Friday, 20 September 2019

जिउतिया लोकोत्सव पर शोध-कार्य खत्म नहीं हो सकता!


जिउतिया की रिपोर्टिंग-यात्रा-01
० उपेंद्र कश्यप ०
चुनौतियां और आलोचना हमेशा प्रेरणादायी होती हैं जो करने की इच्छा नहीं होती, वह भी करा देती है पत्रकारिता में मेरे मार्ग तो इसी कारण प्रशस्त होते रहे हैं औरंगाबाद जिले का एक कस्बाई शहर है दाउदनगर, जिसकी अभी आबादी करीब 60 हजार है जब जिउतिया लोकोत्सव (1860 से पूर्व) के रूप में मनाया जाना शुरू हुआ था, तब बमुश्किल इस शहर की आबादी 05 हजार रही होगी “श्रमण संस्कृति का वाहक-दाउदनगर” के अनुसार 1885 में नगर पालिका बने दाउदनगर शहर की 1881 में 8225 जनसंख्या थी जिउतिया पर काफी मैंने लिखा है, इसका अर्थ यह नहीं कि लिखने को अब कुछ नहीं बचा, अब भी काफी कुछ लिखा जा सकता है शोध के लिए विषय में कुछ न कुछ हमेशा बचा रह जाता है आइये, आगे बढिए, लिखिए, मुझसे आगे की दास्ताँ, कुछ ख़ास और कुछ अलग, सबका स्वागत है अलग जो लिखा जाएगा उसकी भी मुक्तकंठ से प्रशंषा करूंगा, जैसे धर्मवीर भारती ने अपनी डाक्यूमेंट्री में मेरे किये गए काम से कुछ अलग किया/ जोड़ा, तो सार्वजनिक मंच से इसकी प्रशंषा की खैर, मैं यह नहीं कहता, कि जिउतिया लोकोत्सव पर मुझसे बेहतर नहीं लिख सकता कोइ, किन्तु डंके की चोट पर यह कहता हूँ कि- मेरे से अधिक किसी ने अभी तक तो इस विषय पर नहीं लिखा है
इस पंक्ति को कोइ भी अपने हिसाब से सकारात्मक या नकारात्मक भाव में ले सकता है, यह अगले की स्वतंत्रता है लेकिन कई रिपोर्ट मेरी ही रिपोर्ट की हू-ब-हू नकल है साहित्यिक चोरी मेरी किताब, स्मारिकाओं और राष्ट्रीय नवीन मेल, दैनिक जागरण, आर्यावर्त, आज में प्रकाशित मेरी रिपोर्टों की नकल ऐसे में, मुझे किसी के लिखे हुए से अपना कतरन मिलाने की भला क्या जरुरत है? दाउदनगर और शहर के लोग जानते हैं कि जिउतिया का मतलब कौन? औरंगाबाद जिले से बाहर यदि जिउतिया पर किसी का लिखा पढ़ा गया तो मेरा लिखा हुआ बिहार में, और अन्य प्रदेशों में भी जो पढ़ा और देखा गया, उसमें मैं हूँ, या मेरा योगदान शामिल रहा है वरिष्ठ पत्रकार प्रियदर्शी किशोर श्रीवास्तव के अनुसार-“गूगल पर सर्च मारिये, नकल पकड़ी जायेगी कश्यप की लिखी हुई रिपोर्ट में बयान देने वालों के बस नाम बदल दिए गए और लेखक कोइ और हो गया है

पोर्टल रिपोर्टर सुनील बॉबी को इमली तल कोइ बताने वाला नहीं मिला हां बुजुर्गों ने उनको यह जरुर बताया कि-जिउतिया पर दैनिक जागरण के पत्रकार कश्यप जी से मिलिए, वही बताएँगे, वही लिखते हैं (बुजुर्ग को नहीं मालुम कि अब मैं दैनिक भास्कर में डेहरी हूँ) एक और वाकया बताता हूँ, जिसे शायद संस्कार विद्या में आयोजित एक कार्यक्रम में सार्वजनिक रूप से जिउतिया पर डाक्यूमेंट्री बनाने वाले शख्स धर्मवीर भारती ने बताया था जब 2014 में मैंने पुरानी शहर में ज्ञान दीप समिति द्वारा आयोजित जिउतिया नकल प्रतियोगिता में यह घोषणा किया था कि-अगले वर्ष इस शहर पर एक किताब दूंगा, जिसके बाद मैं इस घोषित डेट लाइन पर किताब प्रकाशित करने के लिए लिखने वास्ते अपने घर में दोपहर तक कैद रहने लगा अचानक मोबाइल की घंटी बजी धर्मवीर भारती का कॉल आया मेरी पहचान नहीं थी
बोले-एक डाक्यूमेंट्री बना रहा हूँ, आपसे कुछ जानकारी लेनी है मैं बोला- अभी घर पर आप मिल सकते हैं किताब लिख रहा हूँ या फिर शाम में बाजार में स्टूडियो यादें में मिल सकता हूँ आने की स्वीकृति ले वे घर आ गए उनको जितनी उम्मीद थी, मैं उससे अधिक दिया, हालांकि किसी विषय पर किताब लिख रहा कोइ लेखक प्राय: किसी और से जानकारी किताब के प्रकाशित होने तक साझा नहीं करता यह देख वे चौंक गये मंच से कहा था-“बाईट जिसके पास भी लेने गया, उसमें से अधिकतर ने यही बोला कि- सबके बाईट लिहअ, उपेंद्र कश्यप भिर मत जईह इसके बाद अपने गुरु आफताब राणा से बात की तो वे बोले-जाओ, मिलो, उपेंद्र मेरा इयार है, मिलोगे तो पता चलेगा इसके बाद उपेंद्र भैया से मिले मिले तो इतनी जानकारी दी, जो किसी से नहीं मिली जानकारी क्या, पुरी किताब खोलकर रख दी हर सवाल का जवाब मिला“ जिउतिया मेरी बपौती नहीं है, कोइ कुछ भी पूछेगा तो बताने को नि:संकोच उपलब्ध हूँ शहर में ऐसे किसी का विरोध होता है, धारणा बनाई जाती है धारणा गढ़ी और प्रचारित कर उसे रूढ़ बनाया जाता है कारण बस जलन की भावना जिस डाक्यूमेंट्री का जिक्र किया, उसमें कई के बाईट ठुंसा हुआ लगेगा समझ सकते हैं, धर्मवीर पर पड़े दबाव को

मिलते हैं फिर कभी, जब कोइ दिल पे चोट पहुंचा जाएगा.....      

Saturday, 14 September 2019

लोक संस्कृति का प्रतिनिधि जिउतिया उत्सव


 “जिउतिया हिन्दी पट्टी क्षेत्र का एक त्यौहार हैं किन्तु बिहार के दाउदनगर में यह नौ दिवसीय लोकोत्सव है, जिसमें-स्वांग, नकल, अभिनय और झांकी की प्रस्तुति बड़े पैमाने पर होती है। व्यापक स्त्री भागीदारी विमर्श को नया आयाम देती है। फोकलोट के सभी तत्वों की इतनी व्यापक प्रस्तुति और कहीं नहीं----“
अहा जिन्दगी के 15.09.2019 के अंक में प्रकाशित 

लोकयान के सभी तत्वों की प्रतिनिधि संस्कृति : दाउदनगर-जिउतिया लोकोत्सव
० उपेंद्र कश्यप०
‘श्रमण संस्कृति का वाहक : दाउदनगर’ किताब के लेखक एवं स्थानीय इतिहास के जानकार

यूं तो जिउतिया या जीवित्पुत्रिका व्रत पुरे हिन्दी पट्टी क्षेत्र में मनाया जाता है। किन्तु बिहार के दाउदनगर में इसका अलग स्वरूप और अंदाज है। यहाँ यह नौ दिवसीय लोकोत्सव है, जो न्यूनतम वर्ष 1860 से आयोजित हो रहा है। यह अकेला ऐसा पर्व है जो लोक संस्कृति की संपूर्ण अभिव्यक्ति के लिए बने शब्द “फोकलोट” (इसे लोकायन या लोकयान भी कहते हैं) के सभी चार तत्वों की एक साथ प्रचुरता में प्रस्तुति देखने का अवसर हर वर्ष आश्विन कृष्ण पक्ष में उपलब्ध कराता है। यह पर्व आश्विन कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को होता है। इस बार यह व्रत 21 सितंबर दिन शनिवार को है। डॉ. अनुज लुगुन- सहायक प्रोफेसर, दक्षिण बिहार केंद्रीय विवि, गया ने इस उत्सव में स्त्री भागीदारी पर लिखा है-आमतौर पर हिंदी पट्टी में स्त्रियों की सार्वजनिक भागीदारी बहुत कम दिखती हैयहां तक कि प्रगतिशील संगठनों के कार्यक्रमों में भीयह हिंदी पट्टी का सामंती और पितृसत्तात्मक लक्षण हैलेकिन, दाउदनगर के जिउतिया त्योहार में स्त्रियों की बराबर की उपस्थिति विचार करने को विवश करती है

लोक और संस्कृति की व्यापक अभिव्यक्ति के लिए एक शब्द है-लोकायन या लोकयान या फोकलोट। नृतत्वशास्त्री लोकयानके अंतर्गत चार खंड बताते हैं। लोक-साहित्य, लोक-व्यवहार, लोक-कला या कलात्मक लोकयान, और चौथा लोक-विज्ञान व औद्योगिकी है। जिउतिया लोक संस्कृति में इन चारों की उपस्थिति प्रचुरता के साथ है। ऐसा बिहार की अन्य संस्कृतियों के साथ नहीं है।
० अपना मौलिक, समृद्ध व मौखिक (कुछ लिखित) लोक साहित्य है। इसमें लोक जीवन का दुख दर्द, हर्ष उल्लास का अनुभव तथा जीवन पर वैचारिक प्रतिक्रियायें मिलती हैं। पर्व-त्योहारों, देवी-देवताओं तथा प्रकृति के विविध रुपों का चित्र मिलता है। साहित्य वाचन परंपरा में झुमर, लावनी, मुहावरे या वीरता के गीत के रूप में जीवित है। चकड़दम्मा, झुमर में विविधता, रंगीनीयत और मधुरता होती है। सरस गीत हैं, जिसमें स्थानीय इतिहास, भूगोल और विशेषताओं को भी प्रयाप्त जगह मिली है।
० लोक-व्यवहार न तो साहित्य है न ही कला, इसमें विश्वास, प्रथा, अन्धविश्वास, कर्मकांड, लोकोत्सव, परिपाटी शामिल है। यहां का समाज इससे गहरे जुडाव रखता है। जिउतिया से जिउ के समान जुडे जमात में यह कुट-कुट कर भरा हुआ है।
० लोक-कला या कलात्मक लोकयान में लोक नृत्य, लोक-नाट्य, लोक-नटन, लोक चित्र, लोक- दस्तकारी, लोक वेषभूषा व लोक-अलंकरण शामिल हैं। यहाँ की मिट्टी के कण-कण में कला है तो हर शख्स कलाकार। उर्वरता इतनी कि भर जिउतिया समारोह सब कलाकार बन जाते हैं। ये अप्रशिक्षित लोक कलाकार मंझे हुए प्रशिक्षित व प्रोफेशनल कलाकारों को चुनौती देते दिखते हैं। बच्चे ही कलाकार, निर्देशक, पटकथा लेखक, स्त्री-पुरुष पात्र सब वही हैं।
० चौथा और अंतिम समावेश लोक-विज्ञान व औद्योगिकी का है, जिसमें लोकोपचार, लोकौषधियां, लोक नुस्खे, लोक भोजन खाद्य, लोक कृषि रुढियां, जादू टोने शामिल हैं। यहां जब लोक कलाकार अपनी खतरनाक प्रस्तुति देते हैं तो उसमें नुस्खे और लोकौषधियों की उपयोगिता होती है। शरीर में चाकू-छूरी घुसाना हो या फिर दममदाड, डाकिनी, ब्रह्म, काली, गर्म लौह पिंड या दहकते जंजीर को दूहने की प्रस्तुति।

1860 से पहले किन्तु, कब से यह परंपरा:- 
कसेरा टोली चौक पर प्रस्तुत होने वाले एक लोक गीत की पंक्ति है- आश्विन अंधरिया दूज रहेसंवत 1917 के साल रे जिउतिया, जिउतिया जे रोपे ले, हरिचरणतुलसी, दमड़ी, जुगुलरंगलाल रे जिउतियाअरे धन भाग रे जिउतिया। तोहरा अहले जिउरा नेहालजे अहले मन हुलसइलेनौ दिन कइले बेहाल... । इससे यह स्पष्ट होता है कि हरिचरण, तुलसी, दमड़ीजुगुल और रंगलाल ने इसका प्रारंभ संवत 1917 अर्थात 1860 .सन में किया था। क्या ऐसे किसी लोक संस्कृति का जन्म होता है? शायद नहीं! इस जाति विशेष के पूर्वज भी मानते हैं कि- इमली तल होने वाले जिउतिया लोकोत्सव का नकल किया गया था। इसी कारण इस उत्सव में ‘नकल’ (अर्थात देख कर उसकी नकल करना) खूब होता है। हालांकि इमली तल कब से हो रहा था, इसका कोइ प्रमाण लोक गीत में भी नहीं मिलता। करीब 60 हजार आबादी वाले नगर निकाय दाउदनगर में जीमूतवाहन भगवान के चार चौक बने हुए हैं और यहीं सार्वजनिक और सामूहिक रूप से स्त्रियाँ व्रत करती हैं। व्रत कथा सुनती हैं।

Wednesday, 11 September 2019

बाजार में 200 रुपये के नकली नोट आने से व्यवसायी और आम लोग परेशान

फोटो-200 रुपये का नकली नोट ऊपर और असली नीचे

सावधानी से देखने पर पकड़ में आ जाते हैं नकली नोट

लिखावट में उभार नहीं, हरे रंग की सुरक्षा रेखा अस्पष्ट

08 नवंबर 2016 की रात हुई नोटबंदी के बाद जारी 200 रुपये के अब नकली नोट बाजार में आ गया है। इससे बाजार, व्यवसाय और हर आमो-ख़ास व्यक्ति परेशान हो रहा है। जब व्यवसायी ऐसे नकली नोट लेकर बैंक जा रहे हैं तो उनको ज्ञात हो रहा है कि उनके पास 200 रुपये के एक या इससे अधिक नोट नकली हैं। आप थोड़ी सतर्कता बरत कर ऐसे नकली नोट लेने से बच सकते हैं। जो नकली नोट आप तस्वीर में देख रहे हैं, उसे पकड़ने के लिए उसके प्रमुख चिन्हों को अवश्य टटोलें। लिखावट में उभार नहीं हैं, हरे रंग के सुरक्षा धागे पर लिखा हुआ भारत व आरबीआई स्पष्ट नहीं है, बाईं व दायीं ओर अंधों के लिए जो रेखाएं व गोल विन्दु हैं, वे उभरी हुई नहीं हैं। ये तीन चिन्ह आप बहुत सावधानी से देख कर जान सकते हैं कि आपके हाथ में मिला नोट नकली है या असली।


सब कुछ हूबहू, प्रथम दृष्टया पहचानना मुश्किल:-

200 रुपये के नकली और असली नोट में बहुत फर्क नहीं दिखता। प्रथम दृष्टया कोइ भी नकली नोट लेकर रख लेगा। उसे समझ में नहीं आयेगा कि असली है या नकली। सब कुछ हुबहू है। यह जानने और इसे लेने से बचने के लिए नोट को हाथ में लेकर उसे टटोलना होगा। हाथ फेरने पर पता चलेगा कि जो लिखावटें असली नोट में उभरी हुई हैं, वे नकली नोट पर समतल हैं, उभरी हुई नहीं हैं। सबसे आसानी से हरा सुरक्षा धागा देख कर असली-नकली का फर्क जान सकते हैं। बाकी लिखावटें और प्रिंटिंग के रंग एक सा दिखते हैं। किन्तु प्रिंट में धुंधलापन दिखेगा।   


नकली नोट किसे कहते है?

नकली या जाली नोट उसे कहते हैं, जिसमें वास्तविक भारतीय करेंसी नोटों की विशेषताएँ नहीं मिले। ऐसा कोई भी संदिग्ध नोट, जाली नोट या नकली नोट माना जाता है। वास्तविक नोटों वाली विशेषताएँ नोट को देखने, स्पर्श करने और समतल से घुमाकर-हिलाकर आसानी से पहचान सकने योग्य होती हैं। किसी भी जाली नोट में बैंक नोटों में शामिल सभी सुरक्षा विशेषताओं की सफलतापूर्वक नकल सामान्यतः नहीं हो पाती है।     


जाली नोटों के बारे में क्या है कानूनी प्रावधान:-

भारतीय दंड संहिता की धारा 489 A से 489 E के अंतर्गत बैंकनोटों का जालीकरण/जाली या नकली नोटों का असली नोटों के रूप मे उपयोग करना/ जाली या नकली नोटों को अपने पास रखना/ बैंकनोटों के जालीकरण के लिए उपकरण तथा संबंधित सामग्री बनाना या उन्हें अपने पास रखना/बैंकनोटों की सादृश्य दस्तावेज बनाना तथा उनका उपयोग करना अपराध है। जिसके लिए न्यायालय जुर्माना, अथवा सात वर्ष से लेकर आजीवन कारावास अथवा दोनों सज़ाएं, अपराध के आधार पर, दे सकते हैं।

Monday, 9 September 2019

जुर्माना लीजिये हुजूर, लेकिन हर्जाना भी दीजिये


जुर्माना लगाने वाले सत्ता-तंत्र को भी हर्जाना भरने के लिए तैयार करो

यह तो संभव नहीं है लोकतंत्र में कि जनता को जबरन जुर्माना के लिए मजबूर किया जाए और सत्ता व तंत्र को छुट्टे सांड की तरह छोड़ दिया जाएउसको जिम्मेदारी मुक्त रखा जाए?
 0 उपेंद्र कश्यप 0
नए यातायात नियम को लेकर बवाल है। जायज भी लगता है। सड़क यातायात में सुधार और सड़क हादसों में कमी की उम्मीद इससे है। लेकिन सवाल यह भी है कि जनता जुर्माना तो भरने को मजबूर है, क्या जुर्माना लगाने वाले सत्ता-तंत्र को भी हर्जाना भरने के लिए तैयार नहीं किया जाना चाहिए? आखिर यह तो संभव नहीं है लोकतंत्र में कि जनता को जबरन जुर्माना के लिए मजबूर किया जाए और सत्ता व तंत्र को छुट्टे सांड की तरह छोड़ दिया जाए? उसको जिम्मेदारी मुक्त रखा जाए? नए यातायात जुर्माना दर का एक बेहतर साइड इफेक्ट अब सामने आने लगा है। जनता सड़क की बेहतरी की मांग करने लगी है।
सरकार को यह चाहिए कि जिम्मेदारी तय करे। लाइसेंस दो-चार दिन में मिले। इसके लिए यदि जिम्मेदार अधिकारी तंग करता है, रिश्वत लेता है तो उससे 50 हजार जुर्माना वसूला जाना चाहिए। इसके लिए जांच और सबूत देने/जुटाने का झंझट नहीं, सिर्फ लाइसेंस के लिए आवेदन देने वालों द्वारा एक तय समय में तीन या पांच शिकायत ही पर्याप्त आधार माना जाना चाहिए। ताकि डर का सिद्धांत यहां भी लागू हो। अधिक जुर्माना वसूली नियम के पीछे डर का ही तर्क दिया गया है। इसके अलावा, सड़क पर गड्ढा हो तो उसकी तस्वीर गूगल मैप और लोकेशन के साथ विभागीय एप (बनाया जाए) पर डाउन लोड करते ही सड़क बनाने वाली एजेंसी, मेंटेनेंस के लिए जिम्मेदार अधिकारी, राशि जिस जिस के हस्ताक्षर से जारी होती है, उसके खिलाफ एक लाख का जुर्माना और तस्वीर पोस्ट करने वाले के खाते में 25000 से 50000 का कैश गिफ्ट दिया जाना तय हो। इससे सड़क निर्माण की गुणावत्ता के साथ मेंटेनेंस की स्थिति भी सुधरेगी। क्योंकि सर्वाधिक सड़क हादसे इसी कारण संतुलन बिगड़ने से होते हैं। जहां तहां रोड ब्रेकर बनाने, सड़क का एलाइमेन्ट ठीक नहीं होने, दो बार सड़क बनाए जाने पर ज्वाइंट प्वाइंट पर तीखा उभार/गड्ढा के लिए जिम्मेदारी तय हो, और यह भी एकतरफा नहीं, कार्य एजेंसी के साथ संबद्ध अधिकारी से हर्जाना वसूली हो और फोटो एप पर लोड करने वाले के खाते में आधी रकम जाए। 
इसके अलावा- सड़क यातायात ही नहीं अतिक्रमण बड़ी समस्या है। सड़क अतिक्रमण से भी दुर्घटना घटती है। इसलिए जिस सड़क पर भी अतिक्रमण दिखे, जनता फोटो एप पर डाले तो सीधे वहां के थानाध्यक्ष, अंचल अधिकारी, एसडीपीओ, एसडीएम से जुर्माना वसूला जाए और फोटो डाउनलोड करने वाले के खाते में आधी रकम जाए। यह सब जुर्माना भी एक लाख से कम न हो। यह पक्का निर्माण वाले अतिक्रमण मामले में भी लागू हो, इसमें निर्माण की स्वीकृति देने वाले अधिकारी से भी जुर्माना वसूला जाना चाहिए। सड़क हादसे में मौत या घायल होने पर हत्या, हत्या का प्रयास करने की प्राथमिकी सड़क बनाने और बनवाने में लगे अधिकारियों के विरुद्ध होनी चाहिए। ताकि कोई जुर्रत न कर सके। क्या इतना होने के बाद आप कल्पना कर सकते हैं कि सड़क दुर्घटना होगी? हां, एकदम न्यूनतम हो जाएगी। 
इतना कुछ करने के बाद जनता को यातायात नियम मानने के लिए मजबूर करिये अन्यथा जब तक अधिकारियों की जिम्मेदारी तय नहीं होती तब तक जुर्माने की वसूली का नियम स्थगित रहे।
 एक और बात, नए नियम में लचीलापन होना चाहिए। तुरंत सुधारिये जनाब। तीन बार तक का चालान न भरने की आजादी हो, खास कर बाइक, ऑटो वालों के लिए। जो अपेक्षाकृत गरीब और कमजोर आर्थिक वर्ग के होते हैं, और किलो दो किलोमीटर की यात्रा दिन भर में दर्जनों बार करनी होती है उनको। तीन बार किसी का चालान एक निश्चित समय में (जो भी सरकार तय करे) काटे जाने के बाद चौथी बार चालान कटने पर आपको न सिर्फ जुर्माना भरना होगा बल्कि ड्राइवरी लाइसेंस भी रद्द किया जा सकता है। ऐसा प्रावधान हो। चौथी बार चालान का कटना मजबूरी नहीं बल्कि प्रभावित को कानून नियम न मानने का आदतन 'अपराधी' समझा जा सकता है।

Saturday, 7 September 2019

विद्या निकेतन स्कूल ऑफ़ ग्रुप्स ने प्रारंभ की अपनी त्रैमासिक पत्रिका-द्रोण



विद्या निकेतन ग्रुप ऑफ़ स्कूल्स 
के बच्चों की निखारेगी प्रतिभा

कई समीपवर्ती जिलों का पहला ऐसा विद्यालय होने का दावा

विद्या निकेतन ग्रुप ऑफ़ स्कूल्स ने एक नयी पहल शुरू की है। शनिवार को संस्कार विद्या में आयोजित शिक्षक दिवस कार्यक्रम में त्रैमासिक पत्रिका द्रोण का विमोचन किया गया। जिले में यह अकेला ऐसा विद्यालय है जो नियत समयावधि की पत्रिका का प्रकाशन करने का एलान किया है। संस्थान का दावा है कि ऐसी पहल समीपवर्ती कई जिलों में विद्यालयों द्वारा नहीं की गयी है। एएसपी अभियान राजेश कुमार, एसडीएम अनीश अख्तर, एसडीपीओ राजकुमार तिवारी, पुलिस इंस्पेक्टर शम्भू यादव, सीएमडी सुरेश कुमार, पूर्व जिला परिषद अध्यक्ष पंकज पासवान, समाजसेवी डॉ. प्रकाशचंद्रा समेत नवोदय बारुण, डीएवी दाउदनगर समेत कई विद्यालय के प्राचार्य एवं शिक्षकों ने पत्रिका का सामूहिक विमोचन किया। संचालन संदीप कुमार ने किया। इस सत्र को विशेष बनाने के लिए राष्ट्रपति सम्मान से सम्मानित मार्कंडेय पांडेय ने अमीर खुसरो का कलाम-साधु भूखा भाव का धन का भूखा नाहीं। जो धन का भूखा वो साधु नाहीं- गाया। जिसे राष्ट्रपति अब्दुल कलाम आजाद के समक्ष भी प्रस्तुत किया था। एसडीपीओ राज कुमार तिवारी ने पत्रिका के नाम पर कहा-द्रोण पत्रिका धर्म की धुरी पर कायम रह कर अर्जुन जैसा शिष्य खड़ा करेगा।


विश्व के सबसे बड़े मैनपावर सप्लायर भारत-प्रकाशचन्द्रा
डॉ. प्रकाशचंद्रा ने कहा कि शिक्षा एवं चिकित्सा क्षेत्र का आज व्यवसायीकरण हो रहा है। सामाजिक कार्य दायित्व का निर्वहन कैसे किया जाता है, यह सुरेश सर से सीखना चाहिए। विश्व में सबसे बड़े मैनपावर सप्लायर बन गया है भारत। अरब की खाड़ी में अधिक मजदूर भारतीय हैं। जनसंख्या का दबाव है। चीन ने नियंत्रण किया। हमारे यहाँ इच्छाशक्ति का अभाव है। इसलिए इसमें असफल हैं। कहा कि विद्या निकेतन ग्रुप ऑफ़ स्कूल्स के सीईओ आनंद प्रकाश चुपचाप सामाजिक कार्य कर रहे हैं। लोगों को नौकरी दे रहे हैं। शिक्षा दे रहे हैं। 265 लोगों को इस संस्थान ने रोजगार दे रखा है।

तकनीक का इस्तेमाल सकारात्मक करें-एएसपी

एएसपी अभियान राजेश कुमार ने कहा कि बच्चों को नैतिक शिक्षा दें। तकनीक का इस्तेमाल सकारात्मक हो और देश के विकास में हो। कोई ऐसा कार्य न करें कि माता-पिता या गुरुजन को अपमानित होना पड़े। एसडीएम अनीश अख्तर ने कहा जोश, जज्बा और जुनून के साथ धैर्य होना सफलता के लिए आवश्यक है। एसडीपीओ राजकुमार तिवारी ने कहा कि यह पुरी सृष्टि सापेक्षित गति में हैं। कोई भी स्थिर नहीं है। जो स्थिर दिखाई देता है वह भी किसी के सापेक्ष गतिशील है। विद्या स्वतः ब्रह्म है और संस्कार जो धर्म की धुरी है। नियम में बंधेंगे तो जीवन चलेगा। लेकिन नियम में बंधने का मतलब किसी का गुलाम बनना नहीं है। यही धर्म है और संविधान में यही है। कहा कि गुरु अपने शिष्य को खोजकर निखारता है और शिष्य शिक्षक को खोजता है। नवोदय बारुण के प्राचार्य आरके सिंह, आरके झा, नंद जी दूबे एवं अन्य ने संबोधित किया।

पुरातन छात्रों को मिला-‘रमेश कुमार स्मृति सम्मान’
संस्थान की और से सीएमडी सुरेश कुमार गुप्ता एवं सीईओ आनंद प्रकाश ने विद्यालय के पुरातन छात्रों को ‘रमेश कुमार स्मृति सम्मान’ दिया। भगवान प्रसाद शिवनाथ प्रसाद बीएड कॉलेज के सचिव समाजसेवी डॉ. प्रकाशचंद्रा, जिला परिषद के पूर्व अध्यक्ष पंकज कुमार, न्यूटन कोचिंग के निदेशक डॉ. एसपी सुमन, चंदौली में चिकित्सा पदाधिकारी डॉ. धीरेंद्र कुमार, पूर्व उप मुख्य पार्षद वार्ड पार्षद कौशलेंद्र कुमार सिंहगायक मार्कण्डेय कुमार पांडेय, विजन के निदेशक अरविंद कुमार धीरज, सतीश कुमार, लेखक एवं पत्रकार उपेन्द्र कश्यप, मनीष कुमार, संतोष अमन, रवि मिश्रा, ओमप्रकाश कुमार, सांस्कृतिक पक्ष के निर्देशन के लिए कला प्रभा संगम के विजय चौबे, गोविंदा राज, मनोज मुस्कान, अंजन कुमार सिंह उर्फ़ विक्की को सम्मानित किया गया। इनके अलावा पत्रकार विपुल कुमार, संजय सिन्हा, शंभू शरण सत्यार्थी, अभय कुमार, सत्येन्द्र कुमार, दयानंद शर्मा एवं अन्य को भी सम्मानित किया गया।

Wednesday, 28 August 2019

जाति का बोध या गर्व कब, किसको, क्यों, जाग जाए वह भी नहीं जानता




"तुम ......, ...... कब से हो गयी? पढ़े लिखे लोग अधिक जातिवादी होते हैं, यह इसी कारण माना और कहा जाता है।"
ऊपर की पंक्ति, एक करीबी प्रोफेसर की बेटी को मेरे द्वारा भेजा गया निजी मैसेज है। नाम और जाति खाली जगह में दर्ज था। यहां डॉट डॉट है, क्योंकि जीवन भी रिक्त ही होता है, जिसमें समय के साथ अच्छाइयां और बुराइयां भरती जाती हैं। नाम कोई भी हो सकता है और जाति भी। वास्तव में हुआ यह कि इंजीनियरिंग की नौकरी कर रही इस बहन का फ्रेंड रिक्वेस्ट आया। तो चौक गया क्योंकि मैं उसे उसके नाम के आगे कुछ नहीं उसके स्कूल में देखा-सुना था। वह बड़े स्कूल की सफल छात्रा थी, आज अच्छे पैकेज पर नौकरी कर रही है। चौंकने का कारण उसके नाम के साथ लगा जाति था। अब उसने मैसेज के जवाब में कारण नहीं बताया, बस इतना पूछा-आप पहचान लिए भैया। मन में यह सवाल उठा कि क्या नौकरी के समय उसे जातीय श्रेष्ठता का बोध हुआ, या कार्यस्थल के माहौल के कारण उसे कोई मजबूरी हुई, क्या वजह रही होगी? मैं स्वयं से तय नहीं कर पा रहा हूँ। लेकिन अपने कहे इस विचार पर और अडिग होने का अवसर जरूर मिला। मैं यह कई बार कहता रहा हूँ कि जाहिल, कमअक्ल, निरक्षर, गरीब और कमजोर आदमी जातिवाद नहीं करता। वह जातिवादी नहीं होता। उसे बहकाया जाता है जब-तब। जब रोटी-रोजी की मजबूरी होती है तभी वह जातिवाद करता है। अन्यथा संबन्ध के अलावा वह कभी जाति के फेर में नहीं रहता। राजनीति में भी जाति नीचे तक बरगलाने, बहलाने और प्रेरित करने के कारण ही प्रभावित करती है। इसके उलट पढ़े लिखे लोग जाति को पेशेवर लाभ के लिए इस्तेमाल करते हैं। चाहे वह डॉक्टर हो, इंजिनियर हो, प्रोफेसर हो, व्यवसायी हो, या राजनीतिज्ञ हो। वह जाति का इस्तेमाल अपने लाभ के लिए करता है।
निदा फाजली का एक शेर स्मरण हो आता है-
"बच्चों के छोटे हाथों को चाँद सितारे छूने दो।
चार किताबें पढ़ कर ये भी हम जैसे हो जाएँगे।" 
वाकई शिक्षा ही सामाजिक समस्या की जड़ में है। इस कारण शिक्षा नीति को बहस का मुद्दा बनाया जाना चाहिए। खैर, यहां मुद्दा जातिवाद है।
इस आलेख को लिखते वक्त, एनडीटीवी पर रवीश कुमार को देख-सुन रहा हूँ। वाहनों पर जाति लिखने का विश्लेषण कर रहे हैं वो। वाहनों पर गुर्जर, यादव, ब्राह्मण, राजपूत, प्रजापति जैसे जाति बताते शब्द लिखे हैं। बेचारे रविश भी इसका कारण अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट नहीं बता सके। मैं तो फिर भी मुफ़स्सिल का पत्रकार हूँ। खैर, भारतीय समाज जातियों में विभाजित है। परत दर परत जाति। जाती के भीतर जाति। जिसे हम पारिछ कहते, समझते हैं। वर्ग के बाद जाति और उसके बाद जाति में उप जाति या पारिछ का खांचा। विभाजन इतने स्तर पर है कि उसे खत्म करना मुश्किल है। मैं दिल से कहता हूँ, गांठ बांध लीजिये-जाति कभी खत्म न होने वाली सच्चाई है। और जातिवाद का विरोध हमेशा चालाक लोग करते हैं, जो इसका इस्तेमाल अपने लाभ के लिए करते हैं और दूसरे को जातिवादी बताते हुए तीखी आलोचना करते हैं। आज जातिवाद का विरोध वही कर रहे हैं, जो ऐसा करते हुए सर्वाधिक लाभ लेते रहे हैं, ले रहे हैं। जो अब लेना चाहते हैं वे पहले वालों को खटकते हैं। 
इस झांसे में आने की जरूरत नहीं कि अमुक व्यक्ति जातिवाद विरोधी है। मैं एक डॉक्टर के पास गया था। हो गए कई बरस। घर पहुंचा तो घर से अति व्यस्त दिखते हुए डॉक्टर साहब निकल रहे थे। मुझे उनको दिखाना नहीं था, बीमार नहीं था मैं, बस गप्पें मारने गया था। बोले-आज समय नहीं है भाई। सम्मेलन में जाना है। जातीय सम्मेलन का आयोजन उसी दिन था और उनको देर हो रहा था। इस सम्मेलन में उस जाति के सभी नामचीन बुलाये जाते हैं और वे पहुंचते हैं। चाहे वे किसी दल के हों, किसी पेशे में हों। किसी सरकारी ओहदे से सेवानिवृत्त हुए हों। और हां, सबका उद्देश्य एक ही होता है, जाति को मजबूत करना। जुटाए गए बड़े पढ़े लिखे, ओहदेदारों, विशेषज्ञ पेशेवरों और अधिकारियों को इस बात के लिए प्रेरित करना कि अपनी जाति के लोगों से सहानुभूति रखो, उनका काम प्राथमिकता के आधार पर करो, संभव हो तो अधिक से अधिक सरलता से, थोड़ा कम पैसे लेकर काम करो। इसकी प्रेरणा सबको दी जाती है। अब इसमें कोई पीछे रहना नहीं चाहता। सब एक दूसरे से इस होड़ में आगे निकलने को बेताब हैं। बेचैनी से इस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। जातिवाद पर कई तरह के आलेख, किताब और खबर आपको पढ़ने, देखने को मिलेंगे। मिलते हैं। समस्या यह है कि जाति विहीन भारतीय समाज की कल्पना नहीं की जा सकती। हकीकत यही है कि भारत में कोई भारतीय नहीं रहता। यहां धार्मिक आधार पर बंटे लोग रहते हैं, जाति को कस कर पकड़े लोग विभिन्न खांचों में बंटे लोग रहते हैं। कोई भारतीय नहीं रहता। 

और अंत में:-
साक्षी मिश्रा और अजितेश (दलित) के बच्चे को किस जाति का प्रमाण पत्र बनाएगा शासन-प्रशासन?
इस निकष पर आप राहुल गांधी, और उनसे पहले उनके पिता राजीव गांधी को किस जाति का सर्टिफिकेट मिलेगा? आप तय करिये। जनेऊधारी बताने से यदि कोई जनेऊधारी सनातनी हिन्दू हो जाये तब तो धर्म परिवर्तन की तरह जाति-परिवर्तन का भी सिलसिला चल पड़े। कम से कम हिन्दू सामाज में जाति बदलने की कोई सुविधा सामाजिक और कानूनी तौर पर नहीं है। हां, धर्म आसानी से बदल सकते हैं आप। जाति जन्मना होती है। कर्मणा नहीं। धर्म ग्रंथो के बहाने जाति को कर्मणा बताने वाले सच छुपा कर आपको भ्रमित करते हैं। अपना उल्लू सीधा करते हैं। बचिए ऐसे लोगों से। सच यही है जाति जन्म से तय होती है कर्म से नहीं। वरना साक्षी और अजितेश हों या राहुल- राजीव-सोनिया, इंदिरा-फिरोज। इनको लेकर जाति का विवाद और बखेड़ा, कोर्ट और समाज, राजनीति का प्रवेश नहीं होता। किसी को पहनावे के ऊपर जनेऊ पहन कर खुद को जनेऊधारी बताने की भला क्या आवश्यकता पड़ती। यदि जाति जन्मना नहीं कर्मणा होती तो?