Monday, 6 April 2026

नक्सल आंदोलन के समय मध्य बिहार में फसल, बंदूक और परिवर्तन की कहानी

 ● फसल बन्दूक और परिवर्तन ●



नक्सल पर न्यूज ब्रेक में रिपोर्ट

10 दिसंबर 2000 के अंक में प्रकाशित


सशत्र प्रचार दल द्वारा जारी गांवों में प्रचार के क्रम में उसका पीपुल्सवार से टकराव नहीं होगा। लेकिन 26 नवम्बर की रात ‘सेलारपुर’ में पांच पीपुल्सवार समर्थकों की हत्या लिबरेशन ने कर दी। इसके पूर्व गौरीशंकर सिंह के घर को डायनामाइट से 20 नवम्बर को पीपुल्सवार ने उड़ाया था, जिन पर 1995 में पीपुल्सवार के एक प्रमुख नेता रघु उर्फ बीरबल की हत्या में भूमिका निभाने का आरोप है। माले लिबरेशन की हिटलिस्ट जारी कर उन्हें पार्टी के समक्ष शीघ्र ही आत्मसमर्पण करने की चेतावनी भी पीपुल्सवार ने दी है। उधर जहानावाद के ही चिरारी गांव में हथियारों की वापसी के सवाल पर पीपुल्सवार और भाकपा (माले) लिबरेशन के बीच हिंसक टकराव की आशंका है। पीपुल्सवार के पांच हथियार को लेकर तनाव है। फिर औरंगाबाद के मेहदा गांव में भूमि विवाद में दोनों संगठन आमने-सामने हैं। दक्षिण बिहार के गांवों में हिंसा की आशंका की पुष्टि घोंआकोल (गोह,औरंगाबाद) से गिरफ्तार एम.सी.सी. उग्रवादी कइल प्रजापति के बयानों से भी होती है। परासी में नरसंहार के लिए जुटे हुए दस्ते से प्रजापति को गिरफ्तार किया गया। उसके अनुसार एम.सी.सी के निशाने पर एक कांग्रेसी नेता ललित, बरपा, दादर, बरुण, पिसाय परासी एवं सोनडीहा गांव है। खबर है कि एम.सी.सी का ‘दस्ता’ कुर्था एवं करपी (जहानाबाद) थाना क्षेत्र में विगत 10 दिनों से जमा हुआ है। टिकारी (गया), उपहरा (औरंगाबाद) एवं कोंच (गया) के सीमावर्ती इलाके में ‘लाल त्रिकोण’ वाले क्षेत्र में स्वच्छंद होकर घुमते देखा गया है। एम.सी.सी की योजना कुर्था, करपी, उपहरा, कोंच, टिकारी में बड़ी हिंसा की है। इससे इस क्षेत्र के भूमिहार बहुल गांवों में दहशत है। 



० उपेंद्र कश्यप ०

वह दिन भी सामान्य था, लेकिन ‘न्यूजब्रेक’ के इस संवाददाता के लिए खास महत्व का था। बताया गया था- ‘आप तैयार रहेंगे, आपको किसी भी दिन कभी भी ‘लाल क्षेत्र’ में ले जाया जा सकता है। यह बताने वाले कथित धीरज की मैं कई रोज से प्रतीक्षा करता था। लेकिन उस दिन कोई दूसरा अपरिचित चेहरा सुदामा मेरे पास आया। मैं सहज दिखने की कोशिश करते हुए अपना बैग लेकर चल पड़ा। कुछ दूरी तय करने के बाद मेरी स्कूटर को कसी दूसरे अपरिचित ने ले लिया और फिर मेरी आंखों पर पट्टी बांध दी गयी। करीब आधे घंटे बाद मैं एक सुदूरवर्ती अति पिछड़े गांव में था। कौन सा? नहीं बताया गया। किसी नहर के किनारे स्थित उस गांव में मुझे पक्के अर्द्धनिर्मित या निर्माणाधीन बस दो या तीन घर दिखे, बाकी खपरैल या झोपड़ी ही थी। सार्वजनिक चापाकल पर बर्तन मांजती औरतें, कृषि कार्य में व्यस्त बड़े-बुजुर्ग, उछलते-कुदते बच्चे सब कुछ सामान्य गांव की तरह लग रहा था। पहले मिसरी और मिक्चर के साथ पानी दिया गया। बाद में पोठिया मछली और मोटा पंकजवा चावल का भात परोसा गया। पसंद के विपरीत किसी तरह इसे खाया। खाना खिलाने वाले परिवार से सामाजिक- पारिवारिक मुद्दे पर चर्चा होती रही। विडम्बना देखिए! जो  व्यक्ति समाज बदलने की कोशिश में लगा है उसका चचेरा भाई औरंगाबाद समाहरणालय में कार्यरत है। पैसा वाले इस भाई को जब घर से पंकजवा चावल भेजा गया तो उसने टिपपणी की थी- ‘क्या समझता है?  पंकजवा चावल पहुंचा दिया? यह आदमी खाता है? इसे तो गधा खाता है।’  यह दृष्टिकोण समाज बदलने के सपने पर ही चोट है। इस परिवार को इसका दुःख है कि सिर्फ सवर्ण ही नहीं बल्कि कोइरी जैसी पिछड़ी जाति के समृद्ध किसान भी बन (मजदूरी) सही नहीं देते। घटिया चावल देते हैं।



मैं लिबरेशन की मांद में था। वहां मैंने एक मर्यादा बनाये रखी। किसी का नाम नहीं पूछा। वैसे यह स्पष्ट था कि जो नाम बताया भी जाएगा वह या तो गलत होगा या फिर पार्टी का खास नाम। हम गांव से निकलकर जंगल की ओर गये। लोगों ने जंगल की ओर जाते देखा भी होगा। बाजार से लौट रहे ग्रामीण लाल दस्ते को देखकर ‘लाल सलाम’ करते हुए सहजता से आगे बढ़ जाते। मैंने फिर सवाल किया- इन लोगों के देखने से दिक्कत नहीं होगी? सशत्र दस्ते को लगा कि मैं भीतर से सुरक्षा को लेकर चिंतित हूं। कहा गया- ‘पत्रकार साब! आप निश्चिन्त रहो । पुलिस कभी हिम्मत नहीं कर सकती इधर आने के लिए। फिर यदि ऐसा हुआ तो हम उसे तीन घंटे तक रोक सकते हैं। तब तक धुंधला हो जायेगा और तब कोई भी पुलिस बल इस ‘जंगल’ में आने को साहस नहीं करेगा। तब तक आपको सुरक्षित स्थान पर पहुंचा दिया जायेगा।’ पुछा- पुलिस क्यों नहीं मोर्चा ले सकती है! बहुत व्यावहारिक उत्तर था- ‘उसे नौकरी करती है सो जिंदा बचे रहने की कोशिश करती है, जबकि हम अपनी जान पहले ही दे चुके होते हैं। नक्सली आधार वाले गांव में लोग लाल फौज पर भरोसा करते हैं और उसकी इज्जत करते हैं। उसे सुरक्षा देते हैं, पूरा गांव अपने क्षेत्र के ‘लाल दस्ते ’ के सभी सदस्यों से परिचित होता है।



खैर! अंत में इस जंगल से लौटते वक्त साथ आ रहे सुदामा (अपरिचित ) से मैंने एक सवाल किया -दस्ता वाले नहीं लौटे? उत्तर था- हमें गांव से जंगल की ओर जाते देखने वालों में संभव है कोई विरोधी संगठन का भी हो, सो उसे यह ज्ञात नहीं होना चाहिए कि हमारे अंतिम गंतव्य की दिशा क्या है?’ अपने लक्ष्य को छुपाना इनकी आवश्यकता होती है। माले का हथियारबंद दस्ता इलाके में तो घूम ही रहा है, पीपुल्स वार और एमसीसी का भी लाल दस्ता अपने टारगेट की तलाश में है। किसानों की सुरक्षा के नाम पर रणवीर सेना भी  सक्रिय है। जैसा कि खुफिया विभाग का मानना है कि धनकटनी के बाद मध्य बिहार में नरसंहारों का तांता लग सकता है।’ अभी शान्ति है, लेकिन अंदर से स्थिति भयावह है। मध्य बिहार के सैकड़ों गांवों की शाम संगीनों के साये में ढलती है। दिन के उजाले में रणवीर सेना एवं नक्सली संगठनों के सशस्त्र दस्तों की सक्रियता गांवों में बढ़ गयी है। खेतों के मालिक संभावित विरोध से निपटने के लिए प्रयाप्त आदमी और हथियार जुटाने में लग गये हैं। सिर्फ धनकटनी को लेकर ही नहीं बल्कि ‘बैंलेस ऑफ़ टेरर’ एवं इलाका विस्तार की कोशिशों को लेकर भी सशस्त्र दस्तों की सक्रियता बढ़ी है।


खेतों में जब तक धान की फसल लगी रहती है, प्रायः सुदूरवर्ती गांवों में नरसंहार नहीं होते। और जैसे ही फसल कटनी शुरू होती है- ग्रामीण इलाकों में कई मामूली मुद्दों पर तनाव बढ़ना शुरू हो जाता है। धनकटनी के बाद प्रायः मामूली विवाद भी हिंसक रूप अख्तिार कर लेता है। दरअसल तब खेत खाली हो चुके होते हैं, और हमलावर दस्तों को अपेक्षाकृत सुगम मार्ग उपलब्ध हो जाते हैं। यही कारण है कि धनकटनी को लेकर उपजे विवाद आतंक के संतुलन के सिद्धांत और इलाका विस्तार को लेकर जारी संघर्ष के कारण तब हिसंक टकराव की घटनाएं बढ़ जाती हैं। अभी धनकटनी का मौसम शुरू है- तो गांवों में तनाव भी बढ़ चले हैं। खुफिया विभाग ने बिहार सरकार को नवम्बर में प्रेषित अपनी रिपोर्ट में कहा है कि मध्य बिहार के बक्सर, जहानाबाद, पटना, रोहतास, कैमूर,गया, नवादा, और औरंगाबाद जिलों के 60 से अधिक गांवों में हिंसक टकराव की आशंका है। रिपोर्ट में कहा गया है कि उग्रवादी संगठनों ने अपनी सक्रियता बढ़ा दी है और खेतों मे लगी फसल काटने के लिए किसान संभावित खतरे को देखते हुए प्रयाप्त हथियार और आदमी जुटा रहे हैं। गया, जहानाबाद एवं औरंगाबाद के सीमावती क्षेत्रों- जिसे लाल त्रिकोण कहा जाता है- में लाल दस्तों को घूमते देखा गया है। पालीगंज अनुमण्डल के भरतपुरा, सरकुन्ना, सीही, पनसुही आदि गांवों में लिबरेशन एवं पीपुल्सवार के सशस्त्र दस्ते घूम रहे हैं। इन क्षेत्रों में मालिक-मजदूर के रिश्ते में फिर तनाव व्याप्त हो गया है। अभी पुलिस जिला अरवल के चौरम थाना क्षेत्रों में मालिक- मजदूर के रिश्ते में फिर तनाव व्याप्त हो गया है। अभी पुलिस जिला अरवल के चौरम थाना क्षेत्र के डोरा गांव के आसपास नवम्बर के मध्य में पीपुल्सवार के लगभग 100 सशस्त्र लोगों का जमावड़ा लगा था। पुलिस गयी, लेकिन तब तक दस्ता कहीं और जा चुका था। समझा जाता है कि समीपवतीं गांव ‘सरौती’ में विवादित 85 बीघा जमीन को लेकर यह दस्ता इकट्ठा हुआ था। सरौती के सात किसानों पर आर्थिक नाकेबंदी लगा दी गयी है, जिसके तहत इनके खेतों में लगी धान की फसल काटने से मजदूरों को मना कर दिया गया है। इधर औरंगाबाद जिले के गोह थाना क्षेत्र के बहुरिया बरमा (पुराना जहानाबाद का गांव) के भूपति रमा शर्मा की रैयती करीब 45-50 बीघा जमीन पर भाकपा माले कब्जा कर गरीबों में बांट देने का दावा करती है तो वे न्यायालय से अपने पक्ष में डिग्री ले आए हैं। माले का कहना है- न्यायालय से न्याय खरीदा जाता है। 10 वर्षों से यह विवाद जारी है। क्षेत्र में जब रणवीर सेना अपना पैर जमा चुकी है और वह रमा शर्मा को संरक्षण दे रही है। इसका एक कारण तो यह भी है कि ऐसे मामलों में सफलता पाकर रणवीर सेना अपना जनाधार बढ़ाना चाहती है। दोनों इस विवाद को प्रतिष्ठा का प्रश्न बना चुके हैं। उधर, रोहतास जिले के नवलेश सिंह (यदुनाथपुर) और रमेश चौबे (परछा) की जमीनों पर नाकेबंदी जारी है। नालंदा जिले के इस्लामपुर थाना के धमौली गांव में 8 कट्ठा की गैर मजरूआ आम जमीन पर लगी धान की फसल काटने को लेकर मध्य नवम्बर में चार चक्र गोलियां चलीं। धनकटनी को लेकर हुई ताजा घटना में 17 नवम्बर को रोहतास के कोरी गांव में चार चक्र गोली चली जिसमें दो हरिजन मारे गये और तीन घायल हो गये। औरंगाबाद में भी धनकटनी को लेकर तनाव बढ़ना शुरू हो गया है। रोहतास जिले के उच्चाधिकारियों को दी गयी अपनी रिपोर्ट में खुफिया विभाग का मानना है कि दिनारा के दस, काराकाट के आठ एवं नौहट्टा थाना क्षेत्र के दो गांवों सहित जिले के नोखा, करगहर व दिनारा थाना क्षेत्र की सीमा पर अवस्थित लगभग 50 गांवों में धनकटनी को लेकर तनाव है। इस जिले में भाकपा (माले ) रणवीर सेना तथा किसानों के बीच संघर्ष की आशंका है।



बिहार सरकार को दी गयी अपनी रिपोर्ट में खुफिया विभाग ने रणवीर सेना द्वारा जारी एक नोटिस के हवाले से कहा है- ‘रणवीर सेना का कहना है कि बक्सर जिले के कोरान सराय नवानगर, सोनबरसा, डुमरांव, राजपुर,धनसोई एवं बगेन आदि थाना क्षेत्रों में अति वामवादी उग्रवादियों द्वारा निरीह किसानों  को प्रताड़ित करने एवं उनके सामानों को क्षति पहुंचाने तथा धन की फसल को बर्बाद करने का सिलसिला बदस्तूर जारी रखा गया है। जिला प्रशासन द्वारा उग्रवादियों के सामने घुटने टेक देने से रणवीर सेना कार्रवाई को अब अपने हाथ में लेने के लिए विवश है। दूसरी ओर जहानाबाद के हरदिया, पहाड़पुर, बुलाकी बिगहा, पहलेजा, जलवइया, मधुश्रवा, तबकला, कमता समेत तीन दर्जन गांवों में आतंक एवं खौफ का आलम है।



ग्रामीण सूत्रों के अनुसार औरंगाबाद जिले के गोह, खुदवां, ओबरा, नबीनगर, रफ़ीगंज, मदनपुर, टड़वां, हसपुरा गया के टिकारी, गुरारू, गुरुआ, कोंच, जहानाबाद के कलेर मेंहदिया, अरवल, रोहतास के नवहट्टा, दिनारा, चेनारी आदि। थाना क्षेत्रों में धनकटनी को लेकर तनाव बढ़ रहा है। दूसरी ओर इलाका विस्तार और बैलेंस ऑफ़ टेरर को लेकर भी मध्य बिहार के गांवों में तनाव है क्योंकि अपने उद्देश्यों की पूर्ति में नक्सली संगठन और निजी सेना सक्रिय हैं। पालीगंज अनुमंडल के दुल्हिन बाजार थाना क्षेत्र में पीपुल्सवार तथा भाकपा (माले) लिबरेशन के बीच संघर्ष जारी है। दरअसल पीपुल्सवार जहानाबाद से पूर्वोत्तर की ओर पटना के इलाके में अपना विस्तार व  से   चाह रहा है। उसके मार्ग में सवसे बड़ी बाधा लिबरेषन है। इस क्षेत्र में माले (लिबरेषन) का व्यापक जनाधार है जिसकी बजह से दोनों की बंदूकें एक दूसरे के रिुद्ध गरजती रहती है। इस संघ  में गत दिनों में दर्जन भर से अधिक हतथाएं हो चुकी हैं। रोहतास में रेंजर वीर बहादुर राम की नक्सलियों ने हत्या कर दी । इलाके में नक्सलियों का खौफ इतना अधिक है कि पुलिस वाले जब बस में सवार होते हैं तो अपनी वदी बदल लेते हैं। पीपुल्सवार वालों ने रोहतास के कभी समृद्ध रहे गांव दारानगर को अपना मुख्य केंद्र बना लिया है। यहां दिन में जनअदालत लगाकर सजाएं दी जाती हैं। इलाके की कई बंदूकें लूट ली गयीं और हत्याएं की गयीं। अब नक्सलियों ने व्यवसायिों को अपनी दुकाने शाम होने के पुर्व ही बंद कर देने का फरमान जारी कर दिया है। फरमान के कारण अब अधिकांश दुकानें बंद ही रहती है।


 अपने इलाका विस्तार की कोशिश में लगे मार्क्सवादी कम्युनिस्ट सेंटर  (एम.सी. सी.)  ने कोडरमा क्षेत्र के पूर्व एरिया कमाण्डर प्रकाश को चान्हों क्षेत्र की जिम्मेदारी सौंपी है और इसके केन्द्रीय नेताओं के गुपचुप दौरे की सूचनाएं प्राप्त हो रही हैं। उधर मध्य बिहार के गांवों में अपना जनाधार बढ़ाने की कोशिश के तहत भाकपा (माले) लिबरेशन ने ‘सशस्त्र दल ’ का गठन किया है, जो गांव में जा- जाकर ग्रामिणों को वैचारिक रूप् से अपनी नीतियां समझाता है (विस्तृत रिपोर्ट देखें)। फिर इन नक्सली संगठनों में आपसी संघ  भी यदा-कदा हिंसक हो जाता है।


दरअसल इन संगठनों के ग्राम स्तर या पंचायत स्तर की कमेटियों पर इलाका विस्तार के लिए उच्च कमेटियों का दबाव रहता है। इनके आपसी संघ का मूल कारण यही होता है। सैद्धांतिक मतभेद का कारण कम होता हैं फिर ये नक्सली संगठन अपने कोष के लिए भी प्रयास करते हैं। इसमें भी कभी-कभी दोनों के हित टकराते हैं तो हिंसा होती है। इस सब से गांवों में तनाव बढ़ा है। इधर मजदूरों एवं मालिकों के रिश्ते में भी खटास आने की सूचना है। औरंगावाद के गोह थाना के गैनी गांव में गत महीने एक मरी हुई गाय को उठाकर फेंकने के लिए गांव का कोई हरिजन तैयार नहीं हुआ। अंततः प्रभावित पक्ष ने बाहर से मजदूर मंगाकर इसे फेंकवाया। गांवों में इस बात को लेकर भी चर्चा है कि रणवीर सेना या एस.सी.सी. द्वारा धनकटनी के बाद कभी भी नरसंहार किया जा सकता है ऐसा खुफिया विभाग भी मानता है। अक्टूबर महीने के प्रारंभ में बिहार सरकार को दी गयी अपनी रिपोर्ट में विभाग का मानना है कि रामबिलास पासवान के केंद्रीय मंत्री बनने के बाद रणवीर सेना ने दलितों के प्रति नरम रुख अख्तियार करने की योजना बनायी है। यही कारण है कि मध्य बिहार में अभी दलित समुदाय के लोग राहत महसूस रहे हैं। इस दौरान रणवीर सेना और एम. सी. सी. आमन-सामने हैं। रणवीर ‘सेना’ को आशंका है कि उत्पाद एवं मद्य निषेध राज्यमंत्री सुरेंद्र यादव एम. सी. सी के पीछे रहकर उसकी मदद कर रहे हैं। खुफिया विभाग मानता है कि अभी हाल में राजद में गये एक उद्योगपति सांसद उग्रवादी संगठनों को लाखों रुपये से मदद करते है।  दूसरी ओर भाजपा- समता के कई विधायक, सांसद रणवीर सेना की मदद करते हैं। रिर्पाट में माना गया है कि ‘धनकटनी के बाद नरसंहारों का तांता लग जाता है।’   


 



■ माले का सशस्त्र प्रचार दल ■     


भाकपा माले लिबरेशन ने अपनी नीतियों और कार्यक्रम के प्रचार के लिए सशक्त प्रचार दल का गठन किया है। यह दल गांव के गरीबों, हरिजनों, दलितों, शोषितों, वंचितों में राजनीतिक चेतना जागृत करने , उन्हें सम्मान दिलाने तथा बड़े जोतदारों के विरुद्ध संर्घष के लिए सुरक्षा की गारण्टी देते हुए प्रेरित करने का कार्य कर रहा है। किसी नक्सली संगठन के लाल दस्ते या लाल फौज के प्रचलित रूप् से एकदम भिन्न इस ‘सप्रद’ के जिम्मे सिर्फ राजनीतिक कार्य ही सौंपे गये हैं। यह लाल दस्ता से अलग है। भाकपा (माले) लिबरेषन के जिला सचिव कमल ने इसके उद्देश्य के बारे में ‘न्यूजब्रेक’ को बताया- ‘ सामंती तत्व अपने लठैतों एवं हथियारों के बल पर गांवों में राजनीतिक कार्य को बाधित करते है। कहीं- कहीं इसे जबरदस्ती रोका जाता है। इसलिए ऐसे चिहिृत इलाके में सप्रद जाकर राजनीतिक कार्य करता है। वह ग्रामीण जनता को बड़े जोतदारों की तरफ से होने वाले संभावित हिंसक विरोध के प्रति आश्वस्त करता है और उसे इनके विरुद्ध संर्घष जारी रखने के लिए प्रेरित करता है। ये लोग खुले ढंग से गांवों में कार्यक्रम कर अपनी नीतियों का प्रचार करते है। और  जब संर्घष  की आवश्यकता पड़ती  है , ये लोग हथियार उठा लेते हैं। भानू कहता है- ‘ हम गरीबों के सुरक्षा गार्ड हैं, हम धांधली एवं विकास के मुद्दे पर जनता  को जागरूक  कर एकजुट करने की कोशिश करते हैं। ‘ वंचित समाज को उसका हक दिलाने की कोशिश में लगे सप्रद के सदस्य ईमानदारी, निष्ठा, आस्था,  त्याग, उत्तरदायित्वबोध एवं समर्पण भाव के निकष  पर खरा साबित हुए होते हैं। अपनी निष्ठा एवं समर्पण भाव को कई किस्तों में एक पार्टी कार्यकर्ता साबित कर चुका होता है तभी उसे सशस्त्र दस्ते का सदस्य बनाया जाता है। एक तरह से अपना जीवन अपने उद्देष्य की पूर्ति के निमित्त ये लोग दान कर चुके होते हैं। पार्टी को  या समाज को । और इसके बदले में उन्हें कुछ भी भौतिक उपलब्धि प्राप्त नहीं होती। जब कोई घायल हो जाता है तो उसके इलाज के लिए ग्रामीणों के बीच से चंदा मांगा जाता है और कोई मारा जाता है तो उसकी बेवा एवं बच्चों को सिुर्फ दशहरा या होली में कपड़े दिये जाते हैं। माले की ओर से बस इतना ही दिया जाता है। बावजूद इसके सप्रद में आने वाले लोगों की कमी नहीं दिखती। इसके मूल में कहीं न कहीं कोई विवशता है, उत्पीड़न से बचने की छटपटाहट है। बहरहाल, सशस्त्र प्रचार दल गांवों में अपना ‘राजनीतिक कार्य’ जारी रखे हुए है।


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