Monday, 4 March 2019

किशोरवय के लिए नेशनल बुक ट्रस्ट ने की "सुनो मैं समय हूँ" प्रकाशित

नेशनल बुक ट्रस्ट ने की डेहरी के लेखक की पुस्तक ‘सुनो, मैं समय हूँ’ प्रकाशित

बड़ी उपलब्धि: एनबीटी से प्रकाशित जिले के प्रथम लेखक बने

हिन्दी के बाद अग्रेजी समेत कई भाषाओं में होगी यह प्रकाशित

कृष्ण किसलय ने लिखी है-12 से 14 आयु वर्ग के लिए पुस्तक

विज्ञान पर अच्छी जानकारी देती है 172 पृष्ठ की यह किताब

व्यक्ति की जिज्ञासाओं को शांत करने वाले उत्तर मिलेगी इसमें

०उपेन्द्र कश्यप०

देश के सबसे बड़े प्रकाशक नेशनल बुक ट्रस्ट (एनबीटी) ने डेहरी के कृष्ण किसलय की पुस्तक ‘सुनो, मई समय हूँ’ को प्रकाशित किया है। यह सिर्फ रोहतास ही नहीं बल्कि एक बड़े इलाके के लिए इस सन्दर्भ में उपलब्धि है कि इस प्रकाशक द्वारा किसी दूसरे लेखक की लिखी किताब का प्रकाशन नहीं किया है। दूसरे कई लेखक जिले में ऐसे हैं जिनकी किताबों का प्रकाशन दूसरे कई प्रकाशकों द्वारा हुई है, किन्तु यह बड़े गौरव की बात है कि किसी छोटे शहर के लेखक की कोइ किताब एनबीटी प्रकाशित करे। जिले के इतिहास पर कई शोध-पुस्तक लिख चुके डॉ. श्याम सुन्दर तिवारी ने इस सन्दर्भ में कहा कि-यह गौरव की बात है। जिले में किसी दूसरे लेखक को यह सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ है। देश में प्रकाशन विभाग के बाद यह सबसे बड़ा प्रकाशक है। अर्ध सरकारी है और इसके द्वारा छपा जाना काफी महत्वपूर्ण उपलब्धि है। लेखक और प्रकाशक के बीच हुए एग्रीमेंट के मुताबिक़ हिन्दी में किताब अभी प्रकाशित हुई है, बाद में अग्रेजी समेत कई भाषा में प्रकाशित होगी। यह जिले के मान को विविध भाषा बोलने वालों के बीच राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने का काम करेगी। यह पुस्तक 12-14 आयु वर्ग के किशोरवय के लिए लिखी गयी है। 172 पृष्ठ है जिसमें दो खंड हैं-ब्रह्मांड और जीवन। लेखक श्री किसलय का दावा है कि हिन्दी में वैज्ञानिक सोच विकसित करने वाली ऐसी कोइ दूसरी किताब नहीं है। ब्रह्मांड कब पैदा हुआ, और कहाँ फ़ैल रहा है, विस्तार का अंत कब होगा, ईश्वर ने सृष्टि बनायी तो ईश्वर को किसने बनाया, नियम से विकसित ब्रह्मांड में इश्वर का क्या काम? जीवन पृथ्वी पर पनपा या आकाश से टपका, क्या एलियन आदमी है, सभी जीवों में एक ही जैव पदार्थ तो पृथ्वी पर आदमी का एकक्षत्र राज्य क्यों? इन प्रश्नों का उत्तर किशोर मन को यह किताब देने की एक कोशिश है, अब इसमें सफलता कितनी मिलेगी यह वक्त तय करेगा। इस किताब के लिए दर्जनों चित्र कोलकाता के कला स्नातक अरूप गुप्ता ने बनाया है। 
ऐसे रही प्रकाशन की यात्रा:-
लेखक कृष्ण किसलय ने बताया कि एनबीटी का चयन सबसे बड़ा प्रकाशन क्षेत्र होने के कारण किया। बताया कि 09.09.2016 को पुरी पांडुलिपि प्रकाशक को भेजा। प्रक्रिया के तहत चयन हुआ और 09 मार्च 2017 को प्रकाशन के लिए स्वीकृति मिली। ट्रस्ट की मुप्रसनि नीरा जैन द्वारा एग्रीमेंट 28 अप्रैल 2017 को किया गया। इसके बाद फरवरी 2019 में किताब प्रकाशित हुई। एग्रीमेंट के मुताबिक हिंदी प्रकाशन पर 6 फीसदी और अन्य भाषाओं में 4 फीसदी रॉयल्टी मिलेगी।

छूट गए अंश का प्रकाशन लक्ष्य:-
लेखक ने बताया कि प्रकाशित किताब में कई हिस्से शामिल नहीं हैं। पृष्ठ संख्या की सीमा को देखते हुए उन्हें हटाना पड़ा था। लक्ष्य है कि छूटे हुए खंड का प्रकाशन कराना। एनबीटी से आग्रह करेंगे कि चूंकि पांडुलिपि स्वीकृत है इसलिए अलग खंड में इसका प्रकाशन करें। यदि कोई कानूनी पेंच न हो तो, ताकि बच्चों को विज्ञान से जुड़ी सारी जानकारी एक साथ मिल सके। कहा-लोग सीखें सवाल करना और सवाल का जवाब तलाशना। यही मूल मकसद इस किताब के लिखने की है।

कौन हैं लेखक कृष्ण किसलय:-
अनुमंडल मुख्यालय स्थित जोड़ा मंदिर के पास रहते हैं कृष्ण किसलय। वर्ष 1978 से लगातार विज्ञान विषयों पर लिखते रहे हैं। चार बड़े अखबार में जिला से लेकर संपादक तक के पद पर काम कर चुके हैं। लेखन के लिए इन्डियन साइंस राइटर्स एसोसियेशन समेत कई संस्थाओं द्वारा सम्मान प्राप्त कर चुके हैं। संप्रति आंचलिक पत्रकारिता को नया आयाम देने वाले सोनमाटी समूह के संपादक हैं।

गौरव का विषय-कवि
काव्य संग्रह ‘आवाज भी देह है’ के लेखक संजय कुमार शांडिल्य का मानना है कि एनबीटी राष्ट्रीय महत्व की लिखी उपयोगी किताबों के प्रकाशन के लिए प्रसिद्ध है। कम मूल्य पर प्रमाणिक किताबों को देश भर के पाठकों तक पहुँचाने का दायित्व निर्वहन करने का कार्य यह करता रहा है। यहाँ से प्रकाशित होना किसी भी लेखक के लिए गौरव का विषय है।

Sunday, 3 March 2019

अछूतोद्धार : कोइ छू कर तो दिखाए पैर, यह प्रतीकात्मक ही होता है जनाब



*कोई छू कर तो दिखाए पैर* 
(यह ‘अछूतोद्धार’ प्रतीकात्मक ही होता है)

चुनावी चक्कलस और 'जनटिप्पणी'--01
०उपेन्द्र कश्यप०

चाय की दुकान हमेशा राजनीति पर अजब-गजब टिप्पणी देती है। भर चुनाव इसे मैं जनटिप्पणी कहूंगा और चुनावी चक्कलस का आप आनन्द ले सकेंगे। यह प्रयास है। 
अखबार हाथों में थे। कई अखबार। पाठक अखबार का असली मालिक होता है। खबरों पर, उसकी प्रस्तुति पर और उसके प्रभाव पर उसकी टिप्पणी मायने रखती है। हम बैठे थे। कई थे। एक ने कहा-देखे, कोई मुकाबला नहीं। मोदी ने ऐसा मास्टर स्ट्रोक मारा है कि सब चित पड़ गए। हरिजनों के हित की राजनीति करने वाले स्वयंभू पार्टियां और नेता ऐसे सफाईकर्मियों से छुआते तक नहीं हैं। दूर भागते हैं। अब पीएम ने उनको स्वच्छताग्राही कहा और उनके चरण रज लिए तो मिर्ची तो लगेगी ही। कारण साफ है। नकलचियों को अब मुश्किल आएगी। वे छुएंगे पैर किसी के? पियेंगे चरण रज? नहीं कर सकते ऐसा क्योंकि सामन्ती मानसिकता उनको ऐसा करने से रोकती है। श्रेष्ठी भाव हमेशा उनको ऐसा करने से रोकती है। चाहे समाजवादी हों, लोहियावादी हों, या अम्बेडकरवादी हों, या मध्यमार्गी हों, वाममार्गी हों या दक्षिणमार्गी हों। जो अपने सीएम को कुत्ते से कमतर भाव देता है, उसके शुभ चिंतक क्या कहेंगे भला? आप देखा देखी मंदिर भेजते हो अब देखा देखी अछूतों के पैर छुओगे? ऐसी उम्मीद किसी को नहीं है। न समाजवादियों से न ही वामवादियों से, न ही मध्यवादियों से?

देश में अछूत को लेकर कई धारणाएं हैं। कोइ इसे प्राकृतिक और धार्मिक बताता है, कोइ इसे अमानवीय बताता है। कोइ इसे उचित ठहराता है, कोइ इसे हिन्दू धर्म का कलंक बताता है। कोइ इसे मनुवादी बताता है। लिखित इतिहास के कालखंड प्रारंभ होने से पहले से भारतीय समाज में अछूत एक महत्वपूर्ण सामाजिक बुराई और मुद्दा बना हुआ है। क्या कभी सत्त्ताधारियों की ओर से इसको समाप्त करने की सार्थक और दृढ कोशिश की गयी? एक्ट बना देना और एक्शन लेना दोनों दो अलग-अलग बातें हैं। हरिजन की संज्ञा देकर नाम बदल देना और हरिजनों को सामाजिक मान्यता दिलाना / देना अलग बात है। हमने तो यह भी देखा ही है कि हरिजनों के वोट से दशकों सत्ता की मलाई खाने वाले उप प्रधानमंत्री जगजीवन राम द्वारा पूजा किये जाने के बाद प्रतिमा को दूध से धुलाया था। हद है, उनके भगवान भी अछूत के छूने से अछूत हो गए थे। आज ऐसे लोग, ऐसी विचारधारा वाले स्वच्च्ताग्राहियों के पैर धोने को लेकर सवाल खड़े कर रहे हैं। प्रतीकों की ऐसी राजनीति ही कुछ बदलाव ला सकती है, यह भी तो कोइ किया करे। करने वाले को खारिज करने से बेहतर है कुछ तो करिए, प्रतीकात्मक ही सही। बदलाव मानसिकता बदले जाने से ही होती है, ध्यान रखियेगा।

Saturday, 2 March 2019

दो भिन्न संस्कृतियों और इतिहास को जोड़ेगा दाउदनगर-नासरीगंज सोन पुल



नासरीगंज को सूफी संत ने बसाया तो दाउदनगर को सूबेदार ने

मीर साहब थे फ़कीर तो दाउद खां थे औरंगजेब के सिपहसालार
राजनीतिक, सांस्कृतिक व व्यापारिक गतिविधियां हुई सहज
उपेंद्र कश्यप । डेहरी
नासरीगंज-दाउदनगर सोन पुल चालु हो गया। दोनों शहरों को जोड़ने का काम अब पूरा हो गया। इस पुल के बनने से दो संस्कृतियों और इतिहास का मिलन हो गया। दोनों शहर के साथ एक कॉमन बात है कि दोनों ही किसी-न-किसी द्वारा बसाया हुआ शहर है। नासरीगंज को मीर नासिर देहलवी ने बसाया था तो दाउदनगर को दाउद खां ने। एक संत फ़कीर तो दूसरा बादशाह औरंगजेब का सिपहसालार। बिहार का गवर्नर और दाउदनगर को बसाने वाला नवाब। दोनों शहर सोन के पूरब-पश्चिम किनारे पर स्थित और औद्योगिक नगरी के लिए गुलाम भारत में प्रतिष्ठित। ओमकार प्रसाद बताते हैं कि सासाराम के बाद नासरीगंज ही मशहूर था। साबुन, कागज, कम्बल, नील के उद्योग, बुनकर उद्योग थे। पानी से मिल चलता था। शताब्दियों तक दोनों के बीच आवागमन का माध्यम नाव रहा और अब आधुनिक लंबा-चौड़ा पीसीसी पुल। जो सीधे हाइवे से जुड़ा है और उस पर फर्राटे भर रही हैं आधुनिक लक्जरी गाड़ियां। लोगों के लिए यातायात आसान हुआ है और इससे व्यापार में वृद्धि तय है। दोनों तरफ सांस्कृतिक और व्यापारिक गतिविधियों में वृद्धि के साथ पारिवारिक रिश्तेदारियां निभाना आसान हो गया है।
यह इलाका काराकाट लोक सभा का क्षेत्र का हिस्सा है। निर्वाचन आयोग ने दोनों जिलें औरंगाबाद-रोहतास के एक हिस्से को मिलाकर काराकाट लोक सभा क्षेत्र नाम दिया था। प्रत्याशियों को इलाका भ्रमण के लिए काफी दूरी तय करनी होती थी। अब यह दूरी कम हुई है और सहज भी।
                                                                                                                                    


मीर नासिर देहलवी के नाम पर नासरीगंज:-
नासरीगंज निवासी सामाजिक कार्यकर्ता नकीब अहमद जैसे लोगों का मानना है कि सूफी संत मीर नासिर देहलवी के नाम पर यह शहर बसा हुआ है। वे दो सदी पूर्व यहाँ आये थे। उनका मजार वहां है, जहां हर धर्म के लोग शुक्रवार को मिठाई चढाने और अगरबत्ती जलाने पहुंचते हैं। कुछ लोगों का मत है कि संत कभी-कभी कुछ लोगों को चलते दिख जाते हैं। हर धर्म के लोग दुआ माँगते हैं और उनकी मुराद पुरी होती है। उन पर किताबें लिखी गयी हैं। यहाँ के सामाजिक कार्यकर्ता नेता ओमकार प्रसाद ने बताया कि नील की खेती कराने वाले एक बड़े अधिकारी की बेटी बीमार पड़ गयी थी। उसे अपने नुस्खों से मीर साहब ने स्वस्थ कर दिया था। पुरी बस्ती उस अधिकारी ने मेरे साहब को दान दे दी। बाद में उन्होंने लोगों को जमीन देकर बसा दिया। सबको करीब 20 डेग या 22 डेग जमीन दे दिया। इनके वंशज हैं किंतु उनको अब कोई मतलब नहीं। मजार है। जो जमीन शेष बची थी वह भी सब दान कर दिया गया था।

दाउदखां के नाम पर दाउदनगर:-
दाउदनगर हिन्दुस्तान के बादशाह औरंगजेब के सिपहसालार दाउद खान का बसाया शहर है। यह शहर 16 वीं सदी का है। यहाँ पीतल का देश ख्यात उद्योग था। पानी से चलने वाला मिल 1912 में स्थापित किया गया था। इसे औरंगाबाद जिले की सांस्कृतिक राजधानी भी कहा जाता है। इस शहर का अपना लिखित इतिहास है। 17 वीं सदी में लिखे गए ‘तारीख-ए-दाउदिया’ संक्षिप्त इतिहास बताता है, वहीं ‘श्रमण संस्कृति का वाहक-दाउदनगर’ पुस्तक शहर के जन्म से लेकर 2014 तक का इतिहास बताता है।

Tuesday, 12 February 2019

किस व्यक्ति विशेष के नाम पर होगा दाउदनगर-नासरीगंज सोन पुल का नामकरण


कई नामचीन हस्तियों का इतिहास है महत्वपूर्ण

पुल का नाम कई लोगों के नाम पर रखने की मांग

उपेंद्र कश्यप 
रोहतास और औरंगाबाद जिले को जोड़ने वाला दाउदनगर-नासरीगंज सोन पुल अब उद्घाटन की प्रतीक्षा कर रहा है। इस पुल का फिलवक्त नाम “दाउदनगर-नासरीगंज सोन पुल” है। इसी नाम से परियोजना की प्रशासनिक स्वीकृति है। पुल निर्माण के समय से ही किसी व्यक्ति विशेष के नाम पर इसके नामकरण की मांग जब-तब उठते रही है। पुल का पश्चिमी हिस्सा नासरीगंज प्रखंड में और पूर्वी हिस्सा सीमावर्ती जिला औरंगाबाद के दाउदनगर प्रखंड में। दोनों तरफ कई नामचीन हस्तियाँ ऐसी हैं जिनके नाम पर इस पुल का नाम रखा जा सकता है। मांग बहुत ही शान्ति पूर्ण तरीके से उठती रही है। चाहत से आगे मांग कभी आन्दोलन के रूप को अख्तियार नहीं कर सकी। अब जब पुल बन कर तैयार हो गया है तो व्यक्ति विशेष के नाम पर पुल के नामकरण की मांग उठने लगी है।

क्या है नामकरण की प्रक्रिया:-
बिहार राज्य पुल निर्माण निगम (बीआरपीएनएल) द्वारा पुल का निर्माण कराया जा रहा है। निर्मात्री एजेंसी हिन्दुस्तान कंस्ट्रक्शन कंपनी है। निगम के वरीय परियोजना अभियंता श्रीकांत शर्मा ने बताया कि नाम सरकार तय करती है। इसके लिए एक प्रक्रिया तय है। कोइ भी समूह या संस्था किसी व्यक्ति विशेष के नाम पर पुल का नामकरण करने के लिए प्रस्ताव रखते हुए एक पत्र पथ निर्माण विभाग को भेज सकता है। विभाग सरकार को भेजती है, उस पर विचार होने के बाद कैबिनेट फैसले से नामकरण होता है।

दोनों नगर को जोड़ा था संगम साव ने:-
सोन पुल निर्माण से 109 वर्ष पूर्व बाबू संगम साव ने नासरीगंज और दाउदनगर को एक सूत्र में बांधा था। इनके कारण ही नासरीगंज और दाउदनगर जैसे चट्टी बड़े व्यापारिक केंद्र बन कर उभरे थे। आज एक नगर पंचायत तो दूसरा नगर परिषद है। नासरीगंज कागज़ उद्योग के लिए तो दाउदनगर समीपवर्ती इलाके में अकेला शहर होने के कारण मशहूर था। कहावत मशहूर है-शहर में सासाराम और चट्टी में दाउदनगर। संगम साव ने नासरीगंज (धूस) और दाउदनगर (सिपहां) में पानी से चलने वाला मिल 1910 में लगाया था। तब का उन्हें अंबानी बोल सकते हैं। इंगलैंड से लाकर टरबाइन लगाया था। दर्जनों कोल्हू लगाए गए और सरसों का शुद्ध तेल के साथ धान के लिए भी मशीनें लगाया था। उनकी इस कोशिश में दाउदनगर के राम चरण राम ने साथ दिया और सिपहां मिल का नाम इसी कारण ‘संगम साव रामचरण राम आयल एंड राईस मिल’ था। तब यहाँ 48 कोल्हू और 150 कर्मी रहते थे, अब मात्र 16 कोल्हू बचे हैं और दर्जन भर कर्मी। भारत में यह इकलौता ऐसा मिल है जो पानी से चलता है। घाटे के बावजूद इनके वंशजों ने इसे बचाए रखा है। इलाके के औद्योगिकीकरण का  आगाज उन्होंने ही किया था।       

अब्दुल कयूम अंसारी के लिए लिखा पत्र:-
द्विराष्ट्र सिद्धांत के सबसे बड़े विरोधी अब्दुल कयूम अंसारी के नाम पर भी पुल के नामकरण की मांग है। बिहार मोमिन कांफ्रेंस (क्यू) के अधिवक्ता जावेद अंसारी ने कहा कि वे सबसे बड़े स्वतंत्रता सेनानी थे। इलाके को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाया था। इनके अलावा नासरीगंज निवासी कांग्रेस नेता ओमकार प्रसाद ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर यह मांग की है। उनका कहना है कि इस सोन पुल का नाम इनके ही नाम पर कर इलाके को बेहतर सन्देश दिया जा सकता है। इनके अलावे डॉ.वंशीधर ओझा, गोपाल प्रसाद, कलक्टर चौधरी और कृष्णा सिंह ने भी यह मांग की है।

लिखा भगत सिंह के लिए खत:-
पुल का नामकरण 'शहीद भगत सिंह सेतु' करने के लिए मुख्यमन्त्री को आम नागरिकों का हस्ताक्षर युक्त ज्ञापन शहीद-ए-आज़म भगत सिंह सामाजिक विकास संस्थान के सचिव सत्येन्द्र कुमार ने लिखा है। इसकी प्रतिलिपि राज्यपाल, राष्ट्रपति को भी भेजी जाएगी। दाउदनगर में पुल के निर्माण के समय से ही इसकी मांग यह संस्था करती रही है। यह संगठन धारावाहिक एवं जुझारू संघर्ष चलाने की बात कह रही है।

Friday, 4 January 2019

3477 दिन की लंबी प्रतीक्षा के बाद पुनर्जीवित हुए स्व.रामबिलास सिंह

तत्कालीन विधायक सत्यनारायण सिंह अपने राजनीतिक गुरु रामबिलास सिंह के साथ


० अनुमंडल कार्यालय के सामने लगाई गयी उनकी प्रतिमा
० दाउदनगर को अनुमंडल बनवाने का है उनका ही श्रेय
० उपेन्द्र कश्यप०  
शुक्रवार 04 जनवरी 2019 को एक बार फिर से जी उठे राम बिलास सिंह। उनके निधन के बाद उनके पुनर्जीवित होने के बीच 3477 दिन गुजर चुके हैं। उनका निधन 22 जून 2009 को हुआ था। इसके बाद उनको मूर्त रूप में जीवित करने की कोशिश लगातार होती रही। पृथ्वी छोड़कर किसी और दुनिया में जाने के बाद इनके बारे में जानने की जिज्ञासा कईयों में थी। उनके निधन के बाद मैंने लगातार प्रत्येक वर्ष दैनिक जागरण में उनको स्मरण करता/कराता रहा था। जब 2012 में सन्दर्भ ग्रन्थ “उत्कर्ष” का (द्वितीय अंक) प्रकाशित किया तो उसमें दाउदनगर अनुमंडल के जिन पांच महान आत्माओं का जीवनवृत प्रकाशित किया था उसमें राम बिलास बाबू भी एक थे। उनसे मिलने और उनका साक्षात्कार लेने का कई अवसर मैंने गढ़ा। उनके राजनीतिक और सामाजिक अनुभव को सार्वजनिक किया। अपने जीवन के अंतिम क्षण में उनके अनुभव बहुत कटु हो गए थे। समाज और राजनीति दोनों क्षेत्र से। उन्होंने अनुमंडल बनाने के लिए क्या-क्या संघर्ष किया- यह अखबार में छपने के अतिरिक्त 2007 में प्रकाशित संदर्भ ग्रन्थ “उत्कर्ष” में विस्तार पूर्वक पहली बार पूरा संघर्ष लिखा। जिसे बाद में कुछ पत्रकारों ने उत्कर्ष का श्रेय काटकर प्रकाशित किया। अब उनकी प्रतिमा इसी अनुमंडल कार्यालय के सामने खड़ी की गयी है। विधिज्ञ संघ के प्रयास से।


ऊर्जा मंत्री बिजेंद्र यादव ने अनावरण किया। विधायक बीरेंद्र सिन्हा, पूर्व विधायक सत्यनारायण सिंह और जदयू के वरिष्ठ नेता प्रमोद सिंह चंद्रवंशी ने अनावरण में साथ निभाया। प्रतिमा के लिए भी संघर्ष चला। करीब सात-आठ वर्ष पूर्व तत्कालीन विधायक सत्यनारायण सिंह ने प्रतिमा स्थापना के लिए शिलान्यास किया था। आज वह मूर्तरूप में सबके सामने है। पूर्व विधायक सत्यनारायण सिंह ने कहा कि जब विधायक बना तो पता चला कि तीन पूर्वजों राम बिलास सिंह (तब जीवित थे), संत पदारथ सिंह और राम नरेश सिंह का सामाजिक राजनीतिक योगदान काफी है। तीनों महान आत्माओं की प्रतिमा लगाने का काम किया। राष्ट्रीय इंटर स्कूल में संत पदारथ और राम नरेश सिंह की तथा ओबरा में संत पदारथ की प्रतिमा लगवाया। राम बिलास सिंह के निधन के बाद कुछ माह तक ही विधायक रह सके थे सत्यनारायण सिंह। याद करें वे 2005 में विधायक बने थे। इसके बावजूद उनकी प्रतिमा एक स्कूल में लगवाया। उन्होंने अब मांग की है कि दाउदनगर-नासरीगंज सोन पुल का नामकरण इनके नाम पर हो।   

जाति नहीं जमात और विकास की बात करते थे
राज्य अति पिछड़ा आयोग के पूर्व सदस्य, जदयू के वरिष्ठ नेता प्रमोद सिंह चंद्रवंशी ने कहा कि राम बिलास सिंह जाति नहीं जमात की राजनीत करते थे। हालांकि उनके नाम लेकर राजनीति करने वाले जात की बात करते हैं। यह गलत है, सुधार जरुरी है। कहा कि लंबी प्रतीक्षा के बाद मंत्री बीजेन्द्र यादव ने अनावरण किया जो स्व.राम बिलास सिंह के साथ काम कर चुके हैं।  


Tuesday, 18 December 2018

सूबे बंगाल की सत्ता का केंद्र विन्दु रहे दाउदनगर के युवाओं को जाग्रत होने की जरुरत


दाउदनगरडॉटइन का आयोजन ‘दाउदनगर उत्सव’ सफल रहा। इसके विभिन्न पहलुओं पर मेरी दृष्टि। प्रशंसा भी, समालोचना भी, सलाह भी और कुछ ख़ास भी.....


(सन्दर्भ-दाउदनगरडॉटइन द्वारा आयोजित 
“दाउदनगर महोत्सव”)
०० उपेन्द्र कश्यप ००
दाउदनगर कई दिन की हलचलों के बाद शांत हो गया। यह हलचल थी दाउदनगरडॉटइन द्वारा आयोजित “दाउदनगर महोत्सव” से संबद्ध सांस्कृतिक गतिविधियों की वजह से। कभी सबसे बड़े ‘खुला-शौचालय’ का तगमा रखने वाले दाउद खां कुरैशी के किला परिसर में अपनी तरह का यह दूसरा आयोजन था। 16 दिसंबर के पूर्व गत वर्ष भी यही आयोजन हुआ था। महत्वपूर्ण है कि तब किला का जीर्णोद्धार कार्य आधा से अधिक हो चूका था। मो.इरशाद और नीरज कुमार की मित्र मंडली का यह प्रयास सर्वथा सराहनीय है। एक अच्छी कोशिश और सकारात्मक पहल। एक उम्मीद जगाती युवा और उर्जान्वित टीम दिखती है। पुरे कार्यक्रम में डिजिटल युग का प्रभाव दिखता है। उदघाटन सत्र में मैं था। इस कारण एसडीएम अनीश अख्तर के साथ डिजिटल तरीके से उद्घाटन किया और गुब्बारा भी उड़ाया-जिसे शान्ति का प्रतिक बताया गया। अब भला सफ़ेद कबूतर मिलते भी कहां हैं? साथ में अश्विनी तिवारी रहे। एसडीपीओ राज कुमार तिवारी के साथ भी मंच साझा करने का मौका मिला।
 उनसे गुफ्तगुं हुई तो उद्घोषक आफताब राणा से दुसरी बार माइक मांग लिया। मैंने बताया कि दाउदनगर किला को राष्ट्रीय महत्त्व के धरोहर वाले स्मारकों की सूची में जगह दिलाई जाए। इस सन्दर्भ में मैं और गोह विधायक मनोज कुमार पर्यटन विभाग के प्रधान सचिव से मिल चुके थे। तब साथ में धर्मवीर भारती थे। किला के विकास के लिए एसडीपीओ से सहयोग लेने को दाउदनगरडॉटइन से कहा तो नीचे खड़े इरशाद ने अंगूठा दिखाया। आशान्वित किया कि उनकी टीम अब पहल करेगी। किला का सौन्दर्यीकरण हुआ किन्तु अधूरा क्योंकि चारदीवारी पुरी तरह इसलिए नहीं बन सकी क्योंकि अतिक्रमण नहीं हटाया जा सक रहा है। बहरहाल, आयोजन बेहतर है, सकारात्मक है। आने वाले समय में यह बड़ा आयाम प्राप्त कर सकता है- यदि कोशिश समष्टि में हो।

जिन्दगी उलझी रही ब्रह्म की तरह:-
एसडीपीओ राजकुमार तिवारी ने अपनी बात शुरू कि- कोई कंघी न मिली जिससे संवारु इसको, जिंदगी उलझी रही ब्रह्म की तरह। मगध का इतिहास और सोन की धारा का जिक्र किया। बोले- मग का अर्थ है आग का गोला। मगध हमेशा इंटरफेस (अभिव्यक्त या रिफ्लेक्ट करता है मगध भारत की हर घटनाओं को) रहा है। तपस्वी भृगु और च्यवन की यह धरती है। मग ब्राह्मण बाहर से महाभारत काल में लाये गए। यह मगध ही है जिसने गौतम को बुद्ध बना दिया। यहां ऐसी ताकत है जो व्यक्ति को जिंदा बना देता है। 1662 से 1672 तक दाउदनगर सत्ता का केन्द्र रहा। दाउदनगर से दाऊद खान ने सत्ता चलाया। इस पर गर्व करें। जब तक गर्व करने का माद्दा नहीं रहेगा तब तक आप विकास नहीं कर सकते। कहा यह जीर्णोद्धार का बाट जोह रहा है। आप सजग हो जाएं तो कुछ भी असंभव नहीं है। यहां के लाल चाहे जहां रहते हों इसके संरक्षण के लिए प्रयासरत रहें। गौरव की अनुभूति करिये कि यहां से बिहार की सत्ता का संचालन होता था। युवा आगे आएं। शहर और यहां के युवाओं को जाग्रत होने के जरूरत है।

आलोचना से परे कुछ भी नहीं, किन्तु उसे लें सकारात्मक:-
आलोचना से परे कुछ भी नहीं होता। प्रशंषा सबको प्यारी लगती है। किन्तु आलोचना को जब सकारात्मक लेंगे तो सुधार बेहतर होगा। याद रखिये-सुधार की गुंजाइश सदैव हर जगह बनी रहती है। इरशाद के लिखे और आफताब के बोले गए शब्द प्रभावी हैं। तकनीक का इस्तेमाल प्रभावी बनाता है शब्दों को, किन्तु दायरा सिमटा सा लगा। “मैं दाउदनगर हूँ“ को उतने ही शब्दों में और व्यापक बनाया जा सकता है। जितना बताया गया है, वास्तव में दाउदनगर बस उतने भर नहीं है। बोली गयी डिजिटलबद्ध पंक्तियों को जब कोइ नया व्यक्ति सुनेगा, जो दाउदनगर को नहीं जानता है, या फिर कम जानता है तो उसे ही संपूर्ण मान लेगा। इसकी वजह है- यह शीर्षक। इसलिए सुधार पर विचार होना चाहिए। इन पंक्तियों में दाउदनगर की संपूर्ण संस्कृति नहीं झलकती है। जिउतिया को खारिज नहीं किया जा सकता है। इसके कुछ पहलुओं से कोइ सहमत नहीं भी हो सकता है, किन्तु दाउदनगर की संस्कृति का हर पहलु जिउतिया लोकोत्सव पर ही रिफ्लेक्ट करता है। किसी अन्य पर नहीं। एक यही आयोजन है जब दूर दराज के लोग इसे देखने दाउदनगर आते हैं। दाउदनगर का प्रतिनिधित्व किसी भी सांस्कृतिक मंच पर जिउतिया ही कर सकता है, दूसरा कुछ भी नहीं। यह ‘मैं दाउदनगर हूँ’ के लेखक भाई इरशाद को ध्यान रखना चाहिए।

Friday, 5 October 2018

असल भारतीयता दिखाता है श्रमिक समुदायों का दाउदनगर जिउतिया लोकोत्सव


(सन्दर्भ-पाखण्ड से इतर लोक का विचार-डॉ.अनुज लुगुन-प्रभात खबर-05-10-2018)
 नगर परिषद द्वारा “जिउतिया लोकोत्सव” आयोजन को लेकर पहले संशय पैदा करने, फिर उसे खारिज करने और फिर जन दबाव में एकाधिक पार्षद प्रतिनिधियों द्वारा अगले वर्ष आयोजन करने का भरोसा देने, कलाकारों द्वारा आन्दोलन किये जाने जैसे अवांक्षित मुद्दों की गरमाहट के बीच दाउदनगर जिउतिया लोकोत्सव संपन्न हो गया। अपने पीछे कई सवाल छोड़ गया। सवाल से अधिक यह कहना उचित जान पड़ता है कि-चिंताएं छोड़ गया। चिंता इस बात की कि क्या नगर परिषद “जिउतिया लोकोत्सव” का आयोजन नहीं करेगा? जिसका आगाज 2016 में “श्रमण संस्कृति का वाहक-दाउदनगर” के लेखक उपेंद्र कश्यप की पहल पर हुआ था। विरोध तो तब भी हुआ था। 23 में 08 वार्ड पार्षद खिलाफ में थे। इस बार टिप्पणी आयी कि-अमुक खरीदारी में घोटाले का आरोप था, इससे ध्यान हटाने के लिए आयोजन किया गया था। इस तर्क पर देखें तो फिर विकास का कोई कार्य नहीं होना चाहिए, क्योंकि घोटाला तो नेहरू के जमाने में जीप खरीद से ही शुरू हो गया था। तब से अभी तक हर कार्य में कमीशनखोरी, और हर संवैधानिक संस्था में “सरकार” गठन के लिए खरीद-फरोक्त होना चर्चा में रहता है। तो क्या अब हाथ-पर हाथ धर कर बैठ जाया जाए। जो हमारे से संतुष्ट नहीं हैं, वे भला हमारे काम से कैसे संतुष्ट हो सकते हैं? वे हमारा भला क्यों चाहेंगे? समाज के भले के लिए ‘सब’ नहीं ‘कुछ’ लोग ही दर्द ले सकते हैं, दर्द लेते हैं, और ऐसे ही लोगों से काम चलता है।

विरोध करने के लिए विरोध करने वाले, श्रीमानों !

सोच के संकीर्ण दायरे से बाहर निकलिए। हाँ, ऐसा करना सहज नहीं होता, क्योंकि पूर्वाग्रह, दुराग्रह आदमी को इस कदर जकड़ लेता है कि उसे पता ही नहीं चलता कि वह किसका और क्यों विरोध कर रहा है? उसके विरोध का अंजाम क्या होगा, किसे कितना नुकसान होगा, यह दिखता ही नहीं है। व्यक्ति को लक्ष्य करने के परिणाम स्वरूप समाज-संस्कृति-सभ्यता को क्षति पहुँचती है। खैर, उम्मीद की जानी चाहिए कि अगले वर्ष फिर से नगर परिषद “जिउतिया लोकोत्सव” का आयोजन करेगा। विरोधी शहर की संस्कृति के आगे नतमस्तक होंगे।      

खैर...
जिउतिया जाते-जाते एक सुखद इतिहास लिख गया। प्रभात खबर के संपादकीय पन्ने पर डॉ.अनुज लुगुन ने “पाखण्ड से इतर लोक का विचार” शीर्षक से अग्रलेख लिखा है। वे 02 अक्टूबर को दाउदनगर गए थे। मुझसे मेरी किताब ली, और कई विषयों पर संक्षिप्त चर्चा की थी। यह सकारात्मक आलेख है, जिसमें शहर का नाम आया है, अन्यथा किसी शहर का नाम इस तरह के लिखे में तो नकारात्मक कारणों से ही प्राय: आता है। लेकिन इससे गौरव का बोध उन्हीं को होगा, जो सकारात्मक सोच रखते हैं, अन्यथा कुछ जलेंगे, कुछ झेपेंगे, कुछ भीतर-भीतर विरोध करगें। गाना गुनगुना लीजिये- कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना।
विरोध करने वाले, जिउतिया को खारिज करने वाले और जिउतिया को वंचित, शोषित, दलित समाज का बता कर खारिज करने की कोशिश करने वालों अनुज लुगुन को पढ़ लो। पूरा नहीं पढ़ सकते तो यहाँ कुछ ख़ास दे रहा हूँ, शायद आँखों की पट्टी खुल जाए अगर वास्तव में थोड़ा सा भी शहर से प्यार है, शहर की अपनी संस्कृति पर गर्व है, तो पढ़ने से गौरव का बोध होगा, अन्यथा तो जिसने आँख बंद कर ली है, उससे कुछ नहीं कहना:-

अनुज लुगुन के आलेख : 
पाखण्ड से इतर लोक का विचार 
: से कुछ पंक्तियाँ:-  
इस माह में मगध अंचल में मनाया जानेवाला एक त्योहार है ‘जिउतिया’. इस अंचल के दाउदनगर का जिउतिया सबसे ज्यादा लोकप्रिय है. वहां इस अवसर पर लगभग सप्ताह भर से स्वांग, नकल, अभिनय और झांकियां प्रस्तुत की जाती हैं. लोक कलाकार हैरतअंगेज करतब दिखाते हैं. आमतौर पर हिंदी पट्टी में स्त्रियों की सार्वजनिक भागीदारी बहुत कम दिखती है. यहां तक कि प्रगतिशील संगठनों के कार्यक्रमों में भी. यह हिंदी पट्टी का सामंती और पितृसत्तात्मक लक्षण है. लेकिन, दाउदनगर के जिउतिया त्योहार में स्त्रियों की बराबर की उपस्थिति ने इस पर पुनः विचार करने को विवश किया है. त्योहार के कार्यक्रम की व्यवस्था आपसी सहयोग-सद्भाव के साथ सभी स्थानीय समुदायों के लोग मिल-जुलकर करते हैं. 
लगभग डेढ़ सौ वर्षों से चले आ रहे, कई दिनों तक रातभर चलनेवाले कार्यक्रम में लाल देवता और काला देवता नामक प्रहरी के जिम्मे सुरक्षा का भार होता है और दोनों उसी भेष में घूम-घूम निगरानी करते हैं. ये प्रतीक पुलिस-प्रशासन की बजाय स्थानीय समुदाय की शांतिपूर्ण और सौहार्दपूर्ण व्यवस्था के हैं. यह सामुदायिक भागीदारी के द्वारा सुरक्षा का उदाहरण है. पुरोहितवाद और कर्मकांड के पाखंड से इतर यह त्योहार अपने अंदर लोक जीवन और कलाओं का समागम तो है ही, यह अपनी भंगिमाओं में लोक का वैचारिक प्रतिनिधि भी है. 
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का मानना रहा है कि संस्कृति और साहित्य के अंदर जो द्वंद्व दिखायी देता है, वह मूलतः लोक और शास्त्र का द्वंद्व होता है. लोक श्रमिक समाज की दुनिया है, जबकि शास्त्र पोथियों की दुनिया है. लोक चिंता और शास्त्र चिंता के बीच हमेशा टकराव चलता रहता है. उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि एक समय में ब्राह्मण धर्म को अवर्ण धर्म ने पराजित किया. यह लोक का पक्ष था. आगे चलकर लोक का नया दर्शन ही बना- तंत्र. यह साधनामूलक था, जिसने शूद्र और वंचितों को अधिक स्वतंत्रता दिया और उसकी मान्यताओं ने शास्त्र को चुनौती दी.
लोक अपने तमाम अंतर्विरोधों के बावजूद सहज और लचीला होता है. वह समन्वय की ताकत रखता है, जबकि शास्त्र ‘श्रेष्ठता बोध’ और ‘चयन’ के विचार से चालित होता है. वह अपने ढांचे के अनुकूल ‘करेक्शन’ करता है, अनुशासन गढ़ता है और संस्थाओं के माध्यम से अपना ‘वर्चस्व’ कायम करता है. इन्हीं अर्थों में लोक का विचार बहुलतावादी है, और शास्त्र वर्चस्वकारी. शास्त्र विचार को एक रंग और एकरूपता देने की कोशिश करता है. बहुलता उसके लिए चुनौती है. इसलिए देखा गया है कि शास्त्र-सम्मत धर्म अपना दूसरा कोई प्रतिरूप नहीं चाहते हैं. शास्त्र के पंडित और पुरोहित अपना वर्चस्व बनाते हैं. वे नहीं चाहते कि उनकी सत्ता उनके हाथ से छूटे.
लोक और शास्त्र के टकराव और दोनों के आपसी लेन-देन को समझे बिना संस्कृतियों का अध्ययन नहीं किया जा सकता है. भारतीय लोक की बहुलता को समझने की कोशिश होनी चाहिए. स्वाधीनता संघर्ष के दौरान और उसके कुछ समय बाद हुए कुछ प्रयासों को छोड़कर हमारा अध्ययन लोक की दिशा में नहीं हुआ. हम कथित आधुनिकता के दबाव में औपनिवेशिक मानसिकता के नियंत्रण में रहे और मध्यवर्गीय आकांक्षाओं में उलझकर लोक को उपेक्षित करते रहे. 
इसलिए देवेंद्र सत्यार्थी जैसे महान लोक अध्येताओं के द्वारा प्रस्तावित लोक संस्कृतियों के जरिये भारतीय बहुलता को समझने की दिशा में हम अग्रसर नहीं हुए. लोक का स्वभाव ही है सामूहिकता और सहभागिता. बिना इसके न तो सामाजिकता संभव है और न ही सामाजिक सुरक्षा. लोक अपने समय की सत्ता के विरुद्ध प्रतिरोध भी गढ़ता है. यह प्रतिरोध समाज के वंचित-उत्पीड़ित समुदायों की कथाओं, गाथाओं और गीतों में सहज ही देखा जा सकता है. 
पूंजीवादी युग में शास्त्र पूंजी के साथ गठजोड़ भी करता है. इस तरह लोक पर केवल शास्त्र का हस्तक्षेप नहीं होता, बल्कि पूंजी भी उस पर हमला करती है. 
देश में जिउतिया की तरह अनगिनत लोक त्योहार मनाये जाते हैं. आदिवासी लोक तो विलक्षण लोक है. इन त्योहारों में ही हम असल भारतीयता को देख सकते हैं. इनमें आंतरिक अंतर्विरोध जरूर होंगे, लेकिन यहां आपसी सद्भाव है. यह श्रमिक समुदायों का उत्सव है. ऐसे दौर में जब हम सांप्रदायिकता के चंगुल में फंसते जा रहे हैं, लोक के उत्सव, राग और संघर्ष से जुड़कर, उससे बहस और संवाद करते हुए ही हम नये जनवादी समाज का निर्माण कर सकते हैं.