(टेढ़ी पॉलिटिक्स)
वंदेमातरम और मनुस्मृति को लेकर जो स्टैंड राहुल गांधी और कांग्रेस ने लिया है वह संसद और संविधान की सर्वोच्चता के साथ बहुसंख्यकों की भावना को ठेंगा दिखाने के समान है। दरअसल में ‘सर तन से जुदा करने’ और “छह इंच छोटा करने” वाले समूह इनके साथ खड़े हैं, तब भी इनका डर उन्हें तटस्थ नहीं होने देता। दूसरी तरफ बहु संख्यक समाज की ओर से ऐसे हमले ना होने का विश्वास ऐसे नेताओं को उच्छृंखलता की हद तक निर्भिक बनाता है। इस पूरे संदर्भ में एक विश्लेषण- डॉ. उपेंद्र कश्यप का।)
डॉ. उपेंद्र कश्यप
वरिष्ठ लेखक व पत्रकार
मो.नं.-9931852301
ईमेल- upendrakashyapdnr@gmail.com
संवैधानिक प्रविधान होने के बावजूद वंदे मातरम के सभी छह छंद गाने से स्पष्ट तौर पर इंकार करने और छात्रों की गूंज कार्यक्रम में सर से पांव तक ढकी मुस्लिम महिला के सामने ही मनुस्मृति के हवाले से हिंदू महिला प्रताड़ना की बात कर राहुल गांधी एक बार फिर भाजपा के पीच पर बैटिंग कर बैठे। हर हाल में इन दोनों मुद्दों का लाभ भाजपा और उसके गठबंधन साथियों को मिलेगा। जबकि इसका राजनीतिक नुकसान हर हाल में कांग्रेस और उसके गठबंधन में शामिल दलों को होगा। यह स्पष्ट है। दूसरे मुद्दे इसकी भरपाई कर जाएं तो बात और होगी। दरअसल इन दोनों मुद्दों को जिस तरह से कांग्रेस और राहुल गांधी ने सामने रखा उससे एक बात स्पष्ट हो गई है कि पार्टी हो या व्यक्ति, दोनों ही मुस्लिम परस्त हैं। इसके प्रमाण के तौर पर यह भी देखें कि 2014 के लोकसभा चुनाव में बुरी तरह हारने और उसके बाद एके एंटनी की रिपोर्ट सामने आने के बावजूद कांग्रेस सबक सीखने को तैयार नहीं दिखती। वह मुस्लिम तुष्टिकरण करने और हिंदू परंपराओं को चोटिल करने के मौके से बाज आने को तैयार कतई नहीं है।
वर्ष 2014 के चुनाव परिणाम को अगर देखें तो वैश्विक स्तर पर इस्लामिक स्टेट धार्मिक कट्टरता के कारण नारंगी कपड़ा पहनकर लोगों की गर्दन रेत रही थी, पिंजरे में बंद कर जलाकर मार दे रही थी, जिससे पूरे विश्व में खौफ पैदा हो गया था। कट्टरपंथ को लेकर विश्व चिंतित था, उस बीच भारत में मनमोहन सरकार के कुछ मुस्लिम परस्त निर्णय सामने आए और लोगों को यह लगा कि कांग्रेस न सिर्फ मुस्लिम परस्ती में व्यस्त है बल्कि उसे किसी भी स्तर पर हिंदू और सनातन परंपराओं को अपमानित करने से परहेज नहीं है। नतीजा वराह 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा अकेले बहुमत से अधिक कुल 282 सीट जीती तो कांग्रेस मात्र 44 पर सिमट गई। पार्टी ने अपने ही वरिष्ठ नेता एके एंटनी के नेतृत्व में चुनावी हार की समीक्षा के लिए कमेटी का गठन किया। कमेटी ने अपने रिपोर्ट में बताया कि कांग्रेस की इस सबसे बुरी हार की वजह मुस्लिम परस्त और हिंदू विरोधी होना प्रमुख कारण है। हालांकि इसके बावजूद कांग्रेस और उसके नेताओं पर कोई असर नहीं पड़ा। हार की जो सबसे बड़ी वजह एंटनी ने बताएं उसे ही खारिज कर दिया। उसी रास्ते पर तक चलते रहे। नतीजा 2019 में भाजपा 303 और कांग्रेस 52 सीट जीती। कांग्रेस ने फिर सॉफ्ट हिंदुत्व का रास्ता अपनाया और जनहित से जुड़े मुद्दों को उठाना शुरू किया। संविधान बदलने की एक भाजपा नेता के बयान को चुनाव में हथियार की तरह संविधान लहराते हुए राहुल ने इस्तेमाल किया। तब 2024 में भाजपा को 240 सीटों पर रोकने में कामयाबी मिली और कांग्रेस को 99 सीट मिली। माना गया कि कांग्रेस को मुस्लिम परस्ती और हिंदू सनातन विरोध की बात छोड़कर लगातार आगे बढ़ते रहने से कामयाबी मिलेगी। लेकिन राहुल इस बात को भूल जाते हैं। क्योंकि उसके जिन में ही जैसे सनातन विरोध, हिंदू विरोध और मुस्लिम परस्ती की बीमारी समा गई है। कांग्रेस कहती है कि वह अपने कार्यक्रमों में वंदे मातरम के दो छंद ही गायेगी, तो सीधा-सीधा वह संसद द्वारा बनाए गए संविधान ना मानने का उदंडता से ऐलान करती है। जिसे कोई भी भारतीय स्वीकार नहीं करेगा। जब यह कानून बन रहा था तब सदन में विरोध न करने वाली कांग्रेस अब इसका विरोध कर रही है तो स्वाभाविक है कि वह मुस्लिम परस्ती के मामले में तनिक भी उदार नहीं दिखना चाहती है। छात्रों के गूंज कार्यक्रम में सर से पांव तक लबादा ओढ़ी युवती के सामने मनुस्मृति का हवाला देकर जो बात राहुल ने कही वह भी इसी का उदाहरण है। तमाम इस्लामिक देशों में ही नहीं बल्कि इस्लाम के मानने वाले इक्के दुक्के लोगों को छोड़कर तमाम आबादी में व्यवहारिक जीवन में अमल में लाने वाली किताबी बात पर चर्चा करने का साहस न रखने वाले कांग्रेसी उस मनुस्मृति के एकाधिक श्लोक की चर्चा करते हैं जो शायद ही किसी परिवार में माना जाता हो। मनुस्मृति की ऐसी बातें कहीं लागू है, इसके उदाहरण भी नहीं मिलते। किसी भी हिंदू परिवार और समाज में मनुस्मृति लागू नहीं है, और ना ही उसमें कही गई उस बात पर अमल होता है जिसे राहुल लेकर आगे बढ़े। हालांकि मनुस्मृति में जो अच्छी बातें कही गई है इसका उल्लेख राहुल नहीं करते और किसी भी गैर हिंदू धर्म ग्रंथो में उल्लेखित गलत बातों का उल्लेख राहुल या कांग्रेस के नेता नहीं करते। इससे यह साफ संदेश जाता है वह हिंदू और सनातन परंपराओं को अपमानित करने का मौका ढूंढते हैं, अवसर बनाते हैं।
वह समझते हैं कि ऐसा करने से मुस्लिम उनके साथ चिपका हुआ रहेगा। दूसरी बात यह स्पष्ट है कि दूसरे धर्म को लेकर राहुल ही नहीं कोई भी कांग्रेसी और आई एन डी आई ए के नेता या दल इसलिए चुप रहते हैं कि उनका सर तन से जुदा हो जाने का खतरा है। लेकिन इस पृथ्वी पर अपेक्षाकृत सबसे उदार, सबसे सहिष्णु और सहजीवन में सर्वाधिक विश्वास रखने वाला हिंदू ऐसा नहीं करता। भारत में छह इंच छोट करने वाला और यह बात कह कर गरीबों, कमजोरों को डराने वाला राजनीतिक समूह आई एन डी आई ए का हिस्सा है। सर तन से जुदा करने वाला समूह इसी गठबंधन का हिस्सा है। दूसरे धर्म की कुरीतियों, बुरी बातों, बुरे निर्देशों, खराब परंपराओं, गलत मान्यताओं पर जुबान ना खोलने की कसम खा चुका नेता और दल हिंदुओं को, सनातनियों को अपमानित करते रहता है। इसलिए कि उसे पता है कि हिंदुओं को, सनातनियों को चाहे जितनी गालियां दो, वह न तो तन सर से जुदा करेगा और ना छह इंच छोट करेगा। इसी कारण ऐसे नेता बेखौफ अपमानित करते हैं। थोड़ी देर के लिए मान लें कि मनुस्मृति में पिता ,पति और पुत्र के अधीन स्त्री को रहने की बात कही गई है तो क्या कोई बता सकता है कि मनुस्मृति की यह बात लागू कहां है? कैसे लागू है ?कहां यह अनिवार्य है? जब यह विचार कहीं अनुकरणीय ही नहीं है, कहीं लागू ही नहीं है, कहीं बाध्य नहीं है, कहीं अमल में नहीं है तो फिर इस मुद्दे को बार-बार उठाकर हिंदुओं को अपमानित करने उसे उकसाने के अलावा कौन सा लक्ष्य हासिल हो सकता है? दूसरी तरफ औरतों को लेकर घृणा के स्तर तक बातें कहने वाले धर्म, समुदाय, समूह के साथ खड़े ही नहीं हैं, बल्कि किसी भी तरह के सुधार की बात वहां नहीं की जाती। इसलिए राहुल गांधी एक साथ संसद और संविधान की सर्वोच्चता को खारिज कर रहे हैं तो वहीं दूसरी तरफ मनुस्मृति के बहाने देश की बहुसंख्यक आबादी की भावनाओं को तार तार कर रहे हैं। ऐसी स्थिति में 2027 हो या 2029 में चुनावी जीत का अगर कांग्रेसी और राहुल सपना देख रहे हैं तो शायद हकीकत के सामने आंख मूंद कर खड़े दिखते हैं।
दरअसल, कांग्रेस लंबे समय से अल्पसंख्यक, सवर्ण और अनुसूचित जाति समूहों को अपने व्यापक गठबंधन का हिस्सा मानती रही है। उससे सवर्ण छिटके, अनुसूचित जाति समूह छोड़ गया। अब सिर्फ सर्वाधिक संख्या में मुस्लिम मतदाता उससे चिपके हुए हैं। कांग्रेस के लिए अभी भी वह महत्वपूर्ण हैं। मुस्लिम वोट खोने का डर उसे सताते रहता है। उसके सामने एक वास्तविक समस्या है। यदि वह मुस्लिम मुद्दों पर बहुत पीछे हटती है तो उसे मुस्लिम मतदाताओं के दूसरी पार्टियों, विशेषकर क्षेत्रीय दलों या एआईएमआईएम की ओर जाने का खतरा है। इसी संदर्भ में कांग्रेस नेताओं की बेचैनी को देखा जाना चाहिए। कांग्रेस की मुस्लिम-केंद्रित राजनीतिक छवि बढ़ने से उसे व्यापक हिंदू मतदाताओं के बीच नुकसान हो सकता है। इससे बेखबर रहना शायद कांग्रेस की आवश्यक विवशता बन गयी है।
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