■ अभियुक्तों की रिहाई का कारण केवल “साक्ष्य का अभाव”, “अपर्याप्त साक्ष्य”, “संदेह”, “गवाह मुकर गए”, या “विरोधाभास” लिखकर रिपोर्ट भेज देना स्वीकार्य नहीं। राज्य स्तरीय समिति की समीक्षा में जो बात सामने आई है, उसे अगर लागू किया जाता है तो बिहार में पुलिस सुधार का दशकों से चला आ रहा विमर्श एक आकर ले सकेगा। अन्यथा सुधार की संभावना एक बार फिर गतलखाते में चली जाएगी।■
डॉ.उपेंद्र कश्यप
अपराध की जांच और अभियोजन की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए गठित राज्य स्तरीय समिति की अपराध अनुसंधान विभाग के डीआईजी जयंत कांत की अध्यक्षता में हुई बैठक में जनवरी से अप्रैल 2026 तक विभिन्न जिलों से प्राप्त प्रतिवेदनों की समीक्षा की गई। इसमें यह पाया गया कि जिले अभियुक्तों की रिहाई का कारण केवल “साक्ष्य का अभाव”, “अपर्याप्त साक्ष्य”, “संदेह”, “गवाह मुकर गए”, या “विरोधाभास” लिखकर रिपोर्ट भेज देते हैं। समिति ने इसे अस्वीकार बताया। तय किया गया कि यदि विरोधाभास का उल्लेख किया गया है तो यह भी स्पष्ट करना होगा कि किस गवाह के बयान में और किस बिंदु पर विरोधाभास सामने आया है। समिति ने सरकारी गवाहों की अनुपस्थिति को गंभीर माना है। जिन मामलों में अनुसंधानकर्ता, पुलिस पदाधिकारी, चिकित्सक या अन्य सरकारी गवाह अदालत में साक्ष्य देने नहीं पहुंचे और उसके कारण अभियुक्त बरी हुआ, उन सभी अधिकारियों का पूरा नाम, पद नाम और अन्य विवरण रिपोर्ट में दर्ज करना होगा। यदि कोई सरकारी गवाह पक्ष द्रोही हो गया है, तो उसका भी पूरा विवरण देना अनिवार्य होगा। साथ ही जिला स्तरीय अभियोजन कोषांग यह भी सत्यापित करेगा कि न्यायालय की ओर से जारी समन और अन्य आदेशों का विधिवत तामिला हुआ था या नहीं। बताया गया कि समिति ने यह स्पष्ट कर दिया है कि उसका उद्देश्य रिपोर्ट की गुणवत्ता सुधारना नहीं बल्कि अभियोजन की कमियों की जवाबदेही तय कर दोषमुक्ति के मामलों में कमी लाना है।
अब सवाल यह होता है कि क्या वास्तव में बिहार सरकार में इतनी दृढ़ इच्छा शक्ति है कि वह कांडों के अनुसंधान कर्ताओं की जवाबदेही तय कर सकेगी? पुलिस की अगर जवाबदेही तय हो जाए तो ढेर सारे ऐसे मामले हैं जो स्वतः ही समस्या विहीन हो जाएंगे। पुलिस अगर जवाब देह हो तो अनुसंधान सही होंगे। भ्रष्टाचार कम होगा। निर्दोषों को फंसा कर भी पैसा ऐंठ लेने की प्रवृत्ति में कमी आएगी। बिहार पुलिस ऐसे ही कर्म से काफी बदनाम है। कोई मामला होता नहीं है कि सूचना के साथ पैसे लेनदेन की बात शुरू हो जाती है। यह हो सकता है कि कुछ मामलों में बिना पैसों के लेनदेन के आरोप लगाए जाते हैं, लेकिन इनकी संख्या न्यूनतम है। जबकि यह सत्य अधिकतम मामलों में दिखता है कि पैसों की लेनदेन होती है। अब अगर यह धारणा है तो अच्छी बात है। लेकिन वास्तविकता है तो इससे मुक्ति तभी संभव है जब कांडों के अनुसंधानकर्ता, थाना अध्यक्ष, पुलिस इंस्पेक्टर, डीएसपी और एसपी तक के अधिकारी की जवाबदेही तय हो। ताकि नीचे से उम्मीद टूटे तो उपर से भरोसा जग सके यह आम धारणा है कि पुलिस पैसे के लिए या दबंगों, पूंजीपतियों, राजनीतिक शक्ति प्राप्त व्यक्तियों, जातीय दबंगो की चिरौरी के लिए निर्दोषों को भी फंसाती रही है। बिहार में उग्रवाद के पनपने, फैलने और मजबूत होने की कई वजहों में पुलिस की कार्यशैली भी एक प्रमुख कारक रही है। इससे इनकार नहीं किया जा सकता। पुलिस की जवाबदेही तय होने से यह भी होगा कि झूठे मुकदमों की संख्या लगातार घटती चली जाएगी। क्योंकि जब पुलिस जवाब देह होगी तो झूठे मुकदमों को खारिज करेगी। सही जांच कर आरोपित बनाए गए निर्दोषों को न्याय मिलेगा और झूठे मुकदमे करने वाले हतोत्साहित होंगे। पुलिस का विश्वास बहाल होगा तो आम लोग भी थाना जाने में डरेंगे नहीं, या कहीं पुलिस की उपस्थिति से लोग अपमानित महसूस नहीं करेंगे। पुलिस की कार्यशैली में काफी भिन्नता दिखती है और यह इस पर निर्भर करता है कि संबंधित पक्ष की ताकत कैसी और कितनी है। कानून एक है, अनुपालन का तरीका उसका एक होना चाहिए। लेकिन संबंधित पक्षों की ताकत से अनुपालन का तरीका बदल जाता है। और ऐसा कतई नहीं होना चाहिए। राज्य स्तरीय समिति की समीक्षा में जो बात सामने आई है, उसे अगर लागू किया जाता है तो बिहार में पुलिस सुधार का दशकों से चला आ रहा है विमर्श एक आकर ले सकेगा। अन्यथा यह बात भी आई-गई हो जाएगी। सुधार की संभावना एक बार फिर गतलखाते में चली जाएगी।








