से एक बात समझ में आ गई कि नेता किसी भी गिरगिट से अधिक रंग बदलता है और उसके कहे पर कतई विश्वास ना करिए। जब युवा सोनम वांगचुंग और कॉकरोच जनता पार्टी की अपील पर इकट्ठा हुए थे, तब उनको भी यह अनुमान नहीं रहा होगा कि वह बुरे फसेंगे। दरअसल, आप जब भीड़ का हिस्सा बनते हैं तो आपका दिमाग आपके नियंत्रण से बाहर उस शक्ति के पास चला जाता है जो पर्दे के पीछे रहकर भीड़ को मॉनिटर करता है। वह जैसे चाहेगा भीड़ में शामिल व्यक्ति उसी तरह की प्रतिक्रिया व्यक्त करने लगता है। शब्द और पंक्ति भले व्यक्ति की अपनी हो, लेकिन प्रेरणा, उत्तेजना, भाव छुपे हुए शख्स का होता है। छात्र-छात्राओं द्वारा की गई बदजुबानियों,  अश्लील हरकतों, अभद्र भाषा वाले पोस्टरों को लेकर संस्कारों की बात की जा रही है। कुछ देर के लिए अगर इसे हटा दें। मान लें कि युवाओं ने जोश में बहुत तरीके से अभद्रता दिखाई, अश्लीलता दिखाई, कुछ लोगों का दावा है कि भाई राजनीतिक आंदोलन में नारेबाजियां होते रहती हैं। उसमें अपशब्द इस्तेमाल होते रहते हैं। तमाम नेताओं के लिए अपशब्द कहे गए। चलिए इन मुद्दों को हम हटा देते हैं, और मान लेते हैं कि ऐसा करने वाले तमाम लोग छात्र थे, जो बहक गए। तात्कालिक गुस्से का शिकार हुए और उन्होंने अपनी कुछ बातें जैसे रखी, वह मर्यादा में भी नहीं थी। इन सबको माफ कर देना चाहिए। जो लोग गुंडई करने वालों के पक्ष में हैं, दरअसल वे कभी आंदोलन नहीं करते, वे राजनीतिक रोटी सेंकने के लिए, कुछ लिखते बोलते हैं। उनके बच्चे तो आंदोलन में जाएंगे नहीं, तो दूसरे के कंधे पर बंदूक रख दो। 



खैर, क्या किसी भी सूरत में हत्या के आरोपितों को, दुष्कर्म करने वालों को, जो पहले से आरोपित हैं, जिनकी संख्या दिल्ली पुलिस ने लगभग 2800 से अधिक बताई है, उनको क्यों छोड़ देना चाहिए? उनको जब आपने पहले ही भाजपा और संघ का गुंडा घोषित कर दिया तो उसके विरुद्ध होने वाली कार्रवाई की चिंता आपको (विपक्ष) क्यों हो रही है? यह इस बात का प्रमाण है कि आंदोलन करने वाले अपने गुंडे उसमें शामिल करते हैं, क्योंकि शरीफ चाहे छात्र-छात्रा हो, चाहे किसान हो, चाहे कोई भी आम राजनीतिक-सामाजिक कार्यकर्ता हो, वह आंदोलन का हिस्सा तो बनता है, बड़ी अपेक्षाओं के साथ, लेकिन वह गुंडई नहीं करता है। वह हमले नहीं करता। वह पुलिस के खिलाफ गुंडे की तरह आक्रामक शैली में व्यवहार नहीं करता। और जब तक ऐसा होगा नहीं आंदोलनकारियों की आत्मा तृप्त नहीं होती। इसलिए वही गुंडो को इसमें शामिल करते हैं। और गुंडे इसलिए शामिल होते हैं कि उनके पाप कुछ हद तक धूल जाएगा। उनको लाइमलाइट मिल जाएगा। कहीं अगर चमक गए तो अपने क्षेत्र का नेता भी बन सकते हैं। नेता बनने का तो एक रास्ता यह भी है कि नाम कमाया जाए, भले गुंडई करके ही क्यों नहीं कमाया जाए। तमाम गुंडो को हम देखते हैं जो शरीफजादा बन जाते हैं। सफेद वस्त्र धारण करके जनप्रतिनिधि बन जाते हैं। गुंडो को भी मौका मिल जाता है। दरअसल होता यह है कि आंदोलन करने वालों के बीच ऐसे लोग भी शामिल होते हैं जो आपराधिक प्रवृत्ति के होते हैं। कुछ को मुद्दों से नहीं राजनीति से मतलब होता है। किसी मामलों में यह हो सकता है कि असामाजिक तत्वों के साथ सीधा कनेक्शन आंदोलन बुलाने वालों से ना हो, लेकिन अगर वास्तव में ऐसा है तो फिर कोई देशद्रोही, कोई गुंडा, कोई हत्यारा, कोई मवाली, कोई रेपिस्ट जब आंदोलन में गुंडई करता है, आंदोलन को बदनाम करता है तो आंदोलन बुलाने वाले लोग, आंदोलन का नेतृत्व करने वाले लोग, उसे बचाने के लिए क्यों खड़े हो रहे हैं। इसका मतलब है कि दोनों के बीच रिश्ता है। जिसे छुपाने के लिए उस सबको संघ और भाजपा का गुंडा बताया जाता है। इस आंदोलन के बाद सत्ता चाहे जिसकी हो आंदोलनकारी को सत्ता में शामिल राजनीतिक दलों पर अब यह आरोप लगाना कठीन होगा कि गुंडई उनके भेजे गए गुंडे कर रहे हैं। लोगों को अब ऐसे आरोप पचेंगे नहीं। लोकतंत्र के लिए यह बेहतर भी है। इससे जनमानस यह तैयार होगा कि आंदोलन कोई करे, अगर उसमें गुंडई हो रही है तो सत्ता किसी की हो वह सख्त से सख्त कार्रवाई करे। दूसरी बात जिसके साथ गुंडई हुई, यानी मारपीट हुई, हमले हुए, वह व्यक्ति अगर व्यक्तिगत तौर पर प्राथमिकी करता है तो प्राथमिकी वापस लेने का वादा कोई सरकार कैसे कर सकती है? इसलिए इसका एक पक्ष यह भी है कि अब अगर कोई आंदोलन होता है और गुंडई होती है तो सरकार पीड़ित से ही प्राथमिकी करवा सकती है। ऐसा करने को प्रेरित या अपील कर सकती है। जब व्यक्तियों से प्राथमिकी करवाई जाने लगेगी तब कौन सा कोर्ट प्राथमिकियों को वापस करवा सकेगा? किसी भी आंदोलन का कई पक्ष होता है। इसलिए आने वाले समय में भारतीय लोकतंत्र के लिए यह आंदोलन कई सीख दे गया है। जिसमें एक महत्वपूर्ण सीख यह भी है।




#छात्र_आंदोलन #CJP #STUDENT_PROTEST #JANTAR_MANTAR #RSS #BJP #NARENDRAMODI #Indian_politics #political_news 

Tuesday, 28 July 2026

कटघरे में पत्रकारिता : पत्रकार नहीं संस्थान दोषी

 


#कटघरे_में_पत्रकारिता : पत्रकार नहीं संस्थान दोषी 

◆ ऊपर से नीचे तक पहुंचा भ्रष्टाचार ◆

● #संपादक से #संवाददाता तक लाचार ●

डॉ.उपेंद्र कश्यप 

कॉकरोच जनता पार्टी का जंतर मंतर पर हुआ आंदोलन बड़ी लकीर खींच गया। 15 मई 2026 को न्यायालय ने युवाओं के संदर्भ में कॉकरोच शब्द का इस्तेमाल किया। 16 को कॉकरोच जनता पार्टी बन गई और मात्र 70 दिन में 25 जुलाई 2026 को भारत सरकार के शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा दे देना पड़ा। इस पूरे आंदोलन में एक बात जो स्पष्ट दिखी वह यह कि माइक पर लोगो देखकर आंदोलनकारी प्रतिक्रिया दे रहे थे और उनका व्यवहार तय हो रहा था। मुख्यधारा की मीडिया के लिए वहां जूते की माला और गालियां थी, तो इन्फ्लुएंसर्स और युट्यूबर्स के लिए फूलों का हार। इस आंदोलन में जो कुछ हुआ उसे लेकर नैतिकता ता आदर्शवाद के संदर्भ में कई सवाल खड़े किए जा सकते हैं, लेकिन एक बात जो पूरी तरह स्पष्ट थी वह थी मुख्य धारा की मीडिया खास कर चैनल वालों को लेकर आक्रोश। कई पत्रकार पीटे गए। कई महिला पत्रकारों की हूटिंग हुई। अपशब्द कहे गए। गलियां दी गयी। सवाल है कि यह स्थिति बनी क्यों? ऐसा नहीं है कि मीडिया दलाल की भूमिका में आज है। दलाली हमेशा से होते रही है। आज जो बड़े-बड़े तथाकथित यूट्यूब वाले पत्रकार बन गए हैं, उनका भी एजेंडा है। मुख्य धारा के चैनलों से निकल गए या निकाल दिए गए और यूट्यूबर बन गए कई पत्रकारों ने दलाली करके ही यहां तक का मुकाम हासिल किया है। जिनकी आज आंदोलनकारी प्रशंसा कर रहे थे। अब यहां अगर देखे तो फर्क क्या है कि हमारा पत्रकार और तुम्हारा पत्रकार। दरअसल रवीश कुमार जैसे पत्रकारों और विपक्ष ने एक ऐसा माहौल निर्मित कर दिया है जिसमें हर थोड़ा भी प्रभावशाली व्यक्ति या संस्थान को अपने अनुकूल का पत्रकार चाहिए। अन्यथा गालियां दो। कई बार हमले भी। सच यही है कि पत्रकारिता किसी को पसंद नहीं है। पत्रकार किसी को नहीं सुहाता। सबको अपने-अपने अनुकूल का पत्रकार चाहिए। सत्ता ने हमेशा पत्रकारों को दबाकर रखने की कोशिश की है। मीडिया संस्थानों को हमेशा दबाया गया। लेकिन 2014 के बाद मुख्य धारा की मीडिया रेंगने लगी। इसमें कौन कितना ज्यादा रेंग सकता है इसकी होड़ आपस में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के बीच है। कुछ हद तक कुछ अखबार इससे बचे हैं। लेकिन उनकी विश्वसनीयता भी खत्म हो गई है। यहां इस आंदोलन के समय जो पत्रकारों के साथ हुआ उनका कोई दोष नहीं था। जिला मुख्यालय से लेकर दिल्ली तक में पत्रकार पीटे गए। उन पर हमले हुए। सवाल खुद से पूछें कि क्या पत्रकार जिम्मेदार हैं। शायद नहीं। क्योंकि वह वही करते हैं जो ऊपर से निर्देश आता है। ऊपर वाला वही करवाता है जो उसको ऊपर वाले का निर्देश प्राप्त होता है। यह खड़ी सीढ़ी है। यानी यहां ऊपर से नीचे की तरफ गिरावट आई है। यह और बात है कि बदनाम पत्रकार हैं। सच यह है कि झोली हो या बोरी, या बड़ी-बड़ी अटैचियां लेते संपादक हैं। अखबार का मालिक बिकता है। पत्रकार नहीं बिकता। हां कुछ अपवाद हो सकते हैं। दूध का धुला कोई पत्रकार भी नहीं है। क्योंकि गिरावट हर क्षेत्र में आई है। दरअसल हुआ यह है कि मीडिया घरानों ने सरकारों से समझौता कर लिया। आर्थिक युग में उन्हें दौलत चाहिए और दौलत के लिए बिकना पड़ता है। मीडिया सिर्फ व्यवसाय बनकर रह गया है। संपादक नाम की संस्था तो कब का चौपट हो चुकी थी। 2010 के दशक के बाद इसमें तेजी से गिरावट आई। संपादक पत्रकार की तरह ही एक इक्विपमेंट मात्र बन कर कर रहा है। उनकी लेखनी का कोई मतलब नहीं है। लिखना वही है जो छपेगा, जो दिखेगा। और छापने और दिखाने का अधिकार ना तो संपादक के पास है ना पत्रकार के पास है। मीडिया घरानों का जो विज्ञापन देखने वाला विभाग है, वह संपादकों पर हावी होता है। एक टाइपराइटर, पेज लगाने वाला, चिट्ठियां बटोरने वाला, रिसेप्शनिस्ट का पेमेंट एक पत्रकार से अधिक होता है। (कम से कम प्रखण्ड, अनुमण्डल, जिला, कमिश्नरी के स्तर पर) जबकि दोनों साथ काम करते हैं। पत्रकार अगर किसी संकट में घिर जाए, किसी कानूनी पचड़े में फंस जाए, कोई नेता अधिकारी उसे धमकी दे तो, सबसे पहले अगर कोई भगाता है तो वह संस्थान, जिसके लिए वह दिन रात खतरा मोल लेकर काम कर रहा होता है। एक पत्रकार का मोबाइल डीएम के गार्ड ने छीन लिया और उसे पत्रकार से संबद्ध अखबार में एक लाइन की खबर नहीं छपी। हालांकि दूसरे अखबार ने छापा। एक पत्रकार मर भी जाए तो संस्थान यह लिखने मानने के लिए भी तैयार नहीं कि वह उसका पत्रकार है। कोई लाइफ इंश्योरेंस नहीं। कोई सुरक्षा नहीं। कोई बॉडीगार्ड नहीं। पत्रकारों को इतना कमजोर बना दिया गया है कि सच तो छोड़िए तथ्य तक खुलकर नहीं लिखकर बता सकते हैं। विपक्ष कहता है गोदी मीडिया। मीडिया में गिरावट अब ज्यादा दिख रही है, क्योंकि सोशल मीडिया का वर्चस्व और दायरा बढ़ता जा रहा है। अन्यथा याद करिए। सांसद खरीद फरोख्त के मामले को लेकर देश के तथाकथित बड़े पत्रकार के पास सब प्रमाण सहित रिपोर्ट उनके रिपोर्टर ने भेजा था, और उन्होंने इसे इसलिए नहीं प्रसारित किया कि सत्ता से समझौता हो गया। बाद में उस पत्रकार ने पद्म पुरस्कार प्राप्त कर लिए, वह भी तुरंत। मनमोहन सिंह की सरकार बच गई। अगर वह रिपोर्ट जारी हो जाती तो मनमोहन की सरकार कब का चली जाती। तो आज का विपक्ष जो गोदी मीडिया चिल्लाता है उसने भी सत्ता में रहते हुए पत्रकारों को कम नहीं खरीदा है। हां यह और बात है कि अब पत्रकारिता का जो काम है एक जगह की बात को 100 -200, हजारों, लाखों लोगों व जगह पर पहुंचाना। वह मीडिया घराना की बपौती नहीं रह गई है। क्योंकि सोशल मीडिया का प्रभाव अब लगातार बढ़ता जा रहा है। और यह सीजीपी के आंदोलन में स्पष्ट दिखा। अगर इस आंदोलन से मीडिया के लिए कुछ सीख है तो वह यह है कि वह अपना कवरेज का तरीका सुधारे। सकारात्मकता के नाम पर दलाली और चमचई छोड़े। सत्ता और विपक्ष दोनों की कलई पत्रकार खोलें। सत्ता की गलतियों पर भी बचाव की मुद्रा में जब एंकर और एंकरनिया दिखेंगे तो संस्थान के पत्रकार पीटे जाएंगे। प्रदेशों की राजधानी और देश की राजधानी में घटित घटना का प्रिंट मीडिया जिस तरह से कवरेज करता है उसमें साफ-साफ भेदभाव की बू आती है।

मो.नं:- 9931852301


कॉकरोच जनता पार्टी का जंतर मंतर पर हुआ आंदोलन बड़ी लकीर खींच गया। 15 मई 2026 को न्यायालय ने युवाओं के संदर्भ में कॉकरोच शब्द का इस्तेमाल किया। 16 को कॉकरोच जनता पार्टी बन गई और मात्र 70 दिन में 25 जुलाई 2026 को भारत सरकार के शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा दे देना पड़ा। इस पूरे आंदोलन में एक बात जो स्पष्ट दिखी वह यह कि माइक पर लोगो देखकर आंदोलनकारी प्रतिक्रिया दे रहे थे और उनका व्यवहार तय हो रहा था। मुख्यधारा की मीडिया के लिए वहां जूते की माला और गालियां थी, तो इन्फ्लुएंसर्स और युट्यूबर्स के लिए फूलों का हार। इस आंदोलन में जो कुछ हुआ उसे लेकर नैतिकता ता आदर्शवाद के संदर्भ में कई सवाल खड़े किए जा सकते हैं, लेकिन एक बात जो पूरी तरह स्पष्ट थी वह थी मुख्य धारा की मीडिया खास कर चैनल वालों को लेकर आक्रोश। कई पत्रकार पीटे गए। कई महिला पत्रकारों की हूटिंग हुई। अपशब्द कहे गए। गलियां दी गयी। सवाल है कि यह स्थिति बनी क्यों? ऐसा नहीं है कि मीडिया दलाल की भूमिका में आज है। दलाली हमेशा से होते रही है। आज जो बड़े-बड़े तथाकथित यूट्यूब वाले पत्रकार बन गए हैं, उनका भी एजेंडा है। मुख्य धारा के चैनलों से निकल गए या निकाल दिए गए और यूट्यूबर बन गए कई पत्रकारों ने दलाली करके ही यहां तक का मुकाम हासिल किया है। जिनकी आज आंदोलनकारी प्रशंसा कर रहे थे। अब यहां अगर देखे तो फर्क क्या है कि हमारा पत्रकार और तुम्हारा पत्रकार। दरअसल रवीश कुमार जैसे पत्रकारों और विपक्ष ने एक ऐसा माहौल निर्मित कर दिया है जिसमें हर थोड़ा भी प्रभावशाली व्यक्ति या संस्थान को अपने अनुकूल का पत्रकार चाहिए। अन्यथा गालियां दो। कई बार हमले भी। सच यही है कि पत्रकारिता किसी को पसंद नहीं है। पत्रकार किसी को नहीं सुहाता। सबको अपने-अपने अनुकूल का पत्रकार चाहिए। सत्ता ने हमेशा पत्रकारों को दबाकर रखने की कोशिश की है। मीडिया संस्थानों को हमेशा दबाया गया। लेकिन 2014 के बाद मुख्य धारा की मीडिया रेंगने लगी। इसमें कौन कितना ज्यादा रेंग सकता है इसकी होड़ आपस में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के बीच है। कुछ हद तक कुछ अखबार इससे बचे हैं। लेकिन उनकी विश्वसनीयता भी खत्म हो गई है। यहां इस आंदोलन के समय जो पत्रकारों के साथ हुआ उनका कोई दोष नहीं था। जिला मुख्यालय से लेकर दिल्ली तक में पत्रकार पीटे गए। उन पर हमले हुए। सवाल खुद से पूछें कि क्या पत्रकार जिम्मेदार हैं। शायद नहीं। क्योंकि वह वही करते हैं जो ऊपर से निर्देश आता है। ऊपर वाला वही करवाता है जो उसको ऊपर वाले का निर्देश प्राप्त होता है। यह खड़ी सीढ़ी है। यानी यहां ऊपर से नीचे की तरफ गिरावट आई है। यह और बात है कि बदनाम पत्रकार हैं। सच यह है कि झोली हो या बोरी, या बड़ी-बड़ी अटैचियां लेते संपादक हैं। अखबार का मालिक बिकता है। पत्रकार नहीं बिकता। हां कुछ अपवाद हो सकते हैं। दूध का धुला कोई पत्रकार भी नहीं है। क्योंकि गिरावट हर क्षेत्र में आई है। दरअसल हुआ यह है कि मीडिया घरानों ने सरकारों से समझौता कर लिया। आर्थिक युग में उन्हें दौलत चाहिए और दौलत के लिए बिकना पड़ता है। मीडिया सिर्फ व्यवसाय बनकर रह गया है। संपादक नाम की संस्था तो कब का चौपट हो चुकी थी। 2010 के दशक के बाद इसमें तेजी से गिरावट आई। संपादक पत्रकार की तरह ही एक इक्विपमेंट मात्र बन कर कर रहा है। उनकी लेखनी का कोई मतलब नहीं है। लिखना वही है जो छपेगा, जो दिखेगा। और छापने और दिखाने का अधिकार ना तो संपादक के पास है ना पत्रकार के पास है। मीडिया घरानों का जो विज्ञापन देखने वाला विभाग है, वह संपादकों पर हावी होता है। एक टाइपराइटर, पेज लगाने वाला, चिट्ठियां बटोरने वाला, रिसेप्शनिस्ट का पेमेंट एक पत्रकार से अधिक होता है। (कम से कम प्रखण्ड, अनुमण्डल, जिला, कमिश्नरी के स्तर पर) जबकि दोनों साथ काम करते हैं। पत्रकार अगर किसी संकट में घिर जाए, किसी कानूनी पचड़े में फंस जाए, कोई नेता अधिकारी उसे धमकी दे तो, सबसे पहले अगर कोई भगाता है तो वह संस्थान, जिसके लिए वह दिन रात खतरा मोल लेकर काम कर रहा होता है। एक पत्रकार का मोबाइल डीएम के गार्ड ने छीन लिया और उसे पत्रकार से संबद्ध अखबार में एक लाइन की खबर नहीं छपी। हालांकि दूसरे अखबार ने छापा। एक पत्रकार मर भी जाए तो संस्थान यह लिखने मानने के लिए भी तैयार नहीं कि वह उसका पत्रकार है। कोई लाइफ इंश्योरेंस नहीं। कोई सुरक्षा नहीं। कोई बॉडीगार्ड नहीं। पत्रकारों को इतना कमजोर बना दिया गया है कि सच तो छोड़िए तथ्य तक खुलकर नहीं लिखकर बता सकते हैं। विपक्ष कहता है गोदी मीडिया। मीडिया में गिरावट अब ज्यादा दिख रही है, क्योंकि सोशल मीडिया का वर्चस्व और दायरा बढ़ता जा रहा है। अन्यथा याद करिए। सांसद खरीद फरोख्त के मामले को लेकर देश के तथाकथित बड़े पत्रकार के पास सब प्रमाण सहित रिपोर्ट उनके रिपोर्टर ने भेजा था, और उन्होंने इसे इसलिए नहीं प्रसारित किया कि सत्ता से समझौता हो गया। बाद में उस पत्रकार ने पद्म पुरस्कार प्राप्त कर लिए, वह भी तुरंत। मनमोहन सिंह की सरकार बच गई। अगर वह रिपोर्ट जारी हो जाती तो मनमोहन की सरकार कब का चली जाती। तो आज का विपक्ष जो गोदी मीडिया चिल्लाता है उसने भी सत्ता में रहते हुए पत्रकारों को कम नहीं खरीदा है। हां यह और बात है कि अब पत्रकारिता का जो काम है एक जगह की बात को 100 -200, हजारों, लाखों लोगों व जगह पर पहुंचाना। वह मीडिया घराना की बपौती नहीं रह गई है। क्योंकि सोशल मीडिया का प्रभाव अब लगातार बढ़ता जा रहा है। और यह सीजीपी के आंदोलन में स्पष्ट दिखा। अगर इस आंदोलन से मीडिया के लिए कुछ सीख है तो वह यह है कि वह अपना कवरेज का तरीका सुधारे। सकारात्मकता के नाम पर दलाली और चमचई छोड़े। सत्ता और विपक्ष दोनों की कलई पत्रकार खोलें। सत्ता की गलतियों पर भी बचाव की मुद्रा में जब एंकर और एंकरनिया दिखेंगे तो संस्थान के पत्रकार पीटे जाएंगे। प्रदेशों की राजधानी और देश की राजधानी में घटित घटना का प्रिंट मीडिया जिस तरह से कवरेज करता है उसमें साफ-साफ भेदभाव की बू आती है।

 



और हां अंत में एक बात और..

 जाति से मुक्त नहीं है पत्रकारिता। पत्रकारिता में जातिवाद गहरी पैठ बना चुकी है। और जाति वर्ग देखकर न्यूज़ कवरेज की प्रवृत्ति काफी सघन हुई है। अगर यह दरकेगा नहीं तो फिर जो जंतर मंतर पर पत्रकारों के साथ हुआ, जो देश भर में हुआ उसका दायरा बढ़ता चला जाएगा। इसलिए इस कॉकरोच आंदोलन ने साफ-साफ संदेश दे दिया है- मीडिया घरानों सुधरो, अन्यथा तुम्हारे पत्रकार फील्ड में जाने लायक नहीं रहेंगे। अब होना यह चाहिए कि प्राइम टाइम में एक घण्टे का शो प्रतिदिन “जनता के मुद्दे” पर चर्चा करे। उसमें किसी दल के भों-भों करने वाले नेता को नहीं, सिर्फ विषय विशेषज्ञों को और उनके साथ दो-तीन विभिन्न विश्वविद्यालयों में अध्ययनरत स्टूडेंट को शामिल करें, जो अनिवार्य तौर पर किसी भी राजनीतिक दल से जुड़े न हों। अन्यथा- आने वाले दिनों में दुर्दशा और बढ़ती जाएगी। दूसरी बात- गोदी मीडिया का राग अलापने वालों के लिए कि वे भी निष्पक्ष नहीं हैं। उनको भी अपने अनुकूल मीडिया पसंद है। ऐसे में आप कितनी बेहतरी की उम्मीद कर सकते हैं भला।


#पत्रकारिता #जर्नलिस्ट #jurnlist #CJP #JANTARMANTAR

Sunday, 26 July 2026

CJP का छात्र आंदोलन : जो हुआ अच्छे के लिए हुआ




जो हुआ अच्छे के लिए हुआ, किन्तु…

(सत्ता का अहंकार टूटा, अब आंदोलन की उपज पर नजर)

डॉ.उपेंद्र कश्यप 

मो.नं.- 9931852301



गीता सार में कहा गया है- "जो हुआ वह अच्छा हुआ, जो हो रहा है अच्छा हो रहा है, जो होगा वह भी अच्छा ही होगा"

कॉकरोच जनता पार्टी और इस छात्र आंदोलन को बहुत-बहुत साधुवाद। भारतीय लोकतंत्र में यह घटना हमेशा याद रखी जाएगी। जेपी का आंदोलन हो या अन्ना का आंदोलन हो, दोनों से निकले नेताओं ने बेहतर आदर्श स्थापित नहीं किया है। इसलिए यह देश आंदोलन को लेकर लगभग शिथिल था या निराश था। नई पीढ़ी ने एक बार फिर लोकतंत्र को लेकर उम्मीदें आसमान पर पहुंचा दिए हैं। यानी उद्देश्य अगर बढ़िया है, रास्ते बेहतर हैं, तो सत्ता का अहंकार चाहे जिस ऊंचाई पर हो वह टूटेगा, ढहेगा। यही प्राकृतिक व्यवस्था प्रमाणित हो गयी है। इसलिए जो हुआ वह बेहतर हुआ। यह बात अब नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी को समझ आ गयी होगी। कुछ लोग एक्सपोज भी हुए हैं। खासकर राजनीतिक दल। इस आंदोलन में शामिल छात्र-छात्राओं का एक छोटा हिस्सा ही सही, उसने अपने चारित्रिक दोषों को खुलकर व्यक्त किया। जिससे भारतीय सभ्यता और संस्कृति को भी आघात लगा है। लेकिन कुल मिलाकर बात यही है कि आंदोलन के बाद लोकतंत्र की मजबूती का संकेत स्पष्ट मिला है।

लेकिन, कब पीछे लौटते हैं। जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व में हुआ संपूर्ण क्रांति हो या अन्ना आंदोलन, क्या इन दो बड़े आंदोलनों से कुछ बदला। जेपी के चेलों ने राजनीति में ना यो कोई  सुचिता का काम किया,  ना ही कोई आदर्श स्थापित किया, न सिस्टम के घुन को खत्म कर सके। कथित समाजवाद का झंडा बुलंद किया, बल्कि प्रायः सभी चेले अपवाद छोड़कर भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे दिखे। परिवारवाद को बढ़ावा दिया। सामाजिक न्याय के मुद्दे पर आगे तो बढ़े लेकिन यह अंततः परिवारवाद और जातिवाद तक सिमट कर रह गया। जातिवाद की धार को और तीखा किया। इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी लगाया, जनता ने उनका क्या बिगाड़ लिया। दो ढाई साल में पुनः उन्हीं को भारत की सत्ता सौंप दी। मुलायम सिंह यादव ने कार सेवकों पर गोली चलाई। खुलकर मुस्लिम परस्ती की और मुल्ला मुलायम की उपाधि हासिल कर ली। क्या बिगड़ गया। वह भी मुख्यमंत्री रहे और उनके बेटे अखिलेश यादव भी मुख्यमंत्री बने। परिवारवाद की ऐसी थ्योरी कि परिवार के ही हिस्सों को दूर भगा दिया गया, जिनको उत्तराधिकारी माना जा रहा था। बिहार में देख लीजिए। लालू प्रसाद यादव की राजनीति को, क्या उन्होंने बिहार की व्यवस्था बदली? कैसा आदर्श मानक स्थापित किया, यह कहने की जरूरत नहीं है। देश में भी व्यवस्था तो कम से कम नहीं ही बदली। अन्ना आंदोलन के बाद जो जो काम नहीं करने की गारंटी अरविंद केजरीवाल ने दी, वही वही काम नीचता की हद तक जाकर किया। देश ने पहली बर देखा कि जेल से भी मुख्यमंत्री बनकर सत्ता चलाया जा सकता है। इन दो आंदोलनों ने जो नेता दिए हैं, उन्होंने ना तो आदर्श स्थापित किया, ना कुछ बदल सके। अभी सीजेपी का जो आंदोलन हुआ, उससे क्या कुछ बदल जाएगा? सीजेपी के प्रमुख अभिजीत दीपके की मां अनीता दीपके व पिता भगवान दीपके की इच्छा है कि अभिजीत भविष्य में राजनीति में जाने की जगह निस्वार्थ भाव से समाज सेवा ही जारी रखें। हालांकि राजनीति में जाना है या नहीं, यह फैसला दीपके का अपना रहेगा। यह मां-पिता ने कहा है। यानी आंदोलन खत्म करते ही राजनीति में जाने की चर्चा भी शुरू हो गई। इस देश ने देखा है कि आंदोलन करना और राजनीति करने में आसमान जमीन का अंतर है। अभिजीत दीपके और उनकी टीम के सदस्य भविष्य में राजनीति के क्षेत्र में आते हैं तो वे कैसा आदर्श, मानक स्थापित कर सकेंगे? लोगों को नजर इस पर भी रखनी चाहिए।


#नीट_यूजी_पेपर_लीक  #शिक्षा_मंत्री #धर्मेंद्र_प्रधान #StudentProtest #Aisa #NarendraModi #cjp #Jantar_Mantar #EducationSystem #RYA #DharmendraPradhan #abhijeetdipake #abhijit_deepake


लेखक का परिचय

डॉ. उपेंद्र कश्यप. Mo.No.- 993185231

लेखक- आंचलिक पत्रकारिता की दुनिया, प्रकाशक- द मार्जिनलाइज्ड।

जिसकी भूमिका प्रमोद रंजन ने लिखी है।

इसके अलावा-

गृह शहर, बिहार के दाउदनगर का इतिहास लेखन। पुस्तक- श्रमण संस्कृति का वाहक- दाउदनगर।

■ 1994 से पत्रकारिता। देश और प्रदेश से प्रकाशित विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन के साथ लगातार दैनिक जागरण का अनुमंडल संवाददाता रहा।

● संस्कृति, राजनीति और नक्सल पर विशेष लेखन



Friday, 24 July 2026

कबरिया और पहिरोपना संबंधित कई परंपराएं विलुप्त



रोपनहार को खोंईचा और लुकमा देने की परंपरा खत्म 

मांग भरने के साथ तेल देना भी अब बंद

बढ़िया उपज को धरती मां से करती थी प्रार्थना 

डॉ. उपेंद्र कश्यप 

नबिटा संवाददाता 

दाउदनगर (औरंगाबाद) । भारत कृषि प्रधान देश है। बिहार में तो आजीविका का मुख्य साधन ही कृषि है। यह मौसम कृषि कार्य का है। खेतों में बिहन कबारने और उसे रोपने का काम बड़े पैमाने पर चल रहा है। ऐसे में यह स्पष्ट दिख रहा है कि कबरिया और पहिरोपण से संबंधित कई परंपराएं अब विलुप्त हो गई हैं। मखरा निवासी भाजपा नेता किसान सुरेंद्र यादव बताते हैं कि बिहन कबारते समय कबरिया जयकारा करते थे। वह खत्म हो गया। पुरानी पीढ़ी के लोग रोपने के लिए खेत में जाने से पहले किसान के घर जाती थी और किसान की पत्नी सभी रोपणहार की मांग सिंदूर से भरती थी। खोइन्छा मिलता था। इसमें चावल गुड़ होता था। रोपणहार उसे लेकर खेत में जाते थे। खेत में धरती मां के नाम से छिड़काव करते थे और ईश्वर से प्रार्थना करते थे कि किसान समृद्ध हो। उसकी फसल की उपज बढ़िया हो, ताकि हमारा यानी श्रमिकों का भी पेट भर सके। शाम में फिर रोपनहार किसान के घर जाते थे और उन्हें किसानों के द्वारा लुकमा दिया जाता था। लुकमा में फुला हुआ चना, मटर और चावल का बना हुआ कसर खाने के लिए दिया जाता था। रोपणहार उसे घर ले जाते थे। जिससे उन्हें खुशी मिलती थी। यह परंपरा अब पूरी तरह खत्म हो गई।




उठारो या बनउखाड़ से जुड़ी भी परंपरा समाप्त 

कृषि कार्य में उठारो या बनउखाड़ भी एक महत्वपूर्ण पक्ष है। मतलब किसी भी किसान के तमाम बिहन को उखाड़ने का काम जिस दिन संपन्न होता है, उस दिन उसको उठारो या बनउखाड़ कहते हैं। इस दिन सभी बिहन को उखाड़ कर रोपणहार को दे दिया जाता है। बिहन का गुच्छा बनाया जाता है। जिसे माथे पर रखकर बनिहारिन किसान के घर जाती हैं और किसान उन्हें बन देता है। यानी दक्षिणा देता है। जिसमें चावल, कपड़ा और पैसा होता है। इसे गवछी कहा जाता है। उठारो के बदले यानी बिहन उखाड़ने का काम संपन्न होने के बदले किसान देते हैं। किसान अपने घर के देवता पर भी इसे चढ़ाते हैं।




#krishi #कृषि_परंपरा #खेती_किसानी_परंपरा #धानरोपनी #पहिरोपना #कबरिया 

#farming_traditions

#agriculture #agriculture_tradition

#upendrakashyap

#उपेंद्र_कश्यप_रिपोर्ट