Friday, 31 July 2026

खेतों में अब सुनाई नहीं देते रोपनी के गीत

 


न बजते हैं अब बैलों और हलों के घुंघरू 

कभी किसानों को रोपनहार देती थीं गालियां

उपेंद्र कश्यप

नबिटा संवाददाता

दाउदनगर (औरंगाबाद)

कृषि कार्य अभी जोरों पर है। खेतों में रोपनी के कार्य चल रहे हैं। लेकिन कहीं चले जाइए, रोपणहारो के मुंह से अब गीत सुनाई नहीं देते। अपवाद स्वरूप कहीं-कहीं यदा-कदा कुछ पंक्तियां गुनगुनाती रोपणहार दिख जाए तो बात अलग है। लेकिन आमतौर पर अब खेतों में रोपनी करते वक्त गीत गाए जाते हुए सुनाई नहीं पड़ते हैं। दरअसल, खेतों में हल नहीं चलते। जब हल चलते थे तब बैलों और उसके पैरों में बंधे घुंघरू से मधुर आवाज निकलती थी। इससे रोपनहार को गीत गाने में आनंद आता था। अब हल बैल से बंधे घुंघरू की आवाज भी खेतों में सुनाई नहीं पड़ती। दूसरे रोपनहार भी अब विभिन्न प्रदेशों से मंगाए जाते हैं। जो स्थानीय गीत और संस्कृति से भी अनभिज्ञ होते हैं। कई बार दूसरे धर्म के भी श्रमिक होते हैं। अब किसानों को रोपनहार गाली भी नहीं देती। मखरा निवासी सुरेंद्र सिंह यादव बताते हैं कि दरअसल जब खेत पर किसान खड़ा रहते थे तो रोपनहार उन्हें गाली देती थी, ताकि वह भाग जाए। ऐसा इसलिए करती थी ताकि उन्हें कमर सीधा करने का मौका मिले। आम तौर पर ठेहुना से ऊपर उनका कपड़ा रहता है। शंका निवारण करना होता है। ऐसे में जब किसान खड़ा होगा तो दिक्कत होती थी। दूसरे कई रोपनहारों का किसानों से मजाक करने वाला रिश्ता होता था और इसलिए किसान का नाम लेकर कुछ गालियां देती थी, जो रिश्ते में भौजाई लगती थी। अब यह परंपरा भी खत्म हो गई है।


नई पीढ़ी के रोपनहार नहीं जानती गीत

 तरार पांच के मुखिया व किसान शशि भूषण सिंह कहते हैं कि पुराने (वृद्ध) रोपनहार यदा-कदा, कहीं-कहीं गीत गाती दिख जाती हैं। नई पीढ़ी गीतों को भूल चुकी है। वह गीत गाना भी नहीं जानते और ना इसमें कोई रुचि लेती हैं। हालांकि एक परंपरा अभी भी जीवित है कि रोपनहार किसान के घर आती हैं और घर की महिलाएं उन्हें सिंदूर और तेल देती हैं, श्रृंगार के लिए। ठीक वैसे ही जैसे रोपनी को भी किसान धरती का श्रृंगार मानते हैं।


वर्षा और बढ़िया उपज के लिए गाती थी गीत 

मखरा निवासी किसान सुरेंद्र सिंह यादव कहते हैं कि रोपनहार बेहतर वर्षा और उपज के लिए इंद्र भगवान को खुश करने के लिए गीत गाती थी। वे ईश्वर से प्रार्थना करती थी कि वर्षा पर्याप्त हो, फसल की उपज बेहतर हो, इससे किसान समृद्ध होगा तो उनको भी खेतों में काम करने का अवसर मिलेगा और इससे आर्थिक लाभ भी प्राप्त होगा।


#krishigyan #krishi #khetibadi #khet_khalihan #खेत_खलिहान #किसानी #कृषि_परंपरा #रोपनी_परंपरा #रोपनहार #रोपनी #रोपनी_गीत

Thursday, 30 July 2026

टेढ़ी पॉलिटिक्स : भाजपा- संघ के गुंडो को क्यों बचा रहा विपक्ष

 


टेढ़ी पॉलिटिक्स : भाजपा- संघ के गुंडो को क्यों बचा रहा विपक्ष

(मिले कई सबक, लोकतंत्र के लिए खतरनाक स्थिति)

डॉ.उपेंद्र कश्यप 

मो.नं.- 9931852301


जंतर मंतर पर हुए प्रदर्शन के दौरान जब उपद्रव हुए तो उपद्रवी तत्वों चाहे वे छात्र-छात्रा हों, या युवक युवती, कॉकरोच जनता पार्टी के अभिजीत दीपके, उसके प्रवक्ता सौरभ दास या विभिन्न विपक्षी दलों के नेता- प्रवक्ता सबने एक स्वर से कहा कि भाजपा और संघ ने योजनाबद्ध तरीके से अपने गुंडो को भीड़ में छात्र आंदोलन को बदनाम करने के लिए घुसा दिया है। यह गुंडे आरएसएस और भाजपा के हैं। अब सवाल उठ रहा है कि जब गुंडो के खिलाफ सरकार कार्रवाई करने जा रही है तो इनको बुरा क्यों लग रहा है। कांग्रेस के नेता कपिल सिब्बल ने बजाप्ता एक करोड रुपए फंडिंग की, वेबसाइट बनाया जा रहा है कि देश में कहीं भी छात्र आंदोलन में अगर कोई आंदोलनकारी पुलिस या न्यायिक मामले में उलझता है तो उसे मदद किया जाएगा। अब सवाल यह उठता है कि जब वह संघ और भाजपा के गुंडे थे तो उनको बचाने की चिंता यह विपक्ष क्यों कर रहा है? बात आगे बढ़ी तो सुप्रीम कोर्ट ने साफ-साफ कह दिया कि जिनके खिलाफ पहले से प्राथमिकी है, उनके खिलाफ कार्रवाई होगी। जो 18 साल की उम्र तक के युवा हैं, उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होगी। जिनके विरुद्ध पहली बार अगर कोई प्राथमिकी हुई है तो उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई फिलहाल नहीं होगी। हो सकता है आने वाले समय में किसी सेवानिवृत न्यायाधीश के नेतृत्व में जांच कमेटी गठित कर दे सुप्रीम कोर्ट। सब बातें अपनी जगह है। हम इस मुद्दे पर चर्चा कर रहे हैं कि जब आंदोलनकारियों के बीच भाजपा और संघ ने जैसा कि कॉकरोच जनता पार्टी का दावा है, अपने गुंडे भेजे थे, ताकि वह आंदोलन को बदनाम कर सकें तो ऐसे गुंडो को बचाने के लिए कॉकरोच जनता पार्टी या तमाम विपक्षी दल एकजुट क्यों हो गए? क्यों लोग पैसा चंदा करके न्यायिक मदद पहुंचाने की तैयारी कर रहे हैं? क्यों मांग हो रही है कि अगर सभी प्राथमिकियां वापस नहीं ली गई तो एक बार फिर से इसी तरह से जन आंदोलन खड़ा किया जाएगा। इस घटना से एक बात समझ में आ गई कि नेता किसी भी गिरगिट से अधिक रंग बदलता है और उसके कहे पर कतई विश्वास ना करिए। जब युवा सोनम वांगचुंग और कॉकरोच जनता पार्टी की अपील पर इकट्ठा हुए थे, तब उनको भी यह अनुमान नहीं रहा होगा कि वह बुरे फसेंगे। दरअसल, आप जब भीड़ का हिस्सा बनते हैं तो आपका दिमाग आपके नियंत्रण से बाहर उस शक्ति के पास चला जाता है जो पर्दे के पीछे रहकर भीड़ को मॉनिटर करता है। वह जैसे चाहेगा भीड़ में शामिल व्यक्ति उसी तरह की प्रतिक्रिया व्यक्त करने लगता है। शब्द और पंक्ति भले व्यक्ति की अपनी हो, लेकिन प्रेरणा, उत्तेजना, भाव छुपे हुए शख्स का होता है। छात्र-छात्राओं द्वारा की गई बदजुबानियों,  अश्लील हरकतों, अभद्र भाषा वाले पोस्टरों को लेकर संस्कारों की बात की जा रही है। कुछ देर के लिए अगर इसे हटा दें। मान लें कि युवाओं ने जोश में बहुत तरीके से अभद्रता दिखाई, अश्लीलता दिखाई, कुछ लोगों का दावा है कि भाई राजनीतिक आंदोलन में नारेबाजियां होते रहती हैं। उसमें अपशब्द इस्तेमाल होते रहते हैं। तमाम नेताओं के लिए अपशब्द कहे गए। चलिए इन मुद्दों को हम हटा देते हैं, और मान लेते हैं कि ऐसा करने वाले तमाम लोग छात्र थे, जो बहक गए। तात्कालिक गुस्से का शिकार हुए और उन्होंने अपनी कुछ बातें जैसे रखी, वह मर्यादा में भी नहीं थी। इन सबको माफ कर देना चाहिए। जो लोग गुंडई करने वालों के पक्ष में हैं, दरअसल वे कभी आंदोलन नहीं करते, वे राजनीतिक रोटी सेंकने के लिए, कुछ लिखते बोलते हैं। उनके बच्चे तो आंदोलन में जाएंगे नहीं, तो दूसरे के कंधे पर बंदूक रख दो। 



खैर, क्या किसी भी सूरत में हत्या के आरोपितों को, दुष्कर्म करने वालों को, जो पहले से आरोपित हैं, जिनकी संख्या दिल्ली पुलिस ने लगभग 2800 से अधिक बताई है, उनको क्यों छोड़ देना चाहिए? उनको जब आपने पहले ही भाजपा और संघ का गुंडा घोषित कर दिया तो उसके विरुद्ध होने वाली कार्रवाई की चिंता आपको (विपक्ष) क्यों हो रही है? यह इस बात का प्रमाण है कि आंदोलन करने वाले अपने गुंडे उसमें शामिल करते हैं, क्योंकि शरीफ चाहे छात्र-छात्रा हो, चाहे किसान हो, चाहे कोई भी आम राजनीतिक-सामाजिक कार्यकर्ता हो, वह आंदोलन का हिस्सा तो बनता है, बड़ी अपेक्षाओं के साथ, लेकिन वह गुंडई नहीं करता है। वह हमले नहीं करता। वह पुलिस के खिलाफ गुंडे की तरह आक्रामक शैली में व्यवहार नहीं करता। और जब तक ऐसा होगा नहीं आंदोलनकारियों की आत्मा तृप्त नहीं होती। इसलिए वही गुंडो को इसमें शामिल करते हैं। और गुंडे इसलिए शामिल होते हैं कि उनके पाप कुछ हद तक धूल जाएगा। उनको लाइमलाइट मिल जाएगा। कहीं अगर चमक गए तो अपने क्षेत्र का नेता भी बन सकते हैं। नेता बनने का तो एक रास्ता यह भी है कि नाम कमाया जाए, भले गुंडई करके ही क्यों नहीं कमाया जाए। तमाम गुंडो को हम देखते हैं जो शरीफजादा बन जाते हैं। सफेद वस्त्र धारण करके जनप्रतिनिधि बन जाते हैं। गुंडो को भी मौका मिल जाता है। दरअसल होता यह है कि आंदोलन करने वालों के बीच ऐसे लोग भी शामिल होते हैं जो आपराधिक प्रवृत्ति के होते हैं। कुछ को मुद्दों से नहीं राजनीति से मतलब होता है। किसी मामलों में यह हो सकता है कि असामाजिक तत्वों के साथ सीधा कनेक्शन आंदोलन बुलाने वालों से ना हो, लेकिन अगर वास्तव में ऐसा है तो फिर कोई देशद्रोही, कोई गुंडा, कोई हत्यारा, कोई मवाली, कोई रेपिस्ट जब आंदोलन में गुंडई करता है, आंदोलन को बदनाम करता है तो आंदोलन बुलाने वाले लोग, आंदोलन का नेतृत्व करने वाले लोग, उसे बचाने के लिए क्यों खड़े हो रहे हैं। इसका मतलब है कि दोनों के बीच रिश्ता है। जिसे छुपाने के लिए उस सबको संघ और भाजपा का गुंडा बताया जाता है। इस आंदोलन के बाद सत्ता चाहे जिसकी हो आंदोलनकारी को सत्ता में शामिल राजनीतिक दलों पर अब यह आरोप लगाना कठीन होगा कि गुंडई उनके भेजे गए गुंडे कर रहे हैं। लोगों को अब ऐसे आरोप पचेंगे नहीं। लोकतंत्र के लिए यह बेहतर भी है। इससे जनमानस यह तैयार होगा कि आंदोलन कोई करे, अगर उसमें गुंडई हो रही है तो सत्ता किसी की हो वह सख्त से सख्त कार्रवाई करे। दूसरी बात जिसके साथ गुंडई हुई, यानी मारपीट हुई, हमले हुए, वह व्यक्ति अगर व्यक्तिगत तौर पर प्राथमिकी करता है तो प्राथमिकी वापस लेने का वादा कोई सरकार कैसे कर सकती है? इसलिए इसका एक पक्ष यह भी है कि अब अगर कोई आंदोलन होता है और गुंडई होती है तो सरकार पीड़ित से ही प्राथमिकी करवा सकती है। ऐसा करने को प्रेरित या अपील कर सकती है। जब व्यक्तियों से प्राथमिकी करवाई जाने लगेगी तब कौन सा कोर्ट प्राथमिकियों को वापस करवा सकेगा? किसी भी आंदोलन का कई पक्ष होता है। इसलिए आने वाले समय में भारतीय लोकतंत्र के लिए यह आंदोलन कई सीख दे गया है। जिसमें एक महत्वपूर्ण सीख यह भी है।




#छात्र_आंदोलन #CJP #STUDENT_PROTEST #JANTAR_MANTAR #RSS #BJP #NARENDRAMODI #Indian_politics #political_news 

Tuesday, 28 July 2026

कटघरे में पत्रकारिता : पत्रकार नहीं संस्थान दोषी

 


#कटघरे_में_पत्रकारिता : पत्रकार नहीं संस्थान दोषी 

◆ ऊपर से नीचे तक पहुंचा भ्रष्टाचार ◆

● #संपादक से #संवाददाता तक लाचार ●

डॉ.उपेंद्र कश्यप 

कॉकरोच जनता पार्टी का जंतर मंतर पर हुआ आंदोलन बड़ी लकीर खींच गया। 15 मई 2026 को न्यायालय ने युवाओं के संदर्भ में कॉकरोच शब्द का इस्तेमाल किया। 16 को कॉकरोच जनता पार्टी बन गई और मात्र 70 दिन में 25 जुलाई 2026 को भारत सरकार के शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा दे देना पड़ा। इस पूरे आंदोलन में एक बात जो स्पष्ट दिखी वह यह कि माइक पर लोगो देखकर आंदोलनकारी प्रतिक्रिया दे रहे थे और उनका व्यवहार तय हो रहा था। मुख्यधारा की मीडिया के लिए वहां जूते की माला और गालियां थी, तो इन्फ्लुएंसर्स और युट्यूबर्स के लिए फूलों का हार। इस आंदोलन में जो कुछ हुआ उसे लेकर नैतिकता ता आदर्शवाद के संदर्भ में कई सवाल खड़े किए जा सकते हैं, लेकिन एक बात जो पूरी तरह स्पष्ट थी वह थी मुख्य धारा की मीडिया खास कर चैनल वालों को लेकर आक्रोश। कई पत्रकार पीटे गए। कई महिला पत्रकारों की हूटिंग हुई। अपशब्द कहे गए। गलियां दी गयी। सवाल है कि यह स्थिति बनी क्यों? ऐसा नहीं है कि मीडिया दलाल की भूमिका में आज है। दलाली हमेशा से होते रही है। आज जो बड़े-बड़े तथाकथित यूट्यूब वाले पत्रकार बन गए हैं, उनका भी एजेंडा है। मुख्य धारा के चैनलों से निकल गए या निकाल दिए गए और यूट्यूबर बन गए कई पत्रकारों ने दलाली करके ही यहां तक का मुकाम हासिल किया है। जिनकी आज आंदोलनकारी प्रशंसा कर रहे थे। अब यहां अगर देखे तो फर्क क्या है कि हमारा पत्रकार और तुम्हारा पत्रकार। दरअसल रवीश कुमार जैसे पत्रकारों और विपक्ष ने एक ऐसा माहौल निर्मित कर दिया है जिसमें हर थोड़ा भी प्रभावशाली व्यक्ति या संस्थान को अपने अनुकूल का पत्रकार चाहिए। अन्यथा गालियां दो। कई बार हमले भी। सच यही है कि पत्रकारिता किसी को पसंद नहीं है। पत्रकार किसी को नहीं सुहाता। सबको अपने-अपने अनुकूल का पत्रकार चाहिए। सत्ता ने हमेशा पत्रकारों को दबाकर रखने की कोशिश की है। मीडिया संस्थानों को हमेशा दबाया गया। लेकिन 2014 के बाद मुख्य धारा की मीडिया रेंगने लगी। इसमें कौन कितना ज्यादा रेंग सकता है इसकी होड़ आपस में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के बीच है। कुछ हद तक कुछ अखबार इससे बचे हैं। लेकिन उनकी विश्वसनीयता भी खत्म हो गई है। यहां इस आंदोलन के समय जो पत्रकारों के साथ हुआ उनका कोई दोष नहीं था। जिला मुख्यालय से लेकर दिल्ली तक में पत्रकार पीटे गए। उन पर हमले हुए। सवाल खुद से पूछें कि क्या पत्रकार जिम्मेदार हैं। शायद नहीं। क्योंकि वह वही करते हैं जो ऊपर से निर्देश आता है। ऊपर वाला वही करवाता है जो उसको ऊपर वाले का निर्देश प्राप्त होता है। यह खड़ी सीढ़ी है। यानी यहां ऊपर से नीचे की तरफ गिरावट आई है। यह और बात है कि बदनाम पत्रकार हैं। सच यह है कि झोली हो या बोरी, या बड़ी-बड़ी अटैचियां लेते संपादक हैं। अखबार का मालिक बिकता है। पत्रकार नहीं बिकता। हां कुछ अपवाद हो सकते हैं। दूध का धुला कोई पत्रकार भी नहीं है। क्योंकि गिरावट हर क्षेत्र में आई है। दरअसल हुआ यह है कि मीडिया घरानों ने सरकारों से समझौता कर लिया। आर्थिक युग में उन्हें दौलत चाहिए और दौलत के लिए बिकना पड़ता है। मीडिया सिर्फ व्यवसाय बनकर रह गया है। संपादक नाम की संस्था तो कब का चौपट हो चुकी थी। 2010 के दशक के बाद इसमें तेजी से गिरावट आई। संपादक पत्रकार की तरह ही एक इक्विपमेंट मात्र बन कर कर रहा है। उनकी लेखनी का कोई मतलब नहीं है। लिखना वही है जो छपेगा, जो दिखेगा। और छापने और दिखाने का अधिकार ना तो संपादक के पास है ना पत्रकार के पास है। मीडिया घरानों का जो विज्ञापन देखने वाला विभाग है, वह संपादकों पर हावी होता है। एक टाइपराइटर, पेज लगाने वाला, चिट्ठियां बटोरने वाला, रिसेप्शनिस्ट का पेमेंट एक पत्रकार से अधिक होता है। (कम से कम प्रखण्ड, अनुमण्डल, जिला, कमिश्नरी के स्तर पर) जबकि दोनों साथ काम करते हैं। पत्रकार अगर किसी संकट में घिर जाए, किसी कानूनी पचड़े में फंस जाए, कोई नेता अधिकारी उसे धमकी दे तो, सबसे पहले अगर कोई भगाता है तो वह संस्थान, जिसके लिए वह दिन रात खतरा मोल लेकर काम कर रहा होता है। एक पत्रकार का मोबाइल डीएम के गार्ड ने छीन लिया और उसे पत्रकार से संबद्ध अखबार में एक लाइन की खबर नहीं छपी। हालांकि दूसरे अखबार ने छापा। एक पत्रकार मर भी जाए तो संस्थान यह लिखने मानने के लिए भी तैयार नहीं कि वह उसका पत्रकार है। कोई लाइफ इंश्योरेंस नहीं। कोई सुरक्षा नहीं। कोई बॉडीगार्ड नहीं। पत्रकारों को इतना कमजोर बना दिया गया है कि सच तो छोड़िए तथ्य तक खुलकर नहीं लिखकर बता सकते हैं। विपक्ष कहता है गोदी मीडिया। मीडिया में गिरावट अब ज्यादा दिख रही है, क्योंकि सोशल मीडिया का वर्चस्व और दायरा बढ़ता जा रहा है। अन्यथा याद करिए। सांसद खरीद फरोख्त के मामले को लेकर देश के तथाकथित बड़े पत्रकार के पास सब प्रमाण सहित रिपोर्ट उनके रिपोर्टर ने भेजा था, और उन्होंने इसे इसलिए नहीं प्रसारित किया कि सत्ता से समझौता हो गया। बाद में उस पत्रकार ने पद्म पुरस्कार प्राप्त कर लिए, वह भी तुरंत। मनमोहन सिंह की सरकार बच गई। अगर वह रिपोर्ट जारी हो जाती तो मनमोहन की सरकार कब का चली जाती। तो आज का विपक्ष जो गोदी मीडिया चिल्लाता है उसने भी सत्ता में रहते हुए पत्रकारों को कम नहीं खरीदा है। हां यह और बात है कि अब पत्रकारिता का जो काम है एक जगह की बात को 100 -200, हजारों, लाखों लोगों व जगह पर पहुंचाना। वह मीडिया घराना की बपौती नहीं रह गई है। क्योंकि सोशल मीडिया का प्रभाव अब लगातार बढ़ता जा रहा है। और यह सीजीपी के आंदोलन में स्पष्ट दिखा। अगर इस आंदोलन से मीडिया के लिए कुछ सीख है तो वह यह है कि वह अपना कवरेज का तरीका सुधारे। सकारात्मकता के नाम पर दलाली और चमचई छोड़े। सत्ता और विपक्ष दोनों की कलई पत्रकार खोलें। सत्ता की गलतियों पर भी बचाव की मुद्रा में जब एंकर और एंकरनिया दिखेंगे तो संस्थान के पत्रकार पीटे जाएंगे। प्रदेशों की राजधानी और देश की राजधानी में घटित घटना का प्रिंट मीडिया जिस तरह से कवरेज करता है उसमें साफ-साफ भेदभाव की बू आती है।

मो.नं:- 9931852301


कॉकरोच जनता पार्टी का जंतर मंतर पर हुआ आंदोलन बड़ी लकीर खींच गया। 15 मई 2026 को न्यायालय ने युवाओं के संदर्भ में कॉकरोच शब्द का इस्तेमाल किया। 16 को कॉकरोच जनता पार्टी बन गई और मात्र 70 दिन में 25 जुलाई 2026 को भारत सरकार के शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा दे देना पड़ा। इस पूरे आंदोलन में एक बात जो स्पष्ट दिखी वह यह कि माइक पर लोगो देखकर आंदोलनकारी प्रतिक्रिया दे रहे थे और उनका व्यवहार तय हो रहा था। मुख्यधारा की मीडिया के लिए वहां जूते की माला और गालियां थी, तो इन्फ्लुएंसर्स और युट्यूबर्स के लिए फूलों का हार। इस आंदोलन में जो कुछ हुआ उसे लेकर नैतिकता ता आदर्शवाद के संदर्भ में कई सवाल खड़े किए जा सकते हैं, लेकिन एक बात जो पूरी तरह स्पष्ट थी वह थी मुख्य धारा की मीडिया खास कर चैनल वालों को लेकर आक्रोश। कई पत्रकार पीटे गए। कई महिला पत्रकारों की हूटिंग हुई। अपशब्द कहे गए। गलियां दी गयी। सवाल है कि यह स्थिति बनी क्यों? ऐसा नहीं है कि मीडिया दलाल की भूमिका में आज है। दलाली हमेशा से होते रही है। आज जो बड़े-बड़े तथाकथित यूट्यूब वाले पत्रकार बन गए हैं, उनका भी एजेंडा है। मुख्य धारा के चैनलों से निकल गए या निकाल दिए गए और यूट्यूबर बन गए कई पत्रकारों ने दलाली करके ही यहां तक का मुकाम हासिल किया है। जिनकी आज आंदोलनकारी प्रशंसा कर रहे थे। अब यहां अगर देखे तो फर्क क्या है कि हमारा पत्रकार और तुम्हारा पत्रकार। दरअसल रवीश कुमार जैसे पत्रकारों और विपक्ष ने एक ऐसा माहौल निर्मित कर दिया है जिसमें हर थोड़ा भी प्रभावशाली व्यक्ति या संस्थान को अपने अनुकूल का पत्रकार चाहिए। अन्यथा गालियां दो। कई बार हमले भी। सच यही है कि पत्रकारिता किसी को पसंद नहीं है। पत्रकार किसी को नहीं सुहाता। सबको अपने-अपने अनुकूल का पत्रकार चाहिए। सत्ता ने हमेशा पत्रकारों को दबाकर रखने की कोशिश की है। मीडिया संस्थानों को हमेशा दबाया गया। लेकिन 2014 के बाद मुख्य धारा की मीडिया रेंगने लगी। इसमें कौन कितना ज्यादा रेंग सकता है इसकी होड़ आपस में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के बीच है। कुछ हद तक कुछ अखबार इससे बचे हैं। लेकिन उनकी विश्वसनीयता भी खत्म हो गई है। यहां इस आंदोलन के समय जो पत्रकारों के साथ हुआ उनका कोई दोष नहीं था। जिला मुख्यालय से लेकर दिल्ली तक में पत्रकार पीटे गए। उन पर हमले हुए। सवाल खुद से पूछें कि क्या पत्रकार जिम्मेदार हैं। शायद नहीं। क्योंकि वह वही करते हैं जो ऊपर से निर्देश आता है। ऊपर वाला वही करवाता है जो उसको ऊपर वाले का निर्देश प्राप्त होता है। यह खड़ी सीढ़ी है। यानी यहां ऊपर से नीचे की तरफ गिरावट आई है। यह और बात है कि बदनाम पत्रकार हैं। सच यह है कि झोली हो या बोरी, या बड़ी-बड़ी अटैचियां लेते संपादक हैं। अखबार का मालिक बिकता है। पत्रकार नहीं बिकता। हां कुछ अपवाद हो सकते हैं। दूध का धुला कोई पत्रकार भी नहीं है। क्योंकि गिरावट हर क्षेत्र में आई है। दरअसल हुआ यह है कि मीडिया घरानों ने सरकारों से समझौता कर लिया। आर्थिक युग में उन्हें दौलत चाहिए और दौलत के लिए बिकना पड़ता है। मीडिया सिर्फ व्यवसाय बनकर रह गया है। संपादक नाम की संस्था तो कब का चौपट हो चुकी थी। 2010 के दशक के बाद इसमें तेजी से गिरावट आई। संपादक पत्रकार की तरह ही एक इक्विपमेंट मात्र बन कर कर रहा है। उनकी लेखनी का कोई मतलब नहीं है। लिखना वही है जो छपेगा, जो दिखेगा। और छापने और दिखाने का अधिकार ना तो संपादक के पास है ना पत्रकार के पास है। मीडिया घरानों का जो विज्ञापन देखने वाला विभाग है, वह संपादकों पर हावी होता है। एक टाइपराइटर, पेज लगाने वाला, चिट्ठियां बटोरने वाला, रिसेप्शनिस्ट का पेमेंट एक पत्रकार से अधिक होता है। (कम से कम प्रखण्ड, अनुमण्डल, जिला, कमिश्नरी के स्तर पर) जबकि दोनों साथ काम करते हैं। पत्रकार अगर किसी संकट में घिर जाए, किसी कानूनी पचड़े में फंस जाए, कोई नेता अधिकारी उसे धमकी दे तो, सबसे पहले अगर कोई भगाता है तो वह संस्थान, जिसके लिए वह दिन रात खतरा मोल लेकर काम कर रहा होता है। एक पत्रकार का मोबाइल डीएम के गार्ड ने छीन लिया और उसे पत्रकार से संबद्ध अखबार में एक लाइन की खबर नहीं छपी। हालांकि दूसरे अखबार ने छापा। एक पत्रकार मर भी जाए तो संस्थान यह लिखने मानने के लिए भी तैयार नहीं कि वह उसका पत्रकार है। कोई लाइफ इंश्योरेंस नहीं। कोई सुरक्षा नहीं। कोई बॉडीगार्ड नहीं। पत्रकारों को इतना कमजोर बना दिया गया है कि सच तो छोड़िए तथ्य तक खुलकर नहीं लिखकर बता सकते हैं। विपक्ष कहता है गोदी मीडिया। मीडिया में गिरावट अब ज्यादा दिख रही है, क्योंकि सोशल मीडिया का वर्चस्व और दायरा बढ़ता जा रहा है। अन्यथा याद करिए। सांसद खरीद फरोख्त के मामले को लेकर देश के तथाकथित बड़े पत्रकार के पास सब प्रमाण सहित रिपोर्ट उनके रिपोर्टर ने भेजा था, और उन्होंने इसे इसलिए नहीं प्रसारित किया कि सत्ता से समझौता हो गया। बाद में उस पत्रकार ने पद्म पुरस्कार प्राप्त कर लिए, वह भी तुरंत। मनमोहन सिंह की सरकार बच गई। अगर वह रिपोर्ट जारी हो जाती तो मनमोहन की सरकार कब का चली जाती। तो आज का विपक्ष जो गोदी मीडिया चिल्लाता है उसने भी सत्ता में रहते हुए पत्रकारों को कम नहीं खरीदा है। हां यह और बात है कि अब पत्रकारिता का जो काम है एक जगह की बात को 100 -200, हजारों, लाखों लोगों व जगह पर पहुंचाना। वह मीडिया घराना की बपौती नहीं रह गई है। क्योंकि सोशल मीडिया का प्रभाव अब लगातार बढ़ता जा रहा है। और यह सीजीपी के आंदोलन में स्पष्ट दिखा। अगर इस आंदोलन से मीडिया के लिए कुछ सीख है तो वह यह है कि वह अपना कवरेज का तरीका सुधारे। सकारात्मकता के नाम पर दलाली और चमचई छोड़े। सत्ता और विपक्ष दोनों की कलई पत्रकार खोलें। सत्ता की गलतियों पर भी बचाव की मुद्रा में जब एंकर और एंकरनिया दिखेंगे तो संस्थान के पत्रकार पीटे जाएंगे। प्रदेशों की राजधानी और देश की राजधानी में घटित घटना का प्रिंट मीडिया जिस तरह से कवरेज करता है उसमें साफ-साफ भेदभाव की बू आती है।

 



और हां अंत में एक बात और..

 जाति से मुक्त नहीं है पत्रकारिता। पत्रकारिता में जातिवाद गहरी पैठ बना चुकी है। और जाति वर्ग देखकर न्यूज़ कवरेज की प्रवृत्ति काफी सघन हुई है। अगर यह दरकेगा नहीं तो फिर जो जंतर मंतर पर पत्रकारों के साथ हुआ, जो देश भर में हुआ उसका दायरा बढ़ता चला जाएगा। इसलिए इस कॉकरोच आंदोलन ने साफ-साफ संदेश दे दिया है- मीडिया घरानों सुधरो, अन्यथा तुम्हारे पत्रकार फील्ड में जाने लायक नहीं रहेंगे। अब होना यह चाहिए कि प्राइम टाइम में एक घण्टे का शो प्रतिदिन “जनता के मुद्दे” पर चर्चा करे। उसमें किसी दल के भों-भों करने वाले नेता को नहीं, सिर्फ विषय विशेषज्ञों को और उनके साथ दो-तीन विभिन्न विश्वविद्यालयों में अध्ययनरत स्टूडेंट को शामिल करें, जो अनिवार्य तौर पर किसी भी राजनीतिक दल से जुड़े न हों। अन्यथा- आने वाले दिनों में दुर्दशा और बढ़ती जाएगी। दूसरी बात- गोदी मीडिया का राग अलापने वालों के लिए कि वे भी निष्पक्ष नहीं हैं। उनको भी अपने अनुकूल मीडिया पसंद है। ऐसे में आप कितनी बेहतरी की उम्मीद कर सकते हैं भला।


#पत्रकारिता #जर्नलिस्ट #jurnlist #CJP #JANTARMANTAR

Sunday, 26 July 2026

CJP का छात्र आंदोलन : जो हुआ अच्छे के लिए हुआ




जो हुआ अच्छे के लिए हुआ, किन्तु…

(सत्ता का अहंकार टूटा, अब आंदोलन की उपज पर नजर)

डॉ.उपेंद्र कश्यप 

मो.नं.- 9931852301



गीता सार में कहा गया है- "जो हुआ वह अच्छा हुआ, जो हो रहा है अच्छा हो रहा है, जो होगा वह भी अच्छा ही होगा"

कॉकरोच जनता पार्टी और इस छात्र आंदोलन को बहुत-बहुत साधुवाद। भारतीय लोकतंत्र में यह घटना हमेशा याद रखी जाएगी। जेपी का आंदोलन हो या अन्ना का आंदोलन हो, दोनों से निकले नेताओं ने बेहतर आदर्श स्थापित नहीं किया है। इसलिए यह देश आंदोलन को लेकर लगभग शिथिल था या निराश था। नई पीढ़ी ने एक बार फिर लोकतंत्र को लेकर उम्मीदें आसमान पर पहुंचा दिए हैं। यानी उद्देश्य अगर बढ़िया है, रास्ते बेहतर हैं, तो सत्ता का अहंकार चाहे जिस ऊंचाई पर हो वह टूटेगा, ढहेगा। यही प्राकृतिक व्यवस्था प्रमाणित हो गयी है। इसलिए जो हुआ वह बेहतर हुआ। यह बात अब नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी को समझ आ गयी होगी। कुछ लोग एक्सपोज भी हुए हैं। खासकर राजनीतिक दल। इस आंदोलन में शामिल छात्र-छात्राओं का एक छोटा हिस्सा ही सही, उसने अपने चारित्रिक दोषों को खुलकर व्यक्त किया। जिससे भारतीय सभ्यता और संस्कृति को भी आघात लगा है। लेकिन कुल मिलाकर बात यही है कि आंदोलन के बाद लोकतंत्र की मजबूती का संकेत स्पष्ट मिला है।

लेकिन, कब पीछे लौटते हैं। जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व में हुआ संपूर्ण क्रांति हो या अन्ना आंदोलन, क्या इन दो बड़े आंदोलनों से कुछ बदला। जेपी के चेलों ने राजनीति में ना यो कोई  सुचिता का काम किया,  ना ही कोई आदर्श स्थापित किया, न सिस्टम के घुन को खत्म कर सके। कथित समाजवाद का झंडा बुलंद किया, बल्कि प्रायः सभी चेले अपवाद छोड़कर भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे दिखे। परिवारवाद को बढ़ावा दिया। सामाजिक न्याय के मुद्दे पर आगे तो बढ़े लेकिन यह अंततः परिवारवाद और जातिवाद तक सिमट कर रह गया। जातिवाद की धार को और तीखा किया। इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी लगाया, जनता ने उनका क्या बिगाड़ लिया। दो ढाई साल में पुनः उन्हीं को भारत की सत्ता सौंप दी। मुलायम सिंह यादव ने कार सेवकों पर गोली चलाई। खुलकर मुस्लिम परस्ती की और मुल्ला मुलायम की उपाधि हासिल कर ली। क्या बिगड़ गया। वह भी मुख्यमंत्री रहे और उनके बेटे अखिलेश यादव भी मुख्यमंत्री बने। परिवारवाद की ऐसी थ्योरी कि परिवार के ही हिस्सों को दूर भगा दिया गया, जिनको उत्तराधिकारी माना जा रहा था। बिहार में देख लीजिए। लालू प्रसाद यादव की राजनीति को, क्या उन्होंने बिहार की व्यवस्था बदली? कैसा आदर्श मानक स्थापित किया, यह कहने की जरूरत नहीं है। देश में भी व्यवस्था तो कम से कम नहीं ही बदली। अन्ना आंदोलन के बाद जो जो काम नहीं करने की गारंटी अरविंद केजरीवाल ने दी, वही वही काम नीचता की हद तक जाकर किया। देश ने पहली बर देखा कि जेल से भी मुख्यमंत्री बनकर सत्ता चलाया जा सकता है। इन दो आंदोलनों ने जो नेता दिए हैं, उन्होंने ना तो आदर्श स्थापित किया, ना कुछ बदल सके। अभी सीजेपी का जो आंदोलन हुआ, उससे क्या कुछ बदल जाएगा? सीजेपी के प्रमुख अभिजीत दीपके की मां अनीता दीपके व पिता भगवान दीपके की इच्छा है कि अभिजीत भविष्य में राजनीति में जाने की जगह निस्वार्थ भाव से समाज सेवा ही जारी रखें। हालांकि राजनीति में जाना है या नहीं, यह फैसला दीपके का अपना रहेगा। यह मां-पिता ने कहा है। यानी आंदोलन खत्म करते ही राजनीति में जाने की चर्चा भी शुरू हो गई। इस देश ने देखा है कि आंदोलन करना और राजनीति करने में आसमान जमीन का अंतर है। अभिजीत दीपके और उनकी टीम के सदस्य भविष्य में राजनीति के क्षेत्र में आते हैं तो वे कैसा आदर्श, मानक स्थापित कर सकेंगे? लोगों को नजर इस पर भी रखनी चाहिए।


#नीट_यूजी_पेपर_लीक  #शिक्षा_मंत्री #धर्मेंद्र_प्रधान #StudentProtest #Aisa #NarendraModi #cjp #Jantar_Mantar #EducationSystem #RYA #DharmendraPradhan #abhijeetdipake #abhijit_deepake


लेखक का परिचय

डॉ. उपेंद्र कश्यप. Mo.No.- 993185231

लेखक- आंचलिक पत्रकारिता की दुनिया, प्रकाशक- द मार्जिनलाइज्ड।

जिसकी भूमिका प्रमोद रंजन ने लिखी है।

इसके अलावा-

गृह शहर, बिहार के दाउदनगर का इतिहास लेखन। पुस्तक- श्रमण संस्कृति का वाहक- दाउदनगर।

■ 1994 से पत्रकारिता। देश और प्रदेश से प्रकाशित विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन के साथ लगातार दैनिक जागरण का अनुमंडल संवाददाता रहा।

● संस्कृति, राजनीति और नक्सल पर विशेष लेखन



Friday, 24 July 2026

कबरिया और पहिरोपना संबंधित कई परंपराएं विलुप्त



रोपनहार को खोंईचा और लुकमा देने की परंपरा खत्म 

मांग भरने के साथ तेल देना भी अब बंद

बढ़िया उपज को धरती मां से करती थी प्रार्थना 

डॉ. उपेंद्र कश्यप 

नबिटा संवाददाता 

दाउदनगर (औरंगाबाद) । भारत कृषि प्रधान देश है। बिहार में तो आजीविका का मुख्य साधन ही कृषि है। यह मौसम कृषि कार्य का है। खेतों में बिहन कबारने और उसे रोपने का काम बड़े पैमाने पर चल रहा है। ऐसे में यह स्पष्ट दिख रहा है कि कबरिया और पहिरोपण से संबंधित कई परंपराएं अब विलुप्त हो गई हैं। मखरा निवासी भाजपा नेता किसान सुरेंद्र यादव बताते हैं कि बिहन कबारते समय कबरिया जयकारा करते थे। वह खत्म हो गया। पुरानी पीढ़ी के लोग रोपने के लिए खेत में जाने से पहले किसान के घर जाती थी और किसान की पत्नी सभी रोपणहार की मांग सिंदूर से भरती थी। खोइन्छा मिलता था। इसमें चावल गुड़ होता था। रोपणहार उसे लेकर खेत में जाते थे। खेत में धरती मां के नाम से छिड़काव करते थे और ईश्वर से प्रार्थना करते थे कि किसान समृद्ध हो। उसकी फसल की उपज बढ़िया हो, ताकि हमारा यानी श्रमिकों का भी पेट भर सके। शाम में फिर रोपनहार किसान के घर जाते थे और उन्हें किसानों के द्वारा लुकमा दिया जाता था। लुकमा में फुला हुआ चना, मटर और चावल का बना हुआ कसर खाने के लिए दिया जाता था। रोपणहार उसे घर ले जाते थे। जिससे उन्हें खुशी मिलती थी। यह परंपरा अब पूरी तरह खत्म हो गई।




उठारो या बनउखाड़ से जुड़ी भी परंपरा समाप्त 

कृषि कार्य में उठारो या बनउखाड़ भी एक महत्वपूर्ण पक्ष है। मतलब किसी भी किसान के तमाम बिहन को उखाड़ने का काम जिस दिन संपन्न होता है, उस दिन उसको उठारो या बनउखाड़ कहते हैं। इस दिन सभी बिहन को उखाड़ कर रोपणहार को दे दिया जाता है। बिहन का गुच्छा बनाया जाता है। जिसे माथे पर रखकर बनिहारिन किसान के घर जाती हैं और किसान उन्हें बन देता है। यानी दक्षिणा देता है। जिसमें चावल, कपड़ा और पैसा होता है। इसे गवछी कहा जाता है। उठारो के बदले यानी बिहन उखाड़ने का काम संपन्न होने के बदले किसान देते हैं। किसान अपने घर के देवता पर भी इसे चढ़ाते हैं।




#krishi #कृषि_परंपरा #खेती_किसानी_परंपरा #धानरोपनी #पहिरोपना #कबरिया 

#farming_traditions

#agriculture #agriculture_tradition

#upendrakashyap

#उपेंद्र_कश्यप_रिपोर्ट


जो होना जरूरी है उससे किसी को मतलब नहीं

 जो होना जरूरी है उससे किसी को मतलब नहीं

(संदर्भ-अनशन-आंदोलन, राजनीतिक चालाकियां व परिणाम)

डॉ.उपेंद्र कश्यप

(लेखक- आंचलिक पत्रकारिता की दुनिया, श्रमण संस्कृति का वाहक-दाउदनगर)



पेपर लीक मामले को लेकर भूख हड़ताल और आंदोलन ने देश को झकझोर कर रख दिया। हर समस्या का समाधान है, इसका भी समाधान तय है। अनशन समाप्त हो गया है। आंदोलन जारी है। सरकार ने अपनी बात रखी। सीजेपी, राजनीतिक दलों और छात्र-छात्राओं ने अपनी बातें रखी। बहुत कुछ सकारात्मक हुआ, बहुत कुछ नकारात्मक भी हुआ। जो होना नहीं चाहिए था, वह तो हो गया, और कुछ होने का आश्वासन भी सत्ता की तरफ से मिल गया। लेकिन क्या यह पर्याप्त है?

 इस पूरे आंदोलन का हश्र लगभग वैसा ही हुआ, जैसा पहले होते रहा है। जो होना आवश्यक था या है, वह तो हुआ ही नहीं। ना होता हुआ दिख रहा है। न वैसा करने की मांग छात्र-छात्राओं के तरफ से है, ना बीजेपी के तरफ से है, ना किसी भी विपक्षी दल की तरफ से है, और न ही सरकार की तरफ से है। इस देश में आंदोलन होते रहे हैं और आंदोलन का अंत ठीक वैसे ही होता है जैसे नीट पेपर लीक मामले को लेकर आंदोलन का हुआ। क्या शिक्षा मंत्री के पद त्याग देने से शिक्षा की व्यवस्था सुधर जाएगी? क्या पेपर लीक होना बंद हो जाएगा? क्या इस्तीफा देने को नैतिकता से जोड़ने वाले लोग यह बता सकते हैं कि बिहार में लोकसभा चुनाव हारने के बाद इस्तीफा देकर जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री बनाने वाले नीतीश कुमार ने कौन सी नैतिकता और आदर्श का पालन किया था, कि कुछ ही महीने के बाद उनको हटाकर पुन: मुख्यमंत्री बन गए? क्या रेलवे दुर्घटना का की जिम्मेदारी लेकर इस्तीफा देने वाले नेताओं की नैतिकता के कारण रेलवे में सुधार हुआ? दुर्घटना बंद हो गई? रेलवे में आज भी खानपान की स्थिति बद से बदतर है। दरअसल व्यवस्था बदलने में सबसे बड़ी बाधा आदर्श या नैतिकता और विवेक के दावे और मांग हैं। यह दोनों शब्द का व्यवहार लोकतंत्र के लिए सर्वोच्च स्थिति में होने चाहिए थे। लेकिन पूरे भारतीय लोकतंत्र को मटिया मेट करके रख दिया है। इस देश की जो संस्कृति है, खासकर सामाजिक और राजनीतिक उसमें दोनों शब्दों का कोई महत्व नहीं है। सब कुछ लिखित होना चाहिए। कानून में होना चाहिए। अन्यथा विवेकाधिकार और नैतिकता का इस्तेमाल हमेशा लाभ हानि देखकर किया जाता रहा है, किया जाता रहेगा। और जो इसका इस्तेमाल करता है वह सिर्फ और सिर्फ स्वहित देखकर करता है। इसके तमाम उदाहरण भरे पड़े हैं। इस आलेख में उस दिशा में चर्चा करने की जरूरत फिलहाल नहीं है।


 मूल बात यह है कि जो हुआ, क्या वह पर्याप्त है? क्या अब कोई पेपर लीक नहीं होंगे? क्या फास्ट ट्रैक कोर्ट इस बात की गारंटी देंगे कि पेपर लीक नहीं होंगे? दोषियों को सजा जल्द और सख्त मिलेगी? संजीव मुखिया निर्दोष कैसे साबित हो गए? यह न्यायिक निर्णय सही है तो सवाल यह खड़ा होता है कि दोषी कौन था? पेपर लीक करने वाला माफिया कौन था? सख्त से सख्त सजा का प्रावधान अगर सोमवार को बिल पास कर बना भी दिए जाते हैं, तो क्या नैतिक रूप से भ्रष्ट लोग जो पेपर लीक करते रहे हैं वह अब नहीं करेंगे? क्या पेपर लीक करने वाला नया समूह पैदा नहीं होगा? इसकी गारंटी कौन लेगा? क्या आजीवन कारावास और मृत्यु दंड तक के प्रावधान वाले कानून इस देश में नहीं है, और उससे जुड़े क्या अपराध कम हो गए? ऐसा कुछ होना जाना नहीं है। घटनाएं हमेशा घटती रही हैं और हमेशा घटती रहेंगी। चाहे सत्ता कैसी भी हो, किसी की भी हो। इसलिए आवश्यक जो है वह किया जाना चाहिए।


 इस देश में आवश्यकता जो है वह इस बात की है कि सब की जिम्मेदारी तय हो। यह कानून से हो। नैतिकता और विवेक जैसे आवरण में छुपने का कोई अवसर नहीं होना चाहिए। जब एक देश एक चुनाव, एक देश एक राशन कार्ड किया जा सकता है तो फिर एक देश एक शिक्षा प्रणाली, एक देश एक चिकित्सा प्रणाली क्यों नहीं देश तय कर सकता है?

 वर्ष 2016 से पहले चलिए जब नीट नहीं था, तो कितने गरीब बच्चों को डॉक्टर बनने का मौका मिलता था? सीटें बिक जाती थी। लाखों करोड़ों में। यह बदलाव मात्र सुधार भर लाया। समस्या का समाधान नहीं। 


समस्या का समाधान यह है कि देश में पहले तो एक देश और एक शिक्षा-चिकित्सा प्रणाली लागू होना चाहिए। यानी शिक्षा और चिकित्सा का निजीकरण नहीं होना चाहिए। यह दोनों पूरी तरह फ्री होने चाहिए। भले ही इसकी भरपाई के लिए सरकार अन्य प्रकार का टैक्स लगाए। इसलिए कि बिना पैसे तो कुछ भी नहीं होता। अब तो लोग बिना पैसे ना बोलते हैं, ना लिखते हैं, ना चलते हैं। ऐसी स्थिति में धन आवश्यक है। धन का इंतजाम सरकार चाहे जैसे करें, लेकिन शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए एक रुपये भी किसी भी व्यक्ति को खर्च नहीं होना चाहिए। इसके लिए आधार होना चाहिए 18 अगस्त 2015 को इलाहाबाद हाईकोर्ट का वह फैसला, जिसमें न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल ने कहा था कि- बेसिक शिक्षा सभी के लिए एक होनी चाहिए। सरकारी सुविधा संसाधन और अर्थ का लाभ लेने वाला हर व्यक्ति का बच्चा सरकारी स्कूल में पढ़े यह सुनिश्चित होना चाहिए। कहा था- उत्तर प्रदेश के सरकारी कर्मचारी, जन प्रतिनिधि, स्थानीय निकायों के पदाधिकारी, न्यायपालिका से जुड़े लोग तथा सरकारी खजाने से वेतन या मानदेय पाने वाले सभी व्यक्तियों के बच्चों को सरकार प्राथमिक विद्यालयों में पढ़ाने की व्यवस्था सरकार करे। अदालत ने तब कहा था- जब तक नीति निर्माता और सरकारी अधिकारियों के अपने बच्चे सरकारी स्कूलों में नहीं पढ़ेंगे, तब तक विभिन्न विद्यालयों की गुणवत्ता सुधारने के प्रति गंभीर नहीं होंगे। कितनी सही बात कही गयी थी। अब कल्पना करिए जब यह फैसला आया तो उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव की सरकार थी, सरकार ने क्या किया? कुछ नहीं। उस फैसले को गतलखाते में डाल दिया। इस देश में तब का कोई सत्ता या विपक्ष का नेता, कोई भी राजनीतिक दल उस फैसले को लागू करने के लिए बयान तक नहीं दिया। सुप्रीम कोर्ट जाने की बात तो भूल ही जाइए। तब केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार थी। कोई केंद्रीय कानून नहीं बनाया गया, जिसमें उस फैसले का अस्क भी दिखे। बाद में वहां आदित्यनाथ योगी की सरकार बनी। उस सरकार ने भी हाई कोर्ट के इस फैसले पर कोई कार्रवाई नहीं की। तब भी इस देश की जनता को, जेन जी को, राजनीतिक दलों को यह समझ में नहीं आ रहा कि समस्या कहां है? सारे राजनीतिक दल, सभी नेता, एक बात पर एक स्वर में, एक जगह पर खड़े दिखते हैं कि इस देश के युवाओं को, आम लोगों को पढ़ने नहीं देना है। और स्वस्थ नहीं रहने देना है। कोई किसी से इस मुद्दे पर कम कतई नहीं है। हां जो आप सरकारी स्तर पर स्कूलों के निर्माण, अस्पतालों के निर्माण, उनके आधारभूत संरचनाओं में वृद्धि, कुछ नौकरी दे देना, यह सब चलता रहेगा। ताकि लोगों को सरकार उनकी चिंता करते हुए दिखती रहे। वास्तव में सरकारों के एजेंडे में शिक्षा व स्वास्थ्य शामिल ही नहीं है। हकीकत यह है कि किसी भी सरकार को आजादी से लेकर अब तक शिक्षा और स्वास्थ्य की चिंता नहीं रही है। जितनी चिंताएं दिखाई गई वह सिर्फ वोट को प्रभावित करने के लिए। बड़ी-बड़ी बातें बनाई गई। लेकिन समस्या के जड़ पर हमला किसी ने नहीं किया। और यह करेंगे भी नहीं। ऐसा करने के लिए एक व्यापक आंदोलन की जरूरत है इस देश को। अगर जनता, सामाजिक संगठन बिना किसी राजनीतिक दल के समर्थन लिए सड़क पर उतरें, सिर्फ एक देश एक शिक्षा, एक स्वास्थ्य की मांग को लेकर तब व्यवस्था बदलेगी, सुधरेगी, अन्यथा हर दशक में इस तरह के आंदोलन होते रहेंगे और सुधार दिखाने की कोशिशें सरकारें करती रहेंगी। समस्या खत्म नहीं होगी। हमने देखे हैं संपूर्ण क्रांति, अन्ना आंदोलन और उसका राजनीतिक लाभ लेने वाले चतुर चेलों की सत्ता, उनकी सादगी पर भ्रष्टाचार के दीमकों को पनपते हुए। इतिहास निराशाजनक है, वर्तमान उम्मीद जगाता है, और भविष्य का पता नहीं।


#neet #studentprotest 

#cjp_protest 

#students #StudentSupport #StudentProtest #jantarmantar #Jantar_Mantar_protest  #BiharGovernment #BiharNews #schoolnews





Monday, 20 July 2026

एक ही गुलदस्ते में महत्वपूर्ण और गुणवत्तापूर्ण पांडुलिपियां

 



सम्मानित किये गए आठ लोगों ने करायी 26086 पांडुलिपि

जिले से कुल 26158 पांडुलिपि उपलब्ध

डॉ. उपेंद्र कश्यप/ नबिटा संवाददाता 

दाउदनगर (औरंगाबाद) । ज्ञान भारतम् मिशन के तहत 15 मार्च से 15 जून तक हुए सर्वेक्षण में बिहार में छठे स्थान पर औरंगाबाद रहा। सोमवार को जिला मुख्यालय स्थित समाहरणालय के एक सभागार में उन आठ लोगों को सम्मानित किया गया जिन्होंने सर्वाधिक महत्वपूर्ण, गुणवत्तापूर्ण और संख्या में पांडुलिपियां उपलब्ध कराई थी। जिला पदाधिकारी अभिलाष शर्मा ने कहा कि एक ऐसा गुलदस्ता औरंगाबाद के लोगों ने सजाया जिसमें पारसी, अरबी, उर्दू, संस्कृत, तमिल, उड़िया भाषा में लिखी पांडुलिपि शामिल है। अधिकारियों ने कहा कि गुणवत्तापूर्ण पांडुलिपियां उपलब्ध कराई गई। जिससे जिले का मान बढ़ा। सभागार में अधिकारियों ने यह भी स्वीकार किया कि आरंभिक समय में तो यह लगा के जिला में शायद ही कोई महत्वपूर्ण अभिलेख उपलब्ध हो लेकिन अधिकारियों ने श्रम किया और लोगों ने सहयोग किया, नतीजा काफी प्राचीन प्राचीन पांडुलिपियां उपलब्ध हुई। डीडीसी कुमारी अनुपम सिंह ने काफी प्रशंषा की। जिला पंचायती राज पदाधिकारी इफ्तिखार अहमद ने कहा कि एक से बढ़कर एक पांडुलिपि लोगों ने उपलब्ध कराया है जिसके लिए किसी भी तरह की परेशानी का सामना किया जा सकता है।



जिले से कुल 26158 पांडुलिपि उपलब्ध हुई है। इसमें 26086 पांडुलिपि सिर्फ आठ व्यक्ति द्वारा उपलब्ध कराई गई है, जिनको सम्मानित किया गया। इसमें दाउदनगर अनुमण्डल के सात व्यक्तियों द्वारा 8865 और मदनपुर के दो व्यक्ति द्वारा 17221 पांडुलिपि उपलब्ध कराया गया है। इस अवसर जिन आठ लोगों को सम्मानित किया गया उन्होंने काफी महत्वपूर्ण दस्तावेज उपलब्ध कराया है। जिला कला संस्कृति पदाधिकारी कुमार पप्पू द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारी के अनुसार अमझर शरीफ से कुल 7195 पांडुलिपियां प्राप्त हुई है। जिसमें दाउदनगर शरीफ से मोहम्मद शबा कादरी द्वारा 142, मनोरा शरीफ खानकाह से पीर सैयद शाह मंजर अली कादरी द्वारा 2062 एवं शहीद सैयद मसूद कादरी द्वारा 1182 अमझर शरीफ खानकाह के अब्दुल कादिर जिलानी से 309 और सैयद हसनैन कादरी से 3500 पांडुलिपि उपलब्ध कराए गए हैं। बताया गया कि 1200 वर्ष पुरानी अब्दुल कादिर जिलानी द्वारा हस्तलिखित कुरान, पैगंबर मोहम्मद साहब का पद चिन्ह, दाढ़ी का बाल एवं ताड़ पत्र, भोजपत्र, कपड़ा, धातु पर लिखा कुरान, इस्लामी ग्रंथ, जादू टोना टोटके बीमारी का उपचार से संबंधित दस्तावेज एवं इस्लामी आयतें उपलब्ध कराई गई हैं। जिनकी भाषा अरबी, फारसी एवं उर्दू है। दाउदनगर के गुरुद्वारा बाबा बिहारी दास संगत में रखे हुए गुरु ग्रंथ साहिब उपलब्ध कराया गया। यह लगभग 1402 पांडुलिपि है। डॉ राजेंद्र प्रसाद सर्राफ द्वारा यह उपलब्ध कराया गया। बताया गया है कि यह गुरु तेग बहादुर जी द्वारा हस्तलिखित गुरु ग्रंथ साहिब है। जिसकी लिपि गुरुमुखी है। पत्रकार डॉ.उपेंद्र कश्यप द्वारा 268 पांडुलिपियां उपलब्ध कराई गई हैं। यह संस्कृत भाषा में है, जिसमें कई संस्कृत ग्रंथ हैं और विभिन्न बीमारियों और उसके उपचार से संबंधित इसमें जानकारी दी गई है। यह लगभग 1400 साल पुरानी बताई जाती है। मदनपुर के घटराईन निवासी सत्येंद्र नारायण सिंह द्वारा 14630 और नरेंद्र प्रताप सिंह द्वारा 2591 दस्तावेज उपलब्ध कराए गए हैं। इसमें ताड़पत्र, भोजपत्र एवं पन्नों पर हस्तलिखित गीता, रामायण, सभी देवी देवताओं पर्व से संबंधित पूजा पाठ की विधि और मंत्र मंत्र लिखे हैं। उनकी भाषा संस्कृत, ओड़िया एवं तमिल बताई जा रही है।

 



#DDC_Aurangabad #kumari_anupam_singh और #DM_Aurangabad #Abhilasha_Sharma


#ज्ञान_भारतम_मिशन #GyanBharatamMission #Aurangabad #Bihar #HeritageConservation #Digitization #IndianHeritage #Culture #DigitalIndia #अभिलाषा_शर्मा #कला_संस्कृति_एवं_युवा_विभाग

Art, Culture and Youth Department, Government of Bihar

100 नहीं अब 125 दिन काम, 252 नहीं 300 भुगतान

 



औरंगाबाद के जनप्रतिनिधियों ने पंच सम्मेलन में उठाया मुद्दा

ससमय भुगतान और अधिक विकास का मिला भरोसा

डॉ. उपेंद्र कश्यप/ नबिटा संवाददाता

दाउदनगर (औरंगाबाद) । ग्रामीण विकास मंत्रलय द्वारा वाराणसी में आयोजित पंच सम्मेलन में वीबीजी रामजी से जुड़े मुद्दे औरंगाबाद से शामिल हुए दो मुखिया प्रतिनिधियों ने भी अपने विचार रखें और उन्हें सकारात्मक जवाब महात्मा की उच्च अधिकारियों के तरफ से दिया गया गोल्ड यहां पंचायत के मुखिया कौशल्या देवी के पति नागेंद्र सिंह व बारुण के पिपरा के मुखिया विजय सिंह ने प्रश्न किया तो सकारात्मक जवाब मिला। इन सवालों से प्रायः सभी मुखिया जूझ रहे थे। जो आश्वासन मिला उससे इस योजना के कार्यान्वयन में सहूलियत होगी, मजदूरों को काम और दाम दोनों अधिक मिलेगा। नागेंद्र सिंह ने विभागीय संयुक्त सचिव रोहीणी आर्य से सवाल किया कि मजदुरों का भुगतान बाधित रहता था तो अब नए एक्ट से कैसे भुगतान किया जाएगा? दुसरा कि केंद्रांश और राज्यांश में 60- 40 के अनुपात से समस्या खड़ी होने के कारण कार्य संचालन में समस्या आएगी। वीबीजी रामजी का प्राक्कलन और 15 वीं, षष्ठम राज्य वित्त में सामाग्री पर अलग-अलग  रेट प्राक्कलन क्यों है? जबकि पंचायत में पक्का कार्य करने में एक ही प्रकार का ईंट और सिमेंट लगा रहे हैं। मुखिया विजय सिंह ने कहा कि जब पंचायत भवन में सारी योजनाओं को संचालित करने वाले कर्मी मोजूद हैं तो फिर वीबीजी रामजी में जिला से भुगतान क्यों, जबकि 15 वीं वित्त का भुगतान पंचायत में हो रहा है। संयुक्त सचिव रोहिणी आर्य का जबाब था कि अपने काम को बेहतर ढंग से पूरा करें और अतिरिक्त राशि पंचायत और प्रखंड में जमा रहेगा। अब सामग्री का भुगतान हर माह मकराया जायेगा। मुखिया संघ ने इसका जबरदस्त स्वागत करते हुए खुशी का इजहार किया। नागेंद्र सिंह का कहना है कि अगर ऐसा वास्तव में हुआ तो श्रमिकों से लेकर ग्रामीण क्षेत्र में विकास की तस्वीर बदल जाएगी। बताया कि ग्रामीण विकास राज्य मंत्री ने कहा कि अब 100 दिन की जगह 125 दिन मानव दिवस का सृजन करें। मजदूरों को 252 रुपये की जगह 300 रुपये का भुगतान किया जाएगा। इससे गांवों की तस्वीर बदल जाएगी।


भ्रमण भी और सम्मान भी मिला

मुखिया प्रतिनिधि नागेंद्र सिंह ने बताया कि भारत सरकार ने तीर्थ व पर्यटन स्थलों का भ्रमण भी कराया, और सम्मान भी दिया। बहुत अच्छा लगा। सभी प्रतिनिधि गदगद हो गए। आवासीय सुविधा भी जबरदस्त रही।


#samratchoudhary #Panchayatchunav #PanchayatElection #पंचायत #मनरेगा 

#ViksitBharat #VBGRAMG #RuralDevelopment #AatmanirbharGaon #Infrastructure #Livelihood #EnvironmentProtection #UPGov #VBGRAMG

Chief Minister Office Uttar Pradesh Dy Chief Minister GoUP Ministry of Rural Development, Government of India Government of UP Press Information Bureau - PIB,  Government of India Ministry of Information & Broadcasting, Government of India

ईबीसी_पॉलिटिक्स : सीमित नहीं अंतिम व्यक्ति को सशक्त करना लक्ष्य - प्रमोद सिंह चंद्रवंशी




देश से लेकर प्रदेश तक ईबीसी पॉलिटिक्स बीते कई दशकों के इतिहास को देखें तो अभी चरम पर है। ऐसे में लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार के संदर्भ में देखें तो कई प्रश्न खड़े होते हैं। क्या भाजपा अति पिछड़े राजनीति को लेकर आगे बढ़ रही है या वास्तव में उसका उद्देश्य व प्रयास वंचित कमजोर वर्ग को सशक्त बनाना है। बिहार से लेकर देश की ईबीसी पॉलिटिक्स पर भाजपा ओबीसी मोर्चा के बिहार प्रदेश अध्यक्ष प्रमोद सिंह चंद्रवंशी से वरिष्ठ पत्रकार डॉ. उपेंद्र कश्यप ने बातचीत की।


प्रश्न- भारतीय जनता पार्टी के ओबीसी मोर्चा का प्रदेश अध्यक्ष आप हैं। प्रश्न है कि भाजपा अति पिछड़ी जातियों (EBC) को अपने राजनीतिक लाभ के लिए साधने की कवायद कर रही है या वास्तव में ईबीसी जातियों को सशक्त बनाने के साथ उसे विकसित होने का अवसर भी प्रदान करना चाहती है?


उत्तर-भारतीय जनता पार्टी पूरे देश में पिछड़ा वर्ग के भीतर आर्थिक एवं सामाजिक रूप से सबसे वंचित वर्ग, जिसे बिहार में अति पिछड़ा वर्ग (EBC) के रूप में जाना जाता है, को अलग पहचान और उचित प्रतिनिधित्व दिलाने के लिए निरंतर कार्य कर रही है। इसी उद्देश्य से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जस्टिस रोहिणी आयोग का गठन किया, ताकि पिछड़ा वर्ग के भीतर सबसे वंचित समुदायों की पहचान कर उनके समुचित विकास के लिए केंद्र एवं राज्य स्तर पर प्रभावी नीतियां बनाई जा सकें।


प्रश्न-भाजपा के पास ईबीसी को लेकर क्या योजनाएं हैं? राजनीतिक तौर पर उनकी भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए अब तक क्या-क्या किया गया है और आगे क्या-क्या किया जाना है। भाजपा सरकार ईबीसी जातियों के कल्याण के लिए क्या कर रही है? विशेष तौर पर बिहार में।

उत्तर-भारतीय जनता पार्टी का प्रारंभ से ही यह स्पष्ट मत रहा है कि अति पिछड़ा समाज को राजनीति और शासन की मुख्यधारा में सम्मानजनक भागीदारी मिलनी चाहिए। वर्ष 1978 में जननायक कर्पूरी ठाकुर ने पिछड़ा एवं अति पिछड़ा वर्ग का वर्गीकरण कर सामाजिक न्याय की मजबूत नींव रखी थी। किंतु वर्ष 1993 में तत्कालीन राज्य सरकार द्वारा पंचायती राज व्यवस्था में इस वर्गीकरण को समाप्त कर केवल पिछड़ा वर्ग के नाम पर आरक्षण का प्रावधान किया गया, जिसका भारतीय जनता पार्टी ने विधानसभा के भीतर और बाहर पुरजोर विरोध किया। उस समय सरकार के बहुमत के कारण विधेयक पारित हो गया। इसके बाद सामाजिक संगठनों और जनप्रतिनिधियों द्वारा उच्च न्यायालय में याचिका दायर की गई। न्यायालय ने कहा कि पंचायतों में आरक्षण का लाभ उन जातियों को नहीं मिलना चाहिए जो पहले से पर्याप्त प्रतिनिधित्व प्राप्त कर चुकी हैं। न्यायालय ने सरकार को अति पिछड़ा वर्ग के लिए पृथक व्यवस्था करने का निर्देश दिया। बाद में मामला सर्वोच्च न्यायालय तक गया और वर्ष 2001 में बिहार में बिना आरक्षण के पंचायत चुनाव संपन्न हुए।


जब भारतीय जनता पार्टी के सहयोग से नीतीश कुमार के नेतृत्व में बिहार में सरकार बनी, तब सर्वोच्च न्यायालय से लंबित याचिका वापस लेकर वर्ष 2006 में नया बिहार पंचायती राज अधिनियम बनाया गया। इस अधिनियम के तहत अति पिछड़ा वर्ग को 20 प्रतिशत आरक्षण प्रदान किया गया, जिससे हजारों अति पिछड़े परिवारों को पहली बार पंचायतों में नेतृत्व का अवसर मिला और वे राजनीतिक मुख्यधारा से जुड़े।


इसी प्रकार जननायक कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न देने की मांग वर्षों से उठती रही, लेकिन नरेंद्र मोदी सरकार ने उनको भारत रत्न देकर अति पिछड़ा समाज का सम्मान बढ़ाने का कार्य किया।


प्रश्न- बिहार में विधान परिषद के लिए 10 सदस्य निर्वाचित हुए हैं। उनमें 6 ईबीसी जातियों के हैं। क्या लालू प्रसाद यादव के सामाजिक न्याय का यह विस्तार है? राजद की राजनीति को कमजोर करने के लिए ईबीसी पॉलिटिक्स करने को भाजपा या एनडीए की चाल के रूप में देखा जाए या फिर या कुछ और है?

उत्तर-जहां तक बिहार विधान परिषद में अति पिछड़ा समाज के प्रतिनिधित्व का प्रश्न है, भारतीय जनता पार्टी ने सदैव उन जातियों को अवसर देने का प्रयास किया है जो अति पिछड़ा वर्ग के भीतर भी सबसे अधिक वंचित रही हैं। भाजपा की राजनीति केवल वोट प्राप्त करने की नहीं, बल्कि समाज के अंतिम व्यक्ति को आगे बढ़ाने की है। पार्टी का विश्वास है कि “सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास” के बिना विकसित भारत और समृद्ध बिहार का निर्माण संभव नहीं है।

इसके विपरीत राष्ट्रीय जनता दल ने सामाजिक न्याय की बातें तो बहुत कीं, लेकिन व्यवहार में उसका लाभ सीमित लोगों तक ही सिमट कर रह गया। सामाजिक न्याय के नाम पर परिवारवाद को बढ़ावा मिला, जबकि समाज के सबसे वंचित वर्गों को अपेक्षित अवसर नहीं मिल सके।


प्रश्न-प्रमोद सिंह चंद्रवंशी ओबरा में लगातार असफल रहे। गया जिले से जिला परिषद के सदस्य रहे हैं। क्या अब गया में किसी सीट की तलाश अपने लिए कर रहे हैं? अगर हां तो वह कौन सी सीट होगी और क्यों होगी?


उत्तर-व्यक्तिगत रूप से मेरा उद्देश्य केवल चुनाव जीतना नहीं रहा है। समाज सेवा मेरा मूल लक्ष्य रहा है। चुनाव जीतना या हारना लोकतंत्र की स्वाभाविक प्रक्रिया है, लेकिन ओबरा विधानसभा की जनता का जो स्नेह, विश्वास और अपनापन मुझे आज भी प्राप्त है, वही मेरी सबसे बड़ी पूंजी है। मैं आज भी ओबरा की जनता के दिलों में स्थान रखता हूं और उनके सुख-दुख में सहभागी हूं।


प्रश्न- गया जिले की राजनीति को आप कैसे देखते हैं? खास कर ईबीसी पॉलिटिक्स के लिए जब डॉक्टर प्रेम कुमार जैसे बड़े अति पिछड़े चेहरे लगातार पांच दशक से भाजपा के लिए महत्वपूर्ण रूप से सक्रिय भूमिका में हों?

श्री चंद्रवंशी-मेरे लिए केवल गया जिला ही महत्वपूर्ण नहीं है। मेरा संकल्प पूरे बिहार के अति पिछड़ा समाज को भारतीय जनता पार्टी की विचारधारा, नीतियों, कार्यक्रमों और केंद्र तथा राज्य सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं से जोड़कर उन्हें सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक रूप से सशक्त बनाना है। चुनाव लड़ना मेरा लक्ष्य नहीं है। मेरा लक्ष्य और संकल्प है कि अति पिछड़ा समाज हर क्षेत्र में आगे बढ़े, सम्मानपूर्वक नेतृत्व करे और राष्ट्र निर्माण में अपनी प्रभावी भूमिका निभाए।


(बीरेंद्र यादव न्यूज के अतिपिछडा केंद्रित अंक में प्रकाशित)


#OBC #obcmahasabha #OBCMorcha #OBC_SC_ST #obc_politics #EBC_POLITICS #EBC #CASTE_POLITICS #BiharPolitics #BiharNews #bihar #IndianPolitics

Friday, 17 July 2026

..तो क्या पुलिस की जवाबदेही तय हो सकेगी?




■ अभियुक्तों की रिहाई का कारण केवल “साक्ष्य का अभाव”, “अपर्याप्त साक्ष्य”, “संदेह”, “गवाह मुकर गए”, या “विरोधाभास” लिखकर रिपोर्ट भेज देना स्वीकार्य नहीं। राज्य स्तरीय समिति की समीक्षा में जो बात सामने आई है, उसे अगर लागू किया जाता है तो बिहार में पुलिस सुधार का दशकों से चला आ रहा विमर्श एक आकर ले सकेगा। अन्यथा सुधार की संभावना एक बार फिर गतलखाते में चली जाएगी।■



डॉ.उपेंद्र कश्यप 

अपराध की जांच और अभियोजन की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए गठित राज्य स्तरीय समिति की अपराध अनुसंधान विभाग के डीआईजी जयंत कांत की अध्यक्षता में हुई बैठक में जनवरी से अप्रैल 2026 तक विभिन्न जिलों से प्राप्त प्रतिवेदनों की समीक्षा की गई। इसमें यह पाया गया कि जिले अभियुक्तों की रिहाई का कारण केवल “साक्ष्य का अभाव”, “अपर्याप्त साक्ष्य”, “संदेह”, “गवाह मुकर गए”, या “विरोधाभास” लिखकर रिपोर्ट भेज देते हैं। समिति ने इसे अस्वीकार बताया। तय किया गया कि यदि विरोधाभास का उल्लेख किया गया है तो यह भी स्पष्ट करना होगा कि किस गवाह के बयान में और किस बिंदु पर विरोधाभास सामने आया है। समिति ने सरकारी गवाहों की अनुपस्थिति को गंभीर माना है। जिन मामलों में अनुसंधानकर्ता, पुलिस पदाधिकारी, चिकित्सक या अन्य सरकारी गवाह अदालत में साक्ष्य देने नहीं पहुंचे और उसके कारण अभियुक्त बरी हुआ, उन सभी अधिकारियों का पूरा नाम, पद नाम और अन्य विवरण रिपोर्ट में दर्ज करना होगा। यदि कोई सरकारी गवाह पक्ष द्रोही हो गया है, तो उसका भी पूरा विवरण देना अनिवार्य होगा।  साथ ही जिला स्तरीय अभियोजन कोषांग यह भी सत्यापित करेगा कि न्यायालय की ओर से जारी समन और अन्य आदेशों का विधिवत तामिला हुआ था या नहीं। बताया गया कि समिति ने यह स्पष्ट कर दिया है कि उसका उद्देश्य रिपोर्ट की गुणवत्ता सुधारना नहीं बल्कि अभियोजन की कमियों की जवाबदेही तय कर दोषमुक्ति के मामलों में कमी लाना है।



अब सवाल यह होता है कि क्या वास्तव में बिहार सरकार में इतनी दृढ़ इच्छा शक्ति है कि वह कांडों के अनुसंधान कर्ताओं की जवाबदेही तय कर सकेगी? पुलिस की अगर जवाबदेही तय हो जाए तो ढेर सारे ऐसे मामले हैं जो स्वतः ही समस्या विहीन हो जाएंगे। पुलिस अगर जवाब देह हो तो अनुसंधान सही होंगे। भ्रष्टाचार कम होगा। निर्दोषों को फंसा कर भी पैसा ऐंठ लेने की प्रवृत्ति में कमी आएगी। बिहार पुलिस ऐसे ही कर्म से काफी बदनाम है। कोई मामला होता नहीं है कि सूचना के साथ पैसे लेनदेन की बात शुरू हो जाती है। यह हो सकता है कि कुछ मामलों में बिना पैसों के लेनदेन के आरोप लगाए जाते हैं, लेकिन इनकी संख्या न्यूनतम है। जबकि यह सत्य अधिकतम मामलों में दिखता है कि पैसों की लेनदेन होती है। अब अगर यह धारणा है तो अच्छी बात है। लेकिन वास्तविकता है तो इससे मुक्ति तभी संभव है जब कांडों के अनुसंधानकर्ता, थाना अध्यक्ष, पुलिस इंस्पेक्टर, डीएसपी और एसपी तक के अधिकारी की जवाबदेही तय हो। ताकि नीचे से उम्मीद टूटे तो उपर से भरोसा जग सके  यह आम धारणा है कि पुलिस पैसे के लिए या दबंगों, पूंजीपतियों, राजनीतिक शक्ति प्राप्त व्यक्तियों, जातीय दबंगो की चिरौरी के लिए निर्दोषों को भी फंसाती रही है। बिहार में उग्रवाद के पनपने, फैलने और मजबूत होने की कई वजहों में पुलिस की कार्यशैली भी एक प्रमुख कारक रही है। इससे इनकार नहीं किया जा सकता। पुलिस की जवाबदेही तय होने से यह भी होगा कि झूठे मुकदमों की संख्या लगातार घटती चली जाएगी। क्योंकि जब पुलिस जवाब देह होगी तो झूठे मुकदमों को खारिज करेगी। सही जांच कर आरोपित बनाए गए निर्दोषों को न्याय मिलेगा और झूठे मुकदमे करने वाले हतोत्साहित होंगे। पुलिस का विश्वास बहाल होगा तो आम लोग भी थाना जाने में डरेंगे नहीं, या कहीं पुलिस की उपस्थिति से लोग अपमानित महसूस नहीं करेंगे। पुलिस की कार्यशैली में काफी भिन्नता दिखती है और यह इस पर निर्भर करता है कि संबंधित पक्ष की ताकत कैसी और कितनी है। कानून एक है, अनुपालन का तरीका उसका एक होना चाहिए। लेकिन संबंधित पक्षों की ताकत से अनुपालन का तरीका बदल जाता है। और ऐसा कतई नहीं होना चाहिए। राज्य स्तरीय समिति की समीक्षा में जो बात सामने आई है, उसे अगर लागू किया जाता है तो बिहार में पुलिस सुधार का दशकों से चला आ रहा है विमर्श एक आकर ले सकेगा। अन्यथा यह बात भी आई-गई हो जाएगी। सुधार की संभावना एक बार फिर गतलखाते में चली जाएगी।

Saturday, 11 July 2026

लोकसंस्कृति के संरक्षण में उपेंद्र कश्यप का ऐतिहासिक योगदान

 लोकसंस्कृति के संरक्षण में उपेंद्र कश्यप का ऐतिहासिक योगदान


■डॉ. कुणाल किशोर, प्राध्यापक-दाउदनगर महाविद्यालय

(संदर्भ-दाउदनगर के जिउतिया को राजकीय दर्जा)



दाउदनगर के ऐतिहासिक जिउतिया पर्व को बिहार सरकार द्वारा राजकीय दर्जा (आवंटन शेष) प्रदान किया जाना इस क्षेत्र की सांस्कृतिक चेतना और लोक परंपरा के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। यह निर्णय केवल एक लोकपर्व की प्रशासनिक मान्यता नहीं, बल्कि दाउदनगर की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को सम्मान देने का प्रयास है। इससे इस पर्व के संरक्षण, संवर्धन और व्यापक प्रचार-प्रसार की नई संभावनाओं के द्वार खुलेंगी।


किसी भी लोकपर्व की प्रतिष्ठा केवल जनआस्था से नहीं बनती, बल्कि उसके इतिहास, सांस्कृतिक महत्व और सामाजिक भूमिका को शोध एवं अकादमिक विमर्श का विषय बनाए जाने से भी सुदृढ़ होती है। दाउदनगर के जिउतिया को इसी स्तर पर स्थापित करने में साहित्यकार और शोधकर्ता उपेंद्र कश्यप का योगदान अत्यंत उल्लेखनीय है।

उपेंद्र कश्यप ने अपने शोध, लेखन और दस्तावेजीकरण के माध्यम से दाउदनगर के जिउतिया की सांस्कृतिक विशिष्टता को व्यापक समाज के सामने रखा। उनकी चर्चित पुस्तक "श्रवण संस्कृति का वाहक-दाउदनगर” और “उत्कर्ष" इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कृति मानी जाती है, जिसमें जिउतिया की परंपरा, लोकविश्वास, सांस्कृतिक विकास और सामाजिक महत्व का गंभीर विश्लेषण मिलता है। यह पुस्तक केवल एक सांस्कृतिक दस्तावेज नहीं, बल्कि लोकजीवन को समझने का महत्वपूर्ण स्रोत भी है।

पुस्तक लेखन के अतिरिक्त उपेंद्र कश्यप ने दैनिक जागरण तथा प्रांतीय व राष्ट्रीय स्तर के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर लेख लिखकर जिउतिया की ऐतिहासिकता, सांस्कृतिक गरिमा और सामाजिक महत्व को जन-जन तक पहुँचाने का कार्य किया। उनके लेखों ने न केवल इस पर्व को व्यापक पहचान दिलाई, बल्कि शोधार्थियों, इतिहासकारों और संस्कृति के अध्येताओं का ध्यान भी इस ओर आकर्षित किया। यह प्रयास इस बात का प्रमाण है कि लोकसंस्कृति का संरक्षण केवल उत्सवों से नहीं, बल्कि गंभीर लेखन और बौद्धिक हस्तक्षेप से भी संभव होता है।

आज जब दाउदनगर के जिउतिया को राजकीय दर्जा प्राप्त हो चुका है, तब उपेंद्र कश्यप जैसे शोधकर्ताओं के योगदान को स्मरण करना आवश्यक है। उनके वर्षों के अध्ययन, लेखन और सांस्कृतिक प्रतिबद्धता ने इस लोकपर्व को अकादमिक पहचान दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण आधार तैयार किया। यह उपलब्धि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी प्रेरणा है कि लोकपरंपराओं का संरक्षण केवल भावनात्मक आग्रह से नहीं, बल्कि शोध, लेखन और दस्तावेजीकरण से भी होता है।

राजकीय दर्जा दाउदनगर के जिउतिया के लिए एक नई शुरुआत है। अब आवश्यकता इस बात की है कि विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों और सांस्कृतिक संगठनों द्वारा इस विषय पर और अधिक अध्ययन, शोध, संगोष्ठियाँ तथा प्रकाशन किए जाएँ। इससे दाउदनगर का जिउतिया केवल बिहार ही नहीं, बल्कि भारतीय लोकसंस्कृति के एक महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में स्थापित होगा। इस दिशा में उपेंद्र कश्यप का योगदान निस्संदेह ऐतिहासिक, प्रेरणादायी और सम्मान का अधिकारी है।



#सांस्कृतिक_कैलेंडर में शामिल हुआ #दाउदनगर_जिउतिया_लोकोत्सव

 

#upendrakashyap_and_sons_jewellers #उपेंद्र_कश्यप_एंड_संस_ज्वेलर्स #daudnagarnews #aurangabadbihar #jitiya #jiutiya #jiutiya_daudnagar #jitiya_daudnagar #jitiya_upendrakashyap #jiutiya_upendrakashyap

सांस्कृतिक कैलेंडर में शामिल हुआ दाउदनगर जिउतिया लोकोत्सव

 




#सांस्कृतिक_कैलेंडर में शामिल हुआ #दाउदनगर_जिउतिया_लोकोत्सव

◆ कुछ महत्वपूर्ण पड़ाव-

● पहली बार 1995 में राष्ट्रीय नवीन मेल में आठ कॉलम में एक आलेख उपेंद्र कश्यप की प्रकाशित हुई थी, जिसमें यह बताने का प्रयास किया गया था कि इस लोक उत्सव का आयाम बहुत व्यापक है।

■ वर्ष 2000 सितंबर में न्यूज़ ब्रेक में पहली बार जिउतिया से संबंधित खबरें रंगीन तस्वीरों के साथ चार पेज में छपी और पूरे बिहार में इसकी चर्चा हुई। नतीजा यह हुआ कि तब एशियन न्यूज इंटरनेशनल (एएनआई) के बिहार ब्यूरो प्रशांत झा यहां पहुंचे और पहली बार इंटरनेशनल स्तर पर वीडियो रिपोर्ट प्रसारित हुई। 

■ पटना व दिल्ली से प्रकाशित विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर लिखता रहा।

■ वर्ष 2016 में पहली बार नगर पंचायत द्वारा मेरी पहल पर जिउतिया लोकोत्सव का आयोजन हुआ। तब मुख्य पार्षद परमानंद प्रसाद थे।

■ 09 जुलाई 2026 को बिहार सरकार द्वारा जारी सांस्कृतिक कैलेंडर में चार दिवसीय जिउतिया लोकोत्सव को शामिल किया गया। प्रयास मुख्य पार्षद अंजली कुमारी का सफल हुआ।

■ अब आगे क्या? 

अभी आवंटन नहीं हुआ है। नगर परिषद की मुख्यपार्षद अंजली कुमारी ने 27 लाख रुपये खर्च करने का बजट प्रस्ताव बिहार सरकार को भेजा है। एक अधिकारी के अनुसार 05 लाख का आवंटन पहली बार प्राप्त हो सकता है। बाद में यह राशि बढ़ सकती है। 

■ आवंटन प्राप्त होते ही नगर परिषद की भूमिका सीमित हो जाएगी। प्राप्त आवंटन से खर्च का अधिकार बीडीओ के पास जा सकता है। समन्वय की आवश्यक्ता पड़ेगी।


#upendrakashyap_and_sons_jewellers #उपेंद्र_कश्यप_एंड_संस_ज्वेलर्स #daudnagarnews #aurangabadbihar #jitiya #jiutiya #jiutiya_daudnagar #jitiya_daudnagar #jitiya_upendrakashyap #jiutiya_upendrakashyap

सिर्फ सांस्कृतिक कैलेंडर में जिउतिया लोकोत्सव का शामिल होना लक्ष्य नहीं

 



आवंटन स्वीकृत होने समेत अभी कई कार्य होना शेष 


1995 से जारी कोशिश को मिला है एक पड़ाव 

मीडिया की रही है बड़ी भूमिका 

अब होगी आगे की यात्रा आरंभ 

डॉ. उपेंद्र कश्यप 

दाउदनगर (औरंगाबाद) । बिहार सरकार के कला एवं संस्कृति विभाग अंतर्गत सांस्कृतिक कार्य निदेशालय द्वारा जारी सांस्कृतिक कैलेंडर 2026 में दाउदनगर के जिउतिया लोकोत्सव को शामिल किया गया है। बिहार के प्रायः सभी जिलों से किसी ने किसी महोत्सव को इस सूची में शामिल किया गया है। औरंगाबाद जिला से 10 महोत्सव इस सूची में शामिल है और सभी के लिए न्यूनतम दो से अधिकतम 15 लाख रुपए तक का आवंटन प्राप्त हुआ है। सर्वाधिक 15 लाख रुपए देव महोत्सव के लिए आवंटित है। लेकिन दाउदनगर जिउतिया लोकित्सव के लिए अभी राशि का आवंटन नहीं हुआ है। इसके लिए अभी प्रयास करना होगा। सांस्कृतिक कैलेंडर में नाम आ जाना मात्र अंतिम लक्ष्य नहीं है। 1995 से लगातार राजकीय दर्जा दिलाने के साथ बिहार-झारखंड विभाजन के बाद से राज्य की प्रतिनिधि संस्कृति बनाने की मांग हम उठाते रहे। इसमें मीडिया की बड़ी भूमिका रही है। सांस्कृतिक कैलेंडर में शामिल हो जाना तो मात्र एक पड़ाव है। आगे की यात्रा अभी जारी रखनी होगी। कभी लोग हंसते थे। अविश्वसनीय बताते थे, आज जश्न मना रहे हैं लोग। इस लोक उत्सव को लेकर पत्रकारों और लोगों में मात्र इतनी समझ थी कि यह नौ दिन तक मनाया जाने वाला लोक उत्सव है। जिसमें बम्मा माई और भगवान जीमूतवाहन की पूजा होती है। संतान की रक्षा की कामना की जाती है। एक कहावत प्रचलित है कि- खैर मनाव कि मां जितिया की है,  कि जान बच गई। यह कहावत हर उस बार कही जाती थी जब कोई व्यक्ति किसी दुर्घटना या बीमारी में जीवित बच जाता था। लेकिन जितिया लोकोत्सव का आयाम बस इतना भर नहीं था। 


पहली बार 1995 में राष्ट्रीय नवीन मेल में आठ कॉलम में एक आलेख उपेंद्र कश्यप की प्रकाशित हुई थी, जिसमें यह बताने का प्रयास किया गया था की इस लोक उत्सव का आयाम बहुत व्यापक है। यह लोकयान के निकष पर सबसे व्यापक प्रभाव छोड़ने वाला लोकोत्सव है। इसके बाद बिहार (तब झारखंड भी साथ था), दिल्ली से प्रकाशित कई पत्र पत्रिकाओं में लगातार जिउतिया के सांस्कृतिक विशेषताओं पर मेरे लेख छपे। वर्ष 2000 का सितंबर माह काफी महत्वपूर्ण पड़ाव साबित हुआ। जब बिहार से प्रकाशित न्यूज़ ब्रेक में पहली बार जिउतिया से संबंधित खबरें रंगीन तस्वीरों के साथ चार पेज में छपी और पूरे बिहार में इसकी चर्चा हुई। नतीजा यह हुआ कि तब एशियन न्यूज इंटरनेशनल (एएनआई) जिसका लोगो आप प्राय: प्रतिदिन दर्जनों बार विभिन्न न्यूज़ चैनलों पर देखते हैं, के बिहार ब्यूरो प्रशांत झा ने मुझसे संपर्क किया। तब न्यूज़ ब्रेक के संपादक चंदेश्वर विद्यार्थी थे जो अभी जीवित नहीं है। तब इस टीम में नवेन्दु भी शामिल थे। जो आज भी सक्रिय हैं। प्रशांत झा ने तब (मोबाइल का जमाना नहीं था) विवेकानंद स्कूल आफ एजुकेशन बाजार समिति के पास लैंडलाइन पर कॉल किया था। वे दाउदनगर पहुंचे। पहली बार दाउदनगर के जितिया लोकोत्सव का कवरेज कोई टीवी चैनल वाला ग्रुप कर रहा था वह भी इंटरनेशनल लोगो के साथ। इसका व्यापक प्रसारण हुआ। इसके बाद 11 सितंबर 2001 को दैनिक जागरण के अपना प्रदेश परिशिष्ट में - जिउतिया के अवसर पर सांस्कृतिक कार्यक्रम आज भी जीवित- शीर्षक से लगभग आधे पेज का आलेख छपा। आज के ताना-बाना, आउटलुक सप्ताहिक, फारवर्ड प्रेस जैसी बाइलिंगुअल पत्रिका समेत कई में लगातार इस मुद्दे पर लिखता रहा। और या मांग उठाई जाती रही कि जिउतिया को राजकीय दर्जा दिया जाए। लगभग तमाम मंचों पर जनप्रतिनिधियों द्वारा मांग की जाती रही। लेकिन मंच से उतरने के बाद ना उनको जितिया याद था ना घोषणा याद रही। इन महत्वपूर्ण प्रयासों के बाद सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव वर्ष 2016 में आया, जब परमानंद प्रसाद मुख्य पार्षद थे और कौशलेंद्र सिंह उपमुख्यपार्षद। विपिन बिहारी सिंह कार्यपालक पदाधिकारी थे। तब मेरी बात परमानंद प्रसाद ने मानी और दाउदनगर नगर पंचायत कार्यालय परिसर में पहली बार जिउतिया लोकोत्सव के नाम से आयोजन हुआ। तमाम जज तब बाहर के रखें ताकि निर्विवाद रूप से प्रतियोगिता के सफल अभ्यर्थियों का चयन हो सके। जितनी राशि तब के आयोजन में बतौर नगद पुरस्कार बंटी, उतनी राशि आज तक किसी टीम या आयोजकों द्वारा नहीं बांटी गई। इसके बाद परमानंद प्रसाद बतौर अध्यक्ष वापस नहीं लौटे।

इधर नगर पंचायत नगर परिषद के रूप में उत्क्रमित होने से 2017 में चुनाव नहीं हुआ। मैं दाउदनगर छोड़कर डेहरी चला गया था और यहां प्रेशर बनाने में लोग असफल रहे। नतीजा कार्यपालक पदाधिकारी ने परमानंद प्रसाद द्वारा जारी की गई परंपरा को विराम दे दिया। उसके बाद नगर परिषद का चुनाव हुआ। यह दुर्भाग्य रहा परंपरा को आगे नहीं बढ़ा सके लोग। लोक कलाकारों के आंदोलन के बाद मीनू सिंह जब मुख्य पार्षद थी तो आयोजन हुआ। और तब से अब लगातार चल रहा है। मुख्य पार्षद अंजली कुमारी लगातार प्रयास करती रही, तब जाकर एक आरंभिक सफलता यह मिली है कि सांस्कृतिक कैलेंडर 2026 में दाउदनगर लोक उत्सव का नाम शामिल हो गया। इससे होगा यह कि बिहार की सत्ता और प्रशासन की नजर में अब यह स्थाई रूप से दिखाता रहेगा। अब आगे अधिकाधिक राशि आवंटन की लड़ाई चलेगी, ताकि जितिया लोकोत्सव को और भव्यता प्रदान हो सके।


#daudnagarnews #उपेंद्र_कश्यप_एंड_संस_ज्वेलर्स #दाउदनगर #jitiya #jiutiya #jitiya_lokotsav #jiutiya_lokotsav #जिउतिया #जितिया #दाउदनगर_का_जितिया #दाउदनगर_का_जिउतिया_लोकोत्सव #upendrakashyap_jitiya