Monday, 5 October 2026

लोक संस्कृति के आयामों का समुच्चय है जिउतिया-संस्कृति

(जिउतिया सिर्फ पर्व नहीं, दाउदनगर में लोक का उत्सव भी)

० उपेंद्र कश्यप ०

● जिउतिया के शोधकर्ता, इतिहास लेखक व पत्रकार


बिहार समेत कई हिन्दी भाषी प्रदेशों में आश्विन कृष्ण पक्ष अष्टमी तिथि को जितिया पर्व मनाया जाता है। इस वर्ष (2026) यह 03 अक्टूबर को है। इसे कहीं जितिया, कहीं जिउतिया तो कहीं जीवित्पुत्रिका व्रत नाम से संबोधित किया जाता है। यूं तो इस आरंभ होने को महाभारत काल, दौपदी, द्वापर के अंत और कलियुग के प्रारंभ के काल से जोड़ा जाता है। वैज्ञानिक तरीके से यह तय नहीं किया जा सकता कि वास्तव में यह पर्व कब से प्रारंभ हुआ होगा। किन्तु तमाम किस्सों में शैब्या व शालीवाहन के पुत्र जीमूतवाहन से इस पर्व को जोड़ा गया है। पौराणिक आख्यानों के अनुसार गन्धर्व के राजकुमार का नाम जीमूतवाहन था। भविष्य पुराण में श्लोक है- जननी मम शैब्यास्ति पितामे शालिवाहन। सूर्यवंशाद भवचाहं राजो जीमूतवाहन॥ यानि माता का नाम शैब्या एवं पिता का नाम शालिवाहन है। सूर्य वंशीय राजा शालिवाहन ने ही शक संवत चलाया था। हालांकि बुदुआ का मत है कि इसे उज्जयिनी के क्षत्रप चेष्टन ने प्रचलित किया। शक राज्यों को चंद्रगुप्त विक्रमादित्य ने समाप्त कर दिया पर शक संवत्‌ अभी तक भारत में चल रहा है। यह शक संवत ईस्वी सन 78 में शुरू हुआ था। अभी (आलेख लिखे जाते वक्त) ईस्वी सन 2026 चल रहा है। इस प्रकार अभी उनके जन्म के 1948 वर्ष हुए हैं। शालिवाहन समुद्र किनारे स्थित संयुक्त प्रांत (तत्कालीन उड़ीसा) के राजा थे। कर्मकांडी आचार्य पं. लालमोहन शास्त्री का मत है कि जीवित्पुत्रिका व्रत को प्रसिद्धि दिलाने के लिए इसे सत्ययुगीन बता कर प्रचारित किया गया। 

बिहार के औरंगाबाद जिले के दाउदनगर में इसी जीमूतवाहन को भगवान का दर्जा दे कर चार चौकें बनाई गई हैं। वास्तव में यह भगवान जीमूतवाहन का मंदिर है, जिसे स्थानीय जन जितिया चौक कहते हैं। जब कोई बच्चा किसी दुर्घटना में बच जाता है तो लोग कहते हैं- ‘खैर मनाव तोर मतारी जीउतिया कइले हलउ कि तू बच गईले।‘ या हर नकल प्रस्तुति के बाद लोक कलाकार कहते हैं- बोलो, बोलो, जितवाहन गोसांई की जय। दरअसल यह पर्व लोक का उत्सव बन गया है। यह लोक संस्कृति अन्यत्र कहीं नहीं दिखती। “श्रमण संस्कृति का वाहक-दाउदनगर” में इस लेखक ने काफी शोधपूर्ण सामग्री इस लोक-संस्कृति के बारे में लिखा है।




किसी भी लोक संस्कृति का प्रारंभ कब, कैसे, क्यों और किनके द्वारा किया गया यह लिखित दस्तावेज के रुप में अमूमन मौजूद नहीं होता है। लोक साहित्य में इसकी झलक मिलती है। जिससे अनुमान किया जा सकता है या फिर उसी को प्रमाण माना जा सकता है। जिउतिया लोक-साहित्य में एक झुमर है -“आश्विन अन्धरिया दूज रहे, संबत 1917 के साल रे जिउतिया। जिउतिया जे रोपे ले हरिचरण, तुलसी, दमडी, जुगुल, रंगलाल रे जिउतिया। अरे धनs भाग रे जिउतिया..।“ इससे स्पष्ट होता है कि पांच लोगों ने जिउतिया लोक संस्कृति को रोपा (प्रारंभ किया) था। हालांकि माना यही जाता है कि वास्तव में इस संस्कृति का आरंभ इमली तल चौक से हुआ था। जिसका देखा-देखी कसेरा टोली चौक पर आरम्भ हुआ था, इसीलिए यहां नकल शब्द प्रचलन में आया। खैर!



इसी झुमर में अभिव्यक्ति मिली है-–‘अरे धन भाग रे जिउतिया, तोरा अइले जियरा नेहाल रे जिउतिया, जिउतिया जे अइले मन हुलसइले, नौ दिन कइले बेहाल रे जिउतिया..” और जब पर्व खत्म होने को होता है तो लोग विरह की वेदना महसूस करते हैं- “देखे अइली जिउतिया, फटे लागल छतिया, नैना ढ़रे नदिया समान। जाने तोहे बिन घायल हूं पागल समान....”। 

वाकई इस संस्कृति में पागलपन है। दीवानगी है। उल्लास की प्रतिक्षा है। सामूहिक उर्जा का स्त्रोत बन गई है यह संस्कृति। ऐसे कि इसके बिना न मन हुलस सकता है न जियरा नेहाल हो सकता है। यूं ही नहीं- ‘दाउदनगर के जिउतिया जिउ के साथ हई गे साजन’-गाया जाता है। इसीलिए इसकी प्रतिक्षा होती है, और जब नौ दिन तक उल्लासित कर, हंसा कर, भागमदौड की जिन्दगी में थकान को दूर भगा कर, हंसने-विहंसने का अवसर देकर, नाते-रिश्तेदारों से मिलने, हाल-चाल जानने का बहाना उपलब्ध करा कर, घर-आंगन में परिचितों, रिश्तेदारों की उपस्थिति बढा कर, उनसे राग बढा कर जब यह जाती है तो हर आदमी की छाती फटने लगती है। यूं ही नहीं नैनन से नदिया ढ़रने लगती है। पागल की तरह दाउदनगरिया खुद को घायल समझने लगता है। इस नौ दिवसीय लोक उत्सव की यही खासियत है। 





यह विचारणीय है कि जिउतिया लोकसंस्कृति का आरंभ क्यों और कैसे हुआ होगा। जनश्रुति है कि इस कस्बे में प्लेग की महामारी आयी हुई थी। इससे निजात पाने का उपाय तलाशने के लिए जो मार्ग अपनाया गया वह कालांतर में संस्कृति बन गई। महत्वपूर्ण है कि ब्रिटिश कालीन गजेटियर के अनुसार 1860 के आस –पास का समय विभिन्न महामारियों का समय है। संवत 1917 का मतलब है 1860 ईस्वी सन। किंवदंती है कि तब इस इलाके में महामारी फैली थी। तब महाराष्ट्र से आये कुछ ओझा गुणियों ने कस्बे की चार सीमाओं पर ‘बम्मा देवी’ की स्थापना की। रात-रात भर जागते हुए करीब एक  महीने तक उपासना करवाई। यह दुष्कर कार्य था, निरंतर एक महीने तक रतजगा। इसके लिए समारोह चाहिए था, उत्सव चाहिए था। मनोरंजन के बिना यह कदापि संभव नहीं होता। इसलिए इस अवधि में मनोरंजन के लिए उपलब्ध साधनों-संसाधनों का इस्तेमाल किया गया। इस बीच या जिस दिन समापन हुआ होगा उस दिन जीवित पुत्रिका व्रत ( जीतिया ) हुआ होगा और इस तरह यह उत्सव हर साल महामारी के भयादोहन से बचने के लिए किया जाने लगा और कालांतर में यह नौ दिन तक सिमट गया। गौर करें- आश्विन (कुवार) की अष्ठमी तिथि को जिउतिया मनाया जाता है। इससे नौ दिन पूर्व भादो और उससे पहले सावन का बरसाती महीना। अपच की बीमारी का मौसम होता है। महामारियां फैलती रही हैं। आज के आधुनिक युग में भले विज्ञान और जागरुकता की बदौलत इस पर नियंत्रण प्राप्त कर लिया गया हो, मगर तत्कालीन समय में महामारियां सामूहिक संहार को जन्म देती थीं। कई-कई परिवार ही नहीं पूरा का पूरा गांव मौत के आगोश में चला जाता था। तब इसे दैवीय प्रकोप माना जाता था। भूत-प्रेत-डायन को इसके लिए जिम्मेदार माना जाता था। इसी से प्रेरित होकर तब के अग्रणी लोगों ने महाराष्ट्र से ओझा-गुणी को बुलाया और प्लेग की महामारी से निजात पाने की कोशिश की। जिसने एक संस्कृति को जन्म दे दिया। इसकी शुरुआत कब हुई यह ज्ञात नहीं हो सका है। कांस्यकार समाज द्वारा किए गए प्रारंभ से पहले इमली तल कब प्रारंभ हुआ? प्लेग की महामारी का कोई रिकार्ड कहीं उपलब्ध नहीं है। इसलिए इसका सही सही अनुमान करना मुश्किल है। 

जिउतिया संस्कृति से महाराष्ट्र और बम्मा देवी आवश्यक रुप से जुडे हुए हैं। क्यो? दाउदनगर से महाराष्ट्र का संबन्ध कैसे और क्यों बना या था? जिउतिया में उनकी क्या भूमिका थी? इन प्रश्नों को जानने से भी यह स्पष्ट हो जाता है कि यहां की जिउतिया-संस्कृति का जन्म दाता बुनकर समाज रहा है। तांती, पटवा, तंतवा जाति बुनकर समाज है। उन्नीसवीं सदी में हस्तशिल्प को रिप्लेस कर काटन मील बन रहे थे। महाराष्ट्र प्रारंभिक काल से ही सूती उद्योग के लिए ख्यात था। दाउदनगर में बुनकरी का कार्य यही समाज करता था। संभव है इस जाति के कुछ लोग महाराष्ट्र के काटन मीलों में कार्य करते होंगे। जनश्रुति के अनुसार जब यहां महामारी आयी तो इस संपर्क ने सूत्र का काम किया और महाराष्ट्रीयन ओझा-गुणी को यहां बुलवाया। जिसने चार कोनों पर बम्मा देवी की स्थापना की, मंत्र से आच्छादित चावल के दाने शहर में छींटे और इससे मुक्ति मिली। यह ‘बम्मा देवी’ महाराष्ट्र की ‘मुम्बा देवी’ का स्थानीय रूप हैं? यह संभव दिखता है। मुंबई और बम्बई, नाम से भी यह स्पष्ट है। कालांतर में शब्द अपने मूल उच्चारण बदलते रहे हैं और उनके अर्थ भी बदलते रहे हैं। इसलिय यह संभावना है कि मुम्बा देवी ही यहां स्थानीयता ग्रहण कर बम्मा देवी बन गई हों। यहां इनका मन्दिर भी बम रोड के अंत में पूरब-दक्षिण किनारे है। दूसरी महत्वपूर्ण उपस्थिति ‘लावणी’ की है, जो महाराष्ट्र की ही विधा है। मराठी थियेटरों में इसकी खूब प्रस्तुति होती है। यहां लावणी भी प्रमुख गेय विधा बन गई है। यह और बात है कि अब लावणी की प्रस्तुति कम होती है। न तो इसके गवइया बचे हैं, न लावणी के लिखवइया ही। एक टोपी भी मराठा से जुडे होने का संकेत देता है। मराठा की टोपी भी यहां के तांती समाज में दिखती रही है। अब नहीं दिखती। इन सन्दर्भों, प्रसंगों से यह स्पष्ट दिखता है कि बुनकरी के कारण दो सुदूरवर्ती संस्कृति इस कदर जुडे कि एक नई संस्कृति बन गई- दाउदनगर की जिउतिया संस्कृति। जो एक छटपटाहट थी रोग से मुक्ति के लिए। पीढियों को बचाने के लिए। जैसे संतानों की रक्षा के लिए जिउतिया का पर्व मातायें करती हैं।

लोक और संस्कृति या लोक-संस्कृति की व्यापकता के सन्दर्भ में एक शब्द है-लोकायन या लोकयान -फोकलोट। नृतत्वशास्त्री ‘लोकयान’ के अंतर्गत चार खंड बताते हैं। पहला लोक-साहित्य है, जिसमें लोक-गीत, लोक-कथा, वीरगीत, मिथकें, मुहावरे, कहावतें शामिल हैं। दूसरा लोक-व्यवहार है-जो न साहित्य है न ही कला- इसमें विश्वास, प्रथाओं, अन्धविश्वासों, कर्मकांडों, लोकोत्सवों, परिपाटियों, लोक खेलों, पशुपक्षियों की प्रतियोगिताओं का समावेश है। तीसरा लोक-कला या कलात्मक लोकयान है, जिसमें लोक नृत्य, लोक-नाट्य, लोक- नटन, लोक चित्र, लोक- दस्तकारी, लोक वेषभूषा एवं लोक-अलंकरण शामिल है। चौथा लोक-विज्ञान एवं औद्योगिकी है जिसमें लोकोपचार, लोकौषधियां, लोक नुस्खे, लोक भोजन खाद्य, लोक कृषि रुढियां, जादू टोने शामिल हैं। यानि लोक-संस्कृति व उसके अनुसंग लोकायन के अंतर्गत ज्ञान भंडार, समुदाय की चिंतन की प्रणालियां तथा कला कसौटी द्वारा प्रासंगिक बने हुए नाना कला कौशलों के तत्व की त्रयी इसमें शामिल है। यहां की जिउतिया लोक संस्कृति में इन चारों की उपस्थिति प्रचुरता के साथ है।



 

दाउदनगर-जिउतिया-संस्कृति का अपना मौलिक और मौखिक (कुछ लिखित) लोक साहित्य है। इसमें लोक जीवन का दुख दर्द, हर्ष उल्लास का अनुभव तथा जीवन पर वैचारिक प्रतिक्रियायें मिलती हैं। तो दूसरी ओर पर्व-त्योहारों, देवी-देवताओं तथा प्रकृति के विविध रुपों का चित्र मिलता है। इन साहित्यों को वाचन परंपरा ने जिन्दा रखा हुआ है। लिखित रुप में काफी कम मौजुद हैं। इनका एकत्र किया जाना आवश्यक प्रतीत होता है। इस साहित्य में नयापन नहीं दिखता, सब पारंपरिक ही हैं। आजादी के संघर्ष की व्यथा और भारत-पाकिस्तान के संदर्भ में देशभक्ति तो अभिव्यक्त होती है, मगर उसके बाद के काल में जैसे झुमर या लावणी लिखे ही नहीं गये हैं। झुमर, लावनी, मुहावरे या वीरता के गीत आपको अवसर विशेष पर सुनने को मिलते हैं। अनन्त पूजा के दूसरे दिन शाम में डमरू के आकार का लकड़ी या पीतल धातु का बना बड़ा-सा ओखली चारों चौंको पर रखकर जिउतिया पर्व का विधिवत आरम्भ कर दिया जाता है। इस दिन से प्रतिदिन शाम को अंधेरा होते ही चौक के पास पुरूष और बच्चे जमा होते हैं और ढोलक की थाप पर तालियां बजा-बजाकर झुमर गाते हैं। इसे ‘चकड़दम्मा’ कहा जाता है। चौक की परिक्रमा करते हुए नाचते-झुमते हुए झुमर गाने का आनंद ही कुछ और होता है। पूरा वातावरण संगीतमय हो जाता है। झुमर गीतों में विविधता होती है, रंगीनी होती है और मधुरता भी। जिउतिया के गीत बडे सरस हैं। इसमें स्थानीय इतिहास, भूगोल और विशेषताओं को भी प्रयाप्त जगह मिली है। झूमर में गाते हैं- दाउदनगर के जिउतिया सरेनाम हई गे साजन दाउदनगर के जिउतिया जीव के साथ हई गे साजन

कहाँ के दिवाली, कहाँ के दशहरा गे साजन,

कहवाँ के जिउतिया कइले नाम हई गे साजन

दिल्ली के दिवाली, कलकता के दशहरा गे साजन

दाऊदनगर के जिउतिया कइले नाम हई गे साजन

दाउदनगर के............................

साहित्य में यहां की आबादी का जीवन संघर्ष व्यक्त होता है। उनके सपने दिखते हैं। रोजगार पाने की उत्कंठा और आमदनी के विभिन्न स्त्रोतों की तलाश करती आबादी का दर्द, दुख, सपने, भविष्य की उम्मीदें बहुत कुछ दिखता है। यहां का परवर काफी मशहूर है। सोन दियारा में इसकी खेती व्यापक पैमाने पर होती है। बालुगंज के मल्लाह समेत कई कृषक जातियां अपनी हाड तोड मेहनत से इसे बलुआही जमीन में उपजाते हैं। औरंगाबाद, गया, पटना, झारखंड के रांची और टाटा जैसे मंडियों में ‘दाउदनगर के परवल’ नाम से यह बिकता है। काफी पहले जब पटना नहर में स्टीमर की यात्रा होती थी, तब हाजीपूर की शब्जी मंडियों में इसे बेचने यहां के लोग जाते थे। इस यात्रा में वे अपने लिए सपना बुनते थे, परवल बेच कर जो आय होगी उससे घर-परिवार की जरुरतों के अलावा स्त्री के श्रृंगार के लिए गहने बनाने की भी सोच रखते थे। आदिम जमाने से ही मनुष्य अपनी स्त्री को सोलह श्रृंगार में देखने का आग्रही रहा है। ऐसे ही एक झुमर में ऐसी भावनाओं को देखिए--- दूर देसे नोकरिया के रे जइहें

के जइहें हाजीपुर, के जइहें पटना, के रे जइहें

दूर देसे नोकरिया के रे जइहें

बाबा जइहें हाजीपुर, भइया जइहें पटना, सइयाँ जइहें

दूर देसे नोकरिया सइयाँ जइहें

के लइहें बाजूबंद, के लइहें कंगना, के रे लइहें

छतिया दरपनवा के रे लइहें

बाबा लइहें बाजूबंद, भइया लइहें कंगना, सइयाँ लइहें

छतिया दरपनवा सइयाँ लइहें


ए राजाजी परवर बेचे जायम हाजीपुर

परवर बेच के पायल गढ़ायम

पायल हम पहिरम जरूर

ए राजाजी परवर बेचे जायम हाजीपुर

यहां का लोक तब भी कितना खुला विचार रखता था यह भी एक झुमर बताता है। जब प्रेम की बातें भी खूब होती थी। खूलेयाम होती थी। ऐसी रचनायें रची गयीं जिसमें प्रेम और श्रृंगार रस का हर भाव, चाहत उसमें पीरो दिया गया हो। जरा देखिए इस रंगीन मिजाजी को, जिसमें है सब कुछ मगर तब भी अश्लीलता नहीं है---------------------------

नैना बिदुल हे कहवाँ से आवेला इयार

कहवाँ से आवेला बारि बियहुआ, बारि बियहुआ

नैना बिदुल हे कहवाँ से आवेला इयार

पूरबा से आवेला बारि बियहुआ, बारि बियहुआ

नैना बिदुल हे पछिमा से आवेला इयार

श्यामसून्दर बनिया के जा (बेटी)  हई रे मनीजरवा

एहि परि गंगा, ओहि पारे जमुना

के मोरा घइला अलगा, हई रे मनीजरवा


लोक-व्यवहार की अद्भुत उपस्थिति ●


लोकयान में दूसरा समावेश है लोक-व्यवहार का। यह न तो साहित्य है न ही कला, इसमें विश्वास, प्रथा, अन्धविश्वास, कर्मकांड, लोकोत्सव, परिपाटी शामिल है। यहां का समाज इससे गहरे जुडाव रखता है। जिउतिया से जिउ के समान जुडे जमात में यह कुट-कुट कर भरा हुआ है। इमली तल जब नकल प्रस्तुत होना होता है तब सबसे पहले पूजा-पाठ के साथ जब ओखली रखी जाती है तो जीमूतवाहन गोंसाई की पूजा की जाती है। यहां काली, ब्रह्म जैसे नकल की खतरनाक प्रस्तुति होती है। यहां के पारंपरिक नकल इसी रात प्रस्तुत होते हैं। पारण के दिन झुमरिया और लावनी गाने वाले जीमूतवाहन के चौक से गाते हुए बम्मा देवी के मन्दिर तक जा कर अपनी प्रस्तुतियों का समापन करते हैं। यह व्यवहार ही है लोक का कि कभी विवाद नहीं होता। लोग एक दूसरे से संवाद कर व समन्वय बिठाकर प्रस्तुति देते हैं, आयोजन करते हैं, एक दूसरे को सहयोग करते हैं।


● जहां कण-कण में बसी है कला ●


लोकयान के तीसरे समावेश में लोक-कला या कलात्मक लोकयान है, जिसमें लोक नृत्य, लोक-नाट्य, लोक-नटन, लोक चित्र, लोक- दस्तकारी, लोक वेषभूषा एवं लोक-अलंकरण शामिल हैं। दाउदनगर के जिउतिया का लोक उत्सव देखिए-यह सब आपको खूब दिखेगा। यहां के जर्रे-जर्रे में कला छिपी हुई है। मिट्टी के कण-कण में कला है तो हर शख्स कलाकार। कला की उर्वरता तो इतनी है कि भर जिउतिया समारोह सब कलाकार बन जाते हैं। जिसे आपने कभी कला के साथ नहीं देखा होगा वे भी कला की प्रस्तुति ऐसे करते दिखेंगे जैसे मंझा हुआ कलाकार हो कोई। कई तरह के ऐसे नकल हैं जिसमें बच्चे ही कलाकार, वही निर्देशक वही पटकथा लेखक वही स्त्री पात्र, वही पुरुष पात्र सब वही हैं। न कभी कोई प्रशिक्षण लिया न कभी उसकी रुचि इस तरफ रही, मगर प्रस्तुति चौंकाने वाली। एक दिवसीय, तीन दिवसीय या नौ दिवसीय कलाकार हैं सब। आदिवासी गीत की प्रस्तुति हो या फिर भांगडा, हर संस्कृति, भाषा और राज्य की संस्कृति की झलक आपको दिख जायेगी। सब जगह की वेषभूषा अलंकरण दिखेगा। चेहरे का मेकअप ऐसा कि बढिया-बढिया मेकअप-मैन लजा जाये। लोग भिन्न-भिन्न रूप धरकर नकल बनने लगते हैं और हँसी-मजाक करने लग जाते हैं। जिउतिया के अवसर पर आप नकल बनकर कुछ भी मजाक करने के लिए स्वतंत्र हैं। कोई आपका बुरा नहीं मानेगा। सबमें अप्रशिक्षित कलाकार शामिल और प्रस्तुति माशा अल्लाह।

● अनोखा है यहाँ के लोक का विज्ञान 

 

लोकयान में चौथा और अंतिम समावेश लोक-विज्ञान एवं औद्योगिकी का है, जिसमें लोकोपचार, लोकौषधियां, लोक नुस्खे, लोक भोजन खाद्य, लोक कृषि रुढियां शामिल हैं। खतरनाक प्रस्तुतियों में लोकौषधियों या नुस्खे इस्तेमाल किए जाते हैं। 


जीवन का आधार है ओखली 

■ उपेंद्र कश्यप

दाउदनगर में जितिया का आगाज ओखली से जुड़ा हुआ है। शहर में बने जीमूत वाहन भगवान के सभी चार चौक पर ओखली रखे जाने के साथ ही जितिया का आगाज माना जाता है। जिज्ञासा का विषय है कि दाउदनगर के जितिया उत्सव में ओखली का इस्तेमाल क्यों होता है। जितिया के हर चौक पर अस्थाई तौर पर पक्का के ओखली बने हुए हैं। इसके बाद उस पर लकड़ी की ओखली परंपरागत रूप से रखी जाती है। युग परिवर्तन के साथ लकड़ी की ओखली पर पीतल की ओखली भी रखी जाने लगी है। आखिर ओखली की पूजा क्यों होती है। इस प्रश्न पर आचार्य लालमोहन शास्त्री कहते हैं कि ओखली का इस्तेमाल वैदिक परंपरा से जुड़ा हुआ है। जब यज्ञ का प्रादुर्भाव हुआ तो हविश बनाने की जरूरत हुई। धान कूटने के लिए लकड़ी की बनाई गई। शालीवाहन के युग में जीमूत वाहन भगवान का संबंध समुद्र किनारे के प्रदेश से है। जहां सियारिन और चील की कथा विकसित हुई। वहां पाकड़ का वृक्ष था। इसी वृक्ष के खोड़रा में चील रहता था। इसलिए यहीं सबसे पहले ओखली का निर्माण हुआ था। बाद के युग में जब मशीनीकरण होता चला गया तो घरों में धान कूटने के लिए ओखली का इस्तेमाल बंद होता चला गया। इसलिए आज की पीढ़ी ओखली से अवगत नहीं है। आचार्य लालमोहन शास्त्री बताते हैं कि बाद के कालखण्ड में शिव के डमरू के आकार की ओखली बनाने की परंपरा विकसित हुई। मटकोर में शादी विवाह के अवसर पर भी इसका इस्तेमाल होता है। बताया कि मटकोर में जो धान प्राप्त होता है उसे मुसल से महिलाएं कूटती हैं और मंगल गीत गाती हैं। धान से जो चावल निकालते हैं वह ओखली में कुटकर ही निकालते हैं। उसी चावल से हम अक्षत बनाते हैं। ओखली से अनहद नाद (ध्वनि) निकलती है। बताया कि श्रीमद्भागवत में दत्तात्रेय की कथा है। उन्होंने महिला को गुरु माना। महिलाओं ने चूड़ी निकालकर ओखली में धान कुटा और फिर उससे भोजन बनाकर घर आए। अपने अतिथियों का पेट भरा। क्योंकि जितिया भी संतान उत्पन्न से जुड़ा हुआ पर्व है, यह भी मांगलिक कार्य है, इसलिए जितिया में मटकोर और ओखली का इस्तेमाल होता है।


इसलिए जितिया नाव आकार का 

 जितिया व्रत में महिलाएं सोने या चांदी का जितिया पूजती हैं। व्रत के दिन जिस महिला की जितनी संतानें होती हैं, उतनी जितिया पूजती हैं और आमतौर पर आश्विन महीने में महिलाएं उसे गले में धारण करती हैं। जिनको नया बनवाना होता है वे नया जितिया बनाकर धारण करती हैं। जिसे फिर व्रत के दिन निकालकर जितवाहन भगवान के सामने पूजती हैं। क्या आप जानते हैं कि तमाम तरह के जितिया बनते हैं, लेकिन उनका आकार नाव के स्वरूप में क्यों होता है। आचार्य लालमोहन शास्त्री बताते हैं कि जितिया माता जो ग्रहण करती है उसके पीछे माता और पिता को संतान द्वारा भवसागर पार कराने की अपेक्षा या आकांक्षा रहती है। क्योंकि भारतीय वांग्मय में व्यक्ति की मृत्यु के बाद भवसागर पार करने की कल्पना है और भवसागर पार करने के लिए जो यातायात का साधन है वह नाव है। मनुष्य के जीवन में यात्रा का प्रारंभ भी नाव से ही हुआ और नाम से ही विश्व की यात्राएं लोगों ने की है। इसलिए यात्रा के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान जाने के लिए प्राचीन काल से नाव का इस्तेमाल होता रहा है इसीलिए जितिया का आकार भी नाव की तरह बनाया जाता है।

[लोक कलाकार क्यों लगाते हैं ज्ञानचंद उस्ताद का जयकारा 


जिउतिया लोक उत्सव के दौरान जो भी लोक कलाकार अपनी प्रस्तुति देते हैं वह इमली तल स्थित ज्ञानचंद उस्ताद के घर मत्था टेकने जरूर जाते हैं। सवाल यह है कि ज्ञानचंद उस्ताद कौन थे और उनके घर मत्था टेकने लोक कलाकार क्यों जाते हैं। जो लोक कलाकार खतरनाक प्रस्तुतियां देते हैं, या झांकी प्रस्तुति करते हैं या किसी भी तरह की कला की प्रस्तुति करते हैं, वह विभिन्न नारों के साथ ज्ञानचंद उस्ताद की जय जरूर बोलते हैं। ये ज्ञानचंद उस्ताद कौन थे, कहां के थे और इनका जिउतिया से क्या संबंध है? यह दिलचस्प जानकारी है। श्रमण संस्कृति का वाहक-दाउदनगर के लेखक उपेंद्र कश्यप के अनुसार वास्तव में ज्ञानचंद उस्ताद को लेकर यह माना जाता है कि या तो उनके नेतृत्व में इमली तल जीमूत वाहन भगवान का चौक स्थापित किया गया होगा या उन्होंने ही पहली बार कलाओं की प्रस्तुति का नेतृत्व किया होगा। इस कारण लोग उन का जयकारा श्रद्धावश लगाना प्रारंभ किए होंगे और यह परंपरा बनती चली गयी। यहां ज्ञानचंद उस्ताद के अलावा भी कई उस्तादों का जयकारा लगता है। ज्ञानचंद उस्ताद इमली तल के निवासी थे। उनके घर में देवी मंदिर बना हुआ है। जहां सात देवियों और एक भैरव बाबा के कुल आठ पिंड स्थापित हैं। कलाकार इस मंदिर में जाते हैं और मत्था टेकते हैं और देवी मां का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। कलाकारों का मानना है कि ऐसा करने से उन पर आने वाला खतरा टल जाता है और उनकी प्रस्तुति यहां सरलता से सफल होती है। महत्वपूर्ण है कि इमली ताल डाकिनी और ब्रह्म की दो खतरनाक प्रस्तुतियां होती है और यहां बिना ज्ञान चंद उस्ताद का जयकारा लगाए कोई कार्य संपन्न नहीं होता है। अन्य स्थानों के कलाकार भी उनका जयकारा लगाते ही लगाते हैं। यहां के लोक कलाकार उनको उस्ताद मानते हैं। ज्ञानचंद उस्ताद का सर्वाधिक नाम लिया जाता है। इससे यह माना जा सकता है कि यहां विविध कला प्रस्तुतियों का नेतृत्व व निर्देशन उन्होंने किया होगा। उसके बाद वासु खलीफा, सीताराम उस्ताद, शकुन उस्ताद, भोला उस्ताद, भूलन उस्ताद, रामप्रीत उस्ताद, गनौरी उस्ताद, दमड़ी उस्ताद, जुगल उस्ताद, नंदकिशोर उस्ताद, राम बाबू उस्ताद का जयकारा यहां के लोक कलाकार लगाते हैं। लोक कलाकार प्रदुमन कसेरा, धीरज कसेरा ने बताया कि ज्यादातर जयकारा मृत उस्तादों के नाम का लगाया जाता है। हालांकि अब जीवित उस्तादों के भी नाम का जयकारा कलाकार उनके प्रति अपना समर्पण भाव व्यक्त करने के लिए लगाते हैं।


परिचय:- 

नाम: -उपेंद्र कश्यप


पुस्तक-

■ आंचलिक पत्रकारिता की दुनिया

■ ‘श्रमण संस्कृति का वाहक-दाउदनगर’

■ सन्दर्भ पुस्तक -“उत्कर्ष” के दो अंक।

राष्ट्रीय व राज्य स्तरीय विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में सैकड़ों आलेख, रिपोतार्ज, फीचर।


संपर्क:

पत्रकार सदन, पांडेय टोली, कान्दू राम की गड़ही, वार्ड संख्या-24

दाउदनगर, औरंगाबाद, बिहार। पिन-824143

संपर्क: 9931852301





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Sunday, 4 October 2026

जिउतिया के सांस्कृतिक, धार्मिक, कलात्मक पक्ष की जानकारी देती है स्मारिका


 दो शताब्दी में पहली बार स्मारिका का प्रकाशन 


लोक संस्कृति के संवर्धन व संरक्षण में मील का पत्थर 

नबिटा संवाददाता 

दाउदनगर (औरंगाबाद) । ई. सन 1860 से पहले दाउदनगर में जिउतिया का आरंभ कब हुआ था, यह ज्ञात नहीं है। लगभग दो शताब्दी में पहली बार जिउतिया लोक उत्सव को लेकर स्मारिका -जिउतिया का उत्कर्ष-का प्रकाशन किया गया। पहली बार बिहार सरकार ने दाउदनगर के जिउतिया को सांस्कृतिक कैलेंडर में शामिल किया।  आयोजन के लिए बिहार सरकार के कला एवं संस्कृति विभाग द्वारा तीन लाख रुपये की राशि आवंटित हुई। नगर परिषद कार्यालय परिसर में आयोजन हुआ। इस अवसर पर एक स्मारिका का प्रकाशन किया गया। इस अवसर विधायक कुटुंबा ललन राम, जिलाधिकारी अभिलाषा शर्मा, नगर परिषद दाउदनगर की अध्यक्ष अंजली कुमारी, उप विकास आयुक्त कुमारी अनुपम सिंह, अपर समाहर्ता अनुग्रह नारायण सिंह, एसडीओ अमित राजन, एसडीपीओ चंद्रभूषण, जिला कला संस्कृति पदाधिकारी कुमार पप्पू राज सहित अन्य पदाधिकारी उपस्थित रहे। स्मारिक की संरक्षक जिला पदाधिकारी अभिलाष शर्मा हैं। अपर समाहर्ता अनुग्रह नारायण सिंह, दाउदनगर के अनुमंडल पदाधिकारी अमित राजन और जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी कुमार पप्पू राज संपादक मंडल में शामिल हैं। बतौर लेखक वरिष्ठ पत्रकार उपेंद्र कश्यप और बतौर सहयोगी नगर परिषद की मुख्य पार्षद अंजली कुमारी और कार्यपालक पदाधिकारी ऋषिकेश अवस्थी का नाम इसमें उल्लेखित है। बिहार सरकार के खान एवं भूतत्व विभाग सह कला एवं संस्कृति मंत्री डॉ प्रमोद कुमार, पिछड़ा वर्ग एवं अति पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग तथा जिला की प्रभारी मंत्री रमा निषाद, क्षेत्रीय विधायक डॉ प्रकाश चंद्र, कला एवं संस्कृति विभाग के सचिव प्रणव कुमार, अपर सचिव श्रीमती रूबी और जिला पदाधिकारी अभिलाष शर्मा का शुभकामना संदेश शामिल है। जबकि 10 पेज में- “लोक संस्कृति के आयामों का समुच्चय है-जिउतिया संस्कृति” शीर्षक से जिउतिया लोक संस्कृति के शोधकर्ता एवं कई पुस्तकों के लेखक उपेंद्र कश्यप का आलेख प्रकाशित किया गया है।



सांस्कृतिक यात्रा को दस्तावेज के रूप में संरक्षित करने की कोशिश


खान एवं भू तत्व विभाग के मंत्री डॉ प्रमोद कुमार ने अपने संदेश में कहा है कि यह उत्सव केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि हमारी लोक संस्कृति, परंपरा और सामुदायिक विरासत के संरक्षण एवं संवर्धन का महत्वपूर्ण माध्यम है। बदलते समय में अपनी सांस्कृतिक जड़ों को सहेजना और उन्हें नई पीढ़ी तक पहुंचाना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है। इस तरह से जिउतिया लोक उत्सव का आयोजन विशेष महत्व रखता है। इस स्मारिका का प्रकाशन इस सांस्कृतिक यात्रा को दस्तावेज के रूप में संरक्षित करने की दिशा में एक सराहनीय प्रयास है। इसमें संकलित सामग्री दाउदनगर की लोक परंपरा, सांस्कृतिक विरासत और जिउतिया उत्सव से जुड़े स्मृतियों को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचने में उपयोगी सिद्ध होगी। 


पीढ़ियों के लिए उपयोगी संदर्भ बनेगी स्मारिका 


अपने शुभकामना संदेश में पिछड़ा वर्ग एवं अति पिछड़ा वर्ग सह प्रभारी मंत्री औरंगाबाद रमा निषाद ने कहा है कि दाउदनगर औरंगाबाद की धरती अपनी विशिष्ट लोक संस्कृति, परंपराओं और सामाजिक समरसता के सदैव समृद्ध रही है। इस सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित, संवर्धित एवं नई पीढ़ी तक पहुंचाने की दिशा में जिउतिया उत्सव 2026 का आयोजन एक सराहनीय फल है। ऐसा आयोजन हमारी लोक परंपराओं को जीवंत बनाए रखने के साथ-साथ स्थानीय कला, लोकगीत, लोक नृत्य एवं सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों को एक सशक्त मंच प्रदान करते हैं। उन्होंने कहा कि स्मारिका उत्सव की गतिविधियों, लोक परंपराओं एवं सांस्कृतिक विरासत का दस्तावेजीकरण करने का महत्वपूर्ण माध्यम बनेंगे। मुझे विश्वास है कि यह स्मारिका आने वाली पीढियों के लिए हमारी समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर को समझने और उसे जोड़ने का उपयोगी संदर्भ बनेगी। क्षेत्रीय विधायक डॉ प्रकाश चंद्र ने अपने संदेश में कहा है कि दाउदनगर की मिट्टी में लोक संस्कृति की गहरी जड़े हैं और जिउतिया पर्व उसके समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रतीक है। पर्व की विशेषता केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है। अपितु स्थानीय कलाकारों द्वारा प्रस्तुत विविध लोक कलाएं जीवंत सांस्कृतिक पहचान को अभिव्यक्त करती है। इस वर्ष जितिया पर्व को राजकीय स्तर पर मनाने की पहल के लिए जिला प्रशासन और सभी सहयोगियों को प्रति हार्दिक आभार। इस गौरवशाली लोक परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुंचाना और सांस्कृतिक गरिमा को बनाए रखना हम सभी का साझा दायित्व है।



स्मारिका का प्रकाशन सराहनीय

इस स्मारिका में प्रकाशित अपने शुभकामना संदेश में कला एवं संस्कृति विभाग के सचिव प्रणव कुमार ने लिखा है कि स्मारिका इस सांस्कृतिक विरासत को शब्दों और दस्तावेजों के रूप में संरक्षित करने की दिशा में एक सराहनीय पहल है। इसमें जिउतिया की परंपरा, दाउदनगर की सांस्कृतिक पहचान और लोक जीवन से जुड़े विविध पक्षों का संकलन आने वाली पीढियों के लिए महत्वपूर्ण सांस्कृतिक धरोहर के रूप में उपयोगी होगी। इसी विभाग की अपर सचिव श्रीमती रूबी ने लिखा कि यह आयोजन हमारी लोक परंपराओं, लोक कला एवं सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण, संवर्धन और नई पीढ़ी तक उनका स्थानांतरण की दिशा में एक सराहनीय पहल है। ऐसे आयोजन हमारी सांस्कृतिक जड़ों को मजबूत करने के साथ-साथ लोक कलाकारों को अपनी कला के प्रदर्शन का अवसर के प्रदान करते हैं। स्मारिका की संरक्षक जिला पदाधिकारी अभिलाष शर्मा ने लखा कि जितिया का उत्कर्ष नाम से प्रकाशित स्मारिका का प्रकाशन किया जा रहा है। जितिया पर्व हमारी समृद्ध लोक परंपरा, आस्था, मातृ स्नेह एवं पारिवारिक मूल्यों का जीवन प्रतीक है। यह पर्व हमारी लोक संस्कृति की उन परंपराओं को अभिव्यक्त करता है जो पीढ़ी दर पीढ़ी समाज को अपनी संस्कृति से जोड़े रखने का कार्य करती है। दाउदनगर के ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक धरती पर जिउतिया लोक उत्सव का आयोजन हमारे लोक विरासत को संरक्षित, संवर्धित एवं नई पीढ़ी तक पहुंचने की दिशा में एक ठोस पहल है। इस अवसर पर प्रकाशित की जा रही स्मारिका भी इस आयोजन की सांस्कृतिक स्मृतियों, लोक परंपराओं एवं क्षेत्र के समृद्ध विरासत को समझने का महत्वपूर्ण माध्यम बनेगी। आशा है कि यह आयोजन लोक कलाकारों, साहित्यकारों एवं कला संस्कृति से जुड़े प्रतिभाओं को प्रोत्साहित करने के साथ-साथ हमारी सांस्कृतिक विविधता और सामाजिक समरसता को भी सुदृढ़ करेगा।



लोक संस्कृति के आयाम को बताता है आलेख 

स्मारिका में उपेंद्र कश्यप द्वारा प्रकाशित आलेख -”लोक संस्कृति के आयाम का समुच्चय है जिउतिया संस्कृति”- में इसके धार्मिक, सांस्कृतिक, पारंपरिक और कलात्मक पहलुओं को बखूबी बताया गया है। इसके साथ-साथ यह बताया गया है कि दाउदनगर में जिउतिया के अवसर पर प्रस्तुत कलाओं में लोक संस्कृति के सभी आयामों की प्रचुरता में उपलब्धता है। यह भी बताया गया है कि दाउदनगर की जिउतियां संस्कृति का जुड़ाव महाराष्ट्र की संस्कृति से कैसे है। लोक साहित्य, लोक कला, लोक विज्ञान और लोक व्यवहार के निकट पर दाउदनगर की जिउतिया लोक संस्कृति को परखने की कोशिश उनके आलेख में मिलती है। स्मारिका यह भी बताती है कि दाउदनगर की जिउतिया के कलाकार आखिर ज्ञानचंद उस्ताद समेत अन्य उस्तादों का जयकारा क्यों लगाते हैं। आलेख यह भी बताता है कि जीमूतवाहन के मंदिर में ओखली क्यों रखे जाते हैं, और महिलाएं जो सोने चांदी की जितिया पहनती हैं वह नाव आकार का ही क्यों होता है।











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Friday, 2 October 2026

जिउतिया लोकोत्सव : प्रशासनिक पहल से जगी बड़ी अपेक्षा

 



डॉ. शम्भू शरण सिंह

जिउतिया, जितिया या जीवित्पुत्रिका व्रत हिंदू माताएं अपनी संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और मंगल कामना के साथ करती हैं। बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, बंगाल और नेपाल के क्षेत्रों में यह कठिन साधना वाला पवित्र निर्जला व्रत श्रद्धा, आस्था, विश्वास के साथ मनाया जाता है। गंधर्व राज जीमूतवाहन को समर्पित यह व्रत नहाय खाय से आरंभ होकर मुख्य निर्जला उपवास और फिर पारण के साथ संपन्न होता है। भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के वैविध्य की स्वर्णिम कड़ी में यह पर्व विक्रम संवत के आश्विन माह के कृष्ण पक्ष के सातवें से नौंवे चंद्र दिवस तक मनाया जाता है। सांस्कृतिक विविधता के अनोखे विरासत की कड़ी में हिंदू या सनातन समुदाय पर्व त्योहार की समृद्ध परंपरा को बदलते जीवन परिदृश्य में भी संजोए रखा है।

 ऐसी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत की स्वर्णिम कड़ी में श्रद्धा के साथ संपन्न होने वाला जितिया पर्व विभिन्न भौगोलिक परिवेश में विभिन्न स्वरूप में जीवंत है। औरंगाबाद जिला के दाउदनगर कस्बे के जितिया पर्व की तस्वीर सिर्फ श्रद्धा, विश्वास और उपवास तक सीमित नहीं है। दाउदनगर जो औरंगाबाद या यूं कहें पुराने गया जिला का नगर पालिका क्षेत्र के रूप में बिहार के मानचित्र पर देदीप्यमान नक्षत्र की तरह स्थापित यह नगर सोनभद्र की सोंधी माटी में कला, कौशल, साहित्य, संस्कृति की खुशबू घोलता रहा है। ऐसी ही सांस्कृतिक कौशल का जीवंत स्वरूप दाउदनगर की पावन धरा पर जीतिया पर्व के अवसर पर पूरे सप्ताह भर अभिव्यक्त होता है। शहर का कोना-कोना नकल अभिनय और आश्चर्यचकित कर देने वाली अनोखी प्रस्तुतियों का गवाह बनता है। साक्षी होता है। हंसी- मजाक, व्यंग-हास्य-विनोद, गीत, संगीत, नृत्य-रोमांच से स्पंदित दाउदनगर का जनजीवन गतिमान रहता है। जितिया के इस अनोखे पुरातन विरासत की कड़ी में शहर में बने चार चौक कसेरा टोली, पटवा टोली, बाजार चौक और पुराना शहर चौक पर स्थापित जीमूतवाहन भगवान की पूजा धूमधाम से होती है। दूसरी ओर अभिनय की बहुरंगी छटा से शहर स्पंदित रहता है। भारतीय संस्कृति के विविध भावों की अभिव्यक्ति वाली अभिनय प्रस्तुतियां न केवल विरासत को अक्षुण्ण रखती हैं, वरन जमाने से चली आ रही परंपरा में बसी सोंच, समझ, चिंतन, कला, कौशल की समृद्ध कड़ी को अभिव्यक्त करती हैं। 

दाउदनगर शहर में मैं शिक्षा के माध्यम से समाज को संवारने हेतु 1997 के जनवरी माह में आया। विवेकानंद स्कूल आफ एजुकेशन की स्थापना के साथ ही स्थाई रूप से दाउदनगर का निवासी हो गया। शहर के शैक्षिक, सांस्कृतिक परिदृश्य को तब से बहुत करीब से और जुड़ कर देखा, समझा और थोड़ी-थोड़ी भूमिका का निर्वहन भी किया। जितिया पर्व के इतिहास, भूगोल विरासत और परंपरा के संबंध में ज्ञान उपेंद्र कश्यप जो संप्रत्ति पत्रकारिता के क्षेत्र के जीवंत नक्षत्र हैं के साथ संवाद के क्रम में हुआ। उनकी ही पहल पर विभिन्न जितिया पर्व से जुड़े संगठनों के साथ सहभागिता भी की और कई बार अभिनय जैसी प्रस्तुतियों के लिए कुछ योगदान भी किया। जितिया पर आम अवाम के ज्ञान को समृद्ध बनाने में उपेंद्र कश्यप का योगदान महत्वपूर्ण है। उनके द्वारा प्रकाशित उत्कर्ष, श्रमण संस्कृति का वाहक-दाउदनगर- जितिया के अनोखे पहलुओं पर सार्थक और ज्ञानवर्धक सामग्री उपलब्ध कराते हैं। ऐसे ही प्रयासों का प्रतिफल है कि दाउदनगर के जितिया पर्व को राज्य के सांस्कृतिक कैलेंडर में स्थान मिला और इस वर्ष जितिया महोत्सव मनाने की सरकारी स्तर पर पहल हुई। विश्वास किया जा सकता है कि सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और संवर्धन को बड़ा मंच सरकार के प्रयास से मिलेगा। जितिया पर्व के अवसर पर प्रस्तुत किए जाने वाले अनोखे कला कौशल, हास्य, अभिनय को सरकार के स्तर से पटना के गांधी मैदान में प्रस्तुत की जाने वाली झांकियों में शामिल करने हेतु भी प्रशासनिक स्तर से प्रयास की अपेक्षा है। वर्तमान में जिले की प्रशासनिक टीम और ऊर्जावान अनुमंडल पदाधिकारी, नगर परिषद के स्तर से और इसमें जन भागीदारी से इसे और बड़ा मंच उपलब्ध कराने का प्रयास होना ही चाहिए। जितिया पर्व के इस पावन अवसर पर अनुमण्डल अधिकारी के सदप्रयास का अभिनंदन, वंदन।


डॉ शम्भू शरण सिंह

एम ए (डबल) गोल्ड मेडलिस्ट, सेवा निवृत्त प्रोफेसर, संस्थापक निदेशक, विवेकानंद ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशंस



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Thursday, 17 September 2026

जिउतिया लोकोत्सव के लिए सरकार ने दिए तीन लाख लेकिन..

 


नगर परिषद में प्रथम दिन प्रशासनिक आयोजन 

बाद के तीन दिन का कार्यक्रम नप के जिम्मे

निबंधन कराये कलाकारों को ही मिलेगा आर्थिक लाभ 

उपेंद्र कश्यप

नबिटा संवाददाता 

दाउदनगर (औरंगाबाद) । मुख्य पार्षद अंजली कुमारी के प्रयास से पहली बार सरकार ने जिउतिया लोक उत्सव के लिए तव्वन लाख रुपये की राशि आवंटित किया है। लेकिन राशि आवंटित होने के साथ ही कई मुश्किलें और समस्याएं भी सामने खड़ी हो गई है। राशि मिलते ही सवाल खड़ा हुआ है कि इस राशि को खर्च कौन करेगा, कैसे और किस मद में खर्च करेगा। इसमें प्रशासन और नगर निकाय की भूमिका क्या होगी। इस प्रश्न के जवाब में मुख्य पार्षद अंजली कुमारी ने कहा कि यह कला संस्कृति पदाधिकारी बताएंगे। कला संस्कृति पदाधिकारी पप्पू कुमार बताते हैं कि नगर परिषद में पहले दिन का आयोजन प्रशासनिक स्तर पर होगा। शेष तीन दिन का आयोजन नगर परिषद करेगा। पहले दिन जो कार्यक्रम होगा उसमें जिला पदाधिकारी के स्तर से जनप्रतिनिधियों को आमंत्रित किया जाएगा। यानी जिले के सभी सांसद, विधायक, विधान परिषद सदस्य, और अन्य


जनप्रतिनिधियों को आमंत्रित किया जाएगा। इस दिन जो कला प्रस्तुतियां होंगी। कुल प्रस्तुतियों में चयनित प्रतिभागियों को पुरस्कृत करने की जिम्मेदारी नगर परिषद की नहीं बल्कि प्रशासनिक महकमे की होगी। समस्या यह आएगी कि बिहार सरकार की कला संस्कृति विभाग के वेबसाइट पर जो निबंधित कलाकार होंगे, सिर्फ वे ही इस आयोजन का लाभ ले सकते हैं। पहली बार इस तरह का अनुभव दाउदनगर को होगा। इसका भविष्य में क्या नफा नुकसान स्थानीय संस्कृति के संदर्भ में होगा यह आकलन करने में वक्त लगेगा।


नई पीढ़ी तक पहुंचेगी विरासत


नगर परिषद की मुख्य पार्षद अंजली कुमारी ने इस प्रसंग में कहा कि राशि का आवंटन होना दाउदनगर वासियों के लिए हर्ष और गौरव का विषय है। यह राशि हमारे पारंपरिक लोक उत्सव को और भव्य एवं व्यवस्थित रूप देने में सहायक होगी तथा हमारी सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।



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Saturday, 12 September 2026

क्षेत्र को चमन बनाने के लिए चाहिए सिर्फ रोशनी

 



मुख्यपथ से सिपहां और बम रोड तक चाहिए स्ट्रीट लाइट 

बीमार, तीमारदार, लोगों के लिए आवश्यक रास्ता

नबिटा संवाददाता 

दाउदनगर (औरंगाबाद) । दाउदनगर बाजार से भखरुआं जाने वाले मुख्य पथ स्थित मौला बाग से नहर के किनारे उत्तर और दक्षिण दिशा में अगर स्ट्रीट लाइट लग जाए तो यह इलाका चमन बन जाएगा। फिलहाल नहर के किनारे का यह मार्ग अंधेरे में डूबा हुआ है। लोगों को इस रास्ते आने जाने में डर लगता है, जबकि यह प्रमुख मार्ग है। अपराध की घटनाओं के डर के कारण लोग इस रास्ते अंधेरा में आना-जाना नहीं पसंद करते हैं। दूसरी तरफ सुखा नशा करने वालों से भी डर बना रहता है, जबकि सिपहां मार्ग में नर्सिंग कॉलेज और अनुमंडल अस्पताल जैसे प्रमुख संस्थान है। जहां देर रात लोगों की आवाजाही आवश्यक मजबूरी होती है। इसी रास्ते में प्रखंड सह अंचल समेत कई प्रखंड स्तरीय कार्यालयों का एक दरवाजा भी है। ऐसे में इस रास्ते में स्ट्रीट लाइट लगाए जाने की आवश्यकता महसूस होती है। दूसरी तरफ बम रोड की तरफ भी आबादी बस गई है। इधर आवागमन होते रहता है। अगर इस हिस्से में स्ट्रीट लाइट लगा दी जाए तो लोग भय मुक्त होकर आवागमन कर सकेंगे। सुबह और शाम की तफरीह कर सकेंगे। जिससे लोग स्वास्थ्य लाभ ले सकेंगे। 


योजना लेकर होगा क्षेत्र रौशन- डॉ. प्रकाशचंद्र

इस संबंध में इस संवाददाता ने विधायक डॉ प्रकाश चंद्र को प्रस्ताव दिया तो उन्होंने कहा कि योजना लेकर काम कराया जाएगा। दोनों रास्तों को जगमग रोशन किया जाएगा। संसाधनों की उपलब्धता के आधार पर काम किया जाएगा। 



प्रदूषण मुक्त क्षेत्र, मरीज को जरूरत


नव ज्योति शिक्षा निकेतन के निदेशक नीरज कुमार गुप्ता कहते हैं कि ओबरा विधायक डॉ प्रकाश चंद्र का स्वभाव ऐसा है कि वे इस काम को अवश्य करेंगे। अगर रोशनी लग जाती है तो लोगों के अंदर का डर खत्म हो जाएगा। लोग निर्भीक होकर शाम में घूम सकेंगे। शहर में बहुत बड़ी आबादी ऐसी है जो सुबह की जगह शाम को ही स्वास्थ्य लाभ के लिए तफरीह कर पाती है। इस रास्ते अनुमंडल अस्पताल जाने वाले मरीज और तीमारदार को भी लाभ होगा। 



स्वस्थ समाज बनाने के लिए जरूरी काम 

एलआईसी के अभिकर्ता अवधेश पांडेय कहते हैं कि लोगों को स्वास्थ्य लाभ मिले इसके लिए क्षेत्र का चयन कर उसे विकसित किया जाना आवश्यक है। विधायक अगर इस हिस्से में रोशनी की व्यवस्था कर देते हैं तो लोग सुबह शाम की तफरीह निर्भीक होकर कर पाएंगे। जिससे लोग स्वस्थ होंगे। इससे समाज और शहर दोनों स्वस्थ होगा और इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।

Thursday, 10 September 2026

सत्य निकेतन नहीं, सत्ता-सरकार की इमारत गिरी

 




टेढ़ी पालिटिक्स




दिल्ली में बिल्डिंग नहीं गिरी, भ्रष्टाचार की पोल खुली


डॉ. उपेंद्र कश्यप

वरिष्ठ लेखक व पत्रकार


दिल्ली में सत्य निकेतन बिल्डिंग गिर गई। आधे दर्जन लोगों की मृत्यु हो गई। राजनीति गर्मा गई। प्रशासन भवन मालिक को इसका दोष देकर उसके खिलाफ करवाई करने पर उतारू है। सवाल है कि क्या मकान मालिक ही सिर्फ दोषी है? क्या वास्तव में सत्य निकेतन गिरा है या फिर सत्ता सरकार का इकबाल गिरने का यह परिणाम है? क्या सत्ता प्रतिष्ठान अगर ईमानदारी से कम करे तो ऐसी घटनाएं होती रह सकती हैं? ऐसी घटनाएं पहले भी दर्जनों बार हुई है और आगे भी होंगी और ऐसे ही घटना क्यों सिर्फ बिल्डिंग गिरने से मौतें थोड़े ही होती हैं, भवनों में आग लगने से भी मौतें होती रही हैं। सवाल है कि इसका उपाय क्या है? क्या वास्तव में सत्ता प्रतिष्ठान कभी ऐसी घटनाएं न हो इसका ठोस उपाय करना चाहती हैं? ऐसी घटनाओं पर रोक लगे इसे लेकर क्या सरकारें कभी दृढ़ निश्चायी रही हैं, नहीं। दरअसल यह सत्य निकेतन नाम का एक बिल्डिंग गिरने और उससे कई मौतें हो जाने भर का बस मामला नहीं है। बिल्डिंग गिरती है तब भी भ्रष्टाचार होता है और बिल्डिंग में आग लगती है तब भी भ्रष्टाचार का ही वह परिणाम होता है। भ्रष्टाचार को समझने की जरूरत है। भ्रष्टाचार कैसे इन मौतों की जिम्मेदार होती है? भारत में शायद ही कोई ऐसा उदाहरण है कि जब भवन बन रहा हो और उसके निर्माण में धांधली ना हो। भले ही वह कोई एजेंसी करे, सरकार बनाए या व्यक्तिगत निर्माण ही क्यों ना हो। सक्षम अथॉरिटी से ना तो बिना रिश्वत के नक्शा पास होते हैं ना निर्माण की स्वीकृति मिलती है। न ही भवन बन जाने के बाद ऑडिट करने वाली संस्थाएं भौतिक सत्यापन करती हैं। वह बिना भौतिक सत्यापन किये ही, या कभी-कभी संबंधित भवन में भौतिक रूप से अधिकारी उपस्थित होकर भी सीधे निबंधन नियमितीकरण के लिए रिश्वत मांगते हैं। बिना रिश्वत लिए भवनों का निबंधन नियमितीकरण होता ही नहीं है। अब कोई ईमानदार हो और ऐसा वास्तव में बिना रिश्वत लिए पूरी तरह भौतिक सत्यापन करके एनओसी करता हो तो यह अद्भुत संयोग हो सकता है। भवनों में आग लगने पर मौतें ना हो इसके लिए अग्निशमन विभाग द्वारा जांच कर एक योजना के तहत सुरक्षा उपकरण लगाए जाते हैं, शायद ही कोई ऐसा भवन होगा और अग्निशामालय का अधिकारी जहां रिश्वतखोरी ना होती हो। बिना रिश्वत लिए किसी भवन का अग्निशमन विभाग एनओसी नहीं देता। भवनों में बिना गए, बिना देखे, बिना निरीक्षण किये अग्निशामालय विभाग के अधिकारी मोटी रकम लेकर एनओसी देते हैं, यह खुला सच है। कभी कभी बड़े पैरवी, सामने वाले कि पहुंच व दबंगता के भय भी वजह होती है। लेकिन इस पर नियंत्रण नहीं किया जाता। सरकार इस दिशा में विचार नहीं करती और इसीलिए भवन गिरते हैं। मौतें होती हैं। 


अगर वास्तव में सरकारी चाहती है, चाहे वह केंद्र की सरकार हो या राज्य की, कि किसी भवन में आग लगने से मौत ना हो, कोई भवन ध्वस्त ना हो, उसके गिरने से मौत ना हो तो उसके लिए जिम्मेदारी तय करनी होगी। संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय करनी होगी। ऐसा करना बहुत मुश्किल वाला या बड़ा काम नहीं है, जिसे किया नहीं जा सकता। बस सत्ता प्रतिष्ठानों के दृढ़ निश्चायी होने भर का मामला है। यह कानून होना चाहिए कि अगर कोई भवन ध्वस्त होता है, किसी भवन में आग लगती है, जैसे सत्य निकेतन का ही मामला ले लें बतौर उदाहरण तो, सत्य निकेतन भवन का निर्माण क्या नक्शा के अनुसार हुआ है, क्या उसमें आग लगने, भुकंप आने पर ध्वस्त होने से मौत न हो इसके सुरक्षा उपाय मानक के अनुरूप हैं, इसकी जांच होनी चाहिए। अगर इसमें कमी पाई जाती है तो नक्शा पास करने वाले (अगर वह सेवानिवृत्त हो गया हो तो उसके पेंशन से, उसकी अर्जित संपत्ति से) से, उसके निर्माण में गड़बड़ी होने या रहने के बावजूद भवन को असुरक्षित घोषित न करने वाले जिम्मेदार अधिकारी, अग्नि सुरक्षा के लिए ज़िम्मेदार अधिकारी अर्थात निबंधन नियमितीकरण दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने वाले अधिकारी पर हत्या का मुकदमा दर्ज हो और जितनी भी क्षति हुई उसकी भरपाई उनके वेतन से किया जाए। यह संवैधानिक व्यवस्था होनी चाहिए। जब ऐसा होगा तो तय जानिए भविष्य में कभी भी बिल्डिंग नहीं ध्वस्त होगी, आग नहीं लगेगी, ऐसी घटनाओं में होने वाली मौत टाली जा सकेंगी। रिश्वत लेकर गलत होने के बावजूद सही लिखने, बताने वाले अधिकारी अधिक दोषी हैं, बनिस्पत मकान मालिक के।  जब ऐसे नियम बनेंगे, ऐसी कानूनी व्यवस्था होगी तो पैसा लेना तो छोड़िए मांगेंगे भी नहीं अधिकारी। यह नियम होना चाहिए कि अगर नियमितीकरण के लिए कोई मकान मालिक आवेदन देता है तो उसे 15 दिन या 30 दिन के अंदर (जो भी प्राविधान हो) संबंधित अथॉरिटी को लाइसेंस के नियमितीकरण का मामला निपटाना होगा। कारण बता कर उसे खारिज करे या स्वीकार करे। ऐसा होने पर रिश्वत लेनदेन का मामला कम होगा। अगर कोई रिश्वत के लिए जबरदस्ती कोई कमी निकाले तो उस तरह के अधिकारी के खिलाफ भी सख्त कार्रवाई का प्रावधान होना चाहिए। जब तक अधिकारी ब्लैकमेल करते रहेंगे, पैसे लेकर निबंधनों का नियमितीकरण करते रहेंगे, भवन गलत तरीके से बनते रहेंगे, तब तक ऐसे हादसे होते रहेंगे और मकान मालिकों को पकड़ कर जेल भेज देने से कोई समस्या का समाधान नहीं होगा। यह लिखने का उद्देश्य सही मुद्दे उठाना, सत्ता को स्थिति का भान कराना और भविष्य में ऐसी दुर्घटना ना हो यह तय करवाना है ना कि किसी मकान के मालिक को बचाना या उसका पक्ष रखना।


 (लेखक का निजी विचार है)

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Wednesday, 2 September 2026

रामबिलास सिंह की प्रतिमा लगाने का एमएलए ने दिया भरोसा

 


यदुवंशी संवाद में लोगों ने उठाया मुद्दा

बड़े जलसा के साथ होगी प्रतिमा प्रतिस्थापित

नबिटा संवाददाता

दाउदनगर (औरंगाबाद) ।

भगवान प्रसाद शिवनाथ प्रसाद बीएड कॉलेज में सोमवार को आयोजित यदुवंशी संवाद कार्यक्रम में कई वक्ताओं ने पूर्व मंत्री रहे रामबिलास सिंह की प्रतिमा जिला मुख्यालय में लगाने की मांग की। कहा गया कि उनकी प्रतिमा ‘कारा में बंद’ कर रखा जाना दुर्भाग्यपूर्ण है। ऐसी मांगों पर विधायक डॉ. प्रकाशचंद्र ने आश्वस्त किया कि प्रतिमा पुनर्स्थापित की जाएगी। कार्यक्रम के दौरान पूर्व विधायक सत्यनारायण सिंह ने इस मुद्दे को उठाते हुए विधायक के इशारे पर कहा कि प्रतिमा स्थापित होगी। हम डॉ. प्रकाशचंद्र की ताकत जानते हैं। पीछे हम खड़ा हैं ही। पूर्व अध्यक्ष राजद ओबरा इंदल यादव व पूर्व जिप सदस्य संजय सिंह सोम ने जिला मुख्यालय में रामबिलास सिंह की प्रतिमा न लग सकने का मुद्दा उठाया। श्री सोम ने कहा कि बड़े जलसा के साथ उनकी प्रतिमा लगेगी। यह दुर्भाग्य है कि कारा मंत्री रहे रामबिलास बाबू की प्रतिमा कारा में बंद है। कहा गया कि सर्वाधिक संख्या में यादव समाज के जिला परिषद के सदस्य हैं, इसके बावजूद ऐसी स्थिति होना दुर्भाग्यपूर्ण है। इंदल या

दव ने बताया कि दिशा की बैठक समेत हर अवसर पर डॉ. प्रकाशचंद्र ने इस मुद्दे को उठाया। प्रतिमा स्थापित करना इनका लक्ष्य है। इस आयोजन के बाद स्व.रामबिलास सिंह की प्रतिमा लगने की उम्मीद जगी है। 


क्या है प्रतिमा को ले विवाद


औरंगाबाद का दानी बिगहा पुराना बस स्टैंड सह-व्यावसायिक परिसर है। इसी के एक हिस्से में पहले से सत्येंद्र नारायण सिन्हा पार्क और उनकी प्रतिमा लगी है। 08 जनवरी 2023

 को जिला परिषद की सामान्य बैठक में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित हुआ था। 06 नवंबर 2024 को समर्थकों ने परिसर में बने फाउंडेशन पर रामबिलास बाबू की आदमकद प्रतिमा स्थापित कर दी।   0 8 नवंबर 2024 की रात तत्कालीन उप विकास आयुक्त अभ्येंद्र मोहन सिंह के आदेश पर प्रशासन ने प्रतिमा को हटाकर नगर थाना में रखवा दिया।   

12 नवंबर 2024 को जिला पार्षदों और "विरासत बचाओ संघर्ष परिषद" ने प्रेस वार्ता कर 15 दिन में प्रतिमा यथास्थान लगाने का अल्टीमेटम दिया। लेकिन मामला लटका ही रह गया। 




जानिए कौन थे रामविलास सिंह 

स्व.राम बिलास सिंह 1967, 1972, 1977, 1985 और 1990 में विधायक बने। वह दाउदनगर हसपुरा और दाऊद नगर ओबरा विधानसभा क्षेत्र से विधायक रहे। तीन बार मंत्री बने। वे समाजवादी नेता रहे। उन्होंने इस संवाददाता से 11 अप्रैल 2009 को बातचीत में बताया था कि अपना पहला चुनाव मात्र 3000 रुपये में लड़े थे और 1990 के चुनाव में मात्र छः से सात हजार रुपये खर्च कर विधायक बने थे। उन्होंने कहा था कि सामाजिक एवं आर्थिक सुधार के बिना समाज नहीं बदल सकता।