Monday, 6 October 2014

154 साल पुराना है दाउदनगर की जिउतिया संस्कृति


154 साल पुराना है दाउदनगर की जिउतिया संस्कृति

उपेन्द्र कश्यप, औरंगाबाद ( जिउतिया संस्कृति पर सिर्फ इस संवाददाता ने ही शोध किया है। सबसे पहले जब ‘न्यूज ब्रेक’ ने साल 2000 में इस लोक संस्कृति पर चार पृष्ठ रंगीन सामग्री दिया तब बिहार जाना। कई इलेक्ट्रोनिक मीडिया वाले आये। एएनआई के जरिये विश्व कई देशों में इसका प्रसारण हुआ।)

बिहार के विभाजन के बाद छउ नृत्य झारखंड की प्रतिनिधि संस्कृति बन गई। बिहार अब भी किसी लोक संस्कृति को यह दर्जा नहीं दे सका है। उसे छठ संस्कृति में ही यह क्षमता दिखती है। मगर सिर्फ बहुजनों की इस लोक संस्कृति में वह क्षमता है। एक लोक गीत बताता है कि यह कब से यहां प्रचलन में है। किसी भी लोक संस्कृति का प्रारंभ किन लोगों ने कब किया यह ज्ञात शायद ही होता है। मगर जिउतिया संस्कृति के मामले में ऐसा ही है। “ आश्विन अन्धरिया दूज रहे, संबत 1917 के साल रे जिउतिया। जिउतिया जे रोपे ले हरिचरण, तुलसी, दमडी, जुगुल, रंगलाल रे जिउतिया। अरे धनs भाग रे जिउतिया..।“ स्पष्ट बताता है कि पांच लोगों ने इसका प्रारंभ किया था। कारण प्लेग की महामारी को शांत करने की तत्कालीन समाज की चेष्टा थी। इसमें कामयाबी भी मिली। लेकिन तब एक महीना तक जो जागरण हुआ वह निरंतरता प्राप्त कर संस्कृति बन गई। बाद में यह नौ दिन और अब मात्र तीन दिवसीय संस्कृति में सिमट गया। यह हर साल आश्विन कृष्णपक्ष अष्ठमी को मनाया जाता है। यहां लकडी या पीतल के बने डमरुनूमा ओखली रखा जाता है। हिन्दी पट्टी में इस तरह सामूहिक जुटान पूजा के लिए कहीं नहीं होता। यहां शहर में बने जीमूतवाहन के मात्र चार चौको (जिउतिया चौक) पर ही तमाम व्रति महिलायें पूजा करती हैं। इस संस्कृति में फोकलोट अर्थात लोकयान के सभी चार तत्व यथा लोक साहित्य, लोक कला, लोक विज्ञान और लोक व्यवहार प्रचुरता में उपलब्ध हैं। तीन दिन तक होने वाली प्रस्तुतियों में इसे देखा जा सकता है। इसे बिहार की प्रतिनिधि संस्कृति बनाने के लिए जब नीतिश कुमार मुख्यमंत्री थे तो सरकार को ज्ञापन सौंपा गया था। सरकार बहुजनों की इस लोक संस्कृति के उत्थान के लिए कुछ भी नहीं कर रही है। सिर्फ प्रोत्साहन देने की आवश्यकता है। लोक अपने तंत्र (सरकार) से कुछ नहीं लेती। न सुरक्षा मांगती है न साधन। न तनाव देती है न बवाल। लोग अपने में मस्त रहते हैं, मस्ती करते हैं और दूसरों को इतना मस्त कर देते हैं कि –‘धन भाग रे जिउतिया, तोरा अइले जियरा नेहाल रे जिउतिया, जे अइले मन हुलसइले, नौ दिन कइले बेहाल, रे जिउतिया..” और जब पर्व खत्म होने को होता है तो लोग विरह की वेदना महसूस करते हैं-“ देखे अइली जिउतिया, फटे लागल छतिया, नैना ढरे नदिया समान। जाने तोहे बिन घाय्ल हूं पागल समान....”।                                         


कौन थे भगवान जीमुतवाहन ?
दाउदनगर में जिस जीमूतवाहन की पूज बहुअजन करते हैं वास्तव में वे राजा थे। उनके पिता शालीवाहन हैं और माता शैब्या। सूर्यवंशीय राजा शालीवाहन ने ही शक संवत चलाया था। इसका प्रयोग आज भी ज्योतिष शास्त्री करते हैं। इस्वी सन के प्रथम शताब्दी में 78 वे वर्ष में वे राज सिंहासन पर बैठे थे। वे समुद्र तटीय संयुक्त प्रांत (उडीसा) के राजा थे। उसी समय उनके पुत्र जीमूतवाहन की पत्नी से भगवान जगन्नाथ जी एवं इनके वाहन गरुण से आशीर्वाद स्वरुप जीवित्पुत्रिका की उत्पत्ति हुई। इसी का धारण महिलायें अपने गले में करती हैं।

दो जातियों ने दे रखा है “संजीवनी”
औरंगाबाद (बिहार) के दाउदनगर में जिउतिया लोक संस्कृति को जीवंत बनाये रखने का श्रेय दो जातियों को जाता है। पटवा या तांती और कांस्यकार या कसेरा। हलवाई जाति के रामबाबू परिवार को भी इसका श्रेय देना होगा। साहित्य में जिन पांच नामों को इस संस्कृति की स्थापना का श्रेय दिया जाता है वे सभी कांस्यकार जाति के हैं। लेकिन यह समाज भी यह मानता है कि उनके पूर्वजों ने यह संस्कार पटवा समाज से ही सीखा था। इमली तल उनके कार्यक्रम को देखने के प्रतिफल स्वरुप इसे ‘रोपा’ गया। आज भी इन दो जातियों की ही भागीदारी होती है।



भगवान शंकर के आंसू से जन्मा तांती समाज
कौन और कहां से आया तांती समाज ?
तिरहुत से आया है तांती
तांत से बना है तांती शब्द
उपेन्द्र कश्यप, औरंगाबाद
 कथित तौर पर अपने पूर्वज की जमीन पर दावा करने के कारण प्रतिष्ठित अभिकर्ता बासदेव प्रसाद को जाति निकाला देकर चर्चा में आया तांती या पटवा समाज वस्तुत: यहां तिरहुत से आया था। दाउद खां जब सतरहवीं सदी में दाउदनगर शहर को बसा रहे थे तो तिरहुत से रेशम बुनने में माहिर जाति तांती को यहां बुलाकर बसाया था। तब इनकी संख्या बमुश्किल दस रही होगी। इसी कारण सब एक दूसरे के रिश्तेदार हैं। ऐसा बुजुर्ग कलाकार बेसलाल प्रसाद तांती और रामजी प्रसाद ने बताया। तथ्य है कि यह समाज महर्षि गौतम के तिरहुत से ही जुडा हुआ है। जब दाउदनगर में यह जाति आई तब भागलपुर से रेशम का कोआ मंगाकर यहां लूम चलाये जाते थे। यह जाति बुनकर जाति रही है। दाउदनगर में भी इनका मुख्य पेशा लुम चलाना ही था। गमछी, चादर, कंबल बनाना या रेशम के कपडे बनाना परंपरागत पेशा था। जब बुनकरी का काम खत्म होने को हुआ तो यह समाज दूसरे धन्धे की तलाश में गया। एस.गोपाल और हेतूकर झा की संयुक्त पुष्तक ‘पीपुल आफ इंडियन’ के बिहार अध्याय के सोलहवें पाठ में इस जाति के बारे में कुछ जानकारी दर्ज है। पृष्ठ 914 से 916 के बीच दर्ज जानकारी के अनुसार इस जाति का मुख्य पेशा लुम चलाना है। तांती शब्द की रचना तांत से हुई और यह जाति भगवान शंकर के आंसू से उत्पन्न हुई है। इस पुष्तक के अनुसार इस जाति में अंध विश्वास है। जीव जंतु, पौधे के प्रति विश्वास रखता है। अंतरजातीय विवाह का चलन है। आज भी ऐसा करने पर बवाल नहीं होता। शंभु कुमार कहते हैं कि इसी शहर में कई उदाहाण मिल जायेंगे। पुष्तक बताता है कि आधुनिक शिक्षा के अभाव के बावजूद भी यह समाज सफल है। विकिपिडिया के अनुसार उत्तर प्रदेश के तंतवा जाति के समकक्ष है तांती, जो देवरिया, गोरखपुर, भोजपुर क्षेत्र, छपरा, सिवान और आरा क्षेत्र में है। शनिवार को समाज की बैठक दूर्गा क्लब में हुई जहां दो संवाददाताओं की छपी खबर पर आपत्ति दर्ज कराई गई। एक ने तीसरे की सक्रियता के प्रभाव में आने की बात कही तो दूसरे ने कही सुनी बात पर लिखने की बात कहा। समाज को प्रकाशित कई तथाकथित तथ्यों पर आपत्ति है। यह जाति ही जितिया संस्कृति का जन्मदाता है। यानी कम से कम संवत 1917 से पूर्व यहां आई है न कि 100 सवा सौ साल पूर्व। शंभु कुमार का कहना है कि पटवा बनाम तांती का उलझन अस्पस्ट है इस कारण इस नाम पर समाज को आरोपित करना गलत है।


बहुजन परंपरा दाऊदनगर : स्‍वांग का शहर


  

आशीष कुमार अंशु के साथ संजीव चन्दन                 
बिहार के गया और औरंगाबाद के बीच औरंगाबाद के एक अनुमंडल, दाउदनगर, में मुख्यतः पिछड़ी जाति ‘कसारे’ और ‘पटवा’ की अधिकतम आबादी है। यहाँ कभी घर –घर में कांसे के बर्तन बनाने के लघु उद्योग थे, जो अब नष्ट हो गए हैं। लेकिन यह शहर आज भी अपनी एक सांस्कृतिक पहचान के साथ अपनी मौजूदगी दर्ज कराता है - पिछड़ी जातियों के बाहुल्य के कारण इसे पिछड़ी जातियों के सांस्कृतिक उन्मेष का शहर कहा जा सकता है।                                          
दाउदनगर उन बहुजन कलाकारों का शहर है। दरअसल, यह पूरा शहर आश्विन मास की द्वितीया तिथि को  (प्रायः अक्तूबर में ) भांति –भांति के स्वांग रचता है, लावणी और झूमर गीत गाते हुए रात –रात भर झूमता है। इस छोटे से शहर में कलाकारों ने भांति –भांति की कलाएं साधी हैं। पानी पर घंटों सोये रहने की कला या जहरीले बिच्छुओं से डंक मरवाने का करतब। स्वांग रचाते हुए कोई छिन्न मस्तक हो सकता है तो कोई अपने हाथ पाँव को अलग करता हुए दिख सकता है। आश्विन मास की आयोजन की रातों में पूरे शहर में कई लोग अलग –अलग देवी –देवताओं की स्वांग में होते हैं तो कई लोग राजनीतिक व्यंग्य करते हुए अलग –अलग नक़ल –अवतारों में। कई लोग घंटों स्थिर मुद्रा में खड़े या बैठे होते हैं, पलक झपकाए बिना, कहीं बुद्ध बने तो कहीं कृष्ण या काली। हमलोगों को भी एक कलाकार, नंदकिशोर चौधरी ने पानी पर आधे घंटे बिना तैरे स्थिर सोकर दिखाया। चौधरी दाउदनगर के उन तीन कलाकारों में से हैं, जिन्होंने पानी पर स्थिर लेटने की इस कला को साधा है। वे कहते हैं कि एक बार उन्होंने एक डूबते बच्चे को बचाने के लिए नहर में छलांग लगाई तो ऐसा लगा कि पानी उन्हें दुलार रहा है। 
स्वांग रचने के उत्सव की शुरुआत का इतिहास वहां के गायकों के गीतों में दर्ज है, जो महाराष्ट्र के लोकगीत लावणी को मगही में गाते हुए अपने झूमर गीतों में वे व्यक्त करते हैं।  उनके गीतों के अनुसार संवत 1917 यानी १८६० इसवी में कभी इस इलाके में महामारी फैली थी। तब महाराष्ट्र से आये कुछ संतों ने दाउद नगर की सीमाओं पर ‘बम्मा देवी’ की स्थापना की और रात –रात भर जागते हुए महीने भर उपासना करवाई।  तब से यह उत्सव जीवित पुत्रिका व्रत ( जीतिया ) के रूम में मनाया जाने लगा। यानी पुत्र की आयु के लिए माताओं का व्रत। प्रसंगवश यह यह भी यह भी जान लेना रोचक होगा कि साहित्‍य अकादमी से पुरस्‍कृत हिंदी कवि ज्ञानेंद्रपति की एक चर्चित कविता ‘जीवित पत्रिका व्रत लिए हुए’ का शीर्षक इसी त्‍योहार के नाम से प्रेरित है। इस कविता में कवि ने उन छपास पीडित कवियों पर व्‍यंग्‍य किया है, जो साहित्यिक पत्रिकाओं को बेचकर संपादकों से अपना नेह-संबंध बनाते हैं।

बहरहाल, ‘बम्मा देवी’ महाराष्ट्र की ‘मुम्बा देवी’ का स्थानीय रूप हो सकती हैं। पेशे से शिक्षक और स्वांग कला में निपुण सत्येन्द्र कहते हैं, ‘संतों ने उपासना के बहाने स्थानीय नागरिकों को महामारी से लड़ने के लिए साफ़ सफाई और अन्य स्वास्थ्य विधियों को अपनाया होगा तथा रात–रात भर जागने के लिए मनोरंजन स्वरुप नक़ल, स्वांग की परंपरा डाली होगी, लावणी गववाया होगा, जिसे परंपरा के रूप में दाउद नगर ने जीवित रखा।’ ब्रिटिश कालीन गजेटियर के अनुसार १८६० के आस –पास  का समय विभिन्न महामारियों का समय है, जिससे लड़ने के लिए ब्रिटिश सरकार स्वास्थ्य सेवाओं की योजनायें बना रही थी, लागू कर रही थी।  

लावणी में सामाजिक सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व की गाथाएं गाई जाती हैं, धार्मिक मिथों के अलावा। सोण नदी पर बने नहर का विशद वर्णन एक लावणी में दर्ज है कि कैसे अंग्रेजों ने जनता के पालन के लिए नहर खुदवाया, कि नहर की कितनी गहराई, चौड़ाई है और कैसे नहर के लिए अभियंताओं ने नक़्शे आदि बनवाये। कला को समर्पित इस शहर में सामुदायिक सौहार्द के कई उदहारण हैं। जीवित पुत्रिका व्रत उर्फ जीतिया के दौरान जहाँ शहर के मुसलमान भी स्वांग रचते हैं, झूमते गाते हैं, वहीँ मुसलमानों के त्योहारों में हिन्दू कलाकारों को भागीदारी बढ़–चढ़ कर होती है। जिन दिनों हमलोग दाउद नगर पहुंचे उन दिनों मुहर्रम के ताजिये का निर्माण हिन्दू कलाकार शिव कुमार के निर्देशन में हो रहा था। शहर के ८ से ९ ताजियों के खलीफ़ा शिव कुमार  की प्रशंसा करते हुए उन्हें सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल बताते हैं।
दाउदनगर के वासी इसे वाणभट्ट का भी शहर बताते हैं। कादम्बरी के रचनाकार वाणभट्ट को आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने ‘वाणभट्ट की आत्मकथा’ में नाट्य विधा में निपुण बताया है। द्विवेदी जी ने अपनी रचना का श्रेय मिस कैथराइन को दिया है, जो ७५ वर्ष की अवस्था में भी सोन क्षेत्र में घूम कर वाणभट्ट के सन्दर्भ में सामग्री जुटाती रही थीं। उस सामग्री को उन्होंने द्विवेदी जी को दिया था।  ब्राह्मणवादी व्यवस्था नाट्यकर्म को कभी प्रतिष्ठा नहीं देती रही है, लेकिन जनता के बीच लोकप्रियता के कारण उन्हें ‘भरत मुनि’ के नाट्य शास्त्र को पंचम वेड मानाना भी पडा था। 


स्वांग रचाता दाऊदनगर तो कई–कई वाणभट्टों का शहर प्रतीत होता है।  कला यहां के लोगों के लिए आय का साधन नहीं है, अलग-अलग पेशों से जुड़े दाउद नगर वासी कला के संधान में लगे हैं, क्या डाक्टर, क्या इंजीनियर या प्राध्यापक, सब के सब स्वांग रचाने के पर्व में सोल्लास शामिल होते हैं।  नक़ल विधा में निपुण और पेशे से डाक्टर विजय कुमार कहते हैं, ‘केंद्र और राज्य सरकार को यहाँ की कला और कलाकारों को संरक्षण देना चाहिए.’ वे साथ ही जोड़ते हैं कि ‘कलाओं को समर्पित टी वी कार्यक्रमों के लिए दाउद नगर एक अलग से विषय हो सकता है।’
काश, उनकी इस मांग पर सरकार और मुख्‍यधारा के मीडियाकर्मी ध्‍यान देते।

युवा कहानीकार व पत्रकार संजीव चंदन स्‍त्रीकाल पत्रिका के संपादक हैं जबकि मासिक पत्रिका ‘सोपान’ के संवाददाता आशीष कुमार अंशु खोजी पत्रकारिता के लिए जाने जाते हैं।



Wednesday, 17 September 2014

जिउतिया को प्रतिनिधि संस्कृति बनाने की जरूरत


जिउतिया को प्रतिनिधि संस्कृति बनाने की जरूरत

जिउतिया को प्रतिनिधि संस्कृति बनाने की जरूरत
संवाद सहयोगी, दाउदनगर (औरंगाबाद) : बिहार के विभाजन के बाद छउ नृत्य झारखंड की प्रतिनिधि संस्कृति बन गई है। अपना प्रदेश अभी इसकी रिक्ति को छठ पूजा की संस्कृति में तलाश रहा है। मगर छठ पूरे प्रदेश में और प्राय हिंदी पट्टी में मनाया जाता है, जबकि जिउतिया लोक उत्सव सिर्फ यहीं है। जिसमें लोकयान के सभी चार तत्व-लोककला, लोक साहित्य, लोक विज्ञान और लोक व्यवहार प्रचुर मात्रा में हैं। यह बहुजनों का उत्सव है शायद इसीलिए सरकारों की दृष्टि इस पर नहीं पड़ती। विवेकानंद ग्रूप आफ स्कूल के निदेशक डा. शभूशरण सिंह कहते हैं कि वर्तमान समाज में बच्चे बुजुर्ग माता पिता की सेवा नहीं करते। भावनाओं का संप्रेषण और विस्तार आवश्यक है। यह पर्व पुत्रों की दीर्घायु की कामना करने वाली माताओं द्वारा किया जाता है। इसलिए यह देश के स्तर पर यह संदेश दे सकता है इसलिए इसको प्रतिनिधि संस्कृति बनाना चाहिए। भगवान प्रसाद शिवनाथ प्रसाद बीएड कालेज के सचिव डा. प्रकाश चंद्रा ने कहा कि राज्य सरकार अगर थोड़ी सी मदद कर दे, निधि उपलब्ध कराए और उसके नुमाइंदे उपस्थित होकर इसका अवलोकन करें तो यह लोक उत्सव राज्य की लोक संस्कृति बन सकती है। नगर पंचायत के मुख्य पार्षद परमानंद प्रसाद ने कहा कि राज्य सरकार में कला संस्कृति मंत्री भी लोक कलाकार हैं। उन्हें आकर देखना चाहिए और इसके संवर्धन के लिए बीस लाख रुपये सालाना देने का प्रावधान करें तो इस संस्कृति को चरमोत्कर्ष दिया जा सकता है। सामाजिक कार्यकर्ता कन्हैया सिंह सिसौदिया, जदयू नेता अभय चंद्रवंशी और भाजपा प्रखंड अध्यक्ष अश्रि्वनी तिवारी ने सरकार से माग की कि तीन दिनों तक सिमट गई इस पौने दो सौ साल से जीवंतता से चली आ रही लोक संस्कृति के उत्थान के लिए वह ठोस कदम उठाए जिला या अनुमंडल प्रशासन के सहयोग के बिना यह संस्कृति अपनी जीवंतता बनाए हुए है। इसके संवर्धन के लिए सिर्फ थोडे़ सहयोग की जरूरत है। अगर दस बीस लाख रुपये जो किसी भी सरकार के लिए एकदम न्यूनतम राशि होती है यहा खर्च किया जाये तो लोक कलाकारों को बड़ा मंच मिल सकता है। विस्तार के साथ गुणवत्तापूर्ण बदलाव लाया जा सकता है।

Tuesday, 16 September 2014

“दाउदनगर के जिउतिया सारे नाम हई गे साजन”



 मंगलवार को जिउत्पुत्रिका व्रत है। इसकी पूरी तैयारी कर ली गई है। यहां इसे नौ दिवसीय उत्सव के रुप में मनाया जाता है। इसके लिए शहर में बने सभी चार चौकों को सजाया गया है। वस्तुत: इन चौकों पर भगवान जिमूतवाहन का प्रतिक ओखली रखा जाता है। इसी की पूजा सभी व्रति महिलायें सामूहिक रुप से करती हैं। लोक पर्व जीवन को उल्लासित करते है, आनंदित करते है और संस्कारित भी करते है। इनसे जीवन या समाज की एकरसता दूर होती है और नयी उर्जा का संचार होता है। सामुहिकता की भावना मजबूत होती है तथा सामाजिक संगठन के रूप में हम अपने को अभिव्यक्त करते है। लोक पर्व में विविधता होती है और विशिष्टता भी। लोक-पर्व से किसी देश, किसी प्रांत, किसी क्षेत्र, किसी शहर, किसी गांव का विशेष पहचान बनती है। कार्निवाल-पर्वदुनिया के कई देशों में मनाया जाता है, किंतु जर्मनी के कोलोन शहर का कार्निवाल अपनी विशेष पहचान रखता है और विश्व में प्रसिद्ध है। इसी तरह जिउतिया-पर्व भी भारत के विभिन्न प्रांतों में मनाया जाता है, किंतु दाउदनगर शहर में जिउतिया मनाने का विषिश्ट ढंग है जो काफी मशहुर है। यहां इसे नकल-पर्व के रूप में बड़े धूम-धाम से मनाया जाता है। इसे देखने के लिए झारखंड से और उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर तक से लोग सपरिवार आते है। यही कारण है कि यह अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान रखता है।

हम सभी जानते है कि जिउतिया-पर्व (जीवित-पुत्रिका व्रत) आश्विन मास (सितम्बर-अक्टुबर) में कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मनाया जाता है। इसका विशेष वर्णन भविष्य पुराणमें मिलता है। इस पर्व में माता अपने पुत्र के चिरंजिवी होनी की कामना करती है। इसलिए जब कोई पुत्र किसी बड़े संकट से बच जाता है तो लोग कहते है - खैर मनाओ कि तुम्हारी मां जिउतिया की थी, सो तुम बच गए।यह पर्व तीन दिनों का होता है - एक दिन नहाय-खाय यानी सप्तमी (सोमवार) को माताएं स्नान करके खाना खाती है, अष्टमी को उपवास रखकर शाम में पूजा करती हैं और नवमी को सुबह में उपवास तोड़कर पारणकर लेती हैं। इस बार नवमी तिथि बुधवार को है। यहां की खासयित यह है कि यहां इस पर्व का आरम्भ अनन्त पूजाके दूसरे दिन से ही हो जाता है। जिउतिया में जीमूतवाहन भगवान की पूजा की जाती है। पूजा करने के लिए दाउदनगर में चार चैक बने हुए हैं - पुराना शहर चौक, कसेरा टोली चौक, पटवा टोली चौक और बाजार चौक। इन चारों चैकों पर जीमूतवाहन भगवान स्थापित हैं।

बर्तन बनाने का काम करती है कांस्यकार जाति



जिउतिया संस्कृति का संवाहक है समाज
लोक साहित्य इस समाज को देता है श्रेय

 संवत 1917 में जिउतिया संस्कृति से जुडी जाति कांस्यकार का पुश्तैनी धंधा है बर्तन बनाना। शहर में पीतल, कांसा, फुल के बर्तन प्राय: हर कसेरा परिवार में कभी बनता था। सतरहवीं सदी में ही दाउद खां ने इन्हें यहां बसाया था। बमभोला कांस्यकार को पता नहीं कहां से आये। बताते हैं खानदानी हैं, जब से दाउदनगर है तब से यहां कांस्यकार है। मूल की तलाश अभी जारी है। इस जाति के कारण ही यहां का बर्तन उद्योग देश में कभी प्रतिष्ठा पाता था। भारत चीन युद्ध के समय यहां का बर्तन सैनिकों को आपूर्ति की गई थी। यहां बडा मिल हनुमान मंदिर के पीछे हुआ करता था। अब यह धंधा सिमट गया है। चंद घरों तक। लोग दूसरे व्यवसाय से जुडते चले गये। इस समाज का कसेरा टोली में बने जीमूतवाहन भगवान के चौक पर एकाधिकाअर है। यहां मूंह से गर्म लौह पिंड को पकडने, हाथों से दपदपाते लाल जंजीर को दूहने जैसी खतरनाक प्रस्तुति की जाती है। जो अन्यत्र नहीं दिखता। यहां लौंडा नाच अभी भी होता है। उसकी परंपरा बन गई है। शादी और बारात के साथ शव यात्रा भी निकाली जाती है। 

जिउतिया संस्कृति का जन्मदाता है तांती समाज



भगवान शंकर के आंसू से जन्मी है यह जाति
सतरहवीं सदी में दाउद खां ने लाया था यहां
तिरहुत से आया है तांती
तांत से बना है तांती शब्द

उपेन्द्र कश्यप
 यहां के नौ दिवसीय लोकउत्सव जिउतिया का प्रारंभ और उसके लिए समर्पित जाति पटवा या तांती समाज खानाबदोश जाति की तरह भी काम करती है। एक बडी आबादी राज्य से बाहर खानाबदोश की जिंदगी जीती है। काम की तलाश में उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश के इलाकों में बडी आबादी काम करती है। साल में कई बार सभी लोग यहां आवश्यक रुप से आते हैं। बैशाख के महीने में शादी के लिए, सावन में घर की देवी या देवता की पूजाई के लिए और कार्तिक में दीपावली में घर की सफाई-सरंगाई के लिए, तब छठ तक यह मजदूर वर्ग यहां ठहरता है। यह समाज वस्तुत: यहां तिरहुत से आया था। दाउद खां जब सतरहवीं सदी में दाउदनगर शहर को बसा रहे थे तो तिरहुत से रेशम बुनने में माहिर जाति तांती को यहां बुलाकर बसाया था। तब इनकी संख्या बमुश्किल दस रही होगी। इसी कारण सब एक दूसरे के रिश्तेदार हैं। ऐसा बुजुर्ग कलाकार बेसलाल प्रसाद तांती और रामजी प्रसाद ने बताया। तथ्य है कि यह समाज महर्षि गौतम के तिरहुत से ही जुडा हुआ है। जब दाउदनगर में यह जाति आई तब भागलपुर से रेशम का कोआ मंगाकर यहां लूम चलाये जाते थे। यह जाति बुनकर जाति रही है। दाउदनगर में भी इनका मुख्य पेशा लुम चलाना ही था। गमछी, चादर, कंबल बनाना या रेशम के कपडे बनाना परंपरागत पेशा था। जब बुनकरी का काम खत्म होने को हुआ तो यह समाज दूसरे धंधे की तलाश में गया। एस.गोपाल और हेतूकर झा की संयुक्त पुष्तक ‘पीपुल आफ इंडियन’ के बिहार अध्याय के सोलहवें पाठ में इस जाति के बारे में कुछ जानकारी दर्ज है। पृष्ठ 914 से 916 के बीच दर्ज जानकारी के अनुसार इस जाति का मुख्य पेशा लुम चलाना है। तांती शब्द की रचना तांत से हुई और यह जाति भगवान शंकर के आंसू से उत्पन्न हुई है। इस पुष्तक के अनुसार इस जाति में अंध विश्वास है। जीव जंतु, पौधे के प्रति विश्वास रखता है। अंतरजातीय विवाह का चलन है। आज भी ऐसा करने पर बवाल नहीं होता। शंभु कुमार कहते हैं कि इसी शहर में कई उदाहाण मिल जायेंगे। पुष्तक बताता है कि आधुनिक शिक्षा के अभाव के बावजूद भी यह समाज सफल है। विकिपिडिया के अनुसार उत्तर प्रदेश के तंतवा जाति के समकक्ष है तांती, जो देवरिया, गोरखपुर, भोजपुर क्षेत्र, छपरा, सिवान और आरा क्षेत्र में है। जितिया संस्कृति का जन्मदाता है। यानी कम से कम संवत 1917 से पूर्व यहां आई है। 

Monday, 15 September 2014

जिउतियाः जैसा हमने देखा-सुजित चौधरी

जिउतियाः जैसा हमने देखा
उत्कर्ष 2012 में मेरे आग्रह पर डा.राय के नाती सुजित चौधरी ने यहा आलेख लिखा था। वे रहते हैं बेंगलुरु में। जिउतिया के अवसर पर इसे साझा कर रहा हूं आपसे।

दाउदनगर में काफी धुम-धाम से मनाया जाता है जिउतिया। जिसमंे सभी लोग धर्मसम्प्रदायजाति और आर्थिक वर्ग से उपर उठकर सम्मिलित होते हैं। जितिया वास्तव में जिमुतवाहन का पर्व है जो उत्तर और पूर्व भारत में मनाया जाता है। दाउदनगर के जितिया का अनोखा पक्ष है की यहां के बच्चे और युवा नक्कल’ बनते हैं। नक्कल मतलब भेश बदलना और पूरे षहर में नक्कल बनकर घूमना। नक्कल बनना उनके लिए अनिवार्य होता है जिनका जन्म जिमुतवाहन के आषीर्वाद से हुआ हो। मगर जितिया में (मैं अपने बचपन यानि कम से कम तीस साल/पहले की बात बोल रहा हूं) षहर के काफी लोग नक्कल  बनते थे और जहां देखिये नक्कल ही नक्कल। आपने गोवा के कार्निवाल के बारे में सुना होगाकुछ वैसा ही। नक्कल की उत्पति में कोई जनजातीय परम्परा नहीं हैक्योंकि दाउदनगर में कोई जन जाति नहीं है। जितिया के समय सामाजिक बंधन ढीले हो जाते हैे औरसामाजिक सांस्कृतिक वर्जनाएं नही रहती। कोई किसी से भी मजाक कर सकता है या किसी का भी मजाक/ माखौल उड़ा सकता है। सब मान्य है। नक्कल के विशय पारंपरिक और सामयिक मुद्दांे से लिए जाते हैं यहां तक कि स्थानीय मुद्दे भी। पुरूश स्त्री रूप धारण करते हैं। जैसे मछली बेचने वाली या बाई स्कोप दिखाने वाली। कोई नट बनता है तो उसका साथी नट्टिन। कोई सूल्ताना डाकू बनता है तो कोई लैला की खोज में भटकता मजनू। कोई जोगी बनता तो कोई भिखारी। सड़कों बाजारो में घुमते ये नक्कल दाउदनगर के कुछ संभ्रांत लोगों की बैठक पर भी जाते हैंजहां उन्हें बख्ष्षीष मिलती है।इन नक्कालों में डिल्ला काफी मषहुर था। वह एक गोरा चिट्टा नवजवान था और पेषे से मछलीमार था। वह स्त्री रूप धारण करता और लोग समझते कि वाकई वह एक औरत है। सुल्ताना डाकु एक बहुचर्चित पात्र था। एक नक्कल सुल्ताना डाकू बनता और एक उसका साथी प्रधान सिंह। मुझे याद है - मेरे नाना डाॅक्टर और सभी नक्कल हमारे बैठक में जरूर आते थे। हाँ एक चीजसभी नक्कल खासकर बड़ी उम्र के षौकियाऔर अनुभवी नक्कल षराब जरूर पीते थे। नाना देषी षराब में कुछ मिलवाते थे जिससे उसका रंग पारदर्षी से बदलकर लाल हो जाता था। यह षराब नक्कलों के लिए हमारे बैठक में आने का एक खास आकर्शण था जो घर के नौकर बैठक से लगे छोटे कमरे में नक्कलों को पिलाते थे। मजनू जंजीरों में बंधा और फटे कपड़े पहने आता और जमीन पर अपना सर पटकता और गाता- लैला लैला पूकारूं मैं वन मेंमेरी लैला बसी है मेरे मन में।’ इसी तरह सुल्ताना डाकू आता और उसके आने का संकेत था कई बम बिस्फोट। फिर वह आता और अपने प्रधान से पूछता, ‘प्रधान जीयह डाक्टर कैसा आदमी है?’ प्रधान कहता- यह डाक्टर गरीबों का खून चुसता है और इसी से काफी दौलत कमाई है।’ सुल्ताना अपनी बन्दूक की नोंक पर मेरे नाना जी की तरफ उठाता और कहता डाक्टर अपने खजाने की चाभी दे दे नहीं तो तेरी लाष बिछा दुंगा।’ मैं बिल्कुल डरा नाना के पीछे खड़ा रहता और सोचता कि सचमुच यह नाना को मार देगा क्या इसके बाद सुल्ताना और प्रधान मेरे नाना के पैर छु प्रणाम करते और पास वाले कमरे में रंगीन षराब पीने चले जाते। ऐसा होता था दाउदनगर का जितिया। अब दस दिनों का यह आयोजन तीन चार दिनों में सिमट गया है। हाँ स्त्रियां अन्तिम दिन ओखली कि पूजा बिना किसी समस्या से कर सकें इसके लिए मुहल्ले के नक्कल लाल परी और काला परी बनकर उनके साथ रहते हैं। अब तो सुना है कि टीवी वाले भी इसका प्रसारण करते है।