Friday, 16 October 2015

जिन्होंने पहली बार किया मतदान -----

सरकारी रिकार्ड में हो जायेगा नाम !

फोटो- पहली बार मतदान करने वाले वोटर
संवाद सहयोगी, दाउदनगर (औरंगाबाद) यह विडंबना ही है कि पहली बार मतदान कर रही लडकियां इसलिए मतदान कर रही हैं कि उनका नाम सरकारी रिकार्ड में दर्ज हो जायेगा। उन्हें नहीं मालुम कि वे मतदान क्यों कर रही हैं। क्या मकसद है, क्या उम्मीद है। हां आर्य अमर केशरी ने कहा कि निडर होकर और बिना प्रलोभन के उस प्रत्याशी को मत दिया जिससे विकास की उम्मीद है। आदर्श मतदान केन्द्र कादरी मध्य विद्यालय में पहली बार मतदान करने पहुंची शबनम परवीन, सरवरी परवीन, रजिया परवीन और अफसरी खातुन ने कहा कि पहली बार वे मतदान कर रही हैं। जब सवल पुछा कि क्यों, किस मकसद से तो बोलीं कि पापा ने कहा कि सरकारी रिकार्ड में नाम दर्ज हो जायेगा, इसलिए वोट कर रही हैं। यह भी कहा कि कोई मना कर देगा तो वोट नहीं देंगे। यह राजनीतिक अपरिपक्वता ही दर्शाता है। जैसे-जैसे मतदान देने का अनुभव बढेगा वैसे वैसे उम्मीद की जा सकती है कि राजनीतिक परिपक्वता भी आ जायेगी। पहली बार वोट दे रहे पटना विश्व विद्यालय के छात्र नेता अवकाश कुमार ने कहा कि बहुत अच्छा लगा। उत्साहित हूं। ऐसे प्रत्याशी को ओबरा से जीताने की कोशिश है जो छात्रों का विकास कर सके, स्वच्छ छवि का हो।


वोट के लिए किया कई ने प्रेरित
दाउदनगर (औरंगाबाद) इस बार चुनाव में वोट के लिए कई युवाओं ने दूसरों को प्रेरित करने वास्ते सोशल मीडिया का भरपुर इस्तेमाल किया। बिना किसी दल विशेष या प्रत्याशी विशेष का नाम लिए ही कहा गया कि मै6ने तो अपना वोट दिया, क्या आपने अपने अधिकार का इस्तेमाल किया? चन्द्रशेखर गुप्ता ने ऐसा सवाल पूछा और अपनी सेल्फी प्रसारित किया। सोनु चौरसिया ने कहा कि अगर आपने अपन अवोट नहीं दिया है तो अभी जाकर दे आइये। साइबर कैफे संचालक अरुण कुमार कह अकि वोट डालना आपका अधिकार है। मुकेश मिश्रा, शंकर गुप्ता, कौशल पांडे, धीरेन्द्र कश्यप उर्फ मंटु, मो.मंसुर जसे युवाओं ने अपनी सेल्फी के साथ लोगों को शब्दों से प्रेरित किया कि वे लोकतंत्र के इस महापर्व में शामिल अवश्य हों।     



धर्म नहीं किंतु जातीय कट्टरता बहुत है- डा.रामपरीखा यादव

विकसित न होने में हम भी भागीदार-निर्मला गुप्ता

फोटो-  डा.यादव एवं निर्मला गुप्ता


उपेन्द्र कश्यप, दाउदनगर (औरंगाबाद) लोकतंत्र का महापर्व संपन्न हो गया। नेताओं ने खुब भाषण पिलाया, जाति के नाम ले-ले कर विचार दिये गये। विकास की चर्चा तक हुई। धरातल पर इसका फर्क पडा। जनता ने अपना फैसला सुना दिया। दो बुजुर्गों के दो विचार महत्वपूर्ण हैं। मई 1925 में जन्मे स्वतंत्रता सेनानी डा.राम परीखा यादव ने मतदान बाद कहा कि हम धर्म के मामले में कट्टर तो नहीं है किंतु जाति के मामले में हम फ्री नहीं हो सके हैं। इस मामले में बिहारी समाज कट्टर है। कहा कि बिहार में बदलाव हो रहा है। लोग वोट की कीमत समझने लगे हैं। मतदान के लिए उत्सुकता बढी है। कन्या मिडिल स्कूल से सेवानिवृत प्रधान अध्यापिका निर्मला गुप्ता का कहना है कि बिहार में विकास न होने में हम सभी सहभागी हैं। कहा कि दूसरे प्रांत में व्यक्ति जब घर बनाता है तो तीन –तीन फीट जमीन अपनी छोडता है जब कि बिहार में सरकार की ही जमीन कब्जा करने की होड रहती है। वोट यह सोच कर नहीं करता कि मुद्दा क्या है। हम इसीलिए पिछडे हैं। इसमें हमारी भागीदारी भी है। स्वयं को सुधारने की आवश्यक्ता है। इनका कहना है कि केन्द्र की सरकार काम अच्छा कर रही है किंतु एक दिन में कुछ नहीं हो सकता है। कहा कि अब राज्य में किसकी सरकार बनती है यह देखना होगा।    

... और दुबारा बुलाया वोट डालने को
फोटो-रामकुमार शर्मा
 ऐसा प्राय: होता नहीं है। अनुमंडल के गोह विधान सभा क्षेत्र में राजकीय मध्य विद्यालय दादर स्थित बूथ संख्या 205 पर मतदान 7.35 पर प्रारंभ हो सका। ग्रामीण वेंकटेश शर्मा ने बताया कि ईवीएम चालु करने में विलंब होने के कारण ऐसा रहा। अहले सुबह इसी विद्यालय से सेवानिवृत शिक्षक राम कुमार शर्मा तैयार हो कर कतारबद्ध हो गये। सबसे पहले जब वोट देने की बारी आयी तब ईवीएम मशीन ने काम करना प्रारंभ ही नहीं किया। निराश इस बुजुर्ग को घर वापस लौट जाना पडा। जब ईवीएम ने काम करना प्रारंभ किया तो उन्हें दुबारा सूचना भेज कर बुलाया गया और मतदान करने का अवसर दिया गया। यहां कुल 1642 मतदाता हैं।


Wednesday, 14 October 2015

मुद्दा विकास नहीं जाति और शांति

 मतों के ध्रुवीकरण का केन्द्र “उपरवाला”

चुनावी शोर आगत क्रांति के पूर्व के सन्नाटे में तब्दील हो गया है। 16 अक्टूबर को जो बैलेट क्रांति होनी है, उसके पूर्व अब सामाजिक और जातीय समीकरण के विश्लेषण की मानसिक कसरत शुरु हो गयी है। सबने खूब प्रचार किया। अपनी अपनी बातें रखीं। इसमें मुख्य चुनावी मुद्दा क्या है? तलाश करना पड रहा है तो स्पष्ट है कि मुद्दा भटक गया है। बात मतों के बिखराव और ध्रुवीकरण पर टिक गयी है। इस चुनाव में मुद्दा विकास कभी नहीं बन सका। यहां चर्चा सिर्फ जाति और जातीय समूह की होती रही। परिणाम जाति ही तय करेगी। स्वजातीय और दल के कापी राईट मान लिए गये जातीय समूह का वोट पैटर्न क्या होता है, चर्चा अब सिर्फ इसी की हो रही है। ध्रुवीकरण के लिए जिस जाति या समूह को अपनी अब तक की निष्ठा बदलनी पड सकती है वे “उपरवाले” का बहाना बना रहे हैं। कह रहे हैं- हमें उपर देखना है। दो प्रमुख प्रत्याशी के आधार परंपरागत वोटर उपरवाले के फेर में कितना ध्रुवीकृत हो पाते हैं, यह मतदान का पैटर्न तय करेगा। यदि “उपरवाले” को न मानते हुए स्थानीय कारणों से अपनी निष्ठा अब तक जिसके साथ रही है उसी के साथ रह गयी तो परिणाम 1995 या 2010 की तरह का चौंकाने वाला हो सकता है। मतदान का पैटर्न तो मतदान के दिन भी बदल जाता है। अभी (संवाद लेखन तक) तो फिर भी 36 घंटे का समय बचा हुआ है। भीड अगर मानस को तैयार करती है और मतदान में बदलती है तो परिणाम भी अप्रत्याशित हो सकते हैं।

मैनेजमेंट बनाम मैनेजमेंट

 इस चुनाव में तीन प्रत्याशियों को छोड कर अन्य सभी नये हैं। छोटे स्तर पर चुनाव लड चुके दो प्रत्याशी हैं, जो विधान सभा का चुनाव पहली बार लड रहे हैं। अन्य सभी का यह प्रथम चुनाव है। इस चुनाव में मैनेजमेंट की चर्चा खूब हो रही है। जो परंपरागत वोटर एक प्रत्याशी विशेष के हैं, उनका साफ मानना है कि यदि पराजय मिलेगी तो सिर्फ मैनेजमेंट और प्रत्याशी के मुट्ठी बान्ध लेने के कारण ही। दूसरी तरफ एक प्रत्याशी के मैनेजमेंट की चर्चा खूब हो रही है। कहा जा रहा है कि इस मैनेजमेंट को मानना पडेगा। परिणाम चाहे जो भी हो। इस पक्ष ने नारा दिया है- टिकट के पैसा पानी में, ---- भैया राजधानी में।  

शोर थमा तो भीड के आकलन में जुटे मतदाता


चुनाव प्रचार के आखिरी दिन दिखायी ताकत
ओबरा विधान सभा क्षेत्र का नक्शा

मतदाताओं के पास पहुंचने की अंतिम कोशिश शुरु

       उपेन्द्र कश्यप
 बुधवार को चुनाव प्रचार का शोर थम गया। सभी प्रमुख प्रत्याशियों ने अपनी ताकत का प्रदर्शन वाहनों और भीड के माध्यम से किया। अब शांति मिल गयी है। शहर दिन भर अखाडा बना रहा, प्रत्याशियों की जोर आजमाइश का। किसी ने चार पहियों का लंबा काफिला निकाला तो अधिकतर ने बाईक जुलूस। एक से एक वाहन दिखे। अब चर्चा इस बात पर हो रही है कि किसके काफिले में किस किस जाति के कहां कहां के लोग थे। वाहनों में झांकने की कोशिश मतदाताओं ने की। यह कोशिश हुई कि भीड के खास चेहरे को पहचाना जा सके। इससे अनुमान लगाने की सुविधा मिल जायेगी कि किस प्रत्याशी या गठबन्धन के साथ किस जाति के कहां कहां के मतदाता हैं। शक यह भी कि कहीं भीड का एक बडा हिस्सा दूसरे क्षेत्र का तो नहीं? इससे वोटरों को अपना मानस बनाने में सहुलियत हो सकेगी। शहर में दो दलों या प्रत्याशियों की भीड से बने माहौल पर लोग बाग चर्चा कर रहे हैं कि किसकी ताकत अधिक दिखी। निर्धारित समय तक शहर में कई दलों ने अपनी ताकत दिखाया। अब मतदाता आकलन में जुट गये हैं कि किसके साथ कितनी जनता है। जो जिसके साथ अब तक रहा इसकी कोई गारंटी नहीं कि 16 अक्टूबर को भी वह उसी के पाले में मतदान करे। चर्चा इस पर भी हो रही है। मतदाताओं तक प्रत्याशियों के शोर सराबे के साथ हुजूम लेकर पहुंचने का वक्त खत्म हो गया है। अब वे शांति से मतदाताओं के पास व्यक्तिगत तौर पर पहुंचने की कोशिश में हैं।


ओबरा में जाति बनाम जाति की लडाई


बिखराव रोकने की है सबको चुनौती


उपेन्द्र कश्यप
औरंगाबाद के ओबरा विधान सभा क्षेत्र में राजनीतिक चर्चाओं में बतौर मुद्दा विकास खोजने से भी नहीं मिलता। जहां कहीं भी चर्चा है तो बस जातीय समीकरण की। कौन जाति किसके साथ है? किसका कितना प्रतिशत किसके साथ है? कौन कितना किसका वोट काट सकेगा? किसके कितना वोट काट लेने से किस प्रत्याशी की स्थिति कैसी होगी? राजनीतिक चर्चा का केन्द्र विन्दु यही है। कहीं भी किसने कितना विकास किया, यह चर्चा का विषय है ही नहीं। सीधी लडाई जाति बनाम जाति की बन गयी है। मुख्य प्रतिद्वन्धियों के बीच सबसे बडी चुनौती यही है कि अपने समीकरण के मतदाताओं को कौन कितना बिखरने से रोक सकता है। बिखराव दोनों प्रमुख गठबन्धनों की कमजोरी बन गयी है। संभव है कि अंतत: बिखराव न हो और ध्रुवीकरण की लहर चल पडे, किंतु फिलहाल बिखराव की आशंका दोनों खेमों को बेचैन किये हुए है। महागठबन्धन प्रत्याशी बीरेन्द्र सिन्हा के खिलाफ बिखराव पूर्व विधायक सोम प्रकाश और सपा प्रत्याशी डा.निलम के पाले में जमा हो सकता है। यदि 2010 के चुनाव परिणाम को देखें तो इन दोनों प्रत्याशियों को हल्के में नहीं लिया जा सकता। तब निर्दलीय सोम प्रकाश को हल्का इस कारण लिया गया था कि लालु यादव का आधार वोटर राजद के साथ माना गया था। किंतु चुनाव में लालु को छोड कर सोम प्रकाश के पाले में वह मतदाता चले गये। इस बार तीनों एक ही जाति के हैं और इनका आधार वोट भी लगभग एक ही है। तीनों की नजर इस वोत पर है। मतदाता क्या निर्णय लेते हैं, यह अभी नहीं कहा जा सकता है। इसी तरह एनडीए प्रत्याशी चंद्रभुषण वर्मा के खिलाफ बिखराव भाकपा माले के राजाराम सिंह, और समरस समाज पार्टी के राजीव कुमार उर्फ बबलु के पाले में जा सकता है। तीनों स्वजातीय हैं। इनके खिलाफ बिखराव का विस्तार राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी से अभिमन्यु शर्मा और निर्दलीय ऋचा सिंह के पाले तक पहुंच कर जमा हो सकता है। ऐसी चर्चा है। अन्य कई ऐसे प्रत्याशी हैं जो चर्चा में नहीं हैं किंतु अधिक नुकसान एनडीए को ही पहुंचा सकते हैं। फिलहाल चर्चा है और उसी का बाजार गर्म है।   

Monday, 12 October 2015

पहाडी पर पहाडी की नरबली !

उमगा की शोध-यात्रा और व्यंग्य की मस्ती


                     (ध्यातव्य- कट्टर धर्मभिरु इसे न पढें)
                               उपेन्द्र कश्यप
05.10.15 दिन सोमवार। हम उमगा की यात्रा पर गये। उमगा, औरंगाबाद के मदनपुर का एक महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल। मैं (लेखक), स्त्रीकाल के संपादक संजीव चंदन भाई, दक्षिण बिहार केन्द्रीय विश्व विद्यालय के सहायक प्राध्यापक मित्र डा.कर्मानंद आर्य, जी न्युज के डीएनए की परिश्रमी पत्रकार इति शरण और फिल्म निर्देशक डाक्युमेंट्री बना रहे धर्मवीर भारती समेत अन्य मित्र साथ हैं। पहाड की जब उंचाई चढ रहे थे तो मस्तिष्क कुछ तलाश करता रहा, सो व्यस्त रहा। बौद्धिक सवाल-जवाब, और उतने ही रहस्य, तर्क-वितर्क और बस दिमाग खोजने में, जानने में और कुछ सीखने में सबका लगा रहा। इस बीच यदा कदा हंसी-मजाक भी। मजा तब से प्रारभ हुआ जब उंचाई पर चढ जाने के बाद सब हल्का हुए और मन मिजाज को सुकून मिला। घर की बनी निमकी और बाजार का सेव (झरुआं) खा कर गप्पें लडाने से मन-मस्तिष्क को शांति मिली। चर्चा इधर उधर की होने लगी। जब ढलान पकड उतरने लगे तो चर्चा यूं ------------------
यहां नर बली की परंपरा रही है। इसके ध्वस्त अवशेष प्रमाण देते हैं। चर्चा शुरु। जब उतरना प्रारंभ हुआ तो डरने और फिर कुछ अनिष्ट हो जाने पर मजाक केन्द्रित हुआ। दादरी की हत्या कांड से लेकर अन्य नकारात्मक बातें। भाई संजीव ने कहा- इति की ही नरबली आसान होगी? अकेली भी है और अबला भी। वह बोलने लगी - मैं तो माता हूं। माता की नरबली की प्रथा नहीं रही है। तब संजीव ने कहा- हां, यह तो बात है। नारी की बली देने की भारतीय परंपरा ब्राहमणों ने नहीं बनाया है। लो तुम तो बच गयी। कहा गया- अच्छा होगा संजीव चन्दन की बली। वे बोले ब्राहमणों ने ब्राह्मण की बली को त्याज्य माना है। मेरी भी बली नहीं हो सकती। तब बात आयी- डा.करमानंद कर्मा की। कहा गया कि उनकी बली अच्छी रहेगी। चन्दन जी ने कहा- उपेन्द्र खबर की हेडिंग अच्छा बनाता है। “मन-रे-गा विरह के गीत धीरे-धीरे” जैसा। तब शीर्षक बनेगा- एक पहाडी की पहाड पर हुई मौत, किंतु 1300 किलोमीटर दूर। जी हां, आर्य लखनउ से आते हैं। पता करने की कोशिश की गयी कि कौन सा पहाड इतना लंबा है।

जब पत्रकार ही पत्रकार हों तो चर्चा भी खबरों के इर्द-गिर्द ही केन्द्रित हो जाती है। दूसरों को इसमें मजा नहीं आता। हां, हंसा देने वाले चुटीले कमेंट सबको हंसा जरुर देते हैं। यात्रा क्रम में एक दिलचस्प वाकया हुआ। मां उमेंगेश्वरी के मन्दिर में पत्थर के नीचे

(देखें चित्र) जब पंडा से यह पुछा कि जब कपडे उठा कर प्रतिमा को दिखा रहे हैं तो कपडे से ढंकने की अवाश्यक्ता ही क्या है। महत्वपूर्ण है कि यह प्रतिमा नग्न नहीं बनी हुई है। तर्क मिला सुन्दरता के लिए। सवाल दागा तो धर्मवीर भारती ने इशारा चुप रहने का किया। हकीकत है कि धर्म बिना तर्क के ही टिकता है। इसीलिए कवि अनिल बिभाकर ने अपनी कविता में कहा था- लोग पत्थर नहीं, अपनी-अपनी आस्था पूजते हैं। यहां भी वही है। एक चर्चा “उमगा” नाम करण पर भी हुई। संजीव भाई ने इसे तोडा- उम-गा। ग प्रत्यय है। इसका अर्थ होता है –गमन। यानी उमा से जहां गमन हुआ उसे उमगा कहा गया। हर तरह सैकडों शिव लिंग भग के साथ बने हैं। अधूरे बने हुए छोड दिये गये हैं। इससे इस अर्थ को भी बल मिलता है। इसे मानें न मानें आपकी मर्जी। यह मात्र एक तर्क भर है। इसकी चर्चा के बीच सहवास के छोड दिये गये चिन्ह जब दिखे तो उस पर भी चर्चा हुई।

 हां, ध्यान रहे, इस पहाड पर सूखी किंतु पानी में डाल देने पर हरी हो जाने वाला पौधा भी मिला जिसे हम संजीवनी बुटी आम तौर पर कह देते हैं। यह सेक्स की क्षमता बढाने वाला बुटी माना जाता है। 


उमगा में लिखा हुआ मिला अल्लाह और आयत

मुख्य सूर्य मन्दिर के सभा मंडप में तीन स्थानों पर अल्लाह और एक स्थान पर कुरआन की आयत लिखी हुई मिली। सवाल यह है कि उमगा पहाडी पर सूर्य मन्दिर में यह कब, कैसे और क्यों लिख दिया गया? किसने लिखा? जब मुस्लिम आक्रांताओं ने मन्दिर ध्वस्त किया और मन्दिर में ऐसे लिखा, तो कब्जा क्यों नहीं किया? क्या कोई समझौता हिन्दु-मुस्लिम के बीच हुआ? जब भारत में मन्दिर तोडे जा रहे थे तब भी यहां मन्दिर निर्माण का काम शायद चल रहा था? ऐसा हुआ भी तो फिर ब्राहम्णों ने इसे यथावत कैसे और क्यों रहने दिया? मुगल काल में मुस्लिम का डर हो सकता है, किंतु अंग्रेज काल में किसका डर रहा होगा? या यूं ही लिखा हुआ छूट गया या जान बुझ कर छोडा गया? क्या ब्राहमण यह सन्देश दे रहे हैं कि किसी ने गलती की तो मैं क्यों गलती करूं? उसकी ताकत थी,  उसने आक्रमण किया,  कुछ भी लिखा तो यह इतिहास है और उसे ध्वस्त न कर मिशाल कायम किया गया। यदि ऐसा है तो इसका प्रचार क्यों नहीं किया गया। इससे सांप्रदायिक सोच को नया आयाम दे सकते थे। सौहार्द की नयी मिशाल इसे बना सकते थे। क्या वास्तव में मनु स्मृति लिखने मानने वाला ब्राहमण धर्म इतना उदार रहा है कि वह इसे यूं ही छोड दिया? सवाल मन को मथ रहा है, जवाब ढुंढ रहा हूं मिल नहीं रहा है। 

और अंत में---

सुखद, रोमांचक और ज्ञानवर्धक यह यात्रा कुछ खास करने को प्रेरित करते हुए यादगार बन गयी है। बात निकली है तो दूर तक जायेगी ऐसी अपेक्षा खुद से है। 


सोमवार, अक्तूबर 12, 2015
उपेन्द्र कश्यप 

(आज बिहार विधान सभा के लिए चुनाव का प्रथम चरण शुरू हुआ है. इस अवसर 2001 में मारी गई महिला मुखिया की कहानी बता रहे हैं युवा पत्रकार उपेन्द्र कश्यप. यह कहानी महिलाओं की  राजनीतिक भागीदारी के  खिलाफ पितृसत्तात्मक समाज के द्वारा पैदा की जाने वाले बाधाओं की है , उसकी घबराहट की भी है कि सत्ता में यह भागीदारी उसके अभेद्य किले को ध्वस्त कर देगी. यह कहानी महिला मुखिया के संघर्ष के साथ -साथ सत्ता पर हाशिये के लोगों की दावेदारी की भी बानगी है.  )

चन्दन की उम्र अब करीब 23 साल हो गयी है। उस दिन की याद अब भी उसे रुला देती है,  जब उसकी मां 'चिंता देवी' की रणबीर सेना के कथित समर्थकों ने 16 मई 2001 को गोली मार कर हत्या कर दी थी। यह हत्या की मात्र एक घटना भर नहीं थी। इसके पीछे के विचार महत्वपूर्ण है। यह अब तक की एकलौती घटना इस मामले में है कि वह बिहार की पहली ऐसी महिला थीं, जो मुखिया बनने की औपचारिक घोषणा सुनने जा रही थी, और उनकी हत्या सामंती सोच के कारण भूपतियों ने कर दी थी। पिछडी जाति (कुर्मी) की 'चिंता देवी' अपने घर ओबरा के चंदा गांव से सज धज कर पूर्वाहन को औरंगाबाद जिला समाहरणालय जा रही थीं । गांव से कुछ ही दूरी पर बधार में हत्यारों ने गोलियों से उन्हें भून  दिया। इन्हें सही अनुमान था कि भूमिहार जाति के पिसाय निवासी सत्येन्द्र पांडेय की पत्नी प्रतिमा देवी का चुनाव हारना तय है। हुआ भी ऐसा ही, किंतु जीत की खबर सुनने से पहले ही चिंता की हत्या कर दी गयी। तब बिहार में त्रीस्तरीय पंचायत चुनाव में महिलाओं के लिए आरक्षण लागू नहीं था। यह व्यव्स्था एनडीए के सत्ता में आने के बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 2006 के पंचायत चुनाव से लागू की थी - देश में पहली  बार किसी राज्य में स्थानीय इकाइयों में महिलाओं को आरक्षण मिला. इसके पहले बिहार में किसी महिला का मुखिया प्रत्याशी होना आश्चर्य हुआ करता था।

चन्दन को आज भी यह खटकता है कि उसके पंचायत की मुखिया उसकी मां शपथ ग्रहण तक नहीं कर सकी और पिता राम चंद्र सिंह उप चुनाव में मुखिया बनने के बाद 2006 के चुनाव में हार गये और फिर उनकी भी हत्या कर दी गयी। हालांकि इस बात का उसे ही नहीं तमाम पिछडा, अति पिछडा, दलित और महादलितवाद की राजनीति करने वालों को संतोष भी है कि इस पंचायत से कभी सवर्ण मुखिया नहीं बन सका। चिंता की हत्या विशुद्ध तौर पर अगडे बनाम पिछडे की लडाई का परिणाम थी। भूमिहार नहीं चाहते कि इस पंचायत का मुखिया पिछडा बनें और पिछडे नहीं चाहते कि सवर्ण बने। चिंता की हत्या के बाद इस संवाददाता से रामचन्द्र ने तब साफ कहा था कि मेरे जीते जी भूपति अपनी जाति का मुखिया नहीं बना सकते। खुद रामचन्द्र एमसीसी के जोनल कमांडर थे। भूपतियों से होने वाले संघर्ष के कारण ही उन्होंने हथियार उठाया था। उन्होंने तब कहा था कि -“इस क्षेत्र के पिछडे, दलितों एवं हरिजनों का कोई कद्र नहीं रह गया है। पहले पिसाय पुलिस पिकेट (अब नहीं) के सहयोग से हरिजनों, दलितों को वोट नहीं देने दिया गया, फिर उसी के सहयोग से चिंता की हत्या कर दी गयी।“ पिसाय के ही सुशील पांडेय को रणबीर सेना का सरगना कहा जाता था। इस गांव पर भी एमसीसी ने अगडा बनाम पिछडा की लडाई के कारण किया था। इनकी हत्या भी पिछडों ने ही किया। हत्या के बाद पहुंचे केन्द्र में मंत्री गिरिनाथ सिंह ने उसे शांतिवादी कहा था। इस पंचायत में अगडा बनाम पिछडा की लडाई जबरदस्त चलती है। आज भी स्थिति बदली नहीं है। रामचन्द्र सिंह को उन्हीं के गुट का माने जाने वाला रामनगर निवासी रंजीत राजवंशी ने 2006 के चुनाव में हराया और फिर 2011 में भी वही मुखिया बना। अपने भाई की हत्या के मामले में वह गत कई महीने से जेल में है। इलाके के लोग आज भी यह तय मानते हैं कि इस लडाई में कभी भी अगडा को इस पंचायत का मुखिया नहीं बनने दिया जायेगा, भले ही कम पसन्द पिछडे दलित किसी व्यक्ति को ही क्यों न मुखिया बनाना पडे।

बिहार में जून 2012 में पटना जिला की गोरखारी की मुखिया बेबी देवी की हत्या की गयी थी। उसे पद छोडने की धमकी उसी से पराजित संगीता देवी के पति , अपराधी से राजनीतिक मुनाफाखोर बने रणविजय प्रताप उर्फ बबलू ,  ने दी थी। मारे जाने के डर से ही अपने पंचायत से 28 किलोमीटर दूर कुरथौल में वह रह रही थी किंतु तब भी जीवन नहीं बचा सकीं। 15 दिसंबर 2013 की रात को भोजपुर जिले के उदवंतनगर थाना क्षेत्र में अज्ञात अपराधियों ने महिला मुखिया चंपा देवी की गला दबाकर हत्या कर दी। राज्य में अभी तक कुल 33 मुखिया की हत्या की गयी है। राज्य में 2011 के अनुसार कुल 8,463 ग्राम पंचायतों में से 3,784 ग्राम पंचायतों में मुखिया का पद महिलाओं के लिए आरक्षित है। अगले साल 2016 में फिर चुनाव होन है तब भी यह संघर्ष चलेगा किंतु स्तर क्या होगा, तनाव कितना  होगा, यह देखना दिलचस्प हो सकता है।

संपर्क : 09931852301