Tuesday, 22 April 2014

‘लव’ की सजा में हुआ ‘मैरेज’



कन्या बदल की जबरन शादी
शादी की दो घटनाएं, समाज के दो चेहरे
संवाद सहयोगी, दाउदनगर(औरंगाबाद) शादी सामाजिक व्यवस्था है। परिवार को व्यवस्थित करने और रिश्ते बनाने के लिए एक सामाजिक नियम। समाज के बनाए औपचारिक दायरे से बाहर प्रेम पनपता है। प्रेम चूंकि मान्य नहीं है सो उसकी परिणति ‘आनर किलिंग’ के रुप में सामाजिक बुराई का प्रस्फुटन है। दूसरा चेहरा दिखाई गई लडकी को बदल कर जबरन विवाह कर देने का भी है। जिसके परिणाम स्वरुप दांपत्य जीवन दुखदायी होता है। शादी और समाज से जुडी दो तस्वीर रविवार और सोमवार की रात दिखी। ओबरा थाना के पूर्णाडीह गम्हरपुरा के रामपुकार सिंह का पुत्र 22 वर्षीय शंभु कुमार सिमराबाग में सोमवार की रात झलकदेव सिंह के घर था। गांव वाले उसे मारने पीटने पर उतारु हो गए। ग्रामीण मुखिया ललिता देवी के पति डा.राजकुमार सिंह को सूचना दिए। समझौते का प्रयास चला। लेख्य प्रमाणक के समक्ष 100 रुपए के स्टांप पेपर पर दोनों की शादी हो गई। फिर सूर्य मंदिर मौलाबाग में परिजनों, रिश्तेदारों की उपस्थिति में मांग में सिन्दूर भरा गया। सूर्य मंदिर विकास समिति से रसीद काटे गए। दोनों राजी खुशी अपने घर चले गए। लेकिन हर बार लव अफेयर में ऐसी सफलता नहीं मिलती। आनर किलिंग नहीं सजा-ए-शादी मिली। खैर..। समाज का दूसरा रूप एकौनी में रविवार की रात दिखा जिसकी जितनी निंदा करें कम होगी। चर्चा के अनुसार वर पक्ष को सुन्दर कन्या दिखाकर शादी तय की गई। वर पक्ष के गांव पहुंचने का मार्ग गड्ढा भर कर बनाया गया था। बारात पहुंच गई। जयमाला के रस्म के वक्त वर ने जैसे ही कन्या को देखा विरोध शुरु कर दिया। बारातियों को जमकर पीटा गया। बेचारे भाग गए। लेकिन भागना भी पैदल पडा क्योंकि रास्ते में भर गया मलवा रात में ही खाली कर दिया गया था ताकि कोई वाहन न निकल सके। वर को बान्धकर घर में रखकर जबरन शादी करा दी गई। वर पक्ष थाने इसलिए नहीं गया कि मंगलवार की रात उसके घर बेटी की बारात आनी है। ऐसे में क्या दांपत्य जीवन सुखमय रहेगा? अगर नहीं तो फिर दोष किसका है? समाज ऐसे मामलों की रोक के लिए क्या करता है? कुछ नहीं, नतीज ऐसे जबरिया या धोखे से शादी करने वालों का मनोबल बढ जाता है।

पंखा चलेगा या फिर लालटेन जलेगा ?


                    काराकाट के ओबरा विस क्षेत्र का आकलन
फोटो-ओबरा विधान सभा क्षेत्र का मानचित्र

                             हुआ खूब जातीय और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण
मुद्दा विकास नहीं सिर्फ नमो नमो
उपेन्द्र कश्यप 
 काराकाट लोकसभा क्षेत्र के ओबरा विधानसभा क्षेत्र में पंखा चलेगा या लालटेन जलेगा? यही एक मात्र प्रश्न मतदान बाद की फिजा में तैर रहा है। बाकी तमाम दल चर्चा से ही गायब हैं। इलाके में किसी मुद्दे की कोई चर्चा नहीं रही। मतदान सिर्फ जातीय खांचें में सांप्रदायिक विभाजन पर हुआ। दो जाति जिस पक्ष में रहीं, बाकी उसके खिलाफ रहीं या उसके साथ नहीं रहीं। जदयू के सांसद महाबली सिंह खुद मुद्दा बने रहे। इनके समर्थन में सिर्फ दलीय या व्यक्तिगत निष्ठा वाले ही सक्रिय रह गए थे। पार्टी का एक धडा भी साथ नहीं था तो जिम्मेदार खुद सांसद और इनके आशीर्वाद प्राप्त जनाधारविहीन नेता ही थे। जो या तो जातीवाद कर बदनाम हुए या फिर सांसद को कई समूहों से दूर रखने की राजनीतिक अदूरदर्शिता दिखाई। ऐसे में सांसद प्रतिनिधि अधिक दोषी थे। बाकी प्रत्याशी की चर्चा तक नहीं है। रालोसपा के उपेंद्र कुशवाहा को भाजपा का साथ था। पंखा नया चुनाव चिन्ह था। बहुतों को ईवीएम में यह नजर नहीं आया क्योंकि वे कमल खोज रहे थे। ऐसी चर्चा है। ऐसे वोटर तीर का बटन दबा गए हैं। पंखा की खासियत नमो से शुरु होती है और नमो पर खत्म हो जाती है। कोई किसी को सुनने को तैयार नहीं। कुशवाहा महाबली से भी अधिक नाराज करेंगे इस डर, आशंका के बावजूद उन्हें काफी वोट मिला है। कोई जाति ऐसी नहीं जिससे राजग को वोट नहीं मिला हो। क्योंकि मुद्दा सिर्फ मोदी थे, वोटरों का एक बडा हिस्सा या तो इसके साथ था या इसके खिलाफ। खिलाफ वाले ध्रुव का नेतृत्व राजद-कांग्रेस गठबन्धन के प्रत्याशी डा.कांति सिंह कर रहे थे। इनके साथ राजद का माय समीकरण पुरी तरह एकजुट दिखा। अन्य जातियों से कम ही वोट मिले हैं। हालांकि एक नेता ने कहा भी था कि दूसरी जातियों की जरुरत भी नहीं है। शायद इसी समझ के तहत दूसरी जातियों के बीच संपर्क भी ना के बराबर ही किया गया। मंच से राजद सुप्रिमो लालू प्रसाद ने कहा भी था कि-अब 36 परसेंट हैं कोई मुकाबला में नहीं है। इसी मंच से डा.एजाज अली के ‘तिलक तराजु और तलवार’ वाले बयान से इस जाति विशेष से जुडे लोग विदक गए। इस समुदाय का जो ‘कुशवाहा’ फैक्टर के कारण नाराज वोट जो राजद के पाले में जाता वह सीधे राजग के पाले में चला गया। राजद का एक सकारात्मक मजबूत पक्ष रहा कि उपेन्द्र कुशवाहा को हराने की गरज में जदयू दरक गया। नीतिश कुमार की जाति का वोट भी इस उम्मीद में राजद को मिला कि इससे राजग हार जाएगा। चर्चा रही कि कुशवाह जीतेंगे तो नीतीश की मुखर खिलाफत करेंगे। जातीय राजनीति की जरुरत पुरी करने का वे माध्यम बन सकते हैं। पुरे चुनाव के विश्लेषण करने वाले इन्हीं फैक्टर के इर्द गिर्द हैं। अब जीत किसकी होगी यह वक्त बताएगा। फिलहाल गर्मी काफी बढती जा रही है। गर्मी में पंखे की जरुरत है, इस जुमले को हवा मिली थी। लहर के बीच पंखे की हवा सुकून देती है। रात्रि में जब बिजली नहीं रहती है तो ललटेन की जरुरत पडती है। दोनों पक्ष मिठाइयां जीत की खुशी में बांट चुके हैं। असली खुशी तो किसी एक के हिस्से ही आएगी।    
गोह के 42 बूथों पर बंफर वोटिंग
फोटो-गोह विधान सभा क्षेत्र का मानचित्र
हुआ 60 फिसदी से अधिक मतदान
संवाद सहयोगी, दाउदनगर(औरंगाबाद) काराकाट लोकसभा क्षेत्र के गोह विधान सभा क्षेत्र में 42 ऐसे बूथ हैं जहां 60 प्रतिशत से अधिक मतदान हुआ है। दिलावरपुर में 992 में 608, महुली में 396 में 307, चांदी में 649 में 467, मलहारा द्क्षिणी भाग में 825 में 540, नगौली में 383 मे 283, देवहरा विहटा में 854 में 588, हैवसपुर में1157 में728, मउवारी में 917 में 596, दुर्गापुर में 473 में 343, चौराही पश्चिमी में 831 में 519, बाघाकोल में 698 में 542, अल्पा में 985 में 603, ईटवां वजीरपुर में 777 में 490, मुंजहर में 843 में 615, सोनवर्षा में 586 में 361, दुलार बिगहा में 862 में 534, बख्तियारपुर में 808 में 507, हरिगांव में 588 में 376, मियांपुर में 593 में 410, तेयाप पूर्वी में 978 में 637, इब्राहिमपुर में 635 में 465, अहियापुर में 487 में 301, दाउदपुर में 629 में 471, कैथी शिरो में 605 में 515, मही में 451 में 367, घाटो में 750 में 456, असेयास में 399 में 307, लोहडी बांया में 624 में 454, कैथी बेनी में 1149 में 695, घेजना में 694 में 453, जमुआईन में 833 में 512, सोहलपुरा में 586 में 449, रामपुर में 424 में 279, पेमा में 978 में 588, बन्देया में 747 में 495, रुकुन्दी में 713 में 443, प्रतापपुर में 490 में 357, खरौना बुजुर्ग में 837 में 568, भारतीपुर में 1354 में 915, पौथु दक्षिणी भाग में 816 में 502 तथा बरुणा में 1380 में 1161 मत पडे।
साथ की 1 बाक्स खबर................
शांतिपूर्ण बूथ कब्जे का है फल
संवाद सहयोगी, दाउदनगर(औरंगाबाद) गोह सामाजिक और जातीय संघर्ष का इलाका है। किसी हिस्से में नक्सकियों की तूती बोलती थी तो किसी हिस्से में सामंती अकड की दुर्गन्ध उठती रही है। कई बूथ ऐसे हैं जो घोर नक्सली इलाके में हैं। कई हिस्से ऐसे रहे हैं जहां कमजोर तबके को वोट देने का अधिकार बडों की मेहरबानी पर निर्भर रहा है। इस स्थिति में बदलाव आया है। सामाजिक समरसता बढ रही है लेकिन अब भी कई इलाकों में यह तीखा है। राजद नेता राजेश कुमार उर्फ मंटु सिंह कहते हैं कि कई इलाकों में अब भी बहुमत वाले कमजोर को वोट नहीं देने देते हैं। अगडा हो या पिछडा जो जिस बूथ पर बहुमत में है उसने शांतिपूर्ण समझौते के तहत बोगस मतदान कर मत प्रतिशत को बढा दिया है। खासकर जिन बूथों पर 70 फिसदी से अधिक मत पडे हैं।


Friday, 18 April 2014

..जहां मृत मछलियों को मिलता है कफन



बरई-सिमराबाग के बीच है चमत्कारी पोखरा
उपेन्द्र कश्यप

 आस्था के कारण ही इंसान पत्थर पूजता है। इसके आगे न कोई तर्क चलता है न बहस की गुंजाईश बचती है। बिरई से चौरी जाने के क्रम में सिमराबाग से पहले एक पोखरा है। धार्मिक महत्व है इसका। चौरी की मुखिया ललिता देवी के पति डा.राजकुमार सिंह एवं भाजपा के पंचायत अध्यक्ष सत्येंद्र कुमार शर्मा ने बताया कि इस पोखरा से मछली नहीं मारी जाती है। जब कोई मछली मर जाती है तो उसको कफन दिया जाता है। दफनाया जाता है। यही गांव की परंपरा है। बुजुर्ग छोटेनारायण शर्मा एवं कमलेश यादव ने भी बताया कि इस पोखरा की यही विशेषता है। पोखरा 70 से 80 साल पुराना बताया जा रहा है। इनके अनुसार सिमराबाग के सूरदास नागा बाबा यहां रहते थे। वे जन्मान्ध थे। भूमिगत कुटिया में रहते थे। इसी पोखरा से मछली मारने वाले एक व्यक्ति को पकड लिया था। यह उनका प्रताप था। पोखरा से ग्रामीणों की याद में कोई मछली नहीं मारता। अगर कोई मछली मर जाती है तो लोग उसे कफन देते हैं। पास में ही बाबा की समाधिस्थल है। अब जब यहां सूर्य मंदिर बन गया है और महायज्ञ की तैयारी चल रही है तो पोखरा का भी भाग्योदय हो रहा है। मुखिया ललिता देवी मनरेगा की योजना से करीब पांच लाख की राशि से घाट का निर्माण दो तरफ करा रही हैं। दो तरफ बिना सीढी का पक्का निर्माण हो रहा है। प्रतिनिधि डा.राजकुमार सिंह ने बताया कि पोखरा के चारों तरफ खडांजा लगाया जा रहा है। यहां बैठने के लिए पक्का निर्माण समेत सौन्दर्यीकरण के कई कार्य बाद में किए जाएंगे।  

क्या क्या ढंकु, सब ढंकेगा तो कैसा दिखेगा भारत


      क्या क्या ढंकु, सब ढंकेगा तो कैसा दिखेगा भारत
(सन्दर्भ-बसपा का हाथी ढंकने का चुनाव आयोग का आदेश)

उपेन्द्र कश्यप 
टीवी तंग करता है कभी-कभी। मन उचट जाता है। कोई ऐसी खबर चलती है और दिमाग की तरंगें
हिलोरें मारने लगती हैं। अब इसे क्या कहें कि निर्वाचन आयोग के आदेश पर उत्तर प्रदेश के लखनउ में बने बौद्ध स्मारक स्थल में लगे हाथियों को ढंका गया। भाई लोग इसमें बहुजन दृष्टिकोण मत खोजिएगा। दायरा बहुत बडा है। रविदास मायावती से लेकर पंडित अटल बिहारी वाजपेयी तक। एक निश्चित दायरे में चाहरदीवारी के भीतर पत्थर से बना हाथी सडक पर आकर लोगों से गुहार करता है कि तुम वोट मुझे दो। इसलिए यह उपाय किया गया। हालांकि इसे अब भी देखकर समझने वाले अधिक स्पस्ट हाथी देख सकते हैं। तो क्या हर मंच पर नेता चाहे किसी दल का हो वह हाथ ( कहें-पंजा) हिला कर किसी का अभिवादन करता है, अपने प्रत्याशी के पक्ष में मतदान करने की अपील करता है तो परोक्ष रुप से वह भी कांग्रेस का प्रचार करता है? अभिवादन पर खुद रोक लगा लेना चाहिए दलीय नेताओं को, भले आयोग ऐसा करने का नियम बनाए या नहीं। कहते हैं-किसी चीज को देखने से मना करने पर उसे देखने की ललक कई सौ गुणा बढ जाती है। यह बात हर मामले में लागू होती है। याद होगा इसी तरह स्वर्णिम चतुर्भूज योजना के तहत बने देश के उच्च पथों पर बने किलोमीटर बताने वाले बोर्डों, द्वारों पर लगे प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की तस्वीरों को ढंका गया था। नतीजा जब निकला तो राजग की सरकार केंद्र से चली गई। वैसे एक सच यह भी था कि स्वर्णिम चतुर्भूज योजना के तहत बनी सडक के किनारे के लोकसभा सीटों में अधिकांश पर भाजपा हार गई थी। जब आयोग का फैसला सुना तो खुद से सवाल पूछा कि अगर कभी मैं निर्वाचन आयोग का प्रधान बना तो अपनी ‘प्रधानी’ अपने पूर्ववर्ती से अधिक ऐतिहासिक बनाने के लिए क्या क्या नया करना पडेगा? (वैसे मैं कुछ भी बन नहीं सकता) मन ने कहा-एक बार गोरा काला सिनेमा देखा था। उसमें सुपर स्टार राजेन्द्र कुमार जी डबल रोल में थे। अब तो हर नेता अमिताभ के सात-सात रोल वाले से भी अधिक रोल एक साथ ही जीता है जी। तो हां--। राजेन्द्र कुमार की मां अपने मरते बेटे (फिल्म में) से कहती है –बेटा जो दिल करने को कहे और दिमाग मना करे उसे करना, और जो दिमाग कहे पर दिल मना करे तो उसे कभी मत करना। मुझे मेरा दिल कह रहा है कि अगर मैं बना तो सबसे पहले सबको आचार संहिता लागू होते ही अपने ‘पंजे’ को मुट्ठी बना देने का आदेश दुंगा। ताकि कहीं ‘पंजा’ ना दिखे। उसे हटाने के लिए मुट्ठी यानी बल चाहिए। फिर देश के सारे तालाब ढंकवा दुंगा। ताकि ‘कमल’ नहीं दिखे। आदिवासियों से उसके अस्त्र ‘तीर’ छीन लुंगा। किसी को ‘साईकिल’ पर सवारी करने की इजाजत नहीं होगी। सभी ‘लालटेन’ उत्पादकों को अपने लालटेन वापस ले लेने का आदेश होगा या कहीं ‘लालटेन’ नहीं दिखे यह इंतजाम उसे करना होगा। ‘पंखा’ बनाने पर रोक होगी। बेचने और उसका हवा खाने पर रोक लगेगी। जब सब पर रोक लग जाएगी तो अंत में ‘तृण मूल’ यानी घास को कवर कर दिया जाएगा जैसे स्टेडियम में बारिश के पानी से बचाने को कवर लगाया जाता है। अरे भाई उसके बाद दुनिया कैसी लगेगी? यह विचार करना मेरा (आयोग) का काम नहीं है। यह समझे नेता कि ऐसी स्थिति से जनता को किस तरह की परेशानी होगी? वह कैसे अपना जीवन चलाएगी?

Thursday, 17 April 2014

ना ना बेहोश नहीं हुए तो केस खत्म


ना ना बेहोश नहीं
हुए तो केस खत्म
उपेन्द्र कश्यप 
यह न्यायपालिका का एक अंग है। जी हां, सर्वाधिक “भ्रष्टाचार मुक्त” संस्थान? मैं भी किसी काम को ले समय काटने के लिए एक न्यायिक दंडाधिकारी की अदालत में बैठा हूं। पीपी अपनी कुर्सी पर डटा हुआ है। लोग आते हैं, काम बताते हैं, पैसे देते और चले जाते हैं। हर काम के लिए फीस तय है। इसी बीच दो युवा आते हैं। पीपी से बात किए तो उसने रुपए 120 देने को कहा। युवा 20 रुपए दिया, और बोला-अब पैसा नहीं है। पीपी-ऐसे थोडे काम होता है? और दो। युवा और 20 रुपए देता है। पीपी और मांगता है। युवक दूसरे युवक से पैसा मांगता है। फिर कुल 60 रुपए देता है। और कहता है कि अब नहीं दे सकेंगे- मात्र 20 रुपए बचा है, घर जाना है। सौदा 120 बनाम 20 से शुरु हुआ और 60 पर खत्म हो गया। मैं दंग था-किसी बाज़ार की तरह की बारगेनिंग देख कर। तभी एक गरीब फटीहलवा (काल्पनिक नाम) लाचार और अनपढ (खुद बताया भी) फटेहाल अवस्था में कटी और टूटी चप्पल, गंदा, फटा कपडा पहने अपने केस में गवाही देने आता है। बोला-अपने तो फंसा देलीं। उ 20 रुपया के चार्ज (मोबाइल रिचार्ज) करेला देले हथी। के? उ साहेब (एक कर्मी)। तो हम का करिव। बैठअ..। पैसा दअ। बढियां से गवाही दिवा देबवअ। बोला कहां मरले हलव। शरीर पर। अरे शरीर पर कने। इशारा कर बताता है। हा तो का होलवअ। मरलई से बिहोश हो गैलिअंइ। अरे सब गोबर कर देबअ। बेहोश मत होईहअ। ‘होइये गैल हलिअइ तो?’ ,,तो बेहोश ना होए ला हव। ना तो केस खत्म हो जतवअ। मने बेहोश हो गेल तो तु देखला कैसे? आंए- ओकर वकील खूब पुछतव। सीधे कहिअ कि फलना फलना के देखले हलिअंइ। सजा हव दिलवावेला ना। हां तो सजा तो दिलवावेला हइए हइ। मन अपने मन के अंदर कुछ तलाश रहा था। उधेडबुन कर रहा था। वाकई कितना अजीब है न्याय का मंदिर? उठा तो दूसरे हिस्से में चला गया। एक टोपी पहने नेता मिले, झाडु वाले। पूछा कि आप से तो इमानदार यहां कोई वकील  नहीं होगा? क्या आप से बिना घुस लिए सब काम कर देते हैं? एक अधेड कर्मी ने कहा- मंदिर में आके और चढावा नहीं चढाएंगे? यह कैसे हो सकता है? वाकई मथुरा के एक मंदिर में संकल्प कराने के बहाने जबरन प्रसाद लेने को कहा जाता है। इस समय वही दृष्य याद आ गया कि वाकई यह मंदिर भी तो हिन्दुस्तानी ही है। समझ गया था कि बिना चढावा कहीं कोई काम नहीं होने वाला।

Wednesday, 16 April 2014

दाउद खां का ‘किला’ 1673 में बनकर हुआ तैयार


                    दाउद खां का किला’ 1673 में बनकर हुआ तैयार

*किला नहीं यह सैनिक छावनी है
*ठहरे थे 4000 जाट और 3000 सवार सिपाही
*दस साल लगे निर्माण में
*341 साल हुआ शहर को बसे
                                     उपेन्द्र कश्यप
पुराना शहर में स्थित दाउद खां का किला वास्तव में किला नहीं सैनिक छावनी है। इसे बनाने में दस साल लगे। दाउद खां बादशाह नहीं थे कि उनका किला होता। राजस्व को लूटने से बचाने के लिए वस्तुत: यहां सैनिक छावनी बनायी गयी थी। स्थापत्य सूमेल भी यही बताता है। किलेके अंदर सिर्फ अस्तबल है, तोप चलाने के लिए चारों तरफ की दीवारों की ऊंचाई पर जगह बनाये गये हैं। 1दाउद खां ने बड़े करीने से शहर को बसाया था। साल 1663 में पलामू फतह के बाद इसका निर्माण कार्य प्रारंभ हुआ था जो दस साल बाद वर्ष 1673 में बनकर तैयार हुआ। तारीख-ए-दाउदिया के अनुसार बाहर से हर कौम और जातियों को लाकर बसाया गया। कहा जाता है कि कथित लड़ाका जातियों को दाउद खां ने नहीं बुलाया-बसाया। फिर सवाल उठता है कि दाउदनगर में जाटटोली का वजूद कैसे है? जाट लड़ाका जाति मानी जाती है। किवंदति है कि किले के निर्माण के समय यहां की आबादी रात्रि में निर्माण ध्वस्त कर देती थी, इसलिए जाट जाति को बसाया गया। दाउद खां जिस बड़ी फौज का नेतृत्व करते हुए यहां ठहरे थे, उसमें 4000 जाट और 3000 सवार सिपाही थे। इसलिए यहां जाट टोली का वजूद चौंकाता नहीं है। जिक्रे आबादी कस्बा दाऊदनगरमें इस जाति का जिक्र ही नहीं है । पटवा, तांती को भी तिरहुत की ओर से कहते हैं, दाउद खां ने ही बुलाया था। संभव है, दाउद के बाद के शख्सियतों ने इन्हें बसाया हो, जिनकी चर्चा तारीखे-दाउदिया में छूट गया हो। दाउद खां ने अपने नगर की सुरक्षा के लिए बड़े कमाल की तरकीब अमल में लाया था। शहर के चारों ओर चार बड़े फाटक बनाया। अजीमाबाद या पटना का फाटक, अजगैब का फाटक तथा गाजी मियां का फाटक अपना वजूद खो चूका है। सिर्फ छत्तर दरवाजा का वजूद आज कायम है। इन चारों दरवाजों से आगे बड़े-बड़े गहरे गड्ढे खुदे हुए थे, ताकि कोई दुश्मन सहजता से पुलिस छावनी पर हमला न कर सके। तारीखे दाउदिया कहता है कि नबीर-ए-दाउद खां नवाब अहमद खान ने अहमदगंज बसाया, जिसे वर्तमान में नया शहर कहा जाता है। पुस्तक बताती है तब यहां के जंगलों में सांभर, नीलगाय, जंगली सुअर पाये जाते थे, हिरण भी कभी-कभी मिलते थे। वर्तमान में अब न जंगल हैं, न ही जंगली जानवर, फिर शिकार खेलने वाला भी कैसे रहेगा। दाउद खां ने दाऊदनगर को बसाने के बाद एक राजपूत को भी राजा बनाया। 1‘हालात-ए-मुख्तसर राजा तरारअध्याय में कहा गया है कि दाउद खां ने एक राजपूत बाबू भूरकुण्डा को मुसलमान बनाकर उसे अबूतालिब नाम दिया और परगना अंछा, गोह एवं मनौरा में से एक चौथाई देकर उसे राजा तरार बनाया। अब तरार में खंडहर भी नहीं बचा। लगभग तीस फीट ऊंचा टीला राजा तरारके अतीत को खुद में छुपा लिया है। राजा तरार की काफी जमीनें अतिक्रमण कर ली गयी हैं। इसे मुक्त कराना और टीले की खुदाई कराने की आवश्यकता है। दाउदनगर में दाउद खां की पुलिस छावनी पर आज उपले ठोके जा रहे है, यह शर्म की बात है। हम अपने गौरवशाली अतीत को अपने ही हाथों जमींदोज करने पर आखिर क्यों तुले हुए हैं? नालियां इसी किलेमें बहायी जा रही हैं, रास्ते बना लिये गये, अतिक्रमण अपनी हदें पार कर रहा है, इस सब के लिए हमारे अलावा कोई दूसरा जिम्मेवार नहीं है। हमें अपने अतीत को बचाना होगा, अन्यथा आने वाली पीढ़ी इसके लिए हमें दोषी ठहराएगी। जब जगा, तभी सबेरापर अमल करते हुए हमें नयी पहल करनी होगी।

Tuesday, 15 April 2014

                                                  सोन तुम हो
(यह कविता साभार मैंने फेसबुक से अपने अग्रज उपेन्द्र मिश्रा के जरिए प्राप्त किया है)

सोन तुम रहते सदा-
निकल अमरकंटक से सुदूर,
बहते मुझी में हो।
चाहता हूं-
पोंछ दूं,
रगड़कर निशान तेरे,
बदन से मेरे,
मगर तेरी धार,
रहती सदा,
बहती मुझी में।
सोन तुम कहां हो-
देश या विदेश में,
जहां भी रहता,
तेरी धार की शांत शोर,
बजती मुझी में है।
खेलने तेरी ही धार में-
तब तलक,
बसा है मेरी रगों में,
सोचता हूं,
अंतिम यात्रा भी हो खत्म तुम्हीं में।
देखता हूं-
निर्निमेश,
तुम हो ख़ामोश,
शांत और सिकुड़े हुए भी,
मुझे देना बिछौना राख को,
जब मैं आउं तुम्हारे ठौर।

प्रस्तुतकर्ता Kaushlendra Prapanna