आवंटन स्वीकृत होने समेत अभी कई कार्य होना शेष
1995 से जारी कोशिश को मिला है एक पड़ाव
मीडिया की रही है बड़ी भूमिका
अब होगी आगे की यात्रा आरंभ
डॉ. उपेंद्र कश्यप
दाउदनगर (औरंगाबाद) । बिहार सरकार के कला एवं संस्कृति विभाग अंतर्गत सांस्कृतिक कार्य निदेशालय द्वारा जारी सांस्कृतिक कैलेंडर 2026 में दाउदनगर के जिउतिया लोकोत्सव को शामिल किया गया है। बिहार के प्रायः सभी जिलों से किसी ने किसी महोत्सव को इस सूची में शामिल किया गया है। औरंगाबाद जिला से 10 महोत्सव इस सूची में शामिल है और सभी के लिए न्यूनतम दो से अधिकतम 15 लाख रुपए तक का आवंटन प्राप्त हुआ है। सर्वाधिक 15 लाख रुपए देव महोत्सव के लिए आवंटित है। लेकिन दाउदनगर जिउतिया लोकित्सव के लिए अभी राशि का आवंटन नहीं हुआ है। इसके लिए अभी प्रयास करना होगा। सांस्कृतिक कैलेंडर में नाम आ जाना मात्र अंतिम लक्ष्य नहीं है। 1995 से लगातार राजकीय दर्जा दिलाने के साथ बिहार-झारखंड विभाजन के बाद से राज्य की प्रतिनिधि संस्कृति बनाने की मांग हम उठाते रहे। इसमें मीडिया की बड़ी भूमिका रही है। सांस्कृतिक कैलेंडर में शामिल हो जाना तो मात्र एक पड़ाव है। आगे की यात्रा अभी जारी रखनी होगी। कभी लोग हंसते थे। अविश्वसनीय बताते थे, आज जश्न मना रहे हैं लोग। इस लोक उत्सव को लेकर पत्रकारों और लोगों में मात्र इतनी समझ थी कि यह नौ दिन तक मनाया जाने वाला लोक उत्सव है। जिसमें बम्मा माई और भगवान जीमूतवाहन की पूजा होती है। संतान की रक्षा की कामना की जाती है। एक कहावत प्रचलित है कि- खैर मनाव कि मां जितिया की है, कि जान बच गई। यह कहावत हर उस बार कही जाती थी जब कोई व्यक्ति किसी दुर्घटना या बीमारी में जीवित बच जाता था। लेकिन जितिया लोकोत्सव का आयाम बस इतना भर नहीं था।
पहली बार 1995 में राष्ट्रीय नवीन मेल में आठ कॉलम में एक आलेख उपेंद्र कश्यप की प्रकाशित हुई थी, जिसमें यह बताने का प्रयास किया गया था की इस लोक उत्सव का आयाम बहुत व्यापक है। यह लोकयान के निकष पर सबसे व्यापक प्रभाव छोड़ने वाला लोकोत्सव है। इसके बाद बिहार (तब झारखंड भी साथ था), दिल्ली से प्रकाशित कई पत्र पत्रिकाओं में लगातार जिउतिया के सांस्कृतिक विशेषताओं पर मेरे लेख छपे। वर्ष 2000 का सितंबर माह काफी महत्वपूर्ण पड़ाव साबित हुआ। जब बिहार से प्रकाशित न्यूज़ ब्रेक में पहली बार जिउतिया से संबंधित खबरें रंगीन तस्वीरों के साथ चार पेज में छपी और पूरे बिहार में इसकी चर्चा हुई। नतीजा यह हुआ कि तब एशियन न्यूज इंटरनेशनल (एएनआई) जिसका लोगो आप प्राय: प्रतिदिन दर्जनों बार विभिन्न न्यूज़ चैनलों पर देखते हैं, के बिहार ब्यूरो प्रशांत झा ने मुझसे संपर्क किया। तब न्यूज़ ब्रेक के संपादक चंदेश्वर विद्यार्थी थे जो अभी जीवित नहीं है। तब इस टीम में नवेन्दु भी शामिल थे। जो आज भी सक्रिय हैं। प्रशांत झा ने तब (मोबाइल का जमाना नहीं था) विवेकानंद स्कूल आफ एजुकेशन बाजार समिति के पास लैंडलाइन पर कॉल किया था। वे दाउदनगर पहुंचे। पहली बार दाउदनगर के जितिया लोकोत्सव का कवरेज कोई टीवी चैनल वाला ग्रुप कर रहा था वह भी इंटरनेशनल लोगो के साथ। इसका व्यापक प्रसारण हुआ। इसके बाद 11 सितंबर 2001 को दैनिक जागरण के अपना प्रदेश परिशिष्ट में - जिउतिया के अवसर पर सांस्कृतिक कार्यक्रम आज भी जीवित- शीर्षक से लगभग आधे पेज का आलेख छपा। आज के ताना-बाना, आउटलुक सप्ताहिक, फारवर्ड प्रेस जैसी बाइलिंगुअल पत्रिका समेत कई में लगातार इस मुद्दे पर लिखता रहा। और या मांग उठाई जाती रही कि जिउतिया को राजकीय दर्जा दिया जाए। लगभग तमाम मंचों पर जनप्रतिनिधियों द्वारा मांग की जाती रही। लेकिन मंच से उतरने के बाद ना उनको जितिया याद था ना घोषणा याद रही। इन महत्वपूर्ण प्रयासों के बाद सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव वर्ष 2016 में आया, जब परमानंद प्रसाद मुख्य पार्षद थे और कौशलेंद्र सिंह उपमुख्यपार्षद। विपिन बिहारी सिंह कार्यपालक पदाधिकारी थे। तब मेरी बात परमानंद प्रसाद ने मानी और दाउदनगर नगर पंचायत कार्यालय परिसर में पहली बार जिउतिया लोकोत्सव के नाम से आयोजन हुआ। तमाम जज तब बाहर के रखें ताकि निर्विवाद रूप से प्रतियोगिता के सफल अभ्यर्थियों का चयन हो सके। जितनी राशि तब के आयोजन में बतौर नगद पुरस्कार बंटी, उतनी राशि आज तक किसी टीम या आयोजकों द्वारा नहीं बांटी गई। इसके बाद परमानंद प्रसाद बतौर अध्यक्ष वापस नहीं लौटे।
इधर नगर पंचायत नगर परिषद के रूप में उत्क्रमित होने से 2017 में चुनाव नहीं हुआ। मैं दाउदनगर छोड़कर डेहरी चला गया था और यहां प्रेशर बनाने में लोग असफल रहे। नतीजा कार्यपालक पदाधिकारी ने परमानंद प्रसाद द्वारा जारी की गई परंपरा को विराम दे दिया। उसके बाद नगर परिषद का चुनाव हुआ। यह दुर्भाग्य रहा परंपरा को आगे नहीं बढ़ा सके लोग। लोक कलाकारों के आंदोलन के बाद मीनू सिंह जब मुख्य पार्षद थी तो आयोजन हुआ। और तब से अब लगातार चल रहा है। मुख्य पार्षद अंजली कुमारी लगातार प्रयास करती रही, तब जाकर एक आरंभिक सफलता यह मिली है कि सांस्कृतिक कैलेंडर 2026 में दाउदनगर लोक उत्सव का नाम शामिल हो गया। इससे होगा यह कि बिहार की सत्ता और प्रशासन की नजर में अब यह स्थाई रूप से दिखाता रहेगा। अब आगे अधिकाधिक राशि आवंटन की लड़ाई चलेगी, ताकि जितिया लोकोत्सव को और भव्यता प्रदान हो सके।
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