Thursday, 17 July 2025

खुदाई में मिले 1300 साल पुराने शिवलिंग की कई विशेषताएं

 



एक ही शिवलिंग में ब्रह्मा, विष्णु और महेश की कल्पना साकार 

ग्रेनाइट पत्थर से निर्मित शिवलिंग को किया गया है संरक्षित

उपेंद्र कश्यप, जागरण ● दाउदनगर (औरंगाबाद) : देवकुंड मठ के महंत कन्हैया नंद पुरी ने जब मंदिर का जीर्णोद्धार कार्य प्रारंभ कराया और इसके लिए मंदिर परिसर में खुदाई का काम शुरू हुआ तो एक शिवलिंग निकला। यह घटना 2018 की बताई जाती है। इस शिवलिंग की कई विशेषताएं हैं। इसे पालकालीन बताया जाता है। अर्थात लगभग 1200 से 1300 साल पुराना आया है। प्रतिमा विज्ञान के अनुसार इस शिवलिंग में ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों का मिश्रित साकार रूप है। हेरीटेज सोसाईटी के महानिदेशक डा. अनंताशुतोष द्विवेदी बताते हैं कि इस शिवलिंग का निर्माण अष्टांगुल शैली में है। सबसे नीचे का भाग अष्टकोणीय बना हुआ है। जिसे अरघा में स्थापित किया जाता है। इस शिवलिंग की विशेषता यह है कि जो लिंग आकार में है, जिस पर श्रद्धालु जल डालते हैं, वह रुद्र भाग कहा जाता है। शिव का एक नाम रूद्र भी है। इसके नीचे अष्टकोणीय निर्माण होता है जिसे अरघा (स्त्री भाग) में रखकर स्थापित किया जाता है। क्योंकि यह अष्टकोणीय होता है इसलिए इसे विष्णु भाग कहते हैं। और सबसे नीचे जो शिवलिंग का तीसरा हिस्सा होता है वह चार कोणीय है। इसलिए इसे ब्रह्म पीठ कहते हैं। यानी एक ही शिवलिंग में सबसे नीचे ब्रह्म पीठ, मध्य में विष्णु पीठ और अग्रभाग जो दिखता है वह रूद्र पीठ है। डा. अनंताशुतोष के अनुसार सातवीं आठवीं सदी का यह शिवलिंग हो सकता है। बनावट की कला के आधार पर यह कहा जा रहा है।



ग्रिल से सुरक्षित, होती है पूजा 

मंदिर निर्माण के समय खुदाई के दौरान जब यह शिवलिंग मिला था तो इसका महत्व लोग नहीं समझ पा रहे थे। बस सामान्य शिवलिंग की तरह इसे देखा गया। लेकिन जब पुरातत्व विदों ने इसके पालकालीन होने की बात कही तो इसे संरक्षित करने के लिए मंदिर परिसर में ही स्टील के ग्रिल से इसे सुरक्षित कर दिया गया। स्टील का यह ग्रिल ऐसा निर्मित किया गया कि लोग इसे सहजता से देख सकें। अब श्रद्धालु इसकी पूजा भी करते हैं।



क्षेत्र में पालकालीन शिवलिंग की उपलब्धता 


हेरिटेज का मगध नाम से मगध क्षेत्र के धार्मिक पौराणिक स्थलों पर डाक्यूमेंट्री बनाने वाले धर्मवीर भारती कहते हैं कि देवकुंड ही नहीं बल्कि दाउदनगर अनुमंडल का शहरी क्षेत्र हो या ग्रामीण क्षेत्र, इस क्षेत्र में

पालकालीन शिवलिंग की उपलब्धता खूब है। पौराणिक मंदिरों के अवशेष मगध के इस पश्चिम क्षेत्र में खूब मिलते हैं। देवकुंड के साथ-साथ भृगुरारी, दाउदनगर शहर के कई मंदिर और अरवल का मधुश्रवा इसके उल्लेखनीय प्रमाण हैं।



प्राचीन मूर्तियों पर रहती है चोरों की नजर 

इस क्षेत्र में प्राचीन शिवलिंग विशेष कर पाल कालीन खूब मिलते हैं। यही कारण है कि चोरों की नजर क्षेत्र के शिवालयों और अन्य मंदिरों पर रहती है। इस क्षेत्र में न सिर्फ शिव के बल्कि राम, कृष्ण, जानकी, भगवती की प्रतिमाओं की चोरी की घटनाएं खूब हुई है। दाउदनगर अनुमंडल मुख्यालय से नौ किलोमीटर दूर हसपुरा प्रखंड का एक गांव है सिहाड़ी। यहां अहिल्याबाई होल्कर द्वारा निर्मित शिव मंदिर है। यहां के ठाकुरबाड़ी स्थित राम जानकी दरबार की मूर्तियां कर उठा कर ले गए चोर। मढ़ी धाम से मां भगवती की प्रतिमा की चोरी हुई थी। जिसमें अंतरराज्यीय गिरोह के 12 सदस्य गिरफ्तार हुए थे। बाद में प्रतिमा भी बरामद हुई थी, और तब यह बताया गया था कि चोरी की गई इस प्रतिमा का बाजार मूल्य लगभग 50 लाख रुपये है। डुमरा के ठाकुरबारी से राम जानकी की प्रतिमा चोरी हुई थी। इसलिए इस तरह की महत्वपूर्ण प्रतिमाओं की सुरक्षा की चिंता भी बनी रहती है।


शिवधाम देवकुंड में एक नहीं, हैं कई मन्दिर

 


यहां मुख्य शिवलिंग के अतिरिक्त भी हैं कई देवी देवता

देवकुंड धाम शब्द बताता है गांव नहीं समुदाय का था मंदिर 

उपेंद्र कश्यप, जागरण ● दाउदनगर (औरंगाबाद) :

देवकुंड मंदिर परिसर में आप कभी भी जाएंगे तो कई स्थान ऐसे हैं जहां लोग पूजा करते दिखेंगे। कहीं बिल्व पत्र चढ़ाते हैं, कहीं सिंदूर, रोरी, अक्षत और चंदन चढ़ाते हैं और हवन कुंड भी अलग है। पूरे मंदिर परिसर में एक नहीं बल्कि कई स्थानों पर यहां आए श्रद्धालु पूजा अर्चना करते हैं। मुख्य मंदिर में गर्भ गृह के बाहर भी कई देवी देवताएं हैं, जिनकी पूजा अर्चना की जाती है। मंदिर के प्रवेश द्वार से सटे भी मंदिर है, जहां पूजा अर्चना की जाती है। यह सब यूं ही नहीं है। आमतौर पर एक ही मंदिर परिसर में पूजा के कई स्थान विभिन्न मंदिरों में मिलते हैं। लेकिन यहां एक बड़े परिसर में कई स्थान पूजा के लायक हैं और खुले के साथ-साथ मंदिर भी बने हुए हैं। यह सब यूं ही नहीं है। आमतौर पर देवकुंड मंदिर शब्द का इस्तेमाल किया जाता है लेकिन वास्तव में इसे देवकुंड धाम बोला जाता है। धाम का मतलब ही होता है कि इस परिसर में एक नहीं बल्कि कई शिव मंदिर थे। 



कई काल खंड में हुए हैं निर्माण कार्य

हेरीटेज सोसाईटी के महानिदेशक डा. अनंताशुतोष द्विवेदी बताते हैं कि इसे धाम कहा जाता है। इससे साफ संकेत मिलता है कि परिसर में एक नहीं बल्कि कई शिवालय थे। एक ही शिव मंदिर यहां नहीं रहा होगा। यह गांव का नहीं बल्कि समुदाय का मंदिर परिसर था। जहां एक बड़े क्षेत्र से लोग शिव की आराधना करने आते थे। बताया कि कई काल खंड में यहां निर्माण के काम हुए हैं। आसपास गांव रहे हैं। इस बात का वहां पुरातात्विक साक्ष्य भी मिला है।



शिवलिंग का परीक्षण होना आवश्यक

मंदिर के गर्भ गृह में स्थापित शिवलिंग को नीलम का बताया जाता है, लेकिन जानकारों की मानें तो अरघा प्राचीन है लेकिन यह शिवलिंग प्राचीन नहीं है। महंत कन्हैयानंद पूरी बताते हैं कि जब केदार पुरी इसके महंत थे तब इस बात का परीक्षण शायद हुआ था कि शिवलिंग नीलम का है या नहीं। महत्वपूर्ण है कि केदारपुरी 1974 से 1990 में अपनी हत्या होने तक यहां के महंत थे।



भगवान राम ने किया था शिवलिंग स्थापित

देवकुंड धाम के महंत कन्हैया नंदपुरी बताते हैं कि महर्षि च्यवन का यह आश्रम है। यहां भगवान राम द्वारा शिवलिंग की स्थापना की गई थी। देश के 12 ज्योतिर्लिंगों में देवकुंड का शिवलिंग भले शामिल नहीं है, लेकिन उज्जैन के महाकाल का इसे उप ज्योर्तिलिंग कहा जाता है। कर्मकांडी और इस क्षेत्र के धार्मिक इतिहास के जानकार आचार्य लालमोहन शास्त्री भी मानते हैं कि यहां का शिवलिंग उज्जैन के महाकाल का उप ज्योतिर्लिंग है।


Wednesday, 16 July 2025

3000 साल पूर्व भी रही है देवकुंड क्षेत्र में मानव गतिविधि

 

दैनिक जागरण : 16 जुलाइ 2025

1400 साल पुराना है देवकुंड का मंदिर 

पाल कालीन है मंदिर और यहां का शिवलिंग 

हर्षवर्धन काल में देवकुंड की ओर से बहता था सोन

 उपेंद्र कश्यप, जागरण ● दाउदनगर (औरंगाबाद) :


 अनुमंडल के गोह क्षेत्र में स्थित देवकुंड की प्राचीनता को लेकर चर्चा होते रहती है। हालांकि अभी तक इस संबंध में कहीं भी कुछ भी स्पष्ट लिखित नहीं है। लेकिन यहां मिले शिवलिंग और अन्य साक्ष्य यह बताते हैं कि यह काफी प्राचीन क्षेत्र है। देवकुंड में जून 2018 में मंदिर परिसर से निर्माण के बाद एक शिवलिंग निकला था। यह पाल कालीन शिवलिंग माना जाता है। मंदिर की संरचना भी बताती है कि यह पाल कालीन ही है। और यह भी महत्वपूर्ण है कि हर्षवर्धन के काल में यानी छठी, सातवीं शताब्दी में सोन देवकुंड होते हुए रामपुर चाय होकर प्रवाहित होता था। इससे यह बात स्पष्ट होती है कि छठी सातवीं सदी में ही देवकुंड का मंदिर निर्मित हुआ था। हालांकि यहां देखे गए कुछ मृद भांड इसके 3000 साल प्राचीन होने का भी संकेत देते हैं। यह भी ध्यान देने योग्य है कि पुरातात्विक महत्व के माने जाने वाले टीला पर मंदिर की संरचना है। मतलब यहां आसपास बसावट प्राचीन काल में भी रही है। यहां उत्तरी कृष्ण मार्जित मृदभांड यानी एनबीपीडब्ल्यू भी देखा गया है। जिससे यह संकेत मिलता है कि ईसा पूर्व 1000 से शुरू और ईसा पूर्व में ही द्वितीय सदी तक जो मृदभांड की परंपरा रही है। लगभग 800 साल के उस काल खंड में भी देवकुंड में मानव गतिविधियां होती थी। आसपास इसके कई गांव रहे होंगे। मालूम हो कि पाल काल आठवीं से 12वीं सदी तक विस्तारित रहा है। जबकि हर्षवर्धन का काल 590 से 647 ईस्वी तक रहा है। उन्होंने वर्ष 606 से 647 तक राजपाट संभाला है। बगल में पीरु और इस क्षेत्र से बाणभट्ट के जुड़ाव होने का संकेत भी यही बताते हैं कि लगभग 1400 साल पहले ही देवकुंड में विशाल मंदिर बनाया गया था।



मंदिर की दीवारें बताती है प्राचीनता 



हेरीटेज सोसाईटी के महानिदेशक डा. अनंताशुतोष द्विवेदी बताते हैं कि मंदिर छठी या सातवीं सदी में निर्मित है। इसकी स्थापत्य संरचना से यह स्पष्ट है। मंदिर की दीवारें जितनी मोटी हैं वह इस काल में ही निर्मित होते थे। यहां मिट्टी बर्तन के जो टुकड़े उन्होंने देखे थे उससे भी यह लगता है कि यहां ईसा पूर्व 1000 साल से द्वितीय सदी ईसा पूर्व के बीच मानव गतिविधियों रही हैं।



देवकुंड मंदिर के बगल से गुजरता था सोन



देवकुंड मंदिर सोन के किनारे स्थित था। यह बात छठी सातवीं सदी की है। महत्वपूर्ण है कि सोन अपना पाट परिवर्तन कई बार किया है। मध्य प्रदेश हिंदी ग्रंथ अकादमी द्वारा 1983 में प्रकाशित देव कुमार मिश्रा ने- सोन के पानी का रंग- में लिखा है कि अतीत में दाउदनगर के पास तराड़ गांव के निकट से सोन दक्षिण पूर्व को बहता था। तथा देवकुंड के बिल्कुल बगल से होता हुआ रामपुर चाय और केयाल के सटे आगे बढ़ता था। उन्होंने विवेचना करते हुए लिखा है- में समझता हूं कि केयाल से सोन उत्तर पूरब को लगातार बहते हुए सोनभद्र गांव के पास पुनपुन का वर्तमान पाट धर लेता था 



  


Friday, 16 May 2025

उप मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी से की AIJGF प्रतिनिधि मंडल में मुलाकात

सम्राट चौधरी ने की व्यवसायियों से कई वादे




 ● दाउदनगर (औरंगाबाद) : आल इंडिया ज्वेलर्स एन्ड गोल्डस्मिथ फेडरेशन की ओर से प्रदेश अध्यक्ष अशोक वर्मा के नेतृत्व में एक शिष्टमंडल उप मुख्य मंत्री सम्राट चौधरी से रविवार को पटना स्थित उनके सरकारी आवास पर मुलाकात कर स्वर्णाभूषण व्यवसायियों की समस्याओं से अवगत कराते हुए समाधान की मांग की। उनके साथ कमल नोपनी कैट राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, राष्ट्रीय सचिव डा.रमेश गांधी, कोषाध्यक्ष प्रिंस कुमार, छपरा की पुर्व मेयर राखी गुप्ता, सारण प्रमंडल अध्यक्ष वरुण प्रकाश, शाहाबाद प्रमंडल अध्यक्ष बबल कश्यप, गया अध्यक्ष संजय कुमार, खगड़िया अध्यक्ष शुभम कुमार, औरंगाबाद से उपेन्द्र कश्यप, प्रो.राजेन्द्र सर्राफ, सुनील खत्री, गुंजन खत्री, स्नेह कमल, शुभम कुमार, मनोज सोनी, विनय प्रसाद, मनु कुमार, शत्रुघ्न कुमार शामिल रहे। 


अध्यक्ष ने विशेष आभार रमन सिंह के प्रति व्यक्त किया। दाउदनगर में एक ज्वेलर्स के बाइक से हुई करीब 25 लाख रुपये मूल्य के जेवर की चोरी का मामला भी उनके पास रखा गया। जम्होर थाना द्वारा दाउदनगर से दो व्यवसायी को पकड़ कर ले जाने और उसमें से एक के साथ अन्याय करने,  उससे जबरन बे बुनियाद आरोप की स्वीकारोक्ति बयान लिखवाने के मामले को भी रखा गया। उन्होंने आश्वस्त किया कि ऐसे मुद्दों पर संज्ञान लिया जाएगा। दरअसल पुलिस चोरी के मामले में चोर के कहने पर व्यवसायियों से पहले कुछ नहीं करने का आश्वासन देकर सोना ले लेती है और फिर उसे बारामदगी दिखाते हुए ज्वैलर को जेल भेज देती है। जबकि मुंबई पुलिस ऐसा नहीं करती। क्या दोनों के लिए एक ही देश मे नियम अलग है। 




दाउदनगर में ही एक घटना में मुंबई पुलिस ने चोर द्वारा बताए गए वजन के बराबर सोना बरामद किया और संबंधित व्यवसायी से कागजी प्रक्रिया पूरी कर मुक्त कर दिया। अशोक वर्मा ने ऐसी ही व्यवस्था बिहार में लागू करने की मांग करते हुए इससे संबंधित मुंबई हाई कोर्ट के निर्णय और उसके बाद वहां के डीजीपी द्वारा जारी निर्देश की प्रति सम्राट चौधरी को दी। कहा कि भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 411-412 का सराफा व्यापारियों के विरुद्ध बेवजह गलत इस्तेमाल करने की बात कही। ओस पर एक दिशा निर्देश की मांग की गई। उपमुख्यमंत्री ने आश्वस्त किया कि शीघ्र ही इस मुद्दे पर ज्वेलर्स और डीजीपी के साथ बैठक करायी जा सकती है।





विधान परिषद के सभापति से स्वर्णाभूषण व्यबसायियों ने की बात

 



● दाउदनगर (औरंगाबाद) : व्यापारियों के एक बड़े संगठन कैट और स्वर्णाभूषण व्यवसाय से संबंधित राष्ट्रीय स्तर के संगठन आल इंडिया ज्वेलर्स एंड गोल्ड स्मिथ फेडरेशन (एआईजेजीएफ) बिहार प्रदेश अध्यक्ष अशोक वर्मा के नेतृत्व में व्यवसाईयों ने पटना में बिहार विधान परिषद के सभापति अवधेश नारायण सिंह के आवास पर उनसे मुलाकात की। अपनी समस्याओं को रखा। उन्हें यह भी बताया गया कि व्यावसायिक संगठनों के साथ जिला पदाधिकारी बैठक नहीं करते।


 व्यवसायियों की बात जिला पदाधिकारी नहीं सुनते हैं। ऐसे में एक व्यवस्था बनाई जानी चाहिए कि जिला पदाधिकारी व्यवसायियों के साथ नियमित बैठक करें। उनकी समस्याओं को समझें और उनका समाधान करें। सभापति अवधेश नारायण सिंह ने कहा कि वैश्यों को एकजुट होकर अपनी ताकत बढ़ानी चाहिए। राजनीति में आनी चाहिए। 


राजनीति में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। उन्होंने कहा कि राजनीति से ही आपकी ताकत बढ़ेगी और फिर आपकी समस्याओं का समाधान निकलने लगेगा। रोहतास से बबल कश्यप व सुशील सोनी, औरंगाबाद से उपेंद्र कश्यप, प्रो.राजेन्द्र सर्राफ, सुनील खत्री, गुंजन खत्री, स्नेह कमल, शुभम कुमार, मनोज सोनी, विनय प्रसाद, मनु कुमार, शत्रुघ्न कुमार शामिल रहे।

Sunday, 30 March 2025

अनुमंडल हुआ 34 वर्ष का, लेकिन अभी भी पूर्णता प्राप्त नहीं

 अनुमंडल के 34 वर्ष -05


 



एलआरडीसी, कार्यपालक दंडाधिकारी व पीजीआरओ के पद रिक्त 

भूमि विवाद निवारण के मामले में आ रही है बाधा 

उपेंद्र कश्यप, जागरण ● दाउदनगर (औरंगाबाद) : अनुमंडल गठन के 34 वर्ष हो गए। यह यात्रा छोटी नहीं मानी जा सकती है। इस दौरान कई पीढ़ी जवान हो गई। लेकिन अनुमंडल कार्यालय पूर्णता को प्राप्त नहीं कर सका। विकास एक सतत प्रक्रिया है। यह होता रहता है। लेकिन किसी कार्यालय का स्थापना महत्वपूर्ण है। 34 वर्ष हो जाने के बावजूद अनुमंडल की स्थिति यह है कि यहां भूमि सुधार उप समाहर्ता (एलआरडीसी) का पद लगभग पांच महीने से रिक्त है। ऐसी स्थिति में एलआरडीसी का कोर्ट नहीं हो रहा है। दाखिल खारिज अपील का कार्य नहीं हो रहा। भूमि विवाद निवारण अधिनियम वाले मामले लंबित रह जा रहे हैं। न्यायिक कार्य बाधित हो रहा है। आवश्यक न्यायिक कार्य एसडीओ के जिम्मे है। लोक शिकायत निवारण पदाधिकारी (पीजीआरओ) का पद रिक्त है लगभग एक साल से इस पर स्थापना नहीं हुई। रूटीन कार्य एसडीओ के जिम्मे है। न्यायिक कार्य भी एसडीओ करते हैं। लंबे समय से यहां कार्यपालक दंडाधिकारी का पद रिक्त है। कार्यपालक दंडाधिकारी का रूटीन कार्य अनुमंडल निर्वाचन पदाधिकारी (एसईओ) मनोज कुमार संभाल रहे हैं। कार्यपालक दंडाधिकारी के पास होने वाले दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 107 (बीएनएस 126) और 144 बीएनएस 163) के काम एसईओ मनोज कुमार संभाल रहे हैं।


निर्वाचन कार्य में आ रही बाधा 

यहां पदस्थापित भूमि सुधार उपसमाहर्ता (एलआरडीसी) ओबरा विधानसभा क्षेत्र के ईआरओ भी होते हैं। लेकिन यह काम भी अभी एसडीओ के जिम्मे है। जबकि एसडीओ खुद गोह विधानसभा क्षेत्र के ईआरओ होते हैं।

एसडीओ व एसडीपीओ का आवास नहीं 

34 वर्ष में भी अनुमंडल के सबसे बड़े पदाधिकारी अनुमंडल पदाधिकारी (एसडीओ) और अनुमंडल पुलिस पदाधिकारी (एसडीपीओ) का आवास नहीं बन सका है। एसडीओ अंचल अधिकारी के आधिकारिक आवास में तो एसडीपीओ सिंचाई विभाग के अतिथि गृह में रहते हैं।


जनता को समस्या न हो इसकी कोशिश

एसडीओ मनोज कुमार ने बताया कि पदाधिकारी की कमी के कारण कार्यों के निष्पादन की जिम्मेदारी दूसरे अधिकारियों को दी गई है। जनता के काम में समस्या ना हो, किसी तरह की बाधा उत्पन्न न हो, इसका पूरा ख्याल रखा जाता है।



स्थापना दिवस पर होंगे कई कार्यक्रम


इस बार धूमधाम से अनुमंडल का 34 वां स्थापना दिवस मनाया जाना है। एसडीओ मनोज कुमार ने बताया कि स्थानीय कलाकारों द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम की प्रस्तुति की जाएगी। उसके बाद संध्या में भजन गायिका तृप्ति शाक्या का कार्यक्रम होगा। सबसे पहले रामविलास सिंह की प्रतिमा पर माल्यार्पण होगा। कलाकारों और पत्रकारों को सम्मानित किया जाएगा। जिला पदाधिकारी और पुलिस अधीक्षक समेत तमाम जिला स्तरीय पदाधिकारी भी कार्यक्रम में आमंत्रित है।


‘माड़-भात खायेगें, अनुमण्डल यहीं बनायेगें’ का नारा हुआ बुलन्द

 अनुमंडल के 34 वर्ष -04



‘माड़-भात खायेगें, अनुमण्डल यहीं बनायेगें’ का नारा हुआ बुलन्द


शहरी क्षेत्र वाले चाहते थे नहर के पश्चिम खुले कार्यालय


सामाजिक-राजनीतिक दबाव का द्वंद्व झेल रहे थे मंत्री जी 

उपेंद्र कश्यप, जागरण ● दाउदनगर (औरंगाबाद) : 31 मार्च 1991 को दाउदनगर अनुमंडल गठन की घोषणा परेड ग्राउंड मैदान में होनी है और इसके लिए कार्यक्रम होगा जिसमें लालू यादव जनता को संबोधित करेंगे। इसकी जानकारी लोगों को मिली। शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय (डायट तरार) के एक भवन में अनुमंडल कार्यालय अस्थाई तौर पर शुरू किया जाना है। इधर अनुमंडल कार्यालय कहां खोला जाए, इसे लेकर आंदोलन शुरू हुआ। अनुमण्डल कार्यालय नहर के पूर्व दिशा में भखरुआं बनेगा कि पश्चिम बाजार में। इसे लेकर विवाद शुरू हुआ। शहर वालों ने जब आन्दोलन छेड़ा तो तत्कालीन मंत्री रामबिलास सिंह ने कहा कि जगह का अभाव है। तब डा.राय (ह्वाइट हाउस), शांति निकेतन (पुराना शहर) तथा खुर्शीद खान के मकान दिखाये गये। उधर बारहगांवा का दबाव तत्कालीन मंत्री पर था कि अनुमण्डल भखरूआं ही बने। शहरियों का तब नारा था- ‘माड़-भात खायेगें, अनुमण्डल यहीं बनायेगें।’ देवरारायण यादव की अध्यक्षता में आईबी में बैठक की गयी। इस संवाददाता से बताया था कि तत्कालीन मंत्री श्री सिंह ने कहा- ‘क्या करें? इस उंगली को काटो तो उतना ही दर्द होगा, जितना उसको काटने से।’ यानी वे द्वंद्ध झेल रहे थे। 

इस आंदोलन में शामिल नगर परिषद के पूर्व मुख्य पार्षद परमानंद प्रसाद बताते हैं कि डा. बी के प्रसाद के घर पर बैठक हुई। उनके साथ प्रहलाद पांडेय शामिल हुए और यह विचार बना कि अगर भखरुआं अनुमंडल कार्यालय खुलता है तो बाजार वीरान हो जाएगा। इसके बाद लोगों को गोलबंद करने की सलाह उन्होंने दी। कार्यक्रम से पहले रामविलास सिंह को आना था। नहर पुल पर उनके घेराव की योजना बनी। काफी लोग जुटे। बताया कि अभूतपूर्व शहर बंदी थी। शिव शंकर सिंह (नगर पालिका के अध्यक्ष) के अलावा मनौवर हुसैन, संजय सिंह इस आंदोलन में शामिल हुए। नहरपुल पर श्री सिंह को शहर में आने से रोक दिया गया। सड़क पर कई नेता लेट गए। तत्कालीन मंत्री श्री सिंह ने कहा कि- ई क्या कर रहा है अब तू परमानंद। परमानंद ने कहा कि- शहर वीरान हो जाएगा। देहात में नहीं ले जाइए। इस बीच लोग नारेबाजी करते रहे। किसी ने रोड़ेबाजी शुरू कर दी। मंत्री जी का काफिला वापस लौट गया। इसके बाद वह सिपहां से घूम कर मौला बाग सिंचाई विभाग के आईबी में पहुंचे। वहां शिष्टमंडल मिलने के लिए बुलाया गया। जब शिष्टमंडल से उन्होंने बात की तो लोग शांत हुए और अंततः शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय में अनुमण्डल कार्यालय अस्थाई तौर पर शुरू हुआ। प्रशासनिक इकाई के तौर पर यहां अनुमण्डल कार्य करना शुरू कर दिया। संघर्ष खत्म हो गये। 


 कौन थे रामविलास सिंह 


स्व.राम बिलास सिंह 1967, 1972, 1977, 1985 और 1990 में विधायक बने। वह दाउदनगर हसपुरा और दाऊद नगर ओबरा विधानसभा क्षेत्र से विधायक रहे। तीन बार मंत्री बने। वे समाजवादी नेता रहे। उन्होंने इस संवाददाता से 11 अप्रैल 2009 को बातचीत में बताया था कि अपना पहला चुनाव मात्र 3000 रुपये में लड़े थे और 1990 के चुनाव में मात्र छः से सात हजार रुपये खर्च कर विधायक बने थे।


Saturday, 29 March 2025

1990 के दशक में बना दाउदनगर अनुमंडल संघर्ष समिति

 अनुमंडल के 34 वर्ष -03




रफीगंज और नबीनगर भी अनुमंडल बनने की होड़ में शामिल

गैर सरकारी संकल्प में उठाया था रामबिलास सिंह ने मुद्दा

दिया था आंकड़ों के साथ मजबूत तर्क

उपेन्द्र कश्यप, जागरण ● दाउदनगर (औरंगाबाद) : 1990 के दशक में रामबिलास सिंह की अध्यक्षता में ‘अनुमण्डल संघर्ष समिति’ का गठन किया गया था। उसके बाद इसकी काट में विरोधी जमातों ने भी अपनी अपनी राजनीति शुरु की। रामविलास सिंह ने इस संवाददाता को बताया था कि रफीगंज के लिए सत्येन्द्र नारायण सिन्हा (पूर्व मुख्यमंत्री) के करीबी विधायक डा. विजय सिंह सक्रिय थे तो नबीनगर के लिए विधायक रघुवंश प्रसाद सिंह। ये तीनों कांग्रेसी थे और सत्ता भी इसी पार्टी की थी। इनकी राजनीतिक लौबियां काफी मजबूत थीं। सत्येन्द्र नारायण सिन्हा स्वयं सन 1989 में मार्च से दिसम्बर तक मुख्यमंत्री रहे हैं। लेकिन नवीनगर और रफीगंज दोनों की कुछ कमजोरियां थी। रफीगंज का अनुमण्डल बनना मदनपुर के लोगों को स्वीकार्य नहीं था, भौगोलिक कारण सहित कई कारण थे। नवीनगर मुख्य पथ से जुड़ा हुआ नहीं था। इस कमजोर कडी के बावजूद लेकिन कोशिशें जारी रहीं, मकसद वही था कि इस बहाने किसी एक को अनुमंडल बनाने का अवसर अधिक हो। अपने निधन से पूर्व तत्कालीन मंत्री रामविलास सिंह ने अनुमंडल बनाने की चली राजनीति पर कई घंटे इस संवाददाता से बात किया था। इस वार्ता में बताये तथ्यों एवं घटनाओं के अनुसार तब सदन में प्रत्येक शुक्रवार को ‘गैर सरकारी संकल्प’ लाया जाता था। विधायक रामबिलास सिंह ने सदन में दाउदनगर अनुमण्डल बनाये जाने का प्रस्ताव लाया और आंकड़ों के साथ तर्क दिया। इसी सदन में डा. विजय सिंह एवं रघुवंश सिंह ने क्रमश: रफीगंज एवं नवीनगर को अनुमण्डल बनाये जाने का प्रस्ताव रखा। तब लोकदल से विधायक बने रामबिलास सिंह ने सदन में कहा था- ‘मैं रफीगंज या नवीनगर को अनुमण्डल बनाये जाने का विरोधी नहीं हूं, मैं चाहता हूं कि दाउदनगर अनुमण्डल बने। बेहतर होगा तीनों क्षेत्रों की तुलना की जाये और जो सारी अहर्ता पूरी करता हो उसे अनुमण्डल बना दिया जाये।’ सदन के अध्यक्ष ने व्यवस्था दी की- ‘सरकार विचार करेगी।’ मामला फिर लटक गया। 


सामाजिक न्याय की सरकार बनी तो घोषणा

बिहार में तब सामाजिक परिवर्तन की लड़ाइयां लड़ी जा रही थी। कांग्रेस की सत्ता के विरुद्ध लालू प्रसाद यादव के नेतृत्व में बिहार में सामाजिक समीकरण की राजनीति की जा रही थी। इस बीच वर्ष 1990 में बिहार विधानसभा का चुनाव हुआ और सत्ता का स्वरूप बदल गया। सामाजिक बदलाव का नारा बुलंद करने वाले लालू प्रसाद को मुख्यमंत्री बनाया गया। जातीय, राजनीतिक समीकरण प्रभावित हुए तो स्वभावतः सत्ता का भीतरी चेहरा भी प्रभावित हुआ। सत्ता के गलियारे में नयी जमात का प्रभाव बढ़ना शुरू हुआ। तब सरकार के एक आयुक्त (कोइ श्रीवास्तव-रामविलास बाबु को याद नहीं) ने रामबिलास सिंह को बताया कि अनुमण्डल गठन की बात चल रही है, सूची तैयार है और उसमें दाउदनगर का नाम भी है। फिर वे सक्रिय हुए।


और इस तरह हुई घोषणा

फिर 31 मार्च 1991 को शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय परिसर (परेड ग्राउंड) में मगध प्रमंडल के तत्कालीन आयुक्त ने राज्यपाल द्वारा जारी अधिसूचना माइक पर पढ़कर यह जानकारी दी कि आज से दाउदनगर अनुमंडल का गठन किया जाता है। सभा स्थल पर तालियों की गूंज सुनाई पड़ने लगी। इसके बाद विधिवत उद्घाटन तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद ने किया और बतौर क्षेत्रीय विधायक एवं कारा सहायक पुर्नवास मंत्री रामबिलास सिंह इस समारोह में उपस्थित रहे। अनुमंडल कार्यालय परेड ग्राउंड के पास तरार में  शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय के एक भवन में प्रारंभ हुआ।