![]() |
| दैनिक जागरण में 5 फरवरी 2026 को प्रकाशित |
दाउदनगर की हृदयस्थली का नाम है भखरुआं
नील की खेती और नील कोठियों से है रिश्ता
उपेंद्र कश्यप● दाउदनगर (औरंगाबाद) : आधी रात को स्थित गोलंबर के ध्वस्त होने के बाद भखरुआं की चर्चा खूब हो रही है। आमा आवाम से लेकर इंटरनेट मीडिया तक में। ऐसे में यह जानना बड़ा प्रासंगिक होगा कि इस स्थल का नाम भखरुआं क्यों पड़ा। दाउदनगर में कोई भी व्यक्ति भखरुआं मोड़ सुनकर चौंकता जरूर है। उसके मन में यह जिज्ञासा जरूर उठती है कि इस स्थान का नाम इस तरह का क्यों है। यह अटपटा शब्द लगता है। वर्ष 2007 में प्रकाशित स्मारिका उत्कर्ष में इस विषय में पर चर्चा की गई है। दाउदनगर में दो नील कोठियां है। एक बाजार में पटना मुख्य नहर के पास के समीप देवी मंदिर के नजदीक और दूसरा बुधन बिगहा के पास। बुधन बिगहा में जो नील कोठी है, उसी के मैनेजर हुआ करते थे बैक्रहम मूर। जब भारत गुलाम हुआ करता था तब नील की खेती करने और उपज से नील निकालने के लिए बने नील कोठियों का मैनेजर हुआ करते थे मूर। उन्हीं के नाम पर यह स्थल भखरुआं मोड़ कहा जाने लगा। यह शहर का हृदय स्थल है।
शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय तरार के परिसर में स्थित मंदिर के समीप एक पीपल का पेड़ है। जिसके नीचे दब गया है उनका कब्र। कब्र की कुछ निशानियां बची हुई है। उनके निधन के बाद जब कब्र बनाए गए तो उसके बगल में ही पीपल का पौधा लगाया गया होगा। पीपल का पेड़ विशाल होता गया और कब्र विस्तारित होते पेड़ के दबाव में आकर ध्वस्त हो गया।
बुधन बिगहा से है अंग्रेज अधिकारी मूर का संबंध
बैक्रहम मूर के निवास पर एक नौकर था-बुधन यादव। बुधन बेलाढ़ी के निवासी थे। वह बड़े ही मालिक-सेवी थे। उनके सेवा भाव से प्रभावित हो वैक्रहम मूर जब इंगलैण्ड चले गये तो बुधन को भी साथ लेते गये और घुमाकर ले आये। जब उनकी मृत्यु हुई तो नील कोठी के पास ही बुधन की पहल पर उनको दफनाया गया। यहां आज भी उस कब्र के अवशेष बचे हुए हैं।

No comments:
Post a Comment