Friday, 24 July 2026

जो होना जरूरी है उससे किसी को मतलब नहीं

 जो होना जरूरी है उससे किसी को मतलब नहीं

(संदर्भ-अनशन-आंदोलन, राजनीतिक चालाकियां व परिणाम)

डॉ.उपेंद्र कश्यप

(लेखक- आंचलिक पत्रकारिता की दुनिया, श्रमण संस्कृति का वाहक-दाउदनगर)



पेपर लीक मामले को लेकर भूख हड़ताल और आंदोलन ने देश को झकझोर कर रख दिया। हर समस्या का समाधान है, इसका भी समाधान तय है। अनशन समाप्त हो गया है। आंदोलन जारी है। सरकार ने अपनी बात रखी। सीजेपी, राजनीतिक दलों और छात्र-छात्राओं ने अपनी बातें रखी। बहुत कुछ सकारात्मक हुआ, बहुत कुछ नकारात्मक भी हुआ। जो होना नहीं चाहिए था, वह तो हो गया, और कुछ होने का आश्वासन भी सत्ता की तरफ से मिल गया। लेकिन क्या यह पर्याप्त है?

 इस पूरे आंदोलन का हश्र लगभग वैसा ही हुआ, जैसा पहले होते रहा है। जो होना आवश्यक था या है, वह तो हुआ ही नहीं। ना होता हुआ दिख रहा है। न वैसा करने की मांग छात्र-छात्राओं के तरफ से है, ना बीजेपी के तरफ से है, ना किसी भी विपक्षी दल की तरफ से है, और न ही सरकार की तरफ से है। इस देश में आंदोलन होते रहे हैं और आंदोलन का अंत ठीक वैसे ही होता है जैसे नीट पेपर लीक मामले को लेकर आंदोलन का हुआ। क्या शिक्षा मंत्री के पद त्याग देने से शिक्षा की व्यवस्था सुधर जाएगी? क्या पेपर लीक होना बंद हो जाएगा? क्या इस्तीफा देने को नैतिकता से जोड़ने वाले लोग यह बता सकते हैं कि बिहार में लोकसभा चुनाव हारने के बाद इस्तीफा देकर जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री बनाने वाले नीतीश कुमार ने कौन सी नैतिकता और आदर्श का पालन किया था, कि कुछ ही महीने के बाद उनको हटाकर पुन: मुख्यमंत्री बन गए? क्या रेलवे दुर्घटना का की जिम्मेदारी लेकर इस्तीफा देने वाले नेताओं की नैतिकता के कारण रेलवे में सुधार हुआ? दुर्घटना बंद हो गई? रेलवे में आज भी खानपान की स्थिति बद से बदतर है। दरअसल व्यवस्था बदलने में सबसे बड़ी बाधा आदर्श या नैतिकता और विवेक के दावे और मांग हैं। यह दोनों शब्द का व्यवहार लोकतंत्र के लिए सर्वोच्च स्थिति में होने चाहिए थे। लेकिन पूरे भारतीय लोकतंत्र को मटिया मेट करके रख दिया है। इस देश की जो संस्कृति है, खासकर सामाजिक और राजनीतिक उसमें दोनों शब्दों का कोई महत्व नहीं है। सब कुछ लिखित होना चाहिए। कानून में होना चाहिए। अन्यथा विवेकाधिकार और नैतिकता का इस्तेमाल हमेशा लाभ हानि देखकर किया जाता रहा है, किया जाता रहेगा। और जो इसका इस्तेमाल करता है वह सिर्फ और सिर्फ स्वहित देखकर करता है। इसके तमाम उदाहरण भरे पड़े हैं। इस आलेख में उस दिशा में चर्चा करने की जरूरत फिलहाल नहीं है।


 मूल बात यह है कि जो हुआ, क्या वह पर्याप्त है? क्या अब कोई पेपर लीक नहीं होंगे? क्या फास्ट ट्रैक कोर्ट इस बात की गारंटी देंगे कि पेपर लीक नहीं होंगे? दोषियों को सजा जल्द और सख्त मिलेगी? संजीव मुखिया निर्दोष कैसे साबित हो गए? यह न्यायिक निर्णय सही है तो सवाल यह खड़ा होता है कि दोषी कौन था? पेपर लीक करने वाला माफिया कौन था? सख्त से सख्त सजा का प्रावधान अगर सोमवार को बिल पास कर बना भी दिए जाते हैं, तो क्या नैतिक रूप से भ्रष्ट लोग जो पेपर लीक करते रहे हैं वह अब नहीं करेंगे? क्या पेपर लीक करने वाला नया समूह पैदा नहीं होगा? इसकी गारंटी कौन लेगा? क्या आजीवन कारावास और मृत्यु दंड तक के प्रावधान वाले कानून इस देश में नहीं है, और उससे जुड़े क्या अपराध कम हो गए? ऐसा कुछ होना जाना नहीं है। घटनाएं हमेशा घटती रही हैं और हमेशा घटती रहेंगी। चाहे सत्ता कैसी भी हो, किसी की भी हो। इसलिए आवश्यक जो है वह किया जाना चाहिए।


 इस देश में आवश्यकता जो है वह इस बात की है कि सब की जिम्मेदारी तय हो। यह कानून से हो। नैतिकता और विवेक जैसे आवरण में छुपने का कोई अवसर नहीं होना चाहिए। जब एक देश एक चुनाव, एक देश एक राशन कार्ड किया जा सकता है तो फिर एक देश एक शिक्षा प्रणाली, एक देश एक चिकित्सा प्रणाली क्यों नहीं देश तय कर सकता है?

 वर्ष 2016 से पहले चलिए जब नीट नहीं था, तो कितने गरीब बच्चों को डॉक्टर बनने का मौका मिलता था? सीटें बिक जाती थी। लाखों करोड़ों में। यह बदलाव मात्र सुधार भर लाया। समस्या का समाधान नहीं। 


समस्या का समाधान यह है कि देश में पहले तो एक देश और एक शिक्षा-चिकित्सा प्रणाली लागू होना चाहिए। यानी शिक्षा और चिकित्सा का निजीकरण नहीं होना चाहिए। यह दोनों पूरी तरह फ्री होने चाहिए। भले ही इसकी भरपाई के लिए सरकार अन्य प्रकार का टैक्स लगाए। इसलिए कि बिना पैसे तो कुछ भी नहीं होता। अब तो लोग बिना पैसे ना बोलते हैं, ना लिखते हैं, ना चलते हैं। ऐसी स्थिति में धन आवश्यक है। धन का इंतजाम सरकार चाहे जैसे करें, लेकिन शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए एक रुपये भी किसी भी व्यक्ति को खर्च नहीं होना चाहिए। इसके लिए आधार होना चाहिए 18 अगस्त 2015 को इलाहाबाद हाईकोर्ट का वह फैसला, जिसमें न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल ने कहा था कि- बेसिक शिक्षा सभी के लिए एक होनी चाहिए। सरकारी सुविधा संसाधन और अर्थ का लाभ लेने वाला हर व्यक्ति का बच्चा सरकारी स्कूल में पढ़े यह सुनिश्चित होना चाहिए। कहा था- उत्तर प्रदेश के सरकारी कर्मचारी, जन प्रतिनिधि, स्थानीय निकायों के पदाधिकारी, न्यायपालिका से जुड़े लोग तथा सरकारी खजाने से वेतन या मानदेय पाने वाले सभी व्यक्तियों के बच्चों को सरकार प्राथमिक विद्यालयों में पढ़ाने की व्यवस्था सरकार करे। अदालत ने तब कहा था- जब तक नीति निर्माता और सरकारी अधिकारियों के अपने बच्चे सरकारी स्कूलों में नहीं पढ़ेंगे, तब तक विभिन्न विद्यालयों की गुणवत्ता सुधारने के प्रति गंभीर नहीं होंगे। कितनी सही बात कही गयी थी। अब कल्पना करिए जब यह फैसला आया तो उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव की सरकार थी, सरकार ने क्या किया? कुछ नहीं। उस फैसले को गतलखाते में डाल दिया। इस देश में तब का कोई सत्ता या विपक्ष का नेता, कोई भी राजनीतिक दल उस फैसले को लागू करने के लिए बयान तक नहीं दिया। सुप्रीम कोर्ट जाने की बात तो भूल ही जाइए। तब केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार थी। कोई केंद्रीय कानून नहीं बनाया गया, जिसमें उस फैसले का अस्क भी दिखे। बाद में वहां आदित्यनाथ योगी की सरकार बनी। उस सरकार ने भी हाई कोर्ट के इस फैसले पर कोई कार्रवाई नहीं की। तब भी इस देश की जनता को, जेन जी को, राजनीतिक दलों को यह समझ में नहीं आ रहा कि समस्या कहां है? सारे राजनीतिक दल, सभी नेता, एक बात पर एक स्वर में, एक जगह पर खड़े दिखते हैं कि इस देश के युवाओं को, आम लोगों को पढ़ने नहीं देना है। और स्वस्थ नहीं रहने देना है। कोई किसी से इस मुद्दे पर कम कतई नहीं है। हां जो आप सरकारी स्तर पर स्कूलों के निर्माण, अस्पतालों के निर्माण, उनके आधारभूत संरचनाओं में वृद्धि, कुछ नौकरी दे देना, यह सब चलता रहेगा। ताकि लोगों को सरकार उनकी चिंता करते हुए दिखती रहे। वास्तव में सरकारों के एजेंडे में शिक्षा व स्वास्थ्य शामिल ही नहीं है। हकीकत यह है कि किसी भी सरकार को आजादी से लेकर अब तक शिक्षा और स्वास्थ्य की चिंता नहीं रही है। जितनी चिंताएं दिखाई गई वह सिर्फ वोट को प्रभावित करने के लिए। बड़ी-बड़ी बातें बनाई गई। लेकिन समस्या के जड़ पर हमला किसी ने नहीं किया। और यह करेंगे भी नहीं। ऐसा करने के लिए एक व्यापक आंदोलन की जरूरत है इस देश को। अगर जनता, सामाजिक संगठन बिना किसी राजनीतिक दल के समर्थन लिए सड़क पर उतरें, सिर्फ एक देश एक शिक्षा, एक स्वास्थ्य की मांग को लेकर तब व्यवस्था बदलेगी, सुधरेगी, अन्यथा हर दशक में इस तरह के आंदोलन होते रहेंगे और सुधार दिखाने की कोशिशें सरकारें करती रहेंगी। समस्या खत्म नहीं होगी। हमने देखे हैं संपूर्ण क्रांति, अन्ना आंदोलन और उसका राजनीतिक लाभ लेने वाले चतुर चेलों की सत्ता, उनकी सादगी पर भ्रष्टाचार के दीमकों को पनपते हुए। इतिहास निराशाजनक है, वर्तमान उम्मीद जगाता है, और भविष्य का पता नहीं।


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