Thursday, 7 May 2026

हर बार टूटती रही है मंत्रिमंडल में हिस्सेदारी का सपना

 


21 वर्ष में मात्र 22 महीने मिला है-मंत्री-सुख

नौ बार रही है जदयू भाजपा की सरकार 

उपेंद्र कश्यप

दाउदनगर (औरंगाबाद) ।

वर्ष 2005 में दूसरी बार अक्टूबर में हुए बिहार विधानसभा चुनाव के बाद से अब तक भाजपा और जदयू की नौ बार सरकार बन चुकी है। प्रायः हर बार यह उम्मीद रही कि औरंगाबाद जिला को मंत्रिमंडल में हिस्सेदारी मिलेगी। लेकिन 21 साल में मात्र 22 महीने की हिस्सेदारी से ही “मंत्री-सुख” औरंगाबाद जिला के नाम अंकित है। इस बार भी ऐसी उम्मीद थी कि जब औरंगाबाद जिले के छह में पांच विधायक एनडीए से हैं तो शायद जिले की भागीदारी भी हो। लेकिन ऐसा न हो सका। वर्ष 2005 में जदयू भाजपा को तीन, राजद को दो और तब अलग चुनाव लड़ी लोक जनशक्ति पार्टी को एक विधायक मिला था। तब भी सरकार में औरंगाबाद जिले को हिस्सेदारी नहीं मिली। वर्ष 2010 में जिले के मतदाताओं ने जदयू व भाजपा के खाते में पांच और निर्दलीय को एक सीट दिया, तो उम्मीद फिर जगी कि बिहार सरकार के मंत्रिमंडल में किसी को जगह मिलेगी। तब औरंगाबाद से भाजपा के विधायक रामाधर सिंह

बिहार सरकार में सहकारिता मंत्री बनाए गए। लेकिन विवादों की वजह से वह मात्र 22 महीना ही मंत्री रह सके। सिर्फ 26 अगस्त 2011 से 16 जून 2013 यानी लगभग 22 माह। तब से लेकर आज तक औरंगाबाद जिले के किसी भी विधायक को मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिली। वर्ष 2015 में जब नीतीश कुमार राजद के साथ चले गए तो, औरंगाबाद में मात्र दो विधायक भाजपा जदयू से जीते और महा गठबंधन को चार विधायक मिले। वर्ष 2020 में जब चुनाव हुआ तो औरंगाबाद जिला से एनडीए का सुपड़ा साफ हो गया। सभी छह सीट राजद और कांग्रेस के खाते में गए। तब औरंगाबाद के किसी विधायक को मंत्रिमंडल में शामिल करने का प्रश्न ही नहीं था। जब 2025 में विधान सभा का चुनाव हुआ, तो इस जिले में एनडीए को पांच और महागठबंधन को मात्र एक विधायक मिला। जब नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने तो उम्मीद की गई कि इस बार हिस्सेदारी मिलेगी। तब भी निराशा हाथ लगी। और अब जब सात मई 2026 को एनडीए की सरकार चला रहे सम्राट चौधरी मंत्रिमंडल का विस्तार हुआ तब भी कोई हिस्सेदारी नहीं मिली। इस 26 साल में जदयू के हाथ से सत्ता भले ही भाजपा के हाथ चली गई, लेकिन मंत्रिमंडल में हिस्सेदारी का सपना अधूरा ही रह गया।



अंत में एक सवाल:-

नए मंत्रिमंडल विस्तार से एक सवाल उठता है कि क्या औरंगाबाद जातीय समीकरण और क्षेत्रीय संतुलन साधने की राजनीतिक विवशता लायक नहीं है, जो इसकी आकांक्षा पूरी नहीं होती। सवाल इसलिए कि मंत्रिमंडल गठन में हर बार यह तर्क दिया जाता है कि जाति और क्षेत्र का ख्याल रखा जाता है। 


औरंगाबाद जिले में एनडीए के विधायक:-

ओबरा से लोजपा आर के डॉ. प्रकाशचंद्र, औरंगाबाद से भाजपा के त्रिविक्रम नारायण सिंह, नबीनगर से जदयू से चेतन आनंद, रफीगंज से जदयू के प्रमोद कुमार सिंह और कुटुंबा सुरक्षित से हम के ललन राम। 


ओबरा से जगी थी उम्मीद 

वर्ष 2025 के चुनाव में ओबरा में चुनावी सभा को संबोधित करते हुए एलजेपीआर सुप्रीमो चिराग पासवान ने जो संकेत दिया था उससे यह उम्मीद जगी थी कि डा.प्रकाश चंद्र को मंत्रिमंडल में शामिल किया जा सकता है। ऐसा भी नहीं हुआ।

Monday, 4 May 2026

पश्चिम बंगाल में भाजपा की जीत विपक्ष के लिए सबक

 


● जनता, ईवीएम और संवैधानिक संस्थाओं को बख्शे विपक्ष ●

◆ विपक्ष को ले डूबेगा मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति ◆


● उपेंद्र कश्यप ●

लेखक व वरिष्ठ पत्रकार


पश्चिम बंगाल में बीजेपी जीत गई। यह जीत होना बीजेपी के लिए कम, देश की राजनीति और लोकतंत्र के लिए अति आवश्यक था। इसके कारण स्पष्ट हैं। बंगाल की पारंपरिक राजनीति को अगर देखें तो 30 साल लगातार कांग्रेस, 34 साल लगातार वामपंथी और अब 15 साल लगातार तृणमूल कांग्रेस की सत्ता रही। राजनीतिक दलों और उनके समर्थकों की प्रवृत्तियां वामपंथी शासन के जमाने में जो आरंभ हुई थी वह रूढ़ होती हुई तृणमूल कांग्रेस तक चली आयी। नतीजा जनता को विकल्प चुनने के अलावा कोई रास्ता नहीं बच गया था, और वह विकल्प बनी भाजपा और तृणमूल कांग्रेसी कांग्रेस हाशिये पर चली गई। जिस वामपंथ का गढ़ था पश्चिम बंगाल, वहां से वह लगभग खत्म हो गयी, साथ ही इसी दुर्दशा को कांग्रेस प्राप्त हो गयी। ऐसा उनकी नीतियों के कारण हुआ। सत्ता के अहंकार में तृणमूल वामपंथियों की दुर्गति के फलस्वरूप प्राप्त अपनी सत्ता से सबक नहीं ले सकी। वामपंथियों के राज्य में भी कोलकाता में जीना आसान नहीं था और वही हाल तृणमूल ने कर रखी थी। बंगाल में यह आम बात थी कि अगर आपको घर बनाना है तो ईट, सीमेंट के लिए भी तृणमूल के नेताओं को कट मणि देनी होगी। जमीन खरीदनी है तो भी। यानी विकास का छोटा सा भी काम अगर कोई नागरिक कर रहा है तो उसे एक हिस्सा तृणमूल के नेताओं को संतुष्ट करने के लिए खर्च करना पड़ता था। इतना ही नहीं लोकतंत्र की दुहाई देने वाला विपक्ष सेलेक्टिव था और तृणमूल के आतंक के आगे खामोश था। वोट देने से रोका जा रहा था। तृणमूल वोट न देने वालों की हत्याएं की गई। घर जलाए गए। यही सब तो वामपंथी भी करते थे। याद करिए बिहार का वह दौर जब हर चुनाव में हत्याएं होती थी और एक दौर वह आया जब हत्या तो छोड़िए वोट देने से रोकने की घटनाएं तक खत्म हो गई। बिहार में सामाजिक परिवर्तन हुआ। राजनीतिक परिवर्तन हुआ। टीएन शेषण की सख्ती के बीच 1995 में चुनाव हुआ, तब भी लालू यादव ने चुनाव आयोग पर कई गंभीर आरोप लगाए थे, लेकिन 167 सीट लाकर लालू प्रसाद यादव पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने में सफल रहे। वरना बूथ लूट लिए जाते थे। हत्याएं होती थी। यही हाल पश्चिम बंगाल में था। वोट देना है तो पहले वामपंथियों के लिए दो, और उनकी सत्ता चली गई तो फिर तृणमूल के लिए दो, अन्यथा जीना मुहाल हो जाएगा। ऐसे में भाजपा ने रणनीति बनाई। लोहे को लोहा काटता है। ठीक उसी तर्ज पर अमित शाह ने कहा- अन्याय करने वालों को उल्टा लटका दिया जाएगा। चुनाव का परिणाम जो हो लंबे समय तक यहां केंद्रीय पुलिस बल तैनात रहेगी। इसने लोगों को भरोसा दिया। हिम्मत दी। नतीजा लोगों ने वोट दिया। उनको यह विश्वास हुआ कि चुनाव बाद होने वाली हिंसा से बच सकेंगे और सत्ता का परिवर्तन बड़ी आसानी से हो गया। विपक्ष के लिए यह सबक है। सबक कई है और जब तक विपक्ष सबक नहीं सीखेगा उसकी दुर्दशा जारी रहेगी। राज्यों के स्तर पर भी और लोकसभा चुनाव के स्तर पर भी। हर बार जनता को बेवकूफ समझने और बताना विपक्ष के लिए अब भारी पड़ता जाएगा। जहां विपक्ष जीतता है वहां ईवीएम से लेकर चुनाव आयोग तक, ईडी, सीबीआई सब ठीक। जनता भी ठीक और समझदार। और जहां हार होती है वहां जनता को बेवकूफ बनाने का आरोप विपक्ष जब भाजपा पर लगाता है तो सीधे-सीधे जनता को आप बेवकूफ बताते हैं। यह जान लीजिए, जनता किसी भी नेता से अधिक समझदार है और वह अधिक देशभक्त है। इसलिए कि उसका अपना निजी स्वार्थ किसी भी नेता और राजनीतिक दल से कम होता है। दूसरी बात चुनाव हारते ईवीएम का रोना बंद करना होगा। जब आप ईवीएम पर आरोप लगाते हैं तो दरअसल अपनी कमियों से आप मुंह मोड़ लेते हैं। ईडी, सीबीआई, चुनाव आयोग के दुरुपयोग का मामला जब विपक्ष उछालता है तो यह भले ही उनके समर्थकों को ऊर्जा देती हो, उनमें जोश भरता हो और उनका विश्वास दृढ़ करता हो कि उनकी पार्टी अभी हारी नहीं बल्कि हराई गई है, लेकिन इसके उलट अगर देखें तो राजनीतिक दल अपनी कमियों से भी मुंह मोड़ लेते हैं। कोई भी व्यक्ति या संस्था या संगठन जब अपनी खामियों को ढूंढने के बजाय दूसरे को दोषी बताना शुरू करता है तो उसका विकास रुक जाता है। ऋणात्मक गति से उसका ह्रास होना शुरू होता है। भारत में विपक्ष के साथ यही खेल हो रहा है। आजादी के समय से चली आ रही मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति को अब छोड़ना होगा। इस पर लंबी बातें कही और लिखी जा सकती है। यहां ठोस में बस इतना ही कहना चाहूंगा कि मुस्लिम तुष्टीकरण के लिए जब आप बहु संख्यक आबादी की निष्ठा उसकी आस्था पर सवाल उठाते हैं, उसको अपमानित करते हैं, हिंदू देवी देवताओं को आप गाली देते हैं और दूसरी तरफ ठीक उलट मुस्लिम अपराधियों व गुंडो के खिलाफ इसलिए सख्त नहीं होते कि मुस्लिम वोट बैंक गड़बड़ा जाएगा तो आप बहु संख्यकों को ध्रुवीकृत कर रहे होते हैं। जब हिंदू देवी देवताओं और सनातन संस्कृति की बात करते हुए उसकी आलोचना करते हैं, जब उसकी कमियों को सामने रखते हैं, तो आप यह भूल जाते हैं कि जनता यह भी अपेक्षा करेगी कि आप इस्लाम की परंपरा में जो खामियां हैं, उनकी त्रुटियों को भी रखें। लेकिन ऐसा इसलिए नहीं करते हैं कि छह इंच छोट कर दिए जाने का डर सताता है विपक्ष को और वोट बैंक खोने का डर सताता है। अन्यथा जो परिणाम पश्चिम बंगाल में हुआ, वह दिन  बहुत दूर नहीं जब तमिलनाडु और केरल में भी भगवा लहराने लगेगा।

स्वस्थ और मजबूत लोकतंत्र के लिए विपक्ष का सशक्त होना आवश्यक है। दुर्भाग्य यह है कि वर्तमान विपक्ष विहीन है, क्योंकि वह दिशाहीन और आत्ममुग्ध है।