Thursday, 17 September 2026

जिउतिया लोकोत्सव के लिए सरकार ने दिए तीन लाख लेकिन..

 


नगर परिषद में प्रथम दिन प्रशासनिक आयोजन 

बाद के तीन दिन का कार्यक्रम नप के जिम्मे

निबंधन कराये कलाकारों को ही मिलेगा आर्थिक लाभ 

उपेंद्र कश्यप

नबिटा संवाददाता 

दाउदनगर (औरंगाबाद) । मुख्य पार्षद अंजली कुमारी के प्रयास से पहली बार सरकार ने जिउतिया लोक उत्सव के लिए तव्वन लाख रुपये की राशि आवंटित किया है। लेकिन राशि आवंटित होने के साथ ही कई मुश्किलें और समस्याएं भी सामने खड़ी हो गई है। राशि मिलते ही सवाल खड़ा हुआ है कि इस राशि को खर्च कौन करेगा, कैसे और किस मद में खर्च करेगा। इसमें प्रशासन और नगर निकाय की भूमिका क्या होगी। इस प्रश्न के जवाब में मुख्य पार्षद अंजली कुमारी ने कहा कि यह कला संस्कृति पदाधिकारी बताएंगे। कला संस्कृति पदाधिकारी पप्पू कुमार बताते हैं कि नगर परिषद में पहले दिन का आयोजन प्रशासनिक स्तर पर होगा। शेष तीन दिन का आयोजन नगर परिषद करेगा। पहले दिन जो कार्यक्रम होगा उसमें जिला पदाधिकारी के स्तर से जनप्रतिनिधियों को आमंत्रित किया जाएगा। यानी जिले के सभी सांसद, विधायक, विधान परिषद सदस्य, और अन्य


जनप्रतिनिधियों को आमंत्रित किया जाएगा। इस दिन जो कला प्रस्तुतियां होंगी। कुल प्रस्तुतियों में चयनित प्रतिभागियों को पुरस्कृत करने की जिम्मेदारी नगर परिषद की नहीं बल्कि प्रशासनिक महकमे की होगी। समस्या यह आएगी कि बिहार सरकार की कला संस्कृति विभाग के वेबसाइट पर जो निबंधित कलाकार होंगे, सिर्फ वे ही इस आयोजन का लाभ ले सकते हैं। पहली बार इस तरह का अनुभव दाउदनगर को होगा। इसका भविष्य में क्या नफा नुकसान स्थानीय संस्कृति के संदर्भ में होगा यह आकलन करने में वक्त लगेगा।


नई पीढ़ी तक पहुंचेगी विरासत


नगर परिषद की मुख्य पार्षद अंजली कुमारी ने इस प्रसंग में कहा कि राशि का आवंटन होना दाउदनगर वासियों के लिए हर्ष और गौरव का विषय है। यह राशि हमारे पारंपरिक लोक उत्सव को और भव्य एवं व्यवस्थित रूप देने में सहायक होगी तथा हमारी सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।



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Saturday, 12 September 2026

क्षेत्र को चमन बनाने के लिए चाहिए सिर्फ रोशनी

 



मुख्यपथ से सिपहां और बम रोड तक चाहिए स्ट्रीट लाइट 

बीमार, तीमारदार, लोगों के लिए आवश्यक रास्ता

नबिटा संवाददाता 

दाउदनगर (औरंगाबाद) । दाउदनगर बाजार से भखरुआं जाने वाले मुख्य पथ स्थित मौला बाग से नहर के किनारे उत्तर और दक्षिण दिशा में अगर स्ट्रीट लाइट लग जाए तो यह इलाका चमन बन जाएगा। फिलहाल नहर के किनारे का यह मार्ग अंधेरे में डूबा हुआ है। लोगों को इस रास्ते आने जाने में डर लगता है, जबकि यह प्रमुख मार्ग है। अपराध की घटनाओं के डर के कारण लोग इस रास्ते अंधेरा में आना-जाना नहीं पसंद करते हैं। दूसरी तरफ सुखा नशा करने वालों से भी डर बना रहता है, जबकि सिपहां मार्ग में नर्सिंग कॉलेज और अनुमंडल अस्पताल जैसे प्रमुख संस्थान है। जहां देर रात लोगों की आवाजाही आवश्यक मजबूरी होती है। इसी रास्ते में प्रखंड सह अंचल समेत कई प्रखंड स्तरीय कार्यालयों का एक दरवाजा भी है। ऐसे में इस रास्ते में स्ट्रीट लाइट लगाए जाने की आवश्यकता महसूस होती है। दूसरी तरफ बम रोड की तरफ भी आबादी बस गई है। इधर आवागमन होते रहता है। अगर इस हिस्से में स्ट्रीट लाइट लगा दी जाए तो लोग भय मुक्त होकर आवागमन कर सकेंगे। सुबह और शाम की तफरीह कर सकेंगे। जिससे लोग स्वास्थ्य लाभ ले सकेंगे। 


योजना लेकर होगा क्षेत्र रौशन- डॉ. प्रकाशचंद्र

इस संबंध में इस संवाददाता ने विधायक डॉ प्रकाश चंद्र को प्रस्ताव दिया तो उन्होंने कहा कि योजना लेकर काम कराया जाएगा। दोनों रास्तों को जगमग रोशन किया जाएगा। संसाधनों की उपलब्धता के आधार पर काम किया जाएगा। 



प्रदूषण मुक्त क्षेत्र, मरीज को जरूरत


नव ज्योति शिक्षा निकेतन के निदेशक नीरज कुमार गुप्ता कहते हैं कि ओबरा विधायक डॉ प्रकाश चंद्र का स्वभाव ऐसा है कि वे इस काम को अवश्य करेंगे। अगर रोशनी लग जाती है तो लोगों के अंदर का डर खत्म हो जाएगा। लोग निर्भीक होकर शाम में घूम सकेंगे। शहर में बहुत बड़ी आबादी ऐसी है जो सुबह की जगह शाम को ही स्वास्थ्य लाभ के लिए तफरीह कर पाती है। इस रास्ते अनुमंडल अस्पताल जाने वाले मरीज और तीमारदार को भी लाभ होगा। 



स्वस्थ समाज बनाने के लिए जरूरी काम 

एलआईसी के अभिकर्ता अवधेश पांडेय कहते हैं कि लोगों को स्वास्थ्य लाभ मिले इसके लिए क्षेत्र का चयन कर उसे विकसित किया जाना आवश्यक है। विधायक अगर इस हिस्से में रोशनी की व्यवस्था कर देते हैं तो लोग सुबह शाम की तफरीह निर्भीक होकर कर पाएंगे। जिससे लोग स्वस्थ होंगे। इससे समाज और शहर दोनों स्वस्थ होगा और इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।

Thursday, 10 September 2026

सत्य निकेतन नहीं, सत्ता-सरकार की इमारत गिरी

 




टेढ़ी पालिटिक्स




दिल्ली में बिल्डिंग नहीं गिरी, भ्रष्टाचार की पोल खुली


डॉ. उपेंद्र कश्यप

वरिष्ठ लेखक व पत्रकार


दिल्ली में सत्य निकेतन बिल्डिंग गिर गई। आधे दर्जन लोगों की मृत्यु हो गई। राजनीति गर्मा गई। प्रशासन भवन मालिक को इसका दोष देकर उसके खिलाफ करवाई करने पर उतारू है। सवाल है कि क्या मकान मालिक ही सिर्फ दोषी है? क्या वास्तव में सत्य निकेतन गिरा है या फिर सत्ता सरकार का इकबाल गिरने का यह परिणाम है? क्या सत्ता प्रतिष्ठान अगर ईमानदारी से कम करे तो ऐसी घटनाएं होती रह सकती हैं? ऐसी घटनाएं पहले भी दर्जनों बार हुई है और आगे भी होंगी और ऐसे ही घटना क्यों सिर्फ बिल्डिंग गिरने से मौतें थोड़े ही होती हैं, भवनों में आग लगने से भी मौतें होती रही हैं। सवाल है कि इसका उपाय क्या है? क्या वास्तव में सत्ता प्रतिष्ठान कभी ऐसी घटनाएं न हो इसका ठोस उपाय करना चाहती हैं? ऐसी घटनाओं पर रोक लगे इसे लेकर क्या सरकारें कभी दृढ़ निश्चायी रही हैं, नहीं। दरअसल यह सत्य निकेतन नाम का एक बिल्डिंग गिरने और उससे कई मौतें हो जाने भर का बस मामला नहीं है। बिल्डिंग गिरती है तब भी भ्रष्टाचार होता है और बिल्डिंग में आग लगती है तब भी भ्रष्टाचार का ही वह परिणाम होता है। भ्रष्टाचार को समझने की जरूरत है। भ्रष्टाचार कैसे इन मौतों की जिम्मेदार होती है? भारत में शायद ही कोई ऐसा उदाहरण है कि जब भवन बन रहा हो और उसके निर्माण में धांधली ना हो। भले ही वह कोई एजेंसी करे, सरकार बनाए या व्यक्तिगत निर्माण ही क्यों ना हो। सक्षम अथॉरिटी से ना तो बिना रिश्वत के नक्शा पास होते हैं ना निर्माण की स्वीकृति मिलती है। न ही भवन बन जाने के बाद ऑडिट करने वाली संस्थाएं भौतिक सत्यापन करती हैं। वह बिना भौतिक सत्यापन किये ही, या कभी-कभी संबंधित भवन में भौतिक रूप से अधिकारी उपस्थित होकर भी सीधे निबंधन नियमितीकरण के लिए रिश्वत मांगते हैं। बिना रिश्वत लिए भवनों का निबंधन नियमितीकरण होता ही नहीं है। अब कोई ईमानदार हो और ऐसा वास्तव में बिना रिश्वत लिए पूरी तरह भौतिक सत्यापन करके एनओसी करता हो तो यह अद्भुत संयोग हो सकता है। भवनों में आग लगने पर मौतें ना हो इसके लिए अग्निशमन विभाग द्वारा जांच कर एक योजना के तहत सुरक्षा उपकरण लगाए जाते हैं, शायद ही कोई ऐसा भवन होगा और अग्निशामालय का अधिकारी जहां रिश्वतखोरी ना होती हो। बिना रिश्वत लिए किसी भवन का अग्निशमन विभाग एनओसी नहीं देता। भवनों में बिना गए, बिना देखे, बिना निरीक्षण किये अग्निशामालय विभाग के अधिकारी मोटी रकम लेकर एनओसी देते हैं, यह खुला सच है। कभी कभी बड़े पैरवी, सामने वाले कि पहुंच व दबंगता के भय भी वजह होती है। लेकिन इस पर नियंत्रण नहीं किया जाता। सरकार इस दिशा में विचार नहीं करती और इसीलिए भवन गिरते हैं। मौतें होती हैं। 


अगर वास्तव में सरकारी चाहती है, चाहे वह केंद्र की सरकार हो या राज्य की, कि किसी भवन में आग लगने से मौत ना हो, कोई भवन ध्वस्त ना हो, उसके गिरने से मौत ना हो तो उसके लिए जिम्मेदारी तय करनी होगी। संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय करनी होगी। ऐसा करना बहुत मुश्किल वाला या बड़ा काम नहीं है, जिसे किया नहीं जा सकता। बस सत्ता प्रतिष्ठानों के दृढ़ निश्चायी होने भर का मामला है। यह कानून होना चाहिए कि अगर कोई भवन ध्वस्त होता है, किसी भवन में आग लगती है, जैसे सत्य निकेतन का ही मामला ले लें बतौर उदाहरण तो, सत्य निकेतन भवन का निर्माण क्या नक्शा के अनुसार हुआ है, क्या उसमें आग लगने, भुकंप आने पर ध्वस्त होने से मौत न हो इसके सुरक्षा उपाय मानक के अनुरूप हैं, इसकी जांच होनी चाहिए। अगर इसमें कमी पाई जाती है तो नक्शा पास करने वाले (अगर वह सेवानिवृत्त हो गया हो तो उसके पेंशन से, उसकी अर्जित संपत्ति से) से, उसके निर्माण में गड़बड़ी होने या रहने के बावजूद भवन को असुरक्षित घोषित न करने वाले जिम्मेदार अधिकारी, अग्नि सुरक्षा के लिए ज़िम्मेदार अधिकारी अर्थात निबंधन नियमितीकरण दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने वाले अधिकारी पर हत्या का मुकदमा दर्ज हो और जितनी भी क्षति हुई उसकी भरपाई उनके वेतन से किया जाए। यह संवैधानिक व्यवस्था होनी चाहिए। जब ऐसा होगा तो तय जानिए भविष्य में कभी भी बिल्डिंग नहीं ध्वस्त होगी, आग नहीं लगेगी, ऐसी घटनाओं में होने वाली मौत टाली जा सकेंगी। रिश्वत लेकर गलत होने के बावजूद सही लिखने, बताने वाले अधिकारी अधिक दोषी हैं, बनिस्पत मकान मालिक के।  जब ऐसे नियम बनेंगे, ऐसी कानूनी व्यवस्था होगी तो पैसा लेना तो छोड़िए मांगेंगे भी नहीं अधिकारी। यह नियम होना चाहिए कि अगर नियमितीकरण के लिए कोई मकान मालिक आवेदन देता है तो उसे 15 दिन या 30 दिन के अंदर (जो भी प्राविधान हो) संबंधित अथॉरिटी को लाइसेंस के नियमितीकरण का मामला निपटाना होगा। कारण बता कर उसे खारिज करे या स्वीकार करे। ऐसा होने पर रिश्वत लेनदेन का मामला कम होगा। अगर कोई रिश्वत के लिए जबरदस्ती कोई कमी निकाले तो उस तरह के अधिकारी के खिलाफ भी सख्त कार्रवाई का प्रावधान होना चाहिए। जब तक अधिकारी ब्लैकमेल करते रहेंगे, पैसे लेकर निबंधनों का नियमितीकरण करते रहेंगे, भवन गलत तरीके से बनते रहेंगे, तब तक ऐसे हादसे होते रहेंगे और मकान मालिकों को पकड़ कर जेल भेज देने से कोई समस्या का समाधान नहीं होगा। यह लिखने का उद्देश्य सही मुद्दे उठाना, सत्ता को स्थिति का भान कराना और भविष्य में ऐसी दुर्घटना ना हो यह तय करवाना है ना कि किसी मकान के मालिक को बचाना या उसका पक्ष रखना।


 (लेखक का निजी विचार है)

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Wednesday, 2 September 2026

रामबिलास सिंह की प्रतिमा लगाने का एमएलए ने दिया भरोसा

 


यदुवंशी संवाद में लोगों ने उठाया मुद्दा

बड़े जलसा के साथ होगी प्रतिमा प्रतिस्थापित

नबिटा संवाददाता

दाउदनगर (औरंगाबाद) ।

भगवान प्रसाद शिवनाथ प्रसाद बीएड कॉलेज में सोमवार को आयोजित यदुवंशी संवाद कार्यक्रम में कई वक्ताओं ने पूर्व मंत्री रहे रामबिलास सिंह की प्रतिमा जिला मुख्यालय में लगाने की मांग की। कहा गया कि उनकी प्रतिमा ‘कारा में बंद’ कर रखा जाना दुर्भाग्यपूर्ण है। ऐसी मांगों पर विधायक डॉ. प्रकाशचंद्र ने आश्वस्त किया कि प्रतिमा पुनर्स्थापित की जाएगी। कार्यक्रम के दौरान पूर्व विधायक सत्यनारायण सिंह ने इस मुद्दे को उठाते हुए विधायक के इशारे पर कहा कि प्रतिमा स्थापित होगी। हम डॉ. प्रकाशचंद्र की ताकत जानते हैं। पीछे हम खड़ा हैं ही। पूर्व अध्यक्ष राजद ओबरा इंदल यादव व पूर्व जिप सदस्य संजय सिंह सोम ने जिला मुख्यालय में रामबिलास सिंह की प्रतिमा न लग सकने का मुद्दा उठाया। श्री सोम ने कहा कि बड़े जलसा के साथ उनकी प्रतिमा लगेगी। यह दुर्भाग्य है कि कारा मंत्री रहे रामबिलास बाबू की प्रतिमा कारा में बंद है। कहा गया कि सर्वाधिक संख्या में यादव समाज के जिला परिषद के सदस्य हैं, इसके बावजूद ऐसी स्थिति होना दुर्भाग्यपूर्ण है। इंदल या

दव ने बताया कि दिशा की बैठक समेत हर अवसर पर डॉ. प्रकाशचंद्र ने इस मुद्दे को उठाया। प्रतिमा स्थापित करना इनका लक्ष्य है। इस आयोजन के बाद स्व.रामबिलास सिंह की प्रतिमा लगने की उम्मीद जगी है। 


क्या है प्रतिमा को ले विवाद


औरंगाबाद का दानी बिगहा पुराना बस स्टैंड सह-व्यावसायिक परिसर है। इसी के एक हिस्से में पहले से सत्येंद्र नारायण सिन्हा पार्क और उनकी प्रतिमा लगी है। 08 जनवरी 2023

 को जिला परिषद की सामान्य बैठक में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित हुआ था। 06 नवंबर 2024 को समर्थकों ने परिसर में बने फाउंडेशन पर रामबिलास बाबू की आदमकद प्रतिमा स्थापित कर दी।   0 8 नवंबर 2024 की रात तत्कालीन उप विकास आयुक्त अभ्येंद्र मोहन सिंह के आदेश पर प्रशासन ने प्रतिमा को हटाकर नगर थाना में रखवा दिया।   

12 नवंबर 2024 को जिला पार्षदों और "विरासत बचाओ संघर्ष परिषद" ने प्रेस वार्ता कर 15 दिन में प्रतिमा यथास्थान लगाने का अल्टीमेटम दिया। लेकिन मामला लटका ही रह गया। 




जानिए कौन थे रामविलास सिंह 

स्व.राम बिलास सिंह 1967, 1972, 1977, 1985 और 1990 में विधायक बने। वह दाउदनगर हसपुरा और दाऊद नगर ओबरा विधानसभा क्षेत्र से विधायक रहे। तीन बार मंत्री बने। वे समाजवादी नेता रहे। उन्होंने इस संवाददाता से 11 अप्रैल 2009 को बातचीत में बताया था कि अपना पहला चुनाव मात्र 3000 रुपये में लड़े थे और 1990 के चुनाव में मात्र छः से सात हजार रुपये खर्च कर विधायक बने थे। उन्होंने कहा था कि सामाजिक एवं आर्थिक सुधार के बिना समाज नहीं बदल सकता।