Thursday, 17 September 2026

जिउतिया लोकोत्सव के लिए सरकार ने दिए तीन लाख लेकिन..

 


नगर परिषद में प्रथम दिन प्रशासनिक आयोजन 

बाद के तीन दिन का कार्यक्रम नप के जिम्मे

निबंधन कराये कलाकारों को ही मिलेगा आर्थिक लाभ 

उपेंद्र कश्यप

नबिटा संवाददाता 

दाउदनगर (औरंगाबाद) । मुख्य पार्षद अंजली कुमारी के प्रयास से पहली बार सरकार ने जिउतिया लोक उत्सव के लिए तव्वन लाख रुपये की राशि आवंटित किया है। लेकिन राशि आवंटित होने के साथ ही कई मुश्किलें और समस्याएं भी सामने खड़ी हो गई है। राशि मिलते ही सवाल खड़ा हुआ है कि इस राशि को खर्च कौन करेगा, कैसे और किस मद में खर्च करेगा। इसमें प्रशासन और नगर निकाय की भूमिका क्या होगी। इस प्रश्न के जवाब में मुख्य पार्षद अंजली कुमारी ने कहा कि यह कला संस्कृति पदाधिकारी बताएंगे। कला संस्कृति पदाधिकारी पप्पू कुमार बताते हैं कि नगर परिषद में पहले दिन का आयोजन प्रशासनिक स्तर पर होगा। शेष तीन दिन का आयोजन नगर परिषद करेगा। पहले दिन जो कार्यक्रम होगा उसमें जिला पदाधिकारी के स्तर से जनप्रतिनिधियों को आमंत्रित किया जाएगा। यानी जिले के सभी सांसद, विधायक, विधान परिषद सदस्य, और अन्य


जनप्रतिनिधियों को आमंत्रित किया जाएगा। इस दिन जो कला प्रस्तुतियां होंगी। कुल प्रस्तुतियों में चयनित प्रतिभागियों को पुरस्कृत करने की जिम्मेदारी नगर परिषद की नहीं बल्कि प्रशासनिक महकमे की होगी। समस्या यह आएगी कि बिहार सरकार की कला संस्कृति विभाग के वेबसाइट पर जो निबंधित कलाकार होंगे, सिर्फ वे ही इस आयोजन का लाभ ले सकते हैं। पहली बार इस तरह का अनुभव दाउदनगर को होगा। इसका भविष्य में क्या नफा नुकसान स्थानीय संस्कृति के संदर्भ में होगा यह आकलन करने में वक्त लगेगा।


नई पीढ़ी तक पहुंचेगी विरासत


नगर परिषद की मुख्य पार्षद अंजली कुमारी ने इस प्रसंग में कहा कि राशि का आवंटन होना दाउदनगर वासियों के लिए हर्ष और गौरव का विषय है। यह राशि हमारे पारंपरिक लोक उत्सव को और भव्य एवं व्यवस्थित रूप देने में सहायक होगी तथा हमारी सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।



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Saturday, 12 September 2026

क्षेत्र को चमन बनाने के लिए चाहिए सिर्फ रोशनी

 



मुख्यपथ से सिपहां और बम रोड तक चाहिए स्ट्रीट लाइट 

बीमार, तीमारदार, लोगों के लिए आवश्यक रास्ता

नबिटा संवाददाता 

दाउदनगर (औरंगाबाद) । दाउदनगर बाजार से भखरुआं जाने वाले मुख्य पथ स्थित मौला बाग से नहर के किनारे उत्तर और दक्षिण दिशा में अगर स्ट्रीट लाइट लग जाए तो यह इलाका चमन बन जाएगा। फिलहाल नहर के किनारे का यह मार्ग अंधेरे में डूबा हुआ है। लोगों को इस रास्ते आने जाने में डर लगता है, जबकि यह प्रमुख मार्ग है। अपराध की घटनाओं के डर के कारण लोग इस रास्ते अंधेरा में आना-जाना नहीं पसंद करते हैं। दूसरी तरफ सुखा नशा करने वालों से भी डर बना रहता है, जबकि सिपहां मार्ग में नर्सिंग कॉलेज और अनुमंडल अस्पताल जैसे प्रमुख संस्थान है। जहां देर रात लोगों की आवाजाही आवश्यक मजबूरी होती है। इसी रास्ते में प्रखंड सह अंचल समेत कई प्रखंड स्तरीय कार्यालयों का एक दरवाजा भी है। ऐसे में इस रास्ते में स्ट्रीट लाइट लगाए जाने की आवश्यकता महसूस होती है। दूसरी तरफ बम रोड की तरफ भी आबादी बस गई है। इधर आवागमन होते रहता है। अगर इस हिस्से में स्ट्रीट लाइट लगा दी जाए तो लोग भय मुक्त होकर आवागमन कर सकेंगे। सुबह और शाम की तफरीह कर सकेंगे। जिससे लोग स्वास्थ्य लाभ ले सकेंगे। 


योजना लेकर होगा क्षेत्र रौशन- डॉ. प्रकाशचंद्र

इस संबंध में इस संवाददाता ने विधायक डॉ प्रकाश चंद्र को प्रस्ताव दिया तो उन्होंने कहा कि योजना लेकर काम कराया जाएगा। दोनों रास्तों को जगमग रोशन किया जाएगा। संसाधनों की उपलब्धता के आधार पर काम किया जाएगा। 



प्रदूषण मुक्त क्षेत्र, मरीज को जरूरत


नव ज्योति शिक्षा निकेतन के निदेशक नीरज कुमार गुप्ता कहते हैं कि ओबरा विधायक डॉ प्रकाश चंद्र का स्वभाव ऐसा है कि वे इस काम को अवश्य करेंगे। अगर रोशनी लग जाती है तो लोगों के अंदर का डर खत्म हो जाएगा। लोग निर्भीक होकर शाम में घूम सकेंगे। शहर में बहुत बड़ी आबादी ऐसी है जो सुबह की जगह शाम को ही स्वास्थ्य लाभ के लिए तफरीह कर पाती है। इस रास्ते अनुमंडल अस्पताल जाने वाले मरीज और तीमारदार को भी लाभ होगा। 



स्वस्थ समाज बनाने के लिए जरूरी काम 

एलआईसी के अभिकर्ता अवधेश पांडेय कहते हैं कि लोगों को स्वास्थ्य लाभ मिले इसके लिए क्षेत्र का चयन कर उसे विकसित किया जाना आवश्यक है। विधायक अगर इस हिस्से में रोशनी की व्यवस्था कर देते हैं तो लोग सुबह शाम की तफरीह निर्भीक होकर कर पाएंगे। जिससे लोग स्वस्थ होंगे। इससे समाज और शहर दोनों स्वस्थ होगा और इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।

Thursday, 10 September 2026

सत्य निकेतन नहीं, सत्ता-सरकार की इमारत गिरी

 




टेढ़ी पालिटिक्स




दिल्ली में बिल्डिंग नहीं गिरी, भ्रष्टाचार की पोल खुली


डॉ. उपेंद्र कश्यप

वरिष्ठ लेखक व पत्रकार


दिल्ली में सत्य निकेतन बिल्डिंग गिर गई। आधे दर्जन लोगों की मृत्यु हो गई। राजनीति गर्मा गई। प्रशासन भवन मालिक को इसका दोष देकर उसके खिलाफ करवाई करने पर उतारू है। सवाल है कि क्या मकान मालिक ही सिर्फ दोषी है? क्या वास्तव में सत्य निकेतन गिरा है या फिर सत्ता सरकार का इकबाल गिरने का यह परिणाम है? क्या सत्ता प्रतिष्ठान अगर ईमानदारी से कम करे तो ऐसी घटनाएं होती रह सकती हैं? ऐसी घटनाएं पहले भी दर्जनों बार हुई है और आगे भी होंगी और ऐसे ही घटना क्यों सिर्फ बिल्डिंग गिरने से मौतें थोड़े ही होती हैं, भवनों में आग लगने से भी मौतें होती रही हैं। सवाल है कि इसका उपाय क्या है? क्या वास्तव में सत्ता प्रतिष्ठान कभी ऐसी घटनाएं न हो इसका ठोस उपाय करना चाहती हैं? ऐसी घटनाओं पर रोक लगे इसे लेकर क्या सरकारें कभी दृढ़ निश्चायी रही हैं, नहीं। दरअसल यह सत्य निकेतन नाम का एक बिल्डिंग गिरने और उससे कई मौतें हो जाने भर का बस मामला नहीं है। बिल्डिंग गिरती है तब भी भ्रष्टाचार होता है और बिल्डिंग में आग लगती है तब भी भ्रष्टाचार का ही वह परिणाम होता है। भ्रष्टाचार को समझने की जरूरत है। भ्रष्टाचार कैसे इन मौतों की जिम्मेदार होती है? भारत में शायद ही कोई ऐसा उदाहरण है कि जब भवन बन रहा हो और उसके निर्माण में धांधली ना हो। भले ही वह कोई एजेंसी करे, सरकार बनाए या व्यक्तिगत निर्माण ही क्यों ना हो। सक्षम अथॉरिटी से ना तो बिना रिश्वत के नक्शा पास होते हैं ना निर्माण की स्वीकृति मिलती है। न ही भवन बन जाने के बाद ऑडिट करने वाली संस्थाएं भौतिक सत्यापन करती हैं। वह बिना भौतिक सत्यापन किये ही, या कभी-कभी संबंधित भवन में भौतिक रूप से अधिकारी उपस्थित होकर भी सीधे निबंधन नियमितीकरण के लिए रिश्वत मांगते हैं। बिना रिश्वत लिए भवनों का निबंधन नियमितीकरण होता ही नहीं है। अब कोई ईमानदार हो और ऐसा वास्तव में बिना रिश्वत लिए पूरी तरह भौतिक सत्यापन करके एनओसी करता हो तो यह अद्भुत संयोग हो सकता है। भवनों में आग लगने पर मौतें ना हो इसके लिए अग्निशमन विभाग द्वारा जांच कर एक योजना के तहत सुरक्षा उपकरण लगाए जाते हैं, शायद ही कोई ऐसा भवन होगा और अग्निशामालय का अधिकारी जहां रिश्वतखोरी ना होती हो। बिना रिश्वत लिए किसी भवन का अग्निशमन विभाग एनओसी नहीं देता। भवनों में बिना गए, बिना देखे, बिना निरीक्षण किये अग्निशामालय विभाग के अधिकारी मोटी रकम लेकर एनओसी देते हैं, यह खुला सच है। कभी कभी बड़े पैरवी, सामने वाले कि पहुंच व दबंगता के भय भी वजह होती है। लेकिन इस पर नियंत्रण नहीं किया जाता। सरकार इस दिशा में विचार नहीं करती और इसीलिए भवन गिरते हैं। मौतें होती हैं। 


अगर वास्तव में सरकारी चाहती है, चाहे वह केंद्र की सरकार हो या राज्य की, कि किसी भवन में आग लगने से मौत ना हो, कोई भवन ध्वस्त ना हो, उसके गिरने से मौत ना हो तो उसके लिए जिम्मेदारी तय करनी होगी। संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय करनी होगी। ऐसा करना बहुत मुश्किल वाला या बड़ा काम नहीं है, जिसे किया नहीं जा सकता। बस सत्ता प्रतिष्ठानों के दृढ़ निश्चायी होने भर का मामला है। यह कानून होना चाहिए कि अगर कोई भवन ध्वस्त होता है, किसी भवन में आग लगती है, जैसे सत्य निकेतन का ही मामला ले लें बतौर उदाहरण तो, सत्य निकेतन भवन का निर्माण क्या नक्शा के अनुसार हुआ है, क्या उसमें आग लगने, भुकंप आने पर ध्वस्त होने से मौत न हो इसके सुरक्षा उपाय मानक के अनुरूप हैं, इसकी जांच होनी चाहिए। अगर इसमें कमी पाई जाती है तो नक्शा पास करने वाले (अगर वह सेवानिवृत्त हो गया हो तो उसके पेंशन से, उसकी अर्जित संपत्ति से) से, उसके निर्माण में गड़बड़ी होने या रहने के बावजूद भवन को असुरक्षित घोषित न करने वाले जिम्मेदार अधिकारी, अग्नि सुरक्षा के लिए ज़िम्मेदार अधिकारी अर्थात निबंधन नियमितीकरण दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने वाले अधिकारी पर हत्या का मुकदमा दर्ज हो और जितनी भी क्षति हुई उसकी भरपाई उनके वेतन से किया जाए। यह संवैधानिक व्यवस्था होनी चाहिए। जब ऐसा होगा तो तय जानिए भविष्य में कभी भी बिल्डिंग नहीं ध्वस्त होगी, आग नहीं लगेगी, ऐसी घटनाओं में होने वाली मौत टाली जा सकेंगी। रिश्वत लेकर गलत होने के बावजूद सही लिखने, बताने वाले अधिकारी अधिक दोषी हैं, बनिस्पत मकान मालिक के।  जब ऐसे नियम बनेंगे, ऐसी कानूनी व्यवस्था होगी तो पैसा लेना तो छोड़िए मांगेंगे भी नहीं अधिकारी। यह नियम होना चाहिए कि अगर नियमितीकरण के लिए कोई मकान मालिक आवेदन देता है तो उसे 15 दिन या 30 दिन के अंदर (जो भी प्राविधान हो) संबंधित अथॉरिटी को लाइसेंस के नियमितीकरण का मामला निपटाना होगा। कारण बता कर उसे खारिज करे या स्वीकार करे। ऐसा होने पर रिश्वत लेनदेन का मामला कम होगा। अगर कोई रिश्वत के लिए जबरदस्ती कोई कमी निकाले तो उस तरह के अधिकारी के खिलाफ भी सख्त कार्रवाई का प्रावधान होना चाहिए। जब तक अधिकारी ब्लैकमेल करते रहेंगे, पैसे लेकर निबंधनों का नियमितीकरण करते रहेंगे, भवन गलत तरीके से बनते रहेंगे, तब तक ऐसे हादसे होते रहेंगे और मकान मालिकों को पकड़ कर जेल भेज देने से कोई समस्या का समाधान नहीं होगा। यह लिखने का उद्देश्य सही मुद्दे उठाना, सत्ता को स्थिति का भान कराना और भविष्य में ऐसी दुर्घटना ना हो यह तय करवाना है ना कि किसी मकान के मालिक को बचाना या उसका पक्ष रखना।


 (लेखक का निजी विचार है)

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Wednesday, 2 September 2026

रामबिलास सिंह की प्रतिमा लगाने का एमएलए ने दिया भरोसा

 


यदुवंशी संवाद में लोगों ने उठाया मुद्दा

बड़े जलसा के साथ होगी प्रतिमा प्रतिस्थापित

नबिटा संवाददाता

दाउदनगर (औरंगाबाद) ।

भगवान प्रसाद शिवनाथ प्रसाद बीएड कॉलेज में सोमवार को आयोजित यदुवंशी संवाद कार्यक्रम में कई वक्ताओं ने पूर्व मंत्री रहे रामबिलास सिंह की प्रतिमा जिला मुख्यालय में लगाने की मांग की। कहा गया कि उनकी प्रतिमा ‘कारा में बंद’ कर रखा जाना दुर्भाग्यपूर्ण है। ऐसी मांगों पर विधायक डॉ. प्रकाशचंद्र ने आश्वस्त किया कि प्रतिमा पुनर्स्थापित की जाएगी। कार्यक्रम के दौरान पूर्व विधायक सत्यनारायण सिंह ने इस मुद्दे को उठाते हुए विधायक के इशारे पर कहा कि प्रतिमा स्थापित होगी। हम डॉ. प्रकाशचंद्र की ताकत जानते हैं। पीछे हम खड़ा हैं ही। पूर्व अध्यक्ष राजद ओबरा इंदल यादव व पूर्व जिप सदस्य संजय सिंह सोम ने जिला मुख्यालय में रामबिलास सिंह की प्रतिमा न लग सकने का मुद्दा उठाया। श्री सोम ने कहा कि बड़े जलसा के साथ उनकी प्रतिमा लगेगी। यह दुर्भाग्य है कि कारा मंत्री रहे रामबिलास बाबू की प्रतिमा कारा में बंद है। कहा गया कि सर्वाधिक संख्या में यादव समाज के जिला परिषद के सदस्य हैं, इसके बावजूद ऐसी स्थिति होना दुर्भाग्यपूर्ण है। इंदल या

दव ने बताया कि दिशा की बैठक समेत हर अवसर पर डॉ. प्रकाशचंद्र ने इस मुद्दे को उठाया। प्रतिमा स्थापित करना इनका लक्ष्य है। इस आयोजन के बाद स्व.रामबिलास सिंह की प्रतिमा लगने की उम्मीद जगी है। 


क्या है प्रतिमा को ले विवाद


औरंगाबाद का दानी बिगहा पुराना बस स्टैंड सह-व्यावसायिक परिसर है। इसी के एक हिस्से में पहले से सत्येंद्र नारायण सिन्हा पार्क और उनकी प्रतिमा लगी है। 08 जनवरी 2023

 को जिला परिषद की सामान्य बैठक में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित हुआ था। 06 नवंबर 2024 को समर्थकों ने परिसर में बने फाउंडेशन पर रामबिलास बाबू की आदमकद प्रतिमा स्थापित कर दी।   0 8 नवंबर 2024 की रात तत्कालीन उप विकास आयुक्त अभ्येंद्र मोहन सिंह के आदेश पर प्रशासन ने प्रतिमा को हटाकर नगर थाना में रखवा दिया।   

12 नवंबर 2024 को जिला पार्षदों और "विरासत बचाओ संघर्ष परिषद" ने प्रेस वार्ता कर 15 दिन में प्रतिमा यथास्थान लगाने का अल्टीमेटम दिया। लेकिन मामला लटका ही रह गया। 




जानिए कौन थे रामविलास सिंह 

स्व.राम बिलास सिंह 1967, 1972, 1977, 1985 और 1990 में विधायक बने। वह दाउदनगर हसपुरा और दाऊद नगर ओबरा विधानसभा क्षेत्र से विधायक रहे। तीन बार मंत्री बने। वे समाजवादी नेता रहे। उन्होंने इस संवाददाता से 11 अप्रैल 2009 को बातचीत में बताया था कि अपना पहला चुनाव मात्र 3000 रुपये में लड़े थे और 1990 के चुनाव में मात्र छः से सात हजार रुपये खर्च कर विधायक बने थे। उन्होंने कहा था कि सामाजिक एवं आर्थिक सुधार के बिना समाज नहीं बदल सकता। 


Saturday, 29 August 2026

संसद, संविधान व बहुसंख्यक को ठेंगा दिखा रहे राहुल




(टेढ़ी पॉलिटिक्स)


वंदेमातरम और मनुस्मृति को लेकर जो स्टैंड राहुल गांधी और कांग्रेस ने लिया है वह संसद और संविधान की सर्वोच्चता के साथ बहुसंख्यकों की भावना को ठेंगा दिखाने के समान है। दरअसल में ‘सर तन से जुदा करने’ और “छह इंच छोटा करने” वाले समूह इनके साथ खड़े हैं, तब भी इनका डर उन्हें तटस्थ नहीं होने देता। दूसरी तरफ बहु संख्यक समाज की ओर से ऐसे हमले ना होने का विश्वास ऐसे नेताओं को उच्छृंखलता की हद तक निर्भिक बनाता है। इस पूरे संदर्भ में एक विश्लेषण- डॉ. उपेंद्र कश्यप का।)


डॉ. उपेंद्र कश्यप

वरिष्ठ लेखक व पत्रकार

मो.नं.-9931852301

ईमेल- upendrakashyapdnr@gmail.com 


संवैधानिक प्रविधान होने के बावजूद वंदे मातरम के सभी छह छंद गाने से स्पष्ट तौर पर इंकार करने और छात्रों की गूंज कार्यक्रम में सर से पांव तक ढकी मुस्लिम महिला के सामने ही मनुस्मृति के हवाले से हिंदू महिला प्रताड़ना की बात कर राहुल गांधी एक बार फिर भाजपा के पीच पर बैटिंग कर बैठे। हर हाल में इन दोनों मुद्दों का लाभ भाजपा और उसके गठबंधन साथियों को मिलेगा। जबकि इसका राजनीतिक नुकसान हर हाल में कांग्रेस और उसके गठबंधन में शामिल दलों को होगा। यह स्पष्ट है। दूसरे मुद्दे इसकी भरपाई कर जाएं तो बात और होगी। दरअसल इन दोनों मुद्दों को जिस तरह से कांग्रेस और राहुल गांधी ने सामने रखा उससे एक बात स्पष्ट हो गई है कि पार्टी हो या व्यक्ति, दोनों ही मुस्लिम परस्त हैं। इसके प्रमाण के तौर पर यह भी देखें कि 2014 के लोकसभा चुनाव में बुरी तरह हारने और उसके बाद एके एंटनी की रिपोर्ट सामने आने के बावजूद कांग्रेस सबक सीखने को तैयार नहीं दिखती। वह मुस्लिम तुष्टिकरण करने और हिंदू परंपराओं को चोटिल करने के मौके से बाज आने को तैयार कतई नहीं है। 


वर्ष 2014 के चुनाव परिणाम को अगर देखें तो वैश्विक स्तर पर इस्लामिक स्टेट धार्मिक कट्टरता के कारण नारंगी कपड़ा पहनकर लोगों की गर्दन रेत रही थी, पिंजरे में बंद कर जलाकर मार दे रही थी, जिससे पूरे विश्व में खौफ पैदा हो गया था। कट्टरपंथ को लेकर विश्व चिंतित था, उस बीच भारत में मनमोहन सरकार के कुछ मुस्लिम परस्त निर्णय सामने आए और लोगों को यह लगा कि कांग्रेस न सिर्फ मुस्लिम परस्ती में व्यस्त है बल्कि उसे किसी भी स्तर पर हिंदू और सनातन परंपराओं को अपमानित करने से परहेज नहीं है। नतीजा वराह 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा अकेले बहुमत से अधिक कुल 282 सीट जीती तो कांग्रेस मात्र 44 पर सिमट गई। पार्टी ने अपने ही वरिष्ठ नेता एके एंटनी के नेतृत्व में चुनावी हार की समीक्षा के लिए कमेटी का गठन किया। कमेटी ने अपने रिपोर्ट में बताया कि कांग्रेस की इस सबसे बुरी हार की वजह मुस्लिम परस्त और हिंदू विरोधी होना प्रमुख कारण है। हालांकि इसके बावजूद कांग्रेस और उसके नेताओं पर कोई असर नहीं पड़ा। हार की जो सबसे बड़ी वजह एंटनी ने बताएं उसे ही खारिज कर दिया। उसी रास्ते पर तक चलते रहे। नतीजा 2019 में भाजपा 303 और कांग्रेस 52 सीट जीती। कांग्रेस ने फिर सॉफ्ट हिंदुत्व का रास्ता अपनाया और जनहित से जुड़े मुद्दों को उठाना शुरू किया। संविधान बदलने की एक भाजपा नेता के बयान को चुनाव में हथियार की तरह संविधान लहराते हुए राहुल ने इस्तेमाल किया। तब 2024 में भाजपा को 240 सीटों पर रोकने में कामयाबी मिली और कांग्रेस को 99 सीट मिली। माना गया कि कांग्रेस को मुस्लिम परस्ती और हिंदू सनातन विरोध की बात छोड़कर लगातार आगे बढ़ते रहने से कामयाबी मिलेगी। लेकिन राहुल इस बात को भूल जाते हैं। क्योंकि उसके जिन में ही जैसे सनातन विरोध, हिंदू विरोध और मुस्लिम परस्ती की बीमारी समा गई है। कांग्रेस कहती है कि वह अपने कार्यक्रमों में वंदे मातरम के दो छंद ही गायेगी, तो सीधा-सीधा वह संसद द्वारा बनाए गए संविधान ना मानने का उदंडता से ऐलान करती है। जिसे कोई भी भारतीय स्वीकार नहीं करेगा। जब यह कानून बन रहा था तब सदन में विरोध न करने वाली कांग्रेस अब इसका विरोध कर रही है तो स्वाभाविक है कि वह मुस्लिम परस्ती के मामले में तनिक भी उदार नहीं दिखना चाहती है। छात्रों के गूंज कार्यक्रम में सर से पांव तक लबादा ओढ़ी युवती के सामने मनुस्मृति का हवाला देकर जो बात राहुल ने कही वह भी इसी का उदाहरण है। तमाम इस्लामिक देशों में ही नहीं बल्कि इस्लाम के मानने वाले इक्के दुक्के लोगों को छोड़कर तमाम आबादी में व्यवहारिक जीवन में अमल में लाने वाली किताबी बात पर चर्चा करने का साहस न रखने वाले कांग्रेसी उस मनुस्मृति के एकाधिक श्लोक की चर्चा करते हैं जो शायद ही किसी परिवार में माना जाता हो। मनुस्मृति की ऐसी बातें कहीं लागू है, इसके उदाहरण भी नहीं मिलते। किसी भी हिंदू परिवार और समाज में मनुस्मृति लागू नहीं है, और ना ही उसमें कही गई उस बात पर अमल होता है जिसे राहुल लेकर आगे बढ़े। हालांकि मनुस्मृति में जो अच्छी बातें कही गई है इसका उल्लेख राहुल नहीं करते और किसी भी गैर हिंदू धर्म ग्रंथो में उल्लेखित गलत बातों का उल्लेख राहुल या कांग्रेस के नेता नहीं करते। इससे यह साफ संदेश जाता है वह हिंदू और सनातन परंपराओं को अपमानित करने का मौका ढूंढते हैं, अवसर बनाते हैं।


 वह समझते हैं कि ऐसा करने से मुस्लिम उनके साथ चिपका हुआ रहेगा। दूसरी बात यह स्पष्ट है कि दूसरे धर्म को लेकर राहुल ही नहीं कोई भी कांग्रेसी और आई एन डी आई ए के नेता या दल इसलिए चुप रहते हैं कि उनका सर तन से जुदा हो जाने का खतरा है। लेकिन इस पृथ्वी पर अपेक्षाकृत सबसे उदार, सबसे सहिष्णु और सहजीवन में सर्वाधिक विश्वास रखने वाला हिंदू ऐसा नहीं करता। भारत में छह इंच छोट करने वाला और यह बात कह कर गरीबों, कमजोरों को डराने वाला राजनीतिक समूह आई एन डी आई ए का हिस्सा है। सर तन से जुदा करने वाला समूह इसी गठबंधन का हिस्सा है। दूसरे धर्म की कुरीतियों, बुरी बातों, बुरे निर्देशों, खराब परंपराओं, गलत मान्यताओं पर जुबान ना खोलने की कसम खा चुका नेता और दल हिंदुओं को, सनातनियों को अपमानित करते रहता है। इसलिए कि उसे पता है कि हिंदुओं को, सनातनियों को चाहे जितनी गालियां दो, वह न तो तन सर से जुदा करेगा और ना छह इंच छोट करेगा। इसी कारण ऐसे नेता बेखौफ अपमानित करते हैं। थोड़ी देर के लिए मान लें कि मनुस्मृति में पिता ,पति और पुत्र के अधीन स्त्री को रहने की बात कही गई है तो क्या कोई बता सकता है कि मनुस्मृति की यह बात लागू कहां है? कैसे लागू है ?कहां यह अनिवार्य है? जब यह विचार कहीं अनुकरणीय ही नहीं है, कहीं लागू ही नहीं है, कहीं बाध्य नहीं है, कहीं अमल में नहीं है तो फिर इस मुद्दे को बार-बार उठाकर हिंदुओं को अपमानित करने उसे उकसाने के अलावा कौन सा लक्ष्य हासिल हो सकता है? दूसरी तरफ औरतों को लेकर घृणा के स्तर तक बातें कहने वाले धर्म, समुदाय, समूह के साथ खड़े ही नहीं हैं, बल्कि किसी भी तरह के सुधार की बात वहां नहीं की जाती। इसलिए राहुल गांधी एक साथ संसद और संविधान की सर्वोच्चता को खारिज कर रहे हैं तो वहीं दूसरी तरफ मनुस्मृति के बहाने देश की बहुसंख्यक आबादी की भावनाओं को तार तार कर रहे हैं। ऐसी स्थिति में 2027 हो या 2029 में चुनावी जीत का अगर कांग्रेसी और राहुल सपना देख रहे हैं तो शायद हकीकत के सामने आंख मूंद कर खड़े दिखते हैं। 


दरअसल, कांग्रेस लंबे समय से अल्पसंख्यक, सवर्ण और अनुसूचित जाति समूहों को अपने व्यापक गठबंधन का हिस्सा मानती रही है। उससे सवर्ण छिटके, अनुसूचित जाति समूह छोड़ गया। अब सिर्फ सर्वाधिक संख्या में मुस्लिम मतदाता उससे चिपके हुए हैं। कांग्रेस के लिए अभी भी वह महत्वपूर्ण हैं। मुस्लिम वोट खोने का डर उसे सताते रहता है। उसके सामने एक वास्तविक समस्या है। यदि वह मुस्लिम मुद्दों पर बहुत पीछे हटती है तो उसे मुस्लिम मतदाताओं के दूसरी पार्टियों, विशेषकर क्षेत्रीय दलों या एआईएमआईएम की ओर जाने का खतरा है। इसी संदर्भ में कांग्रेस नेताओं की बेचैनी को देखा जाना चाहिए। कांग्रेस की मुस्लिम-केंद्रित राजनीतिक छवि बढ़ने से उसे व्यापक हिंदू मतदाताओं के बीच नुकसान हो सकता है। इससे बेखबर रहना शायद कांग्रेस की आवश्यक विवशता बन गयी है। 



#वंदेमातरम और #मनुस्मृति को लेकर जो स्टैंड #राहुल_गांधी और #कांग्रेस ने लिया है वह #संसद और #संविधान की सर्वोच्चता के साथ बहुसंख्यकों की भावना को ठेंगा दिखाने के समान है। दरअसल में ‘सर तन से जुदा करने’ और “छह इंच छोटा करने” वाले समूह इनके साथ खड़े हैं, तब ही इनका डर उन्हें तटस्थ नहीं होने देता। दूसरी तरफ बहु संख्यक समाज की ओर से ऐसे हमले ना होने का विश्वास ऐसे नेताओं को उच्छृंखलता की हद तक निर्भिक बनाता है। इस पूरे संदर्भ में एक विश्लेषण- डॉ. उपेंद्र कश्यप का।)


संसद, संविधान व बहुसंख्यक को ठेंगा दिखा रहे राहुल,टेढ़ी पॉलिटिक्स

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Friday, 28 August 2026

काराकाट : पवन ना होते तो क्या राजाराम सिंह जीत जाते



उपेंद्र कुशवाहा के हारने की वजह बन थे पवन सिंह 

राजाराम सिंह के दावे के बाद कर काराकाट चर्चा में 


डॉ.उपेंद्र कश्यप 

नबिटा संवाददाता 

दाउदनगर (औरंगाबाद) । 2024 के लोकसभा चुनाव में अपनी जीत पर सांसद राजाराम सिंह ने दावा किया है कि यदि पवन सिंह चुनाव नहीं लड़ते तो उनकी जीत का अंतर दो लाख वोटों का होता। तब वे चुनाव आयोग के आंकड़े के अनुसार  105858 वोटों के अंतर से जीते थे। उन्होंने अब कहा है कि-जिस दिन टिकट मिला, उसी दिन जीत तय हो गई थी। काराकाट में महागठबंधन की जमीन पहले से मजबूत थी। इंडिया गठबंधन की लहर थी। सामाजिक न्याय से जुड़े आंदोलनों का भी जिक्र उन्होंने अपने नए दावे के साथ किया है। यह उनका राजनीतिक दावा है। चुनावी राजनीतिक प्रेक्षक हकीकत इससे अलग मानते हैं। पश्चिम बंगाल में प्रत्याशी घोषित होने के बावजूद चुनाव लड़ने से इनकार कर पवन सिंह जब काराकाट चुनाव लड़ने आए तभी यह मान लिया गया था कि अब यहां से भाकपा माले के प्रत्याशी की जीत तय है। किसी को कोई आशंका नहीं थी। इसके अलावा उपेंद्र कुशवाहा से नाराजगी चरम पर थी, जिसे वे समेटते, समेटते भी समेट न सके थे। अन्यथा इसके पहले के सभी चुनाव राजद या राजद के गठबंधन का प्रत्याशी चुनाव हारता रहा है। कुल चार चुनावों में पहली बार गैर भाजपा समर्थित प्रत्याशी चुनाव जीत सका है। 


इतिहास में तथ्यों का विश्लेषण राजग के साथ



2008 में परिसीमन के बाद काराकाट नाम से नया लोकसभा क्षेत्र अस्तित्व में आया था। पहला चुनाव वर्ष 2009 में हुआ था। इसके अलावा 2014 और 2019 में यहां से भाजपा के साथ गठबंधन वाले दल का ही प्रत्याशी जीतते रहा है। चाहे वह महाबली सिंह हों या उपेंद्र कुशवाहा। वर्ष 2009 में जदयू-भाजपा प्रत्याशी महाबली सिंह 196946 वोट लाकर जीते थे। जबकि कांति सिंह को 176463 वोट मिली थी। यानी 20483 वोट का अंतर था। तब भाकपा माले प्रत्याशी राजाराम सिंह को 37493 वोट मिला था। यानी राजद और माले का वोट जोड़ दें तो विजेता से मात्र 17010 वोट अधिक। 


■  2014 में जब चुनाव हुआ तब रालोसपा भाजपा के साथ थी। उपेंद्र कुशवाहा यहां 105241 वोट से राजद की कांति सिंह को हराने में सफल रहे। तब महाबली सिंह जदयू के प्रत्याशी थे। महत्वपूर्ण है कि तब नरेंद्र मोदी को लोकसभा चुनाव का प्रमुख चेहरा बनाए जाने के कारण भाजपा जदयू का गठबंधन टूट गया था। जदयू के प्रत्याशी महाबली सिंह को तब मात्र 76700 वोट मिला था। जबकि माले के राजा राम सिंह को 32686 वोट। राजद और माले का वोट अगर एक साथ जोड़ दें तब भी विजेता से 72555 वोट काम आया था। लेकिन अगर जदयू के महाबली सिंह को मिला 76709 वोट राजग के साथ जोड़ दें, जो स्वाभाविक है, क्योंकि अगर गठबन्धन न टूटता तो दोनों के वोटर एक साथ जाते, तब जीत का अंतर 149264 हो जाता। 


■  इसी तरह 2019 का चुनाव अगर देखें तो भाजपा और जदयू एक साथ हैं। महाबली सिंह काराकाट लोक सभा चुनाव के अब तक के इतिहास का सर्वाधिक 45.86 प्रतिशत मत लाकर 855442 वोट से जीत जाते हैं। तब आरएलएसपी, राजद और कांग्रेस का गठबंधन था। राजाराम सिंह भाकपा माले के प्रत्याशी थे। उनको 24932 वोट मिला था। राजद, कांग्रेस और भाकपा माले के वोट अगर जोड़ दें तब भी विजेता से 60610 वोट कम होता है। 


■  इसी तरह 2024 का चुनाव देखें तो राजद, कांग्रेस के साथ भाकपा माले का गठबंधन होता है, जो 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में ही हो चुका था। इसके प्रत्याशी राजाराम सिंह को 380581 वोट मिलता है। निर्दलीय पवन सिंह को 274723 यानी मात्र 105858 वोट का दोनों में अंतर है। जबकि उपेंद्र कुशवाहा जो राष्ट्रीय लोक मोर्चा, भाजपा व जदयू के संयुक्त प्रत्याशी थे, उनको 253876 वोट मिला था। पवन सिंह और उपेंद्र कुशवाहा को मिले वोट जोड़ दें तो राजाराम सिंह को मिले वोट से 148019 वोट अधिक है।


 इसलिए आंकड़े तो यही बताते हैं कि अगर पवन सिंह ना होते तो राजाराम सिंह संसद नहीं पहुंच पाते। बहरहाल राजनीति में सभी के अपने दावे होते हैं। आंकड़ों का विश्लेषण राजनीतिक दलों के दावे के अनुसार ही हो, यह आवश्यक नहीं है। 



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Friday, 21 August 2026

वास्तव में असली दिमागी नक्सली तो पी चिंदबरम ही हैं



टेढ़ी पॉलिटिक्स

डॉ. उपेंद्र कश्यप


◆ आंकड़ों व तथ्यों के साथ मुद्दे को समझिये ◆



(■ #15अगस्त को लाल किले के प्राचीर से संबोधित करते हुए #प्रधानमंत्री #नरेंद्रमोदी ने दिमागी नक्सलियों की पहचान कर उन्हें अलग-थलग करने का आह्वान किया। इसके बाद देश में एक तरह का वैचारिक तूफान खड़ा हो गया। सबसे पहले भारत सरकार के #गृहमंत्री रहे कांग्रेस के दिग्गज नेता पी.चिंदबरम ने कहा कि - “मैं दिमागी नक्सली होने पर गर्व महसूस करता हूं।’ सवाल है कि क्या वास्तव में वह दिमागी नक्सली के झंडा बरदार नहीं हैं? इसी मुद्दे का विश्लेषण कर रहे हैं वरिष्ठ लेखक व पत्रकार डॉ. उपेंद्र कश्यप।■)



#अर्बन_नक्सल के बाद अब दिमागी नक्सली शब्द चर्चा में है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहली बार इस शब्द का इस्तेमाल स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर लाल किला में ध्वजारोहण करने के बाद संबोधन करते हुए किया। उनके द्वारा इस शब्द का इस्तेमाल किए जाने के बाद देश में वैचारिक बहस तेज हो गई। अर्बन नक्सल शब्द से चीढ़ने वाले नेता खासकर इस मुद्दे को लेकर काफी आगे बढ़े। इसमें झंडाबरदार की भूमिका में अगर कहें तो पी.चिंदबरम नजर आए। वे देश के गृह मंत्री रहे हैं और उन्होंने स्वयं यह घोषित किया कि- दिमागी नक्सली होने का उन्हें गर्व है। क्या वास्तव में वह सच नहीं कह रहे? इसे समझने की जरूरत है कि इतनी धृष्टता नेता लाते कहां से और कैसे हैं?



25 मई 1967 को #पश्चिम_बंगाल के #दार्जिलिंग जिला में स्थित #नक्सलबाड़ी से भारत में नक्सली आंदोलन का आरंभ माना जाता है। भारत सरकार के गृह मंत्री अमित शाह की माने तो 31 मार्च 2026 को नक्सली खत्म हो गए। यानी लगभग 58 साल या कहें तो कुल जमा 694 महीने तक इस देश में नक्सली उत्पात मचाते रहे, विकास कार्यों को ध्वस्त करते रहे, लेवी वसूलते रहे, देश के पुलिस जवानों को शहीद करते रहे, आम लोगों का जीना दूभर हो गया। बंगाल, झारखंड, बिहार, उत्तर प्रदेश, उड़ीसा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश को लाल गलियारा बनाने का अहंकार भरते रहे। नक्सल प्रभावित जिलों में लोग नौकरी करने से बचते थे। किसी का ट्रांसफर हो जाता था तो इसे काला पानी की तरह का सजा मानते थे। लेकिन नक्सली समस्या खत्म करने के लिए लंबा इंतजार करना पड़ा। कोशिशें उसी समय से होती रही हैं, लेकिन उसमें नियत कहीं ना कहीं संदिग्ध थी। और इसीलिए पी.चिंदबरम को इस बात का गर्व है कि वह दिमागी नक्सली हैं। क्योंकि अगर वह दिमागी नक्सली नहीं होते तो नक्सली समस्या खत्म कर चुके होते। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। दूसरी तरफ 30 में 2019 को गृह मंत्री बनते ही अमित शाह ने इस पर काम करना शुरू किया और लगभग सात साल में इस समस्या को खत्म कर दिया। यानी देश में 50 साल नक्सली उत्पात करते रहे और अपने मन की करते रहे तो इसके पीछे पी.चिंदबरम और कांग्रेस जैसे दिमागी नक्सलियों के संरक्षण, प्रोत्साहन, नैतिक समर्थन एक बड़ा कारण था। इसलिये देश के बड़े हिस्से में नक्सली आतंक के साए में लोग जीने के लिए मजबूर थे। इसलिए, इतना बड़ा सच स्वयं स्वीकारने के लिए वास्तव में पी.चिंदबरम को धन्यवाद दिया जाना चाहिए। 



आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संबोधन के बाद बिलबिलाए हुए अर्बन नक्सली या दिमागी नक्सली जो सामने आकर बहुत गर्व महसूस से कह रहे हैं तो उन्हें यह भी जानना चाहिए कि बिना उनके संरक्षण और प्रोत्साहन के इस देश में नक्सली समस्या आधी सदी तक नहीं चल पाती। तथ्यों पर गौर करिए। 25 मई 1967 को नक्सलबाड़ी आंदोलन इस देश में आरंभ होता है और 31 मार्च 2026 को सरकार के दावे के मुताबिक खत्म होता है। यानी लगभग 694 माह। इस दौरान कुल 12150 हत्याएं होती हैं। जिसमें 5019 नागरिक मारे जाते हैं। सुरक्षा बालों के कुल 1913 जवान शहीद होते हैं। कुल 5218 नक्सली मारे जाते हैं। अब इसको पी चिदंबरम के कार्यकाल से तुलना करिए। 30 नवंबर 2008 से 31 जुलाई 2012 तक यानी लगभग 44 महीने देश के गृहमंत्री रहते हैं पी.चिदंबरम। उनके कार्यकाल में कुल मौतें 3112 होती हैं। जिसमें 1413 नागरिक मारे जाते हैं। सुरक्षा बलों के 819 जवान शहीद होते हैं और 880 नक्सली मारे जाते हैं। मतलब 694 माह में 17.5 मौतें प्रति माह हुई, जबकि सिर्फ पी चिदंबरम के 44 महीने के कार्यकाल में प्रत्येक महीने 71 मौतें हुई। चार गुना से अधिक। कुल 57 साल में हुई कुल मौतों का 25.61 प्रतिशत मौतें सिर्फ पी.चिदंबरम के कार्यकाल में हुई है। इन आंकड़ों के आधार पर देखें तो सबसे कड़वा सच पी.चिंदबरम ने स्वीकार किया है कि दिमागी नक्सली होने का उनको गर्व है। उनको दिमागी नक्सली खुद को बताने का गर्व तो वाकई होना ही चाहिए। इसके लिए ऐसे महान नेता को सलामी दी जानी चाहिए, आलोचना नहीं। 



अब देश की जनता को यह तय करना है कि क्या ऐसे दिमागी नक्सलियों के बिना नक्सली इतने सशक्त तौर पर समानांतर सत्ता कायम करने की स्थिति में होते। जब अमित शाह सात साल में किसी समस्या को खत्म कर सकते हैं तो 50 साल में दूसरी सरकारों (अटल बिहारी वाजपेयी भी शामिल) के गृह मंत्रियों ने इस समस्या का समाधान क्यों नहीं किया? स्वाभाविक है कि वह कहीं ना कहीं नक्सलियों के प्रति सहानुभूति रखते थे, या इसे स्थायी समस्या मां चुके थे, या इसे खत्म करने में रुचि नहीं थी, या दृढ़ निश्चयी नहीं हो पा रहे थे। नक्सली समस्या कांग्रेसियों व वामपंथियों की देन थी। उन्हीं की नीतियों और शोषण के खिलाफ नक्सली आंदोलन शुरू हुआ था। इसलिए कम से कम नक्सली के मुद्दे पर तो वर्तमान सरकार को घेरने का नैतिक बल कांग्रेस और वामपंथियों के पास तो कतई नहीं होना चाहिए। ऐसा बल वे प्रदर्शित कर रहे हैं तो यह देश के लिए घातक ही नहीं है बल्कि देश को नुकसान पहुंचाने लायक भी है। निरंकुश साहस कांग्रेसियों और वामपंथियों या कह लीजिए की गैर भाजपाई दलों में आ रहा है, और आगे भी इस दुस्साहस के बने रहने की संभावना दिख रही है, तो तय जनता को करना है कि वे ऐसे दलों और नेताओं के प्रति कैसा व्यवहार रखना चाहते हैं। लोकतंत्र में अंततः जनता (मतदाता) ही मालिक है और वही तय करती है कि किस दल या नेता को कितनी ताकत देनी है। किस हैसियत में रखनी है।


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दाऊद खान कुरैशी के ऐतिहासिक संदर्भ पर प्रो.नृपेंद्र कुमार श्रीवास्तव और उपेंद्र कश्यप

 #दाऊद_खां_कुरैशी के बारे में ज्ञान वृद्धि

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 इतिहास लेखन सतत प्रक्रिया है। यह ऐसी विधा नहीं है कि एक बार जो लिख दिया वह अंतिम सत्य हो गया। जिज्ञासा का शांत होना इतिहास लेखन की प्रक्रिया का ठहराव है। 

● प्रश्न के खुरपी से इतिहास को खंरोचना पड़ता है। और तब कई ऐसी जानकारियां सामने निकल कर आती हैं, जो किसी भी स्थान या समाज के लिए आने वाले वक्त में महत्वपूर्ण हो जाता है। ●

 दाऊद खान और दाउदनगर का इतिहास लिखा गया है। #तारीख_ए_दाउदिया के बाद मेरी पुस्तक #दाउदनगर_श्रमण_संस्कृति_का_वाहक ही यहां के इतिहास को बताता है। लेकिन दूसरा पक्ष यह भी है कि इतिहास लेखन के लिए हमने कई किताबें पढ़ी। शोध किया। दाऊद खान कुरैशी पर सबसे प्रामाणिक शोध कार्य #मगध_विश्वविद्यालय में इतिहास के प्राध्यापक डॉक्टर नृपेंद्र कुमार श्रीवास्तव (#nripendra_kumar_shrivastav ) ने किया है। आज उनसे मगध विश्वविद्यालय में मिलना हुआ। हालांकि लगभग 8 वर्ष पूर्व भी उनसे मेरी मुलाकात हुई थी। लेकिन उनके नाम से मेरा पहला परिचय 2007 में तब हुआ था जब मैं #उत्कर्ष का प्रकाशन किया था। इसके लिए एक लेख #दाऊद_खां_कुरैशी_का_पलामू_फतह_अभियान तत्कालीन एसडीओ अशोक कुमार सिंह ने मुझे उपलब्ध कराया था। वह शोध पत्र इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस 1999 में प्रकाशित था। जिसका अनुवाद तब डीएवी पब्लिक स्कूल दाउदनगर के तत्कालीन प्राचार्य आरके दुबे और उनकी पुत्री ने किया था। व्यक्तिगत तौर पर मुझे डॉ.नृपेंद्र श्रीवास्तव के बारे में कोई जानकारी नहीं थी।



 वर्ष 2015 में जब हमने #श्रमण_संस्कृति_का_वाहक_दाउदनगर लिखा और पुस्तक कई प्रोफेसर के हाथ पहुंची, तो मुझे जानकारी मिली कि श्री श्रीवास्तव मगध विश्वविद्यालय में सेवारत हैं।

इसके बाद उनके आवास पर जाकर उन्हें यह किताब हमने उन्हें सौंपी थी। हालांकि तब उन्होंने जो बात कही थी उसकी चर्चा फिर कभी करूंगा। उनकी कही गई वह बात साहित्यिक चोरी से संबद्ध है। जहां लोग दूसरे के शोध कार्य को खुद का बता कर वाहवाही लूट लेते हैं।

 बहरहाल 21 अगस्त 2026 को उनके कक्ष में दाऊद खान कुरेशी से संबंधित कई प्रश्नों पर बातचीत की। एक प्रश्न बतौर टास्क उनके लिए छोड़ आया। जिस पर उन्होंने आश्वस्त किया है कि रिसर्च करके जरूर उसका जवाब देंगे। यह प्रश्न #DaudKhanKuraishi के जीवन से ही संबंधित है।

 इस मीटिंग में उनसे हमने कई मुद्दों पर बातचीत की है। जो आपको धीरे-धीरे इस प्लेटफार्म पर उपलब्ध होगा। आप दाउदनगर के हैं, या दाउदनगर को जानने में रुचि रखते हैं, तो मेरे इस पेज को फॉलो कर लें। जहां जल्द ही दाऊद खान कुरेशी और दाउदनगर से संबंधित वीडियो आपको उपलब्ध होंगे।

 बिहार और मुगलिया सल्तनत के लिए उनके योगदान, कट्टर मुसलमान होने के आरोप, विकास के नए आयाम गढ़ने समेत कई पहलुओं पर बातचीत है। जो आपको #Daudnagar के बारे में इतिहास पक्ष को मजबूत करेगा।



एक बार फिर आपसे निवेदन करता हूं कि इस पेज को फॉलो जरूर कर लें ताकि रियल टाइम पर आपको दाउदनगर के इतिहास से संबंधित वीडियो मिलते रहे। ऐसे भी इस प्लेटफार्म पर आपको पहले भी कई वीडियो दाउदनगर के इतिहास से संबंधित उपलब्घ है। आगे भी मिलते रहेंगे।

(फोटो-धर्मवीर भारती) 


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Wednesday, 12 August 2026

लालच से मुक्त दूसरों के हितैषी बने रहे रामशरण यादव

 



औरंगाबाद के गोह से पांच बार रहे हैं विधायक 

मंत्री बनने के ऑफर पर भी लालू के साथ नहीं गए मोटरसाइकिल से थे चलते ताकि किसी को समस्या न हो

21 वीं पुण्यतिथि पर विशेष रिपोर्ट

डॉ. उपेंद्र कश्यप 

नबिटा संवाददाता 

दाउदनगर (औरंगाबाद) । 

जिले के गोह विधानसभा क्षेत्र से पांच बार विधायक रहे रामशरण यादव को आज पूरा क्षेत्र याद कर रहा है। उन्होंने अपने राजनीतिक, सामाजिक जीवन में जो मील का पत्थर खड़ा किया है, उस तक पहुंचने तक की संभावना दूसरे नेताओं में नहीं दिखती। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से पहली बार वे 1977 में विधायक बने। इसके बाद 1980, 1990, 1993 (उपचुनाव) और 1995 में जीत कर विधायक बने। लालू प्रसाद यादव ने उन्हें गोह में चुनाव के वक्त कहा था कि रामशरण भाई को लाल बत्ती लगाने का ऑफर दे रहे लेकिन वह सुन नहीं रहे। दरअसल लालू प्रसाद जब अपने चरम पर थे तो वह उनको मंत्रिमंडल में शामिल करना चाहते थे। लेकिन रामशरण यादव ने दल नहीं बदला, दिल भी नहीं बदला। नतीजा वे मंत्री बनने से चूक गए। जबकि आज थोड़े से लाभ के लिए नेता दल और दिल दोनों बदल देते हैं। तनिक भी उनको इस बात का इल्म नहीं होता कि लोग क्या कहेंगे। आज एक मुखिया भी चुनाव जीतते बड़े और लग्जरी चार पहिया वाहन पर चलना शुरू कर देता है, जबकि रामशरण यादव मोटरसाइकिल पर अपने एक अंगरक्षक के साथ चलते थे। कहा यह भी जाता है कि उनका विधायक आवास हमेशा जनता के लिए खुला रहा। कई बार कई लोग यह देखने का दावा कर चुके हैं कि वे लोगों को अपने ही बिस्तर पर सुला देते थे, और स्वयं फर्श पर कंबल बिछाकर सो जाते थे। उनका जन्म हसपुरा प्रखंड के टनकुप्पी गांव में आठ जनवरी 1943 को हुआ था। जबकि 13 अगस्त 2005 को उनका निधन हुआ था। क्षेत्र उनकी 21 में पुण्यतिथि आज मना रहा है।




दूसरे की समस्या का ख्याल अधिक


राम शरण यादव के रिश्तेदार मखरा निवासी सुरेंद्र यादव बताते हैं कि जब उनको बड़े वाहन पर चलने की सलाह दी गयी तो जवाब दिया था कि हम गांव और ग्रामीणों के नेता हैं। मोटरसाइकिल से जाते हैं तो सिर्फ अंगरक्षक रहता है और किसी के घर रुक कर खाकर ठहर सकते हैं। लेकिन जब बड़ी गाड़ी से चलेंगे तो कई लोग साथ होंगे। ऐसी स्थिति में जिसके यहां जाएंगे उसको खिलाने में और रखने में परेशानी होगी।



अनुमण्डल के सबसे बड़े समाजवादी और लोभ-लालच-स्वहित से मुक्त व्यक्तित्व #रामशरण_यादव के जीवन से जुड़े तीन महत्वपूर्ण प्रकरण को जानिये #GohAssembly #गोह_विधानसभा_क्षेत्र #गोह_के_विधायक #Goh_MLA #GOH_Ex_MLA #RAMSHARANYADAV_GOH #गोह_रामशरण_यादव #history_of_daudnagar #political_history_of_daudnagar #upendrakashyap



Saturday, 8 August 2026

मैं और राष्ट्रीय नवीन मेल का आरम्भ व वर्तमान


■ पत्र, पत्रकार व पत्रकारिता:- 02 ■

● उपेंद्र कश्यप ●


जीवन में हर पल परिवर्तन दिखता है, चाहे वह सकारात्मक हो या नकारात्मक। हम बात कर रहे हैं सकारात्मकता की, जिसमें अतीत भी है, वर्तमान भी और शायद भविष्य का छुपा हुआ बीज भी, जो पता नहीं कितना बड़ा पौधा या वृक्ष बन सकेगा।

 बात 1994 की है। अक्टूबर का महीना था। लैंडलाइन के अलावा संचार का कोई दूसरा इलेक्ट्रॉनिक माध्यम तब नहीं हुआ करता था। डेहरी के श्री कृष्णा किसलय भैया (अब स्वर्गीय) से मैं जुड़ा हुआ था। पत्रकारिता का पहला आरंभ भी मैंने इनके द्वारा प्रकाशित “सोनमाटी” से किया था। तब बीएमपी 2 के सहायक समादेष्टा आई ए सिद्दीकी जजिब गाजीपुरी के इंटरव्यू के साथ किया था। इस बीच सूचना यह मिली कि डाल्टेनगंज से राष्ट्रीय नवीन मेल दैनिक अखबार का प्रकाशन हो रहा है। ध्यान रहे तब बिहार झारखंड एक था।

बिहार से प्रकाशित हिंदुस्तान और आज अखबार 12 पेज के ब्लैक एंड व्हाइट 1.90 रुपये मूल्य के साथ बिकते थे, जबकि 12 पेज ब्लैक एंड व्हाइट के साथ ₹02 मूल्य से राष्ट्रीय नवीन मेल आरंभ हुआ था। कृष्ण किसलय भैया ने मुझे कहा कि आप दाउदनगर से रिपोर्टिंग करिए। वर्ष 1994 में ठीक विजयादशमी के दिन इस अखबार का आरंभ तत्कालीन गृह राज्य मंत्री सुबोधकांत सहाय ने किया था। मैं उद्घाटन समारोह में भी शामिल हुआ था। दूसरे दिन से ही मेरी खबरें भी राष्ट्रीय नवीन मेल में प्रकाशित होने लगी। 32 साल बाद अब देश को प्रभावित करने वाली राजनीतिक, सामाजिक, न्यायिक घटनाओं पर लिखना आरंभ किया। तो 31 जुलाई 2026 को एक आलेख- विपक्ष को सत्ता से दूर कर रहा सनातन का अपमान- शीर्षक से आलेख, मेरा कालम- “टेढ़ी पॉलिटिक्स”- के लिए लिखकर माननीय संपादक सुनील बादल सर को भेजा। उनसे मेरा कोई परिचय पूर्व से नहीं था। उनको अपना इतिहास बताया और उन्होंने इस आलेख को संपादकीय पन्ने पर जगह दी। एक अगस्त को प्रकाशित हुआ। फिर 7 अगस्त को -न्यायिक फैसले के लिए जिम्मेदारी तय करने का वक्त- आलेख भेजा, जिसे 8 अगस्त को संपादकीय पेज पर स्थान मिला। इसके लिए संपादक सर को आभार।



 एक दूसरी बात मैं कह रहा हूं कि जब आप किसी अखबार के साथ अपनी पत्रकारिता का आरंभ एक प्रखंड रिपोर्टर के रूप में करते हैं और इस अखबार के संपादकीय पन्ने पर जब आप छपने लगते हैं तो इसकी खुशी अलग होती है। इससे न सिर्फ आपकी लेखनी को प्रमाणिकता, विश्वसनीयता, व्यापकता, बहुलता प्राप्त होती है, बल्कि आप उत्साहित होते हैं, प्रेरित होते हैं और एक नई यात्रा आरंभ करने का जज्बा आपमें पैदा होता है। स्वाभाविक है कि राष्ट्रीय नवीन मेल के संपादकीय पन्ने पर छपने से यह सब मुझे भी प्राप्त हो रहा है। हालांकि पहली बार किसी अखबार के संपादकीय पेज पर जो मेरा आलेख प्रकाशित हुआ था उसका शीर्षक था - सवर्ण वादी मीडिया बनाम निकम्मी बहुजनवादी सोच। यह आलेख 17 सितंबर 2018 को बिहार और दिल्ली से प्रकाशित मीडिया दर्शन के संपादकीय पेज पर छपा था। हालांकि इसके छपने के बाद कुछ दुश्वारियां भी झेलनी पड़ी थी। जो फिर कभी अपने कालम- ‘पत्र, पत्रकार और पत्रकारिता’ में लिखूंगा।


 

फिलहाल में “टेढ़ी पॉलिटिक्स” कालम से संपादकीय पन्नों के लिए आलेख लिख रहा हूं। जिसे बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और दिल्ली समेत कई स्थानों से प्रकाशित विभिन्न अखबारों और वेबसाइटों में जगह मिल रही है। मीडिया मार्ट इंडिया, रांची व डालटनगंज से प्रकाशित राष्ट्रीय नवीन मेल, नई दिल्ली-उत्तरप्रदेश- झारखंड- छत्तीसगढ़ और बिहार से प्रकाशित मीडिया दर्शन, औरंगाबाद से प्रकाशित सीतयोग, रांची-दिल्ली-लखनऊ-पटना से प्रकाशित उजाला पत्रिका में स्थान प्राप्त हो रहा है। पत्रकारिता में यह एक नई यात्रा है। यह बीज जो अंकुरित हुआ है, कितना बड़ा वृक्ष बनता है, मुझे नहीं मालूम।


 बस गीता का यह संदेश कि- फल प्राप्ति की चिंता किए बिना सतत काम करते रहिए, पर अमल करते हुए काम करते रहा हूं, करते रहूंगा। उपलब्धि की ऊंचाई या लंबाई कितनी होगी, इसकी चिंता किये बगैर यह यात्रा जारी है।

आप सबका प्यार मिलता रहता है, इसके लिए सभी के प्रति बहुत-बहुत आभार व्यक्त करता हूं।


धन्यवाद, मेरा यह लिखा पढ़ने के लिए।


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उम्मीद कर सकते हैं क्या “एक शिक्षा व्यवस्था” की

 



■ टेढ़ी पॉलिटिक्स : ■

डॉ.उपेंद्र कश्यप 

मो.नं.- 9931852301



(बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के बयान से फिर यह उम्मीद जगी है कि शिक्षा व्यवस्था में सुधार हो सकता है। क्या एक शिक्षा व्यवस्था संभव नहीं है, और है तो फिर कैसे हैं? इसी संदर्भ में इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए फैसले और अब सम्राट चौधरी के बयान का विश्लेषण कर रहे हैं वरिष्ठ लेखक व पत्रकार- डॉ. उपेंद्र कश्यप)



बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने संत रविदास जयंती पर आयोजित समारोह को संबोधित करते हुए कहा है कि अगले एक-दो वर्षों में ऐसी व्यवस्था बनाने का लक्ष्य है जिससे मंत्री, विधायक और अफसर के बच्चे भी सरकारी स्कूलों में पढ़ें। ऐसा होने पर ही माना जाएगा कि सरकारी शिक्षा व्यवस्था वाकई बदली है।

ऐसा कह कर “एक शिक्षा व्यवस्था” की एक उम्मीद तो जगाते हैं लेकिन वह यह भी स्वीकार करते हैं कि सरकारी शिक्षा व्यवस्था अभी इतनी दुरुस्त नहीं हुई है कि मंत्री और अधिकारी के बच्चे भी उसमें पढ़ सकें।

स्थिति तो ऐसी भी नहीं है कि कस्बाई और छोटे शहरी क्षेत्र के नेता, व्यवसायी, सरकारी कर्मचारी, दूसरे- तीसरे दर्जे के अधिकारी के बच्चे भी सरकारी स्कूलों में पढ़ सकें। स्थिति यह है कि हर वह मां पिता जो थोड़ा भी सक्षम है, अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में पढ़ाना नहीं चाहता। वह निजी विद्यालयों में अपने बच्चों को पढ़ाता है। पेट व कपड़ा में कटौती करके, अपने शौक त्याग कर। इसके लिए कुछ हद तक स्टेटस सिंबल भी जिम्मेदार है। लेकिन 90 प्रतिशत जिम्मेदार शिक्षा व्यवस्था है। हर सक्षम व्यक्ति सरकारी विद्यालयों में एप्ने बच्चे को पढ़ाना स्वीकार नहीं करता। कह सकते हैं कि सरकारी विद्यालयों में वही बच्चे पढ़ते हैं जिनके माता-पिता के पास निजी विद्यालयों में पढ़ाने का विकल्प नहीं है, या सक्षमता नहीं है। तो क्या सम्राट चौधरी के इस बयान से यह उम्मीद दिखती है कि कभी एक शिक्षा व्यवस्था होगी। हालांकि यह उम्मीद जरूर जगती है कि शिक्षा व्यवस्था में सुधार सरकार की प्राथमिकता में शायद अब आ गई है। 

यहां उल्लेखनीय है 18 अगस्त 2015 को आया इलाहाबाद हाईकोर्ट का वह फैसला, जिसमें न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल ने कहा था कि- बेसिक शिक्षा सभी के लिए एक होनी चाहिए। सरकारी सुविधा संसाधन और अर्थ का लाभ लेने वाला हर व्यक्ति का बच्चा सरकारी स्कूल में पढ़े यह सुनिश्चित होना चाहिए। कहा था- उत्तर प्रदेश के सरकारी कर्मचारी, जन प्रतिनिधि, स्थानीय निकायों के पदाधिकारी, न्यायपालिका से जुड़े लोग तथा सरकारी खजाने से वेतन या मानदेय पाने वाले सभी व्यक्तियों के बच्चों को सरकार प्राथमिक विद्यालयों में पढ़ाने की व्यवस्था सरकार करे। अदालत ने तब कहा था- जब तक नीति निर्माता और सरकारी अधिकारियों के अपने बच्चे सरकारी स्कूलों में नहीं पढ़ेंगे, तब तक विभिन्न विद्यालयों की गुणवत्ता सुधारने के प्रति गंभीर नहीं होंगे। कितनी सही बात कही गयी थी।



इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले को अगर तब की उत्तर प्रदेश सरकार (मुख्यमंत्री अखिलेश यादव थे) अमल में ला चुकी होती तो आज बात बहुत हद तक व्यवस्था आगे बढ़ गई होती। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इस उत्तर प्रदेश में बाद में मुख्यमंत्री बने और अब तक सत्ता चला रहे आदित्यनाथ योगी नव भी इस दिशा में पहल नहीं किया।

 दरअसल हकीकत यह है कि इलाहाबाद के उस फैसले की चर्चा करने से हर जाति- धर्म, राजनीतिक दल के नेता बचते रहे। एक सच यह भी है कि आम नागरिक भी उस फैसले को लेकर आगे नहीं बढ़ा। दरअसल, समस्या यह है कि इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले को अगर सरकार लागू कर दे तो उनका ही हित प्रभावित होगा। निजी शिक्षण संस्थानों से बड़े बड़े नेताओं और राजनीतिक दलों के हित जुड़े हुए हैं। उनको आर्थिक लाभ मिलता है। अधिकारियों को भी आर्थिक-सामाजिक लाभ ऐसे संस्थानों से प्राप्त होते हैं। 


आम जनता की तरफ से आवाज क्यों नहीं उठी। मीडिया ने भी इस मुद्दे को आवाज देना उचित नहीं समझा। न मुख्यधारा की मीडिया (प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक) में इलाहाबाद के फैसले को लागू करने के मुद्दे पर चर्चा हुई, न सोशल मीडिया इंफ्लुएंसरों ने इसे उठाया। कहीं चर्चा, बहस नहीं। दरअसल, जिस बड़े तबके को एक शिक्षा व्यवस्था से लाभ होगा, वह आंदोलन करने के प्रति न तो जागरूक है, न ही वह इसको लेकर किसी भी प्रकार का कोई हानि का जोखिल लेने को तैयार है। फिर जो इससे बहुत आहत नहीं हैं, परेशान नहीं हैं, वे भला क्यों सड़क पर उतरेंगे। जो वर्ग सक्षम नहीं है निजी विद्यालयों में अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए वह सड़क पर उतरने में भी सक्षम नहीं है। जो तबका सरकारी विद्यालयों को नजरअंदाज कर निजी विद्यालयों में बच्चों को पढा रहा है उसे बहुत पीड़ा इस मुद्दे को लेकर नहीं है। और ना ही वह संघर्ष करने सड़क पर उतरने वाला है। एक बड़ा हिस्सा कसमकश में है कि क्या उसके सड़क पर उतरने से भी व्यवस्था बदल जाएगी। या सड़क पर उतरने से उसको कितना लाभ हानि होगा, यह विचार करते हुए वह सड़क पर नहीं उतर रहा। कारण कई हो सकते हैं, लेकिन अंतिम सत्य तो यही है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को सड़क का मुद्दा किसी ने नहीं बनाया। जब देश में एक देश एक चुनाव की तैयारी है, एक देश एक राशन की व्यवस्था लागू हो गयी है तो क्यों नहीं एक देश एक शिक्षा का मुद्दा उठ रहा है। समस्या यही है कि राजनीति और समाज में जो सक्रिय तबका है, उसको इस मुद्दे से बहुत लेना देना नहीं है। और जो सरकारी शिक्षा व्यवस्था का लाभ लेने के लिए मजबूर है, उसके पास रोजमर्रे का संघर्ष इतना है कि बच्चों की पढ़ाई जिस स्कूल में वह करवा रहा है उस स्कूल में क्या संसाधन है, क्या सुविधा है, उसके अधिकारों का कितना हनन हो रहा है, इससे उसे कोई मतलब नहीं है। इसके प्रति दरअसल वह जागरूक भी नहीं है। इस देश में जब तक कि हंगामा नहीं कोई समूह करता है, जब तक धरना प्रदर्शन नहीं होगा, जब तक मामले को आप न्यायिक लड़ाई नहीं बनाएंगे, तब तक कुछ सुधारात्मक कार्य नहीं होने वाला। गरीबों की ना सुनने की आदत हर उस वर्ग में है जो थोड़ा भी सक्षम हो गया है। देश में आज जरूरत इस बात की है कि एक देश एक शिक्षा के मुद्दे को लेकर योजनाबद्ध तरीके से आंदोलन हो। मामले को सुप्रीम कोर्ट में ले जाया जाए। लेकिन फिर सवाल यह है कि इस मुद्दे पर आंदोलन कौन करेगा, और आंदोलनकारी को ना तो कोई खाना पहुंचाने जाएगा और ना उनके सुविधा, संसाधनों का कोई ख्याल रखेगा। ऐसे मुद्दे के लिए कोई एनजीओ, राजनीतिक दल, नेता आगे नहीं आएगा, क्योंकि उसको विदेशी चंदा कोई नहीं देगा। कोई अरब या पश्चिम देश ऐसे आंदोलन के लिए न फंडिंग करेगा न खाना भेजेगा। इसलिए गरीबों, वंचित तबके को ही आगे आना होगा, देर-सबेर।




(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह उनके निजी विचार हैं।)


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Friday, 7 August 2026

न्यायिक फैसले के लिए जिम्मेदारी तय करने का वक्त

 



■ टेढ़ी पॉलिटिक्स : ■

● उड़ीसा के अर्जुन जानी के संदर्भ में जिस तरह से सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आया, उससे यह आवश्यक्ता महसूस हो रही है कि विचारधीन कैदियों के जमानत और बिना दोष लंबे समय तक जेल में रहने के मामले पर गहन विचार विमर्श हो। लंबे समय तक जेल में रहने के बाद जब कोई दोषमुक्त साबित होता है, तब तक उसका परिवार बर्बाद हो चुका होता है। उसका कैरियर तबाह हो चुका होता है। सामाजिक, आर्थिक, परिवारिक सभी तरह की क्षति वह भुगत चुका होता है। सवाल है कि इसके लिए जिम्मेदार कौन है? क्या न्यायिक जवाबदेही तय करने और ऐसे मामालों में मुआवजे का प्रविधान नहीं होना चाहिए। वरिष्ठ पत्रकार व लेखक डॉ. उपेंद्र कश्यप का विश्लेषण:-


विचारणीय खबर यह आई है कि उड़ीसा के अर्जुन जानी को सुप्रीम कोर्ट ने हत्या के आरोप में दोष मुक्त कर दिया है। इसी मामले में 22 साल जेल में रहे। सुप्रीम कोर्ट ने न्याय व्यवस्था की सामूहिक विफलता को इसके लिए जिम्मेदार बताया। कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने साक्ष्य का सही मूल्यांकन नहीं किया। हाई कोर्ट मूकदर्शक बना रहा। अर्जुन जानी को सुप्रीम कोर्ट से मई 2026 में जमानत मिली थी। जब वह अपने गांव हिरली डांगरी लौटे तो गांव में उनका घर नहीं बचा था। घर की जगह झाड़ियां उग गयी थी। गांव में कोई ऐसा नहीं जिसे वह अपना कह सके। मां का निधन पहले ही हो गया था  परिवार में न भाई है ना बहन है, ना उसकी शादी हो पाई। एक हद तक वह अब अवसाद में जीता है। अर्जुन कभी नदी किनारे बैठे रहता है तो कभी जंगल की ओर निहारते हुए जाता है। 

यह खबर मामूली नहीं है। देश में अब हर कार्य के लिए जिम्मेदारी तय करने की मांग उठने लगी है। 21 वीं सदी में लोकतांत्रिक अधिकारों को लेकर हर पीढ़ी के लोगों का नजरिया बदला है। ऐसे में न्यायिक जवाब देही भी तय होनी चाहिए। कॉलेजियम सिस्टम विवादों में रहा है। इसका भारी विरोध होता है। जजों की नियुक्ति में पारदर्शिता का घोर अभाव है। जाति का विमर्श अलग है। सवाल यह उठता है कि अर्जुन जानी के लिए मामले में जो हुआ उसके लिए जिम्मेदार कौन है? हद यह है कि निचली अदालत की सजा में से कितने प्रतिशत फैसले उच्च न्यायालय या सुप्रीम कोर्ट बदल देते हैं। इसका कोई आधिकारिक राष्ट्रीय प्रतिशत उपलब्ध नहीं है। कारण है एनसीआरबी या न्यायपालिका ऐसा समेकित डेटा प्रकाशित नहीं करती कि "ट्रायल कोर्ट द्वारा दोषी ठहराए गए कुल अभियुक्तों में से कितनों को हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट ने बरी कर दिया।" यह स्थिति बदलनी चाहिए। यह जानने का हक हर भारतीय को होना ही होना चाहिए।

हालांकि समय समय पर उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय अनेक मामलों में दोषसिद्धि को पलटते हैं।



वहीं अनेक मामलों में वे सजा को बरकरार भी रखते हैं या सजा की अवधि में संशोधन करते हैं। लेकिन यह प्रयाप्त 21 वीं सदी के लोकतांत्रिक परिस्थितियों में नहीं माना जाना चाहिए। कुल दर्ज मामलों में एनसीआरबी की क्राइम इन इंडिया 2023 की रिपोर्ट के अनुसार पुलिस द्वारा आरोपपत्र दाखिल होने की दर: लगभग 72.7 प्रतिशत है। जिन मामलों का न्यायालय में निर्णय हुआ, उनमें लगभग 54 प्रतिशत मामलों में दोषसिद्धि हुई। यह निर्णीत मामलों का प्रतिशत है। कुल दर्ज प्राथमिकियों का नहीं। क्योंकि अधिकांश मामले अभी लंबित रहते हैं। वैसे भी एक तस्वीर काफी भयावह है, जिसकी चर्चा गाहे बगाहे होते रहती है। भारत में लंबित मामलों की स्थिति बहुत गंभीर है।

सभी स्तरों की अदालतों (जिला, उच्च न्यायालय, सर्वोच्च न्यायालय) में पांच करोड़ से अधिक मामले लंबित हैं। केवल उच्च न्यायालयों में लाखों मामले वर्षों से लंबित हैं। लगभग 80000 मामले 30 वर्ष से अधिक पुराने हैं। सर्वोच्च न्यायालय में भी 10000 से अधिक मामले 10 वर्ष से अधिक समय से लंबित बताए गए हैं। 



ऐसी तस्वीरों के बीच कानूनी और न्यायिक मामलों में जवाबदेही तय करने का अब वक्त आ गया है। यह खुला हुआ सच है कि थानों में अनुसंधानकर्ता (आईओ) और थाना अध्यक्ष के स्तर पर हर सक्षम व्यक्ति अपने अनुकूल जांच की दिशा तय करवाने में प्रायः सफल होता है। यही नहीं कभी-कभी तो यह भी देखा गया है कि कांड का जो सबसे महत्वपूर्ण कड़ी आईओ होता है उसे किसी भी मामले का मजबूत पक्षकार अपने लिए काम करने के लिए खरीद लेता है। यहां से ऊपर थानेदार हो, या पुलिस इंस्पेक्टर हो, या डीएसपी हो, और कई मामलों में तो एसपी और उसके ऊपर के अधिकारी पर भी जांच अपने अनुकूल बनाने के लिए पद, प्रतिष्ठा और धन से संपन्न व्यक्ति सफल होता है। स्वाभाविक है कि ऐसी स्थिति में निर्दोष को जेल भेज दिया जाता है और दोषी को कुछ नहीं होता है। ऐसे ही कारणों से यह अवधारणा बन गई है कि- अपराध कर भी देंगे तो क्या हो जाएगा? यही कारण है कि भारत में अपराध का दर नहीं घट रहा है। जिस तरह से अर्जुन जानी को 22 साल बिना दोष के जेल में रहना पड़ा और अपना सब कुछ गवां देना पड़ा, वैसे लाखों लोग इस देश में है जो निर्दोष होते हुए भी विचाराधीन कैदी के रूप में लंबे समय तक जेल में रहते हैं। उनकी जिंदगी नरक बन जाती है। परिवार और पीढ़ी तक पूरी तरह बिखर जाता है। आर्थिक तंगहाली का शिकार हो जाता है। इसलिए जरूरत इस बात की है कि न्यायपालिका ही सही, वह यह तय करें कि अगर कोई निर्दोष जेल जाता है तो इसके लिए आईओ और थाना अध्यक्ष समेत संबंधित कांड के अनुसंधान में सम्मिलित हर अधिकारी (अगर डाक्टर या दूसरे विशेषज्ञ शामिल हों तो वे भी) को जिम्मेदार ठहराया जाए। महीना वार के हिसाब से मुआवजे की राशि तय होनी चाहिए। कोई एक माह या साल तक जेल रहता है और दोष मुक्त साबित होता है, तो उसे कितनी राशि मुआवजे में दी जानी चाहिए, यह भी तय होना चाहिए।  अगर कोई जमानत पर भी बाहर है और परेशान हो रहा है न्यायिक और पुलिस के कारण तो, उसके लिए भी मुआवजे की राशि तय होनी चाहिए। यह राशि निश्चित रूप से कांडों के अनुसंधान में शामिल हर अधिकारी से वसूला जाना चाहिए। कई मामलों में कई-कई की संख्या में आईओ होते हैं। उनके वेतन, पेंशन या उनकी खरीदी गई संपत्ति से मुआवजे की धनराशि वसूल किया जाना चाहिए। तभी यह सुनिश्चित होगा कि निर्दोष को कोई अधिकारी जेल ना भेजें और दोषी को बचाने की कोशिश ना कर सके। जब तक ऐसा नहीं होगा इस देश में अर्जुन जानी जैसे लोग बर्बाद होते रहेंगे और पुलिस अधिकारी खेल करके करोड़पति बनते रहेंगे और उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा। इसके साथ-साथ यह भी तय होना चाहिए की किसी कांड का प्रथम अनुसंधानकर्ता व थानाध्यक्ष की जवाबदेही 50 फ़ीसदी तय हो और उसके बाद के 50 प्रतिशत में शामिल सभी अनुसंधान कर्ता, जांच रिपोर्ट देने वाले, बयान देने वाले अधिकारी को शामिल किया जाना चाहिए। जब ऐसा होगा तभी आईओ और थाना अध्यक्ष डरेंगे। अन्यथा ना तो न्यायिक व्यवस्था पर किसी का विश्वास बनेगा और ना ही पुलिस व्यवस्था पर। हम प्रवचन चाहे जितना दे लें, हकीकत यही है कि आम नागरिक को ना तो पुलिस पर भरोसा है और ना ही न्यायपालिका पर। वह यह मानकर चलता है कि सक्षम लोगों के लिए कानून की परिभाषा और उसके अनुपालन का मानक अलग है, और असक्षम लोगों के लिए अलग। इसलिये हर जागरूक व समझदार या थोड़ा भी सम्पन्न व्यक्ति खास बनना चाहता है। इसकी होड़ मची हुई है। सक्षम लोगों को गिरफ्तार करने से पहले पुलिस कर रवैया अलग होता है, और कमजोर व्यक्ति को पकड़ने के लिए अलग। एक ही तरह के मामले में कमजोर व्यक्ति को पुलिस तुरंत जेल में ठूंस देती है, बेरहमी से पिटती है, जबकि उसे खुद थाने से जमानत देने का अधिकार होता है। लेकिन जब सक्षम व्यक्ति होता है तो पहले जांच होगी और तब गिरफ्तारी होगी। सक्षम व्यक्ति को सबूत मिटाने के लिए, गिरफ्तारी से बचने के लिए, अग्रिम जमानत ले लेने के लिए पर्याप्त समय पुलिस वाले उपलब्ध कराते हैं। इस व्यवस्था को बदला जाना चाहिए। जब तक यह व्यवस्था नहीं बदलेगी, सच्चे मायने में लोकतंत्र की खुशबू भारतीयों को महसूस नहीं होगी।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह उनके निजी विचार हैं।)



न्यायिक फैसले के लिए जिम्मेदारी तय करने का वक्त : टेढ़ी पॉलिटिक्स

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