Thursday, 5 January 2017

सबके लिए आवास योजना में हुई गडबडी

फोटो-जमीन पर ले-आउट के वक्त लाभुक एवं अन्य
नीयत बिना कैसे सुधरेगी नारी की नियति ?
जमीन की वास्तविक स्थिति को छुपाया
दूसरे की जमीन पर किया गया ले-आउट
सबके लिए आवास योजना के तहत नारी को घर की मालकिन बनाया गया है| इंदिरा आवास योजना में भी ऐसी ही स्थिति है| प्राथमिकता महिला को है ताकि वे सशक्त हो सकें| सवाल उठता है कि योजनाओं के कार्यान्वयन में जब गडबडी होगी, नीयत ही खराब होगी तो नारी का सशक्तीकरण कैसे हो सकेगा?
नगर निकायों में आवास की कोइ योजना नहीं चलाती थी| अब बीते वर्ष शुरू हुई है ‘सबके लिए आवास योजना’ तो इसमे गडबडी सामने आ गयी| मात्र तीन योजना स्वीकृत हुई और एक में धांधली पकडी गयी| नगर पंचायत के वार्ड संख्या-16 में संगीता देवी पति द्वारिक राम के नाम आवास की योजना स्वीकृत हुई| जेई परेश्वर प्रसाद ने बतायी गयी जमीन पर ले-आउट किया| तब अपने समर्थक लाभुक के साथ वार्ड पार्षद सह पूर्व मुख्य पार्षद धर्मेन्द्र कुमार भी उपस्थित रहे| लाभुक को उम्मीद थी कि अब उन्हें दो लाख रूपए मिल जायेंगे| लेकिन इस पर नए साल में पानी फिर गया| जमीन पर जब पीलर गाडा जाने लगा तो वह दूसरे की निकली| सुरेन्द्र कुमार पिता बासदेव राम ने चिन्हित जमीन को अपनी संपत्ति बताया| सूत्रों के अनुसार नगर पंचायत से मौखिक शिकायत की गयी| तब मामला उजागर हुआ| आवेदक ने अपनी जमीन की वास्तविक स्थिति छुपा दी थी| उसमें यहाँ नहीं बताया गया था कि सुरेन्द्र से खरीद की गयी जमीन पर चाहरदीवारी की हुई है| ऐसी जमीन पर योजना अका लाभ नहीं मिलाना अहै सो बगल की जमीन पर ले-आउट करा दिया गया| इस मामले में अब कई तरह की चर्चा की जा रही है|

होगी जांच और कारवाई
कार्यपालक पदाधिकारी विपिन बिहारी सिंह ने कहा कि मामले की जांच कर कारर्वाई की जायेगी| दूसरे की जमीन पर आवास बनाने नहीं दिया जाएगा| आवेदन में गडबडी या योजना के कार्यान्वयन में धांधली नही होने दी जायेगी|
   फंस सकते है कर्मचारी
 इस मामले में नगर पंचायत के कर्मी रामा इंजोर तिवारी ने बताया कि योजना का कार्यान्वयन सही ढंग से नहीं होने पर लाभुक या उनके पैरवीकार कर्मचारी को फंसा देंगे| बताया कि बड़ी गंभीरता से काम करना आपदा रहा है| नियम है कि चाहरदीवारी की हुई जमीन, विवादित जमीन पर योजना अका लाभ नहीं मिलेगा|

क्या है सबके लिए आवास योजना?
बहुत ही आकर्षक है सबके लिए आवास योजना| नगर निकाय या कहे शहरी क्षेत्र में यह पहली बार योजना आयी है| इसके तहत कर्मचारी रामा इंजोर तिवारी के अनुसार चयनित लाभुक को दो लाख रूपए मिलेंगे| दो कमरा के साथ शौचालय और स्नानागार बनाना है| योजना के तहत बने आवास में एक साल तक बिजली व पेयजल सुविधा मुफ्त मिलेगी| यहाँ तक पक्की पहुँच पथ बनाया जाना आवश्य है| क्सेत्रफल न्यूनतम तीस वर्गमीटर होना आवश्यक है|

सतर्कता से करना होगा काम
सबके लिए आवास योजना के लिए सतर्कता से काम करना होगा| नियमत: ले-आउट होने के बाद प्रथम किश्त के रूप में लाभुक को 50 हजार रूपए देना है| इस वक्ट की तस्वीर जीओटैगिंग करना अहै ताकि विभाग की जानकारी में हो| इस तरह के मामले खुलने के बाद अब कर्मी चाहते हैं कि ले-आउट की जगह पैसे पीलर गाड़ने के बाद दिए जाएँ ताकि किसी तरह का भी विवाद हो तो वह सामने आ सके|      


Tuesday, 3 January 2017

आँख से दिखता नहीं पर है सेवा का जूनून

उत्साहवर्धन को उपकरण मिलने की बस अपेक्षा
छ: साल से सहायक का भी खर्च उठाते है खुद
पीएचसी या सरकार नहीं देती सुविधा-संसाधन
डा.विकास मिश्रा निश्शुल्क चिकित्सा सेवा करते हैं| छ: साल पूर्व तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री अश्विनी चौबे ने गोरडीहाँ में उन्हें स्वास्थ्य चेतना यात्रा के दौरान पीएचसी में इलाज करने का मौखिक आदेश दिया था| तब से हर मंगलवार और गुरूवार को वे ऐसा करते हैं| गत वर्ष सिर्फ उन्हें जगह नहीं मिली तो करीब दो महीने तक सेवा नहीं दे सके थे| बीते साल पटना अमे कला संस्कृति मंत्री शिवचंद्र राम ने उन्हें पटना में एक्यूप्रेशर रत्न का पुरस्कार दिया| वे कहते हैं कि सरकार या सरकारी संस्थान कभी उन्हें सहयोग नहीं देता| उनके उत्साहवर्धन क्ले लिए उन्हें उपकरण मिलना चाहिए था| पीएचसी सिर्फ बैठने की जगह देती है| सारा उपकरण इनका होता है| कहते हैं कि इससे वे संतुष्ट नहीं है, यदि और उपकरण होता तो वे अधिक बेहतर इलाज करा सकते है| प्रति सप्ताह वे ४० मरीज देख पते हैं| कहा कि निश्शक्तता पेंशन का 400 रूपए ही मिलता है| अन्य कोइ सुविधा नहीं| बताया कि गुलाम सेठ चौक पर अपे क्लिनिक में भी वे जितने मरीज देखेते हैं उनमे अधिकतर निश्शुल्क ही होते हैं| जबकि वे बमुश्किल तीन हजार रुपय महीना कमा पाते है| इससे ही वे अपनी पत्नी और एक पुत्र का घर चला पाते हैं|

२२ साल की उम्र में हुए थे अंधा
डा.विकास मिश्रा जन्मांध नहीं है| मैट्रिक पासा होने के बाद उन्हें ग्लूकोमा हुआ| इलाज के लिए दर दर भटकते रहे| अर्थाभाव में बेहतर इलाज आन्ही करा सके| नतीजा धीरे धीरे आँख की रौशनी चली गयी और करीब २२ वर्ष की उम्र में वे पूरी तरह अंधा हो गए| पिटा विश्वनाथ मिश्रा कांग्रेस के कार्यकर्ता है जिन्होंने अपनी उम्र का एक बड़ा हिस्सा इंदिरा की प्रतिमा अलगाने में खर्च कर दिया किन्तु तब भी इनके पुत्र के इलाज के लिए कोइ मदद नहीं मिल सका| हद यह कि तब श्यामा सिंह सांसद थीं और वे भी कुछ मदद नहीं की| एक बार केंद्र में स्वास्थ्य मंत्री रहते शत्रुघ्न सिंहा से मिले और उम्मीद जाहिर की किन्तु आँख से जाती रौशनी को बचाया नही जा सका| उन्हें भिक्षाटन करने वाले दिव्यांगो से नफरत है| उन्हें ऐसा करना गन्वारा नहीं|

अंधापन के बाद पढ़ा एक्यूप्रेशर

अंधापन का शिकार होने के बाद इनके सामने दुनिया सिर्फ काली रह गयी| ऐसे में प्रकाश का एक किरण एक्यूप्रेशर चिकित्सा में तलाशा| बिहार एक्यूप्रेशर योग कालेज से इस विषय में डिप्लोमा (डीएटी) व एमडीए का कोर्स किया और अर्थाभाव के बावजूद समाज के बीमार लोगों की सेवा करने का प्राण लिया| यह अनवरत जारी है| 

Monday, 2 January 2017

80 बच्चों को दी जा रही है निःशुल्क शिक्षा

कक्षा 6 से 10 तक के पढ़ते है बच्चे

विज्ञान और व्याकरण की मिलती है शिक्षा
सुदूर देहात में शिक्षा निश्शुल्क दी जा रही है , वह भी उच्च स्तर की। रामानुज साइंस एंड एजुकेशनल ट्रस्ट के बैनर तले संसा में निदेशक लक्ष्मी नारायण का यह प्रयास गत की साल से चल रहा है। अब इसकी एक पहचान स्थापित होते जा रही है। कक्षा 6 से 10 वीं तक के कुल 80 बच्चों को निश्शुल्क शिक्षा का यह लाभ प्राप्त हो रहा है। सभी गरीब होते है, जो स्कूल जा कर पढ़ने में खुद को असमर्थ समझते है। एक छोटे से कमरे में शिक्षा लेने वाले गाँव के बच्चे बड़े उत्साहित दिखाते हैं। उनको गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा मुफ्त जो मिल रही है। बतौर प्रधानाध्यापक श्रीकांत कुमार व्यवस्था में अपना योगदान दे रहे है। दोनों की जुगलबंदी अच्छी है और इसका लाभ बच्चे उठा रहे है। दोनों न बड़े पैसेवाले हैं न ही जमींदार है न किसी अच्छी पगार वाली नौकरी में है। इसके बावजूद वे बच्चों को गणित, विज्ञान, व्याकरण, सामाजिक विज्ञान की शिक्षा दे रहे है। इस व्यवस्था से बच्चों को जो शिक्षा मिल रही है वह सरकारी स्कूलों में तो नहीं ही मिल पाती है। इन्हें कक्षा करने और बारीकियों को समझने के लिए विज्ञान के लैब उपलब्ध है। मौके बेमौके विज्ञान प्रदर्शनी लगाई जाती है, जिसमे बच्चे अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करते हैं। अब इनकी प्रतिष्ठा बढ़ती जा रही है। चर्चा होने लगी है। पूर्व जिला पार्षद राजीव कुमार उर्फ बबलू जैसे लोग उनकी मदद करते हैं और हौसला बढ़ाते हैं।

दंड के पैसे से चलती है व्यवस्था
निश्शुल्क शिक्षा की यह व्यवस्था दंड के पैसे से संचालित होती है। संस्था के निदेशक लक्ष्मी नारायण ने बताया कि बच्चों से जो दंड वसूला जाता है उसी से पूरी व्यवस्था संचालित होती है। स्कूल एक दिन नहीं आबे पर 5 रुपये, होम वर्क नहीं बनाने पर 5 रूपए और स्कूल परिसर को गंदा करने पर 10 रुपए का आर्थिक दंड बच्चों को लगाया जाता है। बताया कि सर्वाधिक दंड की राशि 66 रूपए होती है। इस संस्थान का अर्थ तंत्र और आर्थिक जुगाड़ यही है।



Sunday, 1 January 2017

बड़ा दिल चाहिए साहब फजीहत कबूली में


नई ऊर्जा, स्फूर्ति  के साथ यात्रारम्भ !
365 दिन का साल बीत गया। नए वर्ष का स्वागत है। सब नए वर्ष का स्वागत कर रहे है। जश्न है और जश्न मनाया जा रहा है। किंतु जश्न को सराबोर करने वाले शुरा को मदान्ध राजा ने कब का प्रतिबंधित कर दिया सो भाई लोग सीमा ही पार कर गए। राज्य की सीमा के पार खूब सराबोर हुए भाई लोग। इस चिंता के साथ कि पुनः प्रवेश में समस्या न आये। इसकी भी जुगत बिठा ली गयी। सांस तक की महक बदल  देने का जुगत तो भाई लोग जानते ही है। खूब छक कर सराबोर हुआ गया और जुगाड़ टेक्नोलॉजी से बदबू को भी खुशबूदार बना दिया गया। नया साल का शुभारंभ कुछ मित्रों ने इस जुगाड़ के साथ किया और उम्मीद कि नया साल का हर दिन ऐसी ही मस्ती भरा हो। कुछ मित्रों ने इससे बचते हुए परंपरा को निभाया। मौज मस्ती के साथ साल का आगाज किया गया। एक शानदार आयोजित पार्टी  रात तक चली। पार्क की खुशबू  नथुने को सुकून दे गयी तो पकवानों ने भी जिह्वा को मजा चखाया। इसे नकारात्मक भाव में मुहावरा मत समझियेगा। ठेठ सच भर है यह। हाँ, कुछ ऐसे चहरे भी दिखे जो बिन बुलाये मेहमान बने और जबरन का होस्ट भी। इधर आइये सर, उधर फलां साहब बुला रहे है सर। इसे दलाली का नया रूप नहीं समझिए। संबंधों का बेजा इस्तेमाल भी नहीं समझिए, क्योकि जुगाडु तकनीक में यह अब व्यवहार कुशलता का एक परिचय बन गया है। उचरूंग की तरह जबरन साथ में फोटो खींचाइये और भोली जनता को फोटू दिखा के खुद को पैरवीकार बताइए। यह आइडिया अच्छा है। कुछ लोगो का,  पीड़ितों का काम निकल जाता है। उनका भला हो जाता है। अब इसे कोइ निगेटिव मत के भाई। इन्टॉलरेंस का ज़माना है किंतु कहने का अधिकार सबका सुरक्षित भी है। जो नीची सोच का होता है उसकी भाषा भी वैसी ही होती है और समझ भी वैसी ही होती है। ऊंची सोच वाले गाली नहीं देते, आरोप नहीं मढ़ते, वे पुरस्कार वापस करते है। अभी राजनीति को यह सुट नही कर रहा तो वापसी शब्द शोर में तब्दील नहीं हुआ है। खैर,  टीवी पर एक ज्ञान मिला। सन्दर्भ पाकिस्तान का है किंतु प्रवृति तो सर्वव्यापी ही है। सर्जिकल स्ट्राइक को जब उसने खारिज किया तो कवि अशोक चारण को कहना पड़ा-
डगर में है किस जगह पर डर जाकर नहीं कहता।
मौक़ा पास होता है मगर जाकर नहीं कहता।।
बड़ा दिल चाहिए साहब फजीहत कबूली में।
गुंडा पिट भी गया हो तो घर जाकर नहीं कहता।।

खैर, सब कुछ भूल कर नई ऊर्जा, स्फूर्ति  के साथ नये साल का यात्रारम्भ करिए।
और अंत में हरिवंश राय बच्चन को पढ़िए और समझिए---
जीवन में एक सितारा था, माना वह बेहद प्यारा था
वह डूब गया तो डूब गया, अम्बर के आनन को देखो
कितने इसके तारे टूटे, कितने इसके प्यारे छूटे
जो छूट गए फिर कहाँ मिले, पर बोलो टूटे तारों पर
कब अम्बर शोक मनाता है, जो बीत गई सो बात गई।


Sunday, 18 December 2016

शहरियों फूल बरसाओ हुजूर आये हैं


शहरियों साहेब कहो या हुजूर आये हैं,
महागठबंधन के खेवन-हूर आये हैं।
उनको स्वागत कर प्रभावित करो,
सब मिल के चारण गीत गाओ,
चरण वन्दन और तिलक करो,
कुछ मांग सको तो मांग लो,
कौन ठिकाना हूजूर दे जावें,
फूल बरसाओ हुजूर आये हैं।
जी हां। 21 दिसंबर दिन बुधवार को नवाब दाऊद खान के  बसाये शहर में बिहार के नवाब आ रहे है। ओह, शौरी, जनाब मैं गलत तो नहीं कह गया। नवाब कहना कमतर आंकना नहीं है, वैसे जिनको ऐसा लगता है उन्हें नवाब की जगह बादशाह, समाजवादी सम्राट की तरह राजा, सम्राट, हुजूर कुछ भी अपने मन का पढ़ सकते है, लेखक को आपत्ति नही है। ऐसी छूट तो लोकतंत्र में सबको है। मुझको भी और आपको भी है।
खैर, कहना यह है कि साहेब आ रहे है तो तैयारी जोर से जोरों की हो रही है। सिर्फ फूल स्वागत में भेंट ही नही किए जाएंगे उन्हें, फूल ऐसे लगाए जा रहे है कि वे स्थायी तौर पर नयनाभिराम हो। सबको बेहतरी का अहसास हो। जब आ रहे है तो उनसे कुछ मांगने का भी मन कर रहा है। वैसे दाउदनगर पर उनकी मेहरबानी रही है। सोन पूल अब तक की सबसे बड़ी योजना दी है। एक बड़ी योजना अपने पूर्ववर्ती छोटी योजना से भी बदतर हालत में है। साहेब उसे ही ठीक कर देते तो हुजूर की शान बढ़ जाती। हां, मैं अनुमंडल अस्पताल दाउदनगर की बात कर रहा हूँ। यह अपने निर्धारित आकार में नहीं है। डाक्टर नही है, अन्य सुविधाएं भी नदारद हैं। क्या हुजूर को कोइ यह बतायेगा कि इस अस्पताल के उदघाटन की आपकी ललक को राजनीति ने कैसे ख़त्म किया था। आप उदघाटन नहीं कर सके और आपने जिसे उत्तराधिकारी बनाया वे अधूरा ही उदघाटन कर गए है। जनता तो बेचारी होती है हुजूर, वह बेचारी ही बनी रहे इसमें उत्तर भारत की राजनीति को अपना भविष्य दीखता है। उसकी बेचारगी में नेता और दल अपने लिए उर्वरक पाते हैं। आप तो उसे नहीं हैं न, आप तो अलग दीखते हैं या खुद को भी खुद ही अलग बताते है। तो क्या आपसे इतनी उम्मीद नही बनती कि आप आये है तो सिर्फ फूल आप पर ही बरस कर न मुरझा जाए। उस फूल की खुशबू तो महकने के लिये सदा हेतू छोड़ जाइए। बेहाल, बदहाल जनता स्वस्थ हो सकेगी यदि आप अनुमंडल अस्पताल को महका गए। वरना बेचारी जनता ही जब महकने लायक नहीं रह जायेगी तो सड़ांध मारने लगेंगे उसके विचार। और प्रतिकूल सामूहिक विचार नेताओ के लिए खतरनाक होते है। इतना तो आप समझते ही है। अच्छा होगा, अस्पताल बेहतर कर जाए, अन्यथा अस्वस्थ जनता आने वाले समय में आपको कैसे स्वस्थ रख सकेगी। ऐसा नही होता कि अस्वस्थ लोग मिककर किसी को स्वस्थ रखा सकें या बना सकें। वैसे यह मेरी सलाह है। मानना न मानना आप पर निर्भर है। साहब, हुजूर, आये है तो यह कर जाइये। शायद यह आपको अमरत्व दे जाए। जनता फलक- फावड़ा बिछाये बैठी है।


अंत में, शमशेरनगर पानी टंकी और अदम गोंडवी
तुम्हारी फाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है
मगर ये आंकड़े झूठे हैं ये दावा किताबी है ।।
शमशेरनगर में बंद पानी की टंकी चालू है
यह ज्ञान व्यवहारिक नहीं जनाब किताबी है।।

(यह व्यंग्य कॉलम मैंने राजकोट गुजरात से सोमनाथ जाने के क्रम में बस में लिखा है)

Friday, 16 December 2016

शौचालय बनाने में ग्रामीणों की रूचि नहीं, कैसे बदलेगा भारत?


गरीबी और अशिक्षा के कारण समस्या बढ़ी
 सरकार स्वच्छ भारत अभियान चला आरही है तो राज्य सरकार लोहिया स्वच्छा बिहार मिशन चला रही है| दोनों का मकसद एक है-गाँव हो या शहर उसे स्वच्छ बनाना| घरो में शौचालय निर्माण के लिए सरकारे १२ हजार रूपए उपलब्ध करा रही है| कोशिश है कि सभी घर शौचालय युक्त बन जाय| इस योजना में आकर्षण दीखता है| प्रथम दृष्टया यह प्रतीत होता है कि यह लक्ष्य सहजता से हासिल हो जाएगा किन्तु धरातल पर हकीकत उलटा है| ग्रामीणों की कोइ रूचि इस योजना में नहीं है| मुख्य वजह है उनके पास पैसे का अभाव| हालांकि इसके अलावा अशिक्षा और गरीबी भी एक वजह है| लोग इसके प्रति जागरुक नहीं है और पूर्व में किसी सरकार ने इसके लिए जागरुँकता का फैसलाकुन अभियान नही चलाया, न ही योजना के कार्यान्वयन में दृढ़ता दिखाई| नतीजा आज भी गाँव हो या शहर, खुले मे शौच की समस्या बनी हुई है| जो माहौल गाँवों में है उससे लगता है कि घर घर शौचालय निर्माण के लिए सरकार को और अधिक परिश्रम करने की जरुरत है| प्रखंड के तीन पंचायत अंकोढा, तरारी व करमा अका चयन किया गया है| इन्हें पहले प्राथमिकता के आधार पर शौचालययुक्त पंचायत बनाने का लक्ष्य रखा गया है| दैनिक जागरण ने इस योजना की हकीकत जानने के लिए तरारी के धरातल का सच जानना चाहा|

पैसे नहीं है कैसे बनाए-ग्रामीण
तरारी के वार्ड संख्या-13 निवासी मोती यादव 15 कठा के जोतदार किसान है| मिट्टी का खपरैल घर है| किसानी ही आजीविका का प्रमुख साधन है| शौचालय के मुद्दे पर बोले कि आवश्यक जय किन्तु बनाने को पैसे कहाँ से लाये? कहा कि १२ हजार रूपया है नहीं| वार्ड -११ के निवासी बुधन चौधरी ने शौचालय बनाने के लिए गड्ढा खोद लिया है किन्तु आगे काम के लिए उनके पास पैसे नहीं है| बताया कि मुखिया संगीता देवी के प्रतिनिधि राकेश कुमार से पैसे माँगा रहा हूँ| डेढ़ हजार ईंट चाहिए| बना लेने के बाद पैसा सरकार दे या न दे मुझे तो उधार लिया चुकता करना ही होगा| वार्ड १४ निवासी आशा देवी बताती है कि उन्होंने गड्ढा खोद लिया है किन्तु आगे का काम करने के लिए पैसा नहीं है| गाँवों में समस्या यही है कि पैसे कैसे आयेंगे और अगर कर्ज लिया और सरकार पैसे नही दी तब कर्ज चुकता कैसे करेंगे?


कितना कर्ज दे सकेगा मुखिया-संगीता 
 तरारी की मुखिया संगीता देवी से कई ग्रामीणों ने शौचालय निर्माण के लिए मदद माँगी है| इनका कहना है कि कितने लोगो को एक मुखिया मदद या कर्ज दे सकता है| कहा कि किसी को अपिसा दिया भी तो उसकी वापसी की क्या गारंटी है? कौन देगा पैसा? इसकी व्यवस्था बननी चाहिए| कहा कि पैसे वापसी की गारंटी भी हो तो कितने लोगो को आखिर एक मुखिया कर्ज दे सकता है| कितना पैसा है किसी के पास|

करीब 3800 बनेंगे शौचालय
दाउदनगर प्रखंड के चयनित तीन पंचायतो में करीब 3800 शौचालय बनने है| बीडीओ अशोक प्रसाद के अनुसार करमा पंचायत में १२२० शौचालय, अंकोढा में १२७८ और तरारी में १३०० शौचालय का निर्माण होना प्रस्तावित है| यह संख्या लगभग है और अंतिम नहीं| योजना में पैसा मुद्दा नहीं है| संख्या के हिसाब से पैसे आ सकते है|

Thursday, 15 December 2016

क्या भारतीय रेलवे में सुधार संभव है?

 यात्रा-कथा। बरेली से अहमदाबाद। आला हजरत-अहमदाबाद एक्सप्रेस ट्रेन।

शीर्षक बतौर प्रश्न मुझे उद्द्वेलित कर रहा है। समस्या गंभीर है। सुबह को बरेली में ट्रेन पर बैठा। आला हजरत - अहमदाबाद ट्रेन यहाँ से खुलती है। सही समय पर आने के वावजूद 25 मिनट विलंब से अपने निर्धारित समय से खुली। ट्रेन खुलने पर बोगियों में रौशनी आयी। मोबाइल के टॉर्च जलाकर सबने अपने सीट पकड़े और लैगेज रखने का बंदोबस्त किया। पता चला मेरे और बगल के एक बोगी में पानी नही है। एक tte आये तो लोगो ने उनसे शिकायत की। उन्होंने फोन पर किसी साहब से बात की और बताया कि मुरादाबाद में पानी उपलब्ध हो जाएगा। ऐसा नही हुआ। लोग उम्मीद ही करते रहे। दिल्ली में tte से कहा कोइ फर्क नही पड़ा। काफी देर और दूरी तय करने के बाद एक tte से फिर कहा गया। उसने कहा कि दिल्ली में ही मैसेज किया गया है। जयपुर में पानी मिल जाएगा। जयपुर में दूसरा tte मिला। लोगो ने उसे कहा। उसने कहा कि कहा गया है। शिकायत की गयी है पानी भरा जाएगा। तब तक ट्रेन पटरी से खिसकने लगी। ट्रेन में रेलवे पुलिस के जवान साड़ी वर्दी में जांच कराने आये। इस मुद्दे पर बहस हुई तो कहा कि आईडी देख लीजिए। खैर। जवान ने कहा कि अजमेर में पानी भरा जाएगा। नहीं भरेगा तो चेन पल कर दें। गाड़ी बढ़ने नही देना। अपने पानी भरेगा। खैर, अंतिम बात यह कि पानी नही भरा गया। अजमेर में लड़के ने पाइप लगा कर पानी भरा तो भी पानी नहीं मिला। कहा कि रेल चलेगी तो प्रेशर से पानी आयेगा। पानी न मिलना था न मिला।
आप सोचिए। सुरेश प्रभु जी सोचिए। तीन बोगियों में पानी ख़त्म और मुसाफिर 24 घंटे से अधिक आपकी ट्रेन में बिना पानी के मछली की तरह। लोग क्यों शांत रहे?  यह आप पर या आपकी सरकार पर भरोसा होने या न होने की वजह से नही बल्कि मौसम में नमी ने सबको नर्म बनाये रखा। यदि गर्मी होती तो क्या लोग शांत बैठते? तब सरकार जनता को कोसती। पुलिस प्रशासन कार्रवाई जनता के खिलाफ करता। उसके खिलाफ जो 24 घण्टे की यात्रा में बिना पानी के है। कई बार फरियाद करा रहा है और आश्वासन के सिवा कुछ नहीं।
इसके अलावा कई स्टेशनों पर बिजली भक भक करती दिखी। शौचालय गंदा है। पानी नहीं है का बहाना है किंतु एक पहलू यह भी तो है कि व्यवस्था देने वाले गंदे है, लापरवाह है, आश्वासन परोसते है तो मुसाफिर भला क्या करे? पहले तो व्यवस्था देने वालों को जिम्मेदार होना होगा अन्यथा स्वच्छ भारत फुस्स्स हो जाएगा।