● उपेंद्र कश्यप ●
बिहार में सत्ता हस्तांतरण का खेल पूरा हो गया। कुर्मी नीतीश कुमार ने कुशवाहा सम्राट चौधरी को सत्ता हस्तांतरित कर दी। भाजपा जदयू या एनडीए का राजनीतिक परिप्रेक्ष्य अलग है। हम यहां बात ऐतिहासिक संदर्भ की कर रहे हैं। जिस त्रिवेणी संघ की अब खूब चर्चा की जा रही है और यह कहा जा रहा है कि त्रिवेणी संघ का एक चक्र पूरा हो गया, कुछ हद तक ही यह सही है। लेकिन इससे बड़ा सत्य यह है कि दांगियों की कीमत पर कुशवाहा राज कायम हुआ है। आधुनिक काल में कुशवाहों का कोई ऐतिहासिक आंदोलन सामने नहीं देखा गया है। त्रिवेणी सिंह की बात करते हुए बड़ी ही सहजता से यह कह दिया जाता है कि यह यादव, कुर्मी और कोईरी जाति के एक एक व्यक्ति ने मिलकर दलित और पिछड़ों को राजनीतिक व सामाजिक अधिकार दिलाने के उद्देश्य से लगभग 93 वर्ष पहले 30 मई 1933 को इसका गठन किया था। वास्तविकता यह है कि उसमें यादव और कुर्मी के साथ कुशवाहा नहीं था। सरदार जगदेव सिंह यादव, जाति से यादव थे, तो शिवपूजन सिंह कुर्मी थे। लेकिन चौधरी यदुनंदन प्रसाद मेहता कतई कुशवाहा या कोईरी नहीं थे। बिहार में कोइरी या कुशवाहा समूह में कई शाखा है। जिसमें दांगी, बनाफर, ज़लवार, कन्नौजिया, मगहिया, चिरमैत शामिल है। त्रिवेणी संघ के एक स्तंभ चौधरी यदुनंदन प्रसाद मेहता दांगी थे। यह जाति आज भी एक अलग जातीय पहचान के रूप में कायम है। कुशवाहा समूह में होते हुए भी बिहार सरकार की 2022-23 की जातीय गणना रिपोर्ट के अनुसार, कोइरी (कुशवाहा) पिछड़ा वर्ग - 2 (OBC) में आता है। जबकि दांगी अति पिछड़ा वर्ग - 1 (EBC) में वर्गीकृत किया गया है। आज कुशवाहा के मुख्यमंत्री बनने के बाद जगदेव प्रसाद के पुत्र नागमणि लिखते हैं:- बाबूजी बिहार लेनिन जगदेव प्रसाद और मेरा सपना साकार हो गया। अमर शहीद जगदेव बाबू कह गए थे-
पहली पीढी मारी जाएगी,
दुसरी पीढ़ी के लोग जेल जाएगें,
तीसरी पीढी राज करेगी।
हकीकत यह है कि स्वयं जगदेव बाबू कुशवाहा नहीं थे। वे भी दांगी जाति से थे।
दरअसल, शकुनी चौधरी ने कोइरी (कोयरी) समूह के साथ 'कुशवाहा' समूह को बिहार सरकार के गजट में शामिल (जुड़वाया) करवाया था, जो कोइरी/कुशवाहा पहचान की राजनीति के प्रमुख स्तंभ माने जाते हैं। उन्होंने कोइरी समाज को एक नई पहचान दिलाने के लिए 'कुशवाहा' उपनाम को आधिकारिक मान्यता दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। ध्यान रहे न तो शकुनी कुशवाहा लिखते हैं, न सम्राट चौधरी। और उपेन्द्र कुशवाहा भी कुशवाहा नहीं लिखते थे। जब कुशवाहा शब्द राजनीति में स्थापित हुई और इसकी ताकत दिखी तब नेता अपने नाम के साथ कुशवाहा लिखने लगे, भले ही वे पहले कुमार लिखते थे या अन्य टाइटल इस्तेमाल करते रहे थे।
इसके बाद नीतीश कुमार ने लालू प्रसाद यादव के मुस्लिम-यादव जाति के समीकरण को ध्वस्त कर सत्ता पाने के उद्देश्य से लव-कुश की राजनीति शुरू की। उपेंद्र कुशवाहा का कद इसी राजनीति के कारण बढ़ता गया। जिसकी बुनियाद नीतीश कुमार ने रखी थी, उपेंद्र कुशवाहा का कद बढाने के मामले में। लव-कुश की राजनीति ने दांगी शाखा को धीरे-धीरे किनारे कर दिया। अलबत्ता जिस दांगी ने राजनीतिक चेतना इस खेतिहर जातीय समूह में बढ़ाई उसे ही उपेक्षित किया जाने लगा। इसे ऐसे समझिये कि नीतीश कुमार ने एप्ने मंत्रिमंडल में कुशवाहा राजनीति साधने के लिए लव-कुश समीकरण में हर शाखा से मंत्री बनाया। बनाफर, ज़लवार, कन्नौजिया, मगहिया, चिरमैत को प्रतिनिधित्व दिया लेकिन दांगी समाज से किसी नेता को मंत्री नहीं बनाया। सम्राट चौधरी चिरमैत शाखा से हैं तो उपेन्द्र कुशवाहा ज़लवार शाखा से। शायद इसीलिए आज भी दांगी समाज कुश वंशज होने की अवधारणा को पूरी तरह स्वीकार नहीं करता।
सवर्ण, पिछड़े, अति पिछड़े, मुस्लिम, दलित लेकिन वैश्य नदारद
वैश्य समूह की तमाम जातियों या उप जातियों को भाजपा (2005 से एनडीए) के कोर वोटर माने जाते हैं, लेकिन इनको सीएम की कुर्सी कभी नहीं मिली।
श्री कृष्णा सिंह से लेकर सम्राट चौधरी तक मुख्यमंत्री बने लोगों की अगर जाति का विश्लेषण करेंगे तो हम पाते हैं कि चार ब्राह्मण अभी तक मुख्यमंत्री बने हैं। जिसमें विनोदानंद झा, जगन्नाथ मिश्रा, बिंदेश्वरी दुबे और भागवत झा आजाद शामिल हैं। जबकि इतनी ही संख्या में यादव भी मुख्यमंत्री बने हैं। बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल, दरोगा प्रसाद राय, लालू प्रसाद यादव एवं रावड़ी देवी। दो कायस्थ कृष्ण वल्लभ सहाय एवं महामाया प्रसाद सिंह, दो दलित रामसुंदर दास एवं जीतन राम मांझी, एक कुर्मी नीतीश कुमार, एक कुशवाहा सतीश प्रसाद सिंह, दो राजपूत चंद्रशेखर सिंह एवं सत्येंद्र नारायण सिंहा, मात्र एक भूमिहार श्री कृष्णा सिंह और मात्र एक अति पिछड़ा कर्पूरी ठाकुर अभी तक मुख्यमंत्री बने हैं। समेकित वैश्य जातियों की संख्या 32 है। जिनकी कुल जनसंख्या 18.18 प्रतिशत है। बिहार में सबसे अधिक यादव 14.27 प्रतिशत से भी लगभग 04 प्रतिशत अधिक। लेकिन उसके हिस्से मुख्यमंत्री की कुर्सी कब आएगी? इसका इंतजार सबको है।
● बिहार के मुख्यमंत्री और उनकी जाति ●
श्रीकृष्ण सिंह – राजपूत
अनुग्रह नारायण सिन्हा (कार्यवाहक) – कायस्थ
बिनोदानंद झा – ब्राह्मण
कृष्ण बल्लभ सहाय – कायस्थ
महामाया प्रसाद सिन्हा – कायस्थ
सतीश प्रसाद सिंह – कुर्मी
बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल – यादव
दरोगा प्रसाद राय – यादव
कर्पूरी ठाकुर – नाई (अति पिछड़ा वर्ग)
राम सुंदर दास – दलित
जगन्नाथ मिश्रा – ब्राह्मण
चंद्रशेखर सिंह – राजपूत
बिंदेश्वरी दुबे – ब्राह्मण
भागवत झा आजाद – ब्राह्मण
सत्येन्द्र नारायण सिन्हा – राजपूत
लालू प्रसाद यादव – यादव
रबी देवी – यादव
नीतीश कुमार – कुर्मी
जीतन राम मांझी – दलित (महादलित)


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