Wednesday, 10 January 2018

स्वतंत्रता सेनानी और दाउदनगर के चलते-फिरते डाइरेक्ट्री आज ईश्वर के सानिध्य में चले गए

“डायरेक्ट्री ऑफ़ दाउदनगर” डॉ.राम परीखा यादव नहीं रहे...
उपेन्द्र कश्यप, लेखक- ‘श्रमण संस्कृति का वाहक-दाउदनगर’ और दो सन्दर्भ ग्रन्थ ‘उत्कर्ष’
 
मृत्यु से कुछ माह पूर्व की तस्वीर
जी हाँ, डॉ.राम परीखा बाबू नहीं रहे, और वे दाउदनगर के डायरेक्ट्री ऑफ़ दाउदनगर ही थे। कम से कम मेरी नजर में। यह मेरा सौभाग्य था कि मुझे उनका लंबा सानिध्य मिला। उनके जितनी जानकारी शहर में किसी को शहर के बारे में शायद कम थी। स्वतंत्रता आन्दोलन का इतिहास, इसमें भाग लेने वाले स्थानीय जनों का इतिहास, उनके वंशजों के नाम-काम समेत भला किसे जानकारी होगी? वे सिर्फ स्वतंत्रता सेनानी ही नहीं थे, शिक्षा का अलख जगाने वाले क्रांतिकारी भी थे, जिनका मकसद था पिछड़े समाज को शिक्षित करना। उनका शिक्षा के लिए योगदान उल्लेखनीय है। दाउदनगर के इतिहास में 10 जनवरी एक काली तिथि के रूप में दर्ज हो गयी। मुझे जब भी इतिहास में झांकने की आवश्यक्ता महसूस हुई, उनसे जाकर मिला। सवाल किया जवाब मिला। अपेक्षा से कम कभी नहीं मिला। जब उनका स्वास्थ्य एकदम जवाब दे गया तब भी उनसे मिला। बातें की, उनको कोइ आपत्ति नहीं हुई। हमेशा उपेंदर जी (उपेंद्र नहीं) ही कह कर पुकारते। आवs, बैठs। हालचाल और फिर मेरी जिज्ञासाओं को शांत करने की कोशिश। उनसे न जाने कितनी बार मिला, बात की, सवाल पूछा, प्रति और पूरक प्रश्न किया, जवाब मिला। शायद किसी अन्य सहकर्मी को इतना सानिध्य नहीं मिला न इतनी जानकारी उनसे कोइ ले सका। दैनिक जागरण में जब तक रहा (17 साल) तब तक कई दर्जन रिपोर्ट उनके हवाले से लिखा। उनकी तस्वीरें प्रकाशित की। और हर बार कुछ छुट जाने की कसक स्थानाभाव के कारण बची रही। शायद सब कुछ दे देने से बचने की मेरी प्रवृति भी मुझ पर हावी रही।

खैर, फिलहाल इतना ही। आप मेरे पुराने लेख पढ़ सकते हैं- जो नीचे हैं।
   

‘ और जेल की हवा खानी पड़ी ’
(उत्कर्ष 2007 में प्रकाशित उनका साक्षात्कार-अविकल)
डा॰ रामपरीखा यादव
स्वतंत्रता सेनानी, वरिष्ट चिकित्सक
अगस्त क्रांति का वह समय मुझे अब भी याद है, जब भारत छोड़ो आन्दोलन को लेकर यह क्षेत्र इंकलाब जिंदाबाद, जिंदाबाद के नारे बुलंद कर रहा था । मैं सिफ्टन हाई स्कूल(अब अषोक उच्च विद्यालय) में दसवीं कक्षा का छात्र था । सोनहथु(ओबरा) के दिनदयाल सिंह जो पटना पढ़ते थे, हमें हड़ताल करने को प्रेरित किया । बागीचा में बैठक किया गया और अगले दिन स्कूल नहीं जाने का निर्णय लिया गया । तब साथ-साथ आजादी का नारा बुलंद करने वाले हीरादास सिंह(लबदना) बक्सर जेल गये, जहाँ उनका मानसिक संतुलन बिगड़ गया और बेचारे निःसंतान दूनिया से चले गये । खैर, ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ का नारा लगाते हुए छात्र-जनता विद्यालय पहुँचे, गवर्नर बिहार सिफ्टन के तैल चित्र को क्षतिग्रस्त किया गया, उसपर थूका गया, फाटक तोड़ डाले गये । सिंचाई विभाग का कार्यालय तोड़ डाला गया । तब एसडीओ थे  दिलीपपुर(जगदीषपुर) के महाबीर बाबू, जिन्होंने हमें ट्रायल में पहचानने से इंकार कर दिया । ज्यूरी ने उन्हें आरोपित करते हुए कहा- ‘तुम आन्दोलन में सीधे तौर पर षामिल हो ।’ सिंचाई कार्यालय के बाद षराब डीपो में तोड़फोड़ की गयी । कच्चा स्पीरीट में आग लगा दिया, डाकघर में विस्फोट किया गया । बड़का गाँव(भोजपुर) के रामजनम बाबू डाकपाल थे । इन्होंने भी पहचानने से इंकार कर दिया । उत्पाद अधीक्षक ने दुधेष्वर राम (जमुहारा, दाऊदनगर) को पहचाना, उन्हें जेल जाना पड़ा । दाऊदनगर थाना पर भी आन्दोलनकारी पहुँचे, थानेदार रामकेष्वर बाबू ने पूछा- ‘क्या करना चाहते हो ।’ आन्दोलनकारियों ने कहा- ‘तिरंगा फहराना है।’ थानेदार ने हां कहा तो यहाँ तिरंगा लहरा दिया गया । मैं हीरादास के साथ सिपहां पहुँचा । ओवरसीयर बलदेव सिंह ने कहा इधर कहाँ जाइएगा, हम सम्हाल लेंगे । दुध पिलाया और विदा कर दिया । उधर पेड़ काट कर रास्ता बंद कर दिया गया । बेलाढ़ी गये जहाँ रामाषीष बाबू , रामकुमार सिंह सक्रिय छात्र थे । रात्रि में विष्वम्भर बिगहा गये जहाँ विषुनधारी सिंह षिक्षक ने रात्रि में रोका, वह जोर की बारिष अब भी याद है । सुबह जिनोरिया पूल टूटा हुआ पाया । इस दिन तारा में चन्द्रदेव सिंह षिक्षक के दादा कैलाष सिंह ने रात्रि में रोका । अगस्त क्रांति के बाद जेल जाना पड़ा । पिता रामरेखा सिंह एवं माँ ने कहा- जेल चले जाओ नहीं तो पूरा घर बर्बाद हो जायेगा । दो माह जेल में रहना पड़ा । औरंगाबाद और गया सेन्ट्रल जेल में । इसी बीच भादो षष्ठी(1942) को पिता का देहान्त हो गया । पन्द्रह अगस्त 1947 को मैं गया में यादव छात्रावास में था, जहाँ नेहरूजी का भाषण सुना, उनकी यह पक्ति आज भी याद है- ‘सारी दुनिया सो रही है, हम अभी जाग रहे हैं ।’ मेरा सपना है कि जय प्रकाष नारायण जी के नाम पर यहाँ एक पार्क बने । पुस्तकालय हो ।उनके पिता यहाँ कैनाल विभाग में गिरजौर (सर्किल ऑफिसर) थे । अषोक उच्च विद्यालय में चपरासी रहे रामकिषोर ने उन्हें अपनी गोदों में खेलाया है । वह कहते भी थे- ‘मैं भाग्यषाली हूँ मेरे हाथों ने भारतमाता के महान सपूत को खेलाया है ।’ यहाँ जेपी सन् 1938 में चावलबाजार में आये थे, जब उन्हें देखा था । भावी पीढ़ी पढ़े लिखे, लोकतंत्र मजबूत हो, नैतिकता का क्षरण अब रूके यही मेरी अकेली इच्छा है ।


(श्रमण संस्कृति का वाहक-दाउदनगर में प्रकाशित लेख में उनसे संबंधित पंक्तियाँ)

1.... आज समाज भले ही समानता के अधिकार के प्रति जागरुक हुआ है, कानून भेदभाव खत्म करने में सहायक हुआ, लेकिन सामाजिक भेदभाव का शिकार बनने की घटनाएं अब भी होती है, किंतु यदा-कदा। अब रोजमर्रे की बात नहीं रह गई है। वर्जनायें टूटने लगीं हैं, सामाजिक, राजनीतिक दिशा बदलने से समाज की दशा भी बदली है। गुलाम भारत में बच्चों के नामांकन राजनीतिक कारणों से भी नहीं होता था। इसके उदाहरण हैं- स्वतंत्रता सेनानी और इलाके के चलते-फिरते डाइरेक्ट्री (जी मैं इन्हें ऐसा ही मानता-जानता हूं) डा.राम परीखा यादव। अपनी किशोरावस्था में वे अगस्त क्रांति में शामिल हो गये थे। नतीजा उनका सिफ्टन हाई स्कूल में नामांकन नहीं हो रहा था। 01 अक्टूबर से 25 नवंबर 1942 तक उनकी पढाई बाधित रही। बिहार सरकार की अनुमति के बिना इनका नामांकन नहीं होना था। तब सिफ्टन हाई स्कूल के प्रधानाध्यापक थे यामिनी कांत चटर्जी। उन्होंने नामांकन करने से इंकार कर दिया। नामांकन के लिए तब वे अपने ससुर (बाद में ससुर बने थे) के भाई सब डिविजनल बोर्ड औरंगाबाद के उपाध्यक्ष रामनारायण सैनिक के पास गये। फिर दोनों डिस्ट्रिक्ट बोर्ड गया के चेयरमैन रामचन्द्र शर्मा के पास  गये। उन्होंने पटना प्रक्षेत्र के स्कूल इंसपेक्टर आशुतोष घटक के पास पैरवी का पत्र देकर भेजा, आदेश हुआ तब इनका नामांकन दसवीं कक्षा में हो सका। पुरानी शहर के परमेश्वर प्रसाद को मैट्रिक (1970) के बाद सेंटजेवियर कालेज रांची से पढना था। उन्होंने मैट्रिक में 700 में 609 अंक लाया था। कालेज के मेरिट लिस्ट में भी उनका नाम शामिल हुआ। इसके बावजूद उन्हें जब फादर के पास भेजा गया तो उन्होंने अपमानित किया। कहा कि-‘गया जिला का हो इसलिए नामांकन नहीं लेंगे।‘ सवाल पूछा कि-‘गया जिला का होना गुनाह है क्या?’ खैर नामांकन नहीं हुआ। कुछ दिन रांची कालेज में पढे और आरा लौट गये। महाराजा कालेज से इंटर किया।


2..... सन 1940 में अगनूर मिडिल स्कूल (बाद में वही हाई स्कूल हुआ) खुला। हम अतीत में प्रतिद्वन्धिता भी इस क्षेत्र में देखते हैं। डा.रामपरीखा यादव जानते हैं कि जब अगनूर के वैश्य जमीन्दार नागेश्वर प्रसाद और गया प्रसाद ने स्कूल खोला तो अरई के भूमिहार समाज में स्वस्थ बेचैनी बढ गई कि जब वैश्य खोल सकते हैं तो हम क्यों नहीं? इसके बाद अरई के जमींदार मज्जु मियां से जमीन लेकर स्कूल खोला गया जो बाद में अरई हाई स्कूल बना। इसके लिए प्रबन्ध समिति के प्रथम सचिव रामदेनी मौआर, गिरधारी शर्मा और धर्मदेव शर्मा जैसे प्रबुद्ध लोग सक्रिय भूमिका में रहे।

Saturday, 2 December 2017

दिव्यांगों की जिम्मेदारी से भाग रही सरकार, पीएम से मंत्री तक नहीं सुने फ़रियाद

दैनिक भास्कर में प्रकाशित ख़ास खबर

पीएमओ की पहल पर भी नहीं मिल सकी ट्राईसाइकिल
बैटरी चालित ट्राईसाइकिल की मांग पीएम ने भी नहीं की पूरी
पीएमओ ने आवेदन को भेजा जिला लोक शिकायत निवारण को  
मंत्री सिर्फ फ़रियाद सुनते रहे, दिव्यांग इसके लिए दौड़ लगा रहे
उपेंद्र कश्यप । डेहरी

आज विश्व विकलांग दिवस है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस शब्द को नया नाम दिया-दिव्यांग। लेकिन न आयाम बदले, न ही इनकी स्थिति बदली। गूंगी-बहरी सरकार की व्यवस्था दिव्यांगों की जिम्मेदारी से भाग रही है। लाचार बने दिव्यांग कभी पीएम तो कभी मंत्री तो कभी प्रशासनिक महकमे से फ़रियाद के लिए दौड़ रहे हैं, किन्तु कोइ लाभ नहीं हो रहा। स्टेशन रोड में आरके स्टूडियो चला रहे बृजमोहन प्रसाद उर्फ़ ककू जी एक उदाहरण मात्र हैं। ऐसे दिव्यांगों की संख्या काफी है जो पीड़ित हैं और सरकार उनकी नहीं सुन रही है।
दोनों पैर एक दुर्घटना में गंवा चुके बृजमोहन गत 30 महीने से बैटरी चालित ट्राईसाइकिल के लिए दौड़ रहे हैं। पीएम को उनकी बेटी दिव्या सोनी ने मार्च 2017 में पत्र लिख कर फ़रियाद किया। पीएमओ ने पत्र को जिला लोक शिकायत निवारण कार्यालय को भेज दिया। एसडीएम का फोन आया। 04 और 20 अक्टूबर को बेटी कार्यालय में सुनवाई के लिए गयी। अंतत: जवाब मिला कि बिहार में किसी को भी यह उपकरण नहीं मिला इसलिए मांग को अस्वीकार किया जाता है।  दूसरी तरफ बृजमोहन का दावा है कि केंद्र में मंत्री राम कृपाल यादव, मंजू वर्मा और एक अन्य ने दानापुर में बैटरी चालित उपकरण दिया है। काराकाट से सांसद केंद्र में मंत्री उपेन्द्र कुशवाहा से वे कई बार मिले, फ़रियाद की, हुआ कुछ नहीं।

पीएम अंकल, पापा का जीवन सरल हो जाएगा-दिव्या:-
बृजमोहन प्रसाद की बेटी दिव्या सोनी कक्षा आठ में पढ़ती है। 13 साल की इस बच्ची ने पीएम को लिखे पत्र में कहा कि- 
पीएम अंकल,
पापा 100 प्रतिशत विकलांग हैं। उनके विकलांग होने से घर की आर्थिक स्थिति खराब हो गयी है। वे ही कमाते और घर को चलाते थे। अब कुछ भी कर सकने की स्थिति में नहीं हैं। उनका जीवन काफी कठीन हो गया है। यदि मोदी अंकल, आप बैटरी चालित ट्राईसाइकिल दे देंगे, तो पापा का जीवन सरल हो जाएगा। आर्थिक स्थिति सुधर जायेगी, वह और उसके भाई पढ़ सकेंगे।
आपकी बेटी-दिव्या सोनी

यूं दोनों पैर गंवा गए ककू:-
05.02.2015, गुरूवार की सुबह कुहरा घना था, जो इनके जीवन को बर्बाद कर गया। वे रामगढ़ से इंटरसिटी एक्सप्रेस से डेहरी आये। ट्रेन से उतरे और पैर फिसल गया। जब तक संभलते ट्रेन खुल गयी और दोनों पैर कट गया। आवाज लगाया, जीआरपी वाले पहुंचे तो बोले-सुसाइड केस है यह तो। अपना परिचय दिया-पूर्व स्टेशन मैनेजर केपी शर्मा के पुत्र हैं। तब फोन नंबर माँगा, अपना दिया और रिंग होने पर उसे पाया। खुद पत्नी को कॉल किया। बीएचयू में जीवन मौत से संघर्ष के बाद 01 अप्रैल 2015 को वहां से स्वस्थ हो कर लौटे। किन्तु, एक नये संघर्ष के लिए। यह संघर्ष उनके साहस के साथ जारी है।

1981 से अन्तरराष्ट्रीय विकलांग दिवस
अन्तरराष्ट्रीय विकलांग दिवस सयुंक्त राष्ट्र संघ ने 03 दिसंबर 1991 से प्रतिवर्ष मनाने की स्वीकृति दी थी। सयुंक्त राष्ट्र महासभा ने संघ के साथ मिलकर वर्ष 1983-1992 को अन्तरराष्ट्रीय विकलांग दिवस दशक घोषित किया था।
भारत में विकलांगों से संबंधित योजनाओं का क्रियान्वयन सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के अधीन होता है।

Thursday, 16 November 2017

पुलिस के सुस्त रवैये से गुस्से में एकजुट होता है समूह



यदि जल जाते बच्चे तो क्या करती पुलिस?
क्या चुप बैठे रहते अभिभावक?

औरंगाबाद के अंबा में संत जोसेफ स्कूल के बस को चाचा नेहरू के जन्म दिन बाल दिवस पर अपराधियों ने जला दिया। वाहन चालक ही स्कूल बस का मालिक था। उसने सूझ बूझ से अपराधियों के सामने काम लिया। बच्चों को पेट्रोल डालने के बाद वाहन से आग लगाए जाने से ठीक पहले उतार दिया। कल्पना करिए, बस में सवार बच्चों को रहते यदि आग के हवाले कर दिया गया होता तो क्या होता? क्या तब भी पुलिस का रवैया इतना ही सुस्त रहता, जितना कि अभी है? बच्चो के अभिभावक क्या तब भी इसी तरह शांत बैठे रहते? या वे स्कूल को ही जिम्मेदार बता कर सड़क पर उतर गए होते? यह सब कल्पना कर सकते हैं। 
यह सब कहने का कारण है, जो खुद पुलिस ने उपलब्ध कराया है। घटना को अंजाम देने के बाद अपराधी स्कूल को फोन करके बताता है कि स्कूल वाहन झोल (जलाना) दिया है। स्कूल संचालक मिले, अन्यथा स्कूल में बम मार देंगे। मैं फलां हूँ, फलां का भाई। घर अमुक जगह है। यह बातचीत रिकार्ड पर है। इस रिपोर्ट के साथ संगलग्न भी है। इसे आप सुन सकते हैं। 
अब सवाल है कि इतना साहस एक अपराधी को कैसे और कहां से आया? क्यों ऐसा है? आखिर उसने खुद का परिचय और कबूलनामा क्यों दिया? इसके पीछे क्या साजिश है? क्या बड़े बड़ों का संरक्षण प्राप्त है और इसी कारण उसके पास इतना साहस आया, या अपराधी नौसिखुआ है? नौसिखुआ होने पर भी किसी के संरक्षण होने की संभावना खत्म नहीं हो जाती। पुलिस उसे तीन दिन में भी क्यों गिरफ्तार नहीं कर सकी? क्या किसी बड़े पैरवी या सफेदपोश के दबाव में है, जैसी कि रमता हत्या कांड में चर्चा होती रहती है? या पुलिस शांति से अपना काम कर रही है, और सफलता के बाद मीडिया में आकर बयान देगी? संभावनाएं दोनों तरह की है। 
16 नवम्बर को एक सामाजिक संगठन वैश्य चेतना परिषद ने इस मामले में हस्तक्षेप किया। उसने मंत्रीमंडल के सदस्यों के संज्ञान में इस मुद्दे को लाया है। अब संभवतः फैसलाकुन या महत्वपूर्ण कार्रवाई दिख सकती है। 
उस घटना के बाद नन सीबीएसई अफलिएटेड स्कूलों ने हड़ताल कर रखा है। 15 को कुटुंबा प्रखंड के स्कूल बंद रहे और 16 को पूरे जिले के स्कूल बंद रहे। करीब 300 स्कूल बंद रहे। इससे हाजरों बच्चों की पढ़ाई की क्षति हुई। इसकी भरपाई कौन करेगा?
इस स्कूल के निदेशक दिलीप साव और इनके भाई अनूप साव को प्रशासनिक सहयोग चाहिए। तीन माह पहले दिलीप को गोली मारी गई थी। 14 नवम्बर को उनके स्कूल बस में पेट्रोल डालकर आग लगा दी गई।
घटना को अंजाम देने वाले ने खुद स्कूल को फोन कर अपना परिचय दिया। परसा का पुकार मेहता अपना नाम बताया। और धमकी दी कि स्कूल बंद कर दो, अन्यथा बम मार देंगे।
स्कूल बंद करने की धमकी देने से भी सवाल उठता है। आखिर स्कूल बंद हो जाने से किनको लाभ होना है?
उपेंद्र कश्यप, दैनिक भास्कर, डेहरी (रोहतास)

Tuesday, 14 November 2017

व्यापार मंडल के 34 साल के इतिहास में पहली बार "यादव अध्यक्ष"


विजेता चुन्नू सिंह की आरती उतारती हुई मां श्रीमति कान्ति देवी   
चुन्नू सिंह बने सहकारिता के "इतिहास पुरुष"
08 बार कुर्मी और 03 बार राजपूत बने अध्यक्ष
उपेंद्र कश्यप (लेखक, पत्रकार)
व्यापार मंडल का चुनाव पूर्ण हो गया है। दाउदनगर (औरंगाबाद) के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण इतिहास रचा गया, जो कलमकारों की आंखों ने नहीं देखा, या समझा। सुजीत कुमार उर्फ चुन्नू सिंह व्यापार मंडल के अध्यक्ष बन गए। खबर मात्र इतनी भर नहीं है। इस खबर से अधिक महत्वपूर्ण इसका ऐतिहासिक पक्ष है। चुन्नू 'इतिहास पुरुष' बन गए हैं। उनका नाम व्यापार मंडल दाउदनगर के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखा जाएगा। जब भी स्थानीय इतिहास कोई कलमबंद करेगा। यदि उसे स्थानीय राजनीतिक इतिहास का ज्ञान हो। चुन्नू सिंह पहले “यादव अध्यक्ष” बने हैं। 1983 के चुनाव से अब तक का इतिहास ज्ञात है। इसके अनुसार उप चुनाव और कार्यकारिणी द्वारा अध्यक्ष चुने जाने समेत 11 बार अध्यक्ष बने हैं। चुन्नू 12 वीं अध्यक्ष बने हैं। 

व्यापार मंडल पर कुर्मी जाति का एकाधिकार रहा है। सात बार कुर्मी जाति के नेता अध्यक्ष बने हैं। जबकि तीन बार राजपूत। 1978 में तरारी से मुखिया बने बेलाढी निवासी दिनेश सिंह कुर्मी थे। वे 1983 और 1986 में व्यापार मंडल का अध्यक्ष बने। इनके बाद 1989, 1992 और 1995 में लगातार तीन बार संसा के हीरालाल सिंह अध्यक्ष बने। वे भी कुर्मी थे। उसी तरह 1998 और 2001 में गोरडीहां निवासी मुखिया रहे भगवान सिंह अध्यक्ष बने। वे भी कुर्मी हैं। 04 जनवरी 2016 को बेलाढी निवासी दीपक सिंह अध्यक्ष बने, वे भी कुर्मी हैं। बीच में सिर्फ सुदेश सिंह ही ऐसे सवर्ण नेता रहे जो तीन बार अध्यक्ष बने। वे जाति से राजपूत थे, जिनोरिया के निवासी। करमा पंचायत के मुखिया भी रहे हैं। 2004 में कार्यकारिणी ने उनको अध्यक्ष चुना था। 2007 में चुनाव जीत कर अध्यक्ष बने और फिर तीसरी बार 2012 में अध्यक्ष बने। 04 अक्टूबर 2012 को हत्या होने तक वे इस पद पर रहे। सुदेश सिंह भी पिछड़ा और राजद की राजनीति करके ही व्यापार मंडल का अध्यक्ष बने थे। यह पहली बार हुआ है कि कोई यादव व्यापार मंडल का अध्यक्ष बना। 

विडंबना देखिए, इस बार चुन्नू भाजपा जदयू के समर्थन और सवर्ण मतों के सहयोग से अध्यक्ष बने। पिछडावाद की राजनीति करने वाले 'सबका साथ सबका विकास' में यकीन नहीं रखते और नतीजा इतिहास का हिस्सा नहीं बन सके। चुन्नू की जीत इस ऐतिहासिक संदर्भ में भी देखा जाना चाहिए। यह तब महत्वपूर्ण दिखेगा जब इतिहासबोध हो।

चुन्नू सिंह का जीवन परिचय-
पिता-ललन प्रसाद सिंह-सेवा निवृत प्रधानाध्यापक
माता-कान्ति देवी- सेवा निवृत शिक्षिका
भाई-अजीत सिंह-अध्यक्ष-नगर परिषद् पैक्स व आरएसओडी, मंटू सिंह|
घर-मझिआंव-ओबरा|

Thursday, 9 November 2017

बिना ‘गिवअप’ किए ही बंद हो गयी एलपीजी सब्सिडी, सरकार ने कहा –धन्यवाद!

ग्राहक बोल रहे-सब्सिडी छोड़ने के लिए कभी नहीं दिया आवेदन
उपेन्द्र कश्यप। डेहरी

केंद्र सरकार अपनी पीठ खूब थपथपा रही है| उसे फक्र है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आह्वाहन पर देश के एक करोड़ नागरिकों ने अपना एलपीजी गैस सब्सिडी छोड़ दिया है| इससे ‘प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना’ के तहत पांच करोड़ परिवारों को लकड़ी के धुंए से मुक्ति दिलाने का अभियान चल रहा है| यह तब अच्छी बात होती जब वास्तव में परिवारों ने खुद ‘गिवअप’ किया होता। किन्तु जमीनी हकीकत कुछ और है| जिन लोगों को गिवअप करने के बदले पीएम ने धन्यवाद पत्र भेजा है, उसमें से किसी ने स्वेच्छा से सब्सिडी नहीं छोड़ा है| दैनिक भास्कर ने पीएम ने धन्यवाद पत्र जिनके लिए भेजे हैं उनमें से दस लोगों से पूछा, तो सबने कहा कि उन्होंने सब्सिडी नहीं छोडी है। पाली रोड स्थित देव इंडेन के संचालक अशोक पासवान ने भी इस बात की पुष्टि की कि किसी ग्राहक ने आज तक सब्सिडी छोड़ने के लिए आवेदन उन्हें नहीं दिया है। उनके यहाँ ऑन लाइन नंबर लगाने की सुविधा भी नहीं है| इनके अनुसार मोबाइल से नंबर लगाने के लिए कॉल करते वक्त गिवअप के लिए बटन दबाने को बोलता है और लोगों ने अज्ञानतावश या भूलवश वही बटन दबा दिया होगा| नतीजा बड़ी संख्या में लोग बिना जाने ही गिवअप कर गए। सरकार ने उनके नाम “धन्यवाद पत्र” भेज दिया।

कईयों को पता नहीं तो कई लगा रहे दौड़
गिवअप के बाद कइयों को यही ज्ञात नहीं है कि उनके खाते में सब्सिडी जा रही है या नहीं। बहुत ऐसे हैं जो पासबुक चेक ही नहीं करते। कुछ ऐसे ग्राहक भी हैं जो दौड़ रहे हैं कि उनके खाते में सब्सिडी की राशि नहीं आ रही| कुछ बैंक और गैस आपूर्तिकर्ता के बीच दौड़ रहे हैं और तीनों पक्षों को ही पता नहीं कि सब्सिडी खान और क्यों अटकी पडी है। कई ऐसे लोग भी हैं जिनके खाते में सब्सिडी जा रही है और गिवअप के लिए धन्यवाद पत्र भी आया हुआ है।

विवाद के कारण नहीं बाँट रहे “धन्यवाद पत्र” 

देव इंडेन में 55 ग्राहकों के लिए धन्यवाद पत्र आया हुआ है। अशोक पासवान का कहना है कि उन्हें यह कंपनी के चैनल से प्राप्त हुआ है। कुछ ग्राहकों को उन्होंने दिया तो विवाद शुरू हो। प्राय: सभी ने कहा कि उन्होंने सब्सिडी छोड़ने के लिए कोइ आवेदन नहीं दिया है।

हमने मांगा अनुदान, पीएम ने भेजा “धन्यवाद पत्र’
दैनिक भास्कर ने पीएम से धन्यवाद प्राप्त करने वाले ग्राहकों से सवाल पूछा तो जवाब मिला-
० नौडीहा के पांडेपुर से कृष्णा साह बोले-रौंग नंबर|
० चितौलीचौक रमडीहरा से रौशन कुमार बोले-गिवअप नहीं किया है| कोइ आवेदन नहीं दिया| खाता चेक नहीं किया है|
० परमेश्वर बीघा से गनपत सह बोले-काहे सब्सिडी बंद कर दिए? जब छोड़ा ही नहीं सब्सिडी तो पीएम धन्यवाद काहे देंगे?
० परमेश्वर बीघा से प्रेमलाल कुमार बोले- बैंक से पता चला कि सब्सिडी नहीं आ रहा, हम छोड़े नहीं हैं|
० पीतांबरपुर से अशोक कुमार सिंह बोले- बैंक और गैस एजेंसी ने आधार नंबर माँगा| जमा आकिया तब भी सब्सिडी नहीं आ रहा| हम नहीं छोड़े हैं सब्सिडी|

धन्यवाद पत्र का अंश---
प्रधान मंत्री, भारत सरकार, नई दिल्ली 
स्नेही जन
... मैंने ये पत्र आपको और आपके परिवार को धन्यवाद देने और अभिनन्दन करने के लिए लिखा है। 27 मार्च 2015 को मैंने देशवासियों से आह्वाहन किया था कि क्यों न हम रसोई गैस पर मिलने वाले अनुदान का त्याग करें। आपने सहित देश के एक करोड़ से अधिक परिवारों ने गैस सब्सिडी छोड़ दी। आपके छोड़े गए सब्सिडी से देश “प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना” से देश के पांच करोड़ गरीब परिवारों को लकड़ी के धुएं से मुक्ति दिलाने में सहयोग मिल रहा। मुझे उम्मीद है कि अर्थशास्त्र के जानकार और निराशा भरी बात करने वाले कुछ लोग आपके इस त्याग के बाद जन शक्ति को एक नए नजरिए से देखेंगे। 
मैं आभारी हूँ कि आपके इस फैसले से देश के विचार प्रवाह को नया आयाम  मिला है। 

पीएम का कुछ और निवेदन:-    
पीएम नरेन्द्र मोदी ने इस धन्यवाद पत्र में ‘जनता से कुछ और भी निवेदन’ किया है:-
1 -आप अपने और कम से कम 10 परिचितों के घर में बिजली के लिए एलईडी बल्ब का इस्तेमाल शुरू  इससे बिजली भी बचेगी और पैसों की भी बचत ।
2-स्वच्छता को अपना स्वभाव । जिस भी जगह पर आप हैं वहां इसे जन आन्दोलन का स्वरूप देने की कोशिश ।  

Friday, 3 November 2017

पुलिस के हत्थे चढ़ गये- उसी के हिमायती और नक्सलियों के विरोधी सुग्रीव खरवार

दैनिक भास्कर रोहतास में प्रकाशित खबर
पुलिस के नक्सल विरोधी अभियान में रहे हैं सक्रीय
कैमूरांचल विकास मोर्चा के बैनर तले किये हैं काम
उपेन्द्र कश्यप| डेहरी

मुखिया पुत्र के अपहरण मामले में सुग्रीव खरवार की गिरफ्तारी की चर्चा का दूसरा पहलू भी है| जिले के लिए नक्सल आन्दोलन, नक्सल विरोधी आन्दोलन के सन्दर्भ में इस गिरफ्तारी के बड़े मायने हैं| सुग्रीव पुलिस का मुखबीर माने जाते रहे हैं| यह आरोप उन पर नकस्ली संगठनों ने लगाया और इसकी सजा भी दी| इसके बावजूद हिम्मत नहीं हारने वाले खरवार पहाड़ पर नक्सल विरोधी आन्दोलन के मुख्य नेतृत्वकर्ता माने जाते रहे हैं| इस संवाददाता की उनसे मुलाक़ात मुखिया बनने के बाद संभवत: 2002 में हुई थी| एक पत्रिका के लिए तब उनसे साक्षात्कार लिया था| 
मुखबिरी नहीं की तो किया गिरफ्तार
खरवार को लेकर एक चर्चा यह भी है कि पुलिस उनसे मुखबिरी का काम चाहती रही और वे ऐसा इधर के दिनों में नहीं कर पा रहे थे| सूत्रों के अनुसार ग्रामीण इलाके के लोग मानते हैं कि उनका कोइ आपराधिक रिकार्ड नहीं रहा है, हालांकि एसपी ने कहा है कि आपराधिक रिकार्ड रहा है| इसके बावजूद पुलिस कोइ ख़ास आरोप नहीं लगा सकी है| 

संरक्षण देना पडा महँगा
चर्चा है कि वे हथियार का इस्तेमाल अपने हक़ में और अपराधियों का संरक्षण देने के लिए करने लगे थे जो पुलिस को नागवार गुजर रहा था| कौशल अपहरण काण्ड में हुई गिरफ्तारियां सुग्रीव के खिलाफ पुलिस के लिए एक अवसर उपलब्ध करा गयी| सुग्रीव ने कैमुरांचल विकास मोर्चा बनाया था| इसके बैनर तले नक्सलियों के खिलाफ काम किया| पहाड़ पर 59 हथियार के लाइसेंस मिले| इससे नक्सलियों की दम निकल गयी थी|

पुलिस मुखबिरी का आरोप लगा चुके हैं नक्सली संगठन
इसी आरोप में परिवार के तीन सदस्यों की हुई थी ह्त्या
सुग्रीव खरवार के खिलाफ नक्सली संगठन ने कारर्वाई की है| उस पर मुखबिरी का आरोप लगाया गया था| वर्ष 2011 में 30 जुलाई की रात बंडा में उसके घर पर हमला किया गया था| उनके तीन भाइयों अवधेश खरवार, श्री राम खरवार और श्याम बिहारी खरवार की ह्त्या टांगी से काट कर कर दी गयी थी| घर में आग लगा दिया गया था| तब सुग्रीव खरवार घर में नहीं थे इस कारण बच गए थे| उन पर जोनल कमांडर बीरेंद्र यादव उर्फ राणा की हत्या का आरोप माओवादियों ने लगाया था| आज यह बिडंबना ही दिखती है कि पुलिस ने उन पर कई नक्सली घटनाओं में शामिल होने का आरोप लगाया है|

कौन था बीरेंद्र यादव उर्फ राणा?
बीरेंद्र यादव उर्फ़ राणा भाकपा माओवादी का सोन-गंगा-कोयल-विन्ध्याचल एरिया का जोनल कमांडर था| उसने कामेश्वर बैठा की जगह अपने संगठन में ली थी| वही बैठा, जो बाद में सांसद बने| बैठा की तरह ही राणा की भी इलाके में तूती बोलती थी और संगठन के लिए खासा महत्वपूर्ण शख्स था|

2001 में बने थे मुखिया
सुग्रीव खरवार साल 2001 में मुखिया बने थे| बाद में वे चुनाव नहीं जीत सके या चुनाव नहीं लड़ सके|

Wednesday, 25 October 2017

हर सभ्यता संस्कृति में सूर्य ही हैं अराध्य देव

पूरी दुनिया को जगमग करने वाले कौन हैं भगवान भास्कर ?

कश्यप और अदिति के 
पुत्र हैं भगवान सूर्य

छठ व्रत भगवान सूर्य से संबंधित पर्व है| इसी कारण इसे सूर्य षष्ठी व्रत कहा जाता है| सूर्य जो साक्षात हैं, प्रत्यक्ष देवता। इनके बिना जीवन की कल्पना नहीं हो सकती है। इनकी उपासना सिर्फ धरतीवासी ही नहीं बल्कि सौर मंडल के सभी ग्रह, उपग्रह, नक्षत्र करते हैं। धरती पर भी जितनी सभ्यताएं पनपी सबने किसी न किसी अवसर पर किसी न किसी विधि से इन्हें अपना अराध्य माना है। भारतीय वांडगमय में सूर्य के जन्म का भी किस्सा दर्ज है। आचार्य पंडित लाल मोहन शास्त्री ने बताया कि सूर्य की उत्पति कश्यप द्वारा अदिति के गर्भ से माघशुक्ल सप्तमी की प्रात: बेला में हुआ। आदित्य नाम इसीलिए मिला। जन्म क्षेत्र कलिंग (कोर्णाक, उड़ीसा) था, जो कश्यप ऋषि का क्षेत्र है। सूर्य की दो पत्नी संज्ञा और छाया है। संज्ञा विश्वकर्मा की पुत्री है जो अपनी प्रतिबिंब छाया को छोड़कर मायके (नैहर) चली गई। इनकी उपासना में नित्य सूर्य की पूजा, गायत्री मंत्र जाप, अर्घ्य एवं दंडवत करना चाहिए।

दिन, रात, मास पक्ष सब सूर्य से संबद्ध
सूर्य से ही दिन, रात, घटी, पल, मास, पक्ष, वर्ष, संवत का विभाग बना। इनके बिना सिर्फ अंधेरा रह जायेगा। सूर्य ही जीवन, तेज, ओज, बल, यश, चक्षु, आत्मा और मन हैं। विश्व के अंतरात्मा हैं। अग्निपुराण के अनुसार विष्णु के नाभी कमल से ब्रह्मा का जन्म हुआ। ब्रह्मा से मरीची जन्मे, इनसे कश्यप और कश्यप से सूर्य। सूर्य सात अश्वों पर सवार हैं, जिनका सारथी अरुण वास्तव में गरुड़ का अनुज है। पिंडगल लेखक, दंडनायक-द्वार रक्षक और कल्मास नाम के दो पंक्षी द्वार पर खड़े रहते | दिण्डि मुख्य सेवक हैं।

सूर्य की हैं दस संतान
सूर्य की दस संतान हैं| संज्ञा से वैवस्वतमनु, यम, यमुना, अश्रि्वनी कुमार एवं रेवन्त तथा छाया से शनि, तपती, विष्टि (भद्रा) और सावर्णिमनु। सूर्य की अराधना काफी फलदायी है। कुष्ठ रोग समेत कई व्याधियां दूर होती हैं| प्राणायाम को वैज्ञानिकों ने भी लाभदायक बताया है।