टेढ़ी पॉलिटिक्स : भाजपा- संघ के गुंडो को क्यों बचा रहा विपक्ष
(मिले कई सबक, लोकतंत्र के लिए खतरनाक स्थिति)
डॉ.उपेंद्र कश्यप
मो.नं.- 9931852301
जंतर मंतर पर हुए प्रदर्शन के दौरान जब उपद्रव हुए तो उपद्रवी तत्वों चाहे वे छात्र-छात्रा हों, या युवक युवती, कॉकरोच जनता पार्टी के अभिजीत दीपके, उसके प्रवक्ता सौरभ दास या विभिन्न विपक्षी दलों के नेता- प्रवक्ता सबने एक स्वर से कहा कि भाजपा और संघ ने योजनाबद्ध तरीके से अपने गुंडो को भीड़ में छात्र आंदोलन को बदनाम करने के लिए घुसा दिया है। यह गुंडे आरएसएस और भाजपा के हैं। अब सवाल उठ रहा है कि जब गुंडो के खिलाफ सरकार कार्रवाई करने जा रही है तो इनको बुरा क्यों लग रहा है। कांग्रेस के नेता कपिल सिब्बल ने बजाप्ता एक करोड रुपए फंडिंग की, वेबसाइट बनाया जा रहा है कि देश में कहीं भी छात्र आंदोलन में अगर कोई आंदोलनकारी पुलिस या न्यायिक मामले में उलझता है तो उसे मदद किया जाएगा। अब सवाल यह उठता है कि जब वह संघ और भाजपा के गुंडे थे तो उनको बचाने की चिंता यह विपक्ष क्यों कर रहा है? बात आगे बढ़ी तो सुप्रीम कोर्ट ने साफ-साफ कह दिया कि जिनके खिलाफ पहले से प्राथमिकी है, उनके खिलाफ कार्रवाई होगी। जो 18 साल की उम्र तक के युवा हैं, उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होगी। जिनके विरुद्ध पहली बार अगर कोई प्राथमिकी हुई है तो उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई फिलहाल नहीं होगी। हो सकता है आने वाले समय में किसी सेवानिवृत न्यायाधीश के नेतृत्व में जांच कमेटी गठित कर दे सुप्रीम कोर्ट। सब बातें अपनी जगह है। हम इस मुद्दे पर चर्चा कर रहे हैं कि जब आंदोलनकारियों के बीच भाजपा और संघ ने जैसा कि कॉकरोच जनता पार्टी का दावा है, अपने गुंडे भेजे थे, ताकि वह आंदोलन को बदनाम कर सकें तो ऐसे गुंडो को बचाने के लिए कॉकरोच जनता पार्टी या तमाम विपक्षी दल एकजुट क्यों हो गए? क्यों लोग पैसा चंदा करके न्यायिक मदद पहुंचाने की तैयारी कर रहे हैं? क्यों मांग हो रही है कि अगर सभी प्राथमिकियां वापस नहीं ली गई तो एक बार फिर से इसी तरह से जन आंदोलन खड़ा किया जाएगा। इस घटना से एक बात समझ में आ गई कि नेता किसी भी गिरगिट से अधिक रंग बदलता है और उसके कहे पर कतई विश्वास ना करिए। जब युवा सोनम वांगचुंग और कॉकरोच जनता पार्टी की अपील पर इकट्ठा हुए थे, तब उनको भी यह अनुमान नहीं रहा होगा कि वह बुरे फसेंगे। दरअसल, आप जब भीड़ का हिस्सा बनते हैं तो आपका दिमाग आपके नियंत्रण से बाहर उस शक्ति के पास चला जाता है जो पर्दे के पीछे रहकर भीड़ को मॉनिटर करता है। वह जैसे चाहेगा भीड़ में शामिल व्यक्ति उसी तरह की प्रतिक्रिया व्यक्त करने लगता है। शब्द और पंक्ति भले व्यक्ति की अपनी हो, लेकिन प्रेरणा, उत्तेजना, भाव छुपे हुए शख्स का होता है। छात्र-छात्राओं द्वारा की गई बदजुबानियों, अश्लील हरकतों, अभद्र भाषा वाले पोस्टरों को लेकर संस्कारों की बात की जा रही है। कुछ देर के लिए अगर इसे हटा दें। मान लें कि युवाओं ने जोश में बहुत तरीके से अभद्रता दिखाई, अश्लीलता दिखाई, कुछ लोगों का दावा है कि भाई राजनीतिक आंदोलन में नारेबाजियां होते रहती हैं। उसमें अपशब्द इस्तेमाल होते रहते हैं। तमाम नेताओं के लिए अपशब्द कहे गए। चलिए इन मुद्दों को हम हटा देते हैं, और मान लेते हैं कि ऐसा करने वाले तमाम लोग छात्र थे, जो बहक गए। तात्कालिक गुस्से का शिकार हुए और उन्होंने अपनी कुछ बातें जैसे रखी, वह मर्यादा में भी नहीं थी। इन सबको माफ कर देना चाहिए। जो लोग गुंडई करने वालों के पक्ष में हैं, दरअसल वे कभी आंदोलन नहीं करते, वे राजनीतिक रोटी सेंकने के लिए, कुछ लिखते बोलते हैं। उनके बच्चे तो आंदोलन में जाएंगे नहीं, तो दूसरे के कंधे पर बंदूक रख दो।
खैर, क्या किसी भी सूरत में हत्या के आरोपितों को, दुष्कर्म करने वालों को, जो पहले से आरोपित हैं, जिनकी संख्या दिल्ली पुलिस ने लगभग 2800 से अधिक बताई है, उनको क्यों छोड़ देना चाहिए? उनको जब आपने पहले ही भाजपा और संघ का गुंडा घोषित कर दिया तो उसके विरुद्ध होने वाली कार्रवाई की चिंता आपको (विपक्ष) क्यों हो रही है? यह इस बात का प्रमाण है कि आंदोलन करने वाले अपने गुंडे उसमें शामिल करते हैं, क्योंकि शरीफ चाहे छात्र-छात्रा हो, चाहे किसान हो, चाहे कोई भी आम राजनीतिक-सामाजिक कार्यकर्ता हो, वह आंदोलन का हिस्सा तो बनता है, बड़ी अपेक्षाओं के साथ, लेकिन वह गुंडई नहीं करता है। वह हमले नहीं करता। वह पुलिस के खिलाफ गुंडे की तरह आक्रामक शैली में व्यवहार नहीं करता। और जब तक ऐसा होगा नहीं आंदोलनकारियों की आत्मा तृप्त नहीं होती। इसलिए वही गुंडो को इसमें शामिल करते हैं। और गुंडे इसलिए शामिल होते हैं कि उनके पाप कुछ हद तक धूल जाएगा। उनको लाइमलाइट मिल जाएगा। कहीं अगर चमक गए तो अपने क्षेत्र का नेता भी बन सकते हैं। नेता बनने का तो एक रास्ता यह भी है कि नाम कमाया जाए, भले गुंडई करके ही क्यों नहीं कमाया जाए। तमाम गुंडो को हम देखते हैं जो शरीफजादा बन जाते हैं। सफेद वस्त्र धारण करके जनप्रतिनिधि बन जाते हैं। गुंडो को भी मौका मिल जाता है। दरअसल होता यह है कि आंदोलन करने वालों के बीच ऐसे लोग भी शामिल होते हैं जो आपराधिक प्रवृत्ति के होते हैं। कुछ को मुद्दों से नहीं राजनीति से मतलब होता है। किसी मामलों में यह हो सकता है कि असामाजिक तत्वों के साथ सीधा कनेक्शन आंदोलन बुलाने वालों से ना हो, लेकिन अगर वास्तव में ऐसा है तो फिर कोई देशद्रोही, कोई गुंडा, कोई हत्यारा, कोई मवाली, कोई रेपिस्ट जब आंदोलन में गुंडई करता है, आंदोलन को बदनाम करता है तो आंदोलन बुलाने वाले लोग, आंदोलन का नेतृत्व करने वाले लोग, उसे बचाने के लिए क्यों खड़े हो रहे हैं। इसका मतलब है कि दोनों के बीच रिश्ता है। जिसे छुपाने के लिए उस सबको संघ और भाजपा का गुंडा बताया जाता है। इस आंदोलन के बाद सत्ता चाहे जिसकी हो आंदोलनकारी को सत्ता में शामिल राजनीतिक दलों पर अब यह आरोप लगाना कठीन होगा कि गुंडई उनके भेजे गए गुंडे कर रहे हैं। लोगों को अब ऐसे आरोप पचेंगे नहीं। लोकतंत्र के लिए यह बेहतर भी है। इससे जनमानस यह तैयार होगा कि आंदोलन कोई करे, अगर उसमें गुंडई हो रही है तो सत्ता किसी की हो वह सख्त से सख्त कार्रवाई करे। दूसरी बात जिसके साथ गुंडई हुई, यानी मारपीट हुई, हमले हुए, वह व्यक्ति अगर व्यक्तिगत तौर पर प्राथमिकी करता है तो प्राथमिकी वापस लेने का वादा कोई सरकार कैसे कर सकती है? इसलिए इसका एक पक्ष यह भी है कि अब अगर कोई आंदोलन होता है और गुंडई होती है तो सरकार पीड़ित से ही प्राथमिकी करवा सकती है। ऐसा करने को प्रेरित या अपील कर सकती है। जब व्यक्तियों से प्राथमिकी करवाई जाने लगेगी तब कौन सा कोर्ट प्राथमिकियों को वापस करवा सकेगा? किसी भी आंदोलन का कई पक्ष होता है। इसलिए आने वाले समय में भारतीय लोकतंत्र के लिए यह आंदोलन कई सीख दे गया है। जिसमें एक महत्वपूर्ण सीख यह भी है।
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