Sunday, 4 October 2026

जिउतिया के सांस्कृतिक, धार्मिक, कलात्मक पक्ष की जानकारी देती है स्मारिका


 दो शताब्दी में पहली बार स्मारिका का प्रकाशन 


लोक संस्कृति के संवर्धन व संरक्षण में मील का पत्थर 

नबिटा संवाददाता 

दाउदनगर (औरंगाबाद) । ई. सन 1860 से पहले दाउदनगर में जिउतिया का आरंभ कब हुआ था, यह ज्ञात नहीं है। लगभग दो शताब्दी में पहली बार जिउतिया लोक उत्सव को लेकर स्मारिका -जिउतिया का उत्कर्ष-का प्रकाशन किया गया। पहली बार बिहार सरकार ने दाउदनगर के जिउतिया को सांस्कृतिक कैलेंडर में शामिल किया।  आयोजन के लिए बिहार सरकार के कला एवं संस्कृति विभाग द्वारा तीन लाख रुपये की राशि आवंटित हुई। नगर परिषद कार्यालय परिसर में आयोजन हुआ। इस अवसर पर एक स्मारिका का प्रकाशन किया गया। इस अवसर विधायक कुटुंबा ललन राम, जिलाधिकारी अभिलाषा शर्मा, नगर परिषद दाउदनगर की अध्यक्ष अंजली कुमारी, उप विकास आयुक्त कुमारी अनुपम सिंह, अपर समाहर्ता अनुग्रह नारायण सिंह, एसडीओ अमित राजन, एसडीपीओ चंद्रभूषण, जिला कला संस्कृति पदाधिकारी कुमार पप्पू राज सहित अन्य पदाधिकारी उपस्थित रहे। स्मारिक की संरक्षक जिला पदाधिकारी अभिलाष शर्मा हैं। अपर समाहर्ता अनुग्रह नारायण सिंह, दाउदनगर के अनुमंडल पदाधिकारी अमित राजन और जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी कुमार पप्पू राज संपादक मंडल में शामिल हैं। बतौर लेखक वरिष्ठ पत्रकार उपेंद्र कश्यप और बतौर सहयोगी नगर परिषद की मुख्य पार्षद अंजली कुमारी और कार्यपालक पदाधिकारी ऋषिकेश अवस्थी का नाम इसमें उल्लेखित है। बिहार सरकार के खान एवं भूतत्व विभाग सह कला एवं संस्कृति मंत्री डॉ प्रमोद कुमार, पिछड़ा वर्ग एवं अति पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग तथा जिला की प्रभारी मंत्री रमा निषाद, क्षेत्रीय विधायक डॉ प्रकाश चंद्र, कला एवं संस्कृति विभाग के सचिव प्रणव कुमार, अपर सचिव श्रीमती रूबी और जिला पदाधिकारी अभिलाष शर्मा का शुभकामना संदेश शामिल है। जबकि 10 पेज में- “लोक संस्कृति के आयामों का समुच्चय है-जिउतिया संस्कृति” शीर्षक से जिउतिया लोक संस्कृति के शोधकर्ता एवं कई पुस्तकों के लेखक उपेंद्र कश्यप का आलेख प्रकाशित किया गया है।



सांस्कृतिक यात्रा को दस्तावेज के रूप में संरक्षित करने की कोशिश


खान एवं भू तत्व विभाग के मंत्री डॉ प्रमोद कुमार ने अपने संदेश में कहा है कि यह उत्सव केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि हमारी लोक संस्कृति, परंपरा और सामुदायिक विरासत के संरक्षण एवं संवर्धन का महत्वपूर्ण माध्यम है। बदलते समय में अपनी सांस्कृतिक जड़ों को सहेजना और उन्हें नई पीढ़ी तक पहुंचाना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है। इस तरह से जिउतिया लोक उत्सव का आयोजन विशेष महत्व रखता है। इस स्मारिका का प्रकाशन इस सांस्कृतिक यात्रा को दस्तावेज के रूप में संरक्षित करने की दिशा में एक सराहनीय प्रयास है। इसमें संकलित सामग्री दाउदनगर की लोक परंपरा, सांस्कृतिक विरासत और जिउतिया उत्सव से जुड़े स्मृतियों को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचने में उपयोगी सिद्ध होगी। 


पीढ़ियों के लिए उपयोगी संदर्भ बनेगी स्मारिका 


अपने शुभकामना संदेश में पिछड़ा वर्ग एवं अति पिछड़ा वर्ग सह प्रभारी मंत्री औरंगाबाद रमा निषाद ने कहा है कि दाउदनगर औरंगाबाद की धरती अपनी विशिष्ट लोक संस्कृति, परंपराओं और सामाजिक समरसता के सदैव समृद्ध रही है। इस सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित, संवर्धित एवं नई पीढ़ी तक पहुंचाने की दिशा में जिउतिया उत्सव 2026 का आयोजन एक सराहनीय फल है। ऐसा आयोजन हमारी लोक परंपराओं को जीवंत बनाए रखने के साथ-साथ स्थानीय कला, लोकगीत, लोक नृत्य एवं सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों को एक सशक्त मंच प्रदान करते हैं। उन्होंने कहा कि स्मारिका उत्सव की गतिविधियों, लोक परंपराओं एवं सांस्कृतिक विरासत का दस्तावेजीकरण करने का महत्वपूर्ण माध्यम बनेंगे। मुझे विश्वास है कि यह स्मारिका आने वाली पीढियों के लिए हमारी समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर को समझने और उसे जोड़ने का उपयोगी संदर्भ बनेगी। क्षेत्रीय विधायक डॉ प्रकाश चंद्र ने अपने संदेश में कहा है कि दाउदनगर की मिट्टी में लोक संस्कृति की गहरी जड़े हैं और जिउतिया पर्व उसके समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रतीक है। पर्व की विशेषता केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है। अपितु स्थानीय कलाकारों द्वारा प्रस्तुत विविध लोक कलाएं जीवंत सांस्कृतिक पहचान को अभिव्यक्त करती है। इस वर्ष जितिया पर्व को राजकीय स्तर पर मनाने की पहल के लिए जिला प्रशासन और सभी सहयोगियों को प्रति हार्दिक आभार। इस गौरवशाली लोक परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुंचाना और सांस्कृतिक गरिमा को बनाए रखना हम सभी का साझा दायित्व है।



स्मारिका का प्रकाशन सराहनीय

इस स्मारिका में प्रकाशित अपने शुभकामना संदेश में कला एवं संस्कृति विभाग के सचिव प्रणव कुमार ने लिखा है कि स्मारिका इस सांस्कृतिक विरासत को शब्दों और दस्तावेजों के रूप में संरक्षित करने की दिशा में एक सराहनीय पहल है। इसमें जिउतिया की परंपरा, दाउदनगर की सांस्कृतिक पहचान और लोक जीवन से जुड़े विविध पक्षों का संकलन आने वाली पीढियों के लिए महत्वपूर्ण सांस्कृतिक धरोहर के रूप में उपयोगी होगी। इसी विभाग की अपर सचिव श्रीमती रूबी ने लिखा कि यह आयोजन हमारी लोक परंपराओं, लोक कला एवं सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण, संवर्धन और नई पीढ़ी तक उनका स्थानांतरण की दिशा में एक सराहनीय पहल है। ऐसे आयोजन हमारी सांस्कृतिक जड़ों को मजबूत करने के साथ-साथ लोक कलाकारों को अपनी कला के प्रदर्शन का अवसर के प्रदान करते हैं। स्मारिका की संरक्षक जिला पदाधिकारी अभिलाष शर्मा ने लखा कि जितिया का उत्कर्ष नाम से प्रकाशित स्मारिका का प्रकाशन किया जा रहा है। जितिया पर्व हमारी समृद्ध लोक परंपरा, आस्था, मातृ स्नेह एवं पारिवारिक मूल्यों का जीवन प्रतीक है। यह पर्व हमारी लोक संस्कृति की उन परंपराओं को अभिव्यक्त करता है जो पीढ़ी दर पीढ़ी समाज को अपनी संस्कृति से जोड़े रखने का कार्य करती है। दाउदनगर के ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक धरती पर जिउतिया लोक उत्सव का आयोजन हमारे लोक विरासत को संरक्षित, संवर्धित एवं नई पीढ़ी तक पहुंचने की दिशा में एक ठोस पहल है। इस अवसर पर प्रकाशित की जा रही स्मारिका भी इस आयोजन की सांस्कृतिक स्मृतियों, लोक परंपराओं एवं क्षेत्र के समृद्ध विरासत को समझने का महत्वपूर्ण माध्यम बनेगी। आशा है कि यह आयोजन लोक कलाकारों, साहित्यकारों एवं कला संस्कृति से जुड़े प्रतिभाओं को प्रोत्साहित करने के साथ-साथ हमारी सांस्कृतिक विविधता और सामाजिक समरसता को भी सुदृढ़ करेगा।



लोक संस्कृति के आयाम को बताता है आलेख 

स्मारिका में उपेंद्र कश्यप द्वारा प्रकाशित आलेख -”लोक संस्कृति के आयाम का समुच्चय है जिउतिया संस्कृति”- में इसके धार्मिक, सांस्कृतिक, पारंपरिक और कलात्मक पहलुओं को बखूबी बताया गया है। इसके साथ-साथ यह बताया गया है कि दाउदनगर में जिउतिया के अवसर पर प्रस्तुत कलाओं में लोक संस्कृति के सभी आयामों की प्रचुरता में उपलब्धता है। यह भी बताया गया है कि दाउदनगर की जिउतियां संस्कृति का जुड़ाव महाराष्ट्र की संस्कृति से कैसे है। लोक साहित्य, लोक कला, लोक विज्ञान और लोक व्यवहार के निकट पर दाउदनगर की जिउतिया लोक संस्कृति को परखने की कोशिश उनके आलेख में मिलती है। स्मारिका यह भी बताती है कि दाउदनगर की जिउतिया के कलाकार आखिर ज्ञानचंद उस्ताद समेत अन्य उस्तादों का जयकारा क्यों लगाते हैं। आलेख यह भी बताता है कि जीमूतवाहन के मंदिर में ओखली क्यों रखे जाते हैं, और महिलाएं जो सोने चांदी की जितिया पहनती हैं वह नाव आकार का ही क्यों होता है।











 #SDM_Daudnagar #AmitRajan #जिला_कला_संस्कृति_पदाधिकारी #KumarPappuRaj

 #जीमूतवाहन_गोसांई की जय ◆

■ #जिउतिया_लोकोत्सव
#vivekanand_mission_school_daudnagar 

#नगर_परिषद_दाउदनगर 
#artandculture_bihar #pramodsinghchandravanshi #ministryofartandcluture_bihar

#upendrakashyap_and_sons_jewellers_daudnagar #daudnagarnews #facebookviral #fpy #facebookpost #जिउतिया #जितिया #jitiya #jitiya_daudnahar #jiutiya_daudnagar #jitiya_lokotsav_daudnagar #daudnagar_jitiya_lokotsav #jiutiya_lokotsav #jitiya_daudnagar #UpendraKashyap_Jitiya
#Jitiya_UpendraKashyap








Friday, 2 October 2026

जिउतिया लोकोत्सव : प्रशासनिक पहल से जगी बड़ी अपेक्षा

 



डॉ. शम्भू शरण सिंह

जिउतिया, जितिया या जीवित्पुत्रिका व्रत हिंदू माताएं अपनी संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और मंगल कामना के साथ करती हैं। बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, बंगाल और नेपाल के क्षेत्रों में यह कठिन साधना वाला पवित्र निर्जला व्रत श्रद्धा, आस्था, विश्वास के साथ मनाया जाता है। गंधर्व राज जीमूतवाहन को समर्पित यह व्रत नहाय खाय से आरंभ होकर मुख्य निर्जला उपवास और फिर पारण के साथ संपन्न होता है। भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के वैविध्य की स्वर्णिम कड़ी में यह पर्व विक्रम संवत के आश्विन माह के कृष्ण पक्ष के सातवें से नौंवे चंद्र दिवस तक मनाया जाता है। सांस्कृतिक विविधता के अनोखे विरासत की कड़ी में हिंदू या सनातन समुदाय पर्व त्योहार की समृद्ध परंपरा को बदलते जीवन परिदृश्य में भी संजोए रखा है।

 ऐसी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत की स्वर्णिम कड़ी में श्रद्धा के साथ संपन्न होने वाला जितिया पर्व विभिन्न भौगोलिक परिवेश में विभिन्न स्वरूप में जीवंत है। औरंगाबाद जिला के दाउदनगर कस्बे के जितिया पर्व की तस्वीर सिर्फ श्रद्धा, विश्वास और उपवास तक सीमित नहीं है। दाउदनगर जो औरंगाबाद या यूं कहें पुराने गया जिला का नगर पालिका क्षेत्र के रूप में बिहार के मानचित्र पर देदीप्यमान नक्षत्र की तरह स्थापित यह नगर सोनभद्र की सोंधी माटी में कला, कौशल, साहित्य, संस्कृति की खुशबू घोलता रहा है। ऐसी ही सांस्कृतिक कौशल का जीवंत स्वरूप दाउदनगर की पावन धरा पर जीतिया पर्व के अवसर पर पूरे सप्ताह भर अभिव्यक्त होता है। शहर का कोना-कोना नकल अभिनय और आश्चर्यचकित कर देने वाली अनोखी प्रस्तुतियों का गवाह बनता है। साक्षी होता है। हंसी- मजाक, व्यंग-हास्य-विनोद, गीत, संगीत, नृत्य-रोमांच से स्पंदित दाउदनगर का जनजीवन गतिमान रहता है। जितिया के इस अनोखे पुरातन विरासत की कड़ी में शहर में बने चार चौक कसेरा टोली, पटवा टोली, बाजार चौक और पुराना शहर चौक पर स्थापित जीमूतवाहन भगवान की पूजा धूमधाम से होती है। दूसरी ओर अभिनय की बहुरंगी छटा से शहर स्पंदित रहता है। भारतीय संस्कृति के विविध भावों की अभिव्यक्ति वाली अभिनय प्रस्तुतियां न केवल विरासत को अक्षुण्ण रखती हैं, वरन जमाने से चली आ रही परंपरा में बसी सोंच, समझ, चिंतन, कला, कौशल की समृद्ध कड़ी को अभिव्यक्त करती हैं। 

दाउदनगर शहर में मैं शिक्षा के माध्यम से समाज को संवारने हेतु 1997 के जनवरी माह में आया। विवेकानंद स्कूल आफ एजुकेशन की स्थापना के साथ ही स्थाई रूप से दाउदनगर का निवासी हो गया। शहर के शैक्षिक, सांस्कृतिक परिदृश्य को तब से बहुत करीब से और जुड़ कर देखा, समझा और थोड़ी-थोड़ी भूमिका का निर्वहन भी किया। जितिया पर्व के इतिहास, भूगोल विरासत और परंपरा के संबंध में ज्ञान उपेंद्र कश्यप जो संप्रत्ति पत्रकारिता के क्षेत्र के जीवंत नक्षत्र हैं के साथ संवाद के क्रम में हुआ। उनकी ही पहल पर विभिन्न जितिया पर्व से जुड़े संगठनों के साथ सहभागिता भी की और कई बार अभिनय जैसी प्रस्तुतियों के लिए कुछ योगदान भी किया। जितिया पर आम अवाम के ज्ञान को समृद्ध बनाने में उपेंद्र कश्यप का योगदान महत्वपूर्ण है। उनके द्वारा प्रकाशित उत्कर्ष, श्रमण संस्कृति का वाहक-दाउदनगर- जितिया के अनोखे पहलुओं पर सार्थक और ज्ञानवर्धक सामग्री उपलब्ध कराते हैं। ऐसे ही प्रयासों का प्रतिफल है कि दाउदनगर के जितिया पर्व को राज्य के सांस्कृतिक कैलेंडर में स्थान मिला और इस वर्ष जितिया महोत्सव मनाने की सरकारी स्तर पर पहल हुई। विश्वास किया जा सकता है कि सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और संवर्धन को बड़ा मंच सरकार के प्रयास से मिलेगा। जितिया पर्व के अवसर पर प्रस्तुत किए जाने वाले अनोखे कला कौशल, हास्य, अभिनय को सरकार के स्तर से पटना के गांधी मैदान में प्रस्तुत की जाने वाली झांकियों में शामिल करने हेतु भी प्रशासनिक स्तर से प्रयास की अपेक्षा है। वर्तमान में जिले की प्रशासनिक टीम और ऊर्जावान अनुमंडल पदाधिकारी, नगर परिषद के स्तर से और इसमें जन भागीदारी से इसे और बड़ा मंच उपलब्ध कराने का प्रयास होना ही चाहिए। जितिया पर्व के इस पावन अवसर पर अनुमण्डल अधिकारी के सदप्रयास का अभिनंदन, वंदन।


डॉ शम्भू शरण सिंह

एम ए (डबल) गोल्ड मेडलिस्ट, सेवा निवृत्त प्रोफेसर, संस्थापक निदेशक, विवेकानंद ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशंस



◆  दाउदनगर जिउतिया लोकोत्सव 2026  #SDM_Daudnagar #AmitRajan #जिला_कला_संस्कृति_पदाधिकारी #KumarPappuRaj #जीमूतवाहन_गोसांई की जय ◆


■ #जिउतिया_लोकोत्सव

#vivekanand_mission_school_daudnagar 


#नगर_परिषद_दाउदनगर 

#artandculture_bihar #pramodsinghchandravanshi #ministryofartandcluture_bihar


#upendrakashyap_and_sons_jewellers_daudnagar #daudnagarnews #facebookviral #fpy #facebookpost #जिउतिया #जितिया #jitiya #jitiya_daudnahar #jiutiya_daudnagar #jitiya_lokotsav_daudnagar #daudnagar_jitiya_lokotsav #jiutiya_lokotsav #jitiya_daudnagar #UpendraKashyap_Jitiya

#Jitiya_UpendraKashyap


Thursday, 17 September 2026

जिउतिया लोकोत्सव के लिए सरकार ने दिए तीन लाख लेकिन..

 


नगर परिषद में प्रथम दिन प्रशासनिक आयोजन 

बाद के तीन दिन का कार्यक्रम नप के जिम्मे

निबंधन कराये कलाकारों को ही मिलेगा आर्थिक लाभ 

उपेंद्र कश्यप

नबिटा संवाददाता 

दाउदनगर (औरंगाबाद) । मुख्य पार्षद अंजली कुमारी के प्रयास से पहली बार सरकार ने जिउतिया लोक उत्सव के लिए तव्वन लाख रुपये की राशि आवंटित किया है। लेकिन राशि आवंटित होने के साथ ही कई मुश्किलें और समस्याएं भी सामने खड़ी हो गई है। राशि मिलते ही सवाल खड़ा हुआ है कि इस राशि को खर्च कौन करेगा, कैसे और किस मद में खर्च करेगा। इसमें प्रशासन और नगर निकाय की भूमिका क्या होगी। इस प्रश्न के जवाब में मुख्य पार्षद अंजली कुमारी ने कहा कि यह कला संस्कृति पदाधिकारी बताएंगे। कला संस्कृति पदाधिकारी पप्पू कुमार बताते हैं कि नगर परिषद में पहले दिन का आयोजन प्रशासनिक स्तर पर होगा। शेष तीन दिन का आयोजन नगर परिषद करेगा। पहले दिन जो कार्यक्रम होगा उसमें जिला पदाधिकारी के स्तर से जनप्रतिनिधियों को आमंत्रित किया जाएगा। यानी जिले के सभी सांसद, विधायक, विधान परिषद सदस्य, और अन्य


जनप्रतिनिधियों को आमंत्रित किया जाएगा। इस दिन जो कला प्रस्तुतियां होंगी। कुल प्रस्तुतियों में चयनित प्रतिभागियों को पुरस्कृत करने की जिम्मेदारी नगर परिषद की नहीं बल्कि प्रशासनिक महकमे की होगी। समस्या यह आएगी कि बिहार सरकार की कला संस्कृति विभाग के वेबसाइट पर जो निबंधित कलाकार होंगे, सिर्फ वे ही इस आयोजन का लाभ ले सकते हैं। पहली बार इस तरह का अनुभव दाउदनगर को होगा। इसका भविष्य में क्या नफा नुकसान स्थानीय संस्कृति के संदर्भ में होगा यह आकलन करने में वक्त लगेगा।


नई पीढ़ी तक पहुंचेगी विरासत


नगर परिषद की मुख्य पार्षद अंजली कुमारी ने इस प्रसंग में कहा कि राशि का आवंटन होना दाउदनगर वासियों के लिए हर्ष और गौरव का विषय है। यह राशि हमारे पारंपरिक लोक उत्सव को और भव्य एवं व्यवस्थित रूप देने में सहायक होगी तथा हमारी सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।



#upendrakashyap_and_sons_jewellers_daudnagar #daudnagarnews #facebookviral #fpy #facebookpost #जिउतिया #जितिया #jitiya #jitiya_daudnahar #jiutiya_daudnagar #jitiya_lokotsav_daudnagar #daudnagar_jitiya_lokotsav #jiutiya_lokotsav #jitiya_daudnagar #UpendraKashyap_Jitiya #Jitiya_UpendraKashyap






Saturday, 12 September 2026

क्षेत्र को चमन बनाने के लिए चाहिए सिर्फ रोशनी

 



मुख्यपथ से सिपहां और बम रोड तक चाहिए स्ट्रीट लाइट 

बीमार, तीमारदार, लोगों के लिए आवश्यक रास्ता

नबिटा संवाददाता 

दाउदनगर (औरंगाबाद) । दाउदनगर बाजार से भखरुआं जाने वाले मुख्य पथ स्थित मौला बाग से नहर के किनारे उत्तर और दक्षिण दिशा में अगर स्ट्रीट लाइट लग जाए तो यह इलाका चमन बन जाएगा। फिलहाल नहर के किनारे का यह मार्ग अंधेरे में डूबा हुआ है। लोगों को इस रास्ते आने जाने में डर लगता है, जबकि यह प्रमुख मार्ग है। अपराध की घटनाओं के डर के कारण लोग इस रास्ते अंधेरा में आना-जाना नहीं पसंद करते हैं। दूसरी तरफ सुखा नशा करने वालों से भी डर बना रहता है, जबकि सिपहां मार्ग में नर्सिंग कॉलेज और अनुमंडल अस्पताल जैसे प्रमुख संस्थान है। जहां देर रात लोगों की आवाजाही आवश्यक मजबूरी होती है। इसी रास्ते में प्रखंड सह अंचल समेत कई प्रखंड स्तरीय कार्यालयों का एक दरवाजा भी है। ऐसे में इस रास्ते में स्ट्रीट लाइट लगाए जाने की आवश्यकता महसूस होती है। दूसरी तरफ बम रोड की तरफ भी आबादी बस गई है। इधर आवागमन होते रहता है। अगर इस हिस्से में स्ट्रीट लाइट लगा दी जाए तो लोग भय मुक्त होकर आवागमन कर सकेंगे। सुबह और शाम की तफरीह कर सकेंगे। जिससे लोग स्वास्थ्य लाभ ले सकेंगे। 


योजना लेकर होगा क्षेत्र रौशन- डॉ. प्रकाशचंद्र

इस संबंध में इस संवाददाता ने विधायक डॉ प्रकाश चंद्र को प्रस्ताव दिया तो उन्होंने कहा कि योजना लेकर काम कराया जाएगा। दोनों रास्तों को जगमग रोशन किया जाएगा। संसाधनों की उपलब्धता के आधार पर काम किया जाएगा। 



प्रदूषण मुक्त क्षेत्र, मरीज को जरूरत


नव ज्योति शिक्षा निकेतन के निदेशक नीरज कुमार गुप्ता कहते हैं कि ओबरा विधायक डॉ प्रकाश चंद्र का स्वभाव ऐसा है कि वे इस काम को अवश्य करेंगे। अगर रोशनी लग जाती है तो लोगों के अंदर का डर खत्म हो जाएगा। लोग निर्भीक होकर शाम में घूम सकेंगे। शहर में बहुत बड़ी आबादी ऐसी है जो सुबह की जगह शाम को ही स्वास्थ्य लाभ के लिए तफरीह कर पाती है। इस रास्ते अनुमंडल अस्पताल जाने वाले मरीज और तीमारदार को भी लाभ होगा। 



स्वस्थ समाज बनाने के लिए जरूरी काम 

एलआईसी के अभिकर्ता अवधेश पांडेय कहते हैं कि लोगों को स्वास्थ्य लाभ मिले इसके लिए क्षेत्र का चयन कर उसे विकसित किया जाना आवश्यक है। विधायक अगर इस हिस्से में रोशनी की व्यवस्था कर देते हैं तो लोग सुबह शाम की तफरीह निर्भीक होकर कर पाएंगे। जिससे लोग स्वस्थ होंगे। इससे समाज और शहर दोनों स्वस्थ होगा और इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।

Thursday, 10 September 2026

सत्य निकेतन नहीं, सत्ता-सरकार की इमारत गिरी

 




टेढ़ी पालिटिक्स




दिल्ली में बिल्डिंग नहीं गिरी, भ्रष्टाचार की पोल खुली


डॉ. उपेंद्र कश्यप

वरिष्ठ लेखक व पत्रकार


दिल्ली में सत्य निकेतन बिल्डिंग गिर गई। आधे दर्जन लोगों की मृत्यु हो गई। राजनीति गर्मा गई। प्रशासन भवन मालिक को इसका दोष देकर उसके खिलाफ करवाई करने पर उतारू है। सवाल है कि क्या मकान मालिक ही सिर्फ दोषी है? क्या वास्तव में सत्य निकेतन गिरा है या फिर सत्ता सरकार का इकबाल गिरने का यह परिणाम है? क्या सत्ता प्रतिष्ठान अगर ईमानदारी से कम करे तो ऐसी घटनाएं होती रह सकती हैं? ऐसी घटनाएं पहले भी दर्जनों बार हुई है और आगे भी होंगी और ऐसे ही घटना क्यों सिर्फ बिल्डिंग गिरने से मौतें थोड़े ही होती हैं, भवनों में आग लगने से भी मौतें होती रही हैं। सवाल है कि इसका उपाय क्या है? क्या वास्तव में सत्ता प्रतिष्ठान कभी ऐसी घटनाएं न हो इसका ठोस उपाय करना चाहती हैं? ऐसी घटनाओं पर रोक लगे इसे लेकर क्या सरकारें कभी दृढ़ निश्चायी रही हैं, नहीं। दरअसल यह सत्य निकेतन नाम का एक बिल्डिंग गिरने और उससे कई मौतें हो जाने भर का बस मामला नहीं है। बिल्डिंग गिरती है तब भी भ्रष्टाचार होता है और बिल्डिंग में आग लगती है तब भी भ्रष्टाचार का ही वह परिणाम होता है। भ्रष्टाचार को समझने की जरूरत है। भ्रष्टाचार कैसे इन मौतों की जिम्मेदार होती है? भारत में शायद ही कोई ऐसा उदाहरण है कि जब भवन बन रहा हो और उसके निर्माण में धांधली ना हो। भले ही वह कोई एजेंसी करे, सरकार बनाए या व्यक्तिगत निर्माण ही क्यों ना हो। सक्षम अथॉरिटी से ना तो बिना रिश्वत के नक्शा पास होते हैं ना निर्माण की स्वीकृति मिलती है। न ही भवन बन जाने के बाद ऑडिट करने वाली संस्थाएं भौतिक सत्यापन करती हैं। वह बिना भौतिक सत्यापन किये ही, या कभी-कभी संबंधित भवन में भौतिक रूप से अधिकारी उपस्थित होकर भी सीधे निबंधन नियमितीकरण के लिए रिश्वत मांगते हैं। बिना रिश्वत लिए भवनों का निबंधन नियमितीकरण होता ही नहीं है। अब कोई ईमानदार हो और ऐसा वास्तव में बिना रिश्वत लिए पूरी तरह भौतिक सत्यापन करके एनओसी करता हो तो यह अद्भुत संयोग हो सकता है। भवनों में आग लगने पर मौतें ना हो इसके लिए अग्निशमन विभाग द्वारा जांच कर एक योजना के तहत सुरक्षा उपकरण लगाए जाते हैं, शायद ही कोई ऐसा भवन होगा और अग्निशामालय का अधिकारी जहां रिश्वतखोरी ना होती हो। बिना रिश्वत लिए किसी भवन का अग्निशमन विभाग एनओसी नहीं देता। भवनों में बिना गए, बिना देखे, बिना निरीक्षण किये अग्निशामालय विभाग के अधिकारी मोटी रकम लेकर एनओसी देते हैं, यह खुला सच है। कभी कभी बड़े पैरवी, सामने वाले कि पहुंच व दबंगता के भय भी वजह होती है। लेकिन इस पर नियंत्रण नहीं किया जाता। सरकार इस दिशा में विचार नहीं करती और इसीलिए भवन गिरते हैं। मौतें होती हैं। 


अगर वास्तव में सरकारी चाहती है, चाहे वह केंद्र की सरकार हो या राज्य की, कि किसी भवन में आग लगने से मौत ना हो, कोई भवन ध्वस्त ना हो, उसके गिरने से मौत ना हो तो उसके लिए जिम्मेदारी तय करनी होगी। संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय करनी होगी। ऐसा करना बहुत मुश्किल वाला या बड़ा काम नहीं है, जिसे किया नहीं जा सकता। बस सत्ता प्रतिष्ठानों के दृढ़ निश्चायी होने भर का मामला है। यह कानून होना चाहिए कि अगर कोई भवन ध्वस्त होता है, किसी भवन में आग लगती है, जैसे सत्य निकेतन का ही मामला ले लें बतौर उदाहरण तो, सत्य निकेतन भवन का निर्माण क्या नक्शा के अनुसार हुआ है, क्या उसमें आग लगने, भुकंप आने पर ध्वस्त होने से मौत न हो इसके सुरक्षा उपाय मानक के अनुरूप हैं, इसकी जांच होनी चाहिए। अगर इसमें कमी पाई जाती है तो नक्शा पास करने वाले (अगर वह सेवानिवृत्त हो गया हो तो उसके पेंशन से, उसकी अर्जित संपत्ति से) से, उसके निर्माण में गड़बड़ी होने या रहने के बावजूद भवन को असुरक्षित घोषित न करने वाले जिम्मेदार अधिकारी, अग्नि सुरक्षा के लिए ज़िम्मेदार अधिकारी अर्थात निबंधन नियमितीकरण दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने वाले अधिकारी पर हत्या का मुकदमा दर्ज हो और जितनी भी क्षति हुई उसकी भरपाई उनके वेतन से किया जाए। यह संवैधानिक व्यवस्था होनी चाहिए। जब ऐसा होगा तो तय जानिए भविष्य में कभी भी बिल्डिंग नहीं ध्वस्त होगी, आग नहीं लगेगी, ऐसी घटनाओं में होने वाली मौत टाली जा सकेंगी। रिश्वत लेकर गलत होने के बावजूद सही लिखने, बताने वाले अधिकारी अधिक दोषी हैं, बनिस्पत मकान मालिक के।  जब ऐसे नियम बनेंगे, ऐसी कानूनी व्यवस्था होगी तो पैसा लेना तो छोड़िए मांगेंगे भी नहीं अधिकारी। यह नियम होना चाहिए कि अगर नियमितीकरण के लिए कोई मकान मालिक आवेदन देता है तो उसे 15 दिन या 30 दिन के अंदर (जो भी प्राविधान हो) संबंधित अथॉरिटी को लाइसेंस के नियमितीकरण का मामला निपटाना होगा। कारण बता कर उसे खारिज करे या स्वीकार करे। ऐसा होने पर रिश्वत लेनदेन का मामला कम होगा। अगर कोई रिश्वत के लिए जबरदस्ती कोई कमी निकाले तो उस तरह के अधिकारी के खिलाफ भी सख्त कार्रवाई का प्रावधान होना चाहिए। जब तक अधिकारी ब्लैकमेल करते रहेंगे, पैसे लेकर निबंधनों का नियमितीकरण करते रहेंगे, भवन गलत तरीके से बनते रहेंगे, तब तक ऐसे हादसे होते रहेंगे और मकान मालिकों को पकड़ कर जेल भेज देने से कोई समस्या का समाधान नहीं होगा। यह लिखने का उद्देश्य सही मुद्दे उठाना, सत्ता को स्थिति का भान कराना और भविष्य में ऐसी दुर्घटना ना हो यह तय करवाना है ना कि किसी मकान के मालिक को बचाना या उसका पक्ष रखना।


 (लेखक का निजी विचार है)

#satyaniketan #DelhiNews #upendrakashyap_and_sons_jewellers_daudnagar #upendrakashyap #Decode #Delhi_Building_Collapse_Satya_Niketan #Delhi_Building_Collapse #satya_niketan_delhi

#सत्यनिकेतन #satyaniketan

















Wednesday, 2 September 2026

रामबिलास सिंह की प्रतिमा लगाने का एमएलए ने दिया भरोसा

 


यदुवंशी संवाद में लोगों ने उठाया मुद्दा

बड़े जलसा के साथ होगी प्रतिमा प्रतिस्थापित

नबिटा संवाददाता

दाउदनगर (औरंगाबाद) ।

भगवान प्रसाद शिवनाथ प्रसाद बीएड कॉलेज में सोमवार को आयोजित यदुवंशी संवाद कार्यक्रम में कई वक्ताओं ने पूर्व मंत्री रहे रामबिलास सिंह की प्रतिमा जिला मुख्यालय में लगाने की मांग की। कहा गया कि उनकी प्रतिमा ‘कारा में बंद’ कर रखा जाना दुर्भाग्यपूर्ण है। ऐसी मांगों पर विधायक डॉ. प्रकाशचंद्र ने आश्वस्त किया कि प्रतिमा पुनर्स्थापित की जाएगी। कार्यक्रम के दौरान पूर्व विधायक सत्यनारायण सिंह ने इस मुद्दे को उठाते हुए विधायक के इशारे पर कहा कि प्रतिमा स्थापित होगी। हम डॉ. प्रकाशचंद्र की ताकत जानते हैं। पीछे हम खड़ा हैं ही। पूर्व अध्यक्ष राजद ओबरा इंदल यादव व पूर्व जिप सदस्य संजय सिंह सोम ने जिला मुख्यालय में रामबिलास सिंह की प्रतिमा न लग सकने का मुद्दा उठाया। श्री सोम ने कहा कि बड़े जलसा के साथ उनकी प्रतिमा लगेगी। यह दुर्भाग्य है कि कारा मंत्री रहे रामबिलास बाबू की प्रतिमा कारा में बंद है। कहा गया कि सर्वाधिक संख्या में यादव समाज के जिला परिषद के सदस्य हैं, इसके बावजूद ऐसी स्थिति होना दुर्भाग्यपूर्ण है। इंदल या

दव ने बताया कि दिशा की बैठक समेत हर अवसर पर डॉ. प्रकाशचंद्र ने इस मुद्दे को उठाया। प्रतिमा स्थापित करना इनका लक्ष्य है। इस आयोजन के बाद स्व.रामबिलास सिंह की प्रतिमा लगने की उम्मीद जगी है। 


क्या है प्रतिमा को ले विवाद


औरंगाबाद का दानी बिगहा पुराना बस स्टैंड सह-व्यावसायिक परिसर है। इसी के एक हिस्से में पहले से सत्येंद्र नारायण सिन्हा पार्क और उनकी प्रतिमा लगी है। 08 जनवरी 2023

 को जिला परिषद की सामान्य बैठक में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित हुआ था। 06 नवंबर 2024 को समर्थकों ने परिसर में बने फाउंडेशन पर रामबिलास बाबू की आदमकद प्रतिमा स्थापित कर दी।   0 8 नवंबर 2024 की रात तत्कालीन उप विकास आयुक्त अभ्येंद्र मोहन सिंह के आदेश पर प्रशासन ने प्रतिमा को हटाकर नगर थाना में रखवा दिया।   

12 नवंबर 2024 को जिला पार्षदों और "विरासत बचाओ संघर्ष परिषद" ने प्रेस वार्ता कर 15 दिन में प्रतिमा यथास्थान लगाने का अल्टीमेटम दिया। लेकिन मामला लटका ही रह गया। 




जानिए कौन थे रामविलास सिंह 

स्व.राम बिलास सिंह 1967, 1972, 1977, 1985 और 1990 में विधायक बने। वह दाउदनगर हसपुरा और दाऊद नगर ओबरा विधानसभा क्षेत्र से विधायक रहे। तीन बार मंत्री बने। वे समाजवादी नेता रहे। उन्होंने इस संवाददाता से 11 अप्रैल 2009 को बातचीत में बताया था कि अपना पहला चुनाव मात्र 3000 रुपये में लड़े थे और 1990 के चुनाव में मात्र छः से सात हजार रुपये खर्च कर विधायक बने थे। उन्होंने कहा था कि सामाजिक एवं आर्थिक सुधार के बिना समाज नहीं बदल सकता। 


Saturday, 29 August 2026

संसद, संविधान व बहुसंख्यक को ठेंगा दिखा रहे राहुल




(टेढ़ी पॉलिटिक्स)


वंदेमातरम और मनुस्मृति को लेकर जो स्टैंड राहुल गांधी और कांग्रेस ने लिया है वह संसद और संविधान की सर्वोच्चता के साथ बहुसंख्यकों की भावना को ठेंगा दिखाने के समान है। दरअसल में ‘सर तन से जुदा करने’ और “छह इंच छोटा करने” वाले समूह इनके साथ खड़े हैं, तब भी इनका डर उन्हें तटस्थ नहीं होने देता। दूसरी तरफ बहु संख्यक समाज की ओर से ऐसे हमले ना होने का विश्वास ऐसे नेताओं को उच्छृंखलता की हद तक निर्भिक बनाता है। इस पूरे संदर्भ में एक विश्लेषण- डॉ. उपेंद्र कश्यप का।)


डॉ. उपेंद्र कश्यप

वरिष्ठ लेखक व पत्रकार

मो.नं.-9931852301

ईमेल- upendrakashyapdnr@gmail.com 


संवैधानिक प्रविधान होने के बावजूद वंदे मातरम के सभी छह छंद गाने से स्पष्ट तौर पर इंकार करने और छात्रों की गूंज कार्यक्रम में सर से पांव तक ढकी मुस्लिम महिला के सामने ही मनुस्मृति के हवाले से हिंदू महिला प्रताड़ना की बात कर राहुल गांधी एक बार फिर भाजपा के पीच पर बैटिंग कर बैठे। हर हाल में इन दोनों मुद्दों का लाभ भाजपा और उसके गठबंधन साथियों को मिलेगा। जबकि इसका राजनीतिक नुकसान हर हाल में कांग्रेस और उसके गठबंधन में शामिल दलों को होगा। यह स्पष्ट है। दूसरे मुद्दे इसकी भरपाई कर जाएं तो बात और होगी। दरअसल इन दोनों मुद्दों को जिस तरह से कांग्रेस और राहुल गांधी ने सामने रखा उससे एक बात स्पष्ट हो गई है कि पार्टी हो या व्यक्ति, दोनों ही मुस्लिम परस्त हैं। इसके प्रमाण के तौर पर यह भी देखें कि 2014 के लोकसभा चुनाव में बुरी तरह हारने और उसके बाद एके एंटनी की रिपोर्ट सामने आने के बावजूद कांग्रेस सबक सीखने को तैयार नहीं दिखती। वह मुस्लिम तुष्टिकरण करने और हिंदू परंपराओं को चोटिल करने के मौके से बाज आने को तैयार कतई नहीं है। 


वर्ष 2014 के चुनाव परिणाम को अगर देखें तो वैश्विक स्तर पर इस्लामिक स्टेट धार्मिक कट्टरता के कारण नारंगी कपड़ा पहनकर लोगों की गर्दन रेत रही थी, पिंजरे में बंद कर जलाकर मार दे रही थी, जिससे पूरे विश्व में खौफ पैदा हो गया था। कट्टरपंथ को लेकर विश्व चिंतित था, उस बीच भारत में मनमोहन सरकार के कुछ मुस्लिम परस्त निर्णय सामने आए और लोगों को यह लगा कि कांग्रेस न सिर्फ मुस्लिम परस्ती में व्यस्त है बल्कि उसे किसी भी स्तर पर हिंदू और सनातन परंपराओं को अपमानित करने से परहेज नहीं है। नतीजा वराह 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा अकेले बहुमत से अधिक कुल 282 सीट जीती तो कांग्रेस मात्र 44 पर सिमट गई। पार्टी ने अपने ही वरिष्ठ नेता एके एंटनी के नेतृत्व में चुनावी हार की समीक्षा के लिए कमेटी का गठन किया। कमेटी ने अपने रिपोर्ट में बताया कि कांग्रेस की इस सबसे बुरी हार की वजह मुस्लिम परस्त और हिंदू विरोधी होना प्रमुख कारण है। हालांकि इसके बावजूद कांग्रेस और उसके नेताओं पर कोई असर नहीं पड़ा। हार की जो सबसे बड़ी वजह एंटनी ने बताएं उसे ही खारिज कर दिया। उसी रास्ते पर तक चलते रहे। नतीजा 2019 में भाजपा 303 और कांग्रेस 52 सीट जीती। कांग्रेस ने फिर सॉफ्ट हिंदुत्व का रास्ता अपनाया और जनहित से जुड़े मुद्दों को उठाना शुरू किया। संविधान बदलने की एक भाजपा नेता के बयान को चुनाव में हथियार की तरह संविधान लहराते हुए राहुल ने इस्तेमाल किया। तब 2024 में भाजपा को 240 सीटों पर रोकने में कामयाबी मिली और कांग्रेस को 99 सीट मिली। माना गया कि कांग्रेस को मुस्लिम परस्ती और हिंदू सनातन विरोध की बात छोड़कर लगातार आगे बढ़ते रहने से कामयाबी मिलेगी। लेकिन राहुल इस बात को भूल जाते हैं। क्योंकि उसके जिन में ही जैसे सनातन विरोध, हिंदू विरोध और मुस्लिम परस्ती की बीमारी समा गई है। कांग्रेस कहती है कि वह अपने कार्यक्रमों में वंदे मातरम के दो छंद ही गायेगी, तो सीधा-सीधा वह संसद द्वारा बनाए गए संविधान ना मानने का उदंडता से ऐलान करती है। जिसे कोई भी भारतीय स्वीकार नहीं करेगा। जब यह कानून बन रहा था तब सदन में विरोध न करने वाली कांग्रेस अब इसका विरोध कर रही है तो स्वाभाविक है कि वह मुस्लिम परस्ती के मामले में तनिक भी उदार नहीं दिखना चाहती है। छात्रों के गूंज कार्यक्रम में सर से पांव तक लबादा ओढ़ी युवती के सामने मनुस्मृति का हवाला देकर जो बात राहुल ने कही वह भी इसी का उदाहरण है। तमाम इस्लामिक देशों में ही नहीं बल्कि इस्लाम के मानने वाले इक्के दुक्के लोगों को छोड़कर तमाम आबादी में व्यवहारिक जीवन में अमल में लाने वाली किताबी बात पर चर्चा करने का साहस न रखने वाले कांग्रेसी उस मनुस्मृति के एकाधिक श्लोक की चर्चा करते हैं जो शायद ही किसी परिवार में माना जाता हो। मनुस्मृति की ऐसी बातें कहीं लागू है, इसके उदाहरण भी नहीं मिलते। किसी भी हिंदू परिवार और समाज में मनुस्मृति लागू नहीं है, और ना ही उसमें कही गई उस बात पर अमल होता है जिसे राहुल लेकर आगे बढ़े। हालांकि मनुस्मृति में जो अच्छी बातें कही गई है इसका उल्लेख राहुल नहीं करते और किसी भी गैर हिंदू धर्म ग्रंथो में उल्लेखित गलत बातों का उल्लेख राहुल या कांग्रेस के नेता नहीं करते। इससे यह साफ संदेश जाता है वह हिंदू और सनातन परंपराओं को अपमानित करने का मौका ढूंढते हैं, अवसर बनाते हैं।


 वह समझते हैं कि ऐसा करने से मुस्लिम उनके साथ चिपका हुआ रहेगा। दूसरी बात यह स्पष्ट है कि दूसरे धर्म को लेकर राहुल ही नहीं कोई भी कांग्रेसी और आई एन डी आई ए के नेता या दल इसलिए चुप रहते हैं कि उनका सर तन से जुदा हो जाने का खतरा है। लेकिन इस पृथ्वी पर अपेक्षाकृत सबसे उदार, सबसे सहिष्णु और सहजीवन में सर्वाधिक विश्वास रखने वाला हिंदू ऐसा नहीं करता। भारत में छह इंच छोट करने वाला और यह बात कह कर गरीबों, कमजोरों को डराने वाला राजनीतिक समूह आई एन डी आई ए का हिस्सा है। सर तन से जुदा करने वाला समूह इसी गठबंधन का हिस्सा है। दूसरे धर्म की कुरीतियों, बुरी बातों, बुरे निर्देशों, खराब परंपराओं, गलत मान्यताओं पर जुबान ना खोलने की कसम खा चुका नेता और दल हिंदुओं को, सनातनियों को अपमानित करते रहता है। इसलिए कि उसे पता है कि हिंदुओं को, सनातनियों को चाहे जितनी गालियां दो, वह न तो तन सर से जुदा करेगा और ना छह इंच छोट करेगा। इसी कारण ऐसे नेता बेखौफ अपमानित करते हैं। थोड़ी देर के लिए मान लें कि मनुस्मृति में पिता ,पति और पुत्र के अधीन स्त्री को रहने की बात कही गई है तो क्या कोई बता सकता है कि मनुस्मृति की यह बात लागू कहां है? कैसे लागू है ?कहां यह अनिवार्य है? जब यह विचार कहीं अनुकरणीय ही नहीं है, कहीं लागू ही नहीं है, कहीं बाध्य नहीं है, कहीं अमल में नहीं है तो फिर इस मुद्दे को बार-बार उठाकर हिंदुओं को अपमानित करने उसे उकसाने के अलावा कौन सा लक्ष्य हासिल हो सकता है? दूसरी तरफ औरतों को लेकर घृणा के स्तर तक बातें कहने वाले धर्म, समुदाय, समूह के साथ खड़े ही नहीं हैं, बल्कि किसी भी तरह के सुधार की बात वहां नहीं की जाती। इसलिए राहुल गांधी एक साथ संसद और संविधान की सर्वोच्चता को खारिज कर रहे हैं तो वहीं दूसरी तरफ मनुस्मृति के बहाने देश की बहुसंख्यक आबादी की भावनाओं को तार तार कर रहे हैं। ऐसी स्थिति में 2027 हो या 2029 में चुनावी जीत का अगर कांग्रेसी और राहुल सपना देख रहे हैं तो शायद हकीकत के सामने आंख मूंद कर खड़े दिखते हैं। 


दरअसल, कांग्रेस लंबे समय से अल्पसंख्यक, सवर्ण और अनुसूचित जाति समूहों को अपने व्यापक गठबंधन का हिस्सा मानती रही है। उससे सवर्ण छिटके, अनुसूचित जाति समूह छोड़ गया। अब सिर्फ सर्वाधिक संख्या में मुस्लिम मतदाता उससे चिपके हुए हैं। कांग्रेस के लिए अभी भी वह महत्वपूर्ण हैं। मुस्लिम वोट खोने का डर उसे सताते रहता है। उसके सामने एक वास्तविक समस्या है। यदि वह मुस्लिम मुद्दों पर बहुत पीछे हटती है तो उसे मुस्लिम मतदाताओं के दूसरी पार्टियों, विशेषकर क्षेत्रीय दलों या एआईएमआईएम की ओर जाने का खतरा है। इसी संदर्भ में कांग्रेस नेताओं की बेचैनी को देखा जाना चाहिए। कांग्रेस की मुस्लिम-केंद्रित राजनीतिक छवि बढ़ने से उसे व्यापक हिंदू मतदाताओं के बीच नुकसान हो सकता है। इससे बेखबर रहना शायद कांग्रेस की आवश्यक विवशता बन गयी है। 



#वंदेमातरम और #मनुस्मृति को लेकर जो स्टैंड #राहुल_गांधी और #कांग्रेस ने लिया है वह #संसद और #संविधान की सर्वोच्चता के साथ बहुसंख्यकों की भावना को ठेंगा दिखाने के समान है। दरअसल में ‘सर तन से जुदा करने’ और “छह इंच छोटा करने” वाले समूह इनके साथ खड़े हैं, तब ही इनका डर उन्हें तटस्थ नहीं होने देता। दूसरी तरफ बहु संख्यक समाज की ओर से ऐसे हमले ना होने का विश्वास ऐसे नेताओं को उच्छृंखलता की हद तक निर्भिक बनाता है। इस पूरे संदर्भ में एक विश्लेषण- डॉ. उपेंद्र कश्यप का।)


संसद, संविधान व बहुसंख्यक को ठेंगा दिखा रहे राहुल,टेढ़ी पॉलिटिक्स

https://mediamartindia.in/%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%b8%e0%a4%a6-%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a7%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%b5-%e0%a4%ac%e0%a4%b9%e0%a5%81%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%96%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%95/


#upendrakashyap_and_sons_jewellers_daudnagar #daudnagarnews #daudnagar #IndianPolitics #indianpoliticians #NarendraModi #rahulgandhi #RahulGandhiForPM #RahulGandhinews #narendramodi_primeminister #टेढ़ी_पॉलिटिक्स #tedhi_politics #Constitution #parliyament #parliyamentofindia #sanatan #VandeMataram #vandematataram