Saturday, 15 November 2025

12322 मत मिला एनडीए को नप क्षेत्र में



 4226 मतों से शहर जीत सके प्रकाश चंद्र

8096 मत ले सका महागठबंधन

सबसे अधिक चौंकाया तौफीक आलम ने

जनसुराज पार्टी और बसपा से अधिक वोट निर्दलीय को 

उपेंद्र कश्यप, जागरण ● दाउदनगर (औरंगाबाद) : दाउदनगर शहर में कुल 41 मतदान केंद्र पर 22758 मतदाताओं ने वोट डाले। जबकि कुल मतदाताओं की संख्या 39164 है। शहर में प्राय: एनडीए ही जीतते रहा है। लेकिन इस बार एनडीए और महागठबंधन के बीच का फ़ासला संतोषजनक नहीं माना जा रहा। एनडीए समर्थित लोक जनशक्ति पार्टी रामविलास के प्रत्याशी डा. प्रकाश चंद्र को 12322 वोट मिला, जबकि महागठबंधन समर्थित राजद के प्रत्याशी ऋषि कुमार को 8096 मत। दोनों के बीच 4226 मतों का अंतर रहा। राजग समर्थकों के अनुसार यह फासला और अधिक होने का अनुमान था। बहरहाल इस दूसरे और तीसरे स्थान पर रहने वाले प्रत्याशियों से अधिक मोहम्मद तौफीक आलम ने चौंकाया। इस निर्दलीय प्रत्याशी को 505 मत मिला और यह तीसरा स्थान पर है। उर्मिला गैस एजेंसी में कार्यरत यह ऐसा प्रत्याशी है जिसने नामांकन के बाद किसी व्यक्ति को अपने हिस्से मत देने के लिए भी नहीं कहा। कोई प्रचार नहीं किया। इसके बावजूद इसे इतना मत मिला। इसे अपने-अपने हिसाब से लोग देख रहे हैं। तौफीक को इतना मत मिलना आश्चर्जनक लगता है। यह जन सुराज पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के प्रत्याशियों को सदमे में डालने वाला है। जनसुरज पार्टी के सुप्रीमो प्रशांत किशोर ने प्रमोद सिंह चौक से लेकर भखरुआं तक रोड शो किया था। इसके बावजूद उनके प्रत्याशी सुधीर कुमार शर्मा को मात्र 404 मत प्राप्त हुआ। शहर में रोड शो करने वाले बसपा के प्रत्याशी संजय कुमार को मात्र 245 मत प्राप्त हुआ। चौंकाने वाली दूसरी बात यह रही कि ओबरा से निर्दलीय विधायक रहे सोम प्रकाश को मात्र 80 मत मिला और वे 11 वें स्थान पर चले गए। जबकि रामराज यादव (निर्दलीय-247), हरि संत कुमार (निर्दलीय-147), 

प्रतिमा कुमारी (राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी-122), शिवनाथ साव (निर्दलीय-121) और बृज किशोर सिंह (निर्दलीय-101) को कोई जानता तक नहीं और न ही इन्होंने कभी प्रचार किया। इसके बावजूद सोम प्रकाश से अधिक मत लाने में सफल रहे। यह परिणाम बताता है कि शहर में राजद अपना प्रभाव बढ़ाता जा रहा है। वह मजबूत हो रहा है। डा. प्रकाश चंद्र को बाजार में और काम करने की जरूरत है, लोगों से मिलने और संबन्ध प्रगाढ़ करने की आवश्यक्ता है। वहीं सोम प्रकाश के लिए नगर परिषद क्षेत्र काफी दूर है। 



ओबरा के 18 प्रत्याशी को नगर परिषद के 41 मतदान केंद्रों पर मिला मत इस प्रकार है:-



प्रत्याशी का नाम- दल संबद्धता- प्राप्त मत


1-प्रकाश चंद्र- लोक जनशक्ति पार्टी रामविलास-12322

2-ऋषि कुमार- राष्ट्रीय जनता दल-8096

3-मोहम्मद तौफीक आलम -निर्दलीय-505

4-सुधीर कुमार शर्मा- जन सुराज पार्टी-404

5-संजय कुमार- बहुजन समाज पार्टी-245

6-रामराज यादव- निर्दलीय-247 

7-हरि संत कुमार- निर्दलीय-147 

8-प्रतिमा कुमारी -राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी-122

9-शिवनाथ साव- निर्दलीय-121

10-बृज किशोर सिंह- निर्दलीय-101 

11-सोम प्रकाश- स्वराज पार्टी लोकतांत्रिक-80

12-धर्मेंद्र कुमार- जागरूक जनता पार्टी-57

13-धीरज कुमार- निर्दलीय-53

14-जितेंद्र दुबे -अखिल भारतीय जनसंघ-47

15-डा.धर्मेंद्र कुमार -अखिल हिंद फ़ारवर्ड ब्लाक क्रांतिकारी-42

16-जयनंद राम- न्यू इंडिया यूनाइटेड पार्टी-23

17-अजीत कुमार- आम जनता पार्टी राष्ट्रीय-18

18-उदय नारायण राजभर- सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी- 18

नोटा-111


नौ को नोटा से भी कम मत


18 में नौ प्रत्याशियों को नोटा से भी कम वोट मिला है। नगर परिषद क्षेत्र में 111 मत नोटा को गया है। यानी इन लोगों ने किसी प्रत्याशी को पसंद नहीं किया जबकि 18 प्रत्याशी चुनाव लड़ रहे थे। इन नौ प्रत्याशियों में सबसे चर्चित नाम सोम प्रकाश का भी शामिल है, जो ओबरा से विधायक रहे हैं। उनको मात्र 80 मत मिला है।


Wednesday, 12 November 2025

23180 शहरी मतदाता कर रहे प्रत्याशियों को परेशान

बनिया मिजाज वाले शहरी मतदाता खुल नहीं रहे

परिणाम के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी स्थिति

हार-जीत का अंतर ही नहीं निर्णायक है शहरी चुप्पा वोटर

  उपेंद्र कश्यप, जागरण ● दाउदनगर (औरंगाबाद) : ओबरा विधानसभा क्षेत्र में कुल 387 मतदान केंद्र हैं। पूरे विधानसभा क्षेत्र में 318686 मतदाता हैं। मतदान केंद्र संख्या एक से लेकर 41 तक शहरी क्षेत्र में है। नगर परिषद क्षेत्र में स्थित सभी मतदान केंद्रों पर कुल 39164 मतदाता हैं। इसमें लगभग 59.18 प्रतिशत यानी 23180 ने मतदान किया है। मतदान किसके पक्ष में अधिक हुआ किसके पक्ष में कम, यह समझना मुश्किल है। बनिया मिजाज का यह शहर चुप्पा वोट बैंक है। इसमें मात्र एक छोटा हिस्सा है जो खुलेआम यह कह रहा है कि उसने किसे मतदान किया। अन्यथा तमाम मतदाता चुप्पी साधे हुए हैं। इस कारण प्रत्याशी परेशान हैं। शहर में मत प्राप्त करने के लिए राजद के ऋषि कुमार, लोक जनशक्ति पार्टी रामविलास के डा.प्रकाश चंद्र ने अपने हिसाब से पर्याप्त परिश्रम किया है। इनके अलावा जनसुराज पार्टी के सुधीर कुमार शर्मा और बसपा के संजय कुमार ने भी प्रयास किया है। इन दोनों ने बजाप्ता नगर यात्रा की। सुधीर कुमार शर्मा के पक्ष में तो प्रशांत किशोर तक शामिल हुए। अब सवाल यह होता है कि कितना किसे मिला। यह समझना मुश्किल है। आमतौर पर माना यही जा रहा है कि सर्वाधिक मत राजग समर्थित लोक जनशक्ति पार्टी रामविलास के प्रत्याशी डा. प्रकाशचंद्र को मिलेगा। इसके बाद राजद को। बाकी में किसे कितना मिलेगा इसका क्रम भी तय करना बड़ा मुश्किल है।



प्रमोद चंद्रवंशी से पहले पीछे ही रहता था राजग

दाउदनगर शहर की स्थिति यह रही है कि अक्टूबर 2005 में हुए बिहार विधानसभा चुनाव में 23315 मत लाकर तीसरे स्थान पर रहने वाले जदयू प्रत्याशी प्रमोद सिंह चंद्रवंशी शहरी क्षेत्र में सबसे आगे थे। इसके पहले कभी एनडीए या भाजपा या जदयू आगे नहीं रहा है। वर्ष 1995 और 2000 में शहर का सर्वाधिक मत राजाराम सिंह को प्राप्त हुआ था। 2005 अक्टूबर के साथ प्रायः सभी चुनाव में शहरी मतदाता राजग के साथ ही गोलबंद हुए हैं। ऐसा ही इस बार भी होगा यह सभी मान रहे हैं। शहरी क्षेत्र में प्राप्त मतों का अंतर ओबरा विधानसभा चुनाव का परिणाम तय कर सकता है और हार-जीत का अंतर भी।


Sunday, 9 November 2025

मतदान करने के लिए काम छोड़ ठहरे हैं 5000 से अधिक मतदाता

 


कार्तिक पूर्णिमा के बाद यूपी व एमपी चले जाते हैं तांती जाति के लोग 


निर्माण कार्यों में बतौर श्रमिक करते हैं राष्ट्र निर्माण में योगदान 


प्रत्येक वर्ष तीन बार एप्ने पैतृक घर लौटते हैं काम से श्रमिक


उपेंद्र कश्यप, जागरण ● दाउदनगर (औरंगाबाद) : शहर में पान, तांती व तंतवा समाज की बड़ी आबादी है। जिसे आमतौर पर यहां पटवा शब्द से संबोधित किया जाता है। यहां बड़े मोहल्ले में पटवा टोली शामिल है। शहर में इनकी आबादी लगभग 10000 से अधिक बताई जाती है। इसमें से आधी से अधिक आबादी बाहर रहती है। लगभग 5000 लोग बिहार से बाहर उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के विभिन्न शहरों में काम के लिए रहते हैं। इनके जिम्मे निर्माण का काम है। सड़क, नाला, पुल, बांध के निर्माण कार्य में चाहे कच्चा काम हो या पक्का काम यह मजदूर वहां काम करते हैं। जानकी प्रसाद व वीरेंद्र कुमार का कहना है कि अब कच्चा काम कम होता है। एक वर्ष में तीन बार बाहर रहने वाले पान तांती समाज के लोग शहर आकर अपने पैतृक घर में रहते हैं। वैशाख में करीब एक महीना के लिए यह आबादी शहर में रहती है और शादी विवाह जैसे शुभ मुहूर्त वाले काम निपटाती है। दूसरी बार सावन में 15 से 20 दिन रहने के बाद सावन पूर्णिमा के बाद पुन: अपने काम पर वापस लौट जाते हैं। तीसरी बार कार्तिक महीने में दीपावली तक सभी आ जाते हैं और कार्तिक पूर्णिमा के बाद चले जाते हैं। इस बार कार्तिक पूर्णिमा (पांच नवम्बर) के एक सप्ताह के अंदर बिहार विधानसभा का चुनाव होना है। 11 नवम्बर को यहां मतदान होना है। इसलिए तमाम लोग यहीं अभी ठहरे हुए हैं। मतदान करने के बाद 12 नवंबर से यह लोग अपने काम पर लौटने लगेंगे।


इन शहरों में रहते हैं यह मजदूर


बिहार से बाहर उत्तर प्रदेश के गोरखपुर, देवरिया, बहराइच, गोंडा, अयोध्या, फैजाबाद, लखनऊ, इलाहाबाद, लखीमपुर, वाराणसी, बलिया, उन्नाव, चुनार और मध्य प्रदेश के बांदा, रीवां जैसे जिलों में फिलहाल इस जाति के लोग बतौर मजदूर काम करते हैं।



1200 रुपये प्रतिदिन मजदूरी, इस तरह का जीवन

आमतौर पर जो मजदूर होते हैं वह पति-पत्नी दोनों एक साथ काम करते हैं। जानकी प्रसाद ने बताया कि अभी पति-पत्नी को बतौर मजदूरी 1200 से 1300 रुपये प्रतिदिन मिलता है। जिस दिन काम नहीं करते हैं मजदूरी नहीं मिलती है। आठ से नौ घंटा प्रायः प्रतिदिन इन्हें काम करना होता है। जानकी प्रसाद अब काम करने नहीं जाते हैं। इनके तीन पुत्र सपरिवार अभी उत्तर प्रदेश में काम कर रहे हैं। बताया कि सुबह चार से पांच बजे खाना बनाकर फिर खाकर और दोपहर का खाना लेकर मजदूर काम पर जाते हैं। चार पांच बजे मजदूर फिर अपने आवासीय स्थल पर लौटते हैं और दैनिक जीवन का काम करते हैं। बताया कि मजदूर जहां काम करते हैं वहां अगर कोई सरकारी भवन खाली मिल गया तो उसमें रहते हैं अन्यथा टेंट लगाकर रहते हैं। वहीं खाना पीना रहना होता है।



कालीन उद्योग में 600 प्रतिदिन मजदूरी 

यहां के कुछ लोग भदोही में भी कालीन उद्योग में काम करते हैं। कालीन उद्योग में काम करने वाले वीरेंद्र कुमार बताते हैं कि वह भदोही में ही रहते हैं। कालीन बुनाई उद्योग में काम करते हैं। आय श्रम पर आधारित है। एक व्यक्ति दिनभर की मजदूरी करके 500 से 600 रुपये प्रतिदिन कमाता है। वह भी एक साल में तीन बार दाउदनगर अपने घर आते हैं। 




Saturday, 8 November 2025

टिप्पणियों से टूट रही सामाजिक मर्यादा व तानाबाना

 


प्रत्याशियों से अधिक समर्थकों के बीच तनाव 

समर्थकों की टिप्पणियां अलोकतांत्रिक और असहनीय 

उपेंद्र कश्यप, जागरण ● दाउदनगर (औरंगाबाद) : चुनाव प्रचार चरम की तरफ है। तमाम प्रत्याशी अपने-अपने तरीके से प्रचार कर रहे हैं, अपना पक्ष जनता के बीच मतदाताओं के बीच रख रहे हैं। सभी अभ्यर्थी मतदाताओं को अपने लिए भगवान बता रहे हैं और शिष्ट भाषा में बात कर रहे हैं। एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप भी लगा रहे हैं। सभी विधानसभा क्षेत्र में मुख्य प्रत्याशी अपने प्रतिद्वंद्वी के विरुद्ध झूठे सच्चे आरोप लगा रहे हैं, लेकिन आरोपित करने का तरीका एक हद तक संयमित और शिष्ट है। दूसरी तरफ समर्थकों की स्थिति इतनी बदतर है कि वह बदजुबानी पर उतर आए हैं। जातिवाद का घिनौना रूप भी इंटरनेट मीडिया पर कई पोस्ट से साफ-साफ दिख रहे हैं। जातीय दंभ खुलकर दिख रहा है। प्रत्याशी चुनाव जीते या हारे, प्रायः सभी एक दूसरे के घर आते जाते हैं। घरेलू समारोह हो या सार्वजनिक कार्यक्रम हो, नेताओं को साथ बैठने और मंच से संबोधित करने में स्वयं में आपस में बात करने में कोई दिक्कत कोई हिचक नहीं रह जाती है। लेकिन समर्थकों की स्थिति यह है कि ना भाषा के स्तर पर संयमित हैं, और ना ही आरोप के स्तर पर संयमित हैं। जो काफी हद तक अलोकतांत्रिक और असहनीय है। स्थिति यह भी है कि संबंधों को भी तिलांजलि दे दी जा रही है। इस स्तर की क्रिया और प्रतिक्रिया हो रही है कि चुनाव बाद एक दूसरे के सामने खड़ा होने में भी  शर्म आएगी। हालांकि कुछ ऐसे लोग भी हैं जो इंटरनेट मीडिया पर यह बात कह रहे हैं, समर्थकों को प्रेरित कर रहे हैं कि चुनाव आते जाते रहेगा लेकिन भाषा और आरोप लगाने के स्तर को मर्यादित रखा जाए, ताकि चुनाव बाद भी जिस समाज में हम रह रहे हैं वहां एक दूसरे का सामना कर सकें। कुछ लोग ऐसी टिप्पणियां कर रहे हैं जिसका जिक्र भी नहीं किया जा सकता और इससे समाज में तीखा विरोध, सामाजिक दूरी बढ़ाने के अलावा कोई लाभ नहीं होगा। लोग यह समझने के लिए तैयार नहीं दिख रहे कि लोग चुनाव जो लड़ रहे हैं नेता वह जीते या हारे एक साथ बैठेंगे। एक साथ दिखेंगे। और किसी का कोई काम नहीं रुकेगा। लेकिन आपस में जिस स्तर पर कटुता का प्रदर्शन किया जा रहा है, चुनाव बाद इससे मुश्किलें समर्थकों को ही होगी। सामाजिक दूरियां ना बढ़े यह तब हर हाल में ख्याल रखा जाना चाहिए जब राजनीतिक बयान बाजी हो या आरोप प्रत्यारोप या वाद विवाद हो। अन्यथा समाज को दिशा देने का दावा करने वाले राजनीतिक दल और उनके समर्थक चुनाव बाद खुद ही शर्मिंदा होते रहेंगे।


मुसलमानों के लिए उर्वर नहीं है गोह विस क्षेत्र की जमीन

 


गोह में 17 चुनाव में 13 मुस्लिम प्रत्याशी

सिर्फ एक बार कौकब कादरी रहे हैं प्रतिद्वंदी 

मात्र दो बार तीसरा कोण बना सके मुस्लिम प्रत्याशी 



उपेंद्र कश्यप, जागरण ● दाउदनगर (औरंगाबाद) : गोह विधानसभा क्षेत्र में 2020 तक 16 बार चुनाव हो चुका है। यह 17वां चुनाव है। इस बार के चुनाव में मात्र एक प्रत्याशी मोहम्मद एकलाख खान मुस्लिम हैं। इससे पहले का अगर इतिहास देखें तो कुल 17 चुनाव में तेरह मुस्लिम प्रत्याशी रहे हैं। लेकिन गोह की जमीन किसी मुस्लिम को सदन भेजने से परहेज करती रही। मुख्य प्रतिद्वंद्वी भी मुस्लिम प्रत्याशी नहीं बन पाए। मात्र एक बार इंडियन नेशनल कांग्रेस से चुनाव लड़ रहे कौकब कादरी दूसरे स्थान पर थे। वर्ष 2005 के फरवरी में हुए चुनाव में उनको 21953 वोट मिला था और वह जदयू के प्रत्याशी डा. रणविजय से तब 5859 वोट से हार गए थे। इसके अलावा दो बार ऐसा मौका मिला है जब त्रिकोणीय मुकाबले में मुसलमान प्रत्याशी रहा। खुद कौकब कादरी 2010 के चुनाव में इंडियन नेशनल कांग्रेस से चुनाव लड़ रहे थे और 8418 वोट लाकर तीसरा स्थान पर रहे। इससे पहले 1990 में आईपीएफ़ के मोहम्मद हामिद अंसारी 18119 मत प्राप्त कर तीसरे स्थान पर थे। यहां तक भी पहुंचना मुसलमान के लिए आसान नहीं रहा है। वर्ष 1969 में निर्दलीय एस अब्दुल अली चुनाव लड़े और 921 मत लाकर पांचवा स्थान पर रहे थे। 1980 में शोषित समाज दल से चुनाव रहे हबीबुर रहमान 2809 मत प्राप्त कर पांचवा स्थान पर थे। 1990 में डोमन खलीफा निर्दलीय चुनावी मैदान में थे। जिनको मात्र 80 मत प्राप्त हुआ और 19 में स्थान पर थे। जबकि समसुद्दीन अंसारी 66 मत प्राप्त कर बीसवें स्थान पर रहे। वर्ष 1995 में निर्दलीय चुनाव लड़ रहे अमजद अली 234 मत प्राप्त कर 23वें स्थान पर थे। वर्ष 2000 में कौकब कादरी ने 10234 मत प्राप्त कर इंडियन नेशनल कांग्रेस के प्रत्याशी के रूप में चौथा स्थान हासिल किया। इसी चुनाव में मोहम्मद सावन निर्दलीय चुनाव लड़े और 195 मत प्राप्त कर आठवें स्थान पर रहे। 2005 में मोहम्मद हामिद अंसारी एसपी से चुनाव लड़ रहे थे। मात्र 498 मत प्राप्त कर सातवें स्थान पर रहे। 2015 में एकलाख खान एसकेएलपी से चुनाव लड़े और 1563 मत प्राप्त कर नौवे स्थान पर रहे। 2020 में मोहम्मद एकलाख खान पीईसीपी से चुनाव लड़े और 1193 मत प्राप्त कर नौवें स्थान पर रहे।



गोह में 9.34 प्रतिशत मुस्लिम आबादी

वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार गोह प्रखंड की आबादी 234400 है। इसमें मुस्लिम आबादी 6.08 प्रतिशत है। हसपुरा में 12.6 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है, जबकि कुल जनसंख्या 160820 है। अर्थात गोह विधानसभा क्षेत्र में मुस्लिम आबादी 9.34 प्रतिशत है। नाता जनगणना हुआ नहीं है। इसलिए लगभग एक प्रतिशत कम अधिक आबादी मुस्लिमों की हो सकती है। 

 


Sunday, 2 November 2025

ओबरा के किसी विधायक के पुत्र-पुत्री को नहीं मिला मौका

 



कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम के पिता बने थे पहली बार विधायक


राजनीतिक विरासत वाले सिर्फ ऋषि बने विधायक

उपेंद्र कश्यप, जागरण ● दाउदनगर (औरंगाबाद) : ओबरा के मतदाताओं ने कभी किसी को राजनीतिक विरासत नहीं सौंपा। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम के पिता दिलकेश्वर राम को पहली बार ओबरा से ही जीत मिली थी। वर्ष 1962 में यह सीट अनुसूचित जाति के लिए सुरक्षित थी और ओबरा प्रखंड के कंचनपुर पंचायत के हेमन बिगहा निवासी दिलकेश्वर राम को कांग्रेस पार्टी ने अपना प्रत्याशी बनाया और वे जीत गए। इसके बाद वे कई बार विधायक बने। उनके पुत्र राजेश राम यहां से नहीं लड़े, बल्कि वे कुटुंबा विधानसभा से विधायक हैं। इस संदर्भ में अगर देखे तो सिर्फ ऋषि कुमार ही ऐसे व्यक्ति हैं जो राजनीतिक विरासत से आए और चुनाव जीत गए। उनकी मां डा. कांति सिंह रोहतास और भोजपुर जिले के क्षेत्र से विधायक और सांसद के साथ मंत्री भी रही हैं। उनके पुत्र ऋषि कुमार वर्ष 2020 में ओबरा विधानसभा चुनाव राजद की टिकट पर लड़ने आये और जीत जाते हैं। इनके अलावा कभी वैसे व्यक्ति को ओबरा में चुनाव लड़ने का मौका नहीं मिला जिनके पिता या मां या दादा दादी विधायक या सांसद रहे हों। 


डा. संजय को नहीं मिला अवसर

दाउदनगर के प्रथम विधायक रहे रामनरेश सिंह के पुत्र डा. संजय कुमार सिंह कभी चुनाव नहीं लड़े।  गोह प्रखंड के बुधई खुर्द निवासी रामनरेश सिंह दाउदनगर में ही नगरपालिका मार्केट में रहा करते थे और उनके पुत्र डा. संजय कुमार सिंह मौला बाग में रहते हैं। लेकिन वह कभी चुनाव नहीं लड़ सके। प्रारंभिक समय से ही वह कांग्रेस की राजनीति करते हैं। इस बार भी कांग्रेस के संभावित प्रत्याशियों में उनका नाम शामिल था, लेकिन गठबंधन के तहत यह सीट राजद के हवाले है। राम नरेश सिंह वर्ष 1952 और 1967 में दाउदनगर विधानसभा से जीते। मंत्री भी रहे हैं।


कई के वंशज राजनीति में नहीं


ओबरा के प्रथम विधायक रहे पदारथ सिंह का कोई पुत्र या पुत्री चुनावी मैदान में कभी नहीं उतरा। इसी तरह ओबरा से तीन बार और दाउदनगर विधानसभा क्षेत्र से दो बार विधायक रहे रामविलास सिंह के पुत्र उमेश सिंह की राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं रही लेकिन विधानसभा चुनाव नहीं लड़े। वह अपने ग्राम पंचायत अहियापुर हसपुरा प्रखंड से मुखिया भी रहे। हालांकि सदन पहुंचने की उनकी हसरत रही है, ऐसा सभी मानते हैं। उन्होंने दलों से टिकट लेने की भी कोशिश की थी। रघुवंश कुमार सिंह का भी कोई वंशज यहां सक्रिय नहीं रहा।



सफल न हो सके बारुण के सुनील यादव 


विधायक रहे नारायण सिंह जो बारुण के निवासी हैं उनके पुत्र भी कभी ओबरा में सक्रिय नहीं रहे। हालांकि उनके पुत्र भीम कुमार गोह विधानसभा क्षेत्र से 2020 में विधायक बनने में सफल रहे। नारायण सिंह के भतीजे और देवनंदन सिंह उर्फ देवा सिंह के पुत्र सुनील कुमार यादव 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में ओबरा विधानसभा क्षेत्र से जदयू के प्रत्याशी थे। वह यहां चुनाव नहीं जीत सके। जबकि नीतीश कुमार के काफी करीबी माने जाते हैं। 


पुत्र के चुनाव लड़ने की रही बस चर्चा


इनके अलावा यहां से विधायक बने भाजपा के नेता बीरेंद्र प्रसाद सिंह की भी वंश परंपरा का कोई व्यक्ति सक्रिय नहीं रहा। हालांकि इस बार के चुनाव में उनके पुत्र अजित सिंह के चुनाव लड़ने की चर्चा थी। लेकिन अंतत: वे भी चुनावी मैदान में नहीं हैं। वे सीमावर्ती हसपुरा प्रखंड के कोइलवां के निवासी थे। इनके अलावा यहां से विधायक बने सत्यनारायण सिंह, सोम प्रकाश या ऋषि कुमार के पुत्र या पुत्री चुनावी राजनीति में मैदान में दूर दूर तक नहीं दिखते। 


लड़ने को मौका नहीं मिला 

विधायक रहे वीरेंद्र प्रसाद सिंहा के पुत्र कुणाल प्रताप चुनावी राजनीति में काफी सक्रिय हैं। वह अंकोढ़ा पंचायत से मुखिया रहे। विधानसभा चुनाव लड़ने की उनके महत्वाकांक्षा भी है और इस बार ऐसी चर्चा थी कि या तो वे या उनके पिता वीरेंद्र प्रसाद सिंहा चुनाव लड़ सकते हैं। लेकिन ऐसी स्थिति नहीं बनी।




दूसरे चुनाव में ही मुस्लिम विधायक लेकिन फिर सन्नाटा

  


1977 के चुनाव से नहीं बना कोई मुस्लिम प्रत्याशी 

1967 के बाद से ओबरा से कोई मुस्लिम प्रत्याशी नहीं

न दलों ने दिया भाव न खुद हिम्मत जुटा सके अल्पसंख्यक 

आखिरी बार एनओसी से महत्वपूर्ण प्रत्याशी थे शम्सुल हक

उपेंद्र कश्यप, जागरण ● दाउदनगर (औरंगाबाद) : दाउदनगर और ओबरा दो अलग-अलग विधानसभा क्षेत्र 1952 से लेकर 1972 के चुनाव तक रहे। इसके बाद नए सिरे से परिसीमन हुआ और 1977 से दाउदनगर विधानसभा क्षेत्र का वजूद समाप्त हो गया। दाउदनगर विधानसभा क्षेत्र से 1957 में हुए दूसरे बिहार विधानसभा चुनाव में सईद अहमद कादरी विधायक बने। वे इंडियन नेशनल कांग्रेस के प्रत्याशी थे। उनको 40.79 प्रतिशत अर्थात कुल 10316 मत प्राप्त हुआ था। उन्होंने 1952 में हुए प्रथम चुनाव में विधायक बने रामनरेश सिंह को हराया। इस सईद अहमद कादरी का संबंध कारा ईस्टेट से रहा है। इसके बाद दाउदनगर और ओबरा विधानसभा क्षेत्र से कोई विधायक नहीं बना। स्थिति इतनी बदतर रही कि कोई दूसरे स्थान पर भी नहीं रहा। किसी महत्वपूर्ण दल ने मुस्लिम प्रत्याशी नहीं दिया। शायद उनके जीतने की संभावना कम होने की समझ ने राजनीतिक दलों को ऐसा करने पर मजबूर किया। निर्दलीय भी मुस्लिम प्रत्याशी इक्का-दुक्का ही आए। कभी कोई ऐसा मुस्लिम प्रत्याशी भी नहीं दिखा जो मुख्य प्रत्याशियों को चुनौती दे सके। दाउदनगर विधानसभा क्षेत्र से ही 1967 में स्वतंत्र पार्टी से जेड एच खान चुनाव लड़े और वह सबसे अंतिम स्थान पर यानी नौवें स्थान पर रहे। उनको मात्र 620 मत प्राप्त हुआ। दाउदनगर विधानसभा का अंतिम चुनाव 1972 में हुआ था। उसके बाद नए परिसीमन के कारण 1977 में हुए चुनाव में इसका वजूद खत्म हो गया। ओबरा प्रखंड से जुड़कर दाउदनगर ओबरा विधानसभा क्षेत्र का हिस्सा बन गया। इस अंतिम चुनाव में दाउदनगर के चिकित्सक डा. शम्सुल हक पर इंडियन नेशनल कांग्रेस आर्गेनाइजेशन ने दाव खेला। महत्वपूर्ण है कि कांग्रेस का विभाजन होने के बाद बनी इस पार्टी का यह पहला चुनाव था। शम्सुल हक तीसरे स्थान पर रहे। उनको 11983 मत प्राप्त हुआ। इससे पहले ओबरा विधानसभा क्षेत्र से 1967 में हुए चुनाव में एसएएस कादरी निर्दलीय चुनाव लड़े थे। वह तीसरे स्थान पर रहे। तब उनको मात्र 5889 मत प्राप्त हुआ। इसके बाद से ओबरा विधानसभा क्षेत्र से कोई मुस्लिम प्रत्याशी भी चुनावी मैदान में नहीं आया।




14 प्रतिशत वाली आबादी हाशिये पर


ओबरा विधानसभा क्षेत्र में 14 प्रतिशत मुस्लिम आबादी रहती है। लेकिन इस समुदाय से अब तक मात्र एक व्यक्ति का विधायक बनना और और मात्र तीन व्यक्ति का चुनाव लड़ना बताता है कि 78 वर्ष के इतिहास में मुसलमान के साथ राजनीतिक दलों ने छल किया। किसी राजनीतिक दल ने मुसलमानों पर भरोसा नहीं किया और ना ही कोई मुसलमान नेता उभर सका, जो अपने दम पर चुनाव लड़ने का साहस कर सके। वर्ष 2011 में हुई जनगणना के अनुसार ओबरा प्रखंड में 14.82 प्रतिशत, दाउदनगर नगर परिषद क्षेत्र में 18.78 प्रतिशत और दाउदनगर प्रखंड के ग्रामीण क्षेत्र में 8.11 प्रतिशत मुस्लिम आबादी रहती है। विधानसभा के स्तर पर देखें तो यह औसत 14 प्रतिशत की आबादी है। लेकिन राजनीति में अल्पसंख्यक समुदाय की भागीदारी का शोर चाहे जितना हो इन्हें लेकर कोई गंभीर नहीं दिखता।



इस बार एक मुस्लिम प्रत्याशी

ओबरा विधानसभा क्षेत्र के लिए अब तक 16 बार चुनाव हो चुका है। जबकि दाउदनगर विधानसभा क्षेत्र के लिए कुल छह बार चुनाव हुआ है। इस बार ओबरा विधानसभा क्षेत्र के लिए जब सत्रहवां चुनाव हो रहा है तो मोहम्मद तौफीक आलम निर्दलीय चुनाव मैदान मे हैं।