Wednesday, 6 June 2018

तीसरे चेयरमैन: डिप्टी साहब, जिनको शहर खींच लाया

1945 से 1948 तक शहर के चेयरमैन रहे राय बहादुर जयदेव मिश्रा,
दाउदनगर के प्रथम ग्रेजुएट थे।

अभी तक अकेले ऐसे चेयरमैन जिनकी मृत्यु पद पर रहते हुई।
उपेन्द्र कश्यप- लेखक -श्रमण संस्कृति का वाहक दाउदनगर
राय बहादूर जय देव मिश्रा का उप नाम “डिप्टी साहब” ही चर्चित है। यही नाम जन मानस की स्मृतियों में बैठा हुआ है। वे 1945से 1948 तक शहर के चेयरमैन रहे। दाउदनगर में ही पढे लिखे। बिहार के अकेले बी.एन.कालेज से ग्रेजुएट किया था। शायद दाउदनगर के पहले ग्रेजुएट। ब्रिटिश हुकूमत में कानूनगो के पद पर बहाल हुए। वे अंडर सेक्रेटरी के बाद सर्वे सेटलमेंट आफिसर के पद से सेवानिवृत हुए। इसीलिए उनका उप नाम “डिप्टी साहब” ही पड गया। सेवा निवृति के बावजूद तत्कालीन सरकार ने उन्हें नहीं छोडा। काम सौंपा- पूर्णिया में बनेली ईस्टेट के रिसिवर का। यानी इस जमींदार घराने के विवाद को सुलझाने का काम मिला। राजा की तरह तैनात किए गए। तब मामला सुलझाने के लिए यहां से शीतल प्रसाद खत्री और इन्द्रदेव राय को साथ ले गए थे। इन दोनों को इससे पूर्व वे रांची भी साथ ले गए थे। सर्वे कार्य कराने में सहयोग के लिए। लक्ष्य पूरा करने में जब वे कामयाब हुए तो उन्हें वहीं रहने को कहा गया। मगर नबाबी ठाठ वाले शहर की गलियों ने उन्हें पुन: दाउदनगर खींच लाया। सोन किनारे की सोंधी मिट्टी की खुशबू भला और कहां मिलने वाली थी। वे दाउदनगर आ गये। उनको शहर का चेयरमैन बनने को कहा गया। उन्होंने साफ कहा कि सर्वसम्मति से बनाओगे तब स्वीकर है। उन्हें सर्वसम्मति से शहर का चेयरमैन बना दिया गया। उनके पीछे इस आकर्षण की वजह थी। नागरिकों को उनसे काफी अपेक्षा थी। उम्मीद थी कि डिप्टी साहब जब चेयरमैन होंगे तो शहर को बडी कामयाबी मिलेगी। सरकार में उनका रसूख है। अंग्रेजी हुकूमत भी उनकी क्षमता और प्रतिभा का लोहा मानती है। इसकी वजह थी नगरपालिका से जुडा महत्वपूर्ण कार्य करना और नगर निकाय चलाने का उनका तजुर्बा। वे गया म्युंसिपल के विशेष पदाधिकारी रह चुके थे। उसके बाद जब पटना सचिवालय में अंडर सेकरेट्री बने तो उन्होंने दाउदनगर नगर पालिका में चुनाव की व्यवस्था प्रारंभ कराया। यहां म्युंसिपल एक्ट की धारा 21 के तहत पदेन अध्यक्ष हुआ करता था। इसी प्रावधान के तहत यह पद 1885 से 1938 तक दाउदनगर के सिंचाई विभाग के एसडीओ और फिर औरंगाबाद के सिविल एसडीओ के पास रहा था। इन्होंने दफा 28 के तहत पदेन चेयरमैन की व्यवस्था खत्म कराया और तब ही नागरिक समाज से चेयरमैन के चयन की प्रक्रिया प्रार्ंभ हुई। कांग्रेस का जमाना था सो जम्होर के सूरज नारायण सिंह को प्रथम चेयरमैन बनने का मौका मिला। वे निर्वाचित नहीं मनोनित चेयरमैन थे। तब सरकार के पास यह अधिकार था कि किसी को भी चेयरमैन मनोनित कर सकती थी। उनके इसी योगदान से यहां का समाज उनका ऋणी था। वह कर्ज शायद उन्हें चेयरमैन बना कर उतारने की कोशिश की गई थी। लेकिन यह ऋण काफी बडा था। उनका इस पद पर रहते ही निधन हो गया। ऐसा 1885 से लेकर अब तक का अकेला उदाहरण है। जब कोई चेयरमैन पद पर रहते स्वर्ग सिधार गया हो। शहर में पक्की नाली निर्माण का कार्य उन्होंने ही प्रारंभ किया था। एक वाकया जन मानस में दर्ज है कि डा.रणधीर सिंह के पिता सिंघेश्वर सिंह को सरकार ने आई.ए.एस. की मानद उपाधि दे रखा था। जब वे शहर कार से आये तो थाना में अपनी गाडी लगा दी और वहां से पैदल ही उनके पुरानी शहर स्थित मकान पर गये। कारण बताया था कि डिप्टी साहब उनके सिनियर अधिकारी रहे हैं, गुरु की तरह रहे हैं, तो उनके पास कार से कैसे जायें? वाह रे जमाना, अब ऐसी अपेक्षा शायद ही की जा सकती है।

नोट-यह आलेख सबसे पहले मेरी किताब-‘श्रमण संस्कृति का वाहक-दाउदनगर’- में प्रकाशित है, दूसरी बार आपके सामने अविकल प्रस्तुति यहाँ है।

यह आलेख और तस्वीर कॉपी राईट के तहत है । बिना अनुमति लिए इसका पूर्ण या आंशिक प्रकाशन नियम विरुद्ध है । सामग्री इसी लेखक (उपेंद्र कश्यप) द्वारा लिखित पुस्तक- “श्रमण संस्कृति का वाहक-दाउदनगर” में प्रकाशित है । यह निजी शोध कार्य है ।

Sunday, 3 June 2018

चेयरमैन साहब: हकीमी से हुए खान बहादूर, कुत्ते को पच्चीस पैसे की जलेबी



दो बार वायस चेयरमैन रह चुके थे दूसरे चेयरमैन

चमरटोली को डूबसे से बचाया तो ब्रिटिश हुकूमत ने दी “खान बहादूर” का लकब

जब असहयोग आन्दोलन में प्राय: सभी कांग्रेसियों के साथ सूरज नारायण सिंह ने भी अपने सभी पदों से त्यागपत्र दे दिया तब सरकार ने खान बहादूर सैय्यद मुहम्मद को यहां का चेयरमैन नियुक्त किया था। वे 1942 से 1945 तक इस पद पर रहे। इसके पहले 1920 और 1931 में वायस चेयरमैन रहे थे। पहली बार ऐसा हुआ था कि कोई वायस चेयरमैन इस पद तक पहुंचे हों। हालांकि वे मात्र दूसरे ही चेयरमैन थे। पिता का नाम हकीम जलील खां था। सन-1939 में असहयोग आन्दोलन प्रारंभ हुआ था। तब डिस्ट्रिक्ट बोर्ड हुआ करता था। जब 1935 में गवर्मेंट आफ इंडिया एक्ट बना तो उसके तहत राज्य में फेडरल सरकार बनी थी। जिसमें सात मंत्री थे। सभी ने असहयोग आन्दोलन के समर्थन में इस्तिफा दे दिया था। सैय्यद मुहम्मद को ब्रिटिश हुकूमत ने “खान बहादूर” का तगमा दिया था। इसकी वजह थी। गया के कलक्टर की पत्नी बीमार रहती थी। इलाज के लिए काफी जगहों पर गई, वैद्य, हकीम से मिलीं, मगर स्वस्थ नहीं हो रही थीं। सैय्यद मुहम्मद खुद हकीम थे। उंची डिग्री नहीं थी उनके पास। तब भी इनकी हकीमी की चर्चा दूर दराज तक थी। इन्हें कलक्टर का बुलावा आया। अपनी दवा और नुस्खे से उन्हें ठीक कर दिया। शेरवानी और अचकन पहन कर गया जाते, कलक्टर से हाथ मिलाते। यह तब बडी हैरत और गरिमा की बात हुआ करती थी। इससे उनका कद बढता गया। कहते हैं शहर में सोन का हुल्लड (बाढ) आया तो वार्ड संख्या 3 चमार टोली पानी में डूब गया। शहरियों ने इस बाढ की विभीषिका से किसी तरह खुद को बचाया। इन्होंने गया कल्क्टर को टेलीग्राम पर सूचना दी कि हमने बाढ से शहार को बचा लिया तो उधर से उन्हें “खान बहादूर” का लकब दे दिया गया। वे यहां सेना के लिए जवान का चयन किया करते थे। रिक्रूटिंग आफिसर थे। जवानों का चयन फौज के लिए करते और उसे नगरपालिका का चपरासी फौजदार राम अपने साथ लेकर दानापुर कैंट पहुंचा देते। उन्हें अंग्रेजी नहीं आती थी। मलुट गुरु जी उन्हें थोडी बहुत अंग्रेजी सीखाते थे। उनका काफी रुतबा था। ऐसा कि दूसरा उदाहरण मुश्किल से मिलेगा। एक वाकया याद आता है। नगरपालिका में सैय्यद वायज अहमद चपरासी थे। उनको कह दिया कि ‘जाओ तुम्हें सस्पेन्ड किया।‘ वह घर जा कर बैठ गए, मतलब काम पर आना बंद कर दिया। तीन दिन बाद बुलावा भेजा। आये और जब चेयरमैन ने पूछा कि क्यों नहीं आ रहे थे तो जवाब दिया कि- ‘आपने सस्पेंड किया था।‘ वे अवाक रह गए। आज जब चेयरमैन की बात चपरासी भी नहीं सुनता तो ऐसे वाकये चकित करते हैं। वे कागजी कारर्वाई नहीं करते थे। कर्मचारी को परेशान न होना पडे इसका ख्याल करते थे। मगर रुतबा था कि जो मुंह से कह दिया वह काम हो जाता था। उनके जमाने में बडा बाबु थे- गया प्रसाद वर्मा-उनको भी मौखिक ही सस्पेंड किया था। एक बार उनको अपने रईसजादे (बेटे) मो.जुबैर खान के लिए पैरवी करनी पडी थी। वे सरकारी सेवा में थे। गया में उनको उच्चाधिकारियों ने सस्पेंड कर दिया। मिलिट्री में कैप्टन रहे के.अब्राहम गया के तब कलक्टर थे। उनसे पैरवी किया। उनसे इनकी अच्छी बनती थी। कारण था रिक्रूटिंग आफिसर रहते उनसे संपर्क हुआ था। जुबैर खान कुत्ते को उस जमाने में रोजाना पच्चीस पैसे की जिलेबी खिलाया करते थे।
नोट-यह आलेख सबसे पहले मेरी किताब-‘श्रमण संस्कृति का वाहक-दाउदनगर’- में प्रकाशित है, दूसरी बार आपके सामने अविकल प्रस्तुति यहाँ है। 

यह आलेख और तस्वीर कॉपी राईट के तहत है । बिना अनुमति लिए इसका पूर्ण या आंशिक प्रकाशन नियम विरुद्ध है । सामग्री इसी लेखक (उपेंद्र कश्यप) द्वारा लिखित पुस्तक- “श्रमण संस्कृति का वाहक-दाउदनगर” में प्रकाशित है । यह निजी शोध कार्य है ।

Saturday, 2 June 2018

दाउदनगर के नहीं थे नगरपालिका के प्रथम चेयरमैन सूर्य नारायण सिंह



स्व.सूर्य नारायण सिंह जी की तस्वीर के साथ लेखक उपेन्द्र कश्यप
सन-1885 में नगरपालिका का गठन हुआ

तब से लेकर 1910 तक कोइ वार्ड नहीं था


सोन के पानी का रंग बदलते रहता है। कभी झक सफेद, एकदम से कजल तो बरसात में जुलाई से सितंबर तक चाय की तरह मटमैला और फिर सितंबर से दिसंबर तक पानी चामड (कचडा-फंगस) हो जाता है। इसी तरह यहां के प्रशासन और प्रशासक का भी रंग बदलते रहा है। जब सन-1885 में नगरपालिका का गठन हुआ था, तब शहर में कोई वार्ड नहीं था। यह सिलसिला सन 1910 तक चला। चूंकि डोमन खान के अत्याचार से मुक्ति का यह रास्ता ब्रिटिश हुकूमत ने निकाला था, इसलिए प्रजा पर सीधे सीधे उसका ही नियंत्रण हो गया। अंग्रेजी सरकार का अधिकार जनता पर हो गया। शहर का हर कार्य नगरपालिका कार्यालय से होने लगा। दाउदनगर सिंचाई विभाग के एसडीओ ही चेयरमैन के प्रभार में रहे, जब 1922 में म्युंसिपल एक्ट बना तब औरंगाबाद के सिविल एसडीओ इसके पदेन चेयरमैन बनने लगे, साल 1938 तक। साल 1910 में पहली बार वार्डों का गठन किया गया जिसकी संख्या मात्र-4 थी। सन-1925 में यह संख्या-6 थी। 1931 तक चुनाव नहीं होते थे। शहर के 25-50 गणमान्य लोग बैठते थे और हाथ उठा कर वार्ड कमीश्नर का चुनाव हो जात था। जब 1931 में इलेक्शन रुल बना तो चुनाव की प्रक्रिया प्रारंभ हुई। चेयरमैन ही मतदाता सूची बनाते थे। जिसे कोई चुनौती नहीं दे सकता था। मतदाता वही बनते थे जो नगरपालिका को टैक्स देते थे। न्यूनतम डेढ रुपए देने वाले मतदाता बनते थे। इस डेढ रुपए का काफी महत्व था तब। तब किरानी को 30 रुपए महीना वेतन मिला करता था। मजिस्ट्रेट को मात्र डेढ सौ रुपए महीना का वेतन होता था। तब हर सीट से दो सदस्य चुने जाते थे। इस तरह जब छ: वार्ड बना था तो बारह का चुनाव होता था। तीन सरकार मनोनित करती थी। एक चिकित्सक, एक सामाजिक कार्यकर्ता और एक राजनीतिक दल से चुने जाते थे। चेयरमैन पदेन होता था। यानी कोई न कोई अधिकारी ही चेयरमैन बनता था। जब दाउदनगर के जगदेव मिश्रा (बाद में चेयरमैन बने हैं) पटना सचिवालय में पदस्थापित हुए तो उन्होंने ही नगरपालिका अधिनियम की दफा 28 के तहत पदेन चेयरमैन की व्यवस्था खत्म कराया।
इसके बाद 1938 में सरकार ने नागरिक समाज से प्रथम चेयरमैन के रुप में सूर्य नारायण सिंह को मनोनित किया। जो 1942 तक इस पद पर रहे। तब कांग्रेस ही थी और उसी का दबदबा सत्ता से लेकर समाज के गलियारे तक में था। ऐसे में कांग्रेसी पृष्ठभूमि के शख्स को ही चेयरमैन मनोनित किया गया। उनका जन्म 1867 में हुआ था। उनके पिता का नाम राम किशुन सिंह था। दाउदनगर के सिफ्टन हाई स्कूल (अब अशोक इंटर स्कूल) की प्रबंध कमिटी से जुडे हुए थे। शायद वे सचिव या किसी अन्य पद पर थे। इस कारण उनका दाउदनगर आना जाना लगा रहता था। जब उन्हें चेयर मैन बनाया गया तो उन्होंने शहर का अतिक्रमण हटाया। इसकी चर्चा हुई और खिलाफत भी। लेकिन यातायात बहाल हुई। आवागमन सुविधाजनक हुआ। तब तक सिंचाई विभाग के डाकबंगला (नगर भवन के बगल में) में नगर पालिका बोर्ड की बैठक हुआ करती थी क्योंकि चेयरमैन औरंगाबाद के एसडीओ हुआ करते थे। जब सूरज नारायण सिंह चेयरमैन बने तो बैठकें नगरपालिका के कार्यालय में होने लगी। तब खूब तैयारी होती थी। अंग्रेजी हुकूमत थी। उसकी ठाठ भी शहर ने देखा। खूब देखा। बैठक की तैयारी के लिए कई दिन से सभी वार्ड कमीश्नर (अब वार्ड पार्षद) तैयारी करते थे।


 जब चेयरमैन का आगमन होता था तब घडा में पानी और तरबुजा, खरबुजा रखा जाता था। एकदम से ताजा। सोन में उपजाया हुआ। तब यहां के सोन दियारा में तरबूज-खरबूज और ककडी की खेती खूब होती थी। ताजा फल और मीठा स्वाद के साथ शरीर को ठंढक भी मिलती थी। जब वे आते तो शहर में सडक किनारे दोनों ओर नागरिक खडे हो कर सलामी बजाते। आखिर अंग्रेजी सरकार का रुतबा जो था। फिर समाज जमींदारी प्रथा के प्रचलन से खासा प्रभावित था। उनका कालेज जीवन कलकत्ता (अब कोलकाता) विश्व विद्यालय से संबद्ध रहा है। उनके बडे भाई जगरनाथ सिंह ने भी इसी विश्व विद्यालय से संस्कृत में एम.ए. (स्नात्कोत्तर मानविकी) किया था। स्वतंत्रता आन्दोलन में भी उनकी भूमिका रही है। जब जय प्रकाश नारायण हजारी बाग जेल में रखे गए तो उसी वक्त इनको इनके साथी शालिक सोनार एवं ड्राइवर केवल राम (चंद्रवंशी) के साथ गिरफ्तार कर जेल में रखा गया। नतीजा जय प्रकाश बाबु से उनकी घनिष्ठता बढ गई। बाद में जेपी नारायण खुद भू-दान आन्दोलन के प्रणेता विनोबा भावे और त्रिपुरारी शरण सिंह के साथ जम्होर आए। सुरज नारायण सन 1947 से 1952 तक गया जिला के (तब औरंगाबाद जिला वजूद में नहीं था) “जमींदार विधान सभा क्षेत्र” से एमएलसी (विधान परिषद सदस्य) रहे हैं। कांग्रेस में रहते हुए भी उसकी नीतियों के खिलाफ चुनाव लडे थे। क्योंकि वे जमींदारी उन्मूलन के खिलाफ थे। खिलाफत में अपना मतदान भी किया था। यह स्वभाव था या राजनीति यह अलग विषय है मगर उन्होंने जमींदार होते हुए भी इस प्रथा की खिलाफत किया यह महत्वपूर्ण है। इस इलाके में ईख उत्पादन से जुडे किसानों का संघ उन्होंने बनाया- “केन ग्रोवर्स कापरेटिव युनियन” जिसके वे प्रथम चेयरमैन रहे। जम्होर खादी भंडार भी उन्हीं की दी हुई जमीन पर कायम है। इस कारण वे समाज और क्षेत्र में लोकप्रिय होते चले गए। उनका काम करने का तरीका अलहदा था। नाम और रुतबा बडा हो गया था। स्थिति यह तक बन गई कि किसी को उनकी बात काटने तक का साहस नहीं होता था। जब दो लोग या समूह किसी मुद्दे पर आपस में उलझ जाते तो उनके बीच वे समझौता करा देते। नतीजा लोग पुलिस तक नहीं जाते। इन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में, खास कर हाशिये की आबादी को शिक्षित करने के लिए कई प्रयास किया था।
नोट:-मेरी पुस्तक-'श्रमण संस्कृति का वाहक-दाउदनगर' -में यह आलेख -'सोन के पानी में तरबूज-खरबूज का रंग'- शीर्षक से प्रकाशित है। उसी की यहाँ अविकल प्रस्तुति है।
यह आलेख और तस्वीर कॉपी राईट के तहत है । बिना अनुमति लिए इसका पूर्ण या आंशिक प्रकाशन नियम विरुद्ध है । सामग्री इसी लेखक (उपेंद्र कश्यप) द्वारा लिखित पुस्तक- “श्रमण संस्कृति का वाहक-दाउदनगर” में प्रकाशित है । यह निजी शोध कार्य है ।

Thursday, 31 May 2018

मैं नगरपालिका दाउदनगर हूं !


दाउदनगर नगर परिषद के प्रथम बोर्ड के गठन की समय सीमा निकट आ रही है। 1885 नें नगरपालिका बना यह शहर किस-किस दौर से गुजरा है, उसकी अब तक की यात्रा कैसी रही? क्या-क्या उतार-चढ़ाव देखा है इस शहर ने... जानिये यहां मेरे संग....  


संघर्ष ही आजादी का रास्ता

०० उपेन्द्र कश्यप ००
मैं सन 1885 का नगरपालिका हूं। मेरे सीने में कई राज दफन हैं। संघर्ष की कहानी प्रेरणा देती है और रास्ता भी बताती है। मेरे बनने की गाथा अलग है। पीढियों का आश्रयस्थल हूं, कइयों की आजीविका का शरणस्थली। कइयों के अपराध भी दर्ज हैं मेरी स्मरण पत्रिका में। अफसोस है कि आज उनके पास पश्चाताप का कोई अवसर भी नहीं रहा। मैं क्यों बना? क्या जरुरत थी मेरी? किसने प्रयास किया? कौन था वह काल पुरुष जिसने आने वीली पीढी के लिए एक नक्शा दिया, रास्ता दिया, तरक्की का मार्ग प्रसस्त किया? वे कौन थे? अब मैं नहीं जानता। यह काम तो पीढियों का था कि वे मेरे जन्म के बाद मेरी उपस्थिति की कहानी को लिपिबद्ध करते। संजोकर रखते उनका इतिहास जो थे काल पुरुष। जिनकी कोशिशों के बाद मेरा जन्म हुआ था। उनके वंशजों ने उन्हें जिंदा (रुहानी तौर पर) नहीं रखा। ऐसा करने की एकाधिक बार कोशिश भी की गई तो आधी अधूरी। एक कार्यकर्ता था- देवभूषण लाल दास। जो 01.01.1934 को जन्म तो लिया चेचरी कानून गो- राजनगर-मधुबनी जिला में, मगर जब 20 जुलाई 1954 में वह दाउदनगर आया तो 31 दिसंबर 1991 तक मेरी सेवा कर निवृत हुआ और यहीं बस गया। उसने बडी कोशिश कर उन पुराण पुरुषों की जानकारी इकट्ठा की। कई सारी जानकारी जुटाया, मगर बाद में उसे भी भुला दिया गया। यह पाप नहीं तो क्या है मेरे वंशजों? मेरी पैदाईश की कहानी क्यों बिसरा दी गई? वह भी उन्हीं के हाथों जिन्होंने मेरी ही कमाई 2खाया है। मेरी बदौलत ही नाम कमाया है। जो समाज अपने पुरखों को भुला देता है उसका भला कैसे हो सकता है? वह अतीत से सबक कैसे ले सकता है जिसने अपना अतीत ही जला कर राख कर दिया हो या फिर गायब कर दिया हो? यह गलती जान बुझ कर की गई हो या फिर अंजाने में हुई हो। यह क्षमा लायक गलती तो नहीं ही है। कहते हैं- न हन्यते, हन्य माने शरीरे- अर्थात आत्मा नहीं मरती, शरीर मरता है। जैसे पुराने वस्त्र को त्याग कर व्यक्ति नवीन वस्त्र धारण करता है उसी प्रकार आत्म जीर्ण-शीर्ण शरीर को त्याग कर नवीन शरीर धारण करता है। मैं (आत्मा) अपने शरीर की सुध बुध लेने आता हूं। बडी पीडा होती है। मेरी प्रतिष्ठा थी। मैं आजादी के संघर्ष का भी महत्वपूर्ण हिस्सा रहा हूं। चतुर्थ गया जिला सम्मेलन कांग्रेस ने यहां 1934 में कराया था। आजादी का संघर्ष होता था। हमारी ही सीमा किनारे चौरम आश्रम में आजादी के दीवाने गढे जाते थे। यह सब ऐसे ही नहीं मिला हुआ अवसर था। यह नगरपालिका बनने के कारण हुआ था। लेकिन, छोडो, मन भर जाता है। मेरी हालत तो है कि पुरखों ने गलतियां कीं और सजा पीढियां भुगत रही हैं। मेरी छाती पर कैसे कैसे ‘चेयरमैन साहब, हुए। कुछ के नाम के बाद साहब लगाना भी नागवार लगता है। वे माननीय तो थे मगर उनके कृत्य सम्माननीय नहीं थे। एक चेयरमैन साहब तो ऐसे हुए जो अपनी अय्याशी के लिए कार्यालय में ही ताला जड देते थे। कारिन्दे थे कार्यालय के और सेवा करते थे अय्याशी में डूबे चेयरमैन साहब की। नाम बताने का भी जी नहीं करता। ऐसे लोगों के नाम लेने से उनका अपमान नहीं होगा, क्योंकि उनका मान ही कहां था। अपमान उनके वंशजों का होगा, जो आज बेचारे किसी तरह अपनी जीविकोपार्जन करते हैं। अपमान शहर का होगा। जाति विशेष से जोड कर अपमान करने की कोशिश होगी। सो माफ करना मैं ऐसे चेयरमैनों का नाम नहीं लेता। मुझे बेच देने वालों की कमी कभी नहीं रही। फर्क बस मात्रा का है, कौन कितना बेचा? किस तरह बेचा? जब रामप्रसाद बाबू चेयरमैन थे सरस्वती पूजा की धार्मिक अनुभूति वाली रात को काली रात में बदल दिया गया था। रात्रि में नाईट गार्ड हरिद्वार तिवारी को एक व्यक्ति ने आ कर ट्रैक्टर का रियर ह्विल (बडा वाला चक्का) निकाल कर देने को कहा। वे ऐसा करने को तैयार नहीं हुए। वह आदमी चला गया। देर रात जब तिवारी जी सो गए तो लोग खुद से टायर खोलकर ले गए। सब जान गये कि कौन खोला है। वास्तविक दोषी के भाई का कद शहर में बडा जो था। सब जानते हुए भी तिवारी जी का वेतन रोक दिया गया। उनको सस्पेंड कर दिया गया। आखिर किसी न किसी को तो जिम्मेदारी देनी ही थी। तब उनकी बेटी अरुणा कुमारी की शादी तय हो गई थी। बेटी की शादी के वक्त एक सरकारी कर्मी का वेतन उस अपराध में रोक दिया जाए जो उसने किया ही नहीं। यह न्याय के साथ कितना बडा अन्याय है सोचिए। उन्होंने चेयरमैन से फरियाद की। तब चेयरमैन ही सर्वेसर्वा होते थे। कार्यपालक नहीं हुआ करता था। उन्होंने जांचोपरांत निर्दोष बताते हुए वेतन भुगतान पर रोक हटाया और आरोप मुक्त किया। मगर टायर की क्षतिपूर्ति के लिए काटी गई वेतन की राशि कभी वापस नहीं हो सकी। प्रतिष्ठा पर आंच आयी और परेशानी हुई सो अलग। तिवारी जी की सारी पहलवानी खत्म हो गई अपने ही घर में। पहलवान इसलिए कह रहा हूं कि उनको और रामकेश्वर यादव को पहलवानी के कारण ही नाईट गार्ड के रुप में रखा गया था। तब दोनों के जिम्मे था बैलगाडी, भैंसा गाडी, साइकिल से कर वसूली करना। खैर यह छोडो। इतिहास उनको माफ करे, मेरी तो बस पूर्वज होने के नाते यही तमन्ना है।
बदलते वक्त ने करवट लिया और कस्बे का मिजाज भी बदलने लगा। मैं जानता हूं कि यहां के नवाब दाउद खान के वंशज थे डोमन खान। वे अत्याचारी थे। मनसोख थे। बनिया प्रवृति के कस्बे में व्यापारी सुरक्षित नहीं रह गए थे। असुरक्षा के बोध ने उन्हें परेशान कर रखा था। इस बात की चर्चा कस्बे में होने लगी। प्राय: पीडा पहुंचाने वाली घटना से समाज विचलित हो रहा था। वैचारिक अकुलाहट भी साथ साथ होने लगी। जब राजा (नबाब) ही ऐसा हो तो उसका प्यादा उससे कम कैसे होगा? उनके प्यादे आबादी को तंग करने लगे। रोजमर्रे की जिन्दगी परेशान होने लगी। व्यापार हो या दैनिक दिनचर्या। सब पर उनका दखल बढने लगा। जीना मुश्किल हो गया। जिस कस्बा को दाउद खान ने इस तरह बसाया था कि यहां जातीय या धार्मिक संघर्ष न हो, टकराव न हो, उसी कस्बे में यह स्थिति थी। दाउद खान ने तो मुहल्लों मे इस तरह जातीय बसावट किया कि कोई लडाकु जाति ही नहीं रही। अपनी पुलिस छावनी बनाते वक्त अंछा के निवासियों के हमले रोकने के लिए उन्होंने लडाकु जाति मानी गई जाट को अवश्य बसाया था। इन दोनों जातियों के बीच संघर्ष हुआ। कहावत है कि सवा किलो जनेउ सोन में फेंका गया था, इतने लोग इस युद्ध में खेत खाए। जनेउ धारण कौन करता है? दिन में जितना निर्माण होता था उसे रात्रि में ध्वस्त कर दिया जाता था। उन्हें डर था कि पुलिस छावनी बन जाने से उनके काम में बाधा आयेगी, या संभव है लूट पाट को अंजाम देना ही बंद हो जाए। तारीख-ए-दाउदिया कहता है- ‘अंछा पार जब गए भदोही, तब जानो घर आये बटोही’। इस परिस्थिति से निपटने के लिए ही यहां छावनी बनाई गई थी। इसे यहां ‘दाउद खां का किला’ कहते हैं। छावनी और अंछा के रास्ते में जाट बसाये गए थे, जो आज भी जाट टोली के नाम से जाना जाता है। इसके अलावा यहां की शांति और सुरक्षा कायम रखने के लिए ही अन्य किसी भी मजबूत, दबंग या लडाकु प्रवृति की जातियों को यहां नहीं बसाया था। साल 1930 से पूर्व ही जाट आबादी यहां से चली गई थी। तब दाउद खान ने सोचा भी नहीं था कि उनकी दूरदर्शिता और विचार को उन्हीं का वंशज डोमन खान तंग-ओ-तबाह कर देगा। यहां दाउद खां का दोहरा चरित्र नजर आता है। आप जानते हैं कि पलामु किला पर फतह के वक्त उन्होंने चेरो राजा को इस्लाम ग्रहण करने पर सारा राज छोड देने का प्रस्ताव किया था। इसी तरह दाउद खां ने दाऊदनगर को बसाने के बाद एक राजपूत को इस्लाम स्वीकार करा कर राजा तरार बना दिया था। जैसा कि तारीख-ए-दाउदिया बताता है। ‘हालात-ए-मुख्तसर राजा तरार’ अध्याय में कहा गया है कि दाउद खां ने एक राजपूत बाबू भूरकुण्डा को मुसलमान बनाकर उसे अबूतालिब नाम दिया और परगनात अंछा, गोह एवं मनौरा में से एक रवा (चौथाई) देकर उसे राजा तरार बनाया। आज तरार में खण्डहर भी नहीं बचा। लगभग तीस फीट ऊँचा टीला ‘राजा तरार’ के अतीत को खुद में छुपा लिया है। राजा तरार की काफी जमीनें अतिक्रमण कर ली गयी हैं। इस विरोधाभास के बावजूद भी उन्होंने दाउदनगर को इस तरह बसाया कि यहां शांति और सौहार्द बना रहे। हो सकता है कि समय के साथ यहां धार्मिक स्वतंत्रता भी प्रभावित होने लगी हो। इससे समाज में बेचैनी बढने लगी हो और तब करवट बदलने की तमन्ना जागृत होने लगा हो। यह कौन जानता है? तत्कालीन समाज नकारात्मकता के बीच से सकारात्मकता को खोजने को इन कारणों से प्रेरित हुआ हो? रोते रहना,  शोषण सहते रहना, शोषकों को बढावा देना है। शांत चित बनिया स्वभाव के कस्बे ने बहुत सहा होगा। उसकी सहन शक्ति की पराकाष्ठा अभी भी यदा कदा दिखती है। जब पीडा असहनीय हो गई तो चार बहादूर आगे आये। चावल बाजार के कसौन्धन बनिया जाति के पुरुषोत्तम दास, बजाजा रोड के कसौन्धन बनिया रामचरण साव, केशरी जाति के हुसैनी साव एवं अग्रवाल जाति के बाबु जवाहिर मल के नाम तो याद हैं। रामचरण साव के पूर्वज रोहतास जिला के नासरीगंज थाना के अमियावर गांव से आए थे। बजाजा रोड में उनकी किराने की दुकन थी। तूती बोलती थी। ग्रामीण इलाके में दूर दूर तक लोग नाम जानते थे। चलती इतनी थी कि 52 जोडी दरवाजे के मकान के बावजूद परिवार को सोने की जगह नसीब नहीं थी। इतना किराना सामान भरा हुआ रहता था। शहर के लिए अल्पसंख्यक थे मगर दबदबा था। रामचरण साव के पिता ने अमियावर की अपनी सारी संपत्ति ब्राह्मणों को दान कर दिया था। आज भी इस शहर में उनकी जाति कसौन्धन बनिया के मात्र 15 घर ही हैं। इनकी चौथी पीढि शहर में रहती है। रामजी प्रसाद तीन भाई हैं। इनके पिता जवाहिर साव तीन भाई, उनके पिता मोती साव तीन भाई और उनके पिता माधो साव अकेले भाई थे जिनके पिता थे राम चरण साव। इनके पहले का वंश वृक्ष ज्ञात नहीं है। बजाजा रोड में मकान है और गुड बाजार में दुकान। पुरुषोत्तम दास संपन्न व्यक्ति थे। उनके पास खेतिहर जमीनें काफी थीं। आवासीय जमीन भी प्रयाप्त थी। मुख्य पथ में वर्तमान में जहां भारतीय स्टेट बैंक की शाखा है, उसी के सामने उनका मकान हुआ करता था। साधु प्रवृति के थे सो लंगोट पहनते थे। दाढी रखते थे। सादा जीवन उच्च विचार की जीवन शैली थी। जमीन की खरीद बिक्री भी किया करते थे। उनका कोई वंशज अब शहर में नहीं रहता। केशरी जाति के हुसैनी साव का बजाजा रोड में किराना दुकान था। इनके पिता का नाम तुलसी साव था। इसी दुकान में वे जडी बुटी भी बेचा करते थे। माथे पर मुरेठा बांधना कभी नहीं भुलते थे। एकदम सादा ड्रेस धोती-कुर्ता पहनते थे।  काडा ईस्टेट के खजांची थे। हुंडी का काम करते थे। यानी रुपए पैसे रखना-देना। उन्हीं के नाम पर वार्ड संख्या पांच में हुसैनी बाजार है। इनके वंशज के व्यवसाय आज भी शहर में है। श्री बाबू की जडी बुटी दुकान में ही वे अपना व्यवसाय करते थे। उनके तीन पुत्र थे केदार प्रसाद केशरी, द्वारिका प्रसाद केशरी एवं कन्हाई प्रसाद केशरी। केदार बाबु के पुत्र देवेन्द्र प्रसाद केशरी आज भी उसी हुसैनी साव की दुकान में अपनी जडी बुटी का कारोबार करते हैं। हुसैनी साव की चौथी पीढि भी जडी बुटी के करोबार में यहां सक्रिय है। उन्होंने ही बाजार लगाना शुरु किया था और मुहल्ला भी बसाया था। जिसे कालांतर में हुसैनी बाजार और हुसैनी मुहल्ला का नाम मिला। यह दाउद खां के किला से पश्चिम-दक्षिण स्थित है। बाबु जवाहिर मल जाति के अग्रवाल थे। शहर के कई मुख्य हिस्से में जमीन के टुकडों पर इनकी मिलकियत थी। बजाजा रोड, सुतहट्टी गली, मुख्य सडक पर एसबीआई के पास जमीन जायदाद थे। इनके दो पुत्र थे- जगरनाथ बाबु उर्फ नाथो बाबु एवं बैजनाथ प्रसाद उर्फ बीजु बाबु। ‘बीजु बाबु की पट्टी’ शहर में मशहूर थी। जब किसी को जख्म होता था तो उन्हीं की पट्टी साटा करते थे और जख्म ठीक हो जाता था। दोनों नावल्द थे। उनकी सारी संपत्ति के उत्तराधिकारी बने सुरज प्रसाद अग्रवाल। इनके वंशज हैं प्रदीप अग्रवाल।
जब पीढियों ने दस्तावेज तैयार नहीं किया तो बुढाते दिमाग में कितना संरक्षित रह पायेगी स्मृतियां? चारों ने एक आवेदन ब्रिटिश सरकार में भाया कलक्टर गवर्नर  को दिया और दरख्वास्त की कि डोमन खान के अत्याचार से मुक्ति का रास्ता निकाला जाए। इसके बाद अक्टूबर 1884 में प्रारुप का प्रकाशन हुआ। यानी एक खाका तैयार हुआ कि शहर का क्षेत्रफल क्या है, उसकी चौहद्दी क्या है, कितनी आबादी है, सुविधाएं कौन कौन सी है? दावा आपत्ति की मांग हुई। कानूनी प्रक्रिया पूरी की गई। और फिर 10 फरवरी 1885 को मैं (दाउदनगर) कस्बा से नगर बन गया।
(नोट:-दाउदनगर अब नगर परिषद बन गया है। यह आलेख मेरी किताब "श्रमण संस्कृति का वाहक-दाउदनगर" में प्रकाशित है, यहाँ अविकल प्रस्तुति)

यह आलेख और तस्वीर कॉपी राईट के तहत है । बिना अनुमति लिए इसका पूर्ण या आंशिक प्रकाशन नियम विरुद्ध है । सामग्री इसी लेखक (उपेंद्र कश्यप) द्वारा लिखित पुस्तक- “श्रमण संस्कृति का वाहक-दाउदनगर” में प्रकाशित है । यह निजी शोध कार्य है ।


Thursday, 24 May 2018

दाउदनगर नगर परिषद चुनाव: जातियों का विमर्श

नगर परिषद दाउदनगर का नया नक्शा 


(किस जाति से कितने 
और कौन-कौन जीते)
ऐसा समाज बना रहे हम जहां जाति बिना कुछ नहीं
-: उपेंद्र कश्यप :-

दाउदनगर नगर परिषद का चुनाव परिणाम आने के बाद शहर के मिजाज का आकलन कर सकते हैं, यदि आपको जातीय विमर्श में यकीन हो। भर चुनाव जाति और जातिवाद की चर्चा रही है, इससे किसी को इंकार नहीं हो सकता। वास्तव में हम एक ऐसा समाज निर्मित कर चुके हैं जहां बिना जाति के किसी भी सामाजिक-राजनीतिक घटना का विश्लेषण नहीं कर सकते। और अब एक हद तक आर्थिक विश्लेषण भी, जाति विमर्श की दरकार रखने लगा है। यह स्थिति अकेले दाउदनगर की नहीं है। ऐसा समझने की भूल भी न करें। ऐसी स्थिति बिहार, हिन्दी पट्टी या कह सकते हैं अब पूरे भारत की है।
यहाँ दाउदनगर कॉलेज में प्रोफ़ेसर डॉ.ब्रज किशोर प्रसाद गुप्ता और कन्या मिडिल स्कूल की प्रधानाध्यापक उनकी शिक्षिका पत्नी निर्मला गुप्ता रहती थीं। एक बार चुनावी चर्चा में श्री मति गुप्ता ने इस पत्रकार से कहा था कि- ‘यह बनिया मिजाज का शहर है’। इस सन्दर्भ में यदि चुनाव परिणाम पर जातीय विमर्श करें तो अंतिम निष्कर्ष कुछ ऐसा ही निकलता है। इसे आप जातिवार सूची में देख सकते हैं। अधिकाँश जीते पार्षद या तो वैश्य जातीय समूह से हैं या इनके साथ आपसी राजनीतिक-सामाजिक-आर्थिक सहयोग या तालमेल रखने वाले जीते हैं। अपनी हनक दिखाने वाले, पूरे चुनाव में जातीय समीकरण का गणित बनाने वाले राजनीतिज्ञ अब भले ही ‘चुनाव में जातीय फैक्टर’ की उपस्थिति से इंकार करें किन्तु ऐसा वे अब अपना सामाजिक चेहरा बनाने, बचाने की वजह से ही कर रहे हैं। वरना पूरा कटु सत्य यही है कि प्राय: सभी ने चुनाव जीतने के लिए जाति का इस्तेमाल किया। सफल होना तो 27 को ही था, यह पूर्व निर्धारित था। बाकी के 129 की हार तय थी, और वे हारे भी। अब कोइ तुर्रम खां, और राजनीतिक विश्लेषक भले बनाता फिरे, उससे कोइ फर्क पड़ने वाला नहीं है। समाज ने अपनी पसंद-नापसंद साफ़ कर दिया है। अब जो जीते हैं, उनको अपनी पसंद का बोर्ड गठित करना है, जिसके लिए कोई भी विजेता- जनता की नहीं, मतदाता की नहीं, अपनी ही सुनेगा, और उसकी ख़ास वजह सभी जानते हैं। अब उसी दिशा में काम हो रहा है।       

वार्ड वार विजेता वार्ड पार्षद की जाति:-
वार्ड संख्या 01 से जागेश्वरी देवी-पासवान, वार्ड संख्या 02 से सीमन कुमारी-कोइरी, वार्ड संख्या 03 से तारीक अनवर-अंसारी, वार्ड संख्या 04 से शकीला बानो-अंसारी, वार्ड संख्या 05 से बसंत कुमार-माली, वार्ड संख्या 06 से सुहैल राजा उर्फ सुहैल अंसारी-अंसारी, वार्ड संख्या 07 से राजू राम-रविदास, वार्ड संख्या 08 से हसीना खातून-अंसारी, वार्ड संख्या 09 से सुमित्रा साव -तेली, वार्ड संख्या 10 से कांति देवी -मल्लाह, वार्ड संख्या 11 से प्रमोद कुमार सिंह-चंद्रवंशी, वार्ड संख्या 12 से मीनू सिंह-राजपूत, वार्ड संख्या 13 से दीपा कुमारी-रौनियार वैश्य, वार्ड संख्या 14 से सुशीला देवी-गंधर्व, वार्ड संख्या 15 से ममता देवी-कुम्हार, वार्ड संख्या 16 से ललिता देवी-कुम्हार, वार्ड संख्या 17 से लिलावती देवी-तांती, वार्ड संख्या 18 से सोनी देवी-स्वर्णकार, वार्ड संख्या 19 से पुनम देवी-कुम्हार, वार्ड संख्या 20 से रीना देवी उर्फ रीमा देवी-तांती, वार्ड संख्या 21 से दिनेश प्रसाद-तेली, वार्ड संख्या 22 से नंदकिशोर चौधरी-पासी, वार्ड संख्या 23 से सीमा देवी-चंद्रवंशी, वार्ड संख्या 24 से कौशलेन्द्र कुमार-राजपूत, वार्ड संख्या 25 से पुष्पा कुमारी-यादव, वार्ड संख्या 26 से इंदु देवी-रजक व वार्ड संख्या 27 से सतीश कुमार-यादव।

नोट:- तांती व्यावसायिक जाति अब अनुसूचित जाति हुई है। तकनीकी, कानूनी तौर पर कुछ अन्य जातियां अनुसूचित जाति में भले हैं, दाउदनगर के सन्दर्भ में उनका सामाजिक जीवन वैश्य विरादरी समूह की जातियों के सामान ही है।

Monday, 19 March 2018

सुनो! इस दर्द को, जरा दिल-दिमाग संभाल के ०००


                      ●उपेन्द्र कश्यप●
0-मैं आंख में काजल और होठ पर लिपिस्टिक इसलिए लगाती हूँ कि सामने वाला मेरा दर्द न देख सके।
0-कॉलेज से निकलती हूँ तो पीड़ादायक टिप्पणी सुनती हूँ। यह तकलीफ न दे और सामने वाले को लगे कि मैं उनकी भद्दी, कष्टदायक टिप्पणी नहीं सुन पा रही, इसलिए कान में इयरफोन लगाकर कॉलेज से निकलती हूँ।
0-मैं प्यार की भूखी हूँ, प्यार चाहिए, आपकी सहानुभूति नहीं साथ चाहिए।
0-मैं कितनी दर्द में हूँ, यह नहीं जान सकते आप, कभी आवाज उठाया? घर ने ठुकरा दिया, समाज ताने देता है, कानून से भी संघर्ष करना पड़ रहा है।
0-जिस देश में नारी पूजी जाती है, उसी देश की मैं भी हूँ, फिर हमारे साथ ऐसा क्यों होता है? हमें क्यों हर कदम पर अपमानित होना पड़ता है?
0-मैं पटना से औरंगाबाद आने में कितनी पीड़ा झेली, यह आप कल्पना नहीं कर सकते हैं। 

00 ये शब्द सहज नहीं हैं, प्रश्न हैं समाज से, दर्द की अभिव्यक्ति है-वीरा यादव की। 
वीरा यादव किन्नर हैं, पटना विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर की पढ़ाई कर रही हैं। वीरा यादव से मुलाकात औरँगाबाद में धर्मवीर फ़िल्म एंड टेलीविजन प्रोडक्शन द्वारा आयोजित औरँगाबाद फ़िल्म फेस्टिवल में हुई। उन पर केंद्रित एक डॉक्युमेंट्री दिखाई गई। उनसे जजों ने संवाद किया। प्रश्नोत्तरी हुई। नतीजा उनके कुछ शब्द मुझे झंकझोर गए। इन पर बेहतर सामग्री लिखी जा सकती है, जो सिर्फ किन्नरों के लिए नहीं बल्कि पुरुष और स्त्री समाज के लिए भी प्रेरक होगा। एक कोशिश की है। उनके शब्द वाकई कान, मस्तिष्क को झकझोरने वाले रहे। पहली बार किन्नरों का दर्द जाना, वह भी एक अध्ययनरत किन्नर से। साक्षात सुना। और पीड़ा बताने के उनके शब्द चयन ने खासा प्रभावित किया। बोली- ‘यह मेरी अकेले की पीड़ा नहीं है। हम सब एक ही तवा की रोटी हैं। सबकी (किन्नरों की) पीड़ा एक सी है। मैं आवाज उठाई।‘ मैंने जाना कि किन्नर सिर्फ ताली ही नहीं बजाते, वे सिर्फ व्यंग्य वाले छक्के नहीं होते, वे भी बोलते हैं, खूब बोलते हैं, और विराट सचिन सा छक्के भी लगाते हैं। समाज में यह सवाल नारी उत्पीड़न की हर घटना के बाद उठता है, कि जिस देश में 'यत्र नारियस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता' का आध्यात्मिक ज्ञान बांटा जाता है, उसी देश में नारी दूसरी श्रेणी की नागरिक क्यों है? उसे पुरुष सी समानता कब मिलेगी? लेकिन कभी थर्ड जेंडर, किन्नर को लेकर भी ऐसे आवाज पुरजोर तरीके से नहीं उठते, जो कि उठने चाहिए। आखिर, हमसे तो ये हिजड़े बेहतर हैं, जो हमारी मौज मस्ती के लिए ताली पीटते हैं, और आंखों में काजल, होंठों पे लिपिस्टिक इसलिए लगाते हैं कि सामने वाले को इनका असली और दर्द में डूबा चेहरा न दिखे। वीरा ने तो उन मनचलों को भी सम्मान दिया जो इसे कॉलेज से निकलते देख कर फबती कसते हैं-‘अरे हिजड़ा भी पढ़ रहा है। ई पढ़ के क्या करेगा। कॉलेज जाती आती है।‘ ऐसे मनचलों की आवाज इनको दर्द न दे और फबती कसने वाले को यह अहसास न हो कि सामने वाली सुन कर दुखी हो रही है, इसलिए कान में बिना मतलब इयरफोन कोंच लेती है। 

शाबाश, वीरा। शाबाश, तुम किन्नर नहीं, दंभी पुरुष समाज के मुंह पर तमाचा हो।
अंत में, शाबास पिंकी भी। धर्मवीर फ़िल्म एंड टेलीविजन प्रोडक्शन की क्रू मेंबर हसपुरा की इस किशोरवय पिंकी ने गजब की बात किन्नरों को लेकर कहा। मंच संचालक आफताब राणा ने जजों और वीरा के संवाद के बाद बोला कि इससे यदि कुछ अलग है तो पिंकी मंच पर आकर बोलो। पिंकी ने खुद माइक मांगा था, इसलिए संचालक के शब्द चुनौती से कम नहीं थे। वह आई तो ताली बटोर के ले गई। बोली-भगवान शिव ने नारी को सम्मान देने के लिए अर्धनारीश्वर का रूप कुछ देर के लिए धरा था तो हम उनकी पूजा करते हैं। वीरा और इनका समाज तो आजीवन अर्धनारीश्वर ही है, तो इनको अपमान क्यों, क्यों नहीं इनको समान सम्मान मिलना चाहिए? सवाल मौजू है- सन्दर्भ गांडीव धारी अर्जुन का भी है जो वृहन्नला बने थे। वृहन्नला भी तो किन्नर ही था।
अंत में धन्यवाद धर्मवीर भारती, जिनके कॉल और निवेदन ने इस कार्यक्रम का हिस्सा बनने को विवश किया। अन्यथा एक शानदार पल से मेरा साबका नहीं हुआ होता। वीरा, तुमने नजरिया बदल दिया, किन्नरों को देखने का। अगली बार किन्नरों का दर्द मैं भी समेटने की कोशिश करूंगा-शब्दों से।
 ●उपेन्द्र कश्यप●
लेखक-'श्रमण संस्कृति का वाहक-दाउदनगर'
और -सन्दर्भ ग्रंथ- उत्कर्ष के दो अंक।

Sunday, 11 March 2018

गुप्ताधाम की गुफा में चुना-पत्थरों के पिंड को शिव के रूप में पूजते हैं भक्त

फोटो-गुफा में वह पिंड जिसे शिव रूप में पूजा जाता है

ऐसे शिव का रूप- जो न तस्वीरों में दिखता है न प्रतिमाओं में

उरांव-कुडूखों के हटने और खरवारों के आने से बना ‘गुप्ताधाम’

उपेंद्र कश्यप । डेहरी

गुप्ताधाम महोत्सव मनाया जा रहा है। गुप्ताधाम शिवनगरी के रूप में चर्चित है। महाशिवरात्रि पर यहाँ हजारों की भीड़ इकट्ठा होती है और वादियां बम बम भोले, जय शिवशंकर, जय भोले नाथ के उदघोष से गूंज उठती है। वातावरण भक्तिमय हो उठता है। गुप्ताधाम की गुफा में शिवलिंग की नहीं चुना पत्थर के जमे पिंड की पूजा शिव रूप में की जाती है। धार्मिक आस्था अपनी जगह है, किन्तु विज्ञान भी समझा जाना चाहिए। जिस शिव को यहाँ पूजा जाता है, वैसी तस्वीर तो कहीं भी किसी शिवलिंग की नहीं मिलती, न ही ऐसी प्रतिमाएं कहीं मिलती-दिखती हैं। आप तस्वीर में साफ़ इसे देख सकते हैं। वास्तव में यह चुना-पत्थर का जमा हुआ पिंड है। जिसे हम शिव रूप में पूजते चले आ रहे हैं। सदियों से, न जाने कब से? शायद जब खरवार कारुष प्रदेश के इस हिस्से में आये, जमे और उरांव-कुडूखों को हटना पडा, तब से?  प्रदेश के वरिष्ठ कवि और पत्रकार अनिल विभाकर की एक कविता की अंतिम पंक्ति है-'लोग पत्थर नहीं अपनी- अपनी आस्था पूजते हैं।' यही भावना गुप्ताधाम में दिखती है। लोग वास्तव में अपनी आस्था ही पूजते हैं। और बात जब आस्था की आती है तो कोइ तर्क काम नहीं आता।


तीन स्थानों पर हैं इस तरह के बने शिवालय:-

सीमेंट उद्योग के लिए जो चुना पत्थर चाहिए, उसकी उपलब्धता इस कैमूर पर्वता श्रृंखला में खूब है। पहाड़ की गुफाओं में बरसात के जल से गल कर चुना पत्थरों ने कई जगह शिवालय बना दिए हैं। जो कि उच्छैल या पिंड (स्टैलेग्माइट्स) हैं। 'सोन के पानी का रंग' पुस्तक में देवकुमार मिश्र ने बताया है कि ऐसे स्थान मिर्जापुर के पिराड़ी की पहाडी गुफा में ‘गुपुत महादेव का मंदिर’, ओबरा (उत्तर प्रदेश) पहाडी खोह का शिवालय और रोहतास का गुप्तेश्वर धाम शामिल है।


सुरजवंशी खरवार ही प्रसाद के हकदार:- 

रोहतास उपत्यका मुख्यत: खरवारों का भूखंड माना जाता है। इन्हीं का था प्रसिद्ध तीर्थ ”गुप्ता” जो अब गुप्ताधाम कहा जाता है। आज भी इस स्थान के चढ़ावे का हकदार खरवार पुजारी ही होता है। इस क्षेत्र में बसे खरवार खुद को सुरजवंशी कहते हैं। लेकिन यहाँ सोमवंशी (चंद्रवंशी) खरवार भी रहते हैं।


किवंदतियों में गुप्ताधाम:-
गुप्ताधाम से कई किवंदतियां जुड़ी हुई है।
इससे शिव द्वारा अमरत्व का आशीर्वाद देने, आशीर्वाद बाद भस्मासुर बनने और फिर पार्वती की चाह में विष्णु के प्रपंच से खुद ही भस्मासुर के मारे जाने का पौराणिक किस्सा जुडा हुआ है।

जम्मू के शिवखेड़ी में भी यही किवंदति:-
पार्वती-भस्मासुर-विष्णु की जो कहानी गुप्ताधाम से जुड़ी हुई है, वही किस्सा जम्मू स्थित शिवखेड़ी में भी सुनाई-बताई जाती है। वहां भी इसी तरह की संकरी गुफा है।