यहां जिउतिया लोक
संस्कृति को जीवंत बनाए रखने का श्रेय दो जातियों को जाता है। पटवा या तांती और
कांस्यकार या कसेरा। हलवाई जाति के रामबाबू परिवार को भी इसका श्रेय देना होगा। यह
परिवार बाजार चौक की जिम्मेदारी संभालता रहा है। उनके स्वर्गवासी होने के बाद उनके
वंशज और खानदान वालों के साथ दूसरी वैश्य जातियां सक्रिय है। साहित्य में जिन पांच
नामों आश्विन अंधरिया दूज रहे संवत 1917 के साल रे जिउतिया, जिउतिया जे
रोपेलन हरिचरण, तुलसी, दमड़ी जुगुल, रंगलाल रे जिउतिया- को इस संस्कृति की स्थापना का श्रेय
दिया जाता है। वे सभी कांस्यकार जाति के हैं। लेकिन यह समाज भी यह मानता है कि
उनके पूर्वजों ने यह संस्कार पटवा समाज से ही सीखा था। इमली तल उनके कार्यक्रम को
देखने के प्रतिफल स्वरुप इसे ‘रोपा’ गया। बताया जाता है कि जब कांस्यकार जाति के
लोग इमली तल की संस्कृति को देखने जाते थे तो कभी यानी संवत 1917 से पूर्व मारपीट की घटना घटी और प्रतिक्रिया
स्वरुप पांचों ने कसेराटोली चौक पर भी जिउतिया का चौक बना कर कार्यक्रम शुरु किया।
संभव है तभी इसे ‘नकल’ की संज्ञा दी गई हो। दूसरी कथा प्लेग से जुड़ी
है, जिस पर चर्चा बाद में।
बहरहाल आज भी इन दो जातियों की ही भागीदारी सर्वाधिक होती है। पटवा या तांती समाज
मिट्टी कोड़ने की पारंपरिक कार्य से जुड़ा है। तांत से कपड़े बुनना उसकी विशेषता
रही है। जब कि कांस्यकार समाज कांसे, पीतल का बर्तन बनाने के पुश्तैनी धंधे से जुड़ा हुआ है। दोनों ही जातियों को
दाउदनगर को बसाने वाले दाउद खां ने यहां लाकर बसाया था। वैसे तब लगभग हर उस जाति
को दाउद खां ने यहां बुलाकर बसाया था जिसकी जरूरत तत्कालीन समाज को थी।
Saturday, 13 September 2014
हिंदी के लिए अलंकृत थे रघुनंदन राम
हिंदी दिवस पर आज
तमाम तरह के रस्म का आयोजन किया जा रहा है। अपने ही देश में हिंदी की दशा एवं दिशा
पर व्यापक बहस होगी। एक राष्ट्रीय बैंक के लेटर हेड पर लिखा हुआ - हिंदी में हम
आपके पत्रचार का स्वागत करते हैं देख यह समझा जा सकता है कि अपने ही घर में हिंदी
की क्या स्थिति है। बहरहाल, मुद्दे पर बहस
छोड़िए यह सुकून देने वाली जानकारी है कि मदाउदनगर की मिट्टी में पला बढ़ा और अब
स्वर्गवासी बन गए रघुनंदन राम को तत्कालीन रेल मंत्री माधवराज सिंधिया ने दो बार
हिंदी में कार्य करने के लिए सम्मानित किया था। वर्ष 1999 में स्वर्ग सिधार गए लखन मोड़ निवासी श्री राम रेलवे में
टेलीग्राफ बाबू यानि तार बाबू के रूप में गया में कार्यरत थे। तब 1980 में अपना अधिकांश कार्य हिंदी में करने के लिए 23.12.1981
को रेलवे हिंदी समारोह में उन्हें नकद पुरस्कार
से तत्कालीन रेल मंत्री माधवराव सिंधिया ने सम्मानित किया था। इसी तरह 1986
में कार्य करने के लिए उन्हें पुन: 9 फरवरी 1987 को सम्मानित किया गया। वर्ष 1987 में ये चीफ इंसपेक्टर टेलीग्राफ गया के पद से सेवानिवृत्त
हुए थे। इनके पुत्र संजय कुमार उर्फ गांधीजी ने बताया कि अपने सभी दो बेटों ओर 7
बेटियों को कम वेतन मिलने के बावजूद पढ़ाया। आज
सभी 9 संतान सरकारी जाब में
हैं। इमानदारी और निष्ठापूर्वक कार्य करने का प्रतिफल इन्हें सिर्फ पुरस्कार के
रूप में नहीं मिला। व्यवहार कुशलता ने इन्हें अलग पहचान भी दिया। नेताजी के नाम से
लोकप्रिय इनकी पहचान बन गया था- धोती, कुर्ता, बंडी और हाथ में
बकुली। वे नहीं रहे लेकिन अंग्रेजी के अच्छे जानकार होते हुए भी अपना सर्वाधिक
कार्य हिंदी में जिस लगन से किया, वैसी निष्ठा अब
कहां मिलती है। अंग्रेजी जानने वाले बाबू लोग हिंदी वालों को नहीं लगाते, इससे उन्हें पुरस्कार तो नहीं ही मिलता समाज
में प्रतिष्ठा और पहचान भी नहीं मिलती।
Friday, 12 September 2014
पटना के उइया रे सूइया, गया के हइ दरजिया इयार
पटना के उइया रे सूइया, गया के हइ दरजिया इयार
दूर देसे नोकरिया सइयाँ जइहे, लइहें बाजूबंद
बडे सरस हैं जिउतिया के गीत
उपेन्द्र कश्यप,
जिउतिया के गीत बडे सरस
हैं। इसमें स्थानीय इतिहास, भूगोल और विशेषताओं को भी प्रयाप्त जगह मिली है।
साहित्य इस्द लोकोत्सव के बारे में बहुत कुछ बता देता है। झूमर में गाते हैं- -दाऊदनगर के जिउतिया सरनाम हई गे साजनदाऊदनगर के जिउतिया
जीव के साथ हई गे साजन! कहाँ के दिवाली,
कहाँ के दशहरा गे साजन, कहवाँ के जिउतिया कइले नाम हई गे साजन
दाऊदनगर..दिल्ली के
दिवाली, कलकता के दशहरा गे
साजन, दाऊदनगर के जिउतिया कइले नाम हई गे साजन, दाऊदनगर के .....
झूमर में विविधाता होती है, रंगीनी होती है और मधुरता भी-
-दूर
देसे नोकरिया के रे जइहें
के जइहें हाजीपुर, के जइहें पटना, के रे जइहें, दूर देसे नोकरिया के रे
जइहें
बाबा जइहें हाजीपुर,
भइया जइहें पटना, सइयाँ जइहें, दूर
देसे नोकरिया सइयाँ जइहे, के लइहें बाजूबंद,
के लइहें कंगना, के रे लइहें, छतिया
दरपनवा के रे लइहें, बाबा लइहें बाजूबंद,
भइया लइहें कंगना, सइयाँ लइहें, छतिया
दरपनवा सइयाँ लइहें।
यहां का परवर काफी मशहूर है। तब भी था और हाजीपूर तक की
मंडियों में इसे बेचने यहां के लोग जाते थे। तब पटना नहर में स्टीमर की यात्रा
होती थी। देखिये-- ए राजा जी परवर बेचे जायम हाजीपुर
परवर बेच के पायल गढ़ायम, पायल हम पहिरम जरूर, ए राजाजी परवर
बेचे जायम हाजीपुर
एक रंगीन मिजाज का झूमर देखिये। तब भी समाज किस तरह खूला
हुआ था जब प्रेम की बातें भी खूब होती थी।
-नैना बिदुल हे कहवाँ से आवेला इयार, कहवाँ से आवेला बारि बियहुआ, बारि बियहुआ
नैना बिदुल हे कहवाँ से आवेला इयार, पूरबा से आवेला बारि
बियहुआ, बारि बियहुआ, नैना
बिदुल हे पछिमा से आवेला इयार, श्यामसून्दर बनिया के जा (बेटी), हई रे मनीजरवा,
एहि परि गंगा, ओहि पारे
जमुना, के मोरा घइला अलगा, हई रे मनीजरवा,
घोड़वा चढ़ल आवे राजाजी के बेटवा, ओहि मोरा घइला अलगा, हई रे मनीजरवा,क हवाँ के उइया रे सूइया, कहवाँ के दरजिया
इयार, पटना के उइया रे सूइया
गया के हइ दरजिया इयार। अइसन चोलिया सीलिहें दरजिया, दूनो
मोरवा करे गोहार, पटना के उइया रे सूइया, गया के हइ दरजिया इयार।
चढने लगा है शहर पर जिउतिया का रंग
जिउतिया लोक उत्सव का
रंग गाढा होने लगा है। शहर में बने जीमूतवाहन भगवान के चार चौकों पर स्थानीय लोक
गायक ढोलक की थाप पर झुमर और लावनी गा गा कर आनंदित हो रहे हैं। हालांकि यह चिंता
की बात है कि टोलियों की संख्या कम होती जा रही है। इसकी वजह भी है। सामाजिक
आर्थिक परिवेश में परिवर्तन ने इसकी धारा को कुंद किया है। समाज का तथाकथित भद्रजन
या कहें इलिट तबका इसका व्यवसायिक दोहन तो करता है, खूब माल भी कमाता है मगर इसके
संवर्धन या संरक्षण के लिए कुछ नहीं करता। यह राष्ट्रीय चरित्र बन गया है। इसका
असर इस संस्कृति पर भी पडता है। स्वाभाविक है जब इस अर्थयुग में दो जून की रोटी का
जुगाड ही प्राथमिकता हो तो टोलियां सिमटेगी ही। भारतीय समाज जन्मना उत्सव में
विश्वास रखने वाला है सो कमोबेश लोक संस्कृति की जीवंतता बनी रहती है। भले ही
दायरा और आयाम सिकुडता जा रहा हो। झूमर के
बोल, ढोलक की थाप पर चकडदम्मा गाती टोलियां बडा रोचक और सरस लगती है। अगर लोक गायन
में थोडी भी रुचि है तो शायद ही आप इसे छोड कर हटें। चंद लोग हैं जिनकी बदौलत
जिउतिया के लोक साहित्य को जीवन मिला हुआ है। पुराना शहर में रामजी सोनी, इमली तल
में साहेब दयाल चौधरी, बेसलाल प्रसाद तांती, रामचन्द्र प्रसाद तांती, धनेशवर
प्रसाद कसेरा टोली में भोला पेंटर जैसे लोग इस साहित्य को जिंदा रखे हुए हैं।
जातीय पहचान से जुडी है चौकें
शहर में जिउतिया के सभी
चार चौकें जातीय पहचान से जुडी हुई हैं। सबसे पुराना इमली तल पटवा टोली में है।
इससे तांती समाज की पहचान जुडी हुई है। इसई तरह कसेरा टोली चौक से कसेरा जाति की।
यहां आयोजक भी यही जातियां हैउं और संरक्षक भी। इसी तरह पुरानी शहर चौक जो पुराना
सोनारपट्टी है से इस जाति के लोग जुडे हैं। बाजार चौक व्यवसायिक गतिविधियों का
अड्डा है सो इससे वैश्य समाज जुडा हुआ है। पुराना शहर और बाजार चौक से दूसरी
जातियों की भी सहभागिता है। दोनों जगह आयोजन में मिश्रित जातियां शामिल हैं।
Wednesday, 27 August 2014
ज्ञान को चुनौती देते हैं ओझा!
शिक्षिका का
उतारा गया विष
दूर से यहां आते
हैं ग्रामीण
झाड़ फूंक के बाद
अंग्रेजी दवा की मनाही
दाउदनगर (औरंगाबाद) यह तस्वीर विज्ञान के इस युग में अंधविश्वास का
एक रूप दिखाता है। पहली तस्वीर और चौंकाती है, क्योंकि जिस स्त्री की पीठ पर ओझा थाली सटाए हुए है वह
मालती सिन्हा हैं। मालती राजकीय कृत हरवंश हाई स्कूल गोरडीहां की प्रभारी
प्रधानाध्यापिका हैं। पढ़ी लिखी नौकरी पेशा संभ्रांत परिवार। सहसा यह जान कर भरोसे
को झटका लगा। मगर सच आंखों के सामने था। उनके पति अनिल सिंह भी साथ हैं और बताते
हैं कि दो घंटे में सर्प का विष बुधन बिगहा गांव निवासी चंद्रदेव सिंह ने झाड़ से
उतार दिया। मालती बताती हैं कि स्कूल परिसर में जहरीले करैत ने काटा था। पूरा बदन
अकड़ रहा था। अब राहत है। तभी दूसरे शहर में पढ़ रहे पुत्र ने मोबाइल पर चिंता
जाहिर करते हुए चिकित्सक से दिखाने का सलाह दिया। श्री सिंह ने कहा ‘नहीं, ऐसा मत करिएगा। शरीर से विष पूरी तरह निकाला जा चुका है। अगर डाक्टर विष मारने
के लिए दवा दिया तो परिणाम बुरा हो सकता है।‘ पति बोले- ‘बेटे को बोल
देंगे कि डाक्टर से दिखा लिया है।‘ यह है आधुनिक
भारत, अंध विश्वास से लड़ते
हिंदुस्तान की तस्वीर। युवा पीढ़ि के बदलाव की इच्छा भी परंपरावादी मानसिकता के
आगे दम तोड़ देती है। दूसरी तस्वीर में दिख रहे हैं-उब के रामपुर से आई उषा देवी।
इन्हें बिछउत ने पंद्रह दिन पूर्व काट लिया था। शरीर में पूरा बेचैनी थी। गर्मी से
आग की तरह बदन जल रहा था। लगातार पंद्रह दिन उनके बदन से विष उतारा गया। बताया कि
अगर विष नहीं उतरता तो पूरे शरीर में फोड़ा निकल जाता। नीमा के रामदेव सिंह को
बहिरा सांप ने काटा था। ओझा चंद्रदेव सिंह ने बताया कि बहिरा सांप काटने पर पंद्रह
दिन रोजाना दो दो घंटे विष उतारना पड़ता है। गेहूंमन और करैत के काटने पर दो घंटा
में पीड़ित के शरीर से सारा विष उतर जाता है। अब इसे क्या कहा जाए चमत्कार,
अंधविश्वास या फिर विज्ञान से होड़ लेता जादू
टोना।शिक्षक एवं ग्रामीणों का विष उतारते ओझाजागरण
जीवन ही जिनका फुटबाल का खेल रहा
राष्ट्रीय खेल दिवस
(29 अगस्त) पर विशेष
फोटो-रामाशीष बाबू, नन्दकिशोर सिंह एवं दयानन्द शर्मा
यहां फुटबाल टुर्नामेंट का कराया कई आयोजन
महिला फुटबाल टुर्नामेंट भी हुआ
उपेन्द्र कश्यप, दाउदनगर (औरंगाबाद) रामाशीष बाबू। जी हां,
कोई रामाशीष सिंह नहीं बोलता इन्हें। इनका पूरा जीवन ही फुटबाल को समर्पित रहा।
शहर में लोगों को ‘जबरन’ इसके लिए प्रेरित करना और उसे आयोजक बना देना इनकी फितरत
रही है। व्यक्तित्व ऐसा कि गुस्से में जुबान फिसली भी तो लोगों ने बुरा नहीं माना।
फुटबाल का आयोजन और इनका नाम दोनों यहां एक दूसरे के प्रयाय माने गये। कुल्हा टूट
गया तो चार साल से बिस्तर पर क्या पडे कि आयोजन ही बंद पडा गया। कब
प्रफ्फुलचन्द्रा ने आयोजन किया तो उनको सम्मान मिला। चार पहिया वाहन से ही फिल्ड
का भ्रमण किया था। मूलत: बडका बिगहा निवासी श्री सिंह अपने मामा के घर बिहटा
(देवहरा) रहते थे। करीब चार दशक पूर्व दाउदनगर आये तो फिर उनके प्रयास से कई
फुटबाल टुर्नामेंट हुआ। फिलहाल करीब सौ साल की उम्र में वे यहां अंछा निवासी अपनी
बेटी मालती देवी और दामाद कृष्णा सिंह के घर मृत्यू की प्रतिक्षा कर रहे हैं।
उन्होंने सीखाया कि खेल क्या है, कैसे बडा आयोजन होता है। ज्ञान गंगा के निदेशक
नन्दकिशोर सिंह उनसे 1990 में जुडे। बताया कि श्री कृष्ण शील्ड और श्री राम कला
शील्ड चलाते थे। जिद्दी प्रवृति के हैं, जो ठान लिया सो कर दिखाने का जज्बा उनसे
सीखा जा सकता है। उत्साही और इमानदार हैं। चन्दा का एक रुपया भी अपने उपर खर्च
नहीं किया कभी। उनका जमा किया हुआ करीब 8000 रुपया जमा है। बताया कि उनके नाम पर
एक टीम बनाने की योजना है। उसी में यह बचा पैसा खर्च होगा। बिहार एथलेटिक्स
एशोसियेशन के उपाध्यक्ष और एथलेटिक्स के राष्ट्रीय कोच रहे दयानन्द शर्मा ने
उन्हें नि:श्चल प्रवृति का खेल को समर्पित व्यक्ति बताया। कहा कि इन्होंने समाज को
सन्देश दिया कि जाति धर्म से उपर उठकर कार्य करोगे तभी खेल का और समाज का विकास
संभव है। बताया कि खेल मैदान पर आयोजक संस्था का छोटा कार्यकर्ता जो काम नहीं कर
सकता है वह काम भी बडी श्रद्धा से किया करते थे। उन्हें खेल से जुडे किसी काम को
करने में हीनता का बोध नहीं होता था। किसी से कोई गिला शिकवा उनको नहीं रहा।
Friday, 22 August 2014
अद्भुत अनुभूति देता है पीपल का प्राचीन वृक्ष
हजारों साल प्राचीन है यह वृक्ष
तमाम शाखायें धरती को छूने आती हैं नीचे
पुन: उपर की ओर लौट जाती हैं शाखायें
उपेन्द्र कश्यप
जैसा आप तस्वीर में देख
रहे हैं, वास्तव में देखेंगे तो बडा सुखद आश्चर्य और अद्भुत अनुभूति करेंगे। यह
स्थान है औरंगाबाद जिला के दाउदनगर अनुमंडल के गोह प्रखंड का गोरकट्टी गांव। इस वृक्ष के बारे में कोई सटिक जानकारी
नहीं है। पंडित लालमोहन शास्त्री का कहना है कि यहां च्यवन ऋषि ने भगवान शंकर की
प्रतिमा स्थापित किया था। इसके बाद का ही यह वृक्ष होगा। यानी हजारों साल प्राचीन।
इस वृक्ष की विशेषता है कि इसका फैलाव व्यापक है। हर शाखा उपर आकाश की ओर जाती तो
है लेकिन थोडी दूरी तय करने के बाद वापस धरती की ओर लौट आती है। पृथवी को चूमकर
पुन: आकाश की ओर मुड जाती हैं। यहां कोई यह बताने वाला नहीं है कि यह वृक्ष कब से
है। हर बुजूर्ग अपने पूर्वजों से भी पुराना इसे बताते हैं। दादर के वेंकटेश शर्मा
का कुछ विद्वानों के हवाले से मानना है कि ताडुका के भाई सुबाहु यहां पुनपुन के
किनारे पूजा करने आता था। यहीं वह शक्तिमान बना और दक्षिण भारत की ओर चला गया जहां
राम के तीर से उसकी मृत्यू हुई। हालांकि श्री शास्त्री इससे सहमत नहीं हैं। इस
वृक्ष की आयु का सही सही आकलन नहीं किया जा सकता। इसकी उम्र जानने के लिए विशेषज्ञ
की जरुरत पडेगी। इसी स्थान पर पुनपुन दक्षिण दिशा की ओर मुडती है। यहां आना थोडा
मुश्किल है क्योंकि रास्ता नहीं है। करीब तीन किलोमीटर की पैदल यात्रा करनी पडेगी।
बरसात में स्थिति इतनी बदतर कि इस संवाददाता के साथ यहां पहुंचे आदित्य राज जैकी
ने कई बार कहा कि ऐसे स्थान पर मत ले चलिए। लेकिन जब वृक्ष के पास पहुंचा तो सारा
थकान मिट गया। इस सुखद अहसास ने सुकून पहुंचाया। प्रमोद पासवान की तो हालत खराब हो
गई। यह परेशानी इसलिए हुई कि यहां पहुंचने का रास्ता नहीं है। खेत के मेड ही
एकमात्र विकल्प हैं। दूसरा बारिश ने इस यात्रा को कठिन बना दिया। भाजयुमो नेता
दीपक उपाध्याय एवं धीरज सिंह चौहान ने कार्बन डेटिंग कर वृक्ष की प्राचीनता पता
करने की मांग की है। सबने कहा कि प्राचीनता के साथ साथ यह कारण भी ज्ञात करने की
जरुरत है कि शाखायें उपर से नीचे की ओर क्यों आती हैं। श्री शास्त्री का मत है कि
यह प्रक्रिति की झलक है। यह प्राकृतिक और अध्यात्मिक कारण है।
Wednesday, 13 August 2014
समूह के जिम्मे सांस्कृतिक मूल्यों की रक्षा
दाउदनगर में
जीवित है ‘जिउतिया संस्कृति’
154 साल से निरंतर
प्रवाह बरकरार
उपेंद्र कश्यप
दुख के निराकरण की गर्ज से
जन्मी जिउतिया संस्कृति का न कोई वाहक है न कोई संरक्षक। आम आदमी के सहयोग,
समर्पण और सहभागिता से यह संस्कृति संवत 1917
से आम जन के रग रग में प्रवाहित हो रही है। इस
लोक संस्कृति में फोकलोट (लोकयान) में सभी चार तत्व प्रचूरता से विद्यमान है। अपनी
लोक कला, लोक साहित्य, लोक व्यवहार है। वास्तव में झारखंड के अलग होने
के बाद छउ नृत्य हमारा प्रतिनिधि संस्कृति नहीं रहा। सरकार छठ को प्रतिनिधि
संस्कृति मानती है जबकि वह पूरे प्रदेश में होता है और किसी भी खास क्षेत्र या
समुदाय तक सीमित नहीं है। जिउतिया का पर्व उत्तर भारत में प्राय: हर जगह मनाया
जाता है मगर यह सिर्फ दाउदनगर में ही लोक संस्कृति बन सकी है। इसका प्रभाव
समीपवर्ती तरार और ओबरा में भले दिखता है, मगर है यह दाउदनगर की विशिष्ट पहचान। ब्राजील के कार्निवाल से इसकी तुलना होती
है। आकर्षण और सम्मोहन की पराकाष्ठा आप देख सकते हैं जब यह नौ दिवसीय समारोह अपने
अंतिम दो दिन चरमोत्कर्ष पर होता है। पूरा शहर भेष बदलो समारोह में तब्दील दिखता
है। अपुराणिक चरित्रों, राजनेताओं,
संविधान, समेत तमाम क्षेत्रों पर टिप्प्णी करते लोक कलाकार मिलेंगे।
पटवा टोली और कसेरा टोली चौक मुख्य केन्द्र होते हैं। शहर में जिमूतवाहन भगवान के
चार चौक बने हैं। मुख्यत: पटवा जिसे तांती भी कहा जाता है अर कसेरा जाति के लोगों
के समर्पण भाव और परिश्रम की बदौलत यह संस्कृति जीवंत बनी हुई है अन्यथा कब का विलुप्त
हो जाती। इसके गीत बड़े सरस होते हैं। व्यंग्य मजेदार और चुटिले। शहर की बड़ी
आबादी इसमें शामिल होती है और आश्चर्य कि हर बच्चा जो पहली बार अपनी सांस्कृतिक
प्रस्तुति दे रहा होता है वह भी आपको प्रभावित करता है। इससे लगता है कि इस शहर की
मिट्टी में कला का जादू बसता है।दाउदनगर की जिउतिया संस्कृतिजागरण
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