Friday, 4 January 2019

3477 दिन की लंबी प्रतीक्षा के बाद पुनर्जीवित हुए स्व.रामबिलास सिंह

तत्कालीन विधायक सत्यनारायण सिंह अपने राजनीतिक गुरु रामबिलास सिंह के साथ


अनुमंडल कार्यालय के सामने लगाई गयी उनकी प्रतिमा
दाउदनगर को अनुमंडल बनवाने का है उनका ही श्रेय
० उपेन्द्र कश्यप०  
शुक्रवार 04 जनवरी 2019 को एक बार फिर से जी उठे राम बिलास सिंह। उनके निधन के बाद उनके पुनर्जीवित होने के बीच 3477 दिन गुजर चुके हैं। उनका निधन 22 जून 2009 को हुआ था। इसके बाद उनको मूर्त रूप में जीवित करने की कोशिश लगातार होती रही। पृथ्वी छोड़कर किसी और दुनिया में जाने के बाद इनके बारे में जानने की जिज्ञासा कईयों में थी। उनके निधन के बाद मैंने लगातार प्रत्येक वर्ष दैनिक जागरण में उनको स्मरण करता/कराता रहा था। जब 2012 में सन्दर्भ ग्रन्थ “उत्कर्ष” का (द्वितीय अंक) प्रकाशित किया तो उसमें दाउदनगर अनुमंडल के जिन पांच महान आत्माओं का जीवनवृत प्रकाशित किया था उसमें राम बिलास बाबू भी एक थे। उनसे मिलने और उनका साक्षात्कार लेने का कई अवसर मैंने गढ़ा। उनके राजनीतिक और सामाजिक अनुभव को सार्वजनिक किया। अपने जीवन के अंतिम क्षण में उनके अनुभव बहुत कटु हो गए थे। समाज और राजनीति दोनों क्षेत्र से। उन्होंने अनुमंडल बनाने के लिए क्या-क्या संघर्ष किया- यह अखबार में छपने के अतिरिक्त 2007 में प्रकाशित संदर्भ ग्रन्थ “उत्कर्ष” में विस्तार पूर्वक पहली बार पूरा संघर्ष लिखा। जिसे बाद में कुछ पत्रकारों ने उत्कर्ष का श्रेय काटकर प्रकाशित किया। अब उनकी प्रतिमा इसी अनुमंडल कार्यालय के सामने खड़ी की गयी है। विधिज्ञ संघ के प्रयास से।


ऊर्जा मंत्री बिजेंद्र यादव ने अनावरण किया। विधायक बीरेंद्र सिन्हा, पूर्व विधायक सत्यनारायण सिंह और जदयू के वरिष्ठ नेता प्रमोद सिंह चंद्रवंशी ने अनावरण में साथ निभाया। प्रतिमा के लिए भी संघर्ष चला। करीब सात-आठ वर्ष पूर्व तत्कालीन विधायक सत्यनारायण सिंह ने प्रतिमा स्थापना के लिए शिलान्यास किया था। आज वह मूर्तरूप में सबके सामने है। पूर्व विधायक सत्यनारायण सिंह ने कहा कि जब विधायक बना तो पता चला कि तीन पूर्वजों राम बिलास सिंह (तब जीवित थे), संत पदारथ सिंह और राम नरेश सिंह का सामाजिक राजनीतिक योगदान काफी है। तीनों महान आत्माओं की प्रतिमा लगाने का काम किया। राष्ट्रीय इंटर स्कूल में संत पदारथ और राम नरेश सिंह की तथा ओबरा में संत पदारथ की प्रतिमा लगवाया। राम बिलास सिंह के निधन के बाद कुछ माह तक ही विधायक रह सके थे सत्यनारायण सिंह। याद करें वे 2005 में विधायक बने थे। इसके बावजूद उनकी प्रतिमा एक स्कूल में लगवाया। उन्होंने अब मांग की है कि दाउदनगर-नासरीगंज सोन पुल का नामकरण इनके नाम पर हो।   

जाति नहीं जमात और विकास की बात करते थे
राज्य अति पिछड़ा आयोग के पूर्व सदस्य, जदयू के वरिष्ठ नेता प्रमोद सिंह चंद्रवंशी ने कहा कि राम बिलास सिंह जाति नहीं जमात की राजनीत करते थे। हालांकि उनके नाम लेकर राजनीति करने वाले जात की बात करते हैं। यह गलत है, सुधार जरुरी है। कहा कि लंबी प्रतीक्षा के बाद मंत्री बीजेन्द्र यादव ने अनावरण किया जो स्व.राम बिलास सिंह के साथ काम कर चुके हैं।  


Tuesday, 18 December 2018

सूबे बंगाल की सत्ता का केंद्र विन्दु रहे दाउदनगर के युवाओं को जाग्रत होने की जरुरत


दाउदनगरडॉटइन का आयोजन ‘दाउदनगर उत्सव’ सफल रहा। इसके विभिन्न पहलुओं पर मेरी दृष्टि। प्रशंसा भी, समालोचना भी, सलाह भी और कुछ ख़ास भी.....


(सन्दर्भ-दाउदनगरडॉटइन द्वारा आयोजित 
“दाउदनगर महोत्सव”)
०० उपेन्द्र कश्यप ००
दाउदनगर कई दिन की हलचलों के बाद शांत हो गया। यह हलचल थी दाउदनगरडॉटइन द्वारा आयोजित “दाउदनगर महोत्सव” से संबद्ध सांस्कृतिक गतिविधियों की वजह से। कभी सबसे बड़े ‘खुला-शौचालय’ का तगमा रखने वाले दाउद खां कुरैशी के किला परिसर में अपनी तरह का यह दूसरा आयोजन था। 16 दिसंबर के पूर्व गत वर्ष भी यही आयोजन हुआ था। महत्वपूर्ण है कि तब किला का जीर्णोद्धार कार्य आधा से अधिक हो चूका था। मो.इरशाद और नीरज कुमार की मित्र मंडली का यह प्रयास सर्वथा सराहनीय है। एक अच्छी कोशिश और सकारात्मक पहल। एक उम्मीद जगाती युवा और उर्जान्वित टीम दिखती है। पुरे कार्यक्रम में डिजिटल युग का प्रभाव दिखता है। उदघाटन सत्र में मैं था। इस कारण एसडीएम अनीश अख्तर के साथ डिजिटल तरीके से उद्घाटन किया और गुब्बारा भी उड़ाया-जिसे शान्ति का प्रतिक बताया गया। अब भला सफ़ेद कबूतर मिलते भी कहां हैं? साथ में अश्विनी तिवारी रहे। एसडीपीओ राज कुमार तिवारी के साथ भी मंच साझा करने का मौका मिला।
 उनसे गुफ्तगुं हुई तो उद्घोषक आफताब राणा से दुसरी बार माइक मांग लिया। मैंने बताया कि दाउदनगर किला को राष्ट्रीय महत्त्व के धरोहर वाले स्मारकों की सूची में जगह दिलाई जाए। इस सन्दर्भ में मैं और गोह विधायक मनोज कुमार पर्यटन विभाग के प्रधान सचिव से मिल चुके थे। तब साथ में धर्मवीर भारती थे। किला के विकास के लिए एसडीपीओ से सहयोग लेने को दाउदनगरडॉटइन से कहा तो नीचे खड़े इरशाद ने अंगूठा दिखाया। आशान्वित किया कि उनकी टीम अब पहल करेगी। किला का सौन्दर्यीकरण हुआ किन्तु अधूरा क्योंकि चारदीवारी पुरी तरह इसलिए नहीं बन सकी क्योंकि अतिक्रमण नहीं हटाया जा सक रहा है। बहरहाल, आयोजन बेहतर है, सकारात्मक है। आने वाले समय में यह बड़ा आयाम प्राप्त कर सकता है- यदि कोशिश समष्टि में हो।

जिन्दगी उलझी रही ब्रह्म की तरह:-
एसडीपीओ राजकुमार तिवारी ने अपनी बात शुरू कि- कोई कंघी न मिली जिससे संवारु इसको, जिंदगी उलझी रही ब्रह्म की तरह। मगध का इतिहास और सोन की धारा का जिक्र किया। बोले- मग का अर्थ है आग का गोला। मगध हमेशा इंटरफेस (अभिव्यक्त या रिफ्लेक्ट करता है मगध भारत की हर घटनाओं को) रहा है। तपस्वी भृगु और च्यवन की यह धरती है। मग ब्राह्मण बाहर से महाभारत काल में लाये गए। यह मगध ही है जिसने गौतम को बुद्ध बना दिया। यहां ऐसी ताकत है जो व्यक्ति को जिंदा बना देता है। 1662 से 1672 तक दाउदनगर सत्ता का केन्द्र रहा। दाउदनगर से दाऊद खान ने सत्ता चलाया। इस पर गर्व करें। जब तक गर्व करने का माद्दा नहीं रहेगा तब तक आप विकास नहीं कर सकते। कहा यह जीर्णोद्धार का बाट जोह रहा है। आप सजग हो जाएं तो कुछ भी असंभव नहीं है। यहां के लाल चाहे जहां रहते हों इसके संरक्षण के लिए प्रयासरत रहें। गौरव की अनुभूति करिये कि यहां से बिहार की सत्ता का संचालन होता था। युवा आगे आएं। शहर और यहां के युवाओं को जाग्रत होने के जरूरत है।

आलोचना से परे कुछ भी नहीं, किन्तु उसे लें सकारात्मक:-
आलोचना से परे कुछ भी नहीं होता। प्रशंषा सबको प्यारी लगती है। किन्तु आलोचना को जब सकारात्मक लेंगे तो सुधार बेहतर होगा। याद रखिये-सुधार की गुंजाइश सदैव हर जगह बनी रहती है। इरशाद के लिखे और आफताब के बोले गए शब्द प्रभावी हैं। तकनीक का इस्तेमाल प्रभावी बनाता है शब्दों को, किन्तु दायरा सिमटा सा लगा। “मैं दाउदनगर हूँ“ को उतने ही शब्दों में और व्यापक बनाया जा सकता है। जितना बताया गया है, वास्तव में दाउदनगर बस उतने भर नहीं है। बोली गयी डिजिटलबद्ध पंक्तियों को जब कोइ नया व्यक्ति सुनेगा, जो दाउदनगर को नहीं जानता है, या फिर कम जानता है तो उसे ही संपूर्ण मान लेगा। इसकी वजह है- यह शीर्षक। इसलिए सुधार पर विचार होना चाहिए। इन पंक्तियों में दाउदनगर की संपूर्ण संस्कृति नहीं झलकती है। जिउतिया को खारिज नहीं किया जा सकता है। इसके कुछ पहलुओं से कोइ सहमत नहीं भी हो सकता है, किन्तु दाउदनगर की संस्कृति का हर पहलु जिउतिया लोकोत्सव पर ही रिफ्लेक्ट करता है। किसी अन्य पर नहीं। एक यही आयोजन है जब दूर दराज के लोग इसे देखने दाउदनगर आते हैं। दाउदनगर का प्रतिनिधित्व किसी भी सांस्कृतिक मंच पर जिउतिया ही कर सकता है, दूसरा कुछ भी नहीं। यह ‘मैं दाउदनगर हूँ’ के लेखक भाई इरशाद को ध्यान रखना चाहिए।

Friday, 5 October 2018

असल भारतीयता दिखाता है श्रमिक समुदायों का दाउदनगर जिउतिया लोकोत्सव


(सन्दर्भ-पाखण्ड से इतर लोक का विचार-डॉ.अनुज लुगुन-प्रभात खबर-05-10-2018)
 नगर परिषद द्वारा “जिउतिया लोकोत्सव” आयोजन को लेकर पहले संशय पैदा करने, फिर उसे खारिज करने और फिर जन दबाव में एकाधिक पार्षद प्रतिनिधियों द्वारा अगले वर्ष आयोजन करने का भरोसा देने, कलाकारों द्वारा आन्दोलन किये जाने जैसे अवांक्षित मुद्दों की गरमाहट के बीच दाउदनगर जिउतिया लोकोत्सव संपन्न हो गया अपने पीछे कई सवाल छोड़ गया सवाल से अधिक यह कहना उचित जान पड़ता है कि-चिंताएं छोड़ गया चिंता इस बात की कि क्या नगर परिषद “जिउतिया लोकोत्सव” का आयोजन नहीं करेगा? जिसका आगाज 2016 में “श्रमण संस्कृति का वाहक-दाउदनगर” के लेखक उपेंद्र कश्यप की पहल पर हुआ था विरोध तो तब भी हुआ था 23 में 08 वार्ड पार्षद खिलाफ में थे इस बार टिप्पणी आयी कि-अमुक खरीदारी में घोटाले का आरोप था, इससे ध्यान हटाने के लिए आयोजन किया गया था इस तर्क पर देखें तो फिर विकास का कोई कार्य नहीं होना चाहिए, क्योंकि घोटाला तो नेहरू के जमाने में जीप खरीद से ही शुरू हो गया था तब से अभी तक हर कार्य में कमीशनखोरी, और हर संवैधानिक संस्था में “सरकार” गठन के लिए खरीद-फरोक्त होना चर्चा में रहता है तो क्या अब हाथ-पर हाथ धर कर बैठ जाया जाए जो हमारे से संतुष्ट नहीं हैं, वे भला हमारे काम से कैसे संतुष्ट हो सकते हैं? वे हमारा भला क्यों चाहेंगे? समाज के भले के लिए ‘सब’ नहीं ‘कुछ’ लोग ही दर्द ले सकते हैं, दर्द लेते हैं, और ऐसे ही लोगों से काम चलता है

विरोध करने के लिए विरोध करने वाले, श्रीमानों !

सोच के संकीर्ण दायरे से बाहर निकलिए हाँ, ऐसा करना सहज नहीं होता, क्योंकि पूर्वाग्रह, दुराग्रह आदमी को इस कदर जकड़ लेता है कि उसे पता ही नहीं चलता कि वह किसका और क्यों विरोध कर रहा है? उसके विरोध का अंजाम क्या होगा, किसे कितना नुकसान होगा, यह दिखता ही नहीं है व्यक्ति को लक्ष्य करने के परिणाम स्वरूप समाज-संस्कृति-सभ्यता को क्षति पहुँचती है खैर, उम्मीद की जानी चाहिए कि अगले वर्ष फिर से नगर परिषद “जिउतिया लोकोत्सव” का आयोजन करेगा विरोधी शहर की संस्कृति के आगे नतमस्तक होंगे      

खैर...
जिउतिया जाते-जाते एक सुखद इतिहास लिख गया प्रभात खबर के संपादकीय पन्ने पर डॉ.अनुज लुगुन ने “पाखण्ड से इतर लोक का विचार” शीर्षक से अग्रलेख लिखा है वे 02 अक्टूबर को दाउदनगर गए थे मुझसे मेरी किताब ली, और कई विषयों पर संक्षिप्त चर्चा की थी यह सकारात्मक आलेख है, जिसमें शहर का नाम आया है, अन्यथा किसी शहर का नाम इस तरह के लिखे में तो नकारात्मक कारणों से ही प्राय: आता है लेकिन इससे गौरव का बोध उन्हीं को होगा, जो सकारात्मक सोच रखते हैं, अन्यथा कुछ जलेंगे, कुछ झेपेंगे, कुछ भीतर-भीतर विरोध करगें गाना गुनगुना लीजिये- कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना
विरोध करने वाले, जिउतिया को खारिज करने वाले और जिउतिया को वंचित, शोषित, दलित समाज का बता कर खारिज करने की कोशिश करने वालों अनुज लुगुन को पढ़ लो पूरा नहीं पढ़ सकते तो यहाँ कुछ ख़ास दे रहा हूँ, शायद आँखों की पट्टी खुल जाए अगर वास्तव में थोड़ा सा भी शहर से प्यार है, शहर की अपनी संस्कृति पर गर्व है, तो पढ़ने से गौरव का बोध होगा, अन्यथा तो जिसने आँख बंद कर ली है, उससे कुछ नहीं कहना:-

अनुज लुगुन के आलेख 
पाखण्ड से इतर लोक का विचार 
से कुछ पंक्तियाँ:-  
इस माह में मगध अंचल में मनाया जानेवाला एक त्योहार है ‘जिउतिया’. इस अंचल के दाउदनगर का जिउतिया सबसे ज्यादा लोकप्रिय है. वहां इस अवसर पर लगभग सप्ताह भर से स्वांग, नकल, अभिनय और झांकियां प्रस्तुत की जाती हैं. लोक कलाकार हैरतअंगेज करतब दिखाते हैं. आमतौर पर हिंदी पट्टी में स्त्रियों की सार्वजनिक भागीदारी बहुत कम दिखती है. यहां तक कि प्रगतिशील संगठनों के कार्यक्रमों में भी. यह हिंदी पट्टी का सामंती और पितृसत्तात्मक लक्षण है. लेकिन, दाउदनगर के जिउतिया त्योहार में स्त्रियों की बराबर की उपस्थिति ने इस पर पुनः विचार करने को विवश किया है. त्योहार के कार्यक्रम की व्यवस्था आपसी सहयोग-सद्भाव के साथ सभी स्थानीय समुदायों के लोग मिल-जुलकर करते हैं. 
लगभग डेढ़ सौ वर्षों से चले आ रहे, कई दिनों तक रातभर चलनेवाले कार्यक्रम में लाल देवता और काला देवता नामक प्रहरी के जिम्मे सुरक्षा का भार होता है और दोनों उसी भेष में घूम-घूम निगरानी करते हैं. ये प्रतीक पुलिस-प्रशासन की बजाय स्थानीय समुदाय की शांतिपूर्ण और सौहार्दपूर्ण व्यवस्था के हैं. यह सामुदायिक भागीदारी के द्वारा सुरक्षा का उदाहरण है. पुरोहितवाद और कर्मकांड के पाखंड से इतर यह त्योहार अपने अंदर लोक जीवन और कलाओं का समागम तो है ही, यह अपनी भंगिमाओं में लोक का वैचारिक प्रतिनिधि भी है. 
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का मानना रहा है कि संस्कृति और साहित्य के अंदर जो द्वंद्व दिखायी देता है, वह मूलतः लोक और शास्त्र का द्वंद्व होता है. लोक श्रमिक समाज की दुनिया है, जबकि शास्त्र पोथियों की दुनिया है. लोक चिंता और शास्त्र चिंता के बीच हमेशा टकराव चलता रहता है. उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि एक समय में ब्राह्मण धर्म को अवर्ण धर्म ने पराजित किया. यह लोक का पक्ष था. आगे चलकर लोक का नया दर्शन ही बना- तंत्र. यह साधनामूलक था, जिसने शूद्र और वंचितों को अधिक स्वतंत्रता दिया और उसकी मान्यताओं ने शास्त्र को चुनौती दी.
लोक अपने तमाम अंतर्विरोधों के बावजूद सहज और लचीला होता है. वह समन्वय की ताकत रखता है, जबकि शास्त्र ‘श्रेष्ठता बोध’ और ‘चयन’ के विचार से चालित होता है. वह अपने ढांचे के अनुकूल ‘करेक्शन’ करता है, अनुशासन गढ़ता है और संस्थाओं के माध्यम से अपना ‘वर्चस्व’ कायम करता है. इन्हीं अर्थों में लोक का विचार बहुलतावादी है, और शास्त्र वर्चस्वकारी. शास्त्र विचार को एक रंग और एकरूपता देने की कोशिश करता है. बहुलता उसके लिए चुनौती है. इसलिए देखा गया है कि शास्त्र-सम्मत धर्म अपना दूसरा कोई प्रतिरूप नहीं चाहते हैं. शास्त्र के पंडित और पुरोहित अपना वर्चस्व बनाते हैं. वे नहीं चाहते कि उनकी सत्ता उनके हाथ से छूटे.
लोक और शास्त्र के टकराव और दोनों के आपसी लेन-देन को समझे बिना संस्कृतियों का अध्ययन नहीं किया जा सकता है. भारतीय लोक की बहुलता को समझने की कोशिश होनी चाहिए. स्वाधीनता संघर्ष के दौरान और उसके कुछ समय बाद हुए कुछ प्रयासों को छोड़कर हमारा अध्ययन लोक की दिशा में नहीं हुआ. हम कथित आधुनिकता के दबाव में औपनिवेशिक मानसिकता के नियंत्रण में रहे और मध्यवर्गीय आकांक्षाओं में उलझकर लोक को उपेक्षित करते रहे. 
इसलिए देवेंद्र सत्यार्थी जैसे महान लोक अध्येताओं के द्वारा प्रस्तावित लोक संस्कृतियों के जरिये भारतीय बहुलता को समझने की दिशा में हम अग्रसर नहीं हुए. लोक का स्वभाव ही है सामूहिकता और सहभागिता. बिना इसके न तो सामाजिकता संभव है और न ही सामाजिक सुरक्षा. लोक अपने समय की सत्ता के विरुद्ध प्रतिरोध भी गढ़ता है. यह प्रतिरोध समाज के वंचित-उत्पीड़ित समुदायों की कथाओं, गाथाओं और गीतों में सहज ही देखा जा सकता है. 
पूंजीवादी युग में शास्त्र पूंजी के साथ गठजोड़ भी करता है. इस तरह लोक पर केवल शास्त्र का हस्तक्षेप नहीं होता, बल्कि पूंजी भी उस पर हमला करती है. 
देश में जिउतिया की तरह अनगिनत लोक त्योहार मनाये जाते हैं. आदिवासी लोक तो विलक्षण लोक है. इन त्योहारों में ही हम असल भारतीयता को देख सकते हैं. इनमें आंतरिक अंतर्विरोध जरूर होंगे, लेकिन यहां आपसी सद्भाव है. यह श्रमिक समुदायों का उत्सव है. ऐसे दौर में जब हम सांप्रदायिकता के चंगुल में फंसते जा रहे हैं, लोक के उत्सव, राग और संघर्ष से जुड़कर, उससे बहस और संवाद करते हुए ही हम नये जनवादी समाज का निर्माण कर सकते हैं.

Sunday, 23 September 2018

दाउदनगर वालों, तुमसे तुम्हारे पूर्वज मांग रहे हैं- प्रतिदान

दाउदनगर को गढ़ने वालों जागो●
तुम्हारे पुरखों ने शहर की ख़ास संस्कृति गढ़ी है● सामूहिक संस्कार गढ़ा है● प्रारंभ जितना कठीन होता है, उतना अंत नहीं● 156 वर्ष लगे सरकार के सहयोग लेने में, उसे कोई तुरंत खत्म करता है, तो शहर बनाने वालों की पराजय है● जय हमेशा उनकी होती है जो अगुआ होते हैं● पिछलगुओं का, लीक पर चलने वालों का इतिहास नहीं लिखा जाता●
        ■दाउदनगर जिउतिया लोकोत्सव के लिए है आंदोलन की आवश्यकता।■
जिउतिया डॉक्युमेंट्री में इतिहास बताते

यदि संबत 1917 से ही आगाज मानें तो यहां जिउतिया का ख़ास स्वरूप 158 साल से है। 156 वें वर्ष (2016 में) इसे एक उपलब्धि मिली और मेरी पहल, तत्कालीन चेयरमैन परमानंद प्रसाद, उप चेयरमैन कौशलेंद्र सिंह और ईओ विपिन बिहारी सिंह ने नप में आयोजन कराया था। यह उस यात्रा का प्रारंभ विंदू था, जिसे राजकीय दर्जा हासिल करना है।निस यात्रा को गर्भ में ही (प्रथम वर्ष में) मार देने वाले एसडीएम हैं, और अब दुसरे वर्ष जब इसको पुनः प्रारंभ किया जा सकता है, तो  शहर के जन प्रतिनिधि मार रहे हैं।

आयोजन नहीं कराने के पक्ष में मेरी समझ से कोई तर्क नहीं गढ़ा जा सकता है। अब न कराने वाले जो भी कहें, उनको खुल कर अपनी बात रखनी चाहिए। कारण बताना चाहिए। प्रायः वार्ड पार्षद, उनके प्रतिनिधि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर हैं। उनको सार्वजनिक बात रखनी चाहिए।

लोक कलाकारों को सामने आना चाहिए। बोर्ड और ईओ आपकी नहीं सुन रहे हैं, तो एकजुट होइए। सभी मिलकर एक ज्ञापन दीजिये, जैसा कि एक कलाकार ने मुझे बताया है कि ज्ञापन की तैयारी है। कलाकारों को पूर्व चेयरमैन परमानन्द प्रसाद और वीसी कौशलेंद्र सिंह को पकड़ना चाहिए। उनसे नेतृत्व करने को कहिये। हालांकि अच्छा होता वे दोनों खुद नेतृत्व के लिए आगे आएं। कौशलेंद्र जी परमानन्द जी की अनुपस्थिति (बोर्ड) के बावजूद दो की ताकत खुद रखते हैं। कई वार्ड पार्षद हैं जो चाहते होंगे कि आयोजन हो, वे भी साथ आ सकते हैं।

शहर को आयोजन न होने से कितना नुकसान होगा, इसकी कल्पना नहीं कर सकता कोइ भी वह व्यक्ति जिसे संस्कृति की समझ नहीं है।
मुझे लगता है कुछ गिने चुने लोग हैं जो हो सकता है चाहते हों कि आयोजन न हो। इसकी वजह उनकी "प्रभुवादी सोच" है। उनको लगता होगा कि यह उत्सव समाज के निचले तबके का है, इलीट वर्ग का नहीं है। जो जातियां इस समारोह में भागीदार हैं, जिन्होंने अपने पूर्वजों के इस धरोहर को पृथ्वी के एक कोने में सुरक्षित बचा कर रखा है, वही वर्ग नप बोर्ड में प्रभावशाली संख्या में है। शहर उनका है, शहर की संस्कृति उनकी है, शहर का संस्कार उन्होंने गढ़ा है।

इस संस्कृति को, संस्कार को बचाना और आगे बढाने का दायित्व भी उसी जमात के वंशजों और पीढ़ी का है। आप खुद नहीं जागेंगे, तो कोई आपको ना पसन्द करने वाला जगाने नहीं आयेगा। यह कतई संभव नहीं है, कि आप सोये रहिये और विरोधियों से अपेक्षा रखिये कि वे आपको नींद से झकझोरकर जगाने आएंगे। न ऐसा इतिहास में हुआ है, न वर्तमान में हो रहा है, और न ही भविष्य में होगा।

(आज कई फोन मैसेज आये। इसलिए लिख रहा हूँ। शहर को तुरंत आंदोलन की आवश्यकता है। आखिर क्यों नहीं नगर परिषद "दाउदनगर जिउतिया लोकोत्सव" का आयोजन कर रहा है?)

Friday, 21 September 2018

दाउदनगर के सरकारी ताजिया में कहीं नहीं है सरकार


दाउदनगर में सरकारी ताजिया रखा जाता है। कब से और इसमें मुगलिया सरकार की भूमिका क्या रही थी, यह कोई नहीं जानता। यह शहर बिहार के प्रथम गवर्नर सूबेदार दाउद खा का बसाया हुआ है। सन 1662 से 1672 ई. तक शहर का निर्माण हुआ है। आम धारणा है कि दाउद खा ने बरादरी मुहल्ला में सरकारी खर्च पर ताजिया रखवाने की परंपरा प्रारंभ की थी, मगर हकीकत क्या है यह कहीं मजमून के रूप में दर्ज नहीं है। तारीख ए दाउदिया में इसका जिक्र नहीं आता है, जो स्वाभाविक तौर पर दाउद खा और दाउदनगर का इतिहास बताता है। बरादरी मुहल्ला दाउद खा किला के पश्चिम है। पक्के तौर पर यह नहीं कहा जा सकता है कि ताजिया का खर्च दाउद खा देते थे। हालाकि बाद के मुगलिया दौर में ही शासकों की कृपा रही है, सहयोग रहा है। नतीजा आम जनता ने इसे सरकारी ताजिया का तगमा दे दिया, जिसमें आजाद भारत की किसी सरकारी या स्थानीय प्रशासन की कोई भूमिका नहीं रही। बताया जाता है कि अन्य ताजियों की तरह ही इसका वजूद है, सिर्फ नाम का सरकारी है।

खत्म हो गई परंपरा
 सरकारी ताजिया से जुड़ी एक परंपरा सात-आठ वर्ष पहले खत्म कर दी गई। बताया जाता है कि मिनहाज नकीब के घर के पास तूफानी खलीफा और मोहन साव के घर के पास मीर साहब का गोला जमता था। इसी बीच सरकारी ताजिया किला की ओर से मर्सिया पढ़ते हुए आता और दोनों गोलों के बीच चिरता हुआ निकल जाता। कई दफा विवाद भी हुआ। इसे देखते हुए समाज के लोगों ने यह पुरानी परंपरा खत्म कर दी और आपसी विचार सहयोग से नई व्यवस्था लागू हुई कि देहाती क्षेत्र के ताजिया के साथ शहरी ताजिया से एक रोज पूर्व इसका पहलाम होता है।

न राजा न रानी रही, फकत एक कहानी रही

दाउदनगर के पौराणिक इतिहास से लेकर वर्तमान इतिहास तक के सफर पर एकदम संक्षिप्त आलेख।
11 मई 2013 को दैनिक जागरण में प्रकाशित। अचानक गूगल में यह शीर्षक टाइप किया तो यह आलेख मिल गया।

उस खबर का लिंक-https://m.jagran.com/lite/bihar/aurangabad-10382182.html

उपेन्द्र कश्यप, दाउदनगर (औरंगाबाद) : ''न राजा रहा, न रानी रही, फकत एक कहानी रही, लाल वो गोहर सब छोड़ गए, ताबूत सिर्फ उनकी निशानी रही।'' दाउदनगर के गौरवपूर्ण अतीत पर किसी शायर की यह पंक्ति सटीक बैठती है। सिलौटा बखौरा से दाउदनगर बनने की प्रक्रिया, फिर नगर पंचायत, अनुमंडल बनना और इस बीच कई बार गर्वानुभूति के अवसर का मिलना, हमारे अतीत के सुनहरे क्षण रहे हैं। पौराणिक 'कीकट प्रदेश' का पश्चिमी किनारे पर कलकल हजारों साल से बहते सोन नद के तट पर बसा दाउदनगर अपने हजारों साल के इतिहास में न जाने कितनी दफा, कितने झंझावत झेला होगा? कौन जानता है, इस दौर की आबादी, हमारे पूर्वजों को कैसी मुश्किलों का सामना करना पड़ा होगा? इलाके के 'गजहंस' दसवीं सदी पूर्व से लेकर प्रागैतिहासिक काल तक की आबादी से हमें जोड़ते हैं। ऐतिहासिक काल में हमारी मौजूदगी के प्रमाण 322 ईसा पूर्व से लेकर 185 ईसा पूर्व तक रहे स्वर्णयुग - मौर्य काल से जोड़ते हैं, यह संकेत मनौरा में स्थापित बुद्ध प्रतिमा से जुड़ी 'मोर पहनाव प्रथा' से मिलता है क्योंकि मोर पंख मौर्य शासकों का वंश चिन्ह रहा है। छठी सदी में इसलामिक क्रांति से पूर्व हर्षव‌र्द्धन के काल में यहां बुद्ध प्रतिमा के स्थापित होने, हर्षपुरा (हसपुरा) के उपराजधानी (कवि वाणभट्ट के कारण) रहने, वाणभट्ट के पीरु निवासी होने की संभावनाएं हमें गर्व का अहसास कराते हैं। मुगलकालीन भारी में सिलौटा बखौरा को दाउदनगर के रूप में औरंगजेब के सिपहसालार दाउद खां ने विकसित किया। इस शहर की अपनी विशेषताएं हैं। तब दाउद खां ने बड़े करीने से शहर को बसाया था। शांति व्यवस्था का ख्याल रखा था। सामाजिक और जातीय समरसता पर उनका ध्यान था। जातीय नाम से इतने मुहल्ले और जातियों की (सतरहवीं सदी से बसी आबादी के संदर्भ में) एक अलग बोली है। ये दोनों खासियतें बताती है कि यहां बाहर से लाकर विभिन्न जातियों को तब बसाया गया था। जातियां चयन की गयी थी, सामाजिक, पारिवारिक और राजनीतिक प्रशासनिक जरूरतों के मद्देनजर। 'तारीख ए दाउदिया' का हिंदी संस्करण तो नहीं मिलता, हिंदी अनुवाद की कोशिश की जा रही है, इतिहास का यह पुस्तक उपलब्ध दस्तावेज है जिससे आवश्यक जानकारी मिल सकती है। जब 19 वीं सदी में शहरीकरण की कल्पना ग्रास रूट की आबादी नहीं कर पाती थी, सन 1885 में इसे नगरपालिका बनाया गया। नील कोठियां, अंग्रेजी हुकूमत की स्मृति शेष है। आजादी के संघर्ष में राजनीतिक पाठशाला (चौरम) रहा यह इलाका, जहां से समाजवादी विचारधार के ध्वजवाहक निकले। जिसमें संत पदारथ जैसे नेता पिछड़ी हुई आबादी तक शिक्षा की रौशनी पहुंचाने का कार्य किया। करीब 19 वर्ष के संघर्ष के बाद सन 1991 में अनुमंडल बना। अब सपना जिला बनने का है। जिला बनाओ संघर्ष समिति का गठन हुआ है। यह संघर्ष कब तक चलेगा? इतिहास की गर्वोक्ति के साथ वर्तमान संवारने के लिए यह अहम कार्य है। हमारा दुर्भाग्य है कि 'लीडर' नहीं पैदा कर पा रहे हैं। राजनीतिक नेतृत्व के मोर्चे पर हम कमजोर पड़ रहे हैं। मजबूत लीडर नहीं मिल रहा है। सोच बदलने की जरूरत है। याद आती है कि किसी कवि की पंक्ति 'हम अपनी परिधि में कैद हैं, लाचार हैं, इसलिए प्रतिमान के बिगड़े हुए आकार हैं। तुम न बांधो आज यहां पर ये कनात ए कागजी, मुश्किलों से जूझने को हम चलो तैयार हैं।' अंत में यह कि उठो ए नदीम कुछ करें दो जहां बदल डालें। जमीं को ताजा करें, आसमां बदल डालें।

Thursday, 20 September 2018

राज्य की प्रतिनिधि संस्कृति बनाने की आवश्यकता


जिउतिया लोकोत्सव न्यूनतम 158 साल से मनाया जा रहा है। इसमें बिहार की प्रतिनिधि संस्कृति बनने की पूरी क्षमता है। सरकार संस्कृति को बढ़ावा देने की बात चाहे जितनी कर ले, वह बहुजनों के इस पुराने लोक उत्सव को भाव नहीं देती। जबकि वह इसे गंभीरता से ले तो इस संस्कृति को बहुत ऊंचाई दी जा सकती है। आश्रि्वन अंधरिया दूज रहे, संवत 1917 के साल रे जिउतिया। जिउतिया जे रोपे ले हरिचरण, तुलसी, दमड़ी, जुगुल, रंगलाल रे जिउतिया। अरे धन भाग रे जिउतिया.। स्पष्ट बताता है कि संवत 1917 यानी 1860 में पाच लोगों ने इसका प्रारंभ किया था। इतिहास के मुताबिक इससे पहले से यह आयोजन होता था, सिर्फ इमली तर मुहल्ला में। कारण प्लेग की महामारी को शात करने की तत्कालीन समाज की चेष्टा थी। इसमें कामयाबी भी मिली। लेकिन तब एक महीना तक जो जागरण हुआ वह निरंतरता प्राप्त कर संस्कृति बन गई। बाद में यह नौ दिन और अब मात्र तीन दिवसीय संस्कृति में सिमट गया। यह हर साल आश्रि्वन कृष्णपक्ष अष्टमी को मनाया जाता है। यहा लकड़ी या पीतल के बने डमरुनुमा ओखली रखा जाता है। हिंदी पट्टी में इस तरह सामूहिक जुटान पूजा के लिए कहीं नहीं होता। यहा शहर में बने जीमूतवाहन के मात्र चार चौको (जिउतिया चौक) पर ही तमाम व्रती महिलाएं पूजा करती हैं। इस संस्कृति में फोकलोट अर्थात लोकयान के सभी चार तत्व यथा लोक साहित्य, लोक कला, लोक विज्ञान और लोक व्यवहार प्रचुरता में उपलब्ध हैं। तीन दिन तक होने वाली प्रस्तुतियों में इसे देखा जा सकता है। इसे बिहार की प्रतिनिधि संस्कृति बनाने के लिए जब नीतीश कुमार मुख्यमंत्री थे तो सरकार को ज्ञापन सौंपा गया था। सरकार बहुजनों की इस लोक संस्कृति के उत्थान के लिए कुछ भी नहीं कर रही है। सिर्फ प्रोत्साहन देने की आवश्यकता है। लोक अपने तंत्र (सरकार) से कुछ नहीं लेती। न सुरक्षा मागती है न साधन। न तनाव देती है न बवाल। लोग अपने में मस्त रहते हैं, मस्ती करते हैं और दूसरों को इतना मस्त कर देते हैं कि धन भाग रे जिउतिया, तोरा अइले जियरा नेहाल रे जिउतिया, जे अइले मन हुलसइले, नौ दिन कइले बेहाल, रे जिउतिया.और जब पर्व खत्म होने को होता है तो लोग विरह की वेदना महसूस करते हैं। देखे अइली जिउतिया, फटे लागल छतिया, नैना ढरे नदिया समान। जाने तोहे बिन घायल हूं पागल समान..।


https://www.google.co.in/amp/s/m.jagran.com/lite/bihar/aurangabad-representatives-of-the-state-to-create-culture-12963811.html
30 सितंबर 2015 को जागरण में प्रकाशित मेरा लेख।