डॉ. शम्भू शरण सिंह
जिउतिया, जितिया या जीवित्पुत्रिका व्रत हिंदू माताएं अपनी संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और मंगल कामना के साथ करती हैं। बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, बंगाल और नेपाल के क्षेत्रों में यह कठिन साधना वाला पवित्र निर्जला व्रत श्रद्धा, आस्था, विश्वास के साथ मनाया जाता है। गंधर्व राज जीमूतवाहन को समर्पित यह व्रत नहाय खाय से आरंभ होकर मुख्य निर्जला उपवास और फिर पारण के साथ संपन्न होता है। भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के वैविध्य की स्वर्णिम कड़ी में यह पर्व विक्रम संवत के आश्विन माह के कृष्ण पक्ष के सातवें से नौंवे चंद्र दिवस तक मनाया जाता है। सांस्कृतिक विविधता के अनोखे विरासत की कड़ी में हिंदू या सनातन समुदाय पर्व त्योहार की समृद्ध परंपरा को बदलते जीवन परिदृश्य में भी संजोए रखा है।
ऐसी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत की स्वर्णिम कड़ी में श्रद्धा के साथ संपन्न होने वाला जितिया पर्व विभिन्न भौगोलिक परिवेश में विभिन्न स्वरूप में जीवंत है। औरंगाबाद जिला के दाउदनगर कस्बे के जितिया पर्व की तस्वीर सिर्फ श्रद्धा, विश्वास और उपवास तक सीमित नहीं है। दाउदनगर जो औरंगाबाद या यूं कहें पुराने गया जिला का नगर पालिका क्षेत्र के रूप में बिहार के मानचित्र पर देदीप्यमान नक्षत्र की तरह स्थापित यह नगर सोनभद्र की सोंधी माटी में कला, कौशल, साहित्य, संस्कृति की खुशबू घोलता रहा है। ऐसी ही सांस्कृतिक कौशल का जीवंत स्वरूप दाउदनगर की पावन धरा पर जीतिया पर्व के अवसर पर पूरे सप्ताह भर अभिव्यक्त होता है। शहर का कोना-कोना नकल अभिनय और आश्चर्यचकित कर देने वाली अनोखी प्रस्तुतियों का गवाह बनता है। साक्षी होता है। हंसी- मजाक, व्यंग-हास्य-विनोद, गीत, संगीत, नृत्य-रोमांच से स्पंदित दाउदनगर का जनजीवन गतिमान रहता है। जितिया के इस अनोखे पुरातन विरासत की कड़ी में शहर में बने चार चौक कसेरा टोली, पटवा टोली, बाजार चौक और पुराना शहर चौक पर स्थापित जीमूतवाहन भगवान की पूजा धूमधाम से होती है। दूसरी ओर अभिनय की बहुरंगी छटा से शहर स्पंदित रहता है। भारतीय संस्कृति के विविध भावों की अभिव्यक्ति वाली अभिनय प्रस्तुतियां न केवल विरासत को अक्षुण्ण रखती हैं, वरन जमाने से चली आ रही परंपरा में बसी सोंच, समझ, चिंतन, कला, कौशल की समृद्ध कड़ी को अभिव्यक्त करती हैं।
दाउदनगर शहर में मैं शिक्षा के माध्यम से समाज को संवारने हेतु 1997 के जनवरी माह में आया। विवेकानंद स्कूल आफ एजुकेशन की स्थापना के साथ ही स्थाई रूप से दाउदनगर का निवासी हो गया। शहर के शैक्षिक, सांस्कृतिक परिदृश्य को तब से बहुत करीब से और जुड़ कर देखा, समझा और थोड़ी-थोड़ी भूमिका का निर्वहन भी किया। जितिया पर्व के इतिहास, भूगोल विरासत और परंपरा के संबंध में ज्ञान उपेंद्र कश्यप जो संप्रत्ति पत्रकारिता के क्षेत्र के जीवंत नक्षत्र हैं के साथ संवाद के क्रम में हुआ। उनकी ही पहल पर विभिन्न जितिया पर्व से जुड़े संगठनों के साथ सहभागिता भी की और कई बार अभिनय जैसी प्रस्तुतियों के लिए कुछ योगदान भी किया। जितिया पर आम अवाम के ज्ञान को समृद्ध बनाने में उपेंद्र कश्यप का योगदान महत्वपूर्ण है। उनके द्वारा प्रकाशित उत्कर्ष, श्रमण संस्कृति का वाहक-दाउदनगर- जितिया के अनोखे पहलुओं पर सार्थक और ज्ञानवर्धक सामग्री उपलब्ध कराते हैं। ऐसे ही प्रयासों का प्रतिफल है कि दाउदनगर के जितिया पर्व को राज्य के सांस्कृतिक कैलेंडर में स्थान मिला और इस वर्ष जितिया महोत्सव मनाने की सरकारी स्तर पर पहल हुई। विश्वास किया जा सकता है कि सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और संवर्धन को बड़ा मंच सरकार के प्रयास से मिलेगा। जितिया पर्व के अवसर पर प्रस्तुत किए जाने वाले अनोखे कला कौशल, हास्य, अभिनय को सरकार के स्तर से पटना के गांधी मैदान में प्रस्तुत की जाने वाली झांकियों में शामिल करने हेतु भी प्रशासनिक स्तर से प्रयास की अपेक्षा है। वर्तमान में जिले की प्रशासनिक टीम और ऊर्जावान अनुमंडल पदाधिकारी, नगर परिषद के स्तर से और इसमें जन भागीदारी से इसे और बड़ा मंच उपलब्ध कराने का प्रयास होना ही चाहिए। जितिया पर्व के इस पावन अवसर पर अनुमण्डल अधिकारी के सदप्रयास का अभिनंदन, वंदन।
डॉ शम्भू शरण सिंह
एम ए (डबल) गोल्ड मेडलिस्ट, सेवा निवृत्त प्रोफेसर, संस्थापक निदेशक, विवेकानंद ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशंस
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