Saturday, 8 August 2026

मैं और राष्ट्रीय नवीन मेल का आरम्भ व वर्तमान


■ पत्र, पत्रकार व पत्रकारिता:- 02 ■

● उपेंद्र कश्यप ●


जीवन में हर पल परिवर्तन दिखता है, चाहे वह सकारात्मक हो या नकारात्मक। हम बात कर रहे हैं सकारात्मकता की, जिसमें अतीत भी है, वर्तमान भी और शायद भविष्य का छुपा हुआ बीज भी, जो पता नहीं कितना बड़ा पौधा या वृक्ष बन सकेगा।

 बात 1994 की है। अक्टूबर का महीना था। लैंडलाइन के अलावा संचार का कोई दूसरा इलेक्ट्रॉनिक माध्यम तब नहीं हुआ करता था। डेहरी के श्री कृष्णा किसलय भैया (अब स्वर्गीय) से मैं जुड़ा हुआ था। पत्रकारिता का पहला आरंभ भी मैंने इनके द्वारा प्रकाशित “सोनमाटी” से किया था। तब बीएमपी 2 के सहायक समादेष्टा आई ए सिद्दीकी जजिब गाजीपुरी के इंटरव्यू के साथ किया था। इस बीच सूचना यह मिली कि डाल्टेनगंज से राष्ट्रीय नवीन मेल दैनिक अखबार का प्रकाशन हो रहा है। ध्यान रहे तब बिहार झारखंड एक था।

बिहार से प्रकाशित हिंदुस्तान और आज अखबार 12 पेज के ब्लैक एंड व्हाइट 1.90 रुपये मूल्य के साथ बिकते थे, जबकि 12 पेज ब्लैक एंड व्हाइट के साथ ₹02 मूल्य से राष्ट्रीय नवीन मेल आरंभ हुआ था। कृष्ण किसलय भैया ने मुझे कहा कि आप दाउदनगर से रिपोर्टिंग करिए। वर्ष 1994 में ठीक विजयादशमी के दिन इस अखबार का आरंभ तत्कालीन गृह राज्य मंत्री सुबोधकांत सहाय ने किया था। मैं उद्घाटन समारोह में भी शामिल हुआ था। दूसरे दिन से ही मेरी खबरें भी राष्ट्रीय नवीन मेल में प्रकाशित होने लगी। 32 साल बाद अब देश को प्रभावित करने वाली राजनीतिक, सामाजिक, न्यायिक घटनाओं पर लिखना आरंभ किया। तो 31 जुलाई 2026 को एक आलेख- विपक्ष को सत्ता से दूर कर रहा सनातन का अपमान- शीर्षक से आलेख, मेरा कालम- “टेढ़ी पॉलिटिक्स”- के लिए लिखकर माननीय संपादक सुनील बादल सर को भेजा। उनसे मेरा कोई परिचय पूर्व से नहीं था। उनको अपना इतिहास बताया और उन्होंने इस आलेख को संपादकीय पन्ने पर जगह दी। एक अगस्त को प्रकाशित हुआ। फिर 7 अगस्त को -न्यायिक फैसले के लिए जिम्मेदारी तय करने का वक्त- आलेख भेजा, जिसे 8 अगस्त को संपादकीय पेज पर स्थान मिला। इसके लिए संपादक सर को आभार।



 एक दूसरी बात मैं कह रहा हूं कि जब आप किसी अखबार के साथ अपनी पत्रकारिता का आरंभ एक प्रखंड रिपोर्टर के रूप में करते हैं और इस अखबार के संपादकीय पन्ने पर जब आप छपने लगते हैं तो इसकी खुशी अलग होती है। इससे न सिर्फ आपकी लेखनी को प्रमाणिकता, विश्वसनीयता, व्यापकता, बहुलता प्राप्त होती है, बल्कि आप उत्साहित होते हैं, प्रेरित होते हैं और एक नई यात्रा आरंभ करने का जज्बा आपमें पैदा होता है। स्वाभाविक है कि राष्ट्रीय नवीन मेल के संपादकीय पन्ने पर छपने से यह सब मुझे भी प्राप्त हो रहा है। हालांकि पहली बार किसी अखबार के संपादकीय पेज पर जो मेरा आलेख प्रकाशित हुआ था उसका शीर्षक था - सवर्ण वादी मीडिया बनाम निकम्मी बहुजनवादी सोच। यह आलेख 17 सितंबर 2018 को बिहार और दिल्ली से प्रकाशित मीडिया दर्शन के संपादकीय पेज पर छपा था। हालांकि इसके छपने के बाद कुछ दुश्वारियां भी झेलनी पड़ी थी। जो फिर कभी अपने कालम- ‘पत्र, पत्रकार और पत्रकारिता’ में लिखूंगा।


 

फिलहाल में “टेढ़ी पॉलिटिक्स” कालम से संपादकीय पन्नों के लिए आलेख लिख रहा हूं। जिसे बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और दिल्ली समेत कई स्थानों से प्रकाशित विभिन्न अखबारों और वेबसाइटों में जगह मिल रही है। मीडिया मार्ट इंडिया, रांची व डालटनगंज से प्रकाशित राष्ट्रीय नवीन मेल, नई दिल्ली-उत्तरप्रदेश- झारखंड- छत्तीसगढ़ और बिहार से प्रकाशित मीडिया दर्शन, औरंगाबाद से प्रकाशित सीतयोग, रांची-दिल्ली-लखनऊ-पटना से प्रकाशित उजाला पत्रिका में स्थान प्राप्त हो रहा है। पत्रकारिता में यह एक नई यात्रा है। यह बीज जो अंकुरित हुआ है, कितना बड़ा वृक्ष बनता है, मुझे नहीं मालूम।


 बस गीता का यह संदेश कि- फल प्राप्ति की चिंता किए बिना सतत काम करते रहिए, पर अमल करते हुए काम करते रहा हूं, करते रहूंगा। उपलब्धि की ऊंचाई या लंबाई कितनी होगी, इसकी चिंता किये बगैर यह यात्रा जारी है।

आप सबका प्यार मिलता रहता है, इसके लिए सभी के प्रति बहुत-बहुत आभार व्यक्त करता हूं।


धन्यवाद, मेरा यह लिखा पढ़ने के लिए।


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उम्मीद कर सकते हैं क्या “एक शिक्षा व्यवस्था” की

 



■ टेढ़ी पॉलिटिक्स : ■

डॉ.उपेंद्र कश्यप 

मो.नं.- 9931852301



(बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के बयान से फिर यह उम्मीद जगी है कि शिक्षा व्यवस्था में सुधार हो सकता है। क्या एक शिक्षा व्यवस्था संभव नहीं है, और है तो फिर कैसे हैं? इसी संदर्भ में इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए फैसले और अब सम्राट चौधरी के बयान का विश्लेषण कर रहे हैं वरिष्ठ लेखक व पत्रकार- डॉ. उपेंद्र कश्यप)



बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने संत रविदास जयंती पर आयोजित समारोह को संबोधित करते हुए कहा है कि अगले एक-दो वर्षों में ऐसी व्यवस्था बनाने का लक्ष्य है जिससे मंत्री, विधायक और अफसर के बच्चे भी सरकारी स्कूलों में पढ़ें। ऐसा होने पर ही माना जाएगा कि सरकारी शिक्षा व्यवस्था वाकई बदली है।

ऐसा कह कर “एक शिक्षा व्यवस्था” की एक उम्मीद तो जगाते हैं लेकिन वह यह भी स्वीकार करते हैं कि सरकारी शिक्षा व्यवस्था अभी इतनी दुरुस्त नहीं हुई है कि मंत्री और अधिकारी के बच्चे भी उसमें पढ़ सकें।

स्थिति तो ऐसी भी नहीं है कि कस्बाई और छोटे शहरी क्षेत्र के नेता, व्यवसायी, सरकारी कर्मचारी, दूसरे- तीसरे दर्जे के अधिकारी के बच्चे भी सरकारी स्कूलों में पढ़ सकें। स्थिति यह है कि हर वह मां पिता जो थोड़ा भी सक्षम है, अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में पढ़ाना नहीं चाहता। वह निजी विद्यालयों में अपने बच्चों को पढ़ाता है। पेट व कपड़ा में कटौती करके, अपने शौक त्याग कर। इसके लिए कुछ हद तक स्टेटस सिंबल भी जिम्मेदार है। लेकिन 90 प्रतिशत जिम्मेदार शिक्षा व्यवस्था है। हर सक्षम व्यक्ति सरकारी विद्यालयों में एप्ने बच्चे को पढ़ाना स्वीकार नहीं करता। कह सकते हैं कि सरकारी विद्यालयों में वही बच्चे पढ़ते हैं जिनके माता-पिता के पास निजी विद्यालयों में पढ़ाने का विकल्प नहीं है, या सक्षमता नहीं है। तो क्या सम्राट चौधरी के इस बयान से यह उम्मीद दिखती है कि कभी एक शिक्षा व्यवस्था होगी। हालांकि यह उम्मीद जरूर जगती है कि शिक्षा व्यवस्था में सुधार सरकार की प्राथमिकता में शायद अब आ गई है। 

यहां उल्लेखनीय है 18 अगस्त 2015 को आया इलाहाबाद हाईकोर्ट का वह फैसला, जिसमें न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल ने कहा था कि- बेसिक शिक्षा सभी के लिए एक होनी चाहिए। सरकारी सुविधा संसाधन और अर्थ का लाभ लेने वाला हर व्यक्ति का बच्चा सरकारी स्कूल में पढ़े यह सुनिश्चित होना चाहिए। कहा था- उत्तर प्रदेश के सरकारी कर्मचारी, जन प्रतिनिधि, स्थानीय निकायों के पदाधिकारी, न्यायपालिका से जुड़े लोग तथा सरकारी खजाने से वेतन या मानदेय पाने वाले सभी व्यक्तियों के बच्चों को सरकार प्राथमिक विद्यालयों में पढ़ाने की व्यवस्था सरकार करे। अदालत ने तब कहा था- जब तक नीति निर्माता और सरकारी अधिकारियों के अपने बच्चे सरकारी स्कूलों में नहीं पढ़ेंगे, तब तक विभिन्न विद्यालयों की गुणवत्ता सुधारने के प्रति गंभीर नहीं होंगे। कितनी सही बात कही गयी थी।



इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले को अगर तब की उत्तर प्रदेश सरकार (मुख्यमंत्री अखिलेश यादव थे) अमल में ला चुकी होती तो आज बात बहुत हद तक व्यवस्था आगे बढ़ गई होती। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इस उत्तर प्रदेश में बाद में मुख्यमंत्री बने और अब तक सत्ता चला रहे आदित्यनाथ योगी नव भी इस दिशा में पहल नहीं किया।

 दरअसल हकीकत यह है कि इलाहाबाद के उस फैसले की चर्चा करने से हर जाति- धर्म, राजनीतिक दल के नेता बचते रहे। एक सच यह भी है कि आम नागरिक भी उस फैसले को लेकर आगे नहीं बढ़ा। दरअसल, समस्या यह है कि इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले को अगर सरकार लागू कर दे तो उनका ही हित प्रभावित होगा। निजी शिक्षण संस्थानों से बड़े बड़े नेताओं और राजनीतिक दलों के हित जुड़े हुए हैं। उनको आर्थिक लाभ मिलता है। अधिकारियों को भी आर्थिक-सामाजिक लाभ ऐसे संस्थानों से प्राप्त होते हैं। 


आम जनता की तरफ से आवाज क्यों नहीं उठी। मीडिया ने भी इस मुद्दे को आवाज देना उचित नहीं समझा। न मुख्यधारा की मीडिया (प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक) में इलाहाबाद के फैसले को लागू करने के मुद्दे पर चर्चा हुई, न सोशल मीडिया इंफ्लुएंसरों ने इसे उठाया। कहीं चर्चा, बहस नहीं। दरअसल, जिस बड़े तबके को एक शिक्षा व्यवस्था से लाभ होगा, वह आंदोलन करने के प्रति न तो जागरूक है, न ही वह इसको लेकर किसी भी प्रकार का कोई हानि का जोखिल लेने को तैयार है। फिर जो इससे बहुत आहत नहीं हैं, परेशान नहीं हैं, वे भला क्यों सड़क पर उतरेंगे। जो वर्ग सक्षम नहीं है निजी विद्यालयों में अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए वह सड़क पर उतरने में भी सक्षम नहीं है। जो तबका सरकारी विद्यालयों को नजरअंदाज कर निजी विद्यालयों में बच्चों को पढा रहा है उसे बहुत पीड़ा इस मुद्दे को लेकर नहीं है। और ना ही वह संघर्ष करने सड़क पर उतरने वाला है। एक बड़ा हिस्सा कसमकश में है कि क्या उसके सड़क पर उतरने से भी व्यवस्था बदल जाएगी। या सड़क पर उतरने से उसको कितना लाभ हानि होगा, यह विचार करते हुए वह सड़क पर नहीं उतर रहा। कारण कई हो सकते हैं, लेकिन अंतिम सत्य तो यही है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को सड़क का मुद्दा किसी ने नहीं बनाया। जब देश में एक देश एक चुनाव की तैयारी है, एक देश एक राशन की व्यवस्था लागू हो गयी है तो क्यों नहीं एक देश एक शिक्षा का मुद्दा उठ रहा है। समस्या यही है कि राजनीति और समाज में जो सक्रिय तबका है, उसको इस मुद्दे से बहुत लेना देना नहीं है। और जो सरकारी शिक्षा व्यवस्था का लाभ लेने के लिए मजबूर है, उसके पास रोजमर्रे का संघर्ष इतना है कि बच्चों की पढ़ाई जिस स्कूल में वह करवा रहा है उस स्कूल में क्या संसाधन है, क्या सुविधा है, उसके अधिकारों का कितना हनन हो रहा है, इससे उसे कोई मतलब नहीं है। इसके प्रति दरअसल वह जागरूक भी नहीं है। इस देश में जब तक कि हंगामा नहीं कोई समूह करता है, जब तक धरना प्रदर्शन नहीं होगा, जब तक मामले को आप न्यायिक लड़ाई नहीं बनाएंगे, तब तक कुछ सुधारात्मक कार्य नहीं होने वाला। गरीबों की ना सुनने की आदत हर उस वर्ग में है जो थोड़ा भी सक्षम हो गया है। देश में आज जरूरत इस बात की है कि एक देश एक शिक्षा के मुद्दे को लेकर योजनाबद्ध तरीके से आंदोलन हो। मामले को सुप्रीम कोर्ट में ले जाया जाए। लेकिन फिर सवाल यह है कि इस मुद्दे पर आंदोलन कौन करेगा, और आंदोलनकारी को ना तो कोई खाना पहुंचाने जाएगा और ना उनके सुविधा, संसाधनों का कोई ख्याल रखेगा। ऐसे मुद्दे के लिए कोई एनजीओ, राजनीतिक दल, नेता आगे नहीं आएगा, क्योंकि उसको विदेशी चंदा कोई नहीं देगा। कोई अरब या पश्चिम देश ऐसे आंदोलन के लिए न फंडिंग करेगा न खाना भेजेगा। इसलिए गरीबों, वंचित तबके को ही आगे आना होगा, देर-सबेर।




(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह उनके निजी विचार हैं।)


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Friday, 7 August 2026

न्यायिक फैसले के लिए जिम्मेदारी तय करने का वक्त

 



■ टेढ़ी पॉलिटिक्स : ■

● उड़ीसा के अर्जुन जानी के संदर्भ में जिस तरह से सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आया, उससे यह आवश्यक्ता महसूस हो रही है कि विचारधीन कैदियों के जमानत और बिना दोष लंबे समय तक जेल में रहने के मामले पर गहन विचार विमर्श हो। लंबे समय तक जेल में रहने के बाद जब कोई दोषमुक्त साबित होता है, तब तक उसका परिवार बर्बाद हो चुका होता है। उसका कैरियर तबाह हो चुका होता है। सामाजिक, आर्थिक, परिवारिक सभी तरह की क्षति वह भुगत चुका होता है। सवाल है कि इसके लिए जिम्मेदार कौन है? क्या न्यायिक जवाबदेही तय करने और ऐसे मामालों में मुआवजे का प्रविधान नहीं होना चाहिए। वरिष्ठ पत्रकार व लेखक डॉ. उपेंद्र कश्यप का विश्लेषण:-


विचारणीय खबर यह आई है कि उड़ीसा के अर्जुन जानी को सुप्रीम कोर्ट ने हत्या के आरोप में दोष मुक्त कर दिया है। इसी मामले में 22 साल जेल में रहे। सुप्रीम कोर्ट ने न्याय व्यवस्था की सामूहिक विफलता को इसके लिए जिम्मेदार बताया। कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने साक्ष्य का सही मूल्यांकन नहीं किया। हाई कोर्ट मूकदर्शक बना रहा। अर्जुन जानी को सुप्रीम कोर्ट से मई 2026 में जमानत मिली थी। जब वह अपने गांव हिरली डांगरी लौटे तो गांव में उनका घर नहीं बचा था। घर की जगह झाड़ियां उग गयी थी। गांव में कोई ऐसा नहीं जिसे वह अपना कह सके। मां का निधन पहले ही हो गया था  परिवार में न भाई है ना बहन है, ना उसकी शादी हो पाई। एक हद तक वह अब अवसाद में जीता है। अर्जुन कभी नदी किनारे बैठे रहता है तो कभी जंगल की ओर निहारते हुए जाता है। 

यह खबर मामूली नहीं है। देश में अब हर कार्य के लिए जिम्मेदारी तय करने की मांग उठने लगी है। 21 वीं सदी में लोकतांत्रिक अधिकारों को लेकर हर पीढ़ी के लोगों का नजरिया बदला है। ऐसे में न्यायिक जवाब देही भी तय होनी चाहिए। कॉलेजियम सिस्टम विवादों में रहा है। इसका भारी विरोध होता है। जजों की नियुक्ति में पारदर्शिता का घोर अभाव है। जाति का विमर्श अलग है। सवाल यह उठता है कि अर्जुन जानी के लिए मामले में जो हुआ उसके लिए जिम्मेदार कौन है? हद यह है कि निचली अदालत की सजा में से कितने प्रतिशत फैसले उच्च न्यायालय या सुप्रीम कोर्ट बदल देते हैं। इसका कोई आधिकारिक राष्ट्रीय प्रतिशत उपलब्ध नहीं है। कारण है एनसीआरबी या न्यायपालिका ऐसा समेकित डेटा प्रकाशित नहीं करती कि "ट्रायल कोर्ट द्वारा दोषी ठहराए गए कुल अभियुक्तों में से कितनों को हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट ने बरी कर दिया।" यह स्थिति बदलनी चाहिए। यह जानने का हक हर भारतीय को होना ही होना चाहिए।

हालांकि समय समय पर उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय अनेक मामलों में दोषसिद्धि को पलटते हैं।



वहीं अनेक मामलों में वे सजा को बरकरार भी रखते हैं या सजा की अवधि में संशोधन करते हैं। लेकिन यह प्रयाप्त 21 वीं सदी के लोकतांत्रिक परिस्थितियों में नहीं माना जाना चाहिए। कुल दर्ज मामलों में एनसीआरबी की क्राइम इन इंडिया 2023 की रिपोर्ट के अनुसार पुलिस द्वारा आरोपपत्र दाखिल होने की दर: लगभग 72.7 प्रतिशत है। जिन मामलों का न्यायालय में निर्णय हुआ, उनमें लगभग 54 प्रतिशत मामलों में दोषसिद्धि हुई। यह निर्णीत मामलों का प्रतिशत है। कुल दर्ज प्राथमिकियों का नहीं। क्योंकि अधिकांश मामले अभी लंबित रहते हैं। वैसे भी एक तस्वीर काफी भयावह है, जिसकी चर्चा गाहे बगाहे होते रहती है। भारत में लंबित मामलों की स्थिति बहुत गंभीर है।

सभी स्तरों की अदालतों (जिला, उच्च न्यायालय, सर्वोच्च न्यायालय) में पांच करोड़ से अधिक मामले लंबित हैं। केवल उच्च न्यायालयों में लाखों मामले वर्षों से लंबित हैं। लगभग 80000 मामले 30 वर्ष से अधिक पुराने हैं। सर्वोच्च न्यायालय में भी 10000 से अधिक मामले 10 वर्ष से अधिक समय से लंबित बताए गए हैं। 



ऐसी तस्वीरों के बीच कानूनी और न्यायिक मामलों में जवाबदेही तय करने का अब वक्त आ गया है। यह खुला हुआ सच है कि थानों में अनुसंधानकर्ता (आईओ) और थाना अध्यक्ष के स्तर पर हर सक्षम व्यक्ति अपने अनुकूल जांच की दिशा तय करवाने में प्रायः सफल होता है। यही नहीं कभी-कभी तो यह भी देखा गया है कि कांड का जो सबसे महत्वपूर्ण कड़ी आईओ होता है उसे किसी भी मामले का मजबूत पक्षकार अपने लिए काम करने के लिए खरीद लेता है। यहां से ऊपर थानेदार हो, या पुलिस इंस्पेक्टर हो, या डीएसपी हो, और कई मामलों में तो एसपी और उसके ऊपर के अधिकारी पर भी जांच अपने अनुकूल बनाने के लिए पद, प्रतिष्ठा और धन से संपन्न व्यक्ति सफल होता है। स्वाभाविक है कि ऐसी स्थिति में निर्दोष को जेल भेज दिया जाता है और दोषी को कुछ नहीं होता है। ऐसे ही कारणों से यह अवधारणा बन गई है कि- अपराध कर भी देंगे तो क्या हो जाएगा? यही कारण है कि भारत में अपराध का दर नहीं घट रहा है। जिस तरह से अर्जुन जानी को 22 साल बिना दोष के जेल में रहना पड़ा और अपना सब कुछ गवां देना पड़ा, वैसे लाखों लोग इस देश में है जो निर्दोष होते हुए भी विचाराधीन कैदी के रूप में लंबे समय तक जेल में रहते हैं। उनकी जिंदगी नरक बन जाती है। परिवार और पीढ़ी तक पूरी तरह बिखर जाता है। आर्थिक तंगहाली का शिकार हो जाता है। इसलिए जरूरत इस बात की है कि न्यायपालिका ही सही, वह यह तय करें कि अगर कोई निर्दोष जेल जाता है तो इसके लिए आईओ और थाना अध्यक्ष समेत संबंधित कांड के अनुसंधान में सम्मिलित हर अधिकारी (अगर डाक्टर या दूसरे विशेषज्ञ शामिल हों तो वे भी) को जिम्मेदार ठहराया जाए। महीना वार के हिसाब से मुआवजे की राशि तय होनी चाहिए। कोई एक माह या साल तक जेल रहता है और दोष मुक्त साबित होता है, तो उसे कितनी राशि मुआवजे में दी जानी चाहिए, यह भी तय होना चाहिए।  अगर कोई जमानत पर भी बाहर है और परेशान हो रहा है न्यायिक और पुलिस के कारण तो, उसके लिए भी मुआवजे की राशि तय होनी चाहिए। यह राशि निश्चित रूप से कांडों के अनुसंधान में शामिल हर अधिकारी से वसूला जाना चाहिए। कई मामलों में कई-कई की संख्या में आईओ होते हैं। उनके वेतन, पेंशन या उनकी खरीदी गई संपत्ति से मुआवजे की धनराशि वसूल किया जाना चाहिए। तभी यह सुनिश्चित होगा कि निर्दोष को कोई अधिकारी जेल ना भेजें और दोषी को बचाने की कोशिश ना कर सके। जब तक ऐसा नहीं होगा इस देश में अर्जुन जानी जैसे लोग बर्बाद होते रहेंगे और पुलिस अधिकारी खेल करके करोड़पति बनते रहेंगे और उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा। इसके साथ-साथ यह भी तय होना चाहिए की किसी कांड का प्रथम अनुसंधानकर्ता व थानाध्यक्ष की जवाबदेही 50 फ़ीसदी तय हो और उसके बाद के 50 प्रतिशत में शामिल सभी अनुसंधान कर्ता, जांच रिपोर्ट देने वाले, बयान देने वाले अधिकारी को शामिल किया जाना चाहिए। जब ऐसा होगा तभी आईओ और थाना अध्यक्ष डरेंगे। अन्यथा ना तो न्यायिक व्यवस्था पर किसी का विश्वास बनेगा और ना ही पुलिस व्यवस्था पर। हम प्रवचन चाहे जितना दे लें, हकीकत यही है कि आम नागरिक को ना तो पुलिस पर भरोसा है और ना ही न्यायपालिका पर। वह यह मानकर चलता है कि सक्षम लोगों के लिए कानून की परिभाषा और उसके अनुपालन का मानक अलग है, और असक्षम लोगों के लिए अलग। इसलिये हर जागरूक व समझदार या थोड़ा भी सम्पन्न व्यक्ति खास बनना चाहता है। इसकी होड़ मची हुई है। सक्षम लोगों को गिरफ्तार करने से पहले पुलिस कर रवैया अलग होता है, और कमजोर व्यक्ति को पकड़ने के लिए अलग। एक ही तरह के मामले में कमजोर व्यक्ति को पुलिस तुरंत जेल में ठूंस देती है, बेरहमी से पिटती है, जबकि उसे खुद थाने से जमानत देने का अधिकार होता है। लेकिन जब सक्षम व्यक्ति होता है तो पहले जांच होगी और तब गिरफ्तारी होगी। सक्षम व्यक्ति को सबूत मिटाने के लिए, गिरफ्तारी से बचने के लिए, अग्रिम जमानत ले लेने के लिए पर्याप्त समय पुलिस वाले उपलब्ध कराते हैं। इस व्यवस्था को बदला जाना चाहिए। जब तक यह व्यवस्था नहीं बदलेगी, सच्चे मायने में लोकतंत्र की खुशबू भारतीयों को महसूस नहीं होगी।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह उनके निजी विचार हैं।)



न्यायिक फैसले के लिए जिम्मेदारी तय करने का वक्त : टेढ़ी पॉलिटिक्स

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Tuesday, 4 August 2026

यहां वाणभट्ट करते थे प्रतिदिन जलाभिषेक

 



महर्षि च्यवन ऋषि के अनुरोध पर श्रीराम ने सीता संग किया था शिव लिंग स्थापित

सावन के प्रथम सोमवार पर विशेष रिपोर्ट

डॉ. उपेंद्र कश्यप

नबिटा संवाददाता

दाउदनगर (औरंगाबाद) ।

देवकुण्ड धाम। जिले का सबसे प्रमुख शिवनगरी। सावन में बाबा के जलाभिषेक के लिए तैयार है। प्रथम सोमवार का अपना महत्व है। इस शिवमंदिर से कई किवंदतियां जुड़ी हुई है। गोह प्रखण्ड में यह स्थित है और इसे त्रेतायुगीय शिव स्थान बताया जाता है। श्रावण-सोमवार को काफी संख्या में भक्त उपस्थित होते हैं। घंटों की प्रतीक्षा के बाद बाबा का दर्शन होता है। यहां के पोखरा को सहस्त्रधारा वाला बताया जाता है। उसी में स्नान कर उसी का जल शिव पर चढ़ाया जाता है। हर समय महामृत्युंजय का जप और रुद्राभिषेक होते रहा है। इस मन्दिर को भव्यता और सुंदरता पूर्व की अपेक्षा काफी अधिक महंत कन्हैयानन्द पुरी ने दिया है। प्राप्त जानकारी के अनुसार सर्व प्रथम सन्यासी मठ महंत द्वारा सरकारी पूजा होती है। तत्पश्चात सभी के लिए द्वार खोल दिया जाता है। सन्ध्या छह बजे आरती के बाद पट (द्वार) बन्द हो जाता है। प्रातः चार बजे पट (द्वार) खुलता है।

आचार्य पंडित लालमोहन शास्त्री बताते हैं कि यह महर्षि च्यवन की तपस्थली है। भगवान् श्रीराम गया श्राद्ध करने के लिए जाते समय यहां विश्राम किये। महर्षि च्यवन के अनुरोध पर श्रीराम ने भगवती सीता के साथ शिव लिंग स्थापना किया। यह महाकाल ज्योतिर्लिंग का उपज्योतिर्लिग है। यह दुग्धेश से दुग्धेश्वर नाथ कहे जाने लगे। काला नीलम के होने की बात कही जाती है। श्री शास्त्री बताते हैं कि सातवीं शताब्दी में प्रीति कुट (पीरु) के रहने वाले गद संस्कृत के आदि महाकवि, उपन्यास कार बाण भट्ट प्रत्येक दिन अपने गांव से यहां आकर पूजा करते थे। संस्कृत भाषा के गीतकार पं. कमलेश मिश्र वासाटाड़ (अरवल) ने दुग्धेश्वर नाथ की संस्कृत और हिन्दी में स्तुति की है। यह मगध का तीसरा महत्वपूर्ण तीर्थ है। भगवान् श्री बाबा दुग्धेश्वर महादेव के द्वार से कोई खाली नहीं जाता है। खाली झोली लेकर आता है और भर कर जाता है। जो चाहा वही पाया।


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अंतिम सोमवार भादव में, 17 अगस्त तक मांगलिक कार्य शुभ

 


सावन मास 2026 के महत्व पर विशेष

18 अगस्त से सावनपुरिया भेजना व शुभ कार्य नहीं

नबिटा संवाददाता

दाउदनगर (औरंगाबाद) ।

30 जुलाई गुरुवार से प्रारंभ सावन का महीना 20 अगस्त दिन शुक्रवार तक रहेगा। सूर्य कर्क संक्रांति 27 जुलाई से 17 अगस्त तक मांगलिक कार्यो के लिए सावन मान्य है। सावन मास के शुरू गुरुवार से होने से भगवान् शंकर अपनी पत्नी पार्वती के साथ रहेंगें। इस दिन पूजा उपासना रुद्राभिषेक करने से भक्तों की अभीष्ट कामनाऐं पूर्ण होगी। कृष्ण पक्ष चौदह दिनों का और शुक्ल पक्ष सोलह दिनों का होगा। आचार्य पं. लाल मोहन शास्त्री बताते हैं कि इस सावन मास में चार सोमवार पड़ेगा। मगध की परम्परा है कि एक या तीन ही सोमवार करना चाहिये। इस वर्ष अन्तिम सोमवार सौर्य मास सावन सौर्य भादव महीना में पड़ेगा। अतः कृष्ण पक्ष का दो और शुक्ल पक्ष का एक सोमवार व्रत करना चाहिये। सावन मास के प्रथम सोमवार से कार्तिक मास के अन्तिम सोमवार तक क्रमश: सोलह सोमवार का व्रत करना महत्वपूर्ण है। यह अधिक फल दायक माना जाता है। श्री शास्त्री सावन मास देवताओं के गुरु वृहस्पतिवार से प्रारम्भ और राक्षस दैत्य गुरु शुक्राचार्य के दिन शुक्रवार को समाप्त हो रहा है। अतः इस महीना में साधना उपासना करने देव दानव दोनों प्रसन्न होंगे।


किस सोमवार को रुद्राभिषेक का क्या लाभ


प्रथम सोमवार दिन भगवान शंकर वसहा बैल पर रहेंगे। इस दिन रुद्राभिषेक करने से अभीष्ट की सिद्धि मिलेगी। दूसरा सोमवार को प्रातः 05.55 बजे के बाद बसहा बैल से उतर कर भोजन करने बैठ जायेंगे। इस दिन भगवान् को नाना प्रकार का भोग, भांग, धतूरा, विल्व फल समर्पित करना चाहिये। जिससे घर अन्न धन की वृद्धि और स्वस्थता की प्राप्ति होगी। तीसरा सोमवार के दिन अपने परिवार तथा कुटुम्ब के साथ कैलाश पर रहेंगे। इसदिन रुद्राभिषेक करने से लोगों से मित्रता बढ़ेगी। शत्रु भी मित्र हो जायेंगे। चतुर्थ सोमवार को भी शिव जी कैलाश में रहेंगे।


भगवान शंकर को समर्पित यह मास


आचार्य पं. लाल मोहन शास्त्री ने बताया कि सावन मास शुरू होते ही भारत वर्ष के प्रत्येक शहर गांव में भगवान शंकर के मन्दिर को सजाया जाता है। भक्तों की भीड़ होती है। यह महीना पूर्ण रूप से भगवान् शंकर को समर्पित है। सभी भारतीय अपने भोले बाबा को मनाने के लिये गंगा जल, अक्षत, फुल, विल्वपत्र, धतूरा, मन्दार से बाबा की पूजा करते हैं। महत्वपूर्ण महामन्त्र "बोल बम" की उदघोषण करते रहते हैं। केसरिया भगवा रंग का वस्त्र धारण कर कांवर के जल को भगवान शिव लिंग पर चढ़ाते हैं।


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Sunday, 2 August 2026

विपक्ष को सत्ता से दुर कर रहा सनातन का अपमान

 टेढ़ी पॉलिटिक्स : 




(वर्ष 2014 के बाद भारत का राजनीतिक परिदृश्य बहुत बदल गया है। अब हिंदू और सनातन को अपमानित करके खुद को बड़ा सेकुलर साबित करने का दिन चला गया। यह विपक्ष को समझना होगा। हिंदू और सनातन हित की बात करने वाले को सांप्रदायिक और दूसरे शर्म के अपराधियों के साथ खड़े रहने को धर्मनिरपेक्ष मनाने का दौर नहीं रहा। आम लोगों के पास सूचनाओं और संवादों का विश्लेषण करने का औजार (मोबाइल) उपलब्ध हो गया है। ऐसे में भारत का हर नागरिक राजनीतिक घटनाओं और बयानों को विश्लेषण करने लगा है। जातीय कारणों से कुछ लोग अत्यधिक मुखर होते हैं और वह कुछ भी सोशल मीडिया पर लिख बोल जाते हैं। लेकिन उनकी संख्या बहुत कम है। यह हमेशा याद रखिए। बड़ी संख्या ऐसी है जो सिर्फ वोटो से जवाब देती है। यही कारण है कि विपक्ष की राजनीतिक नौटंकियां उनको सत्ता से दूर रख रही है। अब नकली धर्मनिरपेक्षता चलने से रही। संसद परिसर में जो कुछ हुआ उस घटना के संदर्भ में एक विश्लेषण :- डॉ.उपेंद्र कश्यप 

मो.नं.- 9931852301







लोकसभा परिसर में शनिवार को एक बार फिर सनातन का अपमान करता हुआ सामूहिक रूप से विपक्ष दिखा। जंतर मंतर से उठे आंदोलन में सरकार ने सोनम वांगचुंग और कॉकरोच जनता पार्टी से सरकार के प्रतिनिधि ने लिखित समझौते किया। इसके बाद विपक्षी नेताओं के बीच इसका श्रेय लेने की होड़ दिखी। कांग्रेस और राहुल गांधी इसे पचा नहीं पा रहे थे। इसलिए अमित शाह को टारगेट करने लगे। शनिवार को तो हद ही हो गयी। पप्पू यादव पुजारी बनकर पहुंचे। दान पेटी को देवता बना दिया। खुद बैठ गए और सांसदों से प्रतीकात्मक तौर पर मार खाते रहे। जूते पहन कर राहुल गांधी, धर्मेंद्र यादव और तमाम संसद दान पेटी में दान डालते वीडियो-फोटो बनवाते रहे। राहुल गांधी ने दूसरे संसद से मुफ्त में पैसे लेकर दान पेटी में डाला। डिंपल यादव एवं अन्य दिखे। अखिलेश यादव शायद जानबूझकर कर बचते रहे। अयोध्या से सांसद अवधेश कुमार खड़े रहे। लोग दान देते, पप्पू यादव उनसे झपट कर पैसे ले लेते। इस पूरे नौटंकी में एक बात स्पष्ट दिखी कि इंडी गठबंधन वाले सनातन के अपमान का कोई अवसर नहीं छोड़ते। एक संदेश यह देने की कोशिश भी की गई कि पुजारी पीटे जाने के योग्य है। उन्हें पीटना चाहिए। यानी इंडी गठबंधन के नेता खुद तो नौटंकी कर ही रहे हैं, अपने समर्थकों और कार्यकर्ताओं को भी सनातन के प्रति नफरत का भाव रखने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। पुजारी को मारने पीटने तक की प्रेरणा दे रहे हैं। सनातन का अपमान करने के लिए जानबूझकर किसी ने जूते नहीं उतारे। यहां जो पूरी नौटंकी हुई वह किसी भी सूरते हाल में स्वीकार नहीं हो सकती।  हालांकि दूसरा पक्ष यह है कि कुछ समालोचकों का यह मानना है कि ऐसी नौटंकी ही सनातन की शक्ति है। हजारों वर्षों में तमाम प्रकार के आक्रांताओं ने भारत पर हमले किए लेकिन सनातन सुरक्षित रहा। ऐसी राजनीतिक नौटंकियों से सनातन को कोई खतरा नहीं है। बल्कि यही असली ताकत है। दूसरे किताबी या एकेश्वरवादी धर्म परंपरा से सनातन की तुलना करना सनातन को कमजोर बनाना है। जो लोग ऐसी गतिविधियों की आलोचना करते हैं वास्तव में वे सनातन को कमजोर कर रहे होते हैं। यह कहना मूर्खता पूर्ण बात है कि दूसरे धर्म को लेकर ऐसी नौटंकी कोई क्यों नहीं कर पाता। ऐसा करने से सर से जुदा हो जाने का खतरा होता है, इसलिए यह लोग ऐसा नहीं करते। ऐसा करने के पीछे सिर्फ और सिर्फ अपनी जाति और मुस्लिम समुदाय का वोट हासिल करना ही लक्ष्य होता है। ऐसे लोगों को जवाब देते हुए दूसरा दक्षिणपंथी समूह भी है, जिनके तर्क हैं कि ऐसी नौटंकियों को सनातन की शक्ति बताने वाले यह भूल जाते हैं कि गजवा ए हिंद भी अपना आधा लक्ष्य लगभग पूरा कर चुका है। सनातन का अपमान उसकी ताकत नहीं है। यह लोग भूल जाते हैं कि अफगानिस्तान कभी भारत का हिस्सा था। हिंदू बहुत क्षेत्र था। पाकिस्तान और बांग्लादेश का उदाहरण सामने है, जहां से हिंदू साफ हो गए। भारत में डेढ़ सौ लगभग ऐसे जिले बन गए हैं जहां हिंदू अल्पसंख्यक हैं और वे वहां से पलायन करते हैं।

खैर, लोकसभा परिसर में जो नौटंकी की गई, इसको लेकर दक्षिणपंथी समूह और गैर दक्षिणपंथी समूह जिसमें मध्य मार्ग और वामपंथी तक को शामिल आप कर सकते हैं, की सोच अलग-अलग हो सकती है। परस्पर एक दूसरे का विरोध करती हो, लेकिन क्या इस तरह की नौटंकी किया जाना आवश्यक था। क्या इस तरह की नौटंकी से बचा नहीं जा सकता था। ऐसी ही नौटंकियों के कारण विपक्ष इस देश में भाजपा की सरकार और नरेंद्र मोदी- अमित शाह की जोड़ी के खिलाफ राजनीतिक सफलता प्राप्त नहीं कर पा रहा है। और अपनी लगातार हार का ठीकरा इवीएम पर फोड़ते रहता है। 2014 से लगातार चुनाव को अगर देख लें तो विपक्ष का दायरा सिमटता चला जा रहा है। उनके राज्य की सत्ता भी जा रही है और लगभग लगातार विधायक और सांसदों की संख्या भी घटती जा रही है। (वर्ष 2024 के चुनाव परिणाम को अगर अपवाद माने तो) याद करिए 2014 का लोकसभा चुनाव। बुरी तरह हारने के बाद कांग्रेस ने समीक्षा के लिए एके एंटनी के नेतृत्व में एक समिति बनाई थी। उन्हीने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट कहा था कि कांग्रेस की इतनी बुरी हार सिर्फ एक कारण से हुई। वह यह कि- कोंग्रेस हिंदू विरोधी और मुस्लिम परस्त दिखने लगी है। इस आकलन को कांग्रेस ने एक सिरे से खारिज कर दिया। कांग्रेस हो या दूसरे तमाम विपक्षी राजनीतिक दल, उनकी राजनीति अपनी जाति और मुसलमान का वोट लेकर चुनाव जीतने तक सीमित रह गया है। इसीलिए इस तरह की हरकतें उनके तरफ से प्राय: होती हैं। ऐसे में जब दक्षिणपंथी समूह यह सवाल उठाते हैं कि हिंदुओं का, सनातन प्रतीकों का अपमान करना इनका शौक बन गया है, तो बड़ी आबादी को स्वीकार्य हो जाता है। जबकि जैसे ही वक्फ की संपत्ति की बात आती है, मस्जिदों और मदरसों में गड़बड़ी की बात आती है, मुस्लिम अपराधियों की बात आती हज तो उस पर उनके जुबान तक नहीं खुलती। मत भूलिए कि भारत सभी धर्म का सम्मान करने वाला देश है। लेकिन जब लगातार आप किसी एक धार्मिक समूह को टारगेट करते हैं, उसे अपमानित करते हैं, और दूसरे धर्म के साथ तब भी खड़े दिखते हैं जबकि उसे न्यायिक कार्रवाई कर सजा देने की स्थिति रहती है, उनकी बुराइयों पर आप नहीं बोल पाते, उनकी धांधलियों पर चुप हो जाते हैं तो यह साबित हो जाता है कि इस देश की राजनीति में कभी सेकुलर राजनीति नहीं हुई। आजादी के समय से हमेशा छद्म सेक्युलरिज्म हो राजनीति के केंद्र में रही है। इसके दर्जनों उदाहरण भरे पड़े हैं। धर्मनिरपेक्षता की परिभाषा यह बना दी गई कि जो हिंदुओं को, हिंदू धर्म को जितना अधिक अपमानित करेगा वह उतना अधिक सेकुलर होगा। लेकिन जैसे ही कोई हिंदू हित की बात करेगा, सनातन की बात करेगा तो वह सांप्रदायिक है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण इस देश ने देखा है। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सिखों का खुलेआम कत्लेआम किया गया। राजीव गांधी ने कहा कि-जब बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती है। इसे सेकुलर माना, बताया गया। लेकिन जब गुजरात में दंगे के बाद नरेंद्र मोदी ने कहा कि हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती है तो इसे सांप्रदायिक बयान बताया गया। 

दरअसल, अब राजनीतिक जागरूकता पूर्व की अपेक्षा अधिक बढ़ी है। लोगों के पास सूचनाएं आ रही हैं। सूचनाओं की पुष्टि का तरीका उनके पास उपलब्ध हो गया हैम संवादों के विश्लेषण का औजार मोबाइल के रूप में अब हर हाथ में उपलब्ध है। इसलिए जनता को बरगलाना अब आसान नहीं रहा। ऐसे में विपक्ष का जो ताजा नाटक हुआ, यह अधिक आत्मघाती साबित होगा। उत्तर प्रदेश में सफलता के लिए लोकसभा परिसर में जो नौटंकी की गई समालोचकों का एक बड़ा वर्ग यह मानता है कि इसका लाभ कम और नुकसान अधिक समाजवादी पार्टी और कांग्रेस को होगा। बहरहाल 2014 के बाद जो राजनीतिक स्थिति इस देश में बनी है, उसमें विपक्ष के ऐसे कदम उनको सत्ता से दूर ही करते रहेंगे, इसकी संभावना अधिक है। वनिस्पत इसके कि ऐसी गतिविधियां उनको सत्ता के करीब या सत्ता में बिठा देंगी।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और लेखक हैं)

चुनावी राजनीति को कई सन्देश दे रहा बांकीपुर का बांकपन

■ टेढ़ी पॉलिटिक्स ■



(जाति और दलों के भीतर की राजनीति समझने का अवसर)

डॉ.उपेंद्र कश्यप 

मो.नं.- 9931852301



आज बिहार के चुनावी राजनीति को कई संदेश प्राप्त होने वाले हैं। पटना के बांकीपुर विधान सभा उप चुनाव परिणाम आने के बाद संदेशों का आकलन होगा। लेकिन फिलहाल स्थिति यह है कि सबकी सांस अटकी हुई है। इसने कई संदेश दिए हैं। भाजपा की राजनीति को समझने का एक मौका भी है और बिहार में जो कास्ट पॉलिटिक्स (जाति की राजनीति) है उसको भी। मतदान व्यवहार के संदर्भ में आकलन किया जा सकता है। यहां भाजपा के नीरज कुमार सिंहा, जन सुराज के प्रशांत किशोर के बीच सीधा मुकाबला है। राजद की रेखा गुप्ता मुकाबले में शायद नहीं आ सकेंगी। भाजपा खेमे में अपने प्रत्याशी के जीत को लेकर आश्वस्ति है। किंतु यह भी चिंता है कि 2025 में नितिन नवीन यहां से 51936 वोट से जीते थे, यह मार्जिन क्या आधा से भी कम हो जाएगा। ऐसा है तो क्यों है। दूसरी तरफ जन सुराज के प्रशांत किशोर हैं। उनके पक्ष में सवर्ण का भी मतदान हुआ। विशेष कर भूमिहार समाज का। इसका भी अपना एक संदेश है। प्रशांत किशोर अगर चुनाव जीत भी नहीं सके तो एक बेहतर परिणाम वह देते हुए अवश्य दिख रहे हैं। तेजस्वी यादव तो पूरे चुनाव प्रदेश से ही गायब थे। बहुत अंत समय आये। 


बांकीपुर के बांकपन से कई संदेश मिलते हैं  यहां प्राय: मतदान का प्रतिशत कम रहा है और यह भी कहा जाता है कि सबसे पढ़ा लिखा वोटर बांकीपुर में है। फिर भी वर्ष 2025 की अपेक्षा सात प्रतिशत कम मतदान हुआ। जिससे यह एक बात तो साफ है कि पढ़ा लिखा तबका आज भी मतदान को लेकर बहुत उत्साहित नहीं होता। बांकीपुर के बारे में तो यह भी कहा जाता है कि कायस्थ जिनकी संख्या काफी है, वह मतदान करने भी नहीं निकलते। इस बार भी यह देखा गया कि इस समाज का अधिकतर वोट भले ही जाति पार्टी के कारण नीरज कुमार सिंहा के पाले में गया, लेकिन मतदान को लेकर उत्साह नहीं दिखा। घर मे बैठे रहे। इसका भी प्रभाव परिणाम पर पड़ेगा। खैर जब तक आप यह आलेख पढ रहे होंगे चुनाव परिणाम के रुझान स्पष्ट पता चल गए होंगे। बांकीपुर का बांकपन जाने के लिए हम यहां के मतदाताओं के मतदान व्यवहार का विश्लेषण करेंगे। जिसमें कई संदेश छुपे हुए हैं। भाजपा ने अपने कैंडिडेट यहां बदले। एक नकारात्मक संदेश गया। सबसे प्रमुख फैक्टर तो खुद सम्राट चौधरी रहे, जो बिहार के मुख्यमंत्री हैं। जिन परिस्थितियों में सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री बनाया गया उससे बिहार का सवर्ण तबका नाराज है। जिसमें भरत तिवारी एनकाउंटर का भी एक पक्ष है। छोटे-छोटे कई कारणों से सवर्ण समाज में सम्राट चौधरी को लेकर, कुछ हद तक भाजपा से भी, नाराजगी काफी है। भूमिहार समुदाय ने इसे प्रकट भी किया। सवर्ण समुदाय का वोट टूटा है। यह प्रशांत किशोर के पक्ष में गया है। खुद भाजपा के बड़े नेता मानते हैं कि उसका बड़ा हिस्सा टूटा है। वैश्य समाज जो भाजपा का कोर वोटर माना जाता है, उसका भी एक तबका राजद की रेखा गुप्ता (वैश्य होने के कारण) और साथ-साथ पीके के पक्ष में भी मतदान किया है। यानी स्वर्ण और वैश्य जो भाजपा के आधार वोटर हैं, उसमें टूट भाजपा के वैसे दिग्गज नेता भी मानते हैं, जो इस चुनावी कैंपेन में पूरी तरह शामिल थे। अब सवाल यह उठता है कि सवर्ण इतने नाराज क्यों थे। भाजपा के कुछ नेताओं का स्पष्ट मानना है कि सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने के कारण सवर्ण समुदाय में नाराजगी है। उनका मानना था कि किसी सवर्ण को मुख्यमंत्री मनाया जाना चाहिए था, जबकि पहली बार भाजपा की सरकार बन रही थी। लेकिन भाजपा के दिग्गज नेता का मानना है कि यह संभव ही नहीं था। कुछ सवर्ण नेताओं का नाम लेकर उन्होंने साफ-साफ कहा कि नीतीश कुमार के साथ रहने के लिए उनको गालियां दी गई। अब ऐसे में अगर किसी सवर्ण को मुख्यमंत्री बनाया जाता तो तेजस्वी यादव के हाथ में सत्ता का चेक काट कर सौंपने जैसा होता। कुछ जो सवर्ण नेता मंत्री न बनने के कारण नाराज हैं, उन्होंने इस आग को हवा भी दी। तो क्या इस आग को हवा देने का जो काम किया गया उसे भाजपा के अंदर खाने भी सपोर्ट मिल रहा था। इस मुद्दे पर भाजपा में दो विचार हैं। एक पक्ष का मानना यह है कि भाजपा भी चाहती थी कि जो नाराजगी है उसका प्रकटीकरण अगर हो जाता है तो नाराज समूह का गुस्सा ठंढा पड़ेगा, जो आगे चलकर भाजपा के पक्ष में जाएगा। ऐसा मानने वालों का तर्क है कि भाजपा यह मानकर चल रही है कि जीत सुनिश्चित है। भले ही जीत का अंतर कम हो। लेकिन एक दूसरा पक्ष भी है, जो यह मानता है कि अगर नाराजगी को भाजपा के नेताओं ने अंदर खाने से समर्थन दिया और कहीं यह भारी पड़ गया तो? प्रशांत किशोर जीत गए तो? बिहार ही नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश तक पीके का प्रभाव बढ़ेगा और उनके राजनीतिक गतिविधियों पर से भाजपा को नुकसान हो सकता है। ऐसे भाजपा नेताओं का मानना है कि सवर्ण समुदाय के लोगों को यह समझना होगा कि बिहार की जो वर्तमान राजनीतिक स्थिति है उसमें सवर्ण का सीएम बनना मुश्किल है। दूसरी बात यह थी कि नीतीश कुमार की जाति कुर्मी समाज ने कभी भी दूसरी जातियों को भला बुरा नहीं कहा। हालांकि उसने भी सत्ता का स्वाद कम नहीं चखा है। लेकिन सम्राट चौधरी के पक्ष में कुछ कुशवाहा नेताओं ने अनाप-शनाप बयानबाजी की। आक्रामकता दिखाई। जिससे भी दूसरे लोगों में नाराजगी पैदा हुई है। खुद बांकीपुर में स्मार्ट सिटी के लिए जमीन अधिग्रहण को लेकर उसकी बिक्री पर रोक लगा दी गई। इससे कुर्मी समाज बहुत हद तक प्रभावित हुआ। जिनके पास यहां जमीन अधिक हैं। ऐसे में कुर्मी समुदाय भी नाराज था और इसने भी पीके को कुछ हद तक साथ दिया। बाद में सरकार ने जमीन से ऐसे प्रतिबंध वापस ले लिया। यह सब इसलिए था कि सम्राट चौधरी को सबक सिखाया जाए। भाजपा में जो तानाशाही वाली प्रवृत्ति दिखने लगी है उसे ठंडा करने के लिए इस तरह के काम किए गए। भाजपा के अंदर खाने नेताओं का मानना है कि भाजपा नीरज कुमार सिन्हा की जगह अगर ऋतुराज सिंह को या डॉक्टर अजय आलोक को प्रत्याशी बनाती तो जीत हार का मार्जिन अधिक होता।

Friday, 31 July 2026

खेतों में अब सुनाई नहीं देते रोपनी के गीत

 


न बजते हैं अब बैलों और हलों के घुंघरू 

कभी किसानों को रोपनहार देती थीं गालियां

उपेंद्र कश्यप

नबिटा संवाददाता

दाउदनगर (औरंगाबाद)

कृषि कार्य अभी जोरों पर है। खेतों में रोपनी के कार्य चल रहे हैं। लेकिन कहीं चले जाइए, रोपणहारो के मुंह से अब गीत सुनाई नहीं देते। अपवाद स्वरूप कहीं-कहीं यदा-कदा कुछ पंक्तियां गुनगुनाती रोपणहार दिख जाए तो बात अलग है। लेकिन आमतौर पर अब खेतों में रोपनी करते वक्त गीत गाए जाते हुए सुनाई नहीं पड़ते हैं। दरअसल, खेतों में हल नहीं चलते। जब हल चलते थे तब बैलों और उसके पैरों में बंधे घुंघरू से मधुर आवाज निकलती थी। इससे रोपनहार को गीत गाने में आनंद आता था। अब हल बैल से बंधे घुंघरू की आवाज भी खेतों में सुनाई नहीं पड़ती। दूसरे रोपनहार भी अब विभिन्न प्रदेशों से मंगाए जाते हैं। जो स्थानीय गीत और संस्कृति से भी अनभिज्ञ होते हैं। कई बार दूसरे धर्म के भी श्रमिक होते हैं। अब किसानों को रोपनहार गाली भी नहीं देती। मखरा निवासी सुरेंद्र सिंह यादव बताते हैं कि दरअसल जब खेत पर किसान खड़ा रहते थे तो रोपनहार उन्हें गाली देती थी, ताकि वह भाग जाए। ऐसा इसलिए करती थी ताकि उन्हें कमर सीधा करने का मौका मिले। आम तौर पर ठेहुना से ऊपर उनका कपड़ा रहता है। शंका निवारण करना होता है। ऐसे में जब किसान खड़ा होगा तो दिक्कत होती थी। दूसरे कई रोपनहारों का किसानों से मजाक करने वाला रिश्ता होता था और इसलिए किसान का नाम लेकर कुछ गालियां देती थी, जो रिश्ते में भौजाई लगती थी। अब यह परंपरा भी खत्म हो गई है।


नई पीढ़ी के रोपनहार नहीं जानती गीत

 तरार पांच के मुखिया व किसान शशि भूषण सिंह कहते हैं कि पुराने (वृद्ध) रोपनहार यदा-कदा, कहीं-कहीं गीत गाती दिख जाती हैं। नई पीढ़ी गीतों को भूल चुकी है। वह गीत गाना भी नहीं जानते और ना इसमें कोई रुचि लेती हैं। हालांकि एक परंपरा अभी भी जीवित है कि रोपनहार किसान के घर आती हैं और घर की महिलाएं उन्हें सिंदूर और तेल देती हैं, श्रृंगार के लिए। ठीक वैसे ही जैसे रोपनी को भी किसान धरती का श्रृंगार मानते हैं।


वर्षा और बढ़िया उपज के लिए गाती थी गीत 

मखरा निवासी किसान सुरेंद्र सिंह यादव कहते हैं कि रोपनहार बेहतर वर्षा और उपज के लिए इंद्र भगवान को खुश करने के लिए गीत गाती थी। वे ईश्वर से प्रार्थना करती थी कि वर्षा पर्याप्त हो, फसल की उपज बेहतर हो, इससे किसान समृद्ध होगा तो उनको भी खेतों में काम करने का अवसर मिलेगा और इससे आर्थिक लाभ भी प्राप्त होगा।


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Thursday, 30 July 2026

टेढ़ी पॉलिटिक्स : भाजपा- संघ के गुंडो को क्यों बचा रहा विपक्ष

 


टेढ़ी पॉलिटिक्स : भाजपा- संघ के गुंडो को क्यों बचा रहा विपक्ष

(मिले कई सबक, लोकतंत्र के लिए खतरनाक स्थिति)

डॉ.उपेंद्र कश्यप 

मो.नं.- 9931852301


जंतर मंतर पर हुए प्रदर्शन के दौरान जब उपद्रव हुए तो उपद्रवी तत्वों चाहे वे छात्र-छात्रा हों, या युवक युवती, कॉकरोच जनता पार्टी के अभिजीत दीपके, उसके प्रवक्ता सौरभ दास या विभिन्न विपक्षी दलों के नेता- प्रवक्ता सबने एक स्वर से कहा कि भाजपा और संघ ने योजनाबद्ध तरीके से अपने गुंडो को भीड़ में छात्र आंदोलन को बदनाम करने के लिए घुसा दिया है। यह गुंडे आरएसएस और भाजपा के हैं। अब सवाल उठ रहा है कि जब गुंडो के खिलाफ सरकार कार्रवाई करने जा रही है तो इनको बुरा क्यों लग रहा है। कांग्रेस के नेता कपिल सिब्बल ने बजाप्ता एक करोड रुपए फंडिंग की, वेबसाइट बनाया जा रहा है कि देश में कहीं भी छात्र आंदोलन में अगर कोई आंदोलनकारी पुलिस या न्यायिक मामले में उलझता है तो उसे मदद किया जाएगा। अब सवाल यह उठता है कि जब वह संघ और भाजपा के गुंडे थे तो उनको बचाने की चिंता यह विपक्ष क्यों कर रहा है? बात आगे बढ़ी तो सुप्रीम कोर्ट ने साफ-साफ कह दिया कि जिनके खिलाफ पहले से प्राथमिकी है, उनके खिलाफ कार्रवाई होगी। जो 18 साल की उम्र तक के युवा हैं, उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होगी। जिनके विरुद्ध पहली बार अगर कोई प्राथमिकी हुई है तो उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई फिलहाल नहीं होगी। हो सकता है आने वाले समय में किसी सेवानिवृत न्यायाधीश के नेतृत्व में जांच कमेटी गठित कर दे सुप्रीम कोर्ट। सब बातें अपनी जगह है। हम इस मुद्दे पर चर्चा कर रहे हैं कि जब आंदोलनकारियों के बीच भाजपा और संघ ने जैसा कि कॉकरोच जनता पार्टी का दावा है, अपने गुंडे भेजे थे, ताकि वह आंदोलन को बदनाम कर सकें तो ऐसे गुंडो को बचाने के लिए कॉकरोच जनता पार्टी या तमाम विपक्षी दल एकजुट क्यों हो गए? क्यों लोग पैसा चंदा करके न्यायिक मदद पहुंचाने की तैयारी कर रहे हैं? क्यों मांग हो रही है कि अगर सभी प्राथमिकियां वापस नहीं ली गई तो एक बार फिर से इसी तरह से जन आंदोलन खड़ा किया जाएगा। इस घटना से एक बात समझ में आ गई कि नेता किसी भी गिरगिट से अधिक रंग बदलता है और उसके कहे पर कतई विश्वास ना करिए। जब युवा सोनम वांगचुंग और कॉकरोच जनता पार्टी की अपील पर इकट्ठा हुए थे, तब उनको भी यह अनुमान नहीं रहा होगा कि वह बुरे फसेंगे। दरअसल, आप जब भीड़ का हिस्सा बनते हैं तो आपका दिमाग आपके नियंत्रण से बाहर उस शक्ति के पास चला जाता है जो पर्दे के पीछे रहकर भीड़ को मॉनिटर करता है। वह जैसे चाहेगा भीड़ में शामिल व्यक्ति उसी तरह की प्रतिक्रिया व्यक्त करने लगता है। शब्द और पंक्ति भले व्यक्ति की अपनी हो, लेकिन प्रेरणा, उत्तेजना, भाव छुपे हुए शख्स का होता है। छात्र-छात्राओं द्वारा की गई बदजुबानियों,  अश्लील हरकतों, अभद्र भाषा वाले पोस्टरों को लेकर संस्कारों की बात की जा रही है। कुछ देर के लिए अगर इसे हटा दें। मान लें कि युवाओं ने जोश में बहुत तरीके से अभद्रता दिखाई, अश्लीलता दिखाई, कुछ लोगों का दावा है कि भाई राजनीतिक आंदोलन में नारेबाजियां होते रहती हैं। उसमें अपशब्द इस्तेमाल होते रहते हैं। तमाम नेताओं के लिए अपशब्द कहे गए। चलिए इन मुद्दों को हम हटा देते हैं, और मान लेते हैं कि ऐसा करने वाले तमाम लोग छात्र थे, जो बहक गए। तात्कालिक गुस्से का शिकार हुए और उन्होंने अपनी कुछ बातें जैसे रखी, वह मर्यादा में भी नहीं थी। इन सबको माफ कर देना चाहिए। जो लोग गुंडई करने वालों के पक्ष में हैं, दरअसल वे कभी आंदोलन नहीं करते, वे राजनीतिक रोटी सेंकने के लिए, कुछ लिखते बोलते हैं। उनके बच्चे तो आंदोलन में जाएंगे नहीं, तो दूसरे के कंधे पर बंदूक रख दो। 



खैर, क्या किसी भी सूरत में हत्या के आरोपितों को, दुष्कर्म करने वालों को, जो पहले से आरोपित हैं, जिनकी संख्या दिल्ली पुलिस ने लगभग 2800 से अधिक बताई है, उनको क्यों छोड़ देना चाहिए? उनको जब आपने पहले ही भाजपा और संघ का गुंडा घोषित कर दिया तो उसके विरुद्ध होने वाली कार्रवाई की चिंता आपको (विपक्ष) क्यों हो रही है? यह इस बात का प्रमाण है कि आंदोलन करने वाले अपने गुंडे उसमें शामिल करते हैं, क्योंकि शरीफ चाहे छात्र-छात्रा हो, चाहे किसान हो, चाहे कोई भी आम राजनीतिक-सामाजिक कार्यकर्ता हो, वह आंदोलन का हिस्सा तो बनता है, बड़ी अपेक्षाओं के साथ, लेकिन वह गुंडई नहीं करता है। वह हमले नहीं करता। वह पुलिस के खिलाफ गुंडे की तरह आक्रामक शैली में व्यवहार नहीं करता। और जब तक ऐसा होगा नहीं आंदोलनकारियों की आत्मा तृप्त नहीं होती। इसलिए वही गुंडो को इसमें शामिल करते हैं। और गुंडे इसलिए शामिल होते हैं कि उनके पाप कुछ हद तक धूल जाएगा। उनको लाइमलाइट मिल जाएगा। कहीं अगर चमक गए तो अपने क्षेत्र का नेता भी बन सकते हैं। नेता बनने का तो एक रास्ता यह भी है कि नाम कमाया जाए, भले गुंडई करके ही क्यों नहीं कमाया जाए। तमाम गुंडो को हम देखते हैं जो शरीफजादा बन जाते हैं। सफेद वस्त्र धारण करके जनप्रतिनिधि बन जाते हैं। गुंडो को भी मौका मिल जाता है। दरअसल होता यह है कि आंदोलन करने वालों के बीच ऐसे लोग भी शामिल होते हैं जो आपराधिक प्रवृत्ति के होते हैं। कुछ को मुद्दों से नहीं राजनीति से मतलब होता है। किसी मामलों में यह हो सकता है कि असामाजिक तत्वों के साथ सीधा कनेक्शन आंदोलन बुलाने वालों से ना हो, लेकिन अगर वास्तव में ऐसा है तो फिर कोई देशद्रोही, कोई गुंडा, कोई हत्यारा, कोई मवाली, कोई रेपिस्ट जब आंदोलन में गुंडई करता है, आंदोलन को बदनाम करता है तो आंदोलन बुलाने वाले लोग, आंदोलन का नेतृत्व करने वाले लोग, उसे बचाने के लिए क्यों खड़े हो रहे हैं। इसका मतलब है कि दोनों के बीच रिश्ता है। जिसे छुपाने के लिए उस सबको संघ और भाजपा का गुंडा बताया जाता है। इस आंदोलन के बाद सत्ता चाहे जिसकी हो आंदोलनकारी को सत्ता में शामिल राजनीतिक दलों पर अब यह आरोप लगाना कठीन होगा कि गुंडई उनके भेजे गए गुंडे कर रहे हैं। लोगों को अब ऐसे आरोप पचेंगे नहीं। लोकतंत्र के लिए यह बेहतर भी है। इससे जनमानस यह तैयार होगा कि आंदोलन कोई करे, अगर उसमें गुंडई हो रही है तो सत्ता किसी की हो वह सख्त से सख्त कार्रवाई करे। दूसरी बात जिसके साथ गुंडई हुई, यानी मारपीट हुई, हमले हुए, वह व्यक्ति अगर व्यक्तिगत तौर पर प्राथमिकी करता है तो प्राथमिकी वापस लेने का वादा कोई सरकार कैसे कर सकती है? इसलिए इसका एक पक्ष यह भी है कि अब अगर कोई आंदोलन होता है और गुंडई होती है तो सरकार पीड़ित से ही प्राथमिकी करवा सकती है। ऐसा करने को प्रेरित या अपील कर सकती है। जब व्यक्तियों से प्राथमिकी करवाई जाने लगेगी तब कौन सा कोर्ट प्राथमिकियों को वापस करवा सकेगा? किसी भी आंदोलन का कई पक्ष होता है। इसलिए आने वाले समय में भारतीय लोकतंत्र के लिए यह आंदोलन कई सीख दे गया है। जिसमें एक महत्वपूर्ण सीख यह भी है।




#छात्र_आंदोलन #CJP #STUDENT_PROTEST #JANTAR_MANTAR #RSS #BJP #NARENDRAMODI #Indian_politics #political_news 

Tuesday, 28 July 2026

कटघरे में पत्रकारिता : पत्रकार नहीं संस्थान दोषी

 


#कटघरे_में_पत्रकारिता : पत्रकार नहीं संस्थान दोषी 

◆ ऊपर से नीचे तक पहुंचा भ्रष्टाचार ◆

● #संपादक से #संवाददाता तक लाचार ●

डॉ.उपेंद्र कश्यप 

कॉकरोच जनता पार्टी का जंतर मंतर पर हुआ आंदोलन बड़ी लकीर खींच गया। 15 मई 2026 को न्यायालय ने युवाओं के संदर्भ में कॉकरोच शब्द का इस्तेमाल किया। 16 को कॉकरोच जनता पार्टी बन गई और मात्र 70 दिन में 25 जुलाई 2026 को भारत सरकार के शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा दे देना पड़ा। इस पूरे आंदोलन में एक बात जो स्पष्ट दिखी वह यह कि माइक पर लोगो देखकर आंदोलनकारी प्रतिक्रिया दे रहे थे और उनका व्यवहार तय हो रहा था। मुख्यधारा की मीडिया के लिए वहां जूते की माला और गालियां थी, तो इन्फ्लुएंसर्स और युट्यूबर्स के लिए फूलों का हार। इस आंदोलन में जो कुछ हुआ उसे लेकर नैतिकता ता आदर्शवाद के संदर्भ में कई सवाल खड़े किए जा सकते हैं, लेकिन एक बात जो पूरी तरह स्पष्ट थी वह थी मुख्य धारा की मीडिया खास कर चैनल वालों को लेकर आक्रोश। कई पत्रकार पीटे गए। कई महिला पत्रकारों की हूटिंग हुई। अपशब्द कहे गए। गलियां दी गयी। सवाल है कि यह स्थिति बनी क्यों? ऐसा नहीं है कि मीडिया दलाल की भूमिका में आज है। दलाली हमेशा से होते रही है। आज जो बड़े-बड़े तथाकथित यूट्यूब वाले पत्रकार बन गए हैं, उनका भी एजेंडा है। मुख्य धारा के चैनलों से निकल गए या निकाल दिए गए और यूट्यूबर बन गए कई पत्रकारों ने दलाली करके ही यहां तक का मुकाम हासिल किया है। जिनकी आज आंदोलनकारी प्रशंसा कर रहे थे। अब यहां अगर देखे तो फर्क क्या है कि हमारा पत्रकार और तुम्हारा पत्रकार। दरअसल रवीश कुमार जैसे पत्रकारों और विपक्ष ने एक ऐसा माहौल निर्मित कर दिया है जिसमें हर थोड़ा भी प्रभावशाली व्यक्ति या संस्थान को अपने अनुकूल का पत्रकार चाहिए। अन्यथा गालियां दो। कई बार हमले भी। सच यही है कि पत्रकारिता किसी को पसंद नहीं है। पत्रकार किसी को नहीं सुहाता। सबको अपने-अपने अनुकूल का पत्रकार चाहिए। सत्ता ने हमेशा पत्रकारों को दबाकर रखने की कोशिश की है। मीडिया संस्थानों को हमेशा दबाया गया। लेकिन 2014 के बाद मुख्य धारा की मीडिया रेंगने लगी। इसमें कौन कितना ज्यादा रेंग सकता है इसकी होड़ आपस में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के बीच है। कुछ हद तक कुछ अखबार इससे बचे हैं। लेकिन उनकी विश्वसनीयता भी खत्म हो गई है। यहां इस आंदोलन के समय जो पत्रकारों के साथ हुआ उनका कोई दोष नहीं था। जिला मुख्यालय से लेकर दिल्ली तक में पत्रकार पीटे गए। उन पर हमले हुए। सवाल खुद से पूछें कि क्या पत्रकार जिम्मेदार हैं। शायद नहीं। क्योंकि वह वही करते हैं जो ऊपर से निर्देश आता है। ऊपर वाला वही करवाता है जो उसको ऊपर वाले का निर्देश प्राप्त होता है। यह खड़ी सीढ़ी है। यानी यहां ऊपर से नीचे की तरफ गिरावट आई है। यह और बात है कि बदनाम पत्रकार हैं। सच यह है कि झोली हो या बोरी, या बड़ी-बड़ी अटैचियां लेते संपादक हैं। अखबार का मालिक बिकता है। पत्रकार नहीं बिकता। हां कुछ अपवाद हो सकते हैं। दूध का धुला कोई पत्रकार भी नहीं है। क्योंकि गिरावट हर क्षेत्र में आई है। दरअसल हुआ यह है कि मीडिया घरानों ने सरकारों से समझौता कर लिया। आर्थिक युग में उन्हें दौलत चाहिए और दौलत के लिए बिकना पड़ता है। मीडिया सिर्फ व्यवसाय बनकर रह गया है। संपादक नाम की संस्था तो कब का चौपट हो चुकी थी। 2010 के दशक के बाद इसमें तेजी से गिरावट आई। संपादक पत्रकार की तरह ही एक इक्विपमेंट मात्र बन कर कर रहा है। उनकी लेखनी का कोई मतलब नहीं है। लिखना वही है जो छपेगा, जो दिखेगा। और छापने और दिखाने का अधिकार ना तो संपादक के पास है ना पत्रकार के पास है। मीडिया घरानों का जो विज्ञापन देखने वाला विभाग है, वह संपादकों पर हावी होता है। एक टाइपराइटर, पेज लगाने वाला, चिट्ठियां बटोरने वाला, रिसेप्शनिस्ट का पेमेंट एक पत्रकार से अधिक होता है। (कम से कम प्रखण्ड, अनुमण्डल, जिला, कमिश्नरी के स्तर पर) जबकि दोनों साथ काम करते हैं। पत्रकार अगर किसी संकट में घिर जाए, किसी कानूनी पचड़े में फंस जाए, कोई नेता अधिकारी उसे धमकी दे तो, सबसे पहले अगर कोई भगाता है तो वह संस्थान, जिसके लिए वह दिन रात खतरा मोल लेकर काम कर रहा होता है। एक पत्रकार का मोबाइल डीएम के गार्ड ने छीन लिया और उसे पत्रकार से संबद्ध अखबार में एक लाइन की खबर नहीं छपी। हालांकि दूसरे अखबार ने छापा। एक पत्रकार मर भी जाए तो संस्थान यह लिखने मानने के लिए भी तैयार नहीं कि वह उसका पत्रकार है। कोई लाइफ इंश्योरेंस नहीं। कोई सुरक्षा नहीं। कोई बॉडीगार्ड नहीं। पत्रकारों को इतना कमजोर बना दिया गया है कि सच तो छोड़िए तथ्य तक खुलकर नहीं लिखकर बता सकते हैं। विपक्ष कहता है गोदी मीडिया। मीडिया में गिरावट अब ज्यादा दिख रही है, क्योंकि सोशल मीडिया का वर्चस्व और दायरा बढ़ता जा रहा है। अन्यथा याद करिए। सांसद खरीद फरोख्त के मामले को लेकर देश के तथाकथित बड़े पत्रकार के पास सब प्रमाण सहित रिपोर्ट उनके रिपोर्टर ने भेजा था, और उन्होंने इसे इसलिए नहीं प्रसारित किया कि सत्ता से समझौता हो गया। बाद में उस पत्रकार ने पद्म पुरस्कार प्राप्त कर लिए, वह भी तुरंत। मनमोहन सिंह की सरकार बच गई। अगर वह रिपोर्ट जारी हो जाती तो मनमोहन की सरकार कब का चली जाती। तो आज का विपक्ष जो गोदी मीडिया चिल्लाता है उसने भी सत्ता में रहते हुए पत्रकारों को कम नहीं खरीदा है। हां यह और बात है कि अब पत्रकारिता का जो काम है एक जगह की बात को 100 -200, हजारों, लाखों लोगों व जगह पर पहुंचाना। वह मीडिया घराना की बपौती नहीं रह गई है। क्योंकि सोशल मीडिया का प्रभाव अब लगातार बढ़ता जा रहा है। और यह सीजीपी के आंदोलन में स्पष्ट दिखा। अगर इस आंदोलन से मीडिया के लिए कुछ सीख है तो वह यह है कि वह अपना कवरेज का तरीका सुधारे। सकारात्मकता के नाम पर दलाली और चमचई छोड़े। सत्ता और विपक्ष दोनों की कलई पत्रकार खोलें। सत्ता की गलतियों पर भी बचाव की मुद्रा में जब एंकर और एंकरनिया दिखेंगे तो संस्थान के पत्रकार पीटे जाएंगे। प्रदेशों की राजधानी और देश की राजधानी में घटित घटना का प्रिंट मीडिया जिस तरह से कवरेज करता है उसमें साफ-साफ भेदभाव की बू आती है।

मो.नं:- 9931852301


कॉकरोच जनता पार्टी का जंतर मंतर पर हुआ आंदोलन बड़ी लकीर खींच गया। 15 मई 2026 को न्यायालय ने युवाओं के संदर्भ में कॉकरोच शब्द का इस्तेमाल किया। 16 को कॉकरोच जनता पार्टी बन गई और मात्र 70 दिन में 25 जुलाई 2026 को भारत सरकार के शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा दे देना पड़ा। इस पूरे आंदोलन में एक बात जो स्पष्ट दिखी वह यह कि माइक पर लोगो देखकर आंदोलनकारी प्रतिक्रिया दे रहे थे और उनका व्यवहार तय हो रहा था। मुख्यधारा की मीडिया के लिए वहां जूते की माला और गालियां थी, तो इन्फ्लुएंसर्स और युट्यूबर्स के लिए फूलों का हार। इस आंदोलन में जो कुछ हुआ उसे लेकर नैतिकता ता आदर्शवाद के संदर्भ में कई सवाल खड़े किए जा सकते हैं, लेकिन एक बात जो पूरी तरह स्पष्ट थी वह थी मुख्य धारा की मीडिया खास कर चैनल वालों को लेकर आक्रोश। कई पत्रकार पीटे गए। कई महिला पत्रकारों की हूटिंग हुई। अपशब्द कहे गए। गलियां दी गयी। सवाल है कि यह स्थिति बनी क्यों? ऐसा नहीं है कि मीडिया दलाल की भूमिका में आज है। दलाली हमेशा से होते रही है। आज जो बड़े-बड़े तथाकथित यूट्यूब वाले पत्रकार बन गए हैं, उनका भी एजेंडा है। मुख्य धारा के चैनलों से निकल गए या निकाल दिए गए और यूट्यूबर बन गए कई पत्रकारों ने दलाली करके ही यहां तक का मुकाम हासिल किया है। जिनकी आज आंदोलनकारी प्रशंसा कर रहे थे। अब यहां अगर देखे तो फर्क क्या है कि हमारा पत्रकार और तुम्हारा पत्रकार। दरअसल रवीश कुमार जैसे पत्रकारों और विपक्ष ने एक ऐसा माहौल निर्मित कर दिया है जिसमें हर थोड़ा भी प्रभावशाली व्यक्ति या संस्थान को अपने अनुकूल का पत्रकार चाहिए। अन्यथा गालियां दो। कई बार हमले भी। सच यही है कि पत्रकारिता किसी को पसंद नहीं है। पत्रकार किसी को नहीं सुहाता। सबको अपने-अपने अनुकूल का पत्रकार चाहिए। सत्ता ने हमेशा पत्रकारों को दबाकर रखने की कोशिश की है। मीडिया संस्थानों को हमेशा दबाया गया। लेकिन 2014 के बाद मुख्य धारा की मीडिया रेंगने लगी। इसमें कौन कितना ज्यादा रेंग सकता है इसकी होड़ आपस में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के बीच है। कुछ हद तक कुछ अखबार इससे बचे हैं। लेकिन उनकी विश्वसनीयता भी खत्म हो गई है। यहां इस आंदोलन के समय जो पत्रकारों के साथ हुआ उनका कोई दोष नहीं था। जिला मुख्यालय से लेकर दिल्ली तक में पत्रकार पीटे गए। उन पर हमले हुए। सवाल खुद से पूछें कि क्या पत्रकार जिम्मेदार हैं। शायद नहीं। क्योंकि वह वही करते हैं जो ऊपर से निर्देश आता है। ऊपर वाला वही करवाता है जो उसको ऊपर वाले का निर्देश प्राप्त होता है। यह खड़ी सीढ़ी है। यानी यहां ऊपर से नीचे की तरफ गिरावट आई है। यह और बात है कि बदनाम पत्रकार हैं। सच यह है कि झोली हो या बोरी, या बड़ी-बड़ी अटैचियां लेते संपादक हैं। अखबार का मालिक बिकता है। पत्रकार नहीं बिकता। हां कुछ अपवाद हो सकते हैं। दूध का धुला कोई पत्रकार भी नहीं है। क्योंकि गिरावट हर क्षेत्र में आई है। दरअसल हुआ यह है कि मीडिया घरानों ने सरकारों से समझौता कर लिया। आर्थिक युग में उन्हें दौलत चाहिए और दौलत के लिए बिकना पड़ता है। मीडिया सिर्फ व्यवसाय बनकर रह गया है। संपादक नाम की संस्था तो कब का चौपट हो चुकी थी। 2010 के दशक के बाद इसमें तेजी से गिरावट आई। संपादक पत्रकार की तरह ही एक इक्विपमेंट मात्र बन कर कर रहा है। उनकी लेखनी का कोई मतलब नहीं है। लिखना वही है जो छपेगा, जो दिखेगा। और छापने और दिखाने का अधिकार ना तो संपादक के पास है ना पत्रकार के पास है। मीडिया घरानों का जो विज्ञापन देखने वाला विभाग है, वह संपादकों पर हावी होता है। एक टाइपराइटर, पेज लगाने वाला, चिट्ठियां बटोरने वाला, रिसेप्शनिस्ट का पेमेंट एक पत्रकार से अधिक होता है। (कम से कम प्रखण्ड, अनुमण्डल, जिला, कमिश्नरी के स्तर पर) जबकि दोनों साथ काम करते हैं। पत्रकार अगर किसी संकट में घिर जाए, किसी कानूनी पचड़े में फंस जाए, कोई नेता अधिकारी उसे धमकी दे तो, सबसे पहले अगर कोई भगाता है तो वह संस्थान, जिसके लिए वह दिन रात खतरा मोल लेकर काम कर रहा होता है। एक पत्रकार का मोबाइल डीएम के गार्ड ने छीन लिया और उसे पत्रकार से संबद्ध अखबार में एक लाइन की खबर नहीं छपी। हालांकि दूसरे अखबार ने छापा। एक पत्रकार मर भी जाए तो संस्थान यह लिखने मानने के लिए भी तैयार नहीं कि वह उसका पत्रकार है। कोई लाइफ इंश्योरेंस नहीं। कोई सुरक्षा नहीं। कोई बॉडीगार्ड नहीं। पत्रकारों को इतना कमजोर बना दिया गया है कि सच तो छोड़िए तथ्य तक खुलकर नहीं लिखकर बता सकते हैं। विपक्ष कहता है गोदी मीडिया। मीडिया में गिरावट अब ज्यादा दिख रही है, क्योंकि सोशल मीडिया का वर्चस्व और दायरा बढ़ता जा रहा है। अन्यथा याद करिए। सांसद खरीद फरोख्त के मामले को लेकर देश के तथाकथित बड़े पत्रकार के पास सब प्रमाण सहित रिपोर्ट उनके रिपोर्टर ने भेजा था, और उन्होंने इसे इसलिए नहीं प्रसारित किया कि सत्ता से समझौता हो गया। बाद में उस पत्रकार ने पद्म पुरस्कार प्राप्त कर लिए, वह भी तुरंत। मनमोहन सिंह की सरकार बच गई। अगर वह रिपोर्ट जारी हो जाती तो मनमोहन की सरकार कब का चली जाती। तो आज का विपक्ष जो गोदी मीडिया चिल्लाता है उसने भी सत्ता में रहते हुए पत्रकारों को कम नहीं खरीदा है। हां यह और बात है कि अब पत्रकारिता का जो काम है एक जगह की बात को 100 -200, हजारों, लाखों लोगों व जगह पर पहुंचाना। वह मीडिया घराना की बपौती नहीं रह गई है। क्योंकि सोशल मीडिया का प्रभाव अब लगातार बढ़ता जा रहा है। और यह सीजीपी के आंदोलन में स्पष्ट दिखा। अगर इस आंदोलन से मीडिया के लिए कुछ सीख है तो वह यह है कि वह अपना कवरेज का तरीका सुधारे। सकारात्मकता के नाम पर दलाली और चमचई छोड़े। सत्ता और विपक्ष दोनों की कलई पत्रकार खोलें। सत्ता की गलतियों पर भी बचाव की मुद्रा में जब एंकर और एंकरनिया दिखेंगे तो संस्थान के पत्रकार पीटे जाएंगे। प्रदेशों की राजधानी और देश की राजधानी में घटित घटना का प्रिंट मीडिया जिस तरह से कवरेज करता है उसमें साफ-साफ भेदभाव की बू आती है।

 



और हां अंत में एक बात और..

 जाति से मुक्त नहीं है पत्रकारिता। पत्रकारिता में जातिवाद गहरी पैठ बना चुकी है। और जाति वर्ग देखकर न्यूज़ कवरेज की प्रवृत्ति काफी सघन हुई है। अगर यह दरकेगा नहीं तो फिर जो जंतर मंतर पर पत्रकारों के साथ हुआ, जो देश भर में हुआ उसका दायरा बढ़ता चला जाएगा। इसलिए इस कॉकरोच आंदोलन ने साफ-साफ संदेश दे दिया है- मीडिया घरानों सुधरो, अन्यथा तुम्हारे पत्रकार फील्ड में जाने लायक नहीं रहेंगे। अब होना यह चाहिए कि प्राइम टाइम में एक घण्टे का शो प्रतिदिन “जनता के मुद्दे” पर चर्चा करे। उसमें किसी दल के भों-भों करने वाले नेता को नहीं, सिर्फ विषय विशेषज्ञों को और उनके साथ दो-तीन विभिन्न विश्वविद्यालयों में अध्ययनरत स्टूडेंट को शामिल करें, जो अनिवार्य तौर पर किसी भी राजनीतिक दल से जुड़े न हों। अन्यथा- आने वाले दिनों में दुर्दशा और बढ़ती जाएगी। दूसरी बात- गोदी मीडिया का राग अलापने वालों के लिए कि वे भी निष्पक्ष नहीं हैं। उनको भी अपने अनुकूल मीडिया पसंद है। ऐसे में आप कितनी बेहतरी की उम्मीद कर सकते हैं भला।


#पत्रकारिता #जर्नलिस्ट #jurnlist #CJP #JANTARMANTAR

Sunday, 26 July 2026

CJP का छात्र आंदोलन : जो हुआ अच्छे के लिए हुआ




जो हुआ अच्छे के लिए हुआ, किन्तु…

(सत्ता का अहंकार टूटा, अब आंदोलन की उपज पर नजर)

डॉ.उपेंद्र कश्यप 

मो.नं.- 9931852301



गीता सार में कहा गया है- "जो हुआ वह अच्छा हुआ, जो हो रहा है अच्छा हो रहा है, जो होगा वह भी अच्छा ही होगा"

कॉकरोच जनता पार्टी और इस छात्र आंदोलन को बहुत-बहुत साधुवाद। भारतीय लोकतंत्र में यह घटना हमेशा याद रखी जाएगी। जेपी का आंदोलन हो या अन्ना का आंदोलन हो, दोनों से निकले नेताओं ने बेहतर आदर्श स्थापित नहीं किया है। इसलिए यह देश आंदोलन को लेकर लगभग शिथिल था या निराश था। नई पीढ़ी ने एक बार फिर लोकतंत्र को लेकर उम्मीदें आसमान पर पहुंचा दिए हैं। यानी उद्देश्य अगर बढ़िया है, रास्ते बेहतर हैं, तो सत्ता का अहंकार चाहे जिस ऊंचाई पर हो वह टूटेगा, ढहेगा। यही प्राकृतिक व्यवस्था प्रमाणित हो गयी है। इसलिए जो हुआ वह बेहतर हुआ। यह बात अब नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी को समझ आ गयी होगी। कुछ लोग एक्सपोज भी हुए हैं। खासकर राजनीतिक दल। इस आंदोलन में शामिल छात्र-छात्राओं का एक छोटा हिस्सा ही सही, उसने अपने चारित्रिक दोषों को खुलकर व्यक्त किया। जिससे भारतीय सभ्यता और संस्कृति को भी आघात लगा है। लेकिन कुल मिलाकर बात यही है कि आंदोलन के बाद लोकतंत्र की मजबूती का संकेत स्पष्ट मिला है।

लेकिन, कब पीछे लौटते हैं। जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व में हुआ संपूर्ण क्रांति हो या अन्ना आंदोलन, क्या इन दो बड़े आंदोलनों से कुछ बदला। जेपी के चेलों ने राजनीति में ना यो कोई  सुचिता का काम किया,  ना ही कोई आदर्श स्थापित किया, न सिस्टम के घुन को खत्म कर सके। कथित समाजवाद का झंडा बुलंद किया, बल्कि प्रायः सभी चेले अपवाद छोड़कर भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे दिखे। परिवारवाद को बढ़ावा दिया। सामाजिक न्याय के मुद्दे पर आगे तो बढ़े लेकिन यह अंततः परिवारवाद और जातिवाद तक सिमट कर रह गया। जातिवाद की धार को और तीखा किया। इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी लगाया, जनता ने उनका क्या बिगाड़ लिया। दो ढाई साल में पुनः उन्हीं को भारत की सत्ता सौंप दी। मुलायम सिंह यादव ने कार सेवकों पर गोली चलाई। खुलकर मुस्लिम परस्ती की और मुल्ला मुलायम की उपाधि हासिल कर ली। क्या बिगड़ गया। वह भी मुख्यमंत्री रहे और उनके बेटे अखिलेश यादव भी मुख्यमंत्री बने। परिवारवाद की ऐसी थ्योरी कि परिवार के ही हिस्सों को दूर भगा दिया गया, जिनको उत्तराधिकारी माना जा रहा था। बिहार में देख लीजिए। लालू प्रसाद यादव की राजनीति को, क्या उन्होंने बिहार की व्यवस्था बदली? कैसा आदर्श मानक स्थापित किया, यह कहने की जरूरत नहीं है। देश में भी व्यवस्था तो कम से कम नहीं ही बदली। अन्ना आंदोलन के बाद जो जो काम नहीं करने की गारंटी अरविंद केजरीवाल ने दी, वही वही काम नीचता की हद तक जाकर किया। देश ने पहली बर देखा कि जेल से भी मुख्यमंत्री बनकर सत्ता चलाया जा सकता है। इन दो आंदोलनों ने जो नेता दिए हैं, उन्होंने ना तो आदर्श स्थापित किया, ना कुछ बदल सके। अभी सीजेपी का जो आंदोलन हुआ, उससे क्या कुछ बदल जाएगा? सीजेपी के प्रमुख अभिजीत दीपके की मां अनीता दीपके व पिता भगवान दीपके की इच्छा है कि अभिजीत भविष्य में राजनीति में जाने की जगह निस्वार्थ भाव से समाज सेवा ही जारी रखें। हालांकि राजनीति में जाना है या नहीं, यह फैसला दीपके का अपना रहेगा। यह मां-पिता ने कहा है। यानी आंदोलन खत्म करते ही राजनीति में जाने की चर्चा भी शुरू हो गई। इस देश ने देखा है कि आंदोलन करना और राजनीति करने में आसमान जमीन का अंतर है। अभिजीत दीपके और उनकी टीम के सदस्य भविष्य में राजनीति के क्षेत्र में आते हैं तो वे कैसा आदर्श, मानक स्थापित कर सकेंगे? लोगों को नजर इस पर भी रखनी चाहिए।


#नीट_यूजी_पेपर_लीक  #शिक्षा_मंत्री #धर्मेंद्र_प्रधान #StudentProtest #Aisa #NarendraModi #cjp #Jantar_Mantar #EducationSystem #RYA #DharmendraPradhan #abhijeetdipake #abhijit_deepake


लेखक का परिचय

डॉ. उपेंद्र कश्यप. Mo.No.- 993185231

लेखक- आंचलिक पत्रकारिता की दुनिया, प्रकाशक- द मार्जिनलाइज्ड।

जिसकी भूमिका प्रमोद रंजन ने लिखी है।

इसके अलावा-

गृह शहर, बिहार के दाउदनगर का इतिहास लेखन। पुस्तक- श्रमण संस्कृति का वाहक- दाउदनगर।

■ 1994 से पत्रकारिता। देश और प्रदेश से प्रकाशित विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन के साथ लगातार दैनिक जागरण का अनुमंडल संवाददाता रहा।

● संस्कृति, राजनीति और नक्सल पर विशेष लेखन



Friday, 24 July 2026

कबरिया और पहिरोपना संबंधित कई परंपराएं विलुप्त



रोपनहार को खोंईचा और लुकमा देने की परंपरा खत्म 

मांग भरने के साथ तेल देना भी अब बंद

बढ़िया उपज को धरती मां से करती थी प्रार्थना 

डॉ. उपेंद्र कश्यप 

नबिटा संवाददाता 

दाउदनगर (औरंगाबाद) । भारत कृषि प्रधान देश है। बिहार में तो आजीविका का मुख्य साधन ही कृषि है। यह मौसम कृषि कार्य का है। खेतों में बिहन कबारने और उसे रोपने का काम बड़े पैमाने पर चल रहा है। ऐसे में यह स्पष्ट दिख रहा है कि कबरिया और पहिरोपण से संबंधित कई परंपराएं अब विलुप्त हो गई हैं। मखरा निवासी भाजपा नेता किसान सुरेंद्र यादव बताते हैं कि बिहन कबारते समय कबरिया जयकारा करते थे। वह खत्म हो गया। पुरानी पीढ़ी के लोग रोपने के लिए खेत में जाने से पहले किसान के घर जाती थी और किसान की पत्नी सभी रोपणहार की मांग सिंदूर से भरती थी। खोइन्छा मिलता था। इसमें चावल गुड़ होता था। रोपणहार उसे लेकर खेत में जाते थे। खेत में धरती मां के नाम से छिड़काव करते थे और ईश्वर से प्रार्थना करते थे कि किसान समृद्ध हो। उसकी फसल की उपज बढ़िया हो, ताकि हमारा यानी श्रमिकों का भी पेट भर सके। शाम में फिर रोपनहार किसान के घर जाते थे और उन्हें किसानों के द्वारा लुकमा दिया जाता था। लुकमा में फुला हुआ चना, मटर और चावल का बना हुआ कसर खाने के लिए दिया जाता था। रोपणहार उसे घर ले जाते थे। जिससे उन्हें खुशी मिलती थी। यह परंपरा अब पूरी तरह खत्म हो गई।




उठारो या बनउखाड़ से जुड़ी भी परंपरा समाप्त 

कृषि कार्य में उठारो या बनउखाड़ भी एक महत्वपूर्ण पक्ष है। मतलब किसी भी किसान के तमाम बिहन को उखाड़ने का काम जिस दिन संपन्न होता है, उस दिन उसको उठारो या बनउखाड़ कहते हैं। इस दिन सभी बिहन को उखाड़ कर रोपणहार को दे दिया जाता है। बिहन का गुच्छा बनाया जाता है। जिसे माथे पर रखकर बनिहारिन किसान के घर जाती हैं और किसान उन्हें बन देता है। यानी दक्षिणा देता है। जिसमें चावल, कपड़ा और पैसा होता है। इसे गवछी कहा जाता है। उठारो के बदले यानी बिहन उखाड़ने का काम संपन्न होने के बदले किसान देते हैं। किसान अपने घर के देवता पर भी इसे चढ़ाते हैं।




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#उपेंद्र_कश्यप_रिपोर्ट


जो होना जरूरी है उससे किसी को मतलब नहीं

 जो होना जरूरी है उससे किसी को मतलब नहीं

(संदर्भ-अनशन-आंदोलन, राजनीतिक चालाकियां व परिणाम)

डॉ.उपेंद्र कश्यप

(लेखक- आंचलिक पत्रकारिता की दुनिया, श्रमण संस्कृति का वाहक-दाउदनगर)



पेपर लीक मामले को लेकर भूख हड़ताल और आंदोलन ने देश को झकझोर कर रख दिया। हर समस्या का समाधान है, इसका भी समाधान तय है। अनशन समाप्त हो गया है। आंदोलन जारी है। सरकार ने अपनी बात रखी। सीजेपी, राजनीतिक दलों और छात्र-छात्राओं ने अपनी बातें रखी। बहुत कुछ सकारात्मक हुआ, बहुत कुछ नकारात्मक भी हुआ। जो होना नहीं चाहिए था, वह तो हो गया, और कुछ होने का आश्वासन भी सत्ता की तरफ से मिल गया। लेकिन क्या यह पर्याप्त है?

 इस पूरे आंदोलन का हश्र लगभग वैसा ही हुआ, जैसा पहले होते रहा है। जो होना आवश्यक था या है, वह तो हुआ ही नहीं। ना होता हुआ दिख रहा है। न वैसा करने की मांग छात्र-छात्राओं के तरफ से है, ना बीजेपी के तरफ से है, ना किसी भी विपक्षी दल की तरफ से है, और न ही सरकार की तरफ से है। इस देश में आंदोलन होते रहे हैं और आंदोलन का अंत ठीक वैसे ही होता है जैसे नीट पेपर लीक मामले को लेकर आंदोलन का हुआ। क्या शिक्षा मंत्री के पद त्याग देने से शिक्षा की व्यवस्था सुधर जाएगी? क्या पेपर लीक होना बंद हो जाएगा? क्या इस्तीफा देने को नैतिकता से जोड़ने वाले लोग यह बता सकते हैं कि बिहार में लोकसभा चुनाव हारने के बाद इस्तीफा देकर जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री बनाने वाले नीतीश कुमार ने कौन सी नैतिकता और आदर्श का पालन किया था, कि कुछ ही महीने के बाद उनको हटाकर पुन: मुख्यमंत्री बन गए? क्या रेलवे दुर्घटना का की जिम्मेदारी लेकर इस्तीफा देने वाले नेताओं की नैतिकता के कारण रेलवे में सुधार हुआ? दुर्घटना बंद हो गई? रेलवे में आज भी खानपान की स्थिति बद से बदतर है। दरअसल व्यवस्था बदलने में सबसे बड़ी बाधा आदर्श या नैतिकता और विवेक के दावे और मांग हैं। यह दोनों शब्द का व्यवहार लोकतंत्र के लिए सर्वोच्च स्थिति में होने चाहिए थे। लेकिन पूरे भारतीय लोकतंत्र को मटिया मेट करके रख दिया है। इस देश की जो संस्कृति है, खासकर सामाजिक और राजनीतिक उसमें दोनों शब्दों का कोई महत्व नहीं है। सब कुछ लिखित होना चाहिए। कानून में होना चाहिए। अन्यथा विवेकाधिकार और नैतिकता का इस्तेमाल हमेशा लाभ हानि देखकर किया जाता रहा है, किया जाता रहेगा। और जो इसका इस्तेमाल करता है वह सिर्फ और सिर्फ स्वहित देखकर करता है। इसके तमाम उदाहरण भरे पड़े हैं। इस आलेख में उस दिशा में चर्चा करने की जरूरत फिलहाल नहीं है।


 मूल बात यह है कि जो हुआ, क्या वह पर्याप्त है? क्या अब कोई पेपर लीक नहीं होंगे? क्या फास्ट ट्रैक कोर्ट इस बात की गारंटी देंगे कि पेपर लीक नहीं होंगे? दोषियों को सजा जल्द और सख्त मिलेगी? संजीव मुखिया निर्दोष कैसे साबित हो गए? यह न्यायिक निर्णय सही है तो सवाल यह खड़ा होता है कि दोषी कौन था? पेपर लीक करने वाला माफिया कौन था? सख्त से सख्त सजा का प्रावधान अगर सोमवार को बिल पास कर बना भी दिए जाते हैं, तो क्या नैतिक रूप से भ्रष्ट लोग जो पेपर लीक करते रहे हैं वह अब नहीं करेंगे? क्या पेपर लीक करने वाला नया समूह पैदा नहीं होगा? इसकी गारंटी कौन लेगा? क्या आजीवन कारावास और मृत्यु दंड तक के प्रावधान वाले कानून इस देश में नहीं है, और उससे जुड़े क्या अपराध कम हो गए? ऐसा कुछ होना जाना नहीं है। घटनाएं हमेशा घटती रही हैं और हमेशा घटती रहेंगी। चाहे सत्ता कैसी भी हो, किसी की भी हो। इसलिए आवश्यक जो है वह किया जाना चाहिए।


 इस देश में आवश्यकता जो है वह इस बात की है कि सब की जिम्मेदारी तय हो। यह कानून से हो। नैतिकता और विवेक जैसे आवरण में छुपने का कोई अवसर नहीं होना चाहिए। जब एक देश एक चुनाव, एक देश एक राशन कार्ड किया जा सकता है तो फिर एक देश एक शिक्षा प्रणाली, एक देश एक चिकित्सा प्रणाली क्यों नहीं देश तय कर सकता है?

 वर्ष 2016 से पहले चलिए जब नीट नहीं था, तो कितने गरीब बच्चों को डॉक्टर बनने का मौका मिलता था? सीटें बिक जाती थी। लाखों करोड़ों में। यह बदलाव मात्र सुधार भर लाया। समस्या का समाधान नहीं। 


समस्या का समाधान यह है कि देश में पहले तो एक देश और एक शिक्षा-चिकित्सा प्रणाली लागू होना चाहिए। यानी शिक्षा और चिकित्सा का निजीकरण नहीं होना चाहिए। यह दोनों पूरी तरह फ्री होने चाहिए। भले ही इसकी भरपाई के लिए सरकार अन्य प्रकार का टैक्स लगाए। इसलिए कि बिना पैसे तो कुछ भी नहीं होता। अब तो लोग बिना पैसे ना बोलते हैं, ना लिखते हैं, ना चलते हैं। ऐसी स्थिति में धन आवश्यक है। धन का इंतजाम सरकार चाहे जैसे करें, लेकिन शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए एक रुपये भी किसी भी व्यक्ति को खर्च नहीं होना चाहिए। इसके लिए आधार होना चाहिए 18 अगस्त 2015 को इलाहाबाद हाईकोर्ट का वह फैसला, जिसमें न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल ने कहा था कि- बेसिक शिक्षा सभी के लिए एक होनी चाहिए। सरकारी सुविधा संसाधन और अर्थ का लाभ लेने वाला हर व्यक्ति का बच्चा सरकारी स्कूल में पढ़े यह सुनिश्चित होना चाहिए। कहा था- उत्तर प्रदेश के सरकारी कर्मचारी, जन प्रतिनिधि, स्थानीय निकायों के पदाधिकारी, न्यायपालिका से जुड़े लोग तथा सरकारी खजाने से वेतन या मानदेय पाने वाले सभी व्यक्तियों के बच्चों को सरकार प्राथमिक विद्यालयों में पढ़ाने की व्यवस्था सरकार करे। अदालत ने तब कहा था- जब तक नीति निर्माता और सरकारी अधिकारियों के अपने बच्चे सरकारी स्कूलों में नहीं पढ़ेंगे, तब तक विभिन्न विद्यालयों की गुणवत्ता सुधारने के प्रति गंभीर नहीं होंगे। कितनी सही बात कही गयी थी। अब कल्पना करिए जब यह फैसला आया तो उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव की सरकार थी, सरकार ने क्या किया? कुछ नहीं। उस फैसले को गतलखाते में डाल दिया। इस देश में तब का कोई सत्ता या विपक्ष का नेता, कोई भी राजनीतिक दल उस फैसले को लागू करने के लिए बयान तक नहीं दिया। सुप्रीम कोर्ट जाने की बात तो भूल ही जाइए। तब केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार थी। कोई केंद्रीय कानून नहीं बनाया गया, जिसमें उस फैसले का अस्क भी दिखे। बाद में वहां आदित्यनाथ योगी की सरकार बनी। उस सरकार ने भी हाई कोर्ट के इस फैसले पर कोई कार्रवाई नहीं की। तब भी इस देश की जनता को, जेन जी को, राजनीतिक दलों को यह समझ में नहीं आ रहा कि समस्या कहां है? सारे राजनीतिक दल, सभी नेता, एक बात पर एक स्वर में, एक जगह पर खड़े दिखते हैं कि इस देश के युवाओं को, आम लोगों को पढ़ने नहीं देना है। और स्वस्थ नहीं रहने देना है। कोई किसी से इस मुद्दे पर कम कतई नहीं है। हां जो आप सरकारी स्तर पर स्कूलों के निर्माण, अस्पतालों के निर्माण, उनके आधारभूत संरचनाओं में वृद्धि, कुछ नौकरी दे देना, यह सब चलता रहेगा। ताकि लोगों को सरकार उनकी चिंता करते हुए दिखती रहे। वास्तव में सरकारों के एजेंडे में शिक्षा व स्वास्थ्य शामिल ही नहीं है। हकीकत यह है कि किसी भी सरकार को आजादी से लेकर अब तक शिक्षा और स्वास्थ्य की चिंता नहीं रही है। जितनी चिंताएं दिखाई गई वह सिर्फ वोट को प्रभावित करने के लिए। बड़ी-बड़ी बातें बनाई गई। लेकिन समस्या के जड़ पर हमला किसी ने नहीं किया। और यह करेंगे भी नहीं। ऐसा करने के लिए एक व्यापक आंदोलन की जरूरत है इस देश को। अगर जनता, सामाजिक संगठन बिना किसी राजनीतिक दल के समर्थन लिए सड़क पर उतरें, सिर्फ एक देश एक शिक्षा, एक स्वास्थ्य की मांग को लेकर तब व्यवस्था बदलेगी, सुधरेगी, अन्यथा हर दशक में इस तरह के आंदोलन होते रहेंगे और सुधार दिखाने की कोशिशें सरकारें करती रहेंगी। समस्या खत्म नहीं होगी। हमने देखे हैं संपूर्ण क्रांति, अन्ना आंदोलन और उसका राजनीतिक लाभ लेने वाले चतुर चेलों की सत्ता, उनकी सादगी पर भ्रष्टाचार के दीमकों को पनपते हुए। इतिहास निराशाजनक है, वर्तमान उम्मीद जगाता है, और भविष्य का पता नहीं।


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Monday, 20 July 2026

एक ही गुलदस्ते में महत्वपूर्ण और गुणवत्तापूर्ण पांडुलिपियां

 



सम्मानित किये गए आठ लोगों ने करायी 26086 पांडुलिपि

जिले से कुल 26158 पांडुलिपि उपलब्ध

डॉ. उपेंद्र कश्यप/ नबिटा संवाददाता 

दाउदनगर (औरंगाबाद) । ज्ञान भारतम् मिशन के तहत 15 मार्च से 15 जून तक हुए सर्वेक्षण में बिहार में छठे स्थान पर औरंगाबाद रहा। सोमवार को जिला मुख्यालय स्थित समाहरणालय के एक सभागार में उन आठ लोगों को सम्मानित किया गया जिन्होंने सर्वाधिक महत्वपूर्ण, गुणवत्तापूर्ण और संख्या में पांडुलिपियां उपलब्ध कराई थी। जिला पदाधिकारी अभिलाष शर्मा ने कहा कि एक ऐसा गुलदस्ता औरंगाबाद के लोगों ने सजाया जिसमें पारसी, अरबी, उर्दू, संस्कृत, तमिल, उड़िया भाषा में लिखी पांडुलिपि शामिल है। अधिकारियों ने कहा कि गुणवत्तापूर्ण पांडुलिपियां उपलब्ध कराई गई। जिससे जिले का मान बढ़ा। सभागार में अधिकारियों ने यह भी स्वीकार किया कि आरंभिक समय में तो यह लगा के जिला में शायद ही कोई महत्वपूर्ण अभिलेख उपलब्ध हो लेकिन अधिकारियों ने श्रम किया और लोगों ने सहयोग किया, नतीजा काफी प्राचीन प्राचीन पांडुलिपियां उपलब्ध हुई। डीडीसी कुमारी अनुपम सिंह ने काफी प्रशंषा की। जिला पंचायती राज पदाधिकारी इफ्तिखार अहमद ने कहा कि एक से बढ़कर एक पांडुलिपि लोगों ने उपलब्ध कराया है जिसके लिए किसी भी तरह की परेशानी का सामना किया जा सकता है।



जिले से कुल 26158 पांडुलिपि उपलब्ध हुई है। इसमें 26086 पांडुलिपि सिर्फ आठ व्यक्ति द्वारा उपलब्ध कराई गई है, जिनको सम्मानित किया गया। इसमें दाउदनगर अनुमण्डल के सात व्यक्तियों द्वारा 8865 और मदनपुर के दो व्यक्ति द्वारा 17221 पांडुलिपि उपलब्ध कराया गया है। इस अवसर जिन आठ लोगों को सम्मानित किया गया उन्होंने काफी महत्वपूर्ण दस्तावेज उपलब्ध कराया है। जिला कला संस्कृति पदाधिकारी कुमार पप्पू द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारी के अनुसार अमझर शरीफ से कुल 7195 पांडुलिपियां प्राप्त हुई है। जिसमें दाउदनगर शरीफ से मोहम्मद शबा कादरी द्वारा 142, मनोरा शरीफ खानकाह से पीर सैयद शाह मंजर अली कादरी द्वारा 2062 एवं शहीद सैयद मसूद कादरी द्वारा 1182 अमझर शरीफ खानकाह के अब्दुल कादिर जिलानी से 309 और सैयद हसनैन कादरी से 3500 पांडुलिपि उपलब्ध कराए गए हैं। बताया गया कि 1200 वर्ष पुरानी अब्दुल कादिर जिलानी द्वारा हस्तलिखित कुरान, पैगंबर मोहम्मद साहब का पद चिन्ह, दाढ़ी का बाल एवं ताड़ पत्र, भोजपत्र, कपड़ा, धातु पर लिखा कुरान, इस्लामी ग्रंथ, जादू टोना टोटके बीमारी का उपचार से संबंधित दस्तावेज एवं इस्लामी आयतें उपलब्ध कराई गई हैं। जिनकी भाषा अरबी, फारसी एवं उर्दू है। दाउदनगर के गुरुद्वारा बाबा बिहारी दास संगत में रखे हुए गुरु ग्रंथ साहिब उपलब्ध कराया गया। यह लगभग 1402 पांडुलिपि है। डॉ राजेंद्र प्रसाद सर्राफ द्वारा यह उपलब्ध कराया गया। बताया गया है कि यह गुरु तेग बहादुर जी द्वारा हस्तलिखित गुरु ग्रंथ साहिब है। जिसकी लिपि गुरुमुखी है। पत्रकार डॉ.उपेंद्र कश्यप द्वारा 268 पांडुलिपियां उपलब्ध कराई गई हैं। यह संस्कृत भाषा में है, जिसमें कई संस्कृत ग्रंथ हैं और विभिन्न बीमारियों और उसके उपचार से संबंधित इसमें जानकारी दी गई है। यह लगभग 1400 साल पुरानी बताई जाती है। मदनपुर के घटराईन निवासी सत्येंद्र नारायण सिंह द्वारा 14630 और नरेंद्र प्रताप सिंह द्वारा 2591 दस्तावेज उपलब्ध कराए गए हैं। इसमें ताड़पत्र, भोजपत्र एवं पन्नों पर हस्तलिखित गीता, रामायण, सभी देवी देवताओं पर्व से संबंधित पूजा पाठ की विधि और मंत्र मंत्र लिखे हैं। उनकी भाषा संस्कृत, ओड़िया एवं तमिल बताई जा रही है।

 



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Art, Culture and Youth Department, Government of Bihar

100 नहीं अब 125 दिन काम, 252 नहीं 300 भुगतान

 



औरंगाबाद के जनप्रतिनिधियों ने पंच सम्मेलन में उठाया मुद्दा

ससमय भुगतान और अधिक विकास का मिला भरोसा

डॉ. उपेंद्र कश्यप/ नबिटा संवाददाता

दाउदनगर (औरंगाबाद) । ग्रामीण विकास मंत्रलय द्वारा वाराणसी में आयोजित पंच सम्मेलन में वीबीजी रामजी से जुड़े मुद्दे औरंगाबाद से शामिल हुए दो मुखिया प्रतिनिधियों ने भी अपने विचार रखें और उन्हें सकारात्मक जवाब महात्मा की उच्च अधिकारियों के तरफ से दिया गया गोल्ड यहां पंचायत के मुखिया कौशल्या देवी के पति नागेंद्र सिंह व बारुण के पिपरा के मुखिया विजय सिंह ने प्रश्न किया तो सकारात्मक जवाब मिला। इन सवालों से प्रायः सभी मुखिया जूझ रहे थे। जो आश्वासन मिला उससे इस योजना के कार्यान्वयन में सहूलियत होगी, मजदूरों को काम और दाम दोनों अधिक मिलेगा। नागेंद्र सिंह ने विभागीय संयुक्त सचिव रोहीणी आर्य से सवाल किया कि मजदुरों का भुगतान बाधित रहता था तो अब नए एक्ट से कैसे भुगतान किया जाएगा? दुसरा कि केंद्रांश और राज्यांश में 60- 40 के अनुपात से समस्या खड़ी होने के कारण कार्य संचालन में समस्या आएगी। वीबीजी रामजी का प्राक्कलन और 15 वीं, षष्ठम राज्य वित्त में सामाग्री पर अलग-अलग  रेट प्राक्कलन क्यों है? जबकि पंचायत में पक्का कार्य करने में एक ही प्रकार का ईंट और सिमेंट लगा रहे हैं। मुखिया विजय सिंह ने कहा कि जब पंचायत भवन में सारी योजनाओं को संचालित करने वाले कर्मी मोजूद हैं तो फिर वीबीजी रामजी में जिला से भुगतान क्यों, जबकि 15 वीं वित्त का भुगतान पंचायत में हो रहा है। संयुक्त सचिव रोहिणी आर्य का जबाब था कि अपने काम को बेहतर ढंग से पूरा करें और अतिरिक्त राशि पंचायत और प्रखंड में जमा रहेगा। अब सामग्री का भुगतान हर माह मकराया जायेगा। मुखिया संघ ने इसका जबरदस्त स्वागत करते हुए खुशी का इजहार किया। नागेंद्र सिंह का कहना है कि अगर ऐसा वास्तव में हुआ तो श्रमिकों से लेकर ग्रामीण क्षेत्र में विकास की तस्वीर बदल जाएगी। बताया कि ग्रामीण विकास राज्य मंत्री ने कहा कि अब 100 दिन की जगह 125 दिन मानव दिवस का सृजन करें। मजदूरों को 252 रुपये की जगह 300 रुपये का भुगतान किया जाएगा। इससे गांवों की तस्वीर बदल जाएगी।


भ्रमण भी और सम्मान भी मिला

मुखिया प्रतिनिधि नागेंद्र सिंह ने बताया कि भारत सरकार ने तीर्थ व पर्यटन स्थलों का भ्रमण भी कराया, और सम्मान भी दिया। बहुत अच्छा लगा। सभी प्रतिनिधि गदगद हो गए। आवासीय सुविधा भी जबरदस्त रही।


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