Tuesday, 10 January 2017

आपसी सौहार्द का सन्देश देगा हिंदू-सिख धर्मस्थल

होली तक बनकर तैयार होगा गुरुद्वारा व शिवमंदिर
बाबा बिहारी दास संघत में चल रहा है निर्माण कार्य
नव संवत्सर के प्रारंभ से पूर्व यहाँ हिंदू-सिख धर्मस्थल एक ही परिसर में 100-150 फीट की दूरी पर बन कर तैयार हो सकता है| पिछले कई वर्ष से इस पर कम चला रहा है| कुछ समस्या के कारण अभी काम बंद है किन्तु समस्या के अंत होते ही तेजी से निर्माण कार्य होगा और शीघ्र ही यह शहर आपसी सौहार्द का एक मिशाल पेश करेगा| जो राज्य के लिए तो
 महत्वपूर्ण होगा ही, सभी सिखा समुदाय के लिए यह पवित्र ऐतिहासिक स्थल धार्मिक पर्यटन का भी केंद्र बन जाएगा| यहाँ बाबा बिहारी दास संघत में करीब तीन सौ साल पुराना हस्तलिखित गुरुग्रंथ साहिब है| उसे शिवालय में हिंदू धर्मावलंबियों ने सुरक्षित रखा हुआ है| इसी स्थान पर भव्य गुरुद्वारा का निर्माण किया जा रहा है, जबकि इससे कुछ ही दूरी पर इसी परिसर में शिव मंदिर का निर्माण किया जा रहा है| कर सेवा से यह सब संत बाबा गुरुनाम सिंह और बाबा मुख्तियार सिंह के नेतृत्व में हो रहा है| सेवादार संदीप सिंह ने बताया कि नए शिवमंदिर में भगवान की प्रतिमाये प्रतिस्थापित होते ही गुरुद्वारा का निर्माण तेज गति से प्रारंभ हो जाएगा| अभी गुरुद्वारा का निर्माण पुराने मंदिर के चारों तरफ से हो रहा है| मंदिर भी बना है किन्तु अंतिम तौर से नहीं|


जल्द होगी प्रतिमाये स्थापित
बाबा बिहारी दास संघत कमिटी के अध्यक्ष राजेन्द्र प्रसाद सर्राफ ने बताया कि जैसे ही मंदिर बन जाएगा, उसमे शिव प्रतिमाओं को स्थापित किया जाएगा| इसके बाद गुरुद्वारा निर्माण में तेजी आयेगी| मंदिर निर्माण के काम में अभी थोड़ा सा विलंब है|

निर्माण में देगा प्रशासन सहयोग

गुरुद्वारा निर्माण में निर्माण स्थल तक मशीन ले जाने में यदि अतिक्रमण के कारण समसया आयेगी तो प्रशासन सहयोग करेगा| सूत्रों के अनुसार आवश्यकता पड़ने पर गुरुद्बारा निर्माण से जुड़े लोग प्रशासन से सहयोग मांगेंगे तो उन्हें निराश नहीं होना पडेगा|  

Monday, 9 January 2017

आधी सदी से हिंदी को विश्व भाषा बनाने का संघर्ष

विश्व हिन्दी दिवस 10 जनवरी पर विशेष
39 देशों के 122 प्रतिनिधियों ने तय किया था लक्ष्य
आज 10 जनवरी को विश्व हिन्दी दिवस है| नागपुर में 10 जनवरी 1975 को प्रथम हिंदी सम्मेलन में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरगांधी और मौरीशस के तत्कालीन प्रधानमंत्री शिवसागर रामगुलाम की उपस्थिति में 39 देशों के 122 प्रतिनिधियों ने हिंदी को विश्व भाषा बनाने का लक्ष्य तय किया था| उसे धरातल पर उतारने के लिए लक्ष्य से दूर खडी वर्तमान पीढ़ी को मेहनत करनी पड़ेगी। हालांकि मौरीशस में विश्व हिन्दी सचिवालय की स्थापना एक महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जाती है| गौर करें तो दुनिया भर की भाषाओं पर नयी सदी का दबाव है। गरीब देशों में यह अधिक है। आज भोजन ,वस्त्र और आवास के अलावा स्मार्ट फोन जीवन की बुनियादी जरूरत है। भाषा में यह जो तकनीक की वजह से स्पेस छूट रहा है उसको भरने का दबाव है। इस अवसर पर ‘विश्व भाषा के रूप में हिन्दी की संभावना और चुनौतियां’ विषय पर दैनिक जागरण ने दो महत्वपूर्ण हस्ताक्षरों से टिप्पणी ली है|

आत्मसात करनी होगी जुड़े रहने की बेचैनी-संजय
काव्य संग्रह-आवाज भी देह है- के कवि संजय कुमार शांडिल्य का कहना है कि-सिर्फ साहित्य ही भाषा का उपस्कर नहीं है। विचार, दर्शन, इतिहास, रिपोर्टिंग, विज्ञान भी हैं जिनकी अपनी जरूरत है। भाषा में उन जरूरतों के लिए जरूरी संवेदना-विस्तार की संभावना पैदा किए बिना आज भाषाओं का काम नहीं चल सकता है। जैसे सिर्फ आवास ही आज की चिन्ता नहीं है, आदमी आज चार्जिंग-स्टेशन भी सबसे पहले ढूँढता है। तो यह जो जुड़े रहने की नई बेचैनी है उसको आत्मसात किए बिना आज भाषा कैसे जीवित रहेगी और जीवित रह भी ले तो सार्थक कैसे बनी रहेगी? कहा कि- हर भाषा का अपना लोकल होता है। आज उसमें वैश्विक फैलाव आया है। सिर्फ आसपास के ही नहीं दुनिया भर के बदलाव अभिव्यक्त हो सकने वाले उपक्रमों की चिन्ता किए बिना आज भाषाओं का काम नहीं चलने वाला। अन्तर्भाषिक अनुभव को स्थान देने की चुनौती का सामना दुनिया भर के भाषा-परिवारों को करना पड़ रहा है। तकनीक आज जितना संरचनाओं को खोल पा रहा है उतनी भाषाओं में शिथिलन की  क्षमता नहीं आ पा रही है। नये-नये दृश्य-बिम्बों को अपना सकने पर संरचनात्मक शिथिलन का स्कोप नयी सदी में रचना होगा।

संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा बनाना होगा-डा.मुकेश

साहित्य लेखन में रूचि रखने वाले प्रखंड आपूर्ति पदाधिकारी डॉ. मुकेश कुमार का मत है कि हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संघ के 197 सदस्यों में से दो तिहाई का समर्थन मिलने पर सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता और उसके परिणामी लक्ष्य के रूप में हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा बनाने का प्रयास भी जारी रखना होगा| हिंदी के पास भाषिक क्षमता इतनी ज़्यादा है कि वह आसानी से विश्व भाषा बन सकती है। क़रीब 70 करोड़ लोग अकेले भारत में हिन्दी बोलते हैं। पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, तिब्बत, म्यांमार, अफगानिस्तान में भी हज़ारो लोग हिन्दी बोलते और समझते हैं। यही नहीं फ़ीजी, गुयाना, सुरिनाम, त्रिनिदाद जैसे देश तो हिंदी भाषियों के हीं बसाए हुए हैं। विदेशी छात्रों के लिए लघु हिंदी पाठ्यक्रमों, हिन्दी लेखकों के प्रोत्साहन, विदेशियों के लिए हिन्दी प्रशिक्षण के लिए मानक पाठ्यक्रम तैयार करने, देवनागरी के लिए उपयुक्त साफ्टवेयर विकसित करने के लिए भारत सरकार द्वारा प्रोत्साहित करने की ज़रूरत है।

महत्वपूर्ण तथ्य
पहली बार 2006 में मना दिवस
भारत के पूर्व प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह ने 10 जनवरी 2006  को प्रति वर्ष विश्व हिन्दी दिवस के रूप में मनाये जाने की घोषणा की थी। उसके बाद भारतीय विदेश मंत्रालय ने विदेश में 10 जनवरी 2006 को पहली बार विश्व हिन्दी दिवस मनाया था।

Sunday, 8 January 2017

भारतीय टीम के आधार बन सकेंगे ईशान किशन : प्रफुल्लचंद्र

सफलता: दाउदनगर के गोरडीहा गांव का है निवासी
समय के साथ बन रहे पेशेवर खिलाड़ी

अच्छा प्रदर्शन कर टीम के लिए करेंगे दावा
पहले अंडर-19 वल्र्ड टीम के कप्तान और अब भारतीय ए टीम के सदस्य बनने से ईशान किशन के गृह जिला औरंगाबाद में खुशी है। ईशान दाउदनगर प्रखंड के गोरडीहा का निवासी है। ईशान के चयन से बिहार के युवाओं को क्या प्रेरणा मिलेगी, बिहार क्रिकेट के लिए क्या फर्क आएगा जैसे सवाल का उठना भी स्वभाविक है। इन सारे सवालों को जानने के लिए दैनिक जागरण ने पूर्व रणजी खिलाड़ी प्रफ्फुलचंद्र सिंह से बातचीत की। श्री सिंह एक तरह से कहा जाय तो ईशान के कोच थे। वे उन्हें मोइनुल्हक स्टेडियम पटना में फिटनेश सत्र और नेट प्रैक्टिस कराया करते थे। 1प्रफ्फुलचंद्र ने बताया कि ईशान शुरु से ही अनुशासित और कड़ी मेहनत करने वाला खिलाड़ी रहा है। समय के साथ वह परिपक्व पेशेवर खिलाड़ी बन रहा है। मौजूदा रणजी ट्राफी सीजन में ईशान ने लगभग 800 रन बनाए, जिसमें एक दोहरा शतक शामिल है। ईशान की तेजी से रन बनाने की काबिलियत और उनका फिटनेस आने वाले समय में उन्हें राष्ट्रीय टीम में जगह दिला सकती है। इंडिया ए टीम में चयन उनके राष्ट्रीय टीम में जगह बनाने का एक बेहतर विकल्प हो सकता है। यह उनके लगातार अच्छे प्रदर्शन पर निर्भर करेगा। प्रफ्फुलचंद्रा ने बताया कि बिहार क्रिकेट बोर्ड को मान्यता न होने से ज्यादा खिलाड़ी झारखंड चले गए। ईशान 2007-2008 में रांची से खेलने लगे और फिर उनका चयन झारखंड अंडर-17, अंडर-19 और रणजी में वो नियमित वहीं से खेलने लगे।

ईशान का चयन युवाओं के लिए प्रेरणा
प्रफ्फुलचंद्र ने बताया कि ईशान ने जब खेलना शुरु किया था तब उन्हें नहीं पता था कि बिहार की मान्यता नहीं है। उनका खेल में भविष्य क्या होगा? पर आज वो राष्ट्रीय टीम में शामिल होने के प्रबल दावेदार हैं ऐसा उनकी मेहनत और मजबूत इच्छा के कारण संभव हुआ है। बिहार में मौजूदा स्थिति में जब तक मान्यता नहीं मिलती बड़े पैमाने पर खिलाड़ियों को मौका नहीं मिल सकता। खिलाड़ी जरूर आगे खेल सकते हैं।
 नियमित अभ्यास किया 
प्रफ्फुलचंद्र सिंह ने बताया कि ईशान जब छह साल के थे तब वो अपने बड़े भाई राज किशन के साथ 2004 से नियमित अभ्यास करने मोइनुलहक आया करते थे। उन्हें प्रैक्टिस के ज्यादा अवसर नहीं मिल पाते थे। तब उनके पिता प्रणव पांडेय दोनों को शनिवार और रविवार को प्रैक्टिस के लिए लाते थे। उस दिन एकेडमी ऑफ रहने से प्रैक्टिस के ज्यादा अवसर मेरे और कुछ सीनियर खिलाड़ी से ईशान को मिलते थे और ईशान इस समय का सदुपयोग करते थे।
डीएम ने किया था सम्मानित
जब उनका चयन अंडर-19 टीम के लिए हुआ था तब जिला मुख्यालय में 29 दिसंबर 2015 को डीएम कंवल तनुज ने सम्मानित किया था। जनवरी 2016 में प्रकाशित जिला की स्मारिका में उन पर लेख प्रकाशित किया गया था। ये जिले के लिए गर्व का विषय है।

यहाँ जाति, पैसा और पैरवी का “लाइसेंस”


शहर में विवाद हो गया| माननीय बनाम साहेब विवाद की वजह बनी लाइसेंस| जी हाँ, लाइसेंस| हिन्दी में जिसे अनुज्ञप्ति कहते है| हिन्दी शब्द से स्मरण हो आया कि कल विश्व हिन्दी दिवस है| और यह कड़वा सत्य है कि लाइसेंस को आम अवाम जितनी आसानी से समझता है उसने आसानी से अनुज्ञप्ति को नहीं समझता| खैर, मुद्दा लाइसेंस और विवाद का है| ताजा विवाद के सच समेत अन्य पहलू तो बंद कमरे के माननीय और साहेब जानें, किन्तु अतीत में भी ऐसे विवाद होते रहे हैं, यह सत्य है| निकट के दशक में दो साहबों के किस्से चर्चा में रहे हैं जबकि एक साहब के किस्से अखबारों की सुर्खियाँ तक बनी| लाइसेंस बहुत सारे कामों के लिए चाहिए, जबकि लाइसेंस राज कभी हुआ करता था और वह अब ख़त्म होने की बात कही जाती है| इसके बावजूद हथियार के लाइसेंस की चर्चा अक्सर सही कारणों से नहीं होती है| जिला में तीन साहब अतीत के महत्वपूर्ण उदाहरण बन गये है| एक साहब की चर्चा रही कि अपनी स्वजातीय बंधुओ को खूब मुक्त हस्त से आग्नेयास्त्र के लाइसेंस बांटे| एक साहब तो ट्रांसफर होने के बाद- रेवड़ियों की तरह बांटी गयी हथियार की अनुज्ञप्तियाँ -शीर्षक अपने नाम कराने में सफल रहे थे| खूब साहब ने चर्चा बटोरी| हद हो गयी इतने मशहूर हुए कि दूसरों को रस्क होने लगा होगा| जिला में चर्चा होती है कि प्राय: हथियारों के लाइसेंस साहब अपने ट्रांसफर होने के बाद बैक डेट में लाइसेंस जारी करते हैं या तब अधिक जारी होता है जब जाने की संभावना तय दिखने लगती है| लाइसेंस जाति, पैसे और पैरवी पर ही मिलते हैं, यह रुढ होता गया है| यह साहब हों या सरकार, दोनों के लिए सही नहीं है|


अंत में दुष्यंत कुमार---
कैसे मंजर सामने आने लगे हैं|
गाते-गाते लोग चिल्लाने लगे हैं||
अब तो इस तालाब का पानी बदल दो|
ये कँवल के फूल कुम्हालाने लगे हैं||

जनसंख्या नियोजन को अभी बहुत कुछ करना बाकी

संसाधनों और जागरूकता का है घोर अभाव
सरकारी योजनाओं से अपेक्षित उपलब्धि नहीं
जनसंख्या नियोजन के लिए अभी लंबी यात्रा करनी होगी| जिस तरह का सामाजिक परिवेश है और आर्थिक असुरक्षा की भावना उसमें बहुत कुछ करने की आवश्यकता है| सरकारी संसाधनों का घोर अभाव है तो जागरूकता की कमी भी साफ़ दिखती है| सरकार की तरफ से कई योजनाये इस दिशा में संचालित हैं| अनुमंडल मुख्यालय को प्रखंडों के मुकाबले आवश्यक थोड़ा अधिक् शहरी और शिक्षित क्षेत्र मानना होगा| यहाँ की ही स्थिति संतोषजनक नहीं है तो गाँवों की हालत क्या होगी?
पीएचसी से प्राप्त आंकड़े पर गौर करें| परिवार नियोजन के लिए जो योजनाये चलाती है उससे उपलब्धि बहुत दूर है| माला-एन के लिए प्रति माह मात्र 50 लाभुक पीएचसी पहुंचते हैं| यह औसत आंकड़ा है| इसी तरह कॉपर टी के 65, निरोध के लिए 700, ओरल पिल्स के लिए 45, पीपीआईयूसीडीके लिए 50 और ईसीपी के लिए 50 लाभुक प्रति माह लाभ लेते हैं| यह स्थिति बदल सकती है अगरचे कि इसे अभियान के रूप में लिया जाय और लोगों को यह बताया जाए कि किस योजना का लाभुक के लिए क्या लाभ है?

एक साल में एक भी पुरुष नसबंदी नहीं
अनुमंडल मुख्यालय दाउदनगर स्थित पीएचसी में जनसंख्या नियंत्रण की सबसे बड़ी महत्वाकांक्षी योजना का हाल बुरा है| पुरुष नसबंदी महिला के बंध्याकरण से ज्यादा आसान, कम पीड़ादायक और कम खर्चीला है इसके बावजूद गत वर्ष में एक भी पुरुष नसबंदी नहीं हुई| साफ़ है कि लोगों में जागरूकता का अभाव है| जुलाई से दिसंबर के छ: महीने में मात्र 222 बंध्याकरण हुआ| यानी औसतन प्रति माह सिर्फ 37 बंध्याकरण| जबकि गौर करने वाली बात यह है कि इसके लिए आशा कार्यकर्ता कुल 148 बहाल किए गए है जिन्हें हर एक को प्रत्येक महीने एक बंध्याकरण का ही तय लक्ष्य दिया गया है| अर्थात लक्ष्य का सिर्फ 25 फीसदी उपलब्धि|

आर्थिक प्रोत्साहन के बावजूद स्थिति बदतर
यह स्थिति तब है जब सरकार इसके लिए दो स्तर पर आर्थिक प्रोत्साहन देती है| एक बंध्याकरण पर लाभुक को 1400 रूपए और उत्प्रेरक के लिए आशा या एएनएम् को 150 रूपए मिलता है| पहले लाभुक को मात्र 600 रूपए ही मिलते थे| पैसे बढाने के बावजूद लाभुक की दर नहीं बढ़ी| इसी तरह पुरुष नसबंदी के लिए लाभुक को 2000 रूपए और उसके लिए उत्प्रेरक का काम करने वाली आशा कार्यकर्ता और एएनएम् को 200 रूपए दिया जाता है| उत्पेरक का काम कोइ भी कर सकता है और उसे यह राशि देय है|

बहाली फेमली प्लानिंग का और काम दूसरा
दाउदनगर पीएचसी में फेमली प्लानिंग वर्कर के लिए दो बहाली है| दोनों इस काम को छोड़ कर दूसरा काम करते हैं| सुरेश सिंह यादव ओटी तो दीपक कुमार चतुर्थवर्गीय कर्मी का काम करते है| सूत्रों के अनुसार इनके द्वारा कोइ नसबंदी या बंध्याकरण के लिए उत्प्रेरक का काम नहीं किया जाता है|


समाज के कई अंगों को होना होगा सक्रिय-डाक्टर

सिर्फ सरकार या संस्था नहीं
 कर सकता बड़ा काम
जनसंख्या नियंत्रण बहुत बड़ा वैश्विक मुद्दा है| इसमे सफलता सिर्फ सरकार और संस्थानों के बूते नहीं मिला सकती है बल्कि इसके लिए समाज के कई अंगों को सक्रिय होना होगा| यह मानना है पीएचसी के चिकित्सकों का| डा.उपेन्द्र सिंह और डा.विनोद प्रसाद शर्मा का मानना है कि सरकार ने जितनी सुविधा और संसाधन दिया है उसका भरपूर उपयोग चिकित्सक अपने संस्थानों में करते हैं| यदि 100 आयेगा तब भी और मात्र 3 आयेगा तब भी मरीज का बंध्याकरण हो या नसबंदी करेंगे ही या अन्य परिवार नियोजन का लाभ देंगे| किन्तु पीएचसी तक लाने का काम चिकित्सक नहीं कर सकते| कहा कि पैसे दी जाते हैं तब भी अपेक्षित संख्या में बंध्याकरण या नसबंदी के लिए लोग नहीं पहुंचते| इसके लिए गाँव स्तर पर नुककड़ सभा, नाटक करना अहोगा ताकि लोग जागरुक हों तभी अधिक संख्या में लोग परिवार नियोजन के लिए आयेंगे| मुखिया, पंचायत स्तर के जन प्रतिनिधि, शिक्षक सामाजिक कार्यकर्ता, आशा सभी को नियमित तौर पर जागरुक करने का काम करना होगा| कहा कि बड़े पैमाने पर नियमित जागरूकता अभियान चलाना होगा| तभी अपेक्षित सफलता मिल सकेगी|      

Saturday, 7 January 2017

संकट में जलाशय, बचाने का प्रयास नाकाफी

प्राय: जलाशय हैं अतिक्रमण का शिकार
सरकार, प्रशासन, जनता नहीं है गंभीर
जलाशय संकट में हैं| प्राय: अतिक्रमण के शिकार| गाँव वाले हों या शहर वाले, इसके प्रति गंभीर नहीं हैं| न ही सरकार और न ही प्रशासन ही इसके प्रति गंभीर दिखती है, यह और बात है कि योजनाओं की कमी नहीं है| मनरेगा इस दिशा में महत्वपूर्व काम करने का माध्यम है किन्तु अतिक्रमण के कारण कोइ समस्या मोल लेना नहीं चाहता| नतीजा जलाशयों के उद्धार के लिए कम जिस पैमाने पर किए जाने की आवश्यकता है उस स्तर पर काम नहीं हो रहा है| अनुमंडल की अधिकतर जलाशयों. की वर्त्तमान स्थिति लगभग एक सी है| हिन्दू सनातन धर्म में जलाशयों की पूजा का नियम है किन्तु इससे भी उसकी सफाई, अतिक्रमण पर सकारात्मक प्रभाव नहीं दीखता| गोरडीहाँ में सूर्य मंदिर पोखरा है| ग्रामीण उसी में कचड़ा डालते है| गाँव का यह महत्वपूर्ण जलाशय आज बदबू और बीमारी फ़ैलाने का कारण बन गया है| शमशेरनगर का पोखरा 52 बिगहा से सिमट कर १२ बिगहा का हो गया है तो अरई में पोखरा की ही जमीन पर कई सरकारी कार्यालय भवन बना दिए गए है| जब कि सरकार को इसके विकास का काम करना चाहिए था| अरई-मुसेपुर खैरा के बीच का काफी बड़ा जलाशय अतिक्रमण के कारन सिकुड़ता जा रहा है| इसका पेट और पिंड अतिक्रमण के कारण वजूद बचाने को संघर्ष कर रहा है| दादर का जलाशय सूख गया है जबकि कभी अतीत में यह प्रमुख सूर्य पूजा स्थल रहा होगा| अब ऐसे समाज और परिवेश में जलाशय तो संकट में ही रहेंगे|

10 जलाशयों के उद्धार
 को डीएम से गुहार

 पर्यावरण पर काम कर रहे माखर के रंजन भाई जलाशय पर भी काम करा रहे हैं| जलाशयों का संरक्षण ये आवश्यक मानते है| पहली जनवरी को ही उन्होंने जिला पदाधिकारी को पत्र लीख कर 10 जलाशयों के उद्धार की गुहार लगाई है| कहा कि अनुमंडल के दस जलाशयों को चिन्हित किया गया है| इनकी सूची के साथ पत्र भेजा गया है| कहा कि सिर्फ सरकार या प्रशासन से कुछ नहीं होने वाला है| जब तक जनता नहीं जागरुक होगी तब तक जलाशयों का उद्धार नहीं हो सकेगा| कहा कि नए अलाशयों का निर्माण, पुराने का उद्धार, अतिक्रमित को अतिक्रमण मुक्त बनाने के लिए सरकार को सख्ती से काम कारन अहोगा, अन्यथा आने वाले समय में मानव जीवन के लिए पानी का संकट गंभीर होने वाला है|       

Friday, 6 January 2017

14 हजार पौधों के भाई है रंजन भाई

छ: साल में लगाया हजारों पेड़
पर्यावरण संरक्षण ही है जूनून
पर्यावरण संरक्षण देश की जरुरत है और केंद्र सरकार के साथ हर राज्य सरकार इसे लेकर गंभीर है| वास्तव में यह समस्या वैश्विक है और इससे निपटने का प्रयास भी वैश्विक स्तर पर हो रहा है| इस समस्या के समाधान के लिए गाँव से शहर और महानगर तक होने वाला हर प्रयास काफी महत्वपूर्ण है| यहाँ के मखरा डीह निवासी रंजन भाई का प्रयास काबिले तारीफ़ है| वे गत छ: साल से इस दिशा में काम कर रहे हैं| अब तक 14 हजार विभिन्न प्रकार के पौधे लगा चुके हैं| अकेले दैनिक जागरण के एक करोड़ पौधारोपण अभियान के वक्त ही एक हजार से अधिक पौधा इन्होंने लगाया था| लोग अब उनको पौधों के भाई रंजन भाई पुकारने लगे हैं| बताया कि
पर्यावरण संरक्षण का काम वे 2010 से कर रहे हैं| इधर तीन साल से वे प्राण विद्या पीठ के बैनर ते अधिक सक्रिय हुए हैं| बताया कि उनके इस कम में अरविंद कुमार तिवारी काफी योददान देते हैं| मखरा, दाउदनगर, सिहाड़ी, तुलसी बिगहा, सहित मगध और शाहाबाद क्षेत्र में वे पर्यावरण पर काम कर रहे हैं| बताते हैं कि चन्दा संग्रह नहीं करते बल्कि सामूहिक प्रयास से यह सब कर रहे हैं|

देश के लिए स्वस्थ मनुष्य आवश्यक
पर्यावरण पर काम कर रहे रंजन भाई का कहना है कि देश के लिए स्वस्थ शरीर वाले मनुष्यों की आवश्यकता है जिसका काफी आभाव हो गया है| स्वस्थ मनुष्य परिवार, समाज और राष्ट्र के लिए अहमियत रखता है| पेड़ पौधों जडी बूटियों जैसे प्राकृतिक पदार्थ उपयोगी होते हैं और यह पर्यावरण के बेहतर होने से ही होगा| पर्यावरण बेहतर करने के लिए सबको एक पेड़ लगना ही होगा| कहा कि हम अपने जीवन में विभिन्न जरूरतों को पूरी करने के लिए पेड़ खर्च करते हैं, इसलिए हमें हर हाल में एक पौधा अवश्य लगाना चाहिए|