Friday, 24 July 2026

कबरिया और पहिरोपना संबंधित कई परंपराएं विलुप्त



रोपनहार को खोंईचा और लुकमा देने की परंपरा खत्म 

मांग भरने के साथ तेल देना भी अब बंद

बढ़िया उपज को धरती मां से करती थी प्रार्थना 

डॉ. उपेंद्र कश्यप 

नबिटा संवाददाता 

दाउदनगर (औरंगाबाद) । भारत कृषि प्रधान देश है। बिहार में तो आजीविका का मुख्य साधन ही कृषि है। यह मौसम कृषि कार्य का है। खेतों में बिहन कबारने और उसे रोपने का काम बड़े पैमाने पर चल रहा है। ऐसे में यह स्पष्ट दिख रहा है कि कबरिया और पहिरोपण से संबंधित कई परंपराएं अब विलुप्त हो गई हैं। मखरा निवासी भाजपा नेता किसान सुरेंद्र यादव बताते हैं कि बिहन कबारते समय कबरिया जयकारा करते थे। वह खत्म हो गया। पुरानी पीढ़ी के लोग रोपने के लिए खेत में जाने से पहले किसान के घर जाती थी और किसान की पत्नी सभी रोपणहार की मांग सिंदूर से भरती थी। खोइन्छा मिलता था। इसमें चावल गुड़ होता था। रोपणहार उसे लेकर खेत में जाते थे। खेत में धरती मां के नाम से छिड़काव करते थे और ईश्वर से प्रार्थना करते थे कि किसान समृद्ध हो। उसकी फसल की उपज बढ़िया हो, ताकि हमारा यानी श्रमिकों का भी पेट भर सके। शाम में फिर रोपनहार किसान के घर जाते थे और उन्हें किसानों के द्वारा लुकमा दिया जाता था। लुकमा में फुला हुआ चना, मटर और चावल का बना हुआ कसर खाने के लिए दिया जाता था। रोपणहार उसे घर ले जाते थे। जिससे उन्हें खुशी मिलती थी। यह परंपरा अब पूरी तरह खत्म हो गई।




उठारो या बनउखाड़ से जुड़ी भी परंपरा समाप्त 

कृषि कार्य में उठारो या बनउखाड़ भी एक महत्वपूर्ण पक्ष है। मतलब किसी भी किसान के तमाम बिहन को उखाड़ने का काम जिस दिन संपन्न होता है, उस दिन उसको उठारो या बनउखाड़ कहते हैं। इस दिन सभी बिहन को उखाड़ कर रोपणहार को दे दिया जाता है। बिहन का गुच्छा बनाया जाता है। जिसे माथे पर रखकर बनिहारिन किसान के घर जाती हैं और किसान उन्हें बन देता है। यानी दक्षिणा देता है। जिसमें चावल, कपड़ा और पैसा होता है। इसे गवछी कहा जाता है। उठारो के बदले यानी बिहन उखाड़ने का काम संपन्न होने के बदले किसान देते हैं। किसान अपने घर के देवता पर भी इसे चढ़ाते हैं।




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