■ टेढ़ी पॉलिटिक्स : ■
डॉ.उपेंद्र कश्यप
मो.नं.- 9931852301
(बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के बयान से फिर यह उम्मीद जगी है कि शिक्षा व्यवस्था में सुधार हो सकता है। क्या एक शिक्षा व्यवस्था संभव नहीं है, और है तो फिर कैसे हैं? इसी संदर्भ में इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए फैसले और अब सम्राट चौधरी के बयान का विश्लेषण कर रहे हैं वरिष्ठ लेखक व पत्रकार- डॉ. उपेंद्र कश्यप)
बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने संत रविदास जयंती पर आयोजित समारोह को संबोधित करते हुए कहा है कि अगले एक-दो वर्षों में ऐसी व्यवस्था बनाने का लक्ष्य है जिससे मंत्री, विधायक और अफसर के बच्चे भी सरकारी स्कूलों में पढ़ें। ऐसा होने पर ही माना जाएगा कि सरकारी शिक्षा व्यवस्था वाकई बदली है।
ऐसा कह कर “एक शिक्षा व्यवस्था” की एक उम्मीद तो जगाते हैं लेकिन वह यह भी स्वीकार करते हैं कि सरकारी शिक्षा व्यवस्था अभी इतनी दुरुस्त नहीं हुई है कि मंत्री और अधिकारी के बच्चे भी उसमें पढ़ सकें।
स्थिति तो ऐसी भी नहीं है कि कस्बाई और छोटे शहरी क्षेत्र के नेता, व्यवसायी, सरकारी कर्मचारी, दूसरे- तीसरे दर्जे के अधिकारी के बच्चे भी सरकारी स्कूलों में पढ़ सकें। स्थिति यह है कि हर वह मां पिता जो थोड़ा भी सक्षम है, अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में पढ़ाना नहीं चाहता। वह निजी विद्यालयों में अपने बच्चों को पढ़ाता है। पेट व कपड़ा में कटौती करके, अपने शौक त्याग कर। इसके लिए कुछ हद तक स्टेटस सिंबल भी जिम्मेदार है। लेकिन 90 प्रतिशत जिम्मेदार शिक्षा व्यवस्था है। हर सक्षम व्यक्ति सरकारी विद्यालयों में एप्ने बच्चे को पढ़ाना स्वीकार नहीं करता। कह सकते हैं कि सरकारी विद्यालयों में वही बच्चे पढ़ते हैं जिनके माता-पिता के पास निजी विद्यालयों में पढ़ाने का विकल्प नहीं है, या सक्षमता नहीं है। तो क्या सम्राट चौधरी के इस बयान से यह उम्मीद दिखती है कि कभी एक शिक्षा व्यवस्था होगी। हालांकि यह उम्मीद जरूर जगती है कि शिक्षा व्यवस्था में सुधार सरकार की प्राथमिकता में शायद अब आ गई है।
यहां उल्लेखनीय है 18 अगस्त 2015 को आया इलाहाबाद हाईकोर्ट का वह फैसला, जिसमें न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल ने कहा था कि- बेसिक शिक्षा सभी के लिए एक होनी चाहिए। सरकारी सुविधा संसाधन और अर्थ का लाभ लेने वाला हर व्यक्ति का बच्चा सरकारी स्कूल में पढ़े यह सुनिश्चित होना चाहिए। कहा था- उत्तर प्रदेश के सरकारी कर्मचारी, जन प्रतिनिधि, स्थानीय निकायों के पदाधिकारी, न्यायपालिका से जुड़े लोग तथा सरकारी खजाने से वेतन या मानदेय पाने वाले सभी व्यक्तियों के बच्चों को सरकार प्राथमिक विद्यालयों में पढ़ाने की व्यवस्था सरकार करे। अदालत ने तब कहा था- जब तक नीति निर्माता और सरकारी अधिकारियों के अपने बच्चे सरकारी स्कूलों में नहीं पढ़ेंगे, तब तक विभिन्न विद्यालयों की गुणवत्ता सुधारने के प्रति गंभीर नहीं होंगे। कितनी सही बात कही गयी थी।
इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले को अगर तब की उत्तर प्रदेश सरकार (मुख्यमंत्री अखिलेश यादव थे) अमल में ला चुकी होती तो आज बात बहुत हद तक व्यवस्था आगे बढ़ गई होती। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इस उत्तर प्रदेश में बाद में मुख्यमंत्री बने और अब तक सत्ता चला रहे आदित्यनाथ योगी नव भी इस दिशा में पहल नहीं किया।
दरअसल हकीकत यह है कि इलाहाबाद के उस फैसले की चर्चा करने से हर जाति- धर्म, राजनीतिक दल के नेता बचते रहे। एक सच यह भी है कि आम नागरिक भी उस फैसले को लेकर आगे नहीं बढ़ा। दरअसल, समस्या यह है कि इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले को अगर सरकार लागू कर दे तो उनका ही हित प्रभावित होगा। निजी शिक्षण संस्थानों से बड़े बड़े नेताओं और राजनीतिक दलों के हित जुड़े हुए हैं। उनको आर्थिक लाभ मिलता है। अधिकारियों को भी आर्थिक-सामाजिक लाभ ऐसे संस्थानों से प्राप्त होते हैं।
आम जनता की तरफ से आवाज क्यों नहीं उठी। मीडिया ने भी इस मुद्दे को आवाज देना उचित नहीं समझा। न मुख्यधारा की मीडिया (प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक) में इलाहाबाद के फैसले को लागू करने के मुद्दे पर चर्चा हुई, न सोशल मीडिया इंफ्लुएंसरों ने इसे उठाया। कहीं चर्चा, बहस नहीं। दरअसल, जिस बड़े तबके को एक शिक्षा व्यवस्था से लाभ होगा, वह आंदोलन करने के प्रति न तो जागरूक है, न ही वह इसको लेकर किसी भी प्रकार का कोई हानि का जोखिल लेने को तैयार है। फिर जो इससे बहुत आहत नहीं हैं, परेशान नहीं हैं, वे भला क्यों सड़क पर उतरेंगे। जो वर्ग सक्षम नहीं है निजी विद्यालयों में अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए वह सड़क पर उतरने में भी सक्षम नहीं है। जो तबका सरकारी विद्यालयों को नजरअंदाज कर निजी विद्यालयों में बच्चों को पढा रहा है उसे बहुत पीड़ा इस मुद्दे को लेकर नहीं है। और ना ही वह संघर्ष करने सड़क पर उतरने वाला है। एक बड़ा हिस्सा कसमकश में है कि क्या उसके सड़क पर उतरने से भी व्यवस्था बदल जाएगी। या सड़क पर उतरने से उसको कितना लाभ हानि होगा, यह विचार करते हुए वह सड़क पर नहीं उतर रहा। कारण कई हो सकते हैं, लेकिन अंतिम सत्य तो यही है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को सड़क का मुद्दा किसी ने नहीं बनाया। जब देश में एक देश एक चुनाव की तैयारी है, एक देश एक राशन की व्यवस्था लागू हो गयी है तो क्यों नहीं एक देश एक शिक्षा का मुद्दा उठ रहा है। समस्या यही है कि राजनीति और समाज में जो सक्रिय तबका है, उसको इस मुद्दे से बहुत लेना देना नहीं है। और जो सरकारी शिक्षा व्यवस्था का लाभ लेने के लिए मजबूर है, उसके पास रोजमर्रे का संघर्ष इतना है कि बच्चों की पढ़ाई जिस स्कूल में वह करवा रहा है उस स्कूल में क्या संसाधन है, क्या सुविधा है, उसके अधिकारों का कितना हनन हो रहा है, इससे उसे कोई मतलब नहीं है। इसके प्रति दरअसल वह जागरूक भी नहीं है। इस देश में जब तक कि हंगामा नहीं कोई समूह करता है, जब तक धरना प्रदर्शन नहीं होगा, जब तक मामले को आप न्यायिक लड़ाई नहीं बनाएंगे, तब तक कुछ सुधारात्मक कार्य नहीं होने वाला। गरीबों की ना सुनने की आदत हर उस वर्ग में है जो थोड़ा भी सक्षम हो गया है। देश में आज जरूरत इस बात की है कि एक देश एक शिक्षा के मुद्दे को लेकर योजनाबद्ध तरीके से आंदोलन हो। मामले को सुप्रीम कोर्ट में ले जाया जाए। लेकिन फिर सवाल यह है कि इस मुद्दे पर आंदोलन कौन करेगा, और आंदोलनकारी को ना तो कोई खाना पहुंचाने जाएगा और ना उनके सुविधा, संसाधनों का कोई ख्याल रखेगा। ऐसे मुद्दे के लिए कोई एनजीओ, राजनीतिक दल, नेता आगे नहीं आएगा, क्योंकि उसको विदेशी चंदा कोई नहीं देगा। कोई अरब या पश्चिम देश ऐसे आंदोलन के लिए न फंडिंग करेगा न खाना भेजेगा। इसलिए गरीबों, वंचित तबके को ही आगे आना होगा, देर-सबेर।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह उनके निजी विचार हैं।)
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