Monday, 5 October 2026

लोक संस्कृति के आयामों का समुच्चय है जिउतिया-संस्कृति

(जिउतिया सिर्फ पर्व नहीं, दाउदनगर में लोक का उत्सव भी)

० उपेंद्र कश्यप ०

● जिउतिया के शोधकर्ता, इतिहास लेखक व पत्रकार


बिहार समेत कई हिन्दी भाषी प्रदेशों में आश्विन कृष्ण पक्ष अष्टमी तिथि को जितिया पर्व मनाया जाता है। इस वर्ष (2026) यह 03 अक्टूबर को है। इसे कहीं जितिया, कहीं जिउतिया तो कहीं जीवित्पुत्रिका व्रत नाम से संबोधित किया जाता है। यूं तो इस आरंभ होने को महाभारत काल, दौपदी, द्वापर के अंत और कलियुग के प्रारंभ के काल से जोड़ा जाता है। वैज्ञानिक तरीके से यह तय नहीं किया जा सकता कि वास्तव में यह पर्व कब से प्रारंभ हुआ होगा। किन्तु तमाम किस्सों में शैब्या व शालीवाहन के पुत्र जीमूतवाहन से इस पर्व को जोड़ा गया है। पौराणिक आख्यानों के अनुसार गन्धर्व के राजकुमार का नाम जीमूतवाहन था। भविष्य पुराण में श्लोक है- जननी मम शैब्यास्ति पितामे शालिवाहन। सूर्यवंशाद भवचाहं राजो जीमूतवाहन॥ यानि माता का नाम शैब्या एवं पिता का नाम शालिवाहन है। सूर्य वंशीय राजा शालिवाहन ने ही शक संवत चलाया था। हालांकि बुदुआ का मत है कि इसे उज्जयिनी के क्षत्रप चेष्टन ने प्रचलित किया। शक राज्यों को चंद्रगुप्त विक्रमादित्य ने समाप्त कर दिया पर शक संवत्‌ अभी तक भारत में चल रहा है। यह शक संवत ईस्वी सन 78 में शुरू हुआ था। अभी (आलेख लिखे जाते वक्त) ईस्वी सन 2026 चल रहा है। इस प्रकार अभी उनके जन्म के 1948 वर्ष हुए हैं। शालिवाहन समुद्र किनारे स्थित संयुक्त प्रांत (तत्कालीन उड़ीसा) के राजा थे। कर्मकांडी आचार्य पं. लालमोहन शास्त्री का मत है कि जीवित्पुत्रिका व्रत को प्रसिद्धि दिलाने के लिए इसे सत्ययुगीन बता कर प्रचारित किया गया। 

बिहार के औरंगाबाद जिले के दाउदनगर में इसी जीमूतवाहन को भगवान का दर्जा दे कर चार चौकें बनाई गई हैं। वास्तव में यह भगवान जीमूतवाहन का मंदिर है, जिसे स्थानीय जन जितिया चौक कहते हैं। जब कोई बच्चा किसी दुर्घटना में बच जाता है तो लोग कहते हैं- ‘खैर मनाव तोर मतारी जीउतिया कइले हलउ कि तू बच गईले।‘ या हर नकल प्रस्तुति के बाद लोक कलाकार कहते हैं- बोलो, बोलो, जितवाहन गोसांई की जय। दरअसल यह पर्व लोक का उत्सव बन गया है। यह लोक संस्कृति अन्यत्र कहीं नहीं दिखती। “श्रमण संस्कृति का वाहक-दाउदनगर” में इस लेखक ने काफी शोधपूर्ण सामग्री इस लोक-संस्कृति के बारे में लिखा है।




किसी भी लोक संस्कृति का प्रारंभ कब, कैसे, क्यों और किनके द्वारा किया गया यह लिखित दस्तावेज के रुप में अमूमन मौजूद नहीं होता है। लोक साहित्य में इसकी झलक मिलती है। जिससे अनुमान किया जा सकता है या फिर उसी को प्रमाण माना जा सकता है। जिउतिया लोक-साहित्य में एक झुमर है -“आश्विन अन्धरिया दूज रहे, संबत 1917 के साल रे जिउतिया। जिउतिया जे रोपे ले हरिचरण, तुलसी, दमडी, जुगुल, रंगलाल रे जिउतिया। अरे धनs भाग रे जिउतिया..।“ इससे स्पष्ट होता है कि पांच लोगों ने जिउतिया लोक संस्कृति को रोपा (प्रारंभ किया) था। हालांकि माना यही जाता है कि वास्तव में इस संस्कृति का आरंभ इमली तल चौक से हुआ था। जिसका देखा-देखी कसेरा टोली चौक पर आरम्भ हुआ था, इसीलिए यहां नकल शब्द प्रचलन में आया। खैर!



इसी झुमर में अभिव्यक्ति मिली है-–‘अरे धन भाग रे जिउतिया, तोरा अइले जियरा नेहाल रे जिउतिया, जिउतिया जे अइले मन हुलसइले, नौ दिन कइले बेहाल रे जिउतिया..” और जब पर्व खत्म होने को होता है तो लोग विरह की वेदना महसूस करते हैं- “देखे अइली जिउतिया, फटे लागल छतिया, नैना ढ़रे नदिया समान। जाने तोहे बिन घायल हूं पागल समान....”। 

वाकई इस संस्कृति में पागलपन है। दीवानगी है। उल्लास की प्रतिक्षा है। सामूहिक उर्जा का स्त्रोत बन गई है यह संस्कृति। ऐसे कि इसके बिना न मन हुलस सकता है न जियरा नेहाल हो सकता है। यूं ही नहीं- ‘दाउदनगर के जिउतिया जिउ के साथ हई गे साजन’-गाया जाता है। इसीलिए इसकी प्रतिक्षा होती है, और जब नौ दिन तक उल्लासित कर, हंसा कर, भागमदौड की जिन्दगी में थकान को दूर भगा कर, हंसने-विहंसने का अवसर देकर, नाते-रिश्तेदारों से मिलने, हाल-चाल जानने का बहाना उपलब्ध करा कर, घर-आंगन में परिचितों, रिश्तेदारों की उपस्थिति बढा कर, उनसे राग बढा कर जब यह जाती है तो हर आदमी की छाती फटने लगती है। यूं ही नहीं नैनन से नदिया ढ़रने लगती है। पागल की तरह दाउदनगरिया खुद को घायल समझने लगता है। इस नौ दिवसीय लोक उत्सव की यही खासियत है। 





यह विचारणीय है कि जिउतिया लोकसंस्कृति का आरंभ क्यों और कैसे हुआ होगा। जनश्रुति है कि इस कस्बे में प्लेग की महामारी आयी हुई थी। इससे निजात पाने का उपाय तलाशने के लिए जो मार्ग अपनाया गया वह कालांतर में संस्कृति बन गई। महत्वपूर्ण है कि ब्रिटिश कालीन गजेटियर के अनुसार 1860 के आस –पास का समय विभिन्न महामारियों का समय है। संवत 1917 का मतलब है 1860 ईस्वी सन। किंवदंती है कि तब इस इलाके में महामारी फैली थी। तब महाराष्ट्र से आये कुछ ओझा गुणियों ने कस्बे की चार सीमाओं पर ‘बम्मा देवी’ की स्थापना की। रात-रात भर जागते हुए करीब एक  महीने तक उपासना करवाई। यह दुष्कर कार्य था, निरंतर एक महीने तक रतजगा। इसके लिए समारोह चाहिए था, उत्सव चाहिए था। मनोरंजन के बिना यह कदापि संभव नहीं होता। इसलिए इस अवधि में मनोरंजन के लिए उपलब्ध साधनों-संसाधनों का इस्तेमाल किया गया। इस बीच या जिस दिन समापन हुआ होगा उस दिन जीवित पुत्रिका व्रत ( जीतिया ) हुआ होगा और इस तरह यह उत्सव हर साल महामारी के भयादोहन से बचने के लिए किया जाने लगा और कालांतर में यह नौ दिन तक सिमट गया। गौर करें- आश्विन (कुवार) की अष्ठमी तिथि को जिउतिया मनाया जाता है। इससे नौ दिन पूर्व भादो और उससे पहले सावन का बरसाती महीना। अपच की बीमारी का मौसम होता है। महामारियां फैलती रही हैं। आज के आधुनिक युग में भले विज्ञान और जागरुकता की बदौलत इस पर नियंत्रण प्राप्त कर लिया गया हो, मगर तत्कालीन समय में महामारियां सामूहिक संहार को जन्म देती थीं। कई-कई परिवार ही नहीं पूरा का पूरा गांव मौत के आगोश में चला जाता था। तब इसे दैवीय प्रकोप माना जाता था। भूत-प्रेत-डायन को इसके लिए जिम्मेदार माना जाता था। इसी से प्रेरित होकर तब के अग्रणी लोगों ने महाराष्ट्र से ओझा-गुणी को बुलाया और प्लेग की महामारी से निजात पाने की कोशिश की। जिसने एक संस्कृति को जन्म दे दिया। इसकी शुरुआत कब हुई यह ज्ञात नहीं हो सका है। कांस्यकार समाज द्वारा किए गए प्रारंभ से पहले इमली तल कब प्रारंभ हुआ? प्लेग की महामारी का कोई रिकार्ड कहीं उपलब्ध नहीं है। इसलिए इसका सही सही अनुमान करना मुश्किल है। 

जिउतिया संस्कृति से महाराष्ट्र और बम्मा देवी आवश्यक रुप से जुडे हुए हैं। क्यो? दाउदनगर से महाराष्ट्र का संबन्ध कैसे और क्यों बना या था? जिउतिया में उनकी क्या भूमिका थी? इन प्रश्नों को जानने से भी यह स्पष्ट हो जाता है कि यहां की जिउतिया-संस्कृति का जन्म दाता बुनकर समाज रहा है। तांती, पटवा, तंतवा जाति बुनकर समाज है। उन्नीसवीं सदी में हस्तशिल्प को रिप्लेस कर काटन मील बन रहे थे। महाराष्ट्र प्रारंभिक काल से ही सूती उद्योग के लिए ख्यात था। दाउदनगर में बुनकरी का कार्य यही समाज करता था। संभव है इस जाति के कुछ लोग महाराष्ट्र के काटन मीलों में कार्य करते होंगे। जनश्रुति के अनुसार जब यहां महामारी आयी तो इस संपर्क ने सूत्र का काम किया और महाराष्ट्रीयन ओझा-गुणी को यहां बुलवाया। जिसने चार कोनों पर बम्मा देवी की स्थापना की, मंत्र से आच्छादित चावल के दाने शहर में छींटे और इससे मुक्ति मिली। यह ‘बम्मा देवी’ महाराष्ट्र की ‘मुम्बा देवी’ का स्थानीय रूप हैं? यह संभव दिखता है। मुंबई और बम्बई, नाम से भी यह स्पष्ट है। कालांतर में शब्द अपने मूल उच्चारण बदलते रहे हैं और उनके अर्थ भी बदलते रहे हैं। इसलिय यह संभावना है कि मुम्बा देवी ही यहां स्थानीयता ग्रहण कर बम्मा देवी बन गई हों। यहां इनका मन्दिर भी बम रोड के अंत में पूरब-दक्षिण किनारे है। दूसरी महत्वपूर्ण उपस्थिति ‘लावणी’ की है, जो महाराष्ट्र की ही विधा है। मराठी थियेटरों में इसकी खूब प्रस्तुति होती है। यहां लावणी भी प्रमुख गेय विधा बन गई है। यह और बात है कि अब लावणी की प्रस्तुति कम होती है। न तो इसके गवइया बचे हैं, न लावणी के लिखवइया ही। एक टोपी भी मराठा से जुडे होने का संकेत देता है। मराठा की टोपी भी यहां के तांती समाज में दिखती रही है। अब नहीं दिखती। इन सन्दर्भों, प्रसंगों से यह स्पष्ट दिखता है कि बुनकरी के कारण दो सुदूरवर्ती संस्कृति इस कदर जुडे कि एक नई संस्कृति बन गई- दाउदनगर की जिउतिया संस्कृति। जो एक छटपटाहट थी रोग से मुक्ति के लिए। पीढियों को बचाने के लिए। जैसे संतानों की रक्षा के लिए जिउतिया का पर्व मातायें करती हैं।

लोक और संस्कृति या लोक-संस्कृति की व्यापकता के सन्दर्भ में एक शब्द है-लोकायन या लोकयान -फोकलोट। नृतत्वशास्त्री ‘लोकयान’ के अंतर्गत चार खंड बताते हैं। पहला लोक-साहित्य है, जिसमें लोक-गीत, लोक-कथा, वीरगीत, मिथकें, मुहावरे, कहावतें शामिल हैं। दूसरा लोक-व्यवहार है-जो न साहित्य है न ही कला- इसमें विश्वास, प्रथाओं, अन्धविश्वासों, कर्मकांडों, लोकोत्सवों, परिपाटियों, लोक खेलों, पशुपक्षियों की प्रतियोगिताओं का समावेश है। तीसरा लोक-कला या कलात्मक लोकयान है, जिसमें लोक नृत्य, लोक-नाट्य, लोक- नटन, लोक चित्र, लोक- दस्तकारी, लोक वेषभूषा एवं लोक-अलंकरण शामिल है। चौथा लोक-विज्ञान एवं औद्योगिकी है जिसमें लोकोपचार, लोकौषधियां, लोक नुस्खे, लोक भोजन खाद्य, लोक कृषि रुढियां, जादू टोने शामिल हैं। यानि लोक-संस्कृति व उसके अनुसंग लोकायन के अंतर्गत ज्ञान भंडार, समुदाय की चिंतन की प्रणालियां तथा कला कसौटी द्वारा प्रासंगिक बने हुए नाना कला कौशलों के तत्व की त्रयी इसमें शामिल है। यहां की जिउतिया लोक संस्कृति में इन चारों की उपस्थिति प्रचुरता के साथ है।



 

दाउदनगर-जिउतिया-संस्कृति का अपना मौलिक और मौखिक (कुछ लिखित) लोक साहित्य है। इसमें लोक जीवन का दुख दर्द, हर्ष उल्लास का अनुभव तथा जीवन पर वैचारिक प्रतिक्रियायें मिलती हैं। तो दूसरी ओर पर्व-त्योहारों, देवी-देवताओं तथा प्रकृति के विविध रुपों का चित्र मिलता है। इन साहित्यों को वाचन परंपरा ने जिन्दा रखा हुआ है। लिखित रुप में काफी कम मौजुद हैं। इनका एकत्र किया जाना आवश्यक प्रतीत होता है। इस साहित्य में नयापन नहीं दिखता, सब पारंपरिक ही हैं। आजादी के संघर्ष की व्यथा और भारत-पाकिस्तान के संदर्भ में देशभक्ति तो अभिव्यक्त होती है, मगर उसके बाद के काल में जैसे झुमर या लावणी लिखे ही नहीं गये हैं। झुमर, लावनी, मुहावरे या वीरता के गीत आपको अवसर विशेष पर सुनने को मिलते हैं। अनन्त पूजा के दूसरे दिन शाम में डमरू के आकार का लकड़ी या पीतल धातु का बना बड़ा-सा ओखली चारों चौंको पर रखकर जिउतिया पर्व का विधिवत आरम्भ कर दिया जाता है। इस दिन से प्रतिदिन शाम को अंधेरा होते ही चौक के पास पुरूष और बच्चे जमा होते हैं और ढोलक की थाप पर तालियां बजा-बजाकर झुमर गाते हैं। इसे ‘चकड़दम्मा’ कहा जाता है। चौक की परिक्रमा करते हुए नाचते-झुमते हुए झुमर गाने का आनंद ही कुछ और होता है। पूरा वातावरण संगीतमय हो जाता है। झुमर गीतों में विविधता होती है, रंगीनी होती है और मधुरता भी। जिउतिया के गीत बडे सरस हैं। इसमें स्थानीय इतिहास, भूगोल और विशेषताओं को भी प्रयाप्त जगह मिली है। झूमर में गाते हैं- दाउदनगर के जिउतिया सरेनाम हई गे साजन दाउदनगर के जिउतिया जीव के साथ हई गे साजन

कहाँ के दिवाली, कहाँ के दशहरा गे साजन,

कहवाँ के जिउतिया कइले नाम हई गे साजन

दिल्ली के दिवाली, कलकता के दशहरा गे साजन

दाऊदनगर के जिउतिया कइले नाम हई गे साजन

दाउदनगर के............................

साहित्य में यहां की आबादी का जीवन संघर्ष व्यक्त होता है। उनके सपने दिखते हैं। रोजगार पाने की उत्कंठा और आमदनी के विभिन्न स्त्रोतों की तलाश करती आबादी का दर्द, दुख, सपने, भविष्य की उम्मीदें बहुत कुछ दिखता है। यहां का परवर काफी मशहूर है। सोन दियारा में इसकी खेती व्यापक पैमाने पर होती है। बालुगंज के मल्लाह समेत कई कृषक जातियां अपनी हाड तोड मेहनत से इसे बलुआही जमीन में उपजाते हैं। औरंगाबाद, गया, पटना, झारखंड के रांची और टाटा जैसे मंडियों में ‘दाउदनगर के परवल’ नाम से यह बिकता है। काफी पहले जब पटना नहर में स्टीमर की यात्रा होती थी, तब हाजीपूर की शब्जी मंडियों में इसे बेचने यहां के लोग जाते थे। इस यात्रा में वे अपने लिए सपना बुनते थे, परवल बेच कर जो आय होगी उससे घर-परिवार की जरुरतों के अलावा स्त्री के श्रृंगार के लिए गहने बनाने की भी सोच रखते थे। आदिम जमाने से ही मनुष्य अपनी स्त्री को सोलह श्रृंगार में देखने का आग्रही रहा है। ऐसे ही एक झुमर में ऐसी भावनाओं को देखिए--- दूर देसे नोकरिया के रे जइहें

के जइहें हाजीपुर, के जइहें पटना, के रे जइहें

दूर देसे नोकरिया के रे जइहें

बाबा जइहें हाजीपुर, भइया जइहें पटना, सइयाँ जइहें

दूर देसे नोकरिया सइयाँ जइहें

के लइहें बाजूबंद, के लइहें कंगना, के रे लइहें

छतिया दरपनवा के रे लइहें

बाबा लइहें बाजूबंद, भइया लइहें कंगना, सइयाँ लइहें

छतिया दरपनवा सइयाँ लइहें


ए राजाजी परवर बेचे जायम हाजीपुर

परवर बेच के पायल गढ़ायम

पायल हम पहिरम जरूर

ए राजाजी परवर बेचे जायम हाजीपुर

यहां का लोक तब भी कितना खुला विचार रखता था यह भी एक झुमर बताता है। जब प्रेम की बातें भी खूब होती थी। खूलेयाम होती थी। ऐसी रचनायें रची गयीं जिसमें प्रेम और श्रृंगार रस का हर भाव, चाहत उसमें पीरो दिया गया हो। जरा देखिए इस रंगीन मिजाजी को, जिसमें है सब कुछ मगर तब भी अश्लीलता नहीं है---------------------------

नैना बिदुल हे कहवाँ से आवेला इयार

कहवाँ से आवेला बारि बियहुआ, बारि बियहुआ

नैना बिदुल हे कहवाँ से आवेला इयार

पूरबा से आवेला बारि बियहुआ, बारि बियहुआ

नैना बिदुल हे पछिमा से आवेला इयार

श्यामसून्दर बनिया के जा (बेटी)  हई रे मनीजरवा

एहि परि गंगा, ओहि पारे जमुना

के मोरा घइला अलगा, हई रे मनीजरवा


लोक-व्यवहार की अद्भुत उपस्थिति ●


लोकयान में दूसरा समावेश है लोक-व्यवहार का। यह न तो साहित्य है न ही कला, इसमें विश्वास, प्रथा, अन्धविश्वास, कर्मकांड, लोकोत्सव, परिपाटी शामिल है। यहां का समाज इससे गहरे जुडाव रखता है। जिउतिया से जिउ के समान जुडे जमात में यह कुट-कुट कर भरा हुआ है। इमली तल जब नकल प्रस्तुत होना होता है तब सबसे पहले पूजा-पाठ के साथ जब ओखली रखी जाती है तो जीमूतवाहन गोंसाई की पूजा की जाती है। यहां काली, ब्रह्म जैसे नकल की खतरनाक प्रस्तुति होती है। यहां के पारंपरिक नकल इसी रात प्रस्तुत होते हैं। पारण के दिन झुमरिया और लावनी गाने वाले जीमूतवाहन के चौक से गाते हुए बम्मा देवी के मन्दिर तक जा कर अपनी प्रस्तुतियों का समापन करते हैं। यह व्यवहार ही है लोक का कि कभी विवाद नहीं होता। लोग एक दूसरे से संवाद कर व समन्वय बिठाकर प्रस्तुति देते हैं, आयोजन करते हैं, एक दूसरे को सहयोग करते हैं।


● जहां कण-कण में बसी है कला ●


लोकयान के तीसरे समावेश में लोक-कला या कलात्मक लोकयान है, जिसमें लोक नृत्य, लोक-नाट्य, लोक-नटन, लोक चित्र, लोक- दस्तकारी, लोक वेषभूषा एवं लोक-अलंकरण शामिल हैं। दाउदनगर के जिउतिया का लोक उत्सव देखिए-यह सब आपको खूब दिखेगा। यहां के जर्रे-जर्रे में कला छिपी हुई है। मिट्टी के कण-कण में कला है तो हर शख्स कलाकार। कला की उर्वरता तो इतनी है कि भर जिउतिया समारोह सब कलाकार बन जाते हैं। जिसे आपने कभी कला के साथ नहीं देखा होगा वे भी कला की प्रस्तुति ऐसे करते दिखेंगे जैसे मंझा हुआ कलाकार हो कोई। कई तरह के ऐसे नकल हैं जिसमें बच्चे ही कलाकार, वही निर्देशक वही पटकथा लेखक वही स्त्री पात्र, वही पुरुष पात्र सब वही हैं। न कभी कोई प्रशिक्षण लिया न कभी उसकी रुचि इस तरफ रही, मगर प्रस्तुति चौंकाने वाली। एक दिवसीय, तीन दिवसीय या नौ दिवसीय कलाकार हैं सब। आदिवासी गीत की प्रस्तुति हो या फिर भांगडा, हर संस्कृति, भाषा और राज्य की संस्कृति की झलक आपको दिख जायेगी। सब जगह की वेषभूषा अलंकरण दिखेगा। चेहरे का मेकअप ऐसा कि बढिया-बढिया मेकअप-मैन लजा जाये। लोग भिन्न-भिन्न रूप धरकर नकल बनने लगते हैं और हँसी-मजाक करने लग जाते हैं। जिउतिया के अवसर पर आप नकल बनकर कुछ भी मजाक करने के लिए स्वतंत्र हैं। कोई आपका बुरा नहीं मानेगा। सबमें अप्रशिक्षित कलाकार शामिल और प्रस्तुति माशा अल्लाह।

● अनोखा है यहाँ के लोक का विज्ञान 

 

लोकयान में चौथा और अंतिम समावेश लोक-विज्ञान एवं औद्योगिकी का है, जिसमें लोकोपचार, लोकौषधियां, लोक नुस्खे, लोक भोजन खाद्य, लोक कृषि रुढियां शामिल हैं। खतरनाक प्रस्तुतियों में लोकौषधियों या नुस्खे इस्तेमाल किए जाते हैं। 


जीवन का आधार है ओखली 

■ उपेंद्र कश्यप

दाउदनगर में जितिया का आगाज ओखली से जुड़ा हुआ है। शहर में बने जीमूत वाहन भगवान के सभी चार चौक पर ओखली रखे जाने के साथ ही जितिया का आगाज माना जाता है। जिज्ञासा का विषय है कि दाउदनगर के जितिया उत्सव में ओखली का इस्तेमाल क्यों होता है। जितिया के हर चौक पर अस्थाई तौर पर पक्का के ओखली बने हुए हैं। इसके बाद उस पर लकड़ी की ओखली परंपरागत रूप से रखी जाती है। युग परिवर्तन के साथ लकड़ी की ओखली पर पीतल की ओखली भी रखी जाने लगी है। आखिर ओखली की पूजा क्यों होती है। इस प्रश्न पर आचार्य लालमोहन शास्त्री कहते हैं कि ओखली का इस्तेमाल वैदिक परंपरा से जुड़ा हुआ है। जब यज्ञ का प्रादुर्भाव हुआ तो हविश बनाने की जरूरत हुई। धान कूटने के लिए लकड़ी की बनाई गई। शालीवाहन के युग में जीमूत वाहन भगवान का संबंध समुद्र किनारे के प्रदेश से है। जहां सियारिन और चील की कथा विकसित हुई। वहां पाकड़ का वृक्ष था। इसी वृक्ष के खोड़रा में चील रहता था। इसलिए यहीं सबसे पहले ओखली का निर्माण हुआ था। बाद के युग में जब मशीनीकरण होता चला गया तो घरों में धान कूटने के लिए ओखली का इस्तेमाल बंद होता चला गया। इसलिए आज की पीढ़ी ओखली से अवगत नहीं है। आचार्य लालमोहन शास्त्री बताते हैं कि बाद के कालखण्ड में शिव के डमरू के आकार की ओखली बनाने की परंपरा विकसित हुई। मटकोर में शादी विवाह के अवसर पर भी इसका इस्तेमाल होता है। बताया कि मटकोर में जो धान प्राप्त होता है उसे मुसल से महिलाएं कूटती हैं और मंगल गीत गाती हैं। धान से जो चावल निकालते हैं वह ओखली में कुटकर ही निकालते हैं। उसी चावल से हम अक्षत बनाते हैं। ओखली से अनहद नाद (ध्वनि) निकलती है। बताया कि श्रीमद्भागवत में दत्तात्रेय की कथा है। उन्होंने महिला को गुरु माना। महिलाओं ने चूड़ी निकालकर ओखली में धान कुटा और फिर उससे भोजन बनाकर घर आए। अपने अतिथियों का पेट भरा। क्योंकि जितिया भी संतान उत्पन्न से जुड़ा हुआ पर्व है, यह भी मांगलिक कार्य है, इसलिए जितिया में मटकोर और ओखली का इस्तेमाल होता है।


इसलिए जितिया नाव आकार का 

 जितिया व्रत में महिलाएं सोने या चांदी का जितिया पूजती हैं। व्रत के दिन जिस महिला की जितनी संतानें होती हैं, उतनी जितिया पूजती हैं और आमतौर पर आश्विन महीने में महिलाएं उसे गले में धारण करती हैं। जिनको नया बनवाना होता है वे नया जितिया बनाकर धारण करती हैं। जिसे फिर व्रत के दिन निकालकर जितवाहन भगवान के सामने पूजती हैं। क्या आप जानते हैं कि तमाम तरह के जितिया बनते हैं, लेकिन उनका आकार नाव के स्वरूप में क्यों होता है। आचार्य लालमोहन शास्त्री बताते हैं कि जितिया माता जो ग्रहण करती है उसके पीछे माता और पिता को संतान द्वारा भवसागर पार कराने की अपेक्षा या आकांक्षा रहती है। क्योंकि भारतीय वांग्मय में व्यक्ति की मृत्यु के बाद भवसागर पार करने की कल्पना है और भवसागर पार करने के लिए जो यातायात का साधन है वह नाव है। मनुष्य के जीवन में यात्रा का प्रारंभ भी नाव से ही हुआ और नाम से ही विश्व की यात्राएं लोगों ने की है। इसलिए यात्रा के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान जाने के लिए प्राचीन काल से नाव का इस्तेमाल होता रहा है इसीलिए जितिया का आकार भी नाव की तरह बनाया जाता है।

[लोक कलाकार क्यों लगाते हैं ज्ञानचंद उस्ताद का जयकारा 


जिउतिया लोक उत्सव के दौरान जो भी लोक कलाकार अपनी प्रस्तुति देते हैं वह इमली तल स्थित ज्ञानचंद उस्ताद के घर मत्था टेकने जरूर जाते हैं। सवाल यह है कि ज्ञानचंद उस्ताद कौन थे और उनके घर मत्था टेकने लोक कलाकार क्यों जाते हैं। जो लोक कलाकार खतरनाक प्रस्तुतियां देते हैं, या झांकी प्रस्तुति करते हैं या किसी भी तरह की कला की प्रस्तुति करते हैं, वह विभिन्न नारों के साथ ज्ञानचंद उस्ताद की जय जरूर बोलते हैं। ये ज्ञानचंद उस्ताद कौन थे, कहां के थे और इनका जिउतिया से क्या संबंध है? यह दिलचस्प जानकारी है। श्रमण संस्कृति का वाहक-दाउदनगर के लेखक उपेंद्र कश्यप के अनुसार वास्तव में ज्ञानचंद उस्ताद को लेकर यह माना जाता है कि या तो उनके नेतृत्व में इमली तल जीमूत वाहन भगवान का चौक स्थापित किया गया होगा या उन्होंने ही पहली बार कलाओं की प्रस्तुति का नेतृत्व किया होगा। इस कारण लोग उन का जयकारा श्रद्धावश लगाना प्रारंभ किए होंगे और यह परंपरा बनती चली गयी। यहां ज्ञानचंद उस्ताद के अलावा भी कई उस्तादों का जयकारा लगता है। ज्ञानचंद उस्ताद इमली तल के निवासी थे। उनके घर में देवी मंदिर बना हुआ है। जहां सात देवियों और एक भैरव बाबा के कुल आठ पिंड स्थापित हैं। कलाकार इस मंदिर में जाते हैं और मत्था टेकते हैं और देवी मां का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। कलाकारों का मानना है कि ऐसा करने से उन पर आने वाला खतरा टल जाता है और उनकी प्रस्तुति यहां सरलता से सफल होती है। महत्वपूर्ण है कि इमली ताल डाकिनी और ब्रह्म की दो खतरनाक प्रस्तुतियां होती है और यहां बिना ज्ञान चंद उस्ताद का जयकारा लगाए कोई कार्य संपन्न नहीं होता है। अन्य स्थानों के कलाकार भी उनका जयकारा लगाते ही लगाते हैं। यहां के लोक कलाकार उनको उस्ताद मानते हैं। ज्ञानचंद उस्ताद का सर्वाधिक नाम लिया जाता है। इससे यह माना जा सकता है कि यहां विविध कला प्रस्तुतियों का नेतृत्व व निर्देशन उन्होंने किया होगा। उसके बाद वासु खलीफा, सीताराम उस्ताद, शकुन उस्ताद, भोला उस्ताद, भूलन उस्ताद, रामप्रीत उस्ताद, गनौरी उस्ताद, दमड़ी उस्ताद, जुगल उस्ताद, नंदकिशोर उस्ताद, राम बाबू उस्ताद का जयकारा यहां के लोक कलाकार लगाते हैं। लोक कलाकार प्रदुमन कसेरा, धीरज कसेरा ने बताया कि ज्यादातर जयकारा मृत उस्तादों के नाम का लगाया जाता है। हालांकि अब जीवित उस्तादों के भी नाम का जयकारा कलाकार उनके प्रति अपना समर्पण भाव व्यक्त करने के लिए लगाते हैं।


परिचय:- 

नाम: -उपेंद्र कश्यप


पुस्तक-

■ आंचलिक पत्रकारिता की दुनिया

■ ‘श्रमण संस्कृति का वाहक-दाउदनगर’

■ सन्दर्भ पुस्तक -“उत्कर्ष” के दो अंक।

राष्ट्रीय व राज्य स्तरीय विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में सैकड़ों आलेख, रिपोतार्ज, फीचर।


संपर्क:

पत्रकार सदन, पांडेय टोली, कान्दू राम की गड़ही, वार्ड संख्या-24

दाउदनगर, औरंगाबाद, बिहार। पिन-824143

संपर्क: 9931852301





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