Wednesday, 10 February 2016

रामनरेश सिंह : संघर्ष, जेल यात्रा और सजा


अंग्रेजों ने रखा था 5000 का इनाम
रामनरेश सिंह की 104 वीं जयंती पर विशेष
उपेन्द्र कश्यप
आज गुरुवार को रामनरेश सिंह की 104 वीं जयंती है। वे स्वतंत्रा संघर्ष में कई बार जेल गये थे। चार महीने की उन्हें सजा भी काटनी पडी थी। उनके जीवन की सघर्ष, जेल यात्रायें और सजा पहचान हैं। उनका जन्म अनुमण्डल के गोह प्रखण्ड के बुधई ग्राम में 11 फरवरी 
1912 को हुआ था। 23 फरवरी 1978 को लम्बी बीमारी के कारण इनका निधन पीएमसीएच पटना में हुआ था। प्राथमिक शिक्षा गोह और माध्यमिक शिक्षा राजकीय हाई स्कूल, टेकारी से प्राप्त किया था।
उतकर्ष के अनुसार 1930 में नमक आंदोलन में इन्हें गिरफ्तार करके 4 महीने की सजा दी गई थी। यह उनके स्वतंत्रता-संघर्ष में जेल जाने की शुरूआत थी। गोलमेज सम्मेलन की असफलता के बाद तत्कालीन गवर्नर विलिंगटन ने गाँधी-इरविन समझौते को तोड़ना शुरू किया। विरोध करने पर क्रुरता-पूर्वक दमन अंग्रेजों ने किया। इसका विरोध करने पर उन्हें गिरफ्तार किया गया। 1934 में फुलवारी शरीफ जेल में रखे गए। बाहर आये तो बद्रीनारायण सिंह को सहयोग करते हुए चैरम आश्रम की स्थापना 1936 में की। 1942 में इनके क्रांतिकारी भाषण से प्रभावित उग्र भीड़ गोरी सरकार के खिलाफ नारे लगाती हुई स्थानीय गर्ल्स स्कूल के निकट आबकारी गोदाम पर हमला कर दी और शिफ्टन उच्च विद्यालय (अब अषोक इंटर स्कूल) में तोड़-फोड़ की। ओबरा पोस्ट आफिस जला दिया गया। हिंसक घटनाओं को देखते हुए ब्रिटिश सरकार ने इन पर 5000 रू. का इनाम रख दिया। वे गिरफ्तार कर लिए गए लेकिन जल्द ही अंग्रेज पदाधिकारी मिस्टर आईक की गलती का फायदा उठाते हुए जेल से भाग निकले। आंदोलनकारियों को गुप्त रूप से नेतृत्व प्रदान करते रहे। 1943 में इन्हे आल इण्डिया डिफेन्स एक्ट नजरबंदी कानून के तहत गिरफ्तार कर लिया गया और गया के सेंट्रल जेल में 14 नं. सेल में रखे गए। जेल में रहते हुए इन्होनें कई महापुरूषों की जीवनियां पढ़ीं और अपनी अधूरी पड़ी शिक्षा को पूरा किया। जेल से भागने के जुर्म में तथा गुप्त रूप से नेतृत्व प्रदान करने के कारण इस बार इनपर कई मुकदमे लाद दिए गए थे। फल यह हुआ कि आजादी के बाद ही ये जेल से रिहा हो सके।

        आजाद भारत में बने स्वास्थ्य मंत्री

 जब देश आजाद हुआ तो राम नरेश सिंह को इलाके की जनता ने बिहार विधान सभा का सदस्य बनाया और तत्कालीन राज्य सरकार ने उन्हें मंत्री बनाया। 1952 के पहले आम चुनाव में ये सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर दाउदनगर विधानसभा क्षेत्र से चुन लिए गए। इन्हीं के प्रयास से दाउदनगर-गया और दाउदनगर-पटना सड़क के पक्कीकरण का काम 1957 में शुरू हो सका था। दाउदनगर राश्ट्रीय उच्च विद्यालय तथा राश्ट्रीय मध्य विद्यालय की स्थापना कराकर इन्होंने क्षेत्र में शिक्षा के विकास को गति प्रादान की। 1967 में पुनः दाउदनगर से ही प्रजा सोषलिस्ट पार्टी के टिकट पर विधायक निर्वाचित हुए और महामाया बाबू के मुख्यमंत्रित्व काल में स्वास्थ्य राज्यमंत्री बने। बता दें कि तब ओबरा विधान सभा क्षेत्र नहीं था। दाउदनगर और हसपुरा प्रखंड मिलकर दाउदनगर विधान सभा क्षेत्र था। दाउदनगर मेन रोड स्थित नगरपालिका मार्केट में वे रहा करते थे और यहीं इनका कार्यालय भी रहा। स्वतंत्रता संग्राम में तथा दाउदनगर के नव-निर्माण में इनका योगदान अविस्मरणीय है।

Saturday, 6 February 2016

व्यवस्था में गडबडी की वजह दोषपूर्ण शिक्षा प्रणाली

खेल मैदान तो हैं खिलाडी ही गायब हैं
उपेन्द्र कश्यप
दैनिक जागरण के अभियान आठवीं घंटी के तहत यश ई स्कूल में (06.2.2016) आयोजित परिचर्चा का उद्घाटन पुलिस इंस्पेक्टर विन्ध्याचल प्रसाद, थानाध्यक्ष पंकज कुमार, डा.अजय कुमार, डा.विनोद शर्मा, राजद, भाजपा और जदयु के प्रखंड अध्यक्षों ने सामूहिक रुप से किया। परिचर्चा का संचालन उपेन्द्र कश्यप ने किया। मनोज मुस्कान ने स्वागत गान से सभी अतिथियों का स्वागत किया। परिचर्चा में एक बात स्पष्टत: समने आयी कि आठवीं घंटी अति आवश्यक है किंतु समस्या की मूल जड व्यवस्थागत दोष है।
सरकारें नहीं चाहती कि व्यवस्था बदले और सबको एक समान गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिले। जब सरकारें दृढता से यह तय कर लेंगी कि स्कूलों में खेल का आयोजन आवश्यक है तो फिर इसे लागू करने में कोई समस्या नहीं होगी। शिक्षकों की गुणवत्ता पर सवाल उठना स्वाभाविक है किंतु यह मामुली समस्या है, क्योंकि आज भी काबिल शिक्षकों की संख्या काफी है। इससे कोई इंकार नहीं कर सकता। बुनियादी सुविधाओं की कमी है किंतु जितनी है उसकी उपयोगिता भे न के बराबर है। इसकी वजह है। हाई स्कूलों में दो-दो सेट जीम के उपकरण कई वर्ष से बिना इस्तेमाल किए जंग खा रहे हैं। कारण स्पष्ट है कि स्कूल में बच्चे नहीं हैं। यह संवाददाता जब हाई स्कूलों में प्रधानाध्यापकों को परिचर्चा के लिए आमंत्रित करने अचानक पहुंचा तो बालिका इंटर स्कूल में ही छात्राओं की भीड दिखी। तीन स्कूलों में उपस्थित शिक्षक धूप सेंकते देखे गये। वजह साफ है। शिक्षक उपस्थित हैं किंतु उनके पास काम नहीं है। बच्चे गायब हैं। खेल मैदान हि तो सुना पडा हुआ है। खेल उपकरण बेकार हो रहे हैं। इस समस्या की मूल वजह है कोचिंग की व्यवस्था। जब तक कोचिंग सुबह 9 बजे तक चलते थे स्कूलों में भीड रहती थी अब जब कि वे दिन भर हलते हैं स्कूलों से बच्चे गायब हैं। तब कोचिंग शाम को भी चलते थे। बच्चे तब ट्युशन के रुप में कोचिंग का इस्तेमाल करते थे। इस अभियान से बहस शुरु हुई है। इसे विस्तार देने की अपेक्षा आम प्रबुद्धजनों ने व्यक्त की है। लार्यक्रम को सफल बनाने में अवधेश पांडेय, अनुज रामचन्द्र पांडेय, आदित्य राज जैकी, डा.राजन, मनु, श्री निवास शर्मा ने सहयोग किया।  


प्लेफुल मुड में हो काम-प्रो.अवधेश कुमार सिंह
अंग्रेजी के प्रधायापक प्रो.अवधेश कुमार सिंह ने कहा कि प्लेफुल मुड में काम करने का मामहुल बनाना होगा। अवसर मिलेहा तो बच्चे खेलेंगे। नकारात्मक सोच नहीं रखना होगा। ऐसा माहौल बनायें कि आंतरिक और बाह्य व्यक्तित्व निखारने का अवसर प्राप्त करने के लिए खेल खेलने को हर कोई तैयार हो। सबसे बडे खिलाडी श्री कृष्णा थे। खेल खेल में ही कालिया नाग को नाथ लिया था। दरअसल में श्री कृष्ण उतने अच्छे खिलाडी थे कि उनके खेल से सम्मोहित होकर नाग उनके पीछे चल दिया। उन्होंने एक कविता का अंश सुनाया- मेरे बचपन को मत छीनो, तुम अपने द्वारा बनये नीड में मत रखो, हम अपना नीड खुद बना लेंगे। कह अकि हमें ही क्रांति लानी होगी। इसके लिए प्रतिक्षा नहीं की जा सकती।

एक समान शिक्षा व्यवस्था आवश्यक- परमानंद प्रसाद
नगर पंचायत के मुख्य पार्षद पूर्व व्याख्याता परमानंद प्रसाद ने कह कि समस्या एक समान शिक्षा प्रणाली नहीं होने के कारण है। सभी अधिकारी, चिकित्सक सरकारी सेवकों की संतानें नीजि स्कूलों में पढते हैं। इसी कारण वयव्स्था खराब हुई है। जब हम पढते थे और सभी के बच्चे एक साथ पढते थे तो ऐसी समस्या नहीं थी। शिक्षा विभगा ही ऐसा है जो बिन अकाम कराये ही अपने कर्मियों को पैसे देता है। शिक्षा नीति में सुधार आवश्यक है।कहा कि हमको आपस में लडाया जा रहा है। जो पढाना है उसकी जानकारी तो शिक्षक को होती ही नहीं है। हमने ऐसे शिक्षक का योगदान कराया है जो “योगदान” और अपना नाम- “सुशील” ता सही नहीं लिख सका। अधिकारी जानते हुए ऐसा करने के लिए विवश हैं, क्योंकि कानून और सरकार के नियम ही ऐसे हैं। दोष व्यवस्थापरक है। कुछ भी कर लीजिए बदलाव संभव नहीं है। जब तज कि व्यवस्था नहीं बदलेगी। सबके बच्चे एक साथ पढने की व्यवस्था के बिना सुधार संभव नहीं। ऐस हो तो आरक्षण व्यवस्था की आवश्यक्ता ही नहीं होगी। शिक्षा जगत भारत वासियों को खेल खिला रहा है। उसका मकसद है – गरीब न पढे, न खेले, जहां है बस वहीं रहे।

जो हैं खेल की बदौलत हैं- थानाध्यक्ष
थानाध्यक्ष पंकज कुमार ने कहा कि जो हैं वह खेल की बदौलत ही हैं। जब पढते थे तो जो बच्चे खेलते थे वे फिजिकल पास हो जाते थे और जो नहीं खेलते थे वे कमरे में बैठकर शतरंज खेलते थे और एक इंच कम चौडी छाती होने के कारण छंट जाते थे। एक बार दो अभ्यर्थी का अंक समान हो गया। ऐसे में एक ने अपना खेल प्रमाण पत्र दिया और उसको नौकरी मिल गयी। ऐसा नहीं है कि खेल से रोजगार के अवसर नहीं मिलते। अपने बच्चों को खेल के प्रति जागरुक करन अहोगा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सही कहा है कि जितना पसीना बहाओगे उतना निरोग रहोगे। ब्लड प्रेशर, शुगर जैसी बीमारियां टहलने से नहीं होती। शहर के आयोजक सामने आयें जितना संभव होगा खेल के आयोजन में पुलिस अपना सहयोग देगी।

बिना खेल मैदान स्कूल नहीं-पुलिस इंस्पेक्टर
पुलिस इंस्पेक्टर विन्ध्याचल प्रसाद ने कहा कि पहले जब भी स्कूल बनाने की बात होती थी तब यह तय किया जाता था कि बिना खेल मैदान के स्कूल नहीं हो। हर गांव में खेल की घंटी अवश्य बजती थी। हमारे विभाग में कहा जाता है कि एक साल का प्रशिक्षण जीवन भर काम आत है क्योंकि नौकरी में आगे चल कर सुबह सैर करने, व्यायाम करने और शारीरिक परिश्रम करने का वक्त नहीं मिलता है। कहा कि हर व्यक्ति को खेल में दिलचस्पी रखनी चाहिए। इससे शरीर की मासपेशियों और रक्तवाहिनियों को संबल मिलता है।

संसाधन, प्रशिक्षक हैं, वातावरण, विद्यार्थी गायब-डा.अजय कुमार
बीपीएसपी बीएड कालेज के प्राचार्य डा.अजय कुमार ने कहा कि खेल विद्यालयीय कार्यक्रम का एक पक्ष है। यह समझना होगा। एक पाठ्यक्रम है दूसरा पाठ्य सहगामी क्रियायें। इनके लिए बुनियादी तौर पर चार बातें महत्वपूर्ण हैं। प्रथम संसाधन, दूसरा शारीरिक प्रशिक्षणकर्ता, तीसरा वातावरण और चतुर्थ है-खेलने वाला (विद्यार्थी)। स्थिति क्या है? संसाधन और शारीरिक प्रशिक्षणकर्ता प्राय: सरकारी स्कूलों में उपलब्ध हैं, किंतु वातावरण का अभाव है। खेलने वाला कोई नहीं है। वातावरण बनाने का काम अभिभावकों का है। उनके सहयोग के बिना यह संभव नहीं है। विद्यालयों में पाठ्यक्रम और सहगामी क्रियायें सीखने का अवसर मिलता है किंतु यह कोचिंग में संभव नहीं हो सकता। कहा कि बच्चों और अभिभावकों को प्रोत्साहित करने की आवश्यक्ता है। कहा कि अधिकारी सरकारी एजेंट होते हैं। वे वही करते हैं जो सरकार चाहती है। नेता, अधिकारी के बच्चे प्राइवेत स्कूल में पढते हैं, समस्या यहीं से शुरु हुई है। कहा कि शिक्षकों को दोष देना गलत है। 2 या 3 फीसद शिक्षक जिम्मेदार हो सकते हैं अधिकतर नहीं।     
  
नौकरी सरकार की, पढाई नहीं- उदय कुमार सिंह
शिक्षक सह केआरपी उदय कुमार सिंह साफ कहते हैं कि स्थिति खराब हुई है हम सरकार की नौकरी करते हैं, सब कोई चाहता है कि सरकारी नौकरी मिले, किंतु कोई भी अपने बच्चों को सरकारी शिक्षा नहीं दिलाना चाहता है। बच्चों को स्कूल में आठवीं घंटी तक ठहराव सुनिश्चित कराने की आवश्यक्ता प्रथम है। इसके बिना कुछ नहीं हो सकता। कहा कि हमारी सोच ऐसी बन गयी है कि तनाव और धनोपार्जन अच्छा लगता है। खेल-खेल में शिक्षा देने की अवधारणा बनानी है, शिक्षा में खेल नहीं। धर्म ग्रंथों के हवाले से कहा कि हम सब का जीवन ही खेल का परिणाम है। परमात्मा को खेल अच्छा लगता है। कह अकि कितने स्टेडुयम खेलए लायक हैं।?

हम शिक्षक भी दोषी हैं-डा.अशोक कुमार
प्रखंड साधन सेवी शिक्षक डा.अशोक कुमार ने कहा कि हमें इमानदारी से यह स्वीकार करना चाहिए कि सिर्फ बच्चे या अभिभावक ही नहीं शिक्षक भी जिम्मेदार हैं। बहुत तर्क-वितर्क होने के बाद आठवीं घंटी तय हुई थी, ताकि बच्चे तनावमुक्त होकर खेल सकें और मन हल्का कर घर जायें। बडी समस्या यह है कि बच्चे टिफिन के बाद स्कूल में टिकते ही नहीं। सुधार की व्यापक आवश्यक्ता है।

जन्म के साथ शुरु खेल अब खत्म- डा.विनोद शर्मा
पीएचसी के चिकित्सक डा.विनोड शर्मा का कहना है कि बच्चे के जन्म के साथ खेल शुरु हो जाता था। अब इस आवश्यक परंपरा को हमने खत्म कर दिया। बच्चे की उंगली पकड कर चलाते हैं, मिट्टी में खेलने से रिकते हैं। चलने के लिए एक से एक उपकरण देते हैं। हमारी पीढि में मिट्टी में खेलने को महत्वपूर्ण माना जाता था। इससे जिस क्षमता का विकास होता था वह अब की पीढि में नहीं हो रहा। इस कारण आज का युवा हाथ, कमर, पैर दर्द की शिकायत लेकर अस्पताल पहुंचता है। यह समस्या मिट्टी में नहीं खेलने की वजह से हुई। जागृति शुरु से होती थी जो अब नहीं होती। दोष अभिभावक का है। बच्चा स्कूल गया कि नहीं यह जानने स्कूल कोई अभिभावक नहीं जाता।


साथ खेलते और खाते हैं- रासबिहारी प्रसाद
नेवी से सेवानिवृत और कपडा मशीन के इंजीनियर रास बिहारी प्रसाद ने कहा कि सेना में साथ खेलने और साथ खाने की परंपरा है। इससे आदमी के बीच जाति, धर्म और समुदाय का भेद भाव खत्म हो जाता है। जब हम सेना में थे तो यह नहीं सोच सके कि सामने बैठा किस जाति और धर्म का है। तीनों सेनाओं के बीच आंतरिक खेल कूद प्रतियोगिता का आयोजन होने से काफी लाभ होता है। कहा कि इससे व्यक्तित्व में निखार आता है और साक्षात्कार का सामना सहजता से साहसपूर्ण करने का संबल मिलता है। आठवीं घंटी के लिए सातवीं तक पढाई आवश्यक है। प्रधानाध्यापकों को दृढ निश्चय करना होगा तभी इसमें सफलता मिलती है।    

एकर खेललके काम आया- शिवाधार शर्मा
राष्ट्रीय इंटर स्कूल के शारीरिक शिक्षक शिवाधार शर्मा ने कहा कि जब खेलने भागते थे तो पिता बोलते थे। जब फिजिकल टीचर में बहाली हो गयी तो मां से उन्होंने कहा कि -एकर खेललके काम आया। खेल के माध्यम से ही यहां तक पहुंचे हैं। कहा कि लडके भागे नहीं इसके लिए प्रयास करना होता है। समस्या यह भी है कि फुतबाल 90 मिनट का है तो क्रिकेट की कोई समय सीमा ही नहीं है। कैसे खेलाया जा सकता है जब कि घंटी की अवधी मात्र 35 मिनट ही है। इसके लिए सेक्शन बनाकर बच्चों को खेलवाना पडता है। कहा कि विद्यार्थियों के अभिभावकों को सुधारना होगा। पंचायत और नगर पंचायत स्तर पर प्रधानों को बैठक कर संवाद कायम करन अहोगा और जनता को समझाना होगा कि खेल का क्या लाभ है।

गान्धियन थाट की जरुरत- एसके राय
बालिका इंटर स्कूल के प्रधानाध्यापक एस.के.राय ने कहा कि गान्धियन थाट की जरुरत है। वे बताते थे कि चरखा चलाओ। इससे आंख और शरीर केन्द्रित होता था। बुद्धि का विकास होता था। उसके माध्यम से आर्थिक उपार्जन भी आगे चल कर होता था। कहा कि किंजर गार्डेन की खेल-खेल में सीखने की पद्धति बडी अच्छी है। इससे बच्चों का विकास होता है। दैनिक जागरण का यह प्रयास और पहल अच्छा है। खेल की घंटी आठवी ही नहीं बीच में भी रखना चाहिए। इससे पढने से उब गये बच्चों को मनोरंजन का अवसर मिलता अहि और बेहतर कर पाते हैं।

बच्चे आयें तो घंटी बजे- विजय शर्मा
पटेल इंटर स्कूल के प्रभारी प्रधानाध्यापक विजय शर्मा का कहना है कि जब स्कूल में बच्चे आयें तब तो खेल के लिए आठवीं घंटी बजे। दो चार बच्चे आते हैं। गुरुवार को तो मात्र 3 बच्चे आये थे। अब किसे पढायें या खेलायें? जब मिट्टी ही नहीं है तो कुम्हार घदा कैसे बनायेगा? फिजिकल टीचर हैं। कमा नहीं है। प्रार्थना में कदमताल, ताली बजाना सीखाते हैं। हमारे यहां बच्चे नवीं में आते हैं। पहले एनसीसी कैडेट होता था। अब नहीं होता है। उससे बच्चे बलिष्ठ बनते थे। बच्चे विद्यालय आयें यहां उनका सर्वांगिण अविकास होता है। उनके न आने से हम कुंठित होते हैं। प्रतिभा, गुणवत्ता, संसाधन, अवसर है किंतु बच्चे नहीं हैं। खेलने के कारण इन्हें बीएड में 4 अंक मिल अथा जिसका लाभ कैरियर बनाने में हुआ।

संसाधन नहीं मन की है कमी- श्रवण कुमार संत
अशोक इंटर स्कूल के प्रधानाध्यापक श्रवण कुमार संत ने कहा कि स्कूलों में प्रयाप्त जगह है। दो खेल मैदान है। दो-दो सेट जीम सामग्री है। फिजिकल टीचर हैं। बावजूद इसके खेल नहीं है। कौन खेलेगा। नामांकन 1500 है और उपस्थिति मात्र 15 की होती है। किसको और कैसे खेलाया जाये। कहा कि बच्चे स्कूल आने के बाद भागे नहीं, इसकी कोशिश करने  पडती है तब भी खिडकी से किताब बाहर कर भाग जाते हैं। कहा कि वास्तव में कमी मन की है। कह अकि शिक्षक कमजोर नहीं हैं, लेकिन छात्र आते नहीं हैं। जब 1996 में इस स्कूल में आया था तो चार-पांच घंटी रोज पढाना पदता था। आज कोई पढने नहीं आता है। कोई पूछने नहीं आता कि बच्चे क्यों नहीं आ रहे हैं। जब आर्थिक लाभ की बात होती है तब अभिभावक लडने आ जाते हैं कि क्यों नहीं लाभ देंगे, आपको क्या घर से देना है?

सबका ध्येय है सिर्फ धन- रौशन सिन्हा
खेल आयोजन में रुचि रखने वाले रौशन कुमार सिन्हा ने कहा कि खेलों की जगह क्यों स्कूलों से गायब है यह सोचने की विषय वस्तु है। किम्मेदार हन सभी और सरकार भी है। समस्या किसी एक की देन नहीं है। अभिभावक दबाव बनाते हैं कि पढो, और सिर्फ पढो। वास्तव में हम सबका बस एक ही ध्येय बन गया है पैसा पैसा और पैसे कमाना। लेकिन हम यह विचार करें कि पैसे कमाने के लिए शरीर तो स्वस्थ होना चाहिए। यह बिना खेल के कैसे होगा। जब हम खेलेंगे तो स्वस्थ रहेंगे और जब स्वस्थ रहेंगे तो कमायेगे बिना थके हारे। जब खेलेंगे तो फिर कमायेंगे भी, क्योंकि खेल में भी अब पैसे कमाने का अवसर खूब है। यहां कार्यक्रम सुसुप्त हो गया था, उसे जाग्रत करने के लिए आवश्यक है कि खेल हो। जब एसएचओ शैलेश चौहान थे तब वे व्यक्तिगत तौर पर रुचि लेते थे और खेल की गतिविधि को जिन्दा बनाये रखे हुए थे। कहा कि देश के विकास में खेल की भूमिका महत्वपूर्ण है।   


खेल का अवसर देने का लें संकल्प-नीरज कुमार
नीरज कुमार गुप्ता ने कहा कि हमें खेलने का अवसर मिला किंतु नई पीढि को यह अवसर नहीं मिल रहा है। हमें संकल्प लेना चाहिए कि आने वाली पीढि को यह अवसर मुहैया कराया जा सके। बच्चों को और अभिभावकों को खेल के लिए प्रेरित करना होगा। खेल का अवसर मिलेगा तो विकास होगा। अब कहीं खेल नहीं दिखता।

सातवीं ही नहीं तो आठवीं कैसे - शशि कुमार सिंह
कादरी उच्च विद्यालय के शशि कुमार सिंह का कहना है कि खेल को समय कोई नहीं देना चाहता है। अभिभावक नहीं चाहते कि बच्चे खेल में समय बर्बाद करें। जब ऐसी सोच है तो हम क्या कर सकते हैं। आठवी घंटी कैसे होगी जब सातवीं घंटी ही नहीं होती। बच्चे तो टिफिन के बाद स्कूल में रुकते ही नहीं हैं। जिनकी रुचि खेल मे6 होती है उनको टिफिन में ही खेलने का अवसर दे दिया जाता है। राजनीति और फिल्म उद्द्योग में ही आर्थिक स्थिति सुदृढ दिखती है। हालांकि खेल में जो आगे निकल गया वह सबको पछाड देता है। खेल में दिया गया समय भविषय में काम आने वाला होता है। खेल न होने के कारण समाज एक दूसरे से कत रहा है। खेल हो तो कई तरह की सामाजिक बुराई खत्म की जा सकती है।

हड्डी और नस होता मजबूत- गुप्तेश्वर प्रसाद
अशोक इंटर स्कूल के फिजिकल टीचर गुप्तेश्वर प्रसाद ने कहा कि खेल कभी भी हो सकता है, जरुरी नहीं कि घंटी आठवीं ही हो। इससे हड्डी और रक्तवाहिनी मजबूत होती है। पढाई के क्रम में ध्यान केन्द्रित, ध्यान विचलन और ध्यान विभाजन की तीन अवस्था होती है। 40 मिनट की घंटी होती है। इसमें ध्यान भटकता है। ध्यान दूसरे विढय पर चला जाता है। ऐसी स्थिति में छात्र दोनों तरफ से चला जाता है। न पढ पाता है न खेल पाता है। इसलिए बीच की घंटी में खेल होना चाहिए।

एमडीएम तक रुकते हैं बच्चे-रवीन्द्र नाथ टैगोर
ठाकुर मध्य विद्यालय के प्रभारी रवीन्द्र नाथ टैगोर ने कहा कि बच्चे स्कूल में टिकते ही नहीं हैं। बस मध्याह्न भोजन योजना खाने तक बच्चे स्कूल में टिकते हैं। खाना खाया और स्कूल से रफ्फु चक्कर। ऐसे में कैसे बच्चों को पढाया या खेलाया जाता सकता है। विद्यालयों में समस्या ठहराव की है। कहा कि जब शरीर स्वस्थ होगा तभी मन स्वस्थ होगा। खेल-कूद और सांस्कृतिक कार्यक्रम आठवीं घंटी में होते हैं। इससे दिमाग रिफ्रेस हो जाता है। बच्चे अच्छे नागरिक बन सकते हैं।



शिक्षक छात्र संबन्ध खराब- देवेन्द्र सिंह
राजद प्रखंड अध्यक्ष देवेन्द्र सिंह कहते हैं कि समस्या दो तरफा है। छात्र-शिक्षक का संबन्ध 1990 से पूर्व की तरह का नहीं रहा। खराब हुआ है। अनुशासन खत्म हुआ है। सम्मान का भव समाप्त हुआ है। शिक्षक बच्चे से और बच्चा शिक्षक से खैनी मांग कर खाता है। दोनों देर से स्कूल पहुंचते हैं। कोचिंग की व्यवस्था भी जिम्मेदार है। हमें अपने नैतिक कर्तब्य को समझना होगा।

लठैत हो गये हैं अभिभावक- अश्विनी तिवारी
भाजपा प्रखंड अध्यक्ष अश्विनी तिवारी का कहना है कि अभिभाव्क लठैत की भूमिका में आ गये हैं। बच्चे को जब हमारे जमाने में शिक्षक पीटते थे तो अभिभावक कहते थे कि बिना गलती के शिक्षक थोडे पीटे होंगे। अब वे लाठी लेकर स्कूल पहुंच जाते हैं। ऐसे में कैसे अनुशासन रहेगा। शिक्षक अभिभावक मिलकर रास्ता निकालें। शहर से देहात तक प्रयास करने से सफलता अवश्य मिलेगी।

सामाजिक कार्यकर्ता करें पहल-रामानंद चंद्रवंशी
जद यू प्रखंड अध्यक्ष रामानंद चंद्रवंशी ने कहा कि सामाजिक कार्यकर्ताओं को पहल करनी होगी। शिक्षकों और अभिंभावकों की एक साथ बैठक आयोजित कर संवाद कायम करन अहोगा, तब एक रास्ता निकल सकता है। यह गंभीर मुद्दा है कि शिक्षक हैं, किंतु बच्चे गायब हैं। सरकार को चाहिए कि खेल की घंटी गांव से शहर तक के स्कूलों में अनिवार्य बनाये।

अब व्यवस्था बदल गयी- राजेश्वर सिंह
कांग्रेस प्रखंड अध्यक्ष राजेश्वर सिंह ने कहा कि अब पहले वाली बात नहीं रही। धारणायें बदल गयीं। हमारे वक्त में स्कूलों में एनसीसी कैडेट हुआ करता था। खेल के लिए हमारी टीम डाल्टनगंज तक जाती थी। खेल की प्रतियोगिताओं में सेना के अधिकारी तक शामिल होते थे। इससे शरीर को ही नहीं बल्कि मस्तिष्क को भी लाभ होता था।

मिट्टी में खेल आवश्यक- किशोरी मोहन मिश्रा
सेवा निवृत शिक्षक किशोरी मोहन मिश्रा ने कहा कि मिट्टी में खेल आवश्यक होना चाहिए। हम ऐसे ही खेल कर बडे हुए और स्वस्थ तन्दुरुस्त बने रहे। देह मजबूत होता है। खेल के क्रम में चोट लगती है किंतु स्वास्थ्य ठीक रहने के कारन कुछ नहीं होता है।


जुनून जगे तो मिले सफलता- शंभु कुमार
शिक्षक शंभु कुमार ने कहा कि अंतराअत्मा के जाग्रत होने से ही समस्या का समाधान होगा। जो व्यक्ति कुछ भी करने का जुनून पैदा कर लेगा वह कर लेगा। जब हम आत्मा से चाह लें तो राह निकल जाता है। स्कूलों का अनुशासन खत्म हो गय। बच्चों का दोष नहीं है। वे पढते हैं चाहे वह नीजि स्कूल ही जाते हों। वहां कैसे वे पढते है और अनुशासित भी रहते है? यह विचारणीय है। शिक्षा व्यव्स्था मे6 बदलाव से गडबडी हुई है।
  प्रायोजकों की है कमी- अजीत सिंह
यहां डे-नाइट क्रिकेट टुर्नामेंट का आयोजन करने वाली संस्था आरएसओडी के अध्यक्ष अजीत कुमार सिंह ने कहा कि खेल के आयोजनों के लिए सबसे बडी समस्या प्रायोजकों को लेकर आती है। शहर में जब भी आयोजन किया जाता है, इसकी कमी शिद्दत से महसूस की जाती है। कई शिक्षण संस्थान और व्यवसायिक प्रतिष्ठान सहयोग करते हैं किंतु इसके लिए सबसे बडा नाम भगवान प्रसाद शिवनाथ प्रसाद बीएड कालेज के सचिव डा.प्रकाशचन्द्रा का ही है। खेल से सामाजिक एकजुटता के साथ साथ शारीरिक और मानसिक मजबूती मिलती है।

पहल होगी तो प्रारंभ भी होगा-चिंटु मिश्रा
सुधाकर मिश्रा चैरिटेबल ट्र्स्ट के सदस्य चिंटु मिश्रा ने कहा कि पहल होगी तभी प्रारंभ भी होगा। दैनिक जागरण की यह पहल सराहनीय है। सभी शिक्षकों से आग्रह होगा कि स्कूलों में आठवीं घंटी अवश्य हो। जब छात्र जीवन में पढते-पढते बोर हो जाते थे तब खेल से ही उर्जा का संचार होता था। खेलने की घंटी बजते ही शरीर में स्फुर्ति और उर्जा का संचार हो जाता है। कहा कि गलती सब की है। हमारी भी और शिक्षकों के साथ व्यवस्था की भी, किंतु पहल से ही कोई रास्ता निकलने की उम्मीद जगती है।
पढने की उर्जा भी खेल से- प्रफ्फुलचन्द्र सिंह
बिहार-झारखंड के लिए राज्य स्तरीय क्रिकेट खेल चुके प्रफ्फुलचन्द्र सिंह का मानना है कि यह भ्रम है कि खेल से सिर्फ खिलाडी बलवान और मानसिक रुप से स्वस्थ होता है। इससे बहुत अधिक मिलता है। इससे रोजगार भी प्राप्त होता है। सबकी प्रतिभा और क्षमता सामने आती है। पढने के लिए जो दस घंटे का वक्त चाहिए होता है उसके लिए उर्जा भी खेल से ही प्राप्त होती है। जो बच्चे खेलते नहीं है, उनमें आवश्यक उर्जा का अभाव होता है। नतीजा वे पूरी तन्मयता से पढ भी नहीं पाते हैं। घरेलु उपचार खेल से अधिक किसी क्षेत्र से सीखने को नहीं मिल सकता। कहा कि खाली समय में बच्चे नकारात्मकता की ओर अधिक आकर्षित होते हैं। खेल में शामिल होने से वे सकारात्मक होते हैं और अपनी उर्जा और विवेक बुद्धि का सही दिशा में इस्तेमाल करते है। दबाव झेलने, एक दूसरे से व्यवहार बनाने की कला सीखते हैं। बुनियादी सुविधा का अभाव है, खेल मैदान नहीं बचे हैं, जो हैं वो खराब है और वहां चोटिल होने की संभावना अधिक होती है।

नौकरी भी खेल से ही मिली-मनोज
एथलेटिक्स के खिलाडी मनोज कुमार ने कहा कि अशोक इंटर स्कूल में खेल कर ही नौकरी हासिल किया। यदि व्यक्ति को खेल में रुचि के साथ समर्पण की भावना होगी तो वह आगे बढ जायेगा। तब आठवीं और सातवीं में खेल किया करता था। भाइचारा और सौहार्द तो बढता ही है, हमने नौकरी भी इसी खेल की बदौलत हासिल किया। जिला और राज्य स्तर पर खेलने में बहुत परेशानी हुई। यह तो होगी ही और सबको परेशानी झेलनी पडती है। आयोजन हो खूब हो तो अच्छा माहौल बनेगा और बच्चों को सफलता मिलनी तय है।


खेल घंटी होना आवश्यक- अजय पांडेय
स्वामी विवेकानन्द राष्ट्रीय युवा मंच के अजय पांडेय ने कहा कि हमारे लिए खेल का अच्छा मौका मिला है। हमारी पीढि को अब यह मुश्किल का सामना है। दबाव रहता है कि बस पढो, पढो और पढने में लगे रहो। जबकि खेल में अपनी उर्जा और स्फुर्ति दिखाने का अवसर मिलता है। आठवी घंटी को खेल घंटी आवश्यक बनाया जाये और खेलना अनिवार्य हो।

Wednesday, 27 January 2016

फ्रांसिस बुकानन की दाउदनगर यात्रा....

धर्मवीर भारती 

आजादी से पहले कई अंगे्रज यात्रियों ने औरंगाबाद जिला (तात्कालिन गया जिला) की यात्रा की। जिसमें कनिघंम, विलियम डेनियल, फ्रांसिस बुकानन, हैमिल्टन का नाम महत्वपूर्ण है।
फ्रांसिस बुकानन एक चिकित्सक थे। बंगाल चिकित्सा  कोलकाता में उन्होंने चिड़ियाघर की स्थापना की। जो कलकत्ता (अब-कोलकाता) अलिपुर चिड़ियाघर के नाम से मशहुर है। बुकानन ने भारत में दो सर्वे किए। पहली बार 1800 ई. में मैसुर का एवं 1807 ई. से 1814 ई. तक बंगाल का ।
1811 से 1812 तक पटना - गया क्षेत्र का बैलगाड़ी से भ्रमण किया। जिनका संकलन ‘जर्नल आफ फ्रांसिस  बुकानन‘ में है। बुकानन ने अपनी यात्रा के दौरान रास्ते का नक्शा बनाया और सर्वे भी किया। स्थान को खास लैंडमार्क से निश्चित दूरी को दर्शाया गया है।
फ्रांसिस बुकानन और उनकी दाउदनगर यात्रा का नक्शा
बुकानन की यात्रा के दौरान लिखी गई डायरी में शब्दों का चयन गजब हैं। उन्होंने जो देखा वही लिखा। उनकी लेखनी से उस समय की सामाजिक और धार्मिक व्यवस्था के बारे में पता चलता है। इस महत्वपूर्ण यात्रा में जो भी मिला उन्होंने उससे बातचीत की, जानकारी ली। बुकानन ने यात्रा के दौरान तय की गई दूरी का नक्शा बनाया जिसका स्केल है 16 मील= 1 ईंच ।
ॅ06 फरवरी 1812 को फ्रांसीस बुकानन बैलगाड़ी के माध्यम से गोह होते हुए देवहरा पहूंचे। रास्ते में देखा की महिलाएं लाल घाघरे में है और बैद्यनाथ की तरफ पुरूषों के साथ कांवर लेकर जा रही है। साथ में जोर-जोर से नारा लगा रही हंै। बैद्यनाथ की तरफ आने-जाने वाले रास्ते में काफी मंदिर, मुर्तियां एवं उनके अवशेष बिखरे पडे़ है। उन्होंने देवहरा के बाद पूनपून नदी पार किया । पूनपून नदी के बारे में उन्होंने लिखा है कि उसकी चैड़ाई 100 यार्ड है और गया क्षेत्र के किसी भी पानी के स्त्रोत से ज्यादा पानी है। पूनपून नदी की बह रही धारा 30 यार्ड चैड़ी और 12 से 18 इंच गहरी एवं चैड़ी है। उसमें बह रहा जल अत्यंत निर्मल है।
दोपहर को वे पूनपून नदी के किनारे स्थित छिन्नमस्तिका माता मंदिर पहंूचे। मंदिर ध्वस्त की गई पूरानी मंदिर के ईटों से पूनः निर्मित है। वास्तुकला असाधारण है। मंदिर के अंदर छिन्नमस्तिका माता की मुर्ति है। वह एक लेटे हुए पुरूष के शरीर के उपर नृत्य कर रही हैं और प्रणय मुद्रा में है। माता खून की प्यासी हुै। उन्होंने अपना सिर स्वयं काटा है। उनके गर्दन  से खुन की तीन धाराएं बह रही है। पहली धारा माता के कटे हुए मुख में दूसरी धारा हाथ में लिए हुए खप्पड़ में और तीसरी धारा जयकाल के मुख में। पास में ही गौरी शंकर की मुर्तियां है जो अमोद मुद्रा में है एक बैल की खुबसुरत प्रतिमाएं है जो तेल एवं सिंदुर से रंगी है। दो पुजारी बैठकर पुजा कर रहे हैं। मंदिर बहुत छोटा है इसके चारों ओर अनेकों शिवलिंग हंै और यहां सन्यासियों ने धूनी रमाई है।
07 फरवरी 1812 को वे देवहरा  से 10 मील की दूरी पर छोटे-छोटे गांव से होते हुए दाउदनगर पहूंचे। बुकानन लिखते है कि सड़कंे बैलगाड़ी के चलने लायक थीं और रास्ते के दोनों तरफ कई मंदिर हैं।
दाउदनगर में विश्राम किया और अपनी डायरी में रास्ते के विवरण को लिखा। 08 फरवरी 1812 को दाउदनगर  के निवासियों से मनोरा गांव की प्रसिद्धि के बारे में सूनी और चार  कोस की दूरी तय कर पहूंच गए। देखा की मनोरा गांव ऊंचाई पर बसा है। गांव के पूर्व दिशा में पूराना मंदिर है, जो घुमावदार है। दीवार बहुत मोटी है। मंदिर की बनावट अन्य मंदिरों की तुलना मंे अलग है। मंदिर में पद्मासन लगाए बुद्ध की प्रतिमा है। हाथ घुटनों पर है। दोनों पैर के पास पुजारी ब्राह्मण है। जिनको पाठक से संबोधित किया जाता है। मनोरा गांव के बारे में सारी जानकारियां दी। उन्होंने बताया की बुद्धपूजन उनकी संस्कृति नहीं थी। बुकानन अपने जर्नल में लिखते है कि वह जमीदार ब्राह्मण मुझसे डर भी रहा था। उसे लगा रहा था की मैं यहां की जमीन पर कब्जा करने आया हूं। जमींदार ब्राह्मण मुझे कोल राजा के घर के खंडहर दिखाने को कहा जिसने इस बुद्ध मंदिर को बनवाया था। वह मुझे मंदिर से 200 यार्ड उत्तर की ओर ले गया जहां ईटों का खंडहर बिखरा पड़ा था । खंडहर लगभग 20 यार्ड वर्गाकार था। जिसकी सतह पर दो शिवलिंग  स्थापित थे। पास में दो मुर्तियां थी। जिसमेें  एक छोडे वासुदेव की मुर्ति स्थानीय लोग  इसे महामा कहते है।
उसके बाद बुद्ध की बड़ी प्रतिमा को कलाकृति को निहारने लगा। मुर्तियां काफी सजी धजी थी। शिलालेख भी लिखा था। मनोरा से एक कास उत्तर की तरफ बोतारा ;इवनजंतंद्ध पहंूचा । स्थानीय लोगों ने बताया कि कोल राजा के खंडहर पड़े हैं। यह भी 20 यार्ड वर्गाकार एवं 20 फीट उंचा था। इसकी काफी सारी ईटें निकाली गई थी । मेरे अनुमान से यह पूजा का स्ािान रहा होगा, कारण खंडहर में देव गौरीशंकर की टुटी हुई प्रतिमाएं थी।
जिसे लोग सोका बोक्ता ;ेवांइवाजंद्ध कहते है। गांव के लोग इस खंहडर को चेरस कहते है। जो कोल राजाओं के राज्य के गवाह हैं। फिर मैं दाउदनगर वापस चला आया। 11 फरवरी 1812 को दाउदनगर से 3 कोस दूर पूर्व की ओर चला गया वहां पर एक गांव आया जिसका नाम ताल है। गांव काफी लंबा चैड़ा था दक्षिण की तरफ दलदल था । जिसे कोेल का निवास स्थान बताया जाता है। दीवारों की मिट्टियों से दलदल का निर्माण हो गया होगा। यहां की मिट्टियों में ईटों एवं वर्तन के अवशेष पाए गए लेकिन जांच से किसी बड़े किले या मंदिर नही थे।
दाउदनगर और हमीदगंज दो कस्बे हंै और दोनों के बीच में एक थाना भी है। हमीदनगर की गलियां सीधी एवं चैड़ी हंै लेकिन कुछ गलियां पतली एवं टेड़ी-मेढ़ी भी है। चैड़ी गलियां मुख्य मार्ग से निकलती हैं रास्ते में झोपड़ियां अधिक संख्या में है।
दाउदखान जिसके नाम से इस शहर का नाम रखा गया, ने एक संुदर किलाबंद सराया का निर्माण कराया । यह आयताकार है, ईट की दीवारों से निर्मित है। उसमें संुदर नक्काशी भी है। दाउद खां के वंशज सराय के जीर्ण-शीर्ण भाग में अपना आवास बनाकर रह रहे थे। बुकानन के दृष्टिकोण से यह गढ़़ रहा होगा लेकिन  अंग्रेजी सरकार के नजर से बचाने के लिए इसका प्रयोग सराय के रूप में किया जा रहा था। दाउद खां केे बेटे ने भी एक सराय का निर्माण कराया जो हामीद के नाम से है। इसमें लंबी एवं चैड़ी गलियां है और दोनों तरफ गेट भी है। यहां पर छोटा भवन भी है जिसे स्थानीय लोग इमामबाड़ा कहते हैं । इसका  रख-रखाव अच्छा है। गारे से निर्मित एक और भवन है। जिसे चैतेरा बोलते है। यह तीन मंजिला है, बढ़ते ऊंचाई में भवन शंकु के आकार का होते गया है।  यह भवन घेरा रहित है और छत पंचाकृति में है। जो देखने में खास नहीं है । इसका आकार जयपुर के प्रसिद्ध भवन के जैसा मेल खाता है। इमामबाड़ी के पास दो नवाबों के स्मारक बने है। जो कि छोटे और अस्त-व्यस्त है। दाउदनगर में मकानों की संख्या गया शहर से कम है लेकिन यहां के निर्मित मकान देश के अन्य साधारण लोगों के घरो के मुकाबले ज्यादा आरामदायक है। मकान मिट्टी  एवं खपड़े से निर्मित है।
12 फरवरी 1812 को दाउदनगर से 12 मील दूरी तय कर पहलेजा पहुंचा । बसंत ऋतु की पश्चिमी हवा के किनारे काफी हवा चल रही थी। कस्बे से चार मील दूर मैं शमशेर गंज (शमशेर नगर) पहुंचा । यहां बाजार एवं सराय है। जिसका निर्माण शमशेर खान ने करवाया था। बुकानन आगे लिखते है कि शमशेर खान को गांव के दक्षिण तरफ एक बगीचे में दफनाया गया था। यह बगीचा चारों तरफ से ईट से घेरा गया है।
शमशेर खान को स्थानीय लोग जबरदस्त खान के नाम से जानते थे। जिसका मतलब उसके हिंसक होने को दर्शाता है। शमशेर खान की शादी जोबन खान की बहन से हुई थी।  फ्रांसीस बुकानन  12 फरवरी को ही अगनुर  सराय  अरवल विक्रमपुर मनेर होते हुए पटना की ओर प्रस्थान कर गए। दाउदनगर का इतिहास को खोजने में लिखने में कई लेखकों ने कलम चलाई  जिसमें महत्पपूर्ण श्रेय युवा लेखक श्री उपेन्द्र कश्यप को जाता है। वे फ्रांसिस बुकानन हैंमेलटन के बाद दाउदनगर अनुमंडल के इतिहास को करीब 21 वर्षो से खोजने एवं जानने में लगे हैं। दाउदनगर के जिउतिया लोक उत्सव को आज तक उपेक्षित रखा गया है जो दुर्भाग्यपूर्ण है।

सिलौटा बखौरा से दाउदनगर भाया सोन नद की यात्रा


---उपेन्द्र कश्यप---9931852301
सिलौटा बखौरा। जी हां! सतरहवीं सदी में औरंगजेब के शासन काल में बसाये गये दाउदनगर का पूर्व नाम। शहर का नाम महाभारत कालीन श्री कृष्ण के अग्रज बलदाउ से जोड कर “दाउनगर” बताने की कोशिश की जाती है, जिसका कोई प्रमाण नहीं है। तर्क दिया जाता है कि बलदाउ मगध नरेश जरासंध के पास इसी रास्ते से गये थे। क्या वास्तव में ऐसा कोई मार्ग था, जो सिलौटा बखौरा से गुजरता था? माना जाता है कि भगवान बुद्ध बोधगया से सारनाथ जाने के क्रम में मनौरा में विश्राम किये थे। उस मार्ग में गोह, मनौरा और अन्छा परगना के गांव पडे होंगें। कौन जानता है? मनौरा क्षेत्र में इसी कारण बुद्ध का महत्व दिखता है। ‘सोन के पानी का रंग’ एक रास्ता बताता हैं- जो राजगृह से सीधे पश्चिम चलकर वर्तमान सोनपुर गांव (जिला-गया) होते हुए उत्तर पश्चिम काशी की ओर चला जाता है। राज प्दच्युत होकर कोशल नरेश प्रसेनजित मगध नरेश अजातशत्रु से सहायता मांगने इसी मार्ग से राजगृह आया था। अजातशत्रु बिंबिसार का पुत्र था जिसने अपने पिता के बाद 492 ईसा पूर्व से 462 ई.पू. तक मगध पर शासन किया था। सोनपुर के निकट ही गया से एक और मार्ग आकर मिलता था। यह सम्मिलित मार्ग सोन पार कर कारुष के जंगलों से होकर काशी को चला जाता था। बुद्धत्व प्राप्त करने के बाद गौतम इसी मार्ग से बोधगया से सारनाथ की ओर गये थे। जब मगध की राजधानी राजगृह से उठकर पाटलीपुत्र चली गई तब यह मार्ग बंद हुआ। ‘ललित विस्तर’ से अनुमान होता है कि पहली ईसा सदी तक यह मैदानी मार्ग लोगों की नजरों से पूरी तरह ओझल हो गया था। यानी दाउदनगर बनने के करीब साढे सोलह सौ साल पहले ही यह मार्ग बंद हो गया था। बाद में सतरहवीं सदी में जब फ्रांसीसी यात्री तावर्निये पश्चिमी काशी से रोहतास गढ के पास सोन पार कर पटना गया था तब वह सोन के किनारे किनारे दाउदनगर-अरवल होते हुए पटना पहुंचा था। यह इलाका (अंछा परगना) उस मार्ग में पडता था जिससे औरंगजेब कालीन भारत के पूर्वी इलाके (कोलकाता, मगध समेत बडा क्षेत्र) से राजस्व की वसूली कर दिल्ली दरबार को पहुंचाया जाता था। जब यह कहा जाता है कि ‘अंछा पार जब गए भदोही तब जानो घर आये बटोही’ तो यह स्पष्ट हो जाता है कि इस परगना के घनघोर जंगली क्षेत्र में राजस्व लूट लिया जाता था। तभी दाउद खां ने इस इलाके की किलाबन्दी की। हम जानते हैं कि सोनघाटी का विकासमान यातायात भी प्राकृतिक महत्व के कारण है, मानवीय महत्व के कारण नहीं। पाटलीपुत्रा (पटना) को छोडकर इस घाटी के प्राचीनतम ज्ञात नगर हैं धनपुर, सोहागपुर और बिलहरी। इनके बाद के मध्यकालीन नगर हैं- अगोरी, पलामू, रोहतासगढ, दाउदनगर तथा मनेर। इस कारण यह स्पष्ट है कि दाउदनगर मध्यकालीन (मुगलकालीन) नगर है। महत्वपूर्ण है कि सिलौटा बखोरा या दाउदनगर परगना अंछा का एक इलाका है। जमीन खरीद फरोख्त के दस्तावेजों में हाल तक हाल-मोकाम के बाद परगना अंछा ही लिखा जाता रहा है। अंछा, गोह और मनौरा तीन महत्वपूर्ण परगना मुगलकाल में थे। इन तीनों परगनाओं को औरंगजेब ने दाउद खां को पलामु फतह के बाद भेंट किया था। औरंगजेब ने सिपहसिलार दाउद खां को बिहार का नया सुबेदार नियुक्त किया था। उसने इलाका विस्तार का अभियान 1660 में प्रारंभ किया और जिला गया का कोठी, औरंगाबाद जिला का कुंडा, और देवगन राज को फतह कर पलामु भी फतह कर लिया था। इसके बाद ही दाउद खां ने सिलौटा बखौरा को आबाद किया और नगर बसाया। यहां 1662 में दाउद खां ने अपना किला बनाना प्रारंभ किया था जो 1672 में पूर्ण हो सका था।

दाउदनगर और उसके दक्षिण बारुण तक का इलाका घने जंगल से भरा हुआ था। 1766 में फ्रांसीसी अभियंता लुई फेलिक्स द ग्लास ने लिखा है कि “इस इलाके में सर्वेक्षण करना नितांत असंभव है। अभेद्य वनाच्छादित प्रदेश है। न सडक है न पगडंडी ही”। यानी यह इलाका तब भी दाउदनगर ही था घनघोर जंगल के बीच विकास के लिए संघर्ष करता हुआ एक कस्बा। जब बलदाउ (महाभारत काल) और बुद्ध (ढाई हजार साल पूर्व) थे तो यह इलाका था ही नहीं। ऐसे में बलदाउ से दाउग्राम होने की कोई संभावना बचती ही नहीं है। मगध के इस क्षेत्र में पिछले ढाई हजार सालों में मह्त्वपूर्ण भौगोलिक भूगर्भीय घटना रही है सोन भद्र नद के प्रवाह में परिवर्तन। विशेषज्ञ कहते हैं कि पुनपुन नदी जो  वर्तमान में फतुहा में गंगा में मिलती है वह नौबत पुर (पटना के दक्षिण-पश्चिम में) के आगे फतुहा में गंगा में मिलने तक बाल्मिकी कृत रामायणकालीन सोन के पाट का अनुसरण करती है। फल्गु जब गंगा के समानांतर बहना शुरु करती है तो धोवा नाम धारण करती है। सोन की धोवन होने की वजह से ही। सोन जो आज कोइलवर में गंगा में मिलता है उसका प्राचीन प्रवाह और पूरब दिशा से होता था और वर्तमान पटना शहर के बीच से होते हुए गंगा में मिलता था। पूरब में सोनउरा-सोनपुर-मोरहर-दरघा-धोवा-हरोहर से आगे पूरब को सोन कभी नहीं गया। इसी तरह वह पश्चिम में अपने वर्तमान पाट से कुछ पश्चिम तक जा कर रुक गया। बाणभटट की कादम्बरी की रचना सोन नद के किनारे स्थित प्रीतिकूट में की गयी थी। इसे स्वयं बाण ने अपना गृह बताया है। यह प्रीतिकूट कोई दूसरा नहीं बल्कि औरंगाबाद जिले के हसपुरा का पीरू गाँव ही है। ध्यान दें, हर्षवर्धन काल में सोन वर्तमान देवकुण्ड-रामपुर चाय होते हुए प्रवाहित होता था, जिसे दाउदनगर में ‘बह’ कहा जाता है। हर्षवर्धन-वाणभट्ट काल (सातवीं सदी का पूर्वार्ध) में सोन का मार्ग हुआ करता था ‘बह’, जहां निरंतर पानी बहा करे। यहां इसे सोन का छाडन कहा जाता है। जे.डी.बेल्गर ने इसका उल्लेख किया है। उसके शब्दों में-‘अधिकारियों द्वारा प्राप्त सूचनाओं और अपने व्यक्तिगत अवलोकन निरुपण के आधार पर मेरा विचार है कि सुदूर अतीत में दाउदनगर के पास तराढ (तराड) गांव के निकट से सोन दक्षिण-पूरब को बहता था। देवकुंड या देवकुढ के टांड की बिल्कुल बगल से होता हुआ रामपुर चाइ और केयाल के सटे आगे बहता था। तराढ या तरार (आर तर या आर पर) का हिन्दुस्तानी में अर्थ होता है नदी की उंची कगार पर बसा हुआ। नाम से ही स्पष्ट है कि यह गांव पहले किसी नदी के उंचे तीर या तट पर बसा हुआ था। तराढ से बिल्कुल सटे और इसके तथा दाउदनगर के बीच में सोन नहर के लिए हाल की खुदाई से बिल्कुल साफ हो गया है कि यह इलाका पहले की किसी बडी नदी का पाट था। चाइ और केयाल में पानी के बडे-बडे गड्ढे आज भी मौजूद हैं-संभवत: वे प्राचीन सोन के अवशिष्ट हैं। देवकुंड में हर साल एक मेला लगता है। मैं समझता हूं कि केयाल से सोन उत्तर-पूरब को लगातार बहते उए सोनभदर गांव के पास पुनपुन का वर्तमान पाट धर लेता था।“ बेल्गर आगे लिखता है- ‘यह स्पष्ट है कि सुदूर अतीत से बुद्ध के निर्वाणकाल तक मेरे इंगित किए हुए रास्ते से बहता हुआ सोन फतुहा के पास गंगा में मिल जाता था।‘ बेल्गर के इस मत में भी संशोधन की गुंजाईश है। उन्नीसवीं सदी में पटना प्रमंडल का अभियंता रह चुका और सडकें बनवाने के सिलसिले में पटना- गया इलाकों के आभियांत्रिक लक्षणों का पूरा ज्ञान हासिल करने वाले एम.पी.बी.डुएल का मत है कि-‘सोन अरवल और दाउदनगर के बीच से अपना पाट छोडकर पटनावाली सडक पार करने के बाद मसौढी के उत्तर पुनपुन का पाट धर लेता था। वहां से उसका कुछ पानी फतुहा के निकट गंगा में मिल जाता था और कुछ पानी मैथवान (वर्तमान नाम-महतमैन) नदी से होकर मुंगेर की ओर बढा जाता था।‘ कौल के मत को ध्यान रखते हुए डुएल के मत में इतना सुधार किया जा सकता है कि फतुहा के निकट का पानी गिरने (या, बेल्गर के मतानुसार, सोन-गंगा-संगम) की स्थिति बुद्धकालीन हो सकती है, बाल्मीकि कालीन नहीं। उनदिनों फतुहा के उत्तर का राघोपुर-दियारा टापू नहीं , मगध की तत्कालीन भूमि का एक खंड था। सोन के पाट परिवर्तन के इस विशद विवेचना से यह स्पष्ट हो जाता है कि महाभारत और बुद्ध काल में सिलौटा बखौरा के अस्तित्व में होने की धारणा उचित नहीं जान पडता है।

Tuesday, 5 January 2016

तीन साल बाद मिला व्यापार मंडल को अध्यक्ष

फोटो-व्यापार मंडल कार्यालय

इतिहास के आइने में

उपेन्द्र कश्यप
 सोमवार को करीब तीन साल बाद व्यापार मंडल को कार्यकारी अध्यक्ष मिल गया। गत 04 अक्टूबर 2012 को सुदेश सिंह की हत्या के बाद से यह पद रिक्त था। नया कार्यकारी अध्यक्ष दीपक सिंह बने हैं। इस अवसर पर इस संस्था का इतिहास जानना दिलचस्प होगा। मुखिया और पूर्व व्यापार मंडल अध्यक्ष भगवान सिंह ने बताया कि सन 1978 में तरारी पंचायत के मुखिया बने बेलाढी निवासी दिनेश कुमार सिंह 1983 और 1986 में अध्यक्ष चुने गये थे। इनकी पुत्र वधु निर्मला सिन्हा अभी तरारी से मुखिया हैं। इनके पुत्र नागेन्द्र कुमार 2007 में व्यापार मंडल अध्यक्ष पद के लिए चुनाव लडकर हार गये थे। सन 1989, 1992 और 1995 में लगातार तीन बार संसा के हीरालाल सिंह अध्यक्ष निर्वाचित हुए। वे अपने पंचायत संसा से मुखिया और बाजार समिति के अध्यक्ष भी रहे हैं। 1998 में गोरडीहां से मुखिया भगवान सिंह का मुकाबला सुदेश सिंह से हुआ। अध्यक्ष बन गये भगवान सिंह। सन 2001 में पुन: भगवान सिंह निर्विरोध चुन लिए गये। सन 2004 में कर्यकारिणी ने सुदेश सिंह को निर्विरोध अध्यक्ष चुन लिया। कोई चुनौती नहीं मिली। सन 2007 में नागेन्द्र सिंह और करमा पंचायत के मुखिया सुदेश सिंह के बीच मुकाबला हुआ। सुदेश सिंह जीत गये। इसके बद अंतिम चुनाव 2012 में हुआ तो सुदेश सिंह जीते। किंतु एक से डेढ माह के भीतर ही उनकी हत्या कर दी गयी। तब से यह पद रिक्त है।    

Wednesday, 30 December 2015

छुट्टियां न मनाने का अब मिला प्रतिफल

सास के कहने पर भी नहीं की वकालत
बच्चों को दिये समय का अब गर्व
फोटो-इशान के पिता प्रणव कुमार पांडेय और माता सुचित्रा सिंह
उपेन्द्र कश्यप, दाउदनगर (औरंगाबाद) इशान किशन यूं ही भारतीय अंडर 19 क्रिकेट टीम का कप्तान नहीं बना है। उसका क्रिकेट कैरियर बनाने के लिए अधिवक्ता मां सुचित्रा सिंह और पिता प्रणव कुमार पांडेय ने बहुत त्याग किया है। गोरडीहां पंचायत मुख्यालय में पैत्रिक घर में गौरवांवित दंपति ने बताया कि उन्होंने कभी गर्मी या सर्दी की छुट्टी नहीं बिताया। हर छुट्टी का इस्तेमाल इशान और राज किशन के लिए क्रिकेट प्रैक्टिस हेतू किया। जितना अधिक से अधिक अभ्यास कर सके, इसका अवसर बनाया। छुट्टी के दिन में अधिक समय और सहुलियत इसके लिए उपलब्ध हो जाता था। अब जब वह नामचीन और नेशनल सेलेब्रेटी बन गया है तो इस त्याग पर गर्व महसूस हो रहा है। मां बोलीं- “प्राउड फिल कर रही हूं। यह गौरव की बात है। बेटा बिहार, झारखंड ही नहीं देश का प्रतिनिधित्व करने जा रहा है। यह सब उपर वाले की मर्जी है।“ बताया कि वे खुद अधिवक्ता हैं। सास डा.सावित्री सिंह ने वकालत करने को कहा भी किंतु, बच्चों की देख-भाल के लिए यह नहीं किया। बताया कि जब इशान बच्चा था तब दादा राम अनुग्रह पांडेय कुरकुरे और पलास्टिक की गाडी देते थे। तब इशान इससे नहीं खेलता था। उसकी रुचि नहीं थी। तब दादा ने पलास्टिक का बैट बाल दिया तो खूब मन लगा कर खेलता। परदादा राजनंदन पांडेय के जिम्मे पढाना था। पिता ने बताया कि इशान की रुचि को देखते हुए वे उसके साथ मोइनुलहक स्टेडिम जाते थे। कभी दवाब पढने के लिए नहीं बनाया।  

Tuesday, 29 December 2015

अंतर्राष्ट्रीय दबाव में नहीं है इशान किशन

                   
बांगलादेश में खेलेगा वर्ल्ड कप
अंडर-19 क्रिकेट टीम का है कप्तान
उपेन्द्र कश्यप                                                फोटो- इशान अपने परदादा एवं अन्य के साथ
 पहली बार अंडर -19 वर्ल्ड कप भारतीय क्रिकेट टीम का कप्तान बनाये गये इशान किशन पर कोई दबाव नहीं है। मंगलवार को गोरडीहां स्थित उसके पैत्रिक घर पर यह जानने की किशिश की कि उस पर इस उपलब्धि का कितना दबाव है? बताया कि किसी तरह का दबाब नहीं है। अपने लडकों (साथी अन्य 14 खिलाडी) को मानसिक तौर पर मजबूत रखना है। जब अंतर्राष्ट्रीय मीडिया और दर्शक होंगे तब तो दबाव होगाया नहीं? यह पूछने पर कहा कि ऐसा कुछ नहीं है। हम तैयार हैं। मीडिया के हुजूम को लगातार इंगलिश में साक्षात्कार दे रहा हूं। कहा कि हमारी टीम एकजुट होकर खेलेगी और हम जीत कर आएंगे। बांग्लादेश में यह टूर्नामेंट 22 जनवरी से शुरू होना है। ईशान के नेतृत्व में भारतीय टीम 27 जनवरी को अपना पहला मैच आस्ट्रेलिया से खेलेगी। इससे पहले 17 जनवरी तक नेशनल क्रिकेट एकेडमी बंगलुरु में प्रशिक्षण शिविर में भाग लेगा। ईशान ने अपनी सफलता का श्रेय अपने माता-पिता को देते हुये कहा कि छुटटी के दिनों में हम दोनों भाईयों को लेकर पिता अभ्यास कराने पटना के मोईनुल हक स्टेडियम ले जाया करते थे। बीसीए, सीएबी, आरसीसी और सीएपी के तहत प्रशिक्षण मिला। इसके बाद 2011 में झारखंड से खेलने चले गये। बेहतर से बेहतर प्रदर्शन करने का संकल्प ले चुका इशान का लक्ष्य सीनीयर इंडियन टीम में शामिल होकर देश के लिए खेलना है।  

 मुखिया ने किया इशान को सम्मानित
फोटो-मुखिया भगवान सिंह एवं अन्य ने किया सम्मानित
घर पहुंचते जुटा ग्रामीणों का हुजूम
सुरक्षा को पुलिस बल हुआ तैनात
 इशान किशन जब मंगलवार को अपने पैत्रिक गांव गोरडीहां पहुंचे तो पुलिस सुरक्षा में तैनात दिखी। ग्रामीणों का हुजूम जुट पडा। गोरडीहां पंचायत के मुखिया मुखिया भगवान सिंह ने पंचायत की ओर से उसे सम्मानित किया। मौके पर उसे सिनियर होने के नाते नेट पैक्टिस कराने और फिटनेस सत्र दिलाने वाले प्रफ्फुलचन्द्र सिंह, मुखिया लव कुमार सिंह, पंचायत समिति सदस्य कौशल शर्मा, भीम शर्मा, राकेश शर्मा, राजेश पांडेय, पिता प्रणव पांडेय, माता सुचित्रा सिंह, दादा राम अनुग्रह पांडेय और परदादा राजनन्दन पांडेय, भाई राज किशन, अभिषेक कुमारम् समेत सैकडों ग्रामीण उपस्थित रहे। सबमें उसे एक झलक देख लेने की उत्सुकता दिखी। मुखिया भगवान सिंह ने कहा कि इशान के कारण गांव की पहचान अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर होगी। यह गौरव की बात है। गांव का भ्रमण किया। वह गांव में कई घरों में बुलावे पर और स्वयं भी गया। हर कोई उसके साथ अपना एक पल बिता लेने को बेताब था। बडे बुजूर्गों का आशीर्वाद प्राप्त किया। साथ में वह प्रफ्फुलचन्द्र सिंह से गुफ्तगूं करता रहा।

कैसे खेलेगा से बहुत दूर निकल गया इशान
      फोटो- इशान किशन प्रफ्फुलचन्द्र के साथ
शत्रुघ्न सिन्हा ने पूछा था- कैसे खेलेगा यह बच्चा?
 अंडर -19 वर्ल्ड कप भारतीय क्रिकेट टीम का कप्तान बनाये गये इशान किशन ने बहुत दूरी तय कर ली है, किंतु उसे अभी बहुत दूर जाना है। कभी बिहारी बाबु (शत्रुघ्न सिन्हा) ने उस पर शंका जाहिर करते हुए पूछा था- कैसे खेलेगा यह बच्चा? इनको सिनियर होने के नाते मोइनुलहक स्टेडियम में फिटनेस सत्र और नेट प्रैक्टिस कराने वाले प्रफ्फुल चन्द्र सिंह जब उससे मंगलवार को मिले तो पुरानी यादें ताजा हो गयीं। बताया कि 2004 में सुखदेव नारायण क्रिकेट टुर्नामेंट पटना में जन अपने सिनियरों के सामने मात्र 06 साल की उम्र में इशान उतरा तो श्री सिन्हा ने पूछा- कैसे खेलेगा यह बच्चा? तब उसे पैदा भी बान्धना नहीं आता था।प्रफ्फुल ने कहा कि अब हर कोई इसके साथ खेलना चाहेगा। कई सपने देखेंगे कि इनके साथ खेल लेते। यह सौभाग्य भी सबको नहीं उपलब्ध हो सकेगा। दोनों ने अपनी कई यादें साझा की। बताया कि आज जो नाम मोला है वह समर्पण और त्याग की वजह से मिला है। परिस्थिति बदल गयी है। इन्होंने इशान को उपहार भेंट किया। 

प्रदर्शन से खुलेगा भविष्य के कई दरवाजे
 इशान किशन के लिए भविष्य के कई दरवाजे बस खुलने वाले ही हैं। यह इस पर निर्भर करता है कि वह बांलादेश में अंडर-19 वर्ल्ड क्रिकेट टुर्नामेंट में कैसा प्रदर्शन करता है। यदि बतौर बैट्समैन एक दो अर्धशतक या बतौर कप्तान बेहतर प्रदर्शन करने में वह सफल रहा तो भारतीय क्रिकेट के एकदिवसीय और टेस्ट के लिए दरवाके पर वह दस्तक दे सकेगा। प्रफ्फुलचन्द्र सिंह ने बताया कि बांगलादेश के बाद नजदीक में इंडियन प्रिमियर लीग (आईपीएल) होने वाला है। इस नये सत्र के लिए कोई टीम उसे अपने लिए खेला सकती है। यह आने वाले कई साल तक नियमित रणजी खेल सकेगा। इसे बीसीसीआई हर रणजी मैच के लिए मोटी रकम देता है। इशान आश्वस्त है कि वह उंची छलांग लगा सकेगा। उस दिन का सबको इंतजार होगा। जब वह बांगलादेश में खेल रहा होगा तब भी इसकी हर गतिविधि पर औरंगाबाद के निवासियों की नजर होगी। हर कोई बस फिलहाल यही कामना कर रहा है कि वह बेहतर प्रदर्शन कर भारत लौटे।

तब जैसा होगा वह शमां?

 जब बांगला देश में वह भारत की ओर से भारतीय क्रिकेट अंडर 19 टीम का झंडा बतौर कप्तान लेकर चलेगा तो कैसा शमां होगा? जो होगा वह देखना आंखों को सुकून देगा। न सिर्फ भारत के लोग उस दृष्य का गवाह बनना चाहेंगे, बल्कि बिहार, औरंगाबाद और फिर दाउदनगर के लोग उस शमां को देखने से चुकना नहीं चाहेंगे। भारतीय राष्ट्रगान का वह यादगार पल दर्शनीय होगा।