Thursday, 20 August 2015

राजनीति को प्रभावित करेंगें तांती, पटवा




अनु.जाति बनाने का होगा सत्ता को लाभ
दिखेगा सामाजिक एवं राजनीतिक बदलाव

उपेन्द्र कश्यप, दाउदनगर (औरंगाबाद) नीतीश सरकार ने तांती (तंतवां) को अत्यंत पिछडी जाति की सूची एक क्रमांक 33 से विलोपित कर उसे अनुसूचित जाति का दर्जा राज्य में दे दिया है। इस का तत्काल लाभ इस जाति को मिलने लगा है। दीपक कुमार को इंजीनियरिंग में सौ फीसद स्कालरशीप की वजह से नामांकन हो गया। अन्यथा जब अति पिछडी जाति का रहता तो फीस न दे सकने की वजह से वह शायद इंजीनियरिंग कालेज में दाखिला नहीं ले पाता। यह एक उदाहरण मात्र है। ऐसे कई छात्र-छात्राओंने इसक जातीय दर्जा के बदलाव का लाभ लिया। बहुत ऐसे हैं जिकका भविष्य बेहतर दरवाजे पर दस्तक देने लगा है। शहर में इनकी आबादी करीब पन्द्रह हजार बतायी जाती है। मतदाताओं की संख्या करीब पांच हजार है। यह आबादी एकजुट है, इसकी जतीय पंचायत का सिक्का चलता है। ऐसे में बिहार विधान सभा चुनाव में वह जिस तरफ जायेगा उस तरफ एकतरफा जायेगा, इसकी उम्मीद अतीत को देखते हुए और वर्तमान लाभ के कारण स्पष्ट दिखता है। इस बार यह तबका राजनीतिक उपकार के बदले अपना प्रतिदान दे सकता है। इस तबके के लोगों से बात करने पर ऐसा ही संकेत मिला। जातीय सोपान में सबसे नीचे खडे कर दिये गये इस समाज में काफी बदलाव आयेगा। पहले से ही शिक्षा के क्षेत्र में बेहतर करने वाला यह जमात अब और उंचाइयां छू सकेगा। इस जमात से अनुसूचित जाति की अन्य जमातों को खतरा उत्पन्न हो गया है।
अपने हक के लिए लडेंगे-सन्दीप
सन्दीप तांती ने कहा कि हम अपने हक की लडाई लडेंगे। अन्य जमाते अपने हक की लडाई लडेंगें। हम किसी अन्य जमात को परेशान नहीं करने वाले, न उनकी हकमारी करेंगे। हमारे अन्दर वह क्षमता है। इसी कारण हम बेहतर करते रहे हैं। अब जब सरकार ने सुविधा दिया है तो विद्यार्थियों में जोश और जगा है। नई उर्जा के साथ प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करेंगे।

राजनीति प्रभावित होगी-प्रशांत
तांती समाज के विद्यार्थी चेतना परिषद के अध्य्क्ष प्रशांत कुमार तांती ने कहा कि इस निर्णय से राजनीति प्रभावित होगी। हम जद यू का समर्थन करेंगे। इस सरकार ने हमें वह ताकत दी है जिसकी बदौलत नयी उंचाइयां छू सकेंगे। जो बच्चे अर्थाभाव में पढ नहीं पाते थे वे अब इस दिशा में आगे बढेंगे।


शहर में शोषण होगा बंद- माला
शिक्षिका प्रसादा माला कुमारी का कहना है कि शहर में उनका शोषण बंद होगा। मिट्टी काटने वाले मजदूर वर्ग को ताकत निली है। उनके पास अनिसूचित जाति अत्याचार अधिनियम का अधिकार मिल गया है। अब उनसे पैंसे ऐंठना या बेवकुफ बनाना आसान नहीं होगा। समाज के लोगों को यह ज्ञान हो गया है कि वे ऐसे तत्वों को जवाब दे सकते हैं। जागरुकता आयेगी।

विकास को गति और स्थायित्व मिलेगा-रामेश्वर


बीमा अभिकर्ता रामेश्वर प्रसाद तांती ने कहा कि इस अधिकार से जमात के विकास को गति भी मिलेगी और स्थायित्व भी मिलेगा। राज्य सरकार ने एक बडा और दूरगामी प्रभाव का अधिकार दिया है। इससे समाज का जीवन स्तर उंचा उठेगा। उसे शिक्षा और नौकरी में आरक्षण का काफी लाभ मिलेगा। रोजगार के अवसर बढेंगे। परिवारों में संपन्नता आयेगी।

Tuesday, 11 August 2015

राजनीतिक भागीदारी के लिए वैश्यों की एकजुटता मुश्किल ?

राजनीतिक भागीदारी के लिए वैश्यों की एकजुटता मुश्किल ?

100 से अधिक सीटों पर निर्णायक हैं वैश्य
राजनीतिक जागरुकता और एकजुटता का अभाव
उपेन्द्र कश्यप, दाउदनगर (औरंगाबाद) बिहार बिधान सभा की करीब आधी सीटों पर वैश्य समाज का खासा प्रभाव है। प्राय: हर क्षेत्र में राजनैतिक दलों को चंदा देने वाला यह समाज राजनीतिक भागीदारी के मुद्दे पर पिछडा हुआ है। धन, जन, शिक्षा होने के बावजूद इस पिछडेपन की वजह साफ है कि राजनैतिक जागरुकता का घोर अभाव है और समाज 56 उपजातियों में विभाजित है। इस जाति के वर्तमान विधान सभा में मात्र 12 विधायक हैं। इस संख्या को कम नहीं भी माना जाता अगरचे कि इसमें कोई वोकल होता। उसकी उपस्थिति मीडिया और बडे राजनैतिक आयोजनों में महत्वपूर्ण उपस्थिति होती। इस जमात को एकजुट करने का कार्य प्राय: चुनाव के वक्त जोर पकडता है और फिर बाद में शिथिल हो जाता है रहा है। प्राय: सभी उपजातियों के अपने संगठन हैं। राष्ट्रीय वैश्य महासभा का गठन 1965 में डा.दुखन राम ने इसी उद्देश्य से किया था कि सब अलग अलग अपनी जाति के उत्थान के लिए सक्रिय होते हुए भी एक बनें। इससे राजनीतिक दबाव बनाया जा सकता है। राजद के तेज तर्रार नेता रहे बृजबिहारी प्रसाद की हत्या जब 13 जुलाई 1998 को हुई, तो इस संगठन का अभियान शिथिल पडता रहा। साल 2004 से बीजेन्द्र चौधरी (राष्ट्रीय अध्यक्ष), समीर महासेठ (बिहार अध्यक्ष) पी.के.चौधरी और डा.पेम कुमार गुप्ता ने इसे सक्रिय किया। अब औरंगाबाद में डा.प्रकाशचन्द्रा इस काम को आगे बढाने का प्रयास कर रहे हैं। एक सर्वे के मुताबिक बिहार में 81 सीट ऐसे हैं जहां इस जमात की आबादी 65000 है। कुल 43 सीट पर करीब 50000 और 130 सीट ऐसी है जिस पर 25000 की आबादी इस जमात की है। यानी अपनी रणनीतिक राजनीति की बदौलत अगर यह जमात एकजुट हो तो कम से कम 100 सीटों पर निर्णायक जीत हासिल कर सकता है या किसी को हरा-जीता सकने का मद्दा रखता है। यह अगर नहीं हो रहा तो वजह साफ है कि एकजुटता का अभाव है। जागरुकता नहीं है। नेता वैसा नहीं मिला जो मूखर हो और समाज में राजनीतिक जागरुकता का घोर अभाव है।       


Sunday, 9 August 2015

बिना विधायक का रहा ओबरा विस क्षेत्र

बिना विधायक का रहा ओबरा विस क्षेत्र
फोटो- सोम प्रकाश, ओबरा विस क्षेत्र और प्रमोद सिंह चन्द्रवंशी
न्यायालय के आदेश पर हुई थी सदस्यता रद्द
सोम प्रकाश ने सवालों का नहीं दिया जवाब
उपेन्द्र कश्यप, औरंगाबाद
औरंगाबाद का ओबरा विधान सभा (विस) क्षेत्र करीब डेढ साल से बिना विधायक का है। अक्टूबर 2010 से लेकर उच्च न्यायालय का फैसला आने (25.4.2014) तक  सोम प्रकाश सिंह विधायक रहे। हालांकि जब संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार वे पूर्व विधायक भी नहीं कहे जा सकते हैं। मात्र 803 मत से पराजित जदयू प्रत्याशी प्रमोद सिंह चंद्रवंशी की याचिका पर उच्च न्यायालय ने इनके नामांकन को ही गलत ठहराते हुए निर्वाचन को असंवैधानिक करार दिया और चुनाव आयोग को चुनाव कराने को कहा। फतुहा के दारोगा पद से इस्तीफा देने के तरीके को न्यायालय ने गलत बताया था। साफ कहा था कि इस्तीफे को सही नहीं माना जा सकता। इसके बाद बिहार विधान सभा के अध्यक्ष उदय नारायण चौधरी ने 21 मई 2014 को विधान सभा से उनकी सदस्यता रद्द कर दी। लगा कि चुनाव होगा, तब तक वे सर्वोच्च न्यायालय चले गये। जहां प्रथम सुनवाई 22 मई 2014 को हुई। न्यायालय ने यथास्थिति को बहाल रखते हुए चुनाव कराने पर रोक लगा दिया। नतीजा सोम प्रकाश विधायक नहीं रहे और न्यायालय के आदेश के आलोक में चुनाव भी नहीं हुआ। न्यायालय में सुनवाई की हर तारीख पर लगता कि बस फैसला आया और मध्यावधि चुनाव होना तय है। न मध्यावधि चुनाव हुआ न निर्वाचन आयोग ने कोई वैकल्पिक व्यवस्था की। कहा जाता है कि श्री सोम ने राज्य सरकार और उसके मुखिया नीतीश कुमार से बेहतर संबन्ध बनाने के लिए भाजपा से अलग होने के बाद जदयू सरकार को समर्थन दिया था। इसकी खास वजह चर्चा में थी। याचिकाकर्ता और मात्र 803 मत से पराजित जदयू नेता प्रमोद सिंह चंद्रवंशी का नीतीश कुमार से नजदीकी संबन्ध होना। इससे समाज को सन्देश यही गया कि श्री सोम अब सत्ता के नजदीक हो गये हैं। श्री चंद्रवंशी का कहना है कि न्यायालय में मामले को लंबा खींचने का हर संभव प्रयास किया गया। चुनाव की आहट हो गयी है और अब तक फैसला नहीं आया है। कहा कि श्री सोम चुनाव भी नहीं लद सकते हैं। इस पर जब सोम प्रकाश का पक्ष मैसेज भेज कर मांगा गया तो जबाब नहीं दिया। फोन करने पर रिसिव नहीं किया। उनकी ओर से नंद किशोर सिंह ने कहा कि चुनाव लडना तय है। वह भी अपनी पार्टी से।  



सोमप्रकाश की उपस्थिति यदा कदा दिखी

यदा-कदा ही इलाके में सोम प्रकाश सिंह की उपस्थिति दिखी। विकास के मोर्चे पर कितनी सफलता मिली यह नहीं कहा जा सकता क्योंकि सब के दावे अलग अलग होते हैं। विकास का पैमाना भी स्पष्ट नहीं है। चुनाव जीतते विधायक निधि खत्म हो गयी और जब राजग सरकार सिर्फ जदयू की रह गयी तो उसके बाद कुछ योजनाओं में विधायकों को अधिकार मिला भी तो चंद महीने के भीतर विधायकी चली गयी। उनपर जातिवाद और राजनीतिक लाभ के लिए नौटंकी करने का आरोप है। जैसे स्वजातीय डीलर द्वारा अधिकारी को रिश्वत देने के लिए चंदा वसूल करने का दावा उन्होंने प्रदेश के बाहर के मीडिया से किया। खबर- घुस देने के लिए चंदा कर रहे विधायक जी- प्रकाशित करवाया था। तब भी इस मामले पर वे नहीं बोले थे और इस बार भी जवाब नहीं दे रहे। असहज करने वाले सवालों का जवाब न देने की उनकी आदत सी बन गयी है। 

Wednesday, 5 August 2015

अतीत से
घोषणायें होती हैं, अमल नहीं होता- डा.बी.के.प्रसाद


पुरानी पर्टियों के पास ही हैं एजेंडे
नये दल परिवार या व्यक्ति केन्द्रित
उपेन्द्र कश्यप, दाउदनगर (औरंगाबाद) चुनाव में गत पांच दशक में काफी कुछ बदल गया है। बिहार विधान सभा चुनाव की आहट सुनाई पडने लगी है। 75 वर्षीय सेवानिवृत चिकित्सा पदाधिकारी डा. बी.के.प्रसाद का मानना है कि काफी परिवर्तन हुआ है। नेताओं द्वारा खूब घोषणायें की जाती हैं, किंतु उस पर अमल नहीं किया जाता है। कहा कि पहले पार्टियों के पास एजेंडा हुआ करता था जो अब सिर्फ पुराने दलों के पास बचा हुआ है। नये दल परिवार या व्यक्ति केन्द्रित हैं। कहा कि लोग नेताओं के सभा में कार्यक्रम देखने नेताओं को सुनने खुद उत्साहित होकर जाया करते थे। अब तो भीड भी भाडे पर जुटाई जाती है। जनता खुद सपोर्ट किया करती थी। पहले उतने विकल्प नहीं थे क्योंकि पार्टियां कम थी, अब विकल्प खूब हैं। कहा कि घोषित तमाम योजनाओं का कार्यांवयन प्रखंड स्तर से होता है। इसलिए ब्लाक में अधिकारियों की संख्या बढायी जानी चाहिए। योजनाओं का कार्यांवयन हो रहा है या नहीं इसकी सख्त निगरानी होनी चाहिए। कहा कि अब अधिकारी सुपरविजन नहीं करते हैं। अधिकारी किसी की सुनते नहीं हैं। फंडों का आडिट होते रहना चाहिए। कहा कि जाति और धर्मवाद से बचने का एक ही रास्ता है शिक्षित होना। शिक्षित होने का मतलब एमए. बीए. का सर्टिफिकेट लेना नहीं बल्कि ज्ञान प्राप्त करना है।   

Monday, 4 May 2015

ओबरा के मनौरा में मिली थी महायान मत को भावभूमि

आज 04 मई 2015 को है बुद्ध पूर्णिमा
उपेन्द्र कश्यप

मगध क्षेत्र की भूमि बौद्ध कालीन इतिहास से आवश्यक रूप से संबद्ध रखती है । यह वही भूमि है जिसने बौद्धधर्म की जड़ को जमीन ही नहीं अपितु खाद-पानी भी प्रदान किया तथा इसके महायानमत को भावभूमि प्रदान कर उसे संपूर्ण हिन्दुस्तान से चीन तक विस्तारित एवं प्रतिष्ठापित किया तथापि इस क्षेत्र के कई ऐसे महत्वपूर्ण स्थान इतिहास के पन्नों में स्थान नहीं पा सके जिनकी ऐतिहासिक पृष्टभूमि से बौद्धकालीन इतिहास को नये सफाहात मिल सकते थे । ऐसा ही एक स्थान औरंगाबाद जिलांतर्गत ओबरा प्रखण्ड मुख्यालय से मात्र 6 कि.मी. दूर पूर्व दिशा में पुनपुन नदी के तट पर मरोवां के नाम से विख्यात लेकिन उपेक्षित है, जिसे बुद्ध के जीवनकाल से लेकर ईस्वी सन् के प्रारम्भिक सात शताब्दियों तक के इतिहास से विस्मृत हुए तथ्यों की प्रमाणिकता के लिए अन्वेषण दल की प्रतीक्षा है । यहाँ ध्यानस्थ बुद्ध की छह फीट ऊँची काले पत्थर से निर्मित एक प्रतिमा स्थापित है जो कम-से-कम साढ़े तेरह सौ साल प्राचीन है ।

      यह ऐतिहासिक तथ्य है कि ईस्वी सन् के प्रथम सदी में हिन्दुस्तान पर कुषाणों का शासन प्रारंभ हुआ इसी शासनकाल में अर्थात बुद्ध के पाँच सौ साल बाद ही बौद्ध धर्म में दो मत हीनयान और महायान के रूप में सामने आया । महायान मत में ही- जो कि पूरे हिन्दुस्तान एवं चीन में फैला और इसका श्रेय पहली सदी में जन्में नागार्जून को जाता है- बुद्ध को ईष्वर की मान्यता दी गयी और इनकी साकार रूप में पूजा (उपासना) की जाने लगी । चूंकि बौद्ध धर्म हठवादी नहीं था और अपनी नैतिक पृष्ठभूमि की रक्षा करते हुए किसी भी चीज (सिद्धांत रूप में) से समझौता करना इसकी प्रवृत्ति रही है, फलतः यह धर्म हिन्दुओं के बहुत करीब होता गया आज इस तथ्य का स्पष्ट साक्ष्य मरोवां प्रस्तुत करता है जहाँ कि बुद्ध प्रतिमा की उपासना हिन्दू धर्म नीतियों के अनुसार की जाती रही है ।                  उपेंद्र कश्यप

Friday, 1 May 2015

तय होना चाहिए सामूहिक जिम्मेदारी


-------------------उपेन्द्र कश्यप-------------------------
हरियाणा के मोक में बस में रेप हुआ तो राजनीति गर्मा गई। बस मुख्यमंत्री बादल के परिजनों द्वारा संचालित ट्रांसपोर्ट का है। नेता जी लोग संचालकों के खिलाफ कारर्वाई की मांग कर रहे हैं। अच्छा है।

मेरे मन में कुछ सवाल उठे तो समझा कि आपसे साझा कर लूं। देश के लिए यह ज्वलंत मुद्दा है और मेरी समझ से मेरे सवाल का हल किये बिना ऐसी समस्या से निजात पाना संभव नहीं है।
 सवाल है क्या न्यायालय में ट्रांसपोर्ट मालिक के खिलाफ सजा का फैसला हो सकेगा? वह कितना कसूरवार है? हां यह हो सकता है कि मालिक रसूखदार हो तो उसका मजदूर उग्र हो, लेकिन क्या इस बात की कोई गारंटी ले सकता है कि नौकर मालिक के घर ही छेडखानी या लूट न कर सके? अगर ऐसा कोई नौकर मजदूर करेगा क्या तब भी मालिक के खिलाफ कारर्वाई होनी चाहिए?
क्या यह नहीं होना चाहिए कि सार्वजनिक स्थानों पर होने वाले अपराध के लिए सामूहिक जिम्मेदारी तय की जाये। जैसे जिस बस में अपराध हुआ उसमें सवार सभी ड्राइवर, कंडक्टर और खलासी के साथ सभी सवारियों को एक समान दोषी मान जाये। जब ऐसा होगा तो भीड अपराधी को अपराध करने से रोकेगी। प्राय: रेप पूर्व नियोजित नहीं होते और न ही बलात्कारी सशस्त्र होता है। ऐसा कानून नही6 होने के कारण ही हम यह सोचते हैं कि रेप तो उसका हो रहा है मुझे क्या। मैं क्यों बचाने के चक्कर में पडुं? जब यह भावना खत्म हो जायेगी तब भला कोई समूह अपने सामने किसी दो चार हरामी को बलात्कार तो नहीं ही करने देगा। किसी सार्वजनिक स्थल पर हत्या हो और वहां (अगर) तैनात सुरक्षाकर्मी को भी अपराधी मान अजाये तो फिर अपराध होगा क्या? अधिकतम मामलों में पुलिस खामोश होती क्योंकि उसका हित सधता है उसे नुकसान की आशांक नहीं रहती।


मैं नहीं जानता कि ऐसे कानून कब बनेंगे या नहीं बनेंगे किंतु ऐस अहोगा तो उम्मीद अवश्य है कि सार्वजनिक स्थलों पर अपराध कम से कम या तो नहीं होंगे या फिर यदा-कदा होंगे?

पाक ने बीफ मशाला भेज अपना संस्कार बताया

बीफ मुद्दे को राजनीतिक मुद्दा बनाना क्या गलत है?
-----------------------उपेन्द्र कश्यप-----------------------
नेपाल विश्व का एक मात्र हिंदू राष्ट्र है। हजारों लोगों की जान भूकंप में चली गई। लोग अपना घर, परिवार खो कर जीवन के सबसे गंभीर संकट से जुझ रहे हैं। ऐसे में विश्व के तमाम राष्ट्र सहयोग में उतरे। सभी सहयोग कर रहे हैं। सनातनी भारत इसमें आगे है। बौद्ध धर्मावलंबी चीन, जापान, इसाइयत को मानने वाले अमेरिका समेत कई युरोपीय कंट्री, यहुदी इजरायल सब सहयोग कर रहे हैं। किंतु पाकिस्तान जो जन्मना धर्मान्ध है, उसने इस संकट की घडी में भी खाने के लिए गोमांस भेजा, वह भी सेना के कैंप से पैकिंग कराकर। इसमें अब जांच क्या करेगा वह। यहां गो-हत्या प्रतिबन्धित है, यह सर्वविदित है। नेपाल के संस्कृति मंत्री ने कहा भी कि हमारी संस्कृति के साथ खिलवाड बर्दास्त नहीं होगा। यह मुद्दा इतना ‘अगंभीर’ है कि सभी सेकुलर जमातें खामोशी ओढ लीं। क्या अगर पाकिस्तान को भारत या नेपाल राहत सामग्री में सुअर का मांस खाने को भेजते तो सेकुलर जमातें खामोश रहती? क्या वे बतायेंगे कि यह घिनौनी हरकत है भी या नहीं? इसकी प्रशंसा तो कर ही सकते थे या फिर वे यह कह सकते थे कि- “त्रासदी में आदमी अपना पेशाब भी पी लेता है, कुछ भी खा लेता है तो अगर पाकिस्तान ने बीफ मशाला भेज दिया तो गलत क्या किया? मदद में जो भेज दिया कम थोडे हैं। इसे मुद्दा बनाना राजनीति करना है।“ यकीन जानिये अगर सेकुलर जमातें ऐसा बोलतीं तो उनका वोट बैंक मजबूत होता? वास्तव में जिस अन्ध धर्मान्धता ने पाकिस्तान को जन्म दिया वह उसके जीन में आज भी है। विश्व को यह समझने की जरुरत है कि इस्लामिक देशों के लिए दूसरे धर्म को नेस्तनाबुत करने के अलावा कोई दूसरा धर्म नहीं होता। उसका संस्कार मानवीय नहीं होता। वह इस धर्म को मनता है कि जो मेरे धर्म को कबूल नहीं करता वह काफिर है और काफिरों को जीने का कोई हक नहीं है। देश चाहे कोई भी हो, जहां आतंकवाद चरम पर है, जितने आतंकी हमले हुए उसके पीछे के कारण आप देख लें, लक्ष्य सिर्फ एक ही होता है- “मुझे मानो या धरती छोडो।“ ऐसे अमानवीय संस्कार वालों से विश्व अगर अब भी यह अपेक्षा करता है कि संकट में उसकी ओर से बढे हाथ मानवीय वजह से है, बिना पूर्वाग्रह के है, तो गलत पाकिस्तान या अन्य कोई भी इस्लामिक देश नहीं है बल्कि दोष गैर इस्लामिक देशों का है। जो अब भी कट्टर धर्मान्धों से यह उम्मीद रख रहे हैं कि वे मानवीय बन जायेंगे। 





'बीफ मसाला' पर पाक ने दी सफाई, कहा- बदनाम कर रहा है भारत
Publish Date:Thu, 30 Apr 2015 09:57 AM (IST) | Updated Date:Thu, 30 Apr 2015 07:13 PM (IST)
काठमांडू। भूकंप की त्रासदी से जूझ रहे नेपाल को पाकिस्तान ने राहत सामग्री के तौर पर बीफ मसाला [गोमांस मसाला] के पैकेट भेजे जाने के मामले पर सफाई देते हुए पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता तसनीम असलम ने कहा कि पाकिस्तान ने नेपाल में जो 'रेडी टू ईट' सामग्री भेजी है उसको बनाने में किसी भी प्रकार से गौमांस का प्रयोग नहीं किया गया है। असलम ने कहा कि बीफ मसाला पैकेट की जो बात की जा रही है वो भारतीय मीडिया की देन हैं। हमारा भारतीय मीडिया से आग्रह है कि नेपाल में मानवीय सहायता के प्रयास लिए वो हमें 'बदनाम' न करे।
नेपाल को पाकिस्तान ने राहत सामग्री के तौर पर बीफ मसाला [गोमांस मसाला] भेज दिए हैं। इस पैकेट के हरे रंग के चलते इन्हें कोई हाथ भी नहीं लगा रहा है। नेपाल में हिंदुओं की बहुलता है और वहां पर गौ हत्या व गौमांस पर कड़ा प्रतिबंध है। वहां पर ऐसा करने पर 12 साल कैद की सजा है। इससे पहले वहां पर यह अपराध करने पर फांसी दी जाती थी।
नेपाल के अधिकारियों ने इस बाबत प्रधानमंत्री सुशील कोइराला को जानकारी दे दी है। बताया जा रहा है कि इस मामले की अंदरूनी जांच शुरू कर दी गई है। यदि मामला सही निकला तो इसे कूटनीतिक स्तर पर पाकिस्तान के सामने उठाया जाएगा। भारत को भी जानकारी दी जाएगी। इस घटना के चलते सार्क सदस्य दोनों देशों के रिश्तों में कटुता आ सकती है।

काठमांडू के बीर अस्पताल में राहत कार्य में लगे हुए भारतीय डॉक्टर के हवाले से कहा गया कि अधिकतर स्थानीय लोगों को इस बारे में जानकारी नहीं है। जब उन्हें इस बात का पता चला, तो सभी ने इससे बचने की कोशिश की। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता तसनीम असलम ने कहा कि उन्हें इस बारे में जानकारी नहीं है। राहत सामग्री राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण द्वारा भेजी जाती है।