उपेंद्र कुशवाहा के हारने की वजह बन थे पवन सिंह
राजाराम सिंह के दावे के बाद कर काराकाट चर्चा में
डॉ.उपेंद्र कश्यप
नबिटा संवाददाता
दाउदनगर (औरंगाबाद) । 2024 के लोकसभा चुनाव में अपनी जीत पर सांसद राजाराम सिंह ने दावा किया है कि यदि पवन सिंह चुनाव नहीं लड़ते तो उनकी जीत का अंतर दो लाख वोटों का होता। तब वे चुनाव आयोग के आंकड़े के अनुसार 105858 वोटों के अंतर से जीते थे। उन्होंने अब कहा है कि-जिस दिन टिकट मिला, उसी दिन जीत तय हो गई थी। काराकाट में महागठबंधन की जमीन पहले से मजबूत थी। इंडिया गठबंधन की लहर थी। सामाजिक न्याय से जुड़े आंदोलनों का भी जिक्र उन्होंने अपने नए दावे के साथ किया है। यह उनका राजनीतिक दावा है। चुनावी राजनीतिक प्रेक्षक हकीकत इससे अलग मानते हैं। पश्चिम बंगाल में प्रत्याशी घोषित होने के बावजूद चुनाव लड़ने से इनकार कर पवन सिंह जब काराकाट चुनाव लड़ने आए तभी यह मान लिया गया था कि अब यहां से भाकपा माले के प्रत्याशी की जीत तय है। किसी को कोई आशंका नहीं थी। इसके अलावा उपेंद्र कुशवाहा से नाराजगी चरम पर थी, जिसे वे समेटते, समेटते भी समेट न सके थे। अन्यथा इसके पहले के सभी चुनाव राजद या राजद के गठबंधन का प्रत्याशी चुनाव हारता रहा है। कुल चार चुनावों में पहली बार गैर भाजपा समर्थित प्रत्याशी चुनाव जीत सका है।
इतिहास में तथ्यों का विश्लेषण राजग के साथ
2008 में परिसीमन के बाद काराकाट नाम से नया लोकसभा क्षेत्र अस्तित्व में आया था। पहला चुनाव वर्ष 2009 में हुआ था। इसके अलावा 2014 और 2019 में यहां से भाजपा के साथ गठबंधन वाले दल का ही प्रत्याशी जीतते रहा है। चाहे वह महाबली सिंह हों या उपेंद्र कुशवाहा। वर्ष 2009 में जदयू-भाजपा प्रत्याशी महाबली सिंह 196946 वोट लाकर जीते थे। जबकि कांति सिंह को 176463 वोट मिली थी। यानी 20483 वोट का अंतर था। तब भाकपा माले प्रत्याशी राजाराम सिंह को 37493 वोट मिला था। यानी राजद और माले का वोट जोड़ दें तो विजेता से मात्र 17010 वोट अधिक।
■ 2014 में जब चुनाव हुआ तब रालोसपा भाजपा के साथ थी। उपेंद्र कुशवाहा यहां 105241 वोट से राजद की कांति सिंह को हराने में सफल रहे। तब महाबली सिंह जदयू के प्रत्याशी थे। महत्वपूर्ण है कि तब नरेंद्र मोदी को लोकसभा चुनाव का प्रमुख चेहरा बनाए जाने के कारण भाजपा जदयू का गठबंधन टूट गया था। जदयू के प्रत्याशी महाबली सिंह को तब मात्र 76700 वोट मिला था। जबकि माले के राजा राम सिंह को 32686 वोट। राजद और माले का वोट अगर एक साथ जोड़ दें तब भी विजेता से 72555 वोट काम आया था। लेकिन अगर जदयू के महाबली सिंह को मिला 76709 वोट राजग के साथ जोड़ दें, जो स्वाभाविक है, क्योंकि अगर गठबन्धन न टूटता तो दोनों के वोटर एक साथ जाते, तब जीत का अंतर 149264 हो जाता।
■ इसी तरह 2019 का चुनाव अगर देखें तो भाजपा और जदयू एक साथ हैं। महाबली सिंह काराकाट लोक सभा चुनाव के अब तक के इतिहास का सर्वाधिक 45.86 प्रतिशत मत लाकर 855442 वोट से जीत जाते हैं। तब आरएलएसपी, राजद और कांग्रेस का गठबंधन था। राजाराम सिंह भाकपा माले के प्रत्याशी थे। उनको 24932 वोट मिला था। राजद, कांग्रेस और भाकपा माले के वोट अगर जोड़ दें तब भी विजेता से 60610 वोट कम होता है।
■ इसी तरह 2024 का चुनाव देखें तो राजद, कांग्रेस के साथ भाकपा माले का गठबंधन होता है, जो 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में ही हो चुका था। इसके प्रत्याशी राजाराम सिंह को 380581 वोट मिलता है। निर्दलीय पवन सिंह को 274723 यानी मात्र 105858 वोट का दोनों में अंतर है। जबकि उपेंद्र कुशवाहा जो राष्ट्रीय लोक मोर्चा, भाजपा व जदयू के संयुक्त प्रत्याशी थे, उनको 253876 वोट मिला था। पवन सिंह और उपेंद्र कुशवाहा को मिले वोट जोड़ दें तो राजाराम सिंह को मिले वोट से 148019 वोट अधिक है।
इसलिए आंकड़े तो यही बताते हैं कि अगर पवन सिंह ना होते तो राजाराम सिंह संसद नहीं पहुंच पाते। बहरहाल राजनीति में सभी के अपने दावे होते हैं। आंकड़ों का विश्लेषण राजनीतिक दलों के दावे के अनुसार ही हो, यह आवश्यक नहीं है।
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