Thursday, 15 January 2026

सीमा आनंद और शुभंकर मिश्रा बनाम स्त्री-पुरुष सोच

(संदर्भ, चित्र:- चर्चित विवादास्पद पॉडकास्ट) 

● उपेंद्र कश्यप ● 

■ 16 जनवरी 2026 ■

आमतौर पर मैं ऐसे विषयों पर लिखने से बचने की कोशिश करता रहा हूं, मन मारकर, क्योंकि सामाजिक वर्जनाएं अनवाश्यक रूप से प्रेशर बनाती हैं। लेकिन किसी भी व्यक्ति से अधिक अनसोशल बन गए सोशल मीडिया पर जिस तरह की चर्चाएं एक पॉडकास्ट को लेकर हो रही है, उसने मुझे 02 घंटे से भी अधिक लंबा यह विवादित चर्चित पॉडकास्ट देखने के लिए विवश कर दिया। खुद को रोक न सका और पूरा पॉडकास्ट लगातार देख गया। सवाल यह उठता है कि सीमा आनंद गलत क्या कह गयी हैं? पितृ सत्तात्मक समाज में स्त्री द्वारा व्यक्त किए गए विचार को उसके चरित्रहीनता से जोड़ देना आम बात हो गई है। ऐसा करना कतई उचित नहीं है। सीमा आनंद ने उस पॉडकास्ट में वही कहा जो जानने की इच्छा सब कोई रखता है। जो करने की इच्छा सब कोई रखता है। बहुत लोग वैसा ही करते हैं, जैसा सीमा कह रही हैं। यह और बात है कि स्वीकारने का साहस किसी में नहीं है। जो पुरुष ऐसे सच को स्वीकार करने का साहस नहीं रखता, वह सीमा आनंद के चरित्र पर सवाल उठाने का दुस्साहस कर पा रहा है तो सिर्फ इसलिए कि वह पुरुष कमजोर है। उसे डर लगता है कि कोई स्त्री उसके बारे में भी बात करे। पुरुषों को यह आजादी दे दी गई है कि वह स्त्री के चरित्र पर विमर्श करे। शुभंकर ने कुरेद कुरेद कर ऐसे सवाल पूछे कि कई सच सामने आ गए। ऐसा नहीं है कि वह सच पहली बार सामने आए हैं। हां वह सच कोई पहली बार सबके सामने सार्वजनिक तौर पर बता रही (बता रहा-नहीं) है, यह महत्वपूर्ण हो गया है। वरना वह कौन सा सच बता रही है सीमा विश्वास जो आम लोग नहीं जानते, या शुभंकर ने कौन सा ऐसा सवाल पूछ लिया जो जानना कोई नहीं चाहता। और अगर दोनों के पॉडकास्ट फालतू है, बिना मतलब के है, समाज को बिगाड़ने वाला हैं तो उसे देख कौन रहा है? जब विधानसभा में सत्र के दौरान पोर्न देखे जा सकते हैं तो फिर उस पर बात करना गलत कैसे हैं? कितने वयस्क पुरुष हैं जो पोर्न नहीं? देखते नियमित या यदा कदा ही सही, देखते सभी हैं, जिसे भी इसकी जानकारी है। कुछ अपवाद हो सकते हैं। जिस देश में कामसूत्र लिखा गया, जिस देश में खजुराहो के मंदिर बने हैं, जहां काम कलाओं को स्पष्ट तौर पर उकेरा गया है, तो क्या वहां सीमा आनंद और शुभंकर मिश्रा की बातचीत देखना अस्वीकार्य हो सकता है? 


कौन सी नैतिकता की बात की जा रही है? क्या जब आप खजुराहो देखते हैं तो आपके मन में पाप जागते हैं? आपके मन में घृणा का भाव पैदा होता है? उन मूर्तियों के निर्माता के प्रति तो आप आकर्षित होते हैं। आपको आश्चर्य होता है कि एक जमाने में भारत में काम कलाओं को लेकर इतने खुले विचार हुआ करते थे। रति क्रियाओं को सार्वजनिक जगहों पर बजाप्ता मूर्ति के रूप में गढ़े गए, दिखाए गए। पाठ्य पुस्तकों में। उसकी तस्वीरें छपी और पढ़ाई जाती है। लोगों को जागरूक किया गया। जब आप खजुराहो जाएंगे और कोई कुमारी कन्या आपके बगल से गुजर कर मंदिर में पूजा करके लौटती है तब भी आपके मन में पाप नहीं जगता और ना मंदिर दर्शन करने वाली लड़की के बारे में आप चरित्रहीनता का सर्टिफिकेट देते हैं? तो फिर सीमा आनंद जो कह रही है वह गलत कैसे है? 


क्या आपने सिमोन द बोऊवा का द सेकेंड सेक्स (हिंदी में - स्त्रीसाइमन उपेक्षिता- प्रभा खेतान) पढ़ा है। अगर नहीं पढ़ा तो पढ़ लीजिए। आपकी कई भ्रांतियां टूट जाएगी। वह पत्नी के बारे में, स्त्री-पुरुष संबंधों के बारे में क्या कहती है? जब यह जान जाइयेगा तो वास्तविकता की समझ बढ़ जाएगी। 

ओशो ने ठीक कहा था कि य

जहां ऐसे विषय पर चर्चा वर्जित है वहां कई समस्याएं खड़ी होती है। आज तमाम तरह की वर्जनाएं ऐसे विषय की चर्चा पर लाद कर लगभग विमर्श को बंद कर दिया गया है तो उसका नतीजा आप सामने देख रहे हैं। कुंठित समाज उन बच्चियों को भी सामूहिक दुष्कर्म करके मार डालता है जिनको यह तक ज्ञात नहीं होता कि स्त्री पुरुष की शारीरिक संरचना में कैसा और क्या फर्क होता है? जब आप खुलकर बात करेंगे तो आप कुंठा से मुक्त होंगे। और जब कुंठा से मुक्त होंगे तो आप दुष्कर्मी नहीं बनेंगे। दुष्कर्मी पुरुष होता है, बच्चियां नहीं, लेकिन झेलना किसे पड़ता है? दुष्कर्म की शिकार बच्चियों को। युवतियों को। महिलाओं को। क्योंकि पुरुष समाज की सोच बहुत ही घृणित है। वेश्यालय जाने वाला बदनाम नहीं होता, वेश्या बदनाम होती है। क्यों?  क्या किसी पुरुष के बिना कोई वेश्या बन सकती है? अगर देह बेचना गुनाह है तो उसका खरीदार बेगुनाह कैसे हो सकता है?



 अगर रति क्रीड़ा पाप और अपराध है, तो यह संसार चल कैसे रहा है? क्या बिना रति क्रीड़ा के संसार का वजूद बचा रह सकता है? अगर प्रजनन बंद हो जाए, काम क्रिया बंद हो जाए, तो इस पृथ्वी पर मानव का अस्तित्व कितने वर्ष बच सकेगा? सीमा आनंद के भी परिवार हैं, उनके भी पति हैं, उनके भी संतान है। जब समाज खुला होता है तभी कोई सीमा आनंद जैसा बातचीत करने वाली खड़ी होती है, और फिर पॉडकास्ट में तो कई बार सीमा कह चुकी है कि मुझे ट्रोल किया जाएगा। तुम (शुभांकर) मुझको मरवाओगे। लोग पीछे पड़ जाएंगे। कितने तरह के सवाल उठेंगे। क्योंकि सीमा आनंद जानती है कि भारत का समाज अभी उतना खुला नहीं है, इसलिए ऐसा कह रही हैं। पुरुष खुलकर बात कर सकता है, स्त्री नहीं। स्त्री मुस्कुरा दे तो वह चरित्रहीन है। और लड़कियों पर फबती कसने वाला पुरुष भटका हुआ और बिगड़ा हुआ कह दिया जाता है। वह चरित्रहीन नहीं माना जाता है। इसे मर्दों की आदत मानी जाती है। इसमें मर्दानगी दिखता है। जब समाज इस तरह से सोचने लगता है तो फिर वर्जनाएं घृणित रूप से  टूटने लगती है।


विचारों को, विमर्शों को जिंदा रखना ही जीवंत समाज की पहचान है। अन्यथा न मुर्दे चर्चा करते हैं, न मुर्दों की चर्चा होती है।


उपेन्द्र कश्यप 




Friday, 21 November 2025

बुनकरी के लिए मशहूर हुआ करता था दाउदनगर

 


मच्छरदानी, चादर, पितांबरी बनते थे घर घर

तांती तंतवा, पटवा जाति का था खानदानी काम

मुजफ्फरपुर और मानपुर से मंगाते थे कच्चा माल

झारखंड और छत्तीसगढ़ से आते थे रेशम के कोआ

उपेंद्र कश्यप, जागरण ● दाउदनगर (औरंगाबाद) : 16 वीं के शहर दाउदनगर में लगभग उसी वक्त से हथकरघा का काम होने लगा था। तांती, तंतवा और पटवा जातियां यहां बसी हुई थीं। पाट पर जो बुनाई का काम करते थे उसे पटवा कहा जाने लगा। यहां तांत, रेशम का काम जो लोग करते थे, उन्हें तांती कहा जाता है। यह जाति अतीत में विश्वकर्मा पूजा करती रही है। ततवां जाति की आबादी कम है। यह बुनकर जातियां अपने व्यवसाय में निपुण मानी जाती थीं। कच्चा माल भागलपुर और गया के मानपुर से लाते थे। मुजफ्फरपुर के सुत्तापट्टी से सूत लाया जाता था। मानपुर गया से उसे रंगवाया जाता था। भागलपुर से रेशम का कोआ आता था। पलामु और छत्तीसगढ के बोहला (रामानुजगंज) से भी कोआ मंगाया जाता था। गमछा, जनता धोती, साड़ी, पितांबरी (कफन) की बुनाई होती थी। सीताराम आर्य को उनके पिता श्याम लाल आर्य ने बताया था कि जनता धोती प्रचलित ब्रांड बन गया था। कभी शहर में सौ से अधिक घरों में बुनकरी का काम होता था। जब मशीनीकरण का युग प्रारंभ हुआ तो दाउदनगर का हथकरघा उद्योग धीरे धीरे समाप्त होता चला गया। बेसलाल राम वल्द डोमनी राम के घर दो दशक पूर्व तक दो हथकरघा चलता था। कपड़ा बीनने का काम व्यापक पैमाने पर होता था। बरसात के कारण मात्र भादो में आठ दिन काम बंद करना पड़ता था। इस समय खूब मौज मस्ती की जाती थी। बस खाओ-पीओ और मौज करो। शहर में अब बुनकरी का काम नहीं होता है। कभी शहर की मुख्य जाति की समृद्धि के गीत लिखने वाला बुनकरी का काम अब पूरी तरह विलुप्त हो गया है।


बनाये जाते थे दरी, कालीन भी

जब बुनकरी का काम समाप्त हो गया तो बुनकर वर्ग के लोग ठेकेदारी, मजदूरी, अन्य व्यवसाय में उतर गए। शिक्षा नहीं थी लेकिन आज शिक्षित भी हैं, और बडे़ पैमाने पर नौकरी के साथ अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्र में भी सक्रिय हैं। दरी-कालीन एवं कंबल बुनाई का काम भी छोटे स्तर पर यहां होता था। चूंकि बगल के ओबरा में कालीन का उद्योग राष्ट्रीय स्तर पर भदोही के बाद दूसरे पायदान पर काबिज था तो यहां उसकी संभावना कम बन सकी।


महंगाई और गुणवत्ता के कारण काम बंद

कपड़े के व्यवसाय से जुड़े सीताराम आर्य का पूरा खानदान हस्तकरघा का काम करता था। वह बताते हैं कि उनके पिता श्याम लाल और भाइयों लाल बिहारी व अन्य के साथ स्वयं भी करघा चलाते थे। लगभग 25 साल से बुनकारी का काम पूरे शहर में पूरी तरह बंद हो गया है। बताया कि मानपुर से आने वाला धागा तक बाद में काफी महंगा हो गया। हथकरघा से निर्मित कपड़ों की बाजार में मांग कम हो गई। बाहर बड़े मीलों से निर्मित कपड़ों की गुणवत्ता इससे अधिक बेहतर लोगों को लगने लगी। नतीजा बिक्री कम हुई और फिर धीरे-धीरे वह पूरी तरह बंद हो गया। जब उद्योग पर संकट मंडराने लगा तो लोग खादी भंडार से जुड़े। उनके लिए चादर बनाने लगे। लेकिन एक दशक भी यह काम नहीं चला और अंत तक पूरी तरह बंद हो गया।


Thursday, 20 November 2025

40 वर्ष तक चरम पर था कभी बर्तन उद्योग

 


फोटो-बर्तन बनाते भोला प्रसाद कांस्यकार

तीन बेलन मिलों से मिली थी पीतल उद्योग को प्रतिष्ठा

स्वतंत्रता पश्चात बिगड़ती गयी स्थिति, अंततः सब बर्बाद

उपेंद्र कश्यप, जागरण ● दाउदनगर (औरंगाबाद) : कभी शहर में कुटीर उद्योग के रुप में बर्तन निर्माण का कार्य व्यापक पैमाने पर होता था। बीसवीं सदी में जब भारत आजाद हुआ और 1965 में चीन ने हमला किया तब सैनिकों के लिए भी यहां के बने बर्तन भेजे गये थे। इसके पीछे की ताकत थी मशीनीकरण का होना। शुक्रबाजार ठाकुरबाड़ी से लेकर नगरपालिका तक और पूरब में बम रोड तक कसेरा एवं ठठेरा बसे हुए थे। यहां जिस पैमाने पर बर्तन बनते थे उस पैमाने पर सिर्फ मिरजापुर (उत्तर प्रदेश) में ही बनता था। इधर बिहार में आरा के पास परेव में आज भी यह निर्माण कार्य व्यापक पैमाने पर होता है मगर दाउदनगर में मात्र दो, चार परिवार तक यह काम सीमित हो गया है। वजह साफ है। समय के साथ मशीनीकरण की ओर यह इलाका नहीं बढ़ सका। बिहार में दूसरे कल कारखाने भी विकसित नहीं हो सके। आजादी के बाद स्थिति बिगड़ती गई और अंतत: सब कुछ खत्म हो गया। एक जमाना था, खासकर सात दशक पूर्व तक कि बर्तन बनाने से निकलने वाली ठक-ठक की आवाज सोन उस पार नासरीगंज तक सुनाई पड़ती थी। इसका चरम समय था 1920 के बाद से 1960 के दशक तक का। जब यहां तीन बेलन मिल लगाये गये थे। सन 1910 में सिपहां में स्थापित संगम साव रामचरण राम आयल एण्ड राइस मिल ने ये मशीनें लगायीं थीं। शुक्रबाजार में उमाशंकर जगदीश प्रसाद रौलिंग मिल, हनुमान मंदिर के नजदीक (बुद्धा मार्केट) श्रीराम बेलन मिल एवं चावल बाजार में संगम साव राम चरण साव रौलिंग मिल लगाया गया था। तीनों जगह बेलन मिल लगाए जाने से बर्तन निर्माताओं को काफी सहुलियत हुई। 

यहां सर्वाधिक 90 प्रतिशत से अधिक निर्माण पीतल की कठौती बनाने का होता था। पीतल को कोयला की भट्ठी में गलाया जाता था। उसे खोटी (एक प्रकार का बर्तन) में ढाल दिया जाता था। उसे जब ठोस आकार मिल गया तो बडा हथौड़ा जिसे घन भी कहते हैं, से पीट-पीट कर एक मीटर का घेरा में फैलाया जाता था। फिर गहरा बनाया जाता था। उसके बाद उस पर गोल-गोल बिन्दी आकार में चमक लाने के लिए पीटा जाता था। जब बेलन मिल लगा तो मजदूरों की समस्या कम हुई, मगर ठक-ठक होती रही। क्योंकि गहराई और चमक लाने का काम तब भी हाथ से ही किया जाता रहा। मिल सिर्फ खोटी को बेल कर आवश्यकतानुसार आकार दे देते थे। शुरु में मजदूरों को लगा कि मशीनीकरण से इनकी समस्या कम हुई है। यह औद्योगिकीकरण की शुरुआत भर थी, जिसने धीरे-धीरे श्रम की सामूहिक संस्कृति को खत्म किया। भोला प्रसाद कांस्यकार बताते हैं जीविकोपार्जन के लिए बर्तन दुकानदारों के लिये अब कारीगर मजदुरी पर पीतल के हांडी बनाने का काम कर रहे हैं। कारीगरों के पास पूंजी का अभाव है।



अन्य प्रदेश को पलायन मजबूरी

कसेरा टोली निवासी धीरज कसेरा कहते हैं कि आधुनिक एवं नये डिजाइन के वस्तुओं के निर्माण के लिए कोई नई तकनीकी प्रशिक्षण उपलब्ध नहीं है। पूंजी के अभाव के कारण आधुनिक मशीनों की खरीदारी नहीं कर पा रहें हैं कारीगर। यही कारण है कि दाउदनगर से कारीगर अन्य राज्यों में पलायन करते जा रहे हैं।


कांस्यकार समाज का पुश्तैनी कारोबार

कांस्यकार या कसेरा जाति का इस पुश्तैनी धन्धे पर कब्जा था। व्यापक पैमाने पर निर्माण ने घरों को, परिवारों को काफी समृद्ध बनाया। इस जाति समूह से दो जातियां यहां पूरब दिशा से आयीं। कसेरा जो पीतल का काम करते थे और ठठेरा जो कसकूट (लोटा) बनाने का काम करते थे। यहां तमेढ़ा जाति की बसावट नहीं है। यह जाति तांबा का काम करती है। यहां तांबा का बर्तन नहीं बनता था।



कभी ठुकरा दिया था प्रमुख की कुर्सी, अब बन गए विधायक

 


फोटो-पूर्व प्रमुख संजय सोम, विधायक डा. प्रकाशचंद्र व संजय पटेल

2004 में बनी तिकड़ी की सक्रियता से मिली सफलता

पंचायत समिति की राजनीति कर बने विधायक

प्रमुख बनने की राजनीति से कर दिया था इंकार 

दो साल रहे हैं दाउदनगर के पंचायत समिति सदस्य

 संवाद सहयोगी, जागरण ● दाउदनगर (औरंगाबाद) : ओबरा के नवनिर्वाचित विधायक डा. प्रकाश चंद्र की राजनीतिक यात्रा पंचायत समिति की राजनीति से शुरू हुई थी। उन्होंने अनुकूल परिस्थिति के बीच प्रमुख बनने से इंकार कर दिया था। बिहार में त्रिस्तरीय ग्राम पंचायत का चुनाव 2001 में पुनः आरंभ हुआ था। तब तरारी क्षेत्र संख्या 13 से निर्वाचित हुए थे गंगा तिवारी, एक मामले में सजायाफ्ता होने के बाद विधि के तहत में पदच्युत कर दिए गए थे। इसके बाद यह पद रिक्त हो गया। यहां 2004 में उप चुनाव हुआ तो डा.प्रकाश चंद्र पहली बार राजनीति में आए। चुनाव लड़े और पंचायत समिति के सदस्य निर्वाचित घोषित किए गए। इनके साथ तब पंचायत समिति के सदस्य थे संजय सोम और संजय पटेल। वर्ष 2001 में चुनाव होने के बाद संजय सोम प्रमुख बने थे। एक साल के बाद उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव आया और उन्हें पद छोड़ना पड़ा। जब तीनों की तिकड़ी बनी तो एक कोशिश यह की गई कि डा. प्रकाश चंद्र को प्रमुख बनाया जाए। तब 21 सदस्य पंचायत समिति में 12 सदस्यों का समर्थन प्रमुख बनने के लिए आवश्यक था। संजय सोम और संजय पटेल बताते हैं कि तब 14 सदस्यों का हस्ताक्षर भी कर लिया गया था। लेकिन प्रकाश चंद्र ने प्रमुख बनने से अंतिम समय में इनकार कर दिया। फिर समाज सेवा में सक्रिय रहे। कोई चुनाव नहीं लड़ा। उसके बाद 2020 में विधानसभा का चुनाव लोक जनशक्ति पार्टी से लड़ा और दूसरे स्थान पर रहे। इस बार लोक जनशक्ति पार्टी रामविलास से एनडीए के समर्थन से प्रत्याशी बने और राजग के आधार वोटरों और समर्थकों की एकजूटता के कारण उनकी जीत सुनिश्चित हो गई। तब से ही बनी यह तिकड़ी लगातार सक्रिय रही। स्वयं डा. प्रकाश चंद्र भी सार्वजनिक मंच से कई बार बता चुके हैं कि राजनीति में इन दोनों ने ही उनको लाया और लगातार राजनीतिक तौर पर सहयोग किया। 


जबरन नैरेटिव सेट करने और आक्रामक मिजाज की हार



जनता का मनोविज्ञान नहीं समझ सके विरोधी 

दशमलव वाली जातियों ने बदल दिया पूरा खेल 

उपेंद्र कश्यप, जागरण ● दाउदनगर (औरंगाबाद) : ओबरा से एनडीए जीत गया जबकि उसे हराने के लिए हर प्रकार का भला बुरा कार्य विरोधियों ने किया। इंटरनेट मीडिया पर गालियां लिखी गई। खुला चैलेंज किया गया कि किसी कीमत पर ओबरा से एनडीए नहीं जीत सकता। महागठबंधन समर्थक 50 से 60000 वोट से जीतने का दावा कर रहे थे। वोटिंग से कुछ घंटे पहले हाथ में लालटेन लिए एनडीए के प्रत्याशी प्रकाश चंद्र की तस्वीर इंटरनेट मीडिया पर वायरल की गई और कहा गया कि उन्होंने भी हार मान ली। महागठबंधन के प्रत्याशी ऋषि कुमार का समर्थन कर दिया। प्रकाश चंद्र को घृणा भाव से देखने वाले कुछ लोग जबरदस्ती नैरेटिव सेट कर रहे थे।  जनता ने चुपचाप जवाब दे दिया। जनता को पता है कि प्रकाश चंद्र को गलियाने वाले अपनी जाति के लोगों की प्रशंसा करते हैं। आक्रामक जातिवाद लोगों को गोलबंद करने में सफल रहा। जन सुराज के प्रत्याशी सुधीर शर्मा ने लिखा- “ओबरा में कुछ लोग उल्टी गंगा बहाना चाहते थे, प्रकाशचंद्र और मुझे दोनों को हराना चाहते थे। प्रकाशचंद्र की जीत उन्हीं लोगों को समर्पित। जनता के मनोविज्ञान की सामान्य समझ भी ऐसे लोगों को नहीं थी। इन्होंने लिखा कि ऐसे लोगों को आगाह किया था।” लेकिन माना जाता है कि नफरत जब कोई किसी से करता है तो उसे कुछ भी अच्छा नहीं दिखता। एनडीए के कुनबे में यह बात घर बैठ गई थी कि अबकी नहीं तो कहियो नहीं। दूसरी तरफ एक प्रतिशत से कम संख्या वाली जातियां चुपचाप हेलीकाप्टर पर चढ़ गए। उन्हें आक्रामकता स्वीकार्य नहीं थी, और भय ने एकजुट कर दिया। उन्हें यह विश्वास था कि एनडीए के प्रत्याशी प्रकाश चंद्र से  जातिवाद या आक्रामक होने का खतरा नहीं है। उल्टे प्रकाश चंद्र के दिए गए वचन इन लोगों में आशा जगा गया। इनका ध्रुवीकरण उनके पक्ष में हो गया और नतीजा सबके सामने है। एनडीए ओबरा से 12013 वोट से जीत गयी।



रणनीति के तहत जनसभा नहीं


विधानसभा चुनाव का प्रत्याशी आम तौर पर अपने दल और गठबंधन के बड़े नेताओं को अपने विधानसभा क्षेत्र में बुलाता है और जनसभा का आयोजन करवाता है। रोड शो करवाता है। जिला में अन्य विधानसभा क्षेत्र में ऐसा हुआ। लेकिन ओबरा विधानसभा क्षेत्र इस मामले में एक हद तक अपवाद रहा। सिर्फ एक चुनावी सभा एनडीए की हुई। लोक जनशक्ति पार्टी रामविलास के सुप्रीमो और केंद्र में मंत्री चिराग पासवान की सभा ओबरा में हुई। इसके अलावा एनडीए के किसी दल के नेता को यहां नहीं बुलाया गया  लोगों को लग रहा था कि नीतीश कुमार, सम्राट चौधरी, उपेंद्र कुशवाहा, विजय सिंहा समेत अन्य नेताओं को ना बुलाना भारी पड़ सकता है। लेकिन चुनाव परिणाम जब आया तो स्पष्ट हो गया कि ना बुलाने की रणनीति भी सफल रही। पिछले चुनाव में डा. प्रकाश चंद्र ने अमीषा पटेल को बुलाया था। तब हुई उनकी हार की कई वजहों में एक वजह सेलेब्रेटी का रोड शो भी माना गया था। इसलिए इस बार उन्होंने खुद ही अधिकतम गांव और घरों को संपर्क किया और उपेंद्र कुशवाहा सायन कुणाल, सुनील पांडे जैसे नेता चिन्हित गांवों में जनसंपर्क किये लेकिन बड़ी सभा नहीं किया। यह सब एक रणनीति के तहत किया गया था जिसे अब कामयाब माना जा रहा है।




Saturday, 15 November 2025

समाजवाद और वामपंथ की जमीन पर दक्षिण पंथ को मिली उड़ान



45 साल का सूखा प्रकाश चंद्र ने किया समाप्त 

1980 में जीती थी भाजपा, हारते रहा है दक्षिणपंथी गठबंधन

उपेंद्र कश्यप, जागरण ● दाउदनगर (औरंगाबाद) : ओबरा की जमीन को समाजवादियों की थाती मानी जाती रही है। हमेशा उसी की जीत होते रही है और दो बार अगर कोई जीता भी तो वह वामपंथी। मात्र एक बार वर्ष 1980 में भाजपा के वीरेंद्र प्रसाद सिंह चुनाव जीत सके थे। इसके बाद भाजपा के साथ गठबंधन करने वाली कोई पार्टी चुनाव नहीं जीत सकी। हालांकि ऐसा गठबंधन मुकाबले में बना रहा। एक बार करीबी हार भी एनडीए को झेलनी पड़ी है। इस बार- अबकी नहीं तो कहियो नहीं, का चुनावी पंच लाइन सफल रहा और जो मुकाबला थोड़ा तीखा दिख रहा था अंततः आसन रहा। किसी चरण में एनडीए समर्थित लोक जनशक्ति पार्टी रामविलास के प्रत्याशी डा. प्रकाश चंद्र पिछड़े नहीं और उनकी जीत हुई। उनके जीत के कई मायने हैं। इस जमीन पर 1952 में सोशलिस्ट पार्टी से पदारथ सिंह चुनाव जीते। 1962 में यह सीट आरक्षित हो गई तो दिलकेश्वर राम इंडियन नेशनल कांग्रेस के प्रत्याशी के रूप में जीते। अगले चुनाव वर्ष 1967 में यह फिर से सामान्य सीट हो गई और रघुवंश कुमार सिंह बतौर कांग्रेस प्रत्याशी चुनाव जीत गए। वर्ष 1969 में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के संत पदारथ सिंह चुनाव जीते। वर्ष 1972 में इंडियन नेशनल कांग्रेस के नारायण सिंह, 1977 में जेएनपी से रामविलास सिंह चुनाव जीत गए। वर्ष 1980 में ही भाजपा की स्थापना हुई थी और इसी वर्ष हुए चुनाव में कोइलवां निवासी वीरेंद्र प्रसाद सिंह चुनाव जीतने में सफल रहे। यह पहली घटना थी जब ओबरा से दक्षिणपंथ की जीत हुई थी। उसके बाद लगातार सुख बना रहा। वर्ष 1985 में रामविलास सिंह लोक दल से और 1990 में जनता दल से चुनाव जीत गए। जब दाउदनगर शहर एकजुट हुआ तो 1995 में वामपंथ के साथ हो लिया। वर्ष 1995 और 2000 में भाकपा माले लिबरेशन के प्रत्याशी राजाराम सिंह को एक तरफ़ा वोट देकर जीता दिया। इसके बाद वर्ष 2005 के फरवरी और अक्टूबर में हुए दो चुनाव में लगातार राजद से सत्यनारायण सिंह चुनाव जीते। वर्ष 2010 में फिर से ओबरा ने करवट लिया और निर्दलीय सोम प्रकाश सिंह चुनाव जीत गए। वर्ष 2015 में राजद से वीरेंद्र कुमार सिंह तो 2020 में ऋषि कुमार चुनाव जीते। इसलिए इस बार यह नारा बुलंद था कि- अबकी नहीं तो कभी नहीं। और इसके पीछे डा. प्रकाश चंद्र के कर्म और व्यवहार का आधार विश्वास की नींव बना था। इसके पहले अगर हम देखें तो दो बार ऐसा लगा था कि दक्षिण पंथी भाजपा से गठबंधन करने वाला दल जीत सकता है। वर्ष 2010 में प्रमोद सिंह चंद्रवंशी जीतते दिखे किन्तु अंततः 802 मत से हार गए। इसके बाद 2015 में यह सीट आरएलएसपी के खाते में चली गई और चंद्रभूषण वर्मा चुनाव लड़ने आए। वे 44646 वोट लाकर 11496 वोट से हार गए।


12322 मत मिला एनडीए को नप क्षेत्र में



 4226 मतों से शहर जीत सके प्रकाश चंद्र

8096 मत ले सका महागठबंधन

सबसे अधिक चौंकाया तौफीक आलम ने

जनसुराज पार्टी और बसपा से अधिक वोट निर्दलीय को 

उपेंद्र कश्यप, जागरण ● दाउदनगर (औरंगाबाद) : दाउदनगर शहर में कुल 41 मतदान केंद्र पर 22758 मतदाताओं ने वोट डाले। जबकि कुल मतदाताओं की संख्या 39164 है। शहर में प्राय: एनडीए ही जीतते रहा है। लेकिन इस बार एनडीए और महागठबंधन के बीच का फ़ासला संतोषजनक नहीं माना जा रहा। एनडीए समर्थित लोक जनशक्ति पार्टी रामविलास के प्रत्याशी डा. प्रकाश चंद्र को 12322 वोट मिला, जबकि महागठबंधन समर्थित राजद के प्रत्याशी ऋषि कुमार को 8096 मत। दोनों के बीच 4226 मतों का अंतर रहा। राजग समर्थकों के अनुसार यह फासला और अधिक होने का अनुमान था। बहरहाल इस दूसरे और तीसरे स्थान पर रहने वाले प्रत्याशियों से अधिक मोहम्मद तौफीक आलम ने चौंकाया। इस निर्दलीय प्रत्याशी को 505 मत मिला और यह तीसरा स्थान पर है। उर्मिला गैस एजेंसी में कार्यरत यह ऐसा प्रत्याशी है जिसने नामांकन के बाद किसी व्यक्ति को अपने हिस्से मत देने के लिए भी नहीं कहा। कोई प्रचार नहीं किया। इसके बावजूद इसे इतना मत मिला। इसे अपने-अपने हिसाब से लोग देख रहे हैं। तौफीक को इतना मत मिलना आश्चर्जनक लगता है। यह जन सुराज पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के प्रत्याशियों को सदमे में डालने वाला है। जनसुरज पार्टी के सुप्रीमो प्रशांत किशोर ने प्रमोद सिंह चौक से लेकर भखरुआं तक रोड शो किया था। इसके बावजूद उनके प्रत्याशी सुधीर कुमार शर्मा को मात्र 404 मत प्राप्त हुआ। शहर में रोड शो करने वाले बसपा के प्रत्याशी संजय कुमार को मात्र 245 मत प्राप्त हुआ। चौंकाने वाली दूसरी बात यह रही कि ओबरा से निर्दलीय विधायक रहे सोम प्रकाश को मात्र 80 मत मिला और वे 11 वें स्थान पर चले गए। जबकि रामराज यादव (निर्दलीय-247), हरि संत कुमार (निर्दलीय-147), 

प्रतिमा कुमारी (राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी-122), शिवनाथ साव (निर्दलीय-121) और बृज किशोर सिंह (निर्दलीय-101) को कोई जानता तक नहीं और न ही इन्होंने कभी प्रचार किया। इसके बावजूद सोम प्रकाश से अधिक मत लाने में सफल रहे। यह परिणाम बताता है कि शहर में राजद अपना प्रभाव बढ़ाता जा रहा है। वह मजबूत हो रहा है। डा. प्रकाश चंद्र को बाजार में और काम करने की जरूरत है, लोगों से मिलने और संबन्ध प्रगाढ़ करने की आवश्यक्ता है। वहीं सोम प्रकाश के लिए नगर परिषद क्षेत्र काफी दूर है। 



ओबरा के 18 प्रत्याशी को नगर परिषद के 41 मतदान केंद्रों पर मिला मत इस प्रकार है:-



प्रत्याशी का नाम- दल संबद्धता- प्राप्त मत


1-प्रकाश चंद्र- लोक जनशक्ति पार्टी रामविलास-12322

2-ऋषि कुमार- राष्ट्रीय जनता दल-8096

3-मोहम्मद तौफीक आलम -निर्दलीय-505

4-सुधीर कुमार शर्मा- जन सुराज पार्टी-404

5-संजय कुमार- बहुजन समाज पार्टी-245

6-रामराज यादव- निर्दलीय-247 

7-हरि संत कुमार- निर्दलीय-147 

8-प्रतिमा कुमारी -राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी-122

9-शिवनाथ साव- निर्दलीय-121

10-बृज किशोर सिंह- निर्दलीय-101 

11-सोम प्रकाश- स्वराज पार्टी लोकतांत्रिक-80

12-धर्मेंद्र कुमार- जागरूक जनता पार्टी-57

13-धीरज कुमार- निर्दलीय-53

14-जितेंद्र दुबे -अखिल भारतीय जनसंघ-47

15-डा.धर्मेंद्र कुमार -अखिल हिंद फ़ारवर्ड ब्लाक क्रांतिकारी-42

16-जयनंद राम- न्यू इंडिया यूनाइटेड पार्टी-23

17-अजीत कुमार- आम जनता पार्टी राष्ट्रीय-18

18-उदय नारायण राजभर- सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी- 18

नोटा-111


नौ को नोटा से भी कम मत


18 में नौ प्रत्याशियों को नोटा से भी कम वोट मिला है। नगर परिषद क्षेत्र में 111 मत नोटा को गया है। यानी इन लोगों ने किसी प्रत्याशी को पसंद नहीं किया जबकि 18 प्रत्याशी चुनाव लड़ रहे थे। इन नौ प्रत्याशियों में सबसे चर्चित नाम सोम प्रकाश का भी शामिल है, जो ओबरा से विधायक रहे हैं। उनको मात्र 80 मत मिला है।