Saturday, 11 July 2026

लोकसंस्कृति के संरक्षण में उपेंद्र कश्यप का ऐतिहासिक योगदान

 लोकसंस्कृति के संरक्षण में उपेंद्र कश्यप का ऐतिहासिक योगदान


■डॉ. कुणाल किशोर, प्राध्यापक-दाउदनगर महाविद्यालय

(संदर्भ-दाउदनगर के जिउतिया को राजकीय दर्जा)



दाउदनगर के ऐतिहासिक जिउतिया पर्व को बिहार सरकार द्वारा राजकीय दर्जा (आवंटन शेष) प्रदान किया जाना इस क्षेत्र की सांस्कृतिक चेतना और लोक परंपरा के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। यह निर्णय केवल एक लोकपर्व की प्रशासनिक मान्यता नहीं, बल्कि दाउदनगर की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को सम्मान देने का प्रयास है। इससे इस पर्व के संरक्षण, संवर्धन और व्यापक प्रचार-प्रसार की नई संभावनाओं के द्वार खुलेंगी।

किसी भी लोकपर्व की प्रतिष्ठा केवल जनआस्था से नहीं बनती, बल्कि उसके इतिहास, सांस्कृतिक महत्व और सामाजिक भूमिका को शोध एवं अकादमिक विमर्श का विषय बनाए जाने से भी सुदृढ़ होती है। दाउदनगर के जिउतिया को इसी स्तर पर स्थापित करने में साहित्यकार और शोधकर्ता उपेंद्र कश्यप का योगदान अत्यंत उल्लेखनीय है।

उपेंद्र कश्यप ने अपने शोध, लेखन और दस्तावेजीकरण के माध्यम से दाउदनगर के जिउतिया की सांस्कृतिक विशिष्टता को व्यापक समाज के सामने रखा। उनकी चर्चित पुस्तक "श्रवण संस्कृति का वाहक-दाउदनगर” और “उत्कर्ष" इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कृति मानी जाती है, जिसमें जिउतिया की परंपरा, लोकविश्वास, सांस्कृतिक विकास और सामाजिक महत्व का गंभीर विश्लेषण मिलता है। यह पुस्तक केवल एक सांस्कृतिक दस्तावेज नहीं, बल्कि लोकजीवन को समझने का महत्वपूर्ण स्रोत भी है।

पुस्तक लेखन के अतिरिक्त उपेंद्र कश्यप ने दैनिक जागरण तथा प्रांतीय व राष्ट्रीय स्तर के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर लेख लिखकर जिउतिया की ऐतिहासिकता, सांस्कृतिक गरिमा और सामाजिक महत्व को जन-जन तक पहुँचाने का कार्य किया। उनके लेखों ने न केवल इस पर्व को व्यापक पहचान दिलाई, बल्कि शोधार्थियों, इतिहासकारों और संस्कृति के अध्येताओं का ध्यान भी इस ओर आकर्षित किया। यह प्रयास इस बात का प्रमाण है कि लोकसंस्कृति का संरक्षण केवल उत्सवों से नहीं, बल्कि गंभीर लेखन और बौद्धिक हस्तक्षेप से भी संभव होता है।

आज जब दाउदनगर के जिउतिया को राजकीय दर्जा प्राप्त हो चुका है, तब उपेंद्र कश्यप जैसे शोधकर्ताओं के योगदान को स्मरण करना आवश्यक है। उनके वर्षों के अध्ययन, लेखन और सांस्कृतिक प्रतिबद्धता ने इस लोकपर्व को अकादमिक पहचान दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण आधार तैयार किया। यह उपलब्धि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी प्रेरणा है कि लोकपरंपराओं का संरक्षण केवल भावनात्मक आग्रह से नहीं, बल्कि शोध, लेखन और दस्तावेजीकरण से भी होता है।

राजकीय दर्जा दाउदनगर के जिउतिया के लिए एक नई शुरुआत है। अब आवश्यकता इस बात की है कि विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों और सांस्कृतिक संगठनों द्वारा इस विषय पर और अधिक अध्ययन, शोध, संगोष्ठियाँ तथा प्रकाशन किए जाएँ। इससे दाउदनगर का जिउतिया केवल बिहार ही नहीं, बल्कि भारतीय लोकसंस्कृति के एक महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में स्थापित होगा। इस दिशा में उपेंद्र कश्यप का योगदान निस्संदेह ऐतिहासिक, प्रेरणादायी और सम्मान का अधिकारी है।



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सांस्कृतिक कैलेंडर में शामिल हुआ दाउदनगर जिउतिया लोकोत्सव

 




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◆ कुछ महत्वपूर्ण पड़ाव-

● पहली बार 1995 में राष्ट्रीय नवीन मेल में आठ कॉलम में एक आलेख उपेंद्र कश्यप की प्रकाशित हुई थी, जिसमें यह बताने का प्रयास किया गया था कि इस लोक उत्सव का आयाम बहुत व्यापक है।

■ वर्ष 2000 सितंबर में न्यूज़ ब्रेक में पहली बार जिउतिया से संबंधित खबरें रंगीन तस्वीरों के साथ चार पेज में छपी और पूरे बिहार में इसकी चर्चा हुई। नतीजा यह हुआ कि तब एशियन न्यूज इंटरनेशनल (एएनआई) के बिहार ब्यूरो प्रशांत झा यहां पहुंचे और पहली बार इंटरनेशनल स्तर पर वीडियो रिपोर्ट प्रसारित हुई। 

■ पटना व दिल्ली से प्रकाशित विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर लिखता रहा।

■ वर्ष 2016 में पहली बार नगर पंचायत द्वारा मेरी पहल पर जिउतिया लोकोत्सव का आयोजन हुआ। तब मुख्य पार्षद परमानंद प्रसाद थे।

■ 09 जुलाई 2026 को बिहार सरकार द्वारा जारी सांस्कृतिक कैलेंडर में चार दिवसीय जिउतिया लोकोत्सव को शामिल किया गया। प्रयास मुख्य पार्षद अंजली कुमारी का सफल हुआ।

■ अब आगे क्या? 

अभी आवंटन नहीं हुआ है। नगर परिषद की मुख्यपार्षद अंजली कुमारी ने 27 लाख रुपये खर्च करने का बजट प्रस्ताव बिहार सरकार को भेजा है। एक अधिकारी के अनुसार 05 लाख का आवंटन पहली बार प्राप्त हो सकता है। बाद में यह राशि बढ़ सकती है। 

■ आवंटन प्राप्त होते ही नगर परिषद की भूमिका सीमित हो जाएगी। प्राप्त आवंटन से खर्च का अधिकार बीडीओ के पास जा सकता है। समन्वय की आवश्यक्ता पड़ेगी।


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सिर्फ सांस्कृतिक कैलेंडर में जिउतिया लोकोत्सव का शामिल होना लक्ष्य नहीं

 



आवंटन स्वीकृत होने समेत अभी कई कार्य होना शेष 


1995 से जारी कोशिश को मिला है एक पड़ाव 

मीडिया की रही है बड़ी भूमिका 

अब होगी आगे की यात्रा आरंभ 

डॉ. उपेंद्र कश्यप 

दाउदनगर (औरंगाबाद) । बिहार सरकार के कला एवं संस्कृति विभाग अंतर्गत सांस्कृतिक कार्य निदेशालय द्वारा जारी सांस्कृतिक कैलेंडर 2026 में दाउदनगर के जिउतिया लोकोत्सव को शामिल किया गया है। बिहार के प्रायः सभी जिलों से किसी ने किसी महोत्सव को इस सूची में शामिल किया गया है। औरंगाबाद जिला से 10 महोत्सव इस सूची में शामिल है और सभी के लिए न्यूनतम दो से अधिकतम 15 लाख रुपए तक का आवंटन प्राप्त हुआ है। सर्वाधिक 15 लाख रुपए देव महोत्सव के लिए आवंटित है। लेकिन दाउदनगर जिउतिया लोकित्सव के लिए अभी राशि का आवंटन नहीं हुआ है। इसके लिए अभी प्रयास करना होगा। सांस्कृतिक कैलेंडर में नाम आ जाना मात्र अंतिम लक्ष्य नहीं है। 1995 से लगातार राजकीय दर्जा दिलाने के साथ बिहार-झारखंड विभाजन के बाद से राज्य की प्रतिनिधि संस्कृति बनाने की मांग हम उठाते रहे। इसमें मीडिया की बड़ी भूमिका रही है। सांस्कृतिक कैलेंडर में शामिल हो जाना तो मात्र एक पड़ाव है। आगे की यात्रा अभी जारी रखनी होगी। कभी लोग हंसते थे। अविश्वसनीय बताते थे, आज जश्न मना रहे हैं लोग। इस लोक उत्सव को लेकर पत्रकारों और लोगों में मात्र इतनी समझ थी कि यह नौ दिन तक मनाया जाने वाला लोक उत्सव है। जिसमें बम्मा माई और भगवान जीमूतवाहन की पूजा होती है। संतान की रक्षा की कामना की जाती है। एक कहावत प्रचलित है कि- खैर मनाव कि मां जितिया की है,  कि जान बच गई। यह कहावत हर उस बार कही जाती थी जब कोई व्यक्ति किसी दुर्घटना या बीमारी में जीवित बच जाता था। लेकिन जितिया लोकोत्सव का आयाम बस इतना भर नहीं था। 


पहली बार 1995 में राष्ट्रीय नवीन मेल में आठ कॉलम में एक आलेख उपेंद्र कश्यप की प्रकाशित हुई थी, जिसमें यह बताने का प्रयास किया गया था की इस लोक उत्सव का आयाम बहुत व्यापक है। यह लोकयान के निकष पर सबसे व्यापक प्रभाव छोड़ने वाला लोकोत्सव है। इसके बाद बिहार (तब झारखंड भी साथ था), दिल्ली से प्रकाशित कई पत्र पत्रिकाओं में लगातार जिउतिया के सांस्कृतिक विशेषताओं पर मेरे लेख छपे। वर्ष 2000 का सितंबर माह काफी महत्वपूर्ण पड़ाव साबित हुआ। जब बिहार से प्रकाशित न्यूज़ ब्रेक में पहली बार जिउतिया से संबंधित खबरें रंगीन तस्वीरों के साथ चार पेज में छपी और पूरे बिहार में इसकी चर्चा हुई। नतीजा यह हुआ कि तब एशियन न्यूज इंटरनेशनल (एएनआई) जिसका लोगो आप प्राय: प्रतिदिन दर्जनों बार विभिन्न न्यूज़ चैनलों पर देखते हैं, के बिहार ब्यूरो प्रशांत झा ने मुझसे संपर्क किया। तब न्यूज़ ब्रेक के संपादक चंदेश्वर विद्यार्थी थे जो अभी जीवित नहीं है। तब इस टीम में नवेन्दु भी शामिल थे। जो आज भी सक्रिय हैं। प्रशांत झा ने तब (मोबाइल का जमाना नहीं था) विवेकानंद स्कूल आफ एजुकेशन बाजार समिति के पास लैंडलाइन पर कॉल किया था। वे दाउदनगर पहुंचे। पहली बार दाउदनगर के जितिया लोकोत्सव का कवरेज कोई टीवी चैनल वाला ग्रुप कर रहा था वह भी इंटरनेशनल लोगो के साथ। इसका व्यापक प्रसारण हुआ। इसके बाद 11 सितंबर 2001 को दैनिक जागरण के अपना प्रदेश परिशिष्ट में - जिउतिया के अवसर पर सांस्कृतिक कार्यक्रम आज भी जीवित- शीर्षक से लगभग आधे पेज का आलेख छपा। आज के ताना-बाना, आउटलुक सप्ताहिक, फारवर्ड प्रेस जैसी बाइलिंगुअल पत्रिका समेत कई में लगातार इस मुद्दे पर लिखता रहा। और या मांग उठाई जाती रही कि जिउतिया को राजकीय दर्जा दिया जाए। लगभग तमाम मंचों पर जनप्रतिनिधियों द्वारा मांग की जाती रही। लेकिन मंच से उतरने के बाद ना उनको जितिया याद था ना घोषणा याद रही। इन महत्वपूर्ण प्रयासों के बाद सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव वर्ष 2016 में आया, जब परमानंद प्रसाद मुख्य पार्षद थे और कौशलेंद्र सिंह उपमुख्यपार्षद। विपिन बिहारी सिंह कार्यपालक पदाधिकारी थे। तब मेरी बात परमानंद प्रसाद ने मानी और दाउदनगर नगर पंचायत कार्यालय परिसर में पहली बार जिउतिया लोकोत्सव के नाम से आयोजन हुआ। तमाम जज तब बाहर के रखें ताकि निर्विवाद रूप से प्रतियोगिता के सफल अभ्यर्थियों का चयन हो सके। जितनी राशि तब के आयोजन में बतौर नगद पुरस्कार बंटी, उतनी राशि आज तक किसी टीम या आयोजकों द्वारा नहीं बांटी गई। इसके बाद परमानंद प्रसाद बतौर अध्यक्ष वापस नहीं लौटे।

इधर नगर पंचायत नगर परिषद के रूप में उत्क्रमित होने से 2017 में चुनाव नहीं हुआ। मैं दाउदनगर छोड़कर डेहरी चला गया था और यहां प्रेशर बनाने में लोग असफल रहे। नतीजा कार्यपालक पदाधिकारी ने परमानंद प्रसाद द्वारा जारी की गई परंपरा को विराम दे दिया। उसके बाद नगर परिषद का चुनाव हुआ। यह दुर्भाग्य रहा परंपरा को आगे नहीं बढ़ा सके लोग। लोक कलाकारों के आंदोलन के बाद मीनू सिंह जब मुख्य पार्षद थी तो आयोजन हुआ। और तब से अब लगातार चल रहा है। मुख्य पार्षद अंजली कुमारी लगातार प्रयास करती रही, तब जाकर एक आरंभिक सफलता यह मिली है कि सांस्कृतिक कैलेंडर 2026 में दाउदनगर लोक उत्सव का नाम शामिल हो गया। इससे होगा यह कि बिहार की सत्ता और प्रशासन की नजर में अब यह स्थाई रूप से दिखाता रहेगा। अब आगे अधिकाधिक राशि आवंटन की लड़ाई चलेगी, ताकि जितिया लोकोत्सव को और भव्यता प्रदान हो सके।


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