टेढ़ी पॉलिटिक्स
डॉ. उपेंद्र कश्यप
◆ आंकड़ों व तथ्यों के साथ मुद्दे को समझिये ◆
(■ #15अगस्त को लाल किले के प्राचीर से संबोधित करते हुए #प्रधानमंत्री #नरेंद्रमोदी ने दिमागी नक्सलियों की पहचान कर उन्हें अलग-थलग करने का आह्वान किया। इसके बाद देश में एक तरह का वैचारिक तूफान खड़ा हो गया। सबसे पहले भारत सरकार के #गृहमंत्री रहे कांग्रेस के दिग्गज नेता पी.चिंदबरम ने कहा कि - “मैं दिमागी नक्सली होने पर गर्व महसूस करता हूं।’ सवाल है कि क्या वास्तव में वह दिमागी नक्सली के झंडा बरदार नहीं हैं? इसी मुद्दे का विश्लेषण कर रहे हैं वरिष्ठ लेखक व पत्रकार डॉ. उपेंद्र कश्यप।■)
#अर्बन_नक्सल के बाद अब दिमागी नक्सली शब्द चर्चा में है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहली बार इस शब्द का इस्तेमाल स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर लाल किला में ध्वजारोहण करने के बाद संबोधन करते हुए किया। उनके द्वारा इस शब्द का इस्तेमाल किए जाने के बाद देश में वैचारिक बहस तेज हो गई। अर्बन नक्सल शब्द से चीढ़ने वाले नेता खासकर इस मुद्दे को लेकर काफी आगे बढ़े। इसमें झंडाबरदार की भूमिका में अगर कहें तो पी.चिंदबरम नजर आए। वे देश के गृह मंत्री रहे हैं और उन्होंने स्वयं यह घोषित किया कि- दिमागी नक्सली होने का उन्हें गर्व है। क्या वास्तव में वह सच नहीं कह रहे? इसे समझने की जरूरत है कि इतनी धृष्टता नेता लाते कहां से और कैसे हैं?
25 मई 1967 को #पश्चिम_बंगाल के #दार्जिलिंग जिला में स्थित #नक्सलबाड़ी से भारत में नक्सली आंदोलन का आरंभ माना जाता है। भारत सरकार के गृह मंत्री अमित शाह की माने तो 31 मार्च 2026 को नक्सली खत्म हो गए। यानी लगभग 58 साल या कहें तो कुल जमा 694 महीने तक इस देश में नक्सली उत्पात मचाते रहे, विकास कार्यों को ध्वस्त करते रहे, लेवी वसूलते रहे, देश के पुलिस जवानों को शहीद करते रहे, आम लोगों का जीना दूभर हो गया। बंगाल, झारखंड, बिहार, उत्तर प्रदेश, उड़ीसा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश को लाल गलियारा बनाने का अहंकार भरते रहे। नक्सल प्रभावित जिलों में लोग नौकरी करने से बचते थे। किसी का ट्रांसफर हो जाता था तो इसे काला पानी की तरह का सजा मानते थे। लेकिन नक्सली समस्या खत्म करने के लिए लंबा इंतजार करना पड़ा। कोशिशें उसी समय से होती रही हैं, लेकिन उसमें नियत कहीं ना कहीं संदिग्ध थी। और इसीलिए पी.चिंदबरम को इस बात का गर्व है कि वह दिमागी नक्सली हैं। क्योंकि अगर वह दिमागी नक्सली नहीं होते तो नक्सली समस्या खत्म कर चुके होते। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। दूसरी तरफ 30 में 2019 को गृह मंत्री बनते ही अमित शाह ने इस पर काम करना शुरू किया और लगभग सात साल में इस समस्या को खत्म कर दिया। यानी देश में 50 साल नक्सली उत्पात करते रहे और अपने मन की करते रहे तो इसके पीछे पी.चिंदबरम और कांग्रेस जैसे दिमागी नक्सलियों के संरक्षण, प्रोत्साहन, नैतिक समर्थन एक बड़ा कारण था। इसलिये देश के बड़े हिस्से में नक्सली आतंक के साए में लोग जीने के लिए मजबूर थे। इसलिए, इतना बड़ा सच स्वयं स्वीकारने के लिए वास्तव में पी.चिंदबरम को धन्यवाद दिया जाना चाहिए।
आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संबोधन के बाद बिलबिलाए हुए अर्बन नक्सली या दिमागी नक्सली जो सामने आकर बहुत गर्व महसूस से कह रहे हैं तो उन्हें यह भी जानना चाहिए कि बिना उनके संरक्षण और प्रोत्साहन के इस देश में नक्सली समस्या आधी सदी तक नहीं चल पाती। तथ्यों पर गौर करिए। 25 मई 1967 को नक्सलबाड़ी आंदोलन इस देश में आरंभ होता है और 31 मार्च 2026 को सरकार के दावे के मुताबिक खत्म होता है। यानी लगभग 694 माह। इस दौरान कुल 12150 हत्याएं होती हैं। जिसमें 5019 नागरिक मारे जाते हैं। सुरक्षा बालों के कुल 1913 जवान शहीद होते हैं। कुल 5218 नक्सली मारे जाते हैं। अब इसको पी चिदंबरम के कार्यकाल से तुलना करिए। 30 नवंबर 2008 से 31 जुलाई 2012 तक यानी लगभग 44 महीने देश के गृहमंत्री रहते हैं पी.चिदंबरम। उनके कार्यकाल में कुल मौतें 3112 होती हैं। जिसमें 1413 नागरिक मारे जाते हैं। सुरक्षा बलों के 819 जवान शहीद होते हैं और 880 नक्सली मारे जाते हैं। मतलब 694 माह में 17.5 मौतें प्रति माह हुई, जबकि सिर्फ पी चिदंबरम के 44 महीने के कार्यकाल में प्रत्येक महीने 71 मौतें हुई। चार गुना से अधिक। कुल 57 साल में हुई कुल मौतों का 25.61 प्रतिशत मौतें सिर्फ पी.चिदंबरम के कार्यकाल में हुई है। इन आंकड़ों के आधार पर देखें तो सबसे कड़वा सच पी.चिंदबरम ने स्वीकार किया है कि दिमागी नक्सली होने का उनको गर्व है। उनको दिमागी नक्सली खुद को बताने का गर्व तो वाकई होना ही चाहिए। इसके लिए ऐसे महान नेता को सलामी दी जानी चाहिए, आलोचना नहीं।
अब देश की जनता को यह तय करना है कि क्या ऐसे दिमागी नक्सलियों के बिना नक्सली इतने सशक्त तौर पर समानांतर सत्ता कायम करने की स्थिति में होते। जब अमित शाह सात साल में किसी समस्या को खत्म कर सकते हैं तो 50 साल में दूसरी सरकारों (अटल बिहारी वाजपेयी भी शामिल) के गृह मंत्रियों ने इस समस्या का समाधान क्यों नहीं किया? स्वाभाविक है कि वह कहीं ना कहीं नक्सलियों के प्रति सहानुभूति रखते थे, या इसे स्थायी समस्या मां चुके थे, या इसे खत्म करने में रुचि नहीं थी, या दृढ़ निश्चयी नहीं हो पा रहे थे। नक्सली समस्या कांग्रेसियों व वामपंथियों की देन थी। उन्हीं की नीतियों और शोषण के खिलाफ नक्सली आंदोलन शुरू हुआ था। इसलिए कम से कम नक्सली के मुद्दे पर तो वर्तमान सरकार को घेरने का नैतिक बल कांग्रेस और वामपंथियों के पास तो कतई नहीं होना चाहिए। ऐसा बल वे प्रदर्शित कर रहे हैं तो यह देश के लिए घातक ही नहीं है बल्कि देश को नुकसान पहुंचाने लायक भी है। निरंकुश साहस कांग्रेसियों और वामपंथियों या कह लीजिए की गैर भाजपाई दलों में आ रहा है, और आगे भी इस दुस्साहस के बने रहने की संभावना दिख रही है, तो तय जनता को करना है कि वे ऐसे दलों और नेताओं के प्रति कैसा व्यवहार रखना चाहते हैं। लोकतंत्र में अंततः जनता (मतदाता) ही मालिक है और वही तय करती है कि किस दल या नेता को कितनी ताकत देनी है। किस हैसियत में रखनी है।
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