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| (संदर्भ, चित्र:- चर्चित विवादास्पद पॉडकास्ट) |
● उपेंद्र कश्यप ●
■ 16 जनवरी 2026 ■
आमतौर पर मैं ऐसे विषयों पर लिखने से बचने की कोशिश करता रहा हूं, मन मारकर, क्योंकि सामाजिक वर्जनाएं अनवाश्यक रूप से प्रेशर बनाती हैं। लेकिन किसी भी व्यक्ति से अधिक अनसोशल बन गए सोशल मीडिया पर जिस तरह की चर्चाएं एक पॉडकास्ट को लेकर हो रही है, उसने मुझे 02 घंटे से भी अधिक लंबा यह विवादित चर्चित पॉडकास्ट देखने के लिए विवश कर दिया। खुद को रोक न सका और पूरा पॉडकास्ट लगातार देख गया। सवाल यह उठता है कि सीमा आनंद गलत क्या कह गयी हैं? पितृ सत्तात्मक समाज में स्त्री द्वारा व्यक्त किए गए विचार को उसके चरित्रहीनता से जोड़ देना आम बात हो गई है। ऐसा करना कतई उचित नहीं है। सीमा आनंद ने उस पॉडकास्ट में वही कहा जो जानने की इच्छा सब कोई रखता है। जो करने की इच्छा सब कोई रखता है। बहुत लोग वैसा ही करते हैं, जैसा सीमा कह रही हैं। यह और बात है कि स्वीकारने का साहस किसी में नहीं है। जो पुरुष ऐसे सच को स्वीकार करने का साहस नहीं रखता, वह सीमा आनंद के चरित्र पर सवाल उठाने का दुस्साहस कर पा रहा है तो सिर्फ इसलिए कि वह पुरुष कमजोर है। उसे डर लगता है कि कोई स्त्री उसके बारे में भी बात करे। पुरुषों को यह आजादी दे दी गई है कि वह स्त्री के चरित्र पर विमर्श करे। शुभंकर ने कुरेद कुरेद कर ऐसे सवाल पूछे कि कई सच सामने आ गए। ऐसा नहीं है कि वह सच पहली बार सामने आए हैं। हां वह सच कोई पहली बार सबके सामने सार्वजनिक तौर पर बता रही (बता रहा-नहीं) है, यह महत्वपूर्ण हो गया है। वरना वह कौन सा सच बता रही है सीमा विश्वास जो आम लोग नहीं जानते, या शुभंकर ने कौन सा ऐसा सवाल पूछ लिया जो जानना कोई नहीं चाहता। और अगर दोनों के पॉडकास्ट फालतू है, बिना मतलब के है, समाज को बिगाड़ने वाला हैं तो उसे देख कौन रहा है? जब विधानसभा में सत्र के दौरान पोर्न देखे जा सकते हैं तो फिर उस पर बात करना गलत कैसे हैं? कितने वयस्क पुरुष हैं जो पोर्न नहीं? देखते नियमित या यदा कदा ही सही, देखते सभी हैं, जिसे भी इसकी जानकारी है। कुछ अपवाद हो सकते हैं। जिस देश में कामसूत्र लिखा गया, जिस देश में खजुराहो के मंदिर बने हैं, जहां काम कलाओं को स्पष्ट तौर पर उकेरा गया है, तो क्या वहां सीमा आनंद और शुभंकर मिश्रा की बातचीत देखना अस्वीकार्य हो सकता है?
कौन सी नैतिकता की बात की जा रही है? क्या जब आप खजुराहो देखते हैं तो आपके मन में पाप जागते हैं? आपके मन में घृणा का भाव पैदा होता है? उन मूर्तियों के निर्माता के प्रति तो आप आकर्षित होते हैं। आपको आश्चर्य होता है कि एक जमाने में भारत में काम कलाओं को लेकर इतने खुले विचार हुआ करते थे। रति क्रियाओं को सार्वजनिक जगहों पर बजाप्ता मूर्ति के रूप में गढ़े गए, दिखाए गए। पाठ्य पुस्तकों में। उसकी तस्वीरें छपी और पढ़ाई जाती है। लोगों को जागरूक किया गया। जब आप खजुराहो जाएंगे और कोई कुमारी कन्या आपके बगल से गुजर कर मंदिर में पूजा करके लौटती है तब भी आपके मन में पाप नहीं जगता और ना मंदिर दर्शन करने वाली लड़की के बारे में आप चरित्रहीनता का सर्टिफिकेट देते हैं? तो फिर सीमा आनंद जो कह रही है वह गलत कैसे है?
क्या आपने सिमोन द बोऊवा का द सेकेंड सेक्स (हिंदी में - स्त्रीसाइमन उपेक्षिता- प्रभा खेतान) पढ़ा है। अगर नहीं पढ़ा तो पढ़ लीजिए। आपकी कई भ्रांतियां टूट जाएगी। वह पत्नी के बारे में, स्त्री-पुरुष संबंधों के बारे में क्या कहती है? जब यह जान जाइयेगा तो वास्तविकता की समझ बढ़ जाएगी।
ओशो ने ठीक कहा था कि य
जहां ऐसे विषय पर चर्चा वर्जित है वहां कई समस्याएं खड़ी होती है। आज तमाम तरह की वर्जनाएं ऐसे विषय की चर्चा पर लाद कर लगभग विमर्श को बंद कर दिया गया है तो उसका नतीजा आप सामने देख रहे हैं। कुंठित समाज उन बच्चियों को भी सामूहिक दुष्कर्म करके मार डालता है जिनको यह तक ज्ञात नहीं होता कि स्त्री पुरुष की शारीरिक संरचना में कैसा और क्या फर्क होता है? जब आप खुलकर बात करेंगे तो आप कुंठा से मुक्त होंगे। और जब कुंठा से मुक्त होंगे तो आप दुष्कर्मी नहीं बनेंगे। दुष्कर्मी पुरुष होता है, बच्चियां नहीं, लेकिन झेलना किसे पड़ता है? दुष्कर्म की शिकार बच्चियों को। युवतियों को। महिलाओं को। क्योंकि पुरुष समाज की सोच बहुत ही घृणित है। वेश्यालय जाने वाला बदनाम नहीं होता, वेश्या बदनाम होती है। क्यों? क्या किसी पुरुष के बिना कोई वेश्या बन सकती है? अगर देह बेचना गुनाह है तो उसका खरीदार बेगुनाह कैसे हो सकता है?
अगर रति क्रीड़ा पाप और अपराध है, तो यह संसार चल कैसे रहा है? क्या बिना रति क्रीड़ा के संसार का वजूद बचा रह सकता है? अगर प्रजनन बंद हो जाए, काम क्रिया बंद हो जाए, तो इस पृथ्वी पर मानव का अस्तित्व कितने वर्ष बच सकेगा? सीमा आनंद के भी परिवार हैं, उनके भी पति हैं, उनके भी संतान है। जब समाज खुला होता है तभी कोई सीमा आनंद जैसा बातचीत करने वाली खड़ी होती है, और फिर पॉडकास्ट में तो कई बार सीमा कह चुकी है कि मुझे ट्रोल किया जाएगा। तुम (शुभांकर) मुझको मरवाओगे। लोग पीछे पड़ जाएंगे। कितने तरह के सवाल उठेंगे। क्योंकि सीमा आनंद जानती है कि भारत का समाज अभी उतना खुला नहीं है, इसलिए ऐसा कह रही हैं। पुरुष खुलकर बात कर सकता है, स्त्री नहीं। स्त्री मुस्कुरा दे तो वह चरित्रहीन है। और लड़कियों पर फबती कसने वाला पुरुष भटका हुआ और बिगड़ा हुआ कह दिया जाता है। वह चरित्रहीन नहीं माना जाता है। इसे मर्दों की आदत मानी जाती है। इसमें मर्दानगी दिखता है। जब समाज इस तरह से सोचने लगता है तो फिर वर्जनाएं घृणित रूप से टूटने लगती है।
विचारों को, विमर्शों को जिंदा रखना ही जीवंत समाज की पहचान है। अन्यथा न मुर्दे चर्चा करते हैं, न मुर्दों की चर्चा होती है।
उपेन्द्र कश्यप







