Monday, 19 March 2018

सुनो! इस दर्द को, जरा दिल-दिमाग संभाल के ०००


                      ●उपेन्द्र कश्यप
0-मैं आंख में काजल और होठ पर लिपिस्टिक इसलिए लगाती हूँ कि सामने वाला मेरा दर्द न देख सके।
0-कॉलेज से निकलती हूँ तो पीड़ादायक टिप्पणी सुनती हूँ। यह तकलीफ न दे और सामने वाले को लगे कि मैं उनकी भद्दी, कष्टदायक टिप्पणी नहीं सुन पा रही, इसलिए कान में इयरफोन लगाकर कॉलेज से निकलती हूँ।
0-मैं प्यार की भूखी हूँ, प्यार चाहिए, आपकी सहानुभूति नहीं साथ चाहिए।
0-मैं कितनी दर्द में हूँ, यह नहीं जान सकते आप, कभी आवाज उठाया? घर ने ठुकरा दिया, समाज ताने देता है, कानून से भी संघर्ष करना पड़ रहा है।
0-जिस देश में नारी पूजी जाती है, उसी देश की मैं भी हूँ, फिर हमारे साथ ऐसा क्यों होता है? हमें क्यों हर कदम पर अपमानित होना पड़ता है?
0-मैं पटना से औरंगाबाद आने में कितनी पीड़ा झेली, यह आप कल्पना नहीं कर सकते हैं। 

00 ये शब्द सहज नहीं हैंप्रश्न हैं समाज सेदर्द की अभिव्यक्ति है-वीरा यादव की। 
वीरा यादव किन्नर हैं, पटना विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर की पढ़ाई कर रही हैं। वीरा यादव से मुलाकात औरँगाबाद में धर्मवीर फ़िल्म एंड टेलीविजन प्रोडक्शन द्वारा आयोजित औरँगाबाद फ़िल्म फेस्टिवल में हुई। उन पर केंद्रित एक डॉक्युमेंट्री दिखाई गई। उनसे जजों ने संवाद किया। प्रश्नोत्तरी हुई। नतीजा उनके कुछ शब्द मुझे झंकझोर गए। इन पर बेहतर सामग्री लिखी जा सकती है, जो सिर्फ किन्नरों के लिए नहीं बल्कि पुरुष और स्त्री समाज के लिए भी प्रेरक होगा। एक कोशिश की है। उनके शब्द वाकई कान, मस्तिष्क को झकझोरने वाले रहे। पहली बार किन्नरों का दर्द जाना, वह भी एक अध्ययनरत किन्नर से। साक्षात सुना। और पीड़ा बताने के उनके शब्द चयन ने खासा प्रभावित किया। बोली- ‘यह मेरी अकेले की पीड़ा नहीं है। हम सब एक ही तवा की रोटी हैं। सबकी (किन्नरों की) पीड़ा एक सी है। मैं आवाज उठाई।‘ मैंने जाना कि किन्नर सिर्फ ताली ही नहीं बजाते, वे सिर्फ व्यंग्य वाले छक्के नहीं होते, वे भी बोलते हैं, खूब बोलते हैं, और विराट सचिन सा छक्के भी लगाते हैं। समाज में यह सवाल नारी उत्पीड़न की हर घटना के बाद उठता है, कि जिस देश में 'यत्र नारियस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता' का आध्यात्मिक ज्ञान बांटा जाता है, उसी देश में नारी दूसरी श्रेणी की नागरिक क्यों है? उसे पुरुष सी समानता कब मिलेगी? लेकिन कभी थर्ड जेंडर, किन्नर को लेकर भी ऐसे आवाज पुरजोर तरीके से नहीं उठते, जो कि उठने चाहिए। आखिर, हमसे तो ये हिजड़े बेहतर हैं, जो हमारी मौज मस्ती के लिए ताली पीटते हैं, और आंखों में काजल, होंठों पे लिपिस्टिक इसलिए लगाते हैं कि सामने वाले को इनका असली और दर्द में डूबा चेहरा न दिखे। वीरा ने तो उन मनचलों को भी सम्मान दिया जो इसे कॉलेज से निकलते देख कर फबती कसते हैं-‘अरे हिजड़ा भी पढ़ रहा है। ई पढ़ के क्या करेगा। कॉलेज जाती आती है।‘ ऐसे मनचलों की आवाज इनको दर्द न दे और फबती कसने वाले को यह अहसास न हो कि सामने वाली सुन कर दुखी हो रही है, इसलिए कान में बिना मतलब इयरफोन कोंच लेती है। 

शाबाश, वीरा। शाबाश, तुम किन्नर नहीं, दंभी पुरुष समाज के मुंह पर तमाचा हो।
अंत में, शाबास पिंकी भी। धर्मवीर फ़िल्म एंड टेलीविजन प्रोडक्शन की क्रू मेंबर हसपुरा की इस किशोरवय पिंकी ने गजब की बात किन्नरों को लेकर कहा। मंच संचालक आफताब राणा ने जजों और वीरा के संवाद के बाद बोला कि इससे यदि कुछ अलग है तो पिंकी मंच पर आकर बोलो। पिंकी ने खुद माइक मांगा था, इसलिए संचालक के शब्द चुनौती से कम नहीं थे। वह आई तो ताली बटोर के ले गई। बोली-भगवान शिव ने नारी को सम्मान देने के लिए अर्धनारीश्वर का रूप कुछ देर के लिए धरा था तो हम उनकी पूजा करते हैं। वीरा और इनका समाज तो आजीवन अर्धनारीश्वर ही है, तो इनको अपमान क्यों, क्यों नहीं इनको समान सम्मान मिलना चाहिए? सवाल मौजू है- सन्दर्भ गांडीव धारी अर्जुन का भी है जो वृहन्नला बने थे। वृहन्नला भी तो किन्नर ही था।
अंत में धन्यवाद धर्मवीर भारती, जिनके कॉल और निवेदन ने इस कार्यक्रम का हिस्सा बनने को विवश किया। अन्यथा एक शानदार पल से मेरा साबका नहीं हुआ होता। वीरा, तुमने नजरिया बदल दिया, किन्नरों को देखने का। अगली बार किन्नरों का दर्द मैं भी समेटने की कोशिश करूंगा-शब्दों से।
 उपेन्द्र कश्यप
लेखक-'श्रमण संस्कृति का वाहक-दाउदनगर'
और -सन्दर्भ ग्रंथ- उत्कर्ष के दो अंक।

Sunday, 11 March 2018

गुप्ताधाम की गुफा में चुना-पत्थरों के पिंड को शिव के रूप में पूजते हैं भक्त

फोटो-गुफा में वह पिंड जिसे शिव रूप में पूजा जाता है

ऐसे शिव का रूप- जो न तस्वीरों में दिखता है न प्रतिमाओं में

उरांव-कुडूखों के हटने और खरवारों के आने से बना ‘गुप्ताधाम’

उपेंद्र कश्यप । डेहरी

गुप्ताधाम महोत्सव मनाया जा रहा है। गुप्ताधाम शिवनगरी के रूप में चर्चित है। महाशिवरात्रि पर यहाँ हजारों की भीड़ इकट्ठा होती है और वादियां बम बम भोले, जय शिवशंकर, जय भोले नाथ के उदघोष से गूंज उठती है। वातावरण भक्तिमय हो उठता है। गुप्ताधाम की गुफा में शिवलिंग की नहीं चुना पत्थर के जमे पिंड की पूजा शिव रूप में की जाती है। धार्मिक आस्था अपनी जगह है, किन्तु विज्ञान भी समझा जाना चाहिए। जिस शिव को यहाँ पूजा जाता है, वैसी तस्वीर तो कहीं भी किसी शिवलिंग की नहीं मिलती, न ही ऐसी प्रतिमाएं कहीं मिलती-दिखती हैं। आप तस्वीर में साफ़ इसे देख सकते हैं। वास्तव में यह चुना-पत्थर का जमा हुआ पिंड है। जिसे हम शिव रूप में पूजते चले आ रहे हैं। सदियों से, न जाने कब से? शायद जब खरवार कारुष प्रदेश के इस हिस्से में आये, जमे और उरांव-कुडूखों को हटना पडा, तब से?  प्रदेश के वरिष्ठ कवि और पत्रकार अनिल विभाकर की एक कविता की अंतिम पंक्ति है-'लोग पत्थर नहीं अपनी- अपनी आस्था पूजते हैं।' यही भावना गुप्ताधाम में दिखती है। लोग वास्तव में अपनी आस्था ही पूजते हैं। और बात जब आस्था की आती है तो कोइ तर्क काम नहीं आता।


तीन स्थानों पर हैं इस तरह के बने शिवालय:-

सीमेंट उद्योग के लिए जो चुना पत्थर चाहिए, उसकी उपलब्धता इस कैमूर पर्वता श्रृंखला में खूब है। पहाड़ की गुफाओं में बरसात के जल से गल कर चुना पत्थरों ने कई जगह शिवालय बना दिए हैं। जो कि उच्छैल या पिंड (स्टैलेग्माइट्स) हैं। 'सोन के पानी का रंग' पुस्तक में देवकुमार मिश्र ने बताया है कि ऐसे स्थान मिर्जापुर के पिराड़ी की पहाडी गुफा में ‘गुपुत महादेव का मंदिर’, ओबरा (उत्तर प्रदेश) पहाडी खोह का शिवालय और रोहतास का गुप्तेश्वर धाम शामिल है।


सुरजवंशी खरवार ही प्रसाद के हकदार:- 

रोहतास उपत्यका मुख्यत: खरवारों का भूखंड माना जाता है। इन्हीं का था प्रसिद्ध तीर्थ ”गुप्ता” जो अब गुप्ताधाम कहा जाता है। आज भी इस स्थान के चढ़ावे का हकदार खरवार पुजारी ही होता है। इस क्षेत्र में बसे खरवार खुद को सुरजवंशी कहते हैं। लेकिन यहाँ सोमवंशी (चंद्रवंशी) खरवार भी रहते हैं।


किवंदतियों में गुप्ताधाम:-
गुप्ताधाम से कई किवंदतियां जुड़ी हुई है।
इससे शिव द्वारा अमरत्व का आशीर्वाद देने, आशीर्वाद बाद भस्मासुर बनने और फिर पार्वती की चाह में विष्णु के प्रपंच से खुद ही भस्मासुर के मारे जाने का पौराणिक किस्सा जुडा हुआ है।

जम्मू के शिवखेड़ी में भी यही किवंदति:-
पार्वती-भस्मासुर-विष्णु की जो कहानी गुप्ताधाम से जुड़ी हुई है, वही किस्सा जम्मू स्थित शिवखेड़ी में भी सुनाई-बताई जाती है। वहां भी इसी तरह की संकरी गुफा है।

Wednesday, 10 January 2018

स्वतंत्रता सेनानी और दाउदनगर के चलते-फिरते डाइरेक्ट्री आज ईश्वर के सानिध्य में चले गए

“डायरेक्ट्री ऑफ़ दाउदनगर” डॉ.राम परीखा यादव नहीं रहे...
उपेन्द्र कश्यप, लेखक- ‘श्रमण संस्कृति का वाहक-दाउदनगर’ और दो सन्दर्भ ग्रन्थ ‘उत्कर्ष’
 
मृत्यु से कुछ माह पूर्व की तस्वीर
जी हाँ, डॉ.राम परीखा बाबू नहीं रहे, और वे दाउदनगर के डायरेक्ट्री ऑफ़ दाउदनगर ही थे। कम से कम मेरी नजर में। यह मेरा सौभाग्य था कि मुझे उनका लंबा सानिध्य मिला। उनके जितनी जानकारी शहर में किसी को शहर के बारे में शायद कम थी। स्वतंत्रता आन्दोलन का इतिहास, इसमें भाग लेने वाले स्थानीय जनों का इतिहास, उनके वंशजों के नाम-काम समेत भला किसे जानकारी होगी? वे सिर्फ स्वतंत्रता सेनानी ही नहीं थे, शिक्षा का अलख जगाने वाले क्रांतिकारी भी थे, जिनका मकसद था पिछड़े समाज को शिक्षित करना। उनका शिक्षा के लिए योगदान उल्लेखनीय है। दाउदनगर के इतिहास में 10 जनवरी एक काली तिथि के रूप में दर्ज हो गयी। मुझे जब भी इतिहास में झांकने की आवश्यक्ता महसूस हुई, उनसे जाकर मिला। सवाल किया जवाब मिला। अपेक्षा से कम कभी नहीं मिला। जब उनका स्वास्थ्य एकदम जवाब दे गया तब भी उनसे मिला। बातें की, उनको कोइ आपत्ति नहीं हुई। हमेशा उपेंदर जी (उपेंद्र नहीं) ही कह कर पुकारते। आवs, बैठs। हालचाल और फिर मेरी जिज्ञासाओं को शांत करने की कोशिश। उनसे न जाने कितनी बार मिला, बात की, सवाल पूछा, प्रति और पूरक प्रश्न किया, जवाब मिला। शायद किसी अन्य सहकर्मी को इतना सानिध्य नहीं मिला न इतनी जानकारी उनसे कोइ ले सका। दैनिक जागरण में जब तक रहा (17 साल) तब तक कई दर्जन रिपोर्ट उनके हवाले से लिखा। उनकी तस्वीरें प्रकाशित की। और हर बार कुछ छुट जाने की कसक स्थानाभाव के कारण बची रही। शायद सब कुछ दे देने से बचने की मेरी प्रवृति भी मुझ पर हावी रही।

खैर, फिलहाल इतना ही। आप मेरे पुराने लेख पढ़ सकते हैं- जो नीचे हैं।
   

और जेल की हवा खानी पड़ी
(उत्कर्ष 2007 में प्रकाशित उनका साक्षात्कार-अविकल)
डा॰ रामपरीखा यादव
स्वतंत्रता सेनानी, वरिष्ट चिकित्सक
अगस्त क्रांति का वह समय मुझे अब भी याद है, जब भारत छोड़ो आन्दोलन को लेकर यह क्षेत्र इंकलाब जिंदाबाद, जिंदाबाद के नारे बुलंद कर रहा था । मैं सिफ्टन हाई स्कूल(अब अषोक उच्च विद्यालय) में दसवीं कक्षा का छात्र था । सोनहथु(ओबरा) के दिनदयाल सिंह जो पटना पढ़ते थे, हमें हड़ताल करने को प्रेरित किया । बागीचा में बैठक किया गया और अगले दिन स्कूल नहीं जाने का निर्णय लिया गया । तब साथ-साथ आजादी का नारा बुलंद करने वाले हीरादास सिंह(लबदना) बक्सर जेल गये, जहाँ उनका मानसिक संतुलन बिगड़ गया और बेचारे निःसंतान दूनिया से चले गये । खैर, ‘अंग्रेजों भारत छोड़ोका नारा लगाते हुए छात्र-जनता विद्यालय पहुँचे, गवर्नर बिहार सिफ्टन के तैल चित्र को क्षतिग्रस्त किया गया, उसपर थूका गया, फाटक तोड़ डाले गये । सिंचाई विभाग का कार्यालय तोड़ डाला गया । तब एसडीओ थे  दिलीपपुर(जगदीषपुर) के महाबीर बाबू, जिन्होंने हमें ट्रायल में पहचानने से इंकार कर दिया । ज्यूरी ने उन्हें आरोपित करते हुए कहा- तुम आन्दोलन में सीधे तौर पर षामिल हो ।सिंचाई कार्यालय के बाद षराब डीपो में तोड़फोड़ की गयी । कच्चा स्पीरीट में आग लगा दिया, डाकघर में विस्फोट किया गया । बड़का गाँव(भोजपुर) के रामजनम बाबू डाकपाल थे । इन्होंने भी पहचानने से इंकार कर दिया । उत्पाद अधीक्षक ने दुधेष्वर राम (जमुहारा, दाऊदनगर) को पहचाना, उन्हें जेल जाना पड़ा । दाऊदनगर थाना पर भी आन्दोलनकारी पहुँचे, थानेदार रामकेष्वर बाबू ने पूछा- क्या करना चाहते हो ।आन्दोलनकारियों ने कहा- तिरंगा फहराना है।थानेदार ने हां कहा तो यहाँ तिरंगा लहरा दिया गया । मैं हीरादास के साथ सिपहां पहुँचा । ओवरसीयर बलदेव सिंह ने कहा इधर कहाँ जाइएगा, हम सम्हाल लेंगे । दुध पिलाया और विदा कर दिया । उधर पेड़ काट कर रास्ता बंद कर दिया गया । बेलाढ़ी गये जहाँ रामाषीष बाबू , रामकुमार सिंह सक्रिय छात्र थे । रात्रि में विष्वम्भर बिगहा गये जहाँ विषुनधारी सिंह षिक्षक ने रात्रि में रोका, वह जोर की बारिष अब भी याद है । सुबह जिनोरिया पूल टूटा हुआ पाया । इस दिन तारा में चन्द्रदेव सिंह षिक्षक के दादा कैलाष सिंह ने रात्रि में रोका । अगस्त क्रांति के बाद जेल जाना पड़ा । पिता रामरेखा सिंह एवं माँ ने कहा- जेल चले जाओ नहीं तो पूरा घर बर्बाद हो जायेगा । दो माह जेल में रहना पड़ा । औरंगाबाद और गया सेन्ट्रल जेल में । इसी बीच भादो षष्ठी(1942) को पिता का देहान्त हो गया । पन्द्रह अगस्त 1947 को मैं गया में यादव छात्रावास में था, जहाँ नेहरूजी का भाषण सुना, उनकी यह पक्ति आज भी याद है- सारी दुनिया सो रही है, हम अभी जाग रहे हैं ।मेरा सपना है कि जय प्रकाष नारायण जी के नाम पर यहाँ एक पार्क बने । पुस्तकालय हो ।उनके पिता यहाँ कैनाल विभाग में गिरजौर (सर्किल ऑफिसर) थे । अषोक उच्च विद्यालय में चपरासी रहे रामकिषोर ने उन्हें अपनी गोदों में खेलाया है । वह कहते भी थे- मैं भाग्यषाली हूँ मेरे हाथों ने भारतमाता के महान सपूत को खेलाया है ।यहाँ जेपी सन् 1938 में चावलबाजार में आये थे, जब उन्हें देखा था । भावी पीढ़ी पढ़े लिखे, लोकतंत्र मजबूत हो, नैतिकता का क्षरण अब रूके यही मेरी अकेली इच्छा है ।


(श्रमण संस्कृति का वाहक-दाउदनगर में प्रकाशित लेख में उनसे संबंधित पंक्तियाँ)

1.... आज समाज भले ही समानता के अधिकार के प्रति जागरुक हुआ है, कानून भेदभाव खत्म करने में सहायक हुआ, लेकिन सामाजिक भेदभाव का शिकार बनने की घटनाएं अब भी होती है, किंतु यदा-कदा। अब रोजमर्रे की बात नहीं रह गई है। वर्जनायें टूटने लगीं हैं, सामाजिक, राजनीतिक दिशा बदलने से समाज की दशा भी बदली है। गुलाम भारत में बच्चों के नामांकन राजनीतिक कारणों से भी नहीं होता था। इसके उदाहरण हैं- स्वतंत्रता सेनानी और इलाके के चलते-फिरते डाइरेक्ट्री (जी मैं इन्हें ऐसा ही मानता-जानता हूं) डा.राम परीखा यादव। अपनी किशोरावस्था में वे अगस्त क्रांति में शामिल हो गये थे। नतीजा उनका सिफ्टन हाई स्कूल में नामांकन नहीं हो रहा था। 01 अक्टूबर से 25 नवंबर 1942 तक उनकी पढाई बाधित रही। बिहार सरकार की अनुमति के बिना इनका नामांकन नहीं होना था। तब सिफ्टन हाई स्कूल के प्रधानाध्यापक थे यामिनी कांत चटर्जी। उन्होंने नामांकन करने से इंकार कर दिया। नामांकन के लिए तब वे अपने ससुर (बाद में ससुर बने थे) के भाई सब डिविजनल बोर्ड औरंगाबाद के उपाध्यक्ष रामनारायण सैनिक के पास गये। फिर दोनों डिस्ट्रिक्ट बोर्ड गया के चेयरमैन रामचन्द्र शर्मा के पास  गये। उन्होंने पटना प्रक्षेत्र के स्कूल इंसपेक्टर आशुतोष घटक के पास पैरवी का पत्र देकर भेजा, आदेश हुआ तब इनका नामांकन दसवीं कक्षा में हो सका। पुरानी शहर के परमेश्वर प्रसाद को मैट्रिक (1970) के बाद सेंटजेवियर कालेज रांची से पढना था। उन्होंने मैट्रिक में 700 में 609 अंक लाया था। कालेज के मेरिट लिस्ट में भी उनका नाम शामिल हुआ। इसके बावजूद उन्हें जब फादर के पास भेजा गया तो उन्होंने अपमानित किया। कहा कि-गया जिला का हो इसलिए नामांकन नहीं लेंगे।सवाल पूछा कि-गया जिला का होना गुनाह है क्या?’ खैर नामांकन नहीं हुआ। कुछ दिन रांची कालेज में पढे और आरा लौट गये। महाराजा कालेज से इंटर किया।


2..... सन 1940 में अगनूर मिडिल स्कूल (बाद में वही हाई स्कूल हुआ) खुला। हम अतीत में प्रतिद्वन्धिता भी इस क्षेत्र में देखते हैं। डा.रामपरीखा यादव जानते हैं कि जब अगनूर के वैश्य जमीन्दार नागेश्वर प्रसाद और गया प्रसाद ने स्कूल खोला तो अरई के भूमिहार समाज में स्वस्थ बेचैनी बढ गई कि जब वैश्य खोल सकते हैं तो हम क्यों नहीं? इसके बाद अरई के जमींदार मज्जु मियां से जमीन लेकर स्कूल खोला गया जो बाद में अरई हाई स्कूल बना। इसके लिए प्रबन्ध समिति के प्रथम सचिव रामदेनी मौआर, गिरधारी शर्मा और धर्मदेव शर्मा जैसे प्रबुद्ध लोग सक्रिय भूमिका में रहे।

Saturday, 2 December 2017

दिव्यांगों की जिम्मेदारी से भाग रही सरकार, पीएम से मंत्री तक नहीं सुने फ़रियाद

दैनिक भास्कर में प्रकाशित ख़ास खबर

पीएमओ की पहल पर भी नहीं मिल सकी ट्राईसाइकिल
बैटरी चालित ट्राईसाइकिल की मांग पीएम ने भी नहीं की पूरी
पीएमओ ने आवेदन को भेजा जिला लोक शिकायत निवारण को  
मंत्री सिर्फ फ़रियाद सुनते रहे, दिव्यांग इसके लिए दौड़ लगा रहे
उपेंद्र कश्यप । डेहरी

आज विश्व विकलांग दिवस है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस शब्द को नया नाम दिया-दिव्यांग। लेकिन न आयाम बदले, न ही इनकी स्थिति बदली। गूंगी-बहरी सरकार की व्यवस्था दिव्यांगों की जिम्मेदारी से भाग रही है। लाचार बने दिव्यांग कभी पीएम तो कभी मंत्री तो कभी प्रशासनिक महकमे से फ़रियाद के लिए दौड़ रहे हैं, किन्तु कोइ लाभ नहीं हो रहा। स्टेशन रोड में आरके स्टूडियो चला रहे बृजमोहन प्रसाद उर्फ़ ककू जी एक उदाहरण मात्र हैं। ऐसे दिव्यांगों की संख्या काफी है जो पीड़ित हैं और सरकार उनकी नहीं सुन रही है।
दोनों पैर एक दुर्घटना में गंवा चुके बृजमोहन गत 30 महीने से बैटरी चालित ट्राईसाइकिल के लिए दौड़ रहे हैं। पीएम को उनकी बेटी दिव्या सोनी ने मार्च 2017 में पत्र लिख कर फ़रियाद किया। पीएमओ ने पत्र को जिला लोक शिकायत निवारण कार्यालय को भेज दिया। एसडीएम का फोन आया। 04 और 20 अक्टूबर को बेटी कार्यालय में सुनवाई के लिए गयी। अंतत: जवाब मिला कि बिहार में किसी को भी यह उपकरण नहीं मिला इसलिए मांग को अस्वीकार किया जाता है।  दूसरी तरफ बृजमोहन का दावा है कि केंद्र में मंत्री राम कृपाल यादव, मंजू वर्मा और एक अन्य ने दानापुर में बैटरी चालित उपकरण दिया है। काराकाट से सांसद केंद्र में मंत्री उपेन्द्र कुशवाहा से वे कई बार मिले, फ़रियाद की, हुआ कुछ नहीं।

पीएम अंकल, पापा का जीवन सरल हो जाएगा-दिव्या:-
बृजमोहन प्रसाद की बेटी दिव्या सोनी कक्षा आठ में पढ़ती है। 13 साल की इस बच्ची ने पीएम को लिखे पत्र में कहा कि- 
पीएम अंकल,
पापा 100 प्रतिशत विकलांग हैं। उनके विकलांग होने से घर की आर्थिक स्थिति खराब हो गयी है। वे ही कमाते और घर को चलाते थे। अब कुछ भी कर सकने की स्थिति में नहीं हैं। उनका जीवन काफी कठीन हो गया है। यदि मोदी अंकल, आप बैटरी चालित ट्राईसाइकिल दे देंगे, तो पापा का जीवन सरल हो जाएगा। आर्थिक स्थिति सुधर जायेगी, वह और उसके भाई पढ़ सकेंगे।
आपकी बेटी-दिव्या सोनी

यूं दोनों पैर गंवा गए ककू:-
05.02.2015, गुरूवार की सुबह कुहरा घना था, जो इनके जीवन को बर्बाद कर गया। वे रामगढ़ से इंटरसिटी एक्सप्रेस से डेहरी आये। ट्रेन से उतरे और पैर फिसल गया। जब तक संभलते ट्रेन खुल गयी और दोनों पैर कट गया। आवाज लगाया, जीआरपी वाले पहुंचे तो बोले-सुसाइड केस है यह तो। अपना परिचय दिया-पूर्व स्टेशन मैनेजर केपी शर्मा के पुत्र हैं। तब फोन नंबर माँगा, अपना दिया और रिंग होने पर उसे पाया। खुद पत्नी को कॉल किया। बीएचयू में जीवन मौत से संघर्ष के बाद 01 अप्रैल 2015 को वहां से स्वस्थ हो कर लौटे। किन्तु, एक नये संघर्ष के लिए। यह संघर्ष उनके साहस के साथ जारी है।

1981 से अन्तरराष्ट्रीय विकलांग दिवस
अन्तरराष्ट्रीय विकलांग दिवस सयुंक्त राष्ट्र संघ ने 03 दिसंबर 1991 से प्रतिवर्ष मनाने की स्वीकृति दी थी। सयुंक्त राष्ट्र महासभा ने संघ के साथ मिलकर वर्ष 1983-1992 को अन्तरराष्ट्रीय विकलांग दिवस दशक घोषित किया था।
भारत में विकलांगों से संबंधित योजनाओं का क्रियान्वयन सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के अधीन होता है।

Thursday, 16 November 2017

पुलिस के सुस्त रवैये से गुस्से में एकजुट होता है समूह



यदि जल जाते बच्चे तो क्या करती पुलिस?
क्या चुप बैठे रहते अभिभावक?

औरंगाबाद के अंबा में संत जोसेफ स्कूल के बस को चाचा नेहरू के जन्म दिन बाल दिवस पर अपराधियों ने जला दिया। वाहन चालक ही स्कूल बस का मालिक था। उसने सूझ बूझ से अपराधियों के सामने काम लिया। बच्चों को पेट्रोल डालने के बाद वाहन से आग लगाए जाने से ठीक पहले उतार दिया। कल्पना करिए, बस में सवार बच्चों को रहते यदि आग के हवाले कर दिया गया होता तो क्या होता? क्या तब भी पुलिस का रवैया इतना ही सुस्त रहता, जितना कि अभी है? बच्चो के अभिभावक क्या तब भी इसी तरह शांत बैठे रहते? या वे स्कूल को ही जिम्मेदार बता कर सड़क पर उतर गए होते? यह सब कल्पना कर सकते हैं। 
यह सब कहने का कारण है, जो खुद पुलिस ने उपलब्ध कराया है। घटना को अंजाम देने के बाद अपराधी स्कूल को फोन करके बताता है कि स्कूल वाहन झोल (जलाना) दिया है। स्कूल संचालक मिले, अन्यथा स्कूल में बम मार देंगे। मैं फलां हूँ, फलां का भाई। घर अमुक जगह है। यह बातचीत रिकार्ड पर है। इस रिपोर्ट के साथ संगलग्न भी है। इसे आप सुन सकते हैं। 
अब सवाल है कि इतना साहस एक अपराधी को कैसे और कहां से आया? क्यों ऐसा है? आखिर उसने खुद का परिचय और कबूलनामा क्यों दिया? इसके पीछे क्या साजिश है? क्या बड़े बड़ों का संरक्षण प्राप्त है और इसी कारण उसके पास इतना साहस आया, या अपराधी नौसिखुआ है? नौसिखुआ होने पर भी किसी के संरक्षण होने की संभावना खत्म नहीं हो जाती। पुलिस उसे तीन दिन में भी क्यों गिरफ्तार नहीं कर सकी? क्या किसी बड़े पैरवी या सफेदपोश के दबाव में है, जैसी कि रमता हत्या कांड में चर्चा होती रहती है? या पुलिस शांति से अपना काम कर रही है, और सफलता के बाद मीडिया में आकर बयान देगी? संभावनाएं दोनों तरह की है। 
16 नवम्बर को एक सामाजिक संगठन वैश्य चेतना परिषद ने इस मामले में हस्तक्षेप किया। उसने मंत्रीमंडल के सदस्यों के संज्ञान में इस मुद्दे को लाया है। अब संभवतः फैसलाकुन या महत्वपूर्ण कार्रवाई दिख सकती है। 
उस घटना के बाद नन सीबीएसई अफलिएटेड स्कूलों ने हड़ताल कर रखा है। 15 को कुटुंबा प्रखंड के स्कूल बंद रहे और 16 को पूरे जिले के स्कूल बंद रहे। करीब 300 स्कूल बंद रहे। इससे हाजरों बच्चों की पढ़ाई की क्षति हुई। इसकी भरपाई कौन करेगा?
इस स्कूल के निदेशक दिलीप साव और इनके भाई अनूप साव को प्रशासनिक सहयोग चाहिए। तीन माह पहले दिलीप को गोली मारी गई थी। 14 नवम्बर को उनके स्कूल बस में पेट्रोल डालकर आग लगा दी गई।
घटना को अंजाम देने वाले ने खुद स्कूल को फोन कर अपना परिचय दिया। परसा का पुकार मेहता अपना नाम बताया। और धमकी दी कि स्कूल बंद कर दो, अन्यथा बम मार देंगे।
स्कूल बंद करने की धमकी देने से भी सवाल उठता है। आखिर स्कूल बंद हो जाने से किनको लाभ होना है?
उपेंद्र कश्यप, दैनिक भास्कर, डेहरी (रोहतास)

Tuesday, 14 November 2017

व्यापार मंडल के 34 साल के इतिहास में पहली बार "यादव अध्यक्ष"


विजेता चुन्नू सिंह की आरती उतारती हुई मां श्रीमति कान्ति देवी   
चुन्नू सिंह बने सहकारिता के "इतिहास पुरुष"
08 बार कुर्मी और 03 बार राजपूत बने अध्यक्ष
उपेंद्र कश्यप (लेखक, पत्रकार)
व्यापार मंडल का चुनाव पूर्ण हो गया है। दाउदनगर (औरंगाबाद) के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण इतिहास रचा गया, जो कलमकारों की आंखों ने नहीं देखा, या समझा। सुजीत कुमार उर्फ चुन्नू सिंह व्यापार मंडल के अध्यक्ष बन गए। खबर मात्र इतनी भर नहीं है। इस खबर से अधिक महत्वपूर्ण इसका ऐतिहासिक पक्ष है। चुन्नू 'इतिहास पुरुष' बन गए हैं। उनका नाम व्यापार मंडल दाउदनगर के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखा जाएगा। जब भी स्थानीय इतिहास कोई कलमबंद करेगा। यदि उसे स्थानीय राजनीतिक इतिहास का ज्ञान हो। चुन्नू सिंह पहले “यादव अध्यक्ष” बने हैं। 1983 के चुनाव से अब तक का इतिहास ज्ञात है। इसके अनुसार उप चुनाव और कार्यकारिणी द्वारा अध्यक्ष चुने जाने समेत 11 बार अध्यक्ष बने हैं। चुन्नू 12 वीं अध्यक्ष बने हैं। 

व्यापार मंडल पर कुर्मी जाति का एकाधिकार रहा है। सात बार कुर्मी जाति के नेता अध्यक्ष बने हैं। जबकि तीन बार राजपूत। 1978 में तरारी से मुखिया बने बेलाढी निवासी दिनेश सिंह कुर्मी थे। वे 1983 और 1986 में व्यापार मंडल का अध्यक्ष बने। इनके बाद 1989, 1992 और 1995 में लगातार तीन बार संसा के हीरालाल सिंह अध्यक्ष बने। वे भी कुर्मी थे। उसी तरह 1998 और 2001 में गोरडीहां निवासी मुखिया रहे भगवान सिंह अध्यक्ष बने। वे भी कुर्मी हैं। 04 जनवरी 2016 को बेलाढी निवासी दीपक सिंह अध्यक्ष बने, वे भी कुर्मी हैं। बीच में सिर्फ सुदेश सिंह ही ऐसे सवर्ण नेता रहे जो तीन बार अध्यक्ष बने। वे जाति से राजपूत थे, जिनोरिया के निवासी। करमा पंचायत के मुखिया भी रहे हैं। 2004 में कार्यकारिणी ने उनको अध्यक्ष चुना था2007 में चुनाव जीत कर अध्यक्ष बने और फिर तीसरी बार 2012 में अध्यक्ष बने। 04 अक्टूबर 2012 को हत्या होने तक वे इस पद पर रहे। सुदेश सिंह भी पिछड़ा और राजद की राजनीति करके ही व्यापार मंडल का अध्यक्ष बने थे। यह पहली बार हुआ है कि कोई यादव व्यापार मंडल का अध्यक्ष बना। 

विडंबना देखिए, इस बार चुन्नू भाजपा जदयू के समर्थन और सवर्ण मतों के सहयोग से अध्यक्ष बने। पिछडावाद की राजनीति करने वाले 'सबका साथ सबका विकास' में यकीन नहीं रखते और नतीजा इतिहास का हिस्सा नहीं बन सके। चुन्नू की जीत इस ऐतिहासिक संदर्भ में भी देखा जाना चाहिए। यह तब महत्वपूर्ण दिखेगा जब इतिहासबोध हो।

चुन्नू सिंह का जीवन परिचय-
पिता-ललन प्रसाद सिंह-सेवा निवृत प्रधानाध्यापक
माता-कान्ति देवी- सेवा निवृत शिक्षिका
भाई-अजीत सिंह-अध्यक्ष-नगर परिषद् पैक्स व आरएसओडी, मंटू सिंह|
घर-मझिआंव-ओबरा|

Thursday, 9 November 2017

बिना ‘गिवअप’ किए ही बंद हो गयी एलपीजी सब्सिडी, सरकार ने कहा –धन्यवाद!

ग्राहक बोल रहे-सब्सिडी छोड़ने के लिए कभी नहीं दिया आवेदन
उपेन्द्र कश्यप। डेहरी

केंद्र सरकार अपनी पीठ खूब थपथपा रही है| उसे फक्र है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आह्वाहन पर देश के एक करोड़ नागरिकों ने अपना एलपीजी गैस सब्सिडी छोड़ दिया है| इससे ‘प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना’ के तहत पांच करोड़ परिवारों को लकड़ी के धुंए से मुक्ति दिलाने का अभियान चल रहा है| यह तब अच्छी बात होती जब वास्तव में परिवारों ने खुद ‘गिवअप’ किया होता। किन्तु जमीनी हकीकत कुछ और है| जिन लोगों को गिवअप करने के बदले पीएम ने धन्यवाद पत्र भेजा है, उसमें से किसी ने स्वेच्छा से सब्सिडी नहीं छोड़ा है| दैनिक भास्कर ने पीएम ने धन्यवाद पत्र जिनके लिए भेजे हैं उनमें से दस लोगों से पूछा, तो सबने कहा कि उन्होंने सब्सिडी नहीं छोडी है। पाली रोड स्थित देव इंडेन के संचालक अशोक पासवान ने भी इस बात की पुष्टि की कि किसी ग्राहक ने आज तक सब्सिडी छोड़ने के लिए आवेदन उन्हें नहीं दिया है। उनके यहाँ ऑन लाइन नंबर लगाने की सुविधा भी नहीं है| इनके अनुसार मोबाइल से नंबर लगाने के लिए कॉल करते वक्त गिवअप के लिए बटन दबाने को बोलता है और लोगों ने अज्ञानतावश या भूलवश वही बटन दबा दिया होगा| नतीजा बड़ी संख्या में लोग बिना जाने ही गिवअप कर गए। सरकार ने उनके नाम “धन्यवाद पत्र” भेज दिया।

कईयों को पता नहीं तो कई लगा रहे दौड़
गिवअप के बाद कइयों को यही ज्ञात नहीं है कि उनके खाते में सब्सिडी जा रही है या नहीं। बहुत ऐसे हैं जो पासबुक चेक ही नहीं करते। कुछ ऐसे ग्राहक भी हैं जो दौड़ रहे हैं कि उनके खाते में सब्सिडी की राशि नहीं आ रही| कुछ बैंक और गैस आपूर्तिकर्ता के बीच दौड़ रहे हैं और तीनों पक्षों को ही पता नहीं कि सब्सिडी खान और क्यों अटकी पडी है। कई ऐसे लोग भी हैं जिनके खाते में सब्सिडी जा रही है और गिवअप के लिए धन्यवाद पत्र भी आया हुआ है।

विवाद के कारण नहीं बाँट रहे “धन्यवाद पत्र” 

देव इंडेन में 55 ग्राहकों के लिए धन्यवाद पत्र आया हुआ है। अशोक पासवान का कहना है कि उन्हें यह कंपनी के चैनल से प्राप्त हुआ है। कुछ ग्राहकों को उन्होंने दिया तो विवाद शुरू हो। प्राय: सभी ने कहा कि उन्होंने सब्सिडी छोड़ने के लिए कोइ आवेदन नहीं दिया है।

हमने मांगा अनुदान, पीएम ने भेजा “धन्यवाद पत्र’
दैनिक भास्कर ने पीएम से धन्यवाद प्राप्त करने वाले ग्राहकों से सवाल पूछा तो जवाब मिला-
० नौडीहा के पांडेपुर से कृष्णा साह बोले-रौंग नंबर|
० चितौलीचौक रमडीहरा से रौशन कुमार बोले-गिवअप नहीं किया है| कोइ आवेदन नहीं दिया| खाता चेक नहीं किया है|
० परमेश्वर बीघा से गनपत सह बोले-काहे सब्सिडी बंद कर दिए? जब छोड़ा ही नहीं सब्सिडी तो पीएम धन्यवाद काहे देंगे?
० परमेश्वर बीघा से प्रेमलाल कुमार बोले- बैंक से पता चला कि सब्सिडी नहीं आ रहा, हम छोड़े नहीं हैं|
० पीतांबरपुर से अशोक कुमार सिंह बोले- बैंक और गैस एजेंसी ने आधार नंबर माँगा| जमा आकिया तब भी सब्सिडी नहीं आ रहा| हम नहीं छोड़े हैं सब्सिडी|

धन्यवाद पत्र का अंश---
प्रधान मंत्री, भारत सरकार, नई दिल्ली 
स्नेही जन
... मैंने ये पत्र आपको और आपके परिवार को धन्यवाद देने और अभिनन्दन करने के लिए लिखा है। 27 मार्च 2015 को मैंने देशवासियों से आह्वाहन किया था कि क्यों न हम रसोई गैस पर मिलने वाले अनुदान का त्याग करें। आपने सहित देश के एक करोड़ से अधिक परिवारों ने गैस सब्सिडी छोड़ दी। आपके छोड़े गए सब्सिडी से देश “प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना” से देश के पांच करोड़ गरीब परिवारों को लकड़ी के धुएं से मुक्ति दिलाने में सहयोग मिल रहा। मुझे उम्मीद है कि अर्थशास्त्र के जानकार और निराशा भरी बात करने वाले कुछ लोग आपके इस त्याग के बाद जन शक्ति को एक नए नजरिए से देखेंगे। 
मैं आभारी हूँ कि आपके इस फैसले से देश के विचार प्रवाह को नया आयाम  मिला है। 

पीएम का कुछ और निवेदन:-    
पीएम नरेन्द्र मोदी ने इस धन्यवाद पत्र में ‘जनता से कुछ और भी निवेदन’ किया है:-
1 -आप अपने और कम से कम 10 परिचितों के घर में बिजली के लिए एलईडी बल्ब का इस्तेमाल शुरू  इससे बिजली भी बचेगी और पैसों की भी बचत ।
2-स्वच्छता को अपना स्वभाव । जिस भी जगह पर आप हैं वहां इसे जन आन्दोलन का स्वरूप देने की कोशिश ।