◆ चूहा बोलो या छछूंदर, साथ कौन रहता है? ◆
(संदर्भ- तृणमूल में विखराव और उस पर आयी प्रतिक्रिया)
● डॉ. उपेंद्र कश्यप ●
पश्चिम बंगाल चुनाव परिणाम आने के साथ ही तृणमूल कांग्रेस में बिखराव शुरू हो गया। 28 में 19 सांसद अलग गुट बनाने की अर्जी लोकसभा अध्यक्ष के पास दे चुके हैं। इधर 80 में लगभग 60 विधायक का अलग गुट पश्चिम बंगाल में बन गया है। अब इस घटना के बाद टीएमसी ही नहीं बल्कि आईएनडीआईए गठबंधन के दूसरे नेता भी यह रोना रो रहे हैं कि जो छोड़कर पार्टी गए वह अपने पद से इस्तीफा दें। यानी विधायकी और सांसदी छोड़ दें। इसके बाद फिर जनता के बीच जाएं, चुनाव लड़ें, और तब उनको आटा चावल का भाव पता चल जाएगा। इसके पहले भी लोग टूटते रहे हैं। नेता का तो मतलब ही है कि उगते सूरज के साथ या उगे हुए सूरज के साथ ही रहना। डूबते सूरज के साथ तो कोई नेता रहता ही नहीं। और यही नहीं अगर यह आशंका भी दिख जाए कि उनका शीर्ष नेतृत्व अगर डूबने की स्थिति में है तो सबसे पहले नेता भागते हैं। यह और बात है कि नेता यह प्रलाप करते हैं, कहावत सुनाते हैं कि- जब जहाज डूब रहा होता है तो सबसे पहले चूहे भागते हैं। अपने यहां एक कहावत है- फिसलते में दुलत्ती मार देना। यानी कोई व्यक्ति अगर चिकनी मिट्टी पर फिसल रहा है तो उसे संभालो नहीं लात मार दो कि वह पूरी तरह बर्बाद हो जाए। यही राजनीति में होते रहा है। यही हो रहा है और ऐसा ही होता रहेगा, यह तय है। जब तक राजनीति रहेगी, ऐसी घटनाएं सामने आती रहेंगी। इसलिए भागने वालों को डूबते जहाज से पहले चूहा भागने की बात कहने वाले भी यह तो मान ही रहे हैं ना कि जहाज अब डूबने वाला है। यह और बात है कि भागने वाले को चूहा ठहरा रहे हैं। लेकिन राजनीतिक शब्दावली में यह चूहे तो नहीं हैं। राजनीतिक शब्दावली में इनके लिए सटीक शब्द मौसम वैज्ञानिक होना चाहिए। ऐसे में एक वैज्ञानिक की आलोचना भला कैसे की जा सकती है? जो उन्होंने दिव्य ज्ञान प्राप्त किया हुआ है, वह अपनी दिव्य दृष्टि से यह देख रहे हैं कि जहाज डूब रहा है, तो वे भाग रहे हैं। अब भला डूबते जहाज पर रहता कौन है। यह शिकायत सिर्फ राजनीतिक बिरादरी से ही क्यों? ऐसा तो सभी करते हैं। और ऐसा करने वाले दुनियावी समझ वाले व्यक्ति कहे जाते हैं। अब उनको आप चूहा कहिए चाहे छछूंदर कहिए, उससे क्या फर्क पड़ता है। राजनीति में कोई किसी का सगा नहीं होता और राजनीतिज्ञों के तो गुण में ही धूर्तता, चाटुकारिता, अवसरवादिता समाहित है। इसके बिना तो कोई नेता बन ही नहीं सकता। इसीलिए हम अक्सर देखते हैं कि जब कोई नेता का कद बढ़ता है तो वह सबसे पहले अपना कद बढ़ाने वाले को ही लात मारता है।
■ हालात बदलने हैं तो यह करना आवश्यक ■
वास्तव में अगर हालात सुधारने हैं तो विवेकाधिकार से काम नहीं चलेगा, इसे खत्म होना चाहिए। कानून की लाठी से ही कुछ उम्मीद की जा सकती है। यह कानून ही बना दिया जाना चाहिए कि जब भी कोई विधायक या सांसद या कोई भी पदधारक अगर पार्टी छोड़ता है, चाहे उसकी संख्या जितनी बड़ी हो, उसकी सदस्यता समाप्त हो जाएगी। ठीक वैसे ही जैसे पार्टी छोड़ने पर विधायकी और सांसदी चली जाती है,जल जबकि पार्टी निकाले तो बची रह जाती है। यह नियम हर संख्या या बड़े समूह पर भी लागू होनी चाहिए। लेकिन इसके साथ-साथ यह भी होना चाहिए कि चुनाव में जो जिसे गलिया रहा है उसके साथ वह चुनाव बाद गठबंधन नहीं करेगा। और जो गठबंधन में चुनाव लड़ेगा वह चुनाव बाद गठबंधन अगले चुनाव आने तक नहीं तोड़ सकता है। इसलिए कि यही अंतिम सत्य है कि चाहे देशहित और जनहित की बात नेता जितना कर ले, सबसे पहले वह स्वहित देखता है। उसके बाद दलहित देखता है, उसके बाद परिवारहित देखता है। उसके बाद जाति का हित देखता है, तब जमात और तब देश का हित देखता है। इसलिए कठोर सुधार की जरूरत है ल। अन्यथा डूबते जहाज छोड़िए, जहाज डूबने की आशंका भी दिखने पर लोग भागेंगे ही भागेंगे। अब उन्हें आप चूहा कहिए या छछूंदर। इससे भला क्या फर्क पड़ता है।
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