टेढ़ी पॉलिटिक्स :
(वर्ष 2014 के बाद भारत का राजनीतिक परिदृश्य बहुत बदल गया है। अब हिंदू और सनातन को अपमानित करके खुद को बड़ा सेकुलर साबित करने का दिन चला गया। यह विपक्ष को समझना होगा। हिंदू और सनातन हित की बात करने वाले को सांप्रदायिक और दूसरे शर्म के अपराधियों के साथ खड़े रहने को धर्मनिरपेक्ष मनाने का दौर नहीं रहा। आम लोगों के पास सूचनाओं और संवादों का विश्लेषण करने का औजार (मोबाइल) उपलब्ध हो गया है। ऐसे में भारत का हर नागरिक राजनीतिक घटनाओं और बयानों को विश्लेषण करने लगा है। जातीय कारणों से कुछ लोग अत्यधिक मुखर होते हैं और वह कुछ भी सोशल मीडिया पर लिख बोल जाते हैं। लेकिन उनकी संख्या बहुत कम है। यह हमेशा याद रखिए। बड़ी संख्या ऐसी है जो सिर्फ वोटो से जवाब देती है। यही कारण है कि विपक्ष की राजनीतिक नौटंकियां उनको सत्ता से दूर रख रही है। अब नकली धर्मनिरपेक्षता चलने से रही। संसद परिसर में जो कुछ हुआ उस घटना के संदर्भ में एक विश्लेषण :- डॉ.उपेंद्र कश्यप
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लोकसभा परिसर में शनिवार को एक बार फिर सनातन का अपमान करता हुआ सामूहिक रूप से विपक्ष दिखा। जंतर मंतर से उठे आंदोलन में सरकार ने सोनम वांगचुंग और कॉकरोच जनता पार्टी से सरकार के प्रतिनिधि ने लिखित समझौते किया। इसके बाद विपक्षी नेताओं के बीच इसका श्रेय लेने की होड़ दिखी। कांग्रेस और राहुल गांधी इसे पचा नहीं पा रहे थे। इसलिए अमित शाह को टारगेट करने लगे। शनिवार को तो हद ही हो गयी। पप्पू यादव पुजारी बनकर पहुंचे। दान पेटी को देवता बना दिया। खुद बैठ गए और सांसदों से प्रतीकात्मक तौर पर मार खाते रहे। जूते पहन कर राहुल गांधी, धर्मेंद्र यादव और तमाम संसद दान पेटी में दान डालते वीडियो-फोटो बनवाते रहे। राहुल गांधी ने दूसरे संसद से मुफ्त में पैसे लेकर दान पेटी में डाला। डिंपल यादव एवं अन्य दिखे। अखिलेश यादव शायद जानबूझकर कर बचते रहे। अयोध्या से सांसद अवधेश कुमार खड़े रहे। लोग दान देते, पप्पू यादव उनसे झपट कर पैसे ले लेते। इस पूरे नौटंकी में एक बात स्पष्ट दिखी कि इंडी गठबंधन वाले सनातन के अपमान का कोई अवसर नहीं छोड़ते। एक संदेश यह देने की कोशिश भी की गई कि पुजारी पीटे जाने के योग्य है। उन्हें पीटना चाहिए। यानी इंडी गठबंधन के नेता खुद तो नौटंकी कर ही रहे हैं, अपने समर्थकों और कार्यकर्ताओं को भी सनातन के प्रति नफरत का भाव रखने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। पुजारी को मारने पीटने तक की प्रेरणा दे रहे हैं। सनातन का अपमान करने के लिए जानबूझकर किसी ने जूते नहीं उतारे। यहां जो पूरी नौटंकी हुई वह किसी भी सूरते हाल में स्वीकार नहीं हो सकती। हालांकि दूसरा पक्ष यह है कि कुछ समालोचकों का यह मानना है कि ऐसी नौटंकी ही सनातन की शक्ति है। हजारों वर्षों में तमाम प्रकार के आक्रांताओं ने भारत पर हमले किए लेकिन सनातन सुरक्षित रहा। ऐसी राजनीतिक नौटंकियों से सनातन को कोई खतरा नहीं है। बल्कि यही असली ताकत है। दूसरे किताबी या एकेश्वरवादी धर्म परंपरा से सनातन की तुलना करना सनातन को कमजोर बनाना है। जो लोग ऐसी गतिविधियों की आलोचना करते हैं वास्तव में वे सनातन को कमजोर कर रहे होते हैं। यह कहना मूर्खता पूर्ण बात है कि दूसरे धर्म को लेकर ऐसी नौटंकी कोई क्यों नहीं कर पाता। ऐसा करने से सर से जुदा हो जाने का खतरा होता है, इसलिए यह लोग ऐसा नहीं करते। ऐसा करने के पीछे सिर्फ और सिर्फ अपनी जाति और मुस्लिम समुदाय का वोट हासिल करना ही लक्ष्य होता है। ऐसे लोगों को जवाब देते हुए दूसरा दक्षिणपंथी समूह भी है, जिनके तर्क हैं कि ऐसी नौटंकियों को सनातन की शक्ति बताने वाले यह भूल जाते हैं कि गजवा ए हिंद भी अपना आधा लक्ष्य लगभग पूरा कर चुका है। सनातन का अपमान उसकी ताकत नहीं है। यह लोग भूल जाते हैं कि अफगानिस्तान कभी भारत का हिस्सा था। हिंदू बहुत क्षेत्र था। पाकिस्तान और बांग्लादेश का उदाहरण सामने है, जहां से हिंदू साफ हो गए। भारत में डेढ़ सौ लगभग ऐसे जिले बन गए हैं जहां हिंदू अल्पसंख्यक हैं और वे वहां से पलायन करते हैं।
खैर, लोकसभा परिसर में जो नौटंकी की गई, इसको लेकर दक्षिणपंथी समूह और गैर दक्षिणपंथी समूह जिसमें मध्य मार्ग और वामपंथी तक को शामिल आप कर सकते हैं, की सोच अलग-अलग हो सकती है। परस्पर एक दूसरे का विरोध करती हो, लेकिन क्या इस तरह की नौटंकी किया जाना आवश्यक था। क्या इस तरह की नौटंकी से बचा नहीं जा सकता था। ऐसी ही नौटंकियों के कारण विपक्ष इस देश में भाजपा की सरकार और नरेंद्र मोदी- अमित शाह की जोड़ी के खिलाफ राजनीतिक सफलता प्राप्त नहीं कर पा रहा है। और अपनी लगातार हार का ठीकरा इवीएम पर फोड़ते रहता है। 2014 से लगातार चुनाव को अगर देख लें तो विपक्ष का दायरा सिमटता चला जा रहा है। उनके राज्य की सत्ता भी जा रही है और लगभग लगातार विधायक और सांसदों की संख्या भी घटती जा रही है। (वर्ष 2024 के चुनाव परिणाम को अगर अपवाद माने तो) याद करिए 2014 का लोकसभा चुनाव। बुरी तरह हारने के बाद कांग्रेस ने समीक्षा के लिए एके एंटनी के नेतृत्व में एक समिति बनाई थी। उन्हीने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट कहा था कि कांग्रेस की इतनी बुरी हार सिर्फ एक कारण से हुई। वह यह कि- कोंग्रेस हिंदू विरोधी और मुस्लिम परस्त दिखने लगी है। इस आकलन को कांग्रेस ने एक सिरे से खारिज कर दिया। कांग्रेस हो या दूसरे तमाम विपक्षी राजनीतिक दल, उनकी राजनीति अपनी जाति और मुसलमान का वोट लेकर चुनाव जीतने तक सीमित रह गया है। इसीलिए इस तरह की हरकतें उनके तरफ से प्राय: होती हैं। ऐसे में जब दक्षिणपंथी समूह यह सवाल उठाते हैं कि हिंदुओं का, सनातन प्रतीकों का अपमान करना इनका शौक बन गया है, तो बड़ी आबादी को स्वीकार्य हो जाता है। जबकि जैसे ही वक्फ की संपत्ति की बात आती है, मस्जिदों और मदरसों में गड़बड़ी की बात आती है, मुस्लिम अपराधियों की बात आती हज तो उस पर उनके जुबान तक नहीं खुलती। मत भूलिए कि भारत सभी धर्म का सम्मान करने वाला देश है। लेकिन जब लगातार आप किसी एक धार्मिक समूह को टारगेट करते हैं, उसे अपमानित करते हैं, और दूसरे धर्म के साथ तब भी खड़े दिखते हैं जबकि उसे न्यायिक कार्रवाई कर सजा देने की स्थिति रहती है, उनकी बुराइयों पर आप नहीं बोल पाते, उनकी धांधलियों पर चुप हो जाते हैं तो यह साबित हो जाता है कि इस देश की राजनीति में कभी सेकुलर राजनीति नहीं हुई। आजादी के समय से हमेशा छद्म सेक्युलरिज्म हो राजनीति के केंद्र में रही है। इसके दर्जनों उदाहरण भरे पड़े हैं। धर्मनिरपेक्षता की परिभाषा यह बना दी गई कि जो हिंदुओं को, हिंदू धर्म को जितना अधिक अपमानित करेगा वह उतना अधिक सेकुलर होगा। लेकिन जैसे ही कोई हिंदू हित की बात करेगा, सनातन की बात करेगा तो वह सांप्रदायिक है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण इस देश ने देखा है। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सिखों का खुलेआम कत्लेआम किया गया। राजीव गांधी ने कहा कि-जब बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती है। इसे सेकुलर माना, बताया गया। लेकिन जब गुजरात में दंगे के बाद नरेंद्र मोदी ने कहा कि हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती है तो इसे सांप्रदायिक बयान बताया गया।
दरअसल, अब राजनीतिक जागरूकता पूर्व की अपेक्षा अधिक बढ़ी है। लोगों के पास सूचनाएं आ रही हैं। सूचनाओं की पुष्टि का तरीका उनके पास उपलब्ध हो गया हैम संवादों के विश्लेषण का औजार मोबाइल के रूप में अब हर हाथ में उपलब्ध है। इसलिए जनता को बरगलाना अब आसान नहीं रहा। ऐसे में विपक्ष का जो ताजा नाटक हुआ, यह अधिक आत्मघाती साबित होगा। उत्तर प्रदेश में सफलता के लिए लोकसभा परिसर में जो नौटंकी की गई समालोचकों का एक बड़ा वर्ग यह मानता है कि इसका लाभ कम और नुकसान अधिक समाजवादी पार्टी और कांग्रेस को होगा। बहरहाल 2014 के बाद जो राजनीतिक स्थिति इस देश में बनी है, उसमें विपक्ष के ऐसे कदम उनको सत्ता से दूर ही करते रहेंगे, इसकी संभावना अधिक है। वनिस्पत इसके कि ऐसी गतिविधियां उनको सत्ता के करीब या सत्ता में बिठा देंगी।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और लेखक हैं)
















