Monday, 10 October 2022

सजा भुगत रही अंगरेजी हुकूमत के विद्रोहियों की पीढियां

 

          


(घुमंतू जनजातियां - समाज का उपेक्षित वर्ग राजस्थानी ग्रंथागार से प्रकाशित पुस्तक में प्रकाशित मेरा आलेख)



  ० उपेंद्र कश्यप ० 



विश्व की यह पहली ऐसी घटना थी जब अंग्रेजों ने भारत के करीब 200 जन जातियों को जन्मना अपराधी घोषित कर दिया था। क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट 1871 के तहत जन्मजात अपराधी घोषित इन जातियों को आजाद भारत में 31 अगस्त 1952 को इस काले कानून से भारत सरकार ने मुक्त कर दिया तो इन्हें विमुक्त जनजातियां कही जाने लगी। इन जातियों के साथ जो दुर्भाग्य अंग्रेजी हुकूमत के समय जुड़ा था, उसे भारत सरकार ने जारी रखा और यह अब भी इनका पीछा नहीं छोड़ रहा। इन घुमन्तु-विमुक्त जन जातियों को जन्मजात अपराधी के कलंक से मुक्त करते हुए भारत सरकार ने नये काले कलंकित एक दुसरे क़ानून के खूंटे से इनको बांध दिया। अंग्रेजों के काले कानून से यह कम काला और कलंकित करने वाला कानून नहीं है। इसे आजाद भारत सरकार ने नाम दिया था- हैबिचुअल ओफेंडर्स एक्ट। यानी ‘जन्मजात अपराधी’ घोषित जातियों को आजादी मिली तो उनके लिए नया कलंक-शब्द दिया गया-‘आदतन अपराधी’। अर्थात 81 वर्ष बाद जब विमुक्त हुए तो दूसरे कम कलंकित खूंटे से इनको सदा के लिए बांध दिया गया। अंग्रेजों के काले क़ानून के कारण इन जातियों को रोज थाने में तीन से चार बार हाजिरी लगानी पड़ती थी। चितौडगढ़ जिला के कपासन के मेंदा कोलानी में कंजड जाति के लिए पुलिस चौकी 1934 में खोला गया था। जहां रोज समुदाय के लोगों को हाजरी देनी पड़ती थी। मांग कर खाने वाले इस समुदाय को पुलिस चोर बताती थी, कच्ची शराब बनाने-बेचने के आरोप में प्रताड़ित करती थी। यह हाल तक स्थिति रही। समाज इन जातियों को, जो प्राय: खानाबदोश या बंजारा माने-समझे जाते हैं को चोर समझता है, शक की निगाह से देखता है। इसके लिए समाज नहीं, वह सरकार और क़ानून जिम्मेदार है जो बच्चे को धरती पर आते ही उसे अपराधी मान लेता है। धीरे-धीरे भारतीय समाज ने भी इनको अपराधी जाति मान लिया। पुलिस में भर्ती होने वाले जवानों को इनके बारे में पढ़ाया जाने लगा। प्रशिक्षण के दौरान उन्हें बताया जाता था कि ये जनजातियां पारंपरिक तौर से अपराध करती आई हैं। नतीजा इनको हर जगह अपराधियों के तौर पर देखा जाने लगा। पुलिस को उनका शोषण करने के लिए अपार शक्तियां दे दी गईं। देशभर में लगभग 50 ऐसी बस्तियां बनाई गईं जिनमें इन जनजातियों को जेल की तरह कैद कर दिया गया। इन बस्तियों की चारदीवारी के बाहर हर वक्त पुलिस का पहरा लगता था। बस्ती के बच्चों से लेकर हर सदस्य को बाहर आते-जाते वक्त पुलिस को अनिवार्य रूप से सूचना देनी होती थी या उपस्थिति दर्ज करानी पड़ती थी। इनकी किस्मत का फैसला पुलिस अधिकारियों के हत्थे छोड़ दिया गया। इनको अदालतों में अपने ऊपर लगे आरोपों के विरुद्ध पैरवी का अधिकार नहीं दिया गया। इनकी बस्तियां खुले जेल की तरह थीं। बिजनौर के नजीबाबाद किले के भातुओं को सुधारने के नाम पर अनोखा प्रयोग हुआ। इसकी प्रतिक्रिया के फलस्वरूप वहां से भागा साधारण सुल्ताना इतना बड़ा डाकू बन गया कि उसे पकड़ने के लिए तीन साल तक संयुक्त प्रांत की फ़ौज को लगाना पड़ा था। गौरतलब है कि 2008 में संसद में एक एप्रोप्रियेशन बिल पास हुआ था जिसमें विमुक्त जातियों के हालात पर सांसदों ने कुछ तथ्यात्मक बातें रखी थीं। तब ओडिशा के सांसद ब्रह्मानंद पांडा ने ज़िक्र किया था कि उनके निर्वाचन क्षेत्र का लोधा समुदाय जो वास्तव में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे, उन्हें आज भी समाज एवं शासन सत्ता पर बैठे लोग जन्मजात अपराधी ही मानते हैं। इस सबके कारण ही स्थिति ऐसी बनी कि छोटे कस्बे या शहर में छोटा-मोटा कोइ अपराध होता है तो पुलिस तंबू गाड़ कर रहने वाले बंजारों, खानाबदोशों को पकड़ कर ले आती है और घटना की लीपापोती कर देती है। जब सरकार और उसकी व्यवस्था का व्यवहार अपने ही वंचित नागरिकों के साथ ऐसा होगा, तो स्वाभाविक है जनता भी उसी तरह ट्रीट करेगी।



विमुक्त का अर्थ है-आजाद, स्वतन्त्र। दूसरा अर्थ है-छोड़ा गया और तीसरा अर्थ है-कार्यभार से मुक्ति। इन तीनों अर्थों के निकष पर यदि परखें तो इन जातियों/जनजातियों के हिस्से क्या लगा, भारत की आजादी मिलने से। वे 31 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस मनाते हैं, किन्तु तब भी ये कितने स्वतन्त्र हैं भला? जन्मजात और आदतन में बहुत महीन अंतर है। इनको न 1947 में आजादी मिली, न 1952 में। इनको 31 अगस्त 1952 को “जन्मजात अपराधी” के खूंटे से खोल कर “आदतन अपराधी” के खूंटे से बांध दिया गया। जिनके साथ अंग्रेजों ने और फिर भारत सरकार ने ऐसा किया। उनकी आबादी देश में 2011 की जनगणना के अनुसार 15 करोड़ और वर्तमान में 20 करोड़ होने का अनुमान है। इतनी बड़ी आबादी जो समाज के मुख्यधारा से अलग, हाशिये पर खड़ी होकर बिना गुनाह किये अपराधी मानी जाती है, इस कलंक के साथ जीना कितना दुष्कर है, इस पीड़ा को खुद कलंकित हो कर ही समझा जा सकता है। वो देहात में कहते हैं न-जाके न फटी बेवाई, वो का जाने पीर पराई। यही स्थिति इनके मामले में है। सवाल उठता है कि आखिर क्या वजह थी, जो अंग्रेजों ने इनको जन्मजात अपराधी माना?  



वास्तव में इन जनजातियों ने अंग्रेजों के छक्के छुडा दिए थे। इतिहास की पुस्तकें यूं ही आरोपित नहीं हैं। इनके पन्नों पर जहां इन जन जातियों को तवज्जो मिलनी चाहिए थी, एक सिरे से इनकी चर्चा तक नदारद है। विमुक्त जनअधिकार संगठन कार्यकर्ता बीके लोधी ने लिखा है कि घुमन्तु जनजातियाँ वास्तव में भारतीय (हिन्दू) संस्कृति की रक्षक थीं और हैं। राज्यसभा में वरिष्ठ पत्रकार अरविंद कुमार सिंह ने योजना जनवरी 2014 में एक लेख-नयी रौशनी की तलाश में घुमंतू जनजातियाँ- में लिखा कि यह समुदाय युद्धकला में प्रवीण थीं। मुगलों को खूब छकाया तो सन 1857 की क्रान्ति में इनकी अग्रणी भूमिका रही है। भारत सरकार ने कुछ आयोग एवं कमेटियों का गठन किया था। उन्होंने भी यह माना था कि विमुक्त समुदाय को ब्रिटिश विद्रोह के कारण जन्मजात अपराधी के रूप में कलंकित होना पड़ा। विभिन्न शोधकर्ता, इतिहासकार एवं विद्वान स्पष्टत: यह स्वीकार करते हैं कि विमुक्त जातियां ब्रिटिश हुकूमत की सशस्त्र विद्रोही थीं, ये वास्तविक स्वातंत्र्य योद्धा थे। स्थानीय कृषक जातियों/जनजातियों ने अपने-अपने स्तर और क्षमता के अनुसार सशस्त्र विद्रोह किया था। तब 53 देशों में शासन करने वाले अंग्रेजों ने आखिर सिर्फ भारत में ही क्यों क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट लागू किया था? इसकी पृष्ठभूमि में अंग्रेज़ों की धारणा यह थी कि जिस तरह से भारत में जातिगत व्यवसाय होते हैं, जैसे लोहार का लड़का लोहार होता है, बढ़ई का लड़का बढ़ई, चिकित्सक का लड़का चिकित्सक, इसी तरह अपराधी की संतानें अपराधी ही होती हैं।

इसलिए भारत की लड़ाकू जातियों की संतानों को भी अनिवार्य रूप से जन्मजात अपराधी मान लिया गया था। बीके लोधी कहते हैं-यदि जीविका के लिए चोरी-चकारी जैसे छोटे अपराधों के कारण क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट लागू करना होता तो अंग्रेज़ों ने 1857 के पहले ही कर दिया होता। सच्चाई यह है कि 1857 की क्रांति विफल होने के पश्चात जब महारानी विक्टोरिया ने कंपनी सरकार से शासन अपने हाथ में ले लिया और उन तमाम विद्रोहियों को क्षमा कर दिया, जिन्होंने क्षमा याचना कर ली थी। किन्तु कुछ जन समुदाय ऐसे थे जो समझौता परस्ती को कायरता समझते थे और प्रतिशोधात्मक कार्रवाई के लिए सदैव तत्पर रहते थे। ऐसे ही समुदायों की पहचान करने के लिए क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट 1871 लागू किया गया था। हकीकत यह है कि यह वह समुदाय है जिसने हथियार बनाने, साजो-सामान जुटाने, सन्देश पहुंचाने से लेकर कई अन्य तरीके से क्रांतिकारियों की मदद की थी। इस समुदाय के बारे में कहा गया है कि ये प्राचीनकाल से व्यापार करते रहे हैं, तब से जब कारवां चला करता था। भारत में रेल आयी तो इनकी कारोबारी ताकत बढ़ी। बन्दरगाहों से सामानों को देश के अन्य भीतरी हिस्से तक पहुंचाने की जिम्मेदारी इनके कन्धों पर ही थी। लेकिन दुर्भाग्यवश इनको अंग्रेजों ने देशभक्ति और विद्रोह के कारण अपराधी जाति घोषित कर दिया और आजाद भारत की सरकार ने आदतन अपराधी।



न्याय की आग्रही विमुक्त जातियों की अजब न्याय व्यवस्था


अंग्रेजों द्वारा जन्मजात अपराधी का दर्जा देने और फिर भारत सरकार द्वारा आदतन अपराधी का दर्जा देने का दुर्भाग्य झेल रहा घुमंतू-विमुक्त समुदाय भारत सरकार से और अपने अपने राज्य सरकारों से न्याय का आग्रही है। इन जन जातियों को न्याय चाहिए ही चाहिए। किसी भी सभ्य समाज में यह स्वीकार्य अपेक्षा होती है। किन्तु दूसरी तरह इन जनजातियों की न्याय व्यवस्था विचित्र और उलझी हुई है। पारंपरिक व्यवस्था ही चली आ रही है। किसी तरह के मामले में कोइ थाना-पुलिस नहीं जाता। पंचायत बैठती है और दोनों पक्षों की बात सुन कर किसी निर्णय पर पहुँचती है। किसी विवाद पर पहले पंचायत बैठता है। विचार विमर्श के बाद सजा तय किया जाता है। कोइ विरोध नहीं कर सकता। सजा जो भी हो, जितना भी कठीण हो, आरोपित को स्वीकारना पड़ता ही है। चाहे आर्थिक दंड हो या शारीरिक प्रताड़ना का दंड। जिस जाति के स्त्री-पुरुष पर आरोप लगता है, उस जाति के अगल-बगल के कई गाँवों के स्वजातीय जुटते हैं। तब सुनवाई होती है। परखा जाता है कि आरोपित सही बोल रहा है या गलत। प्रेम प्रसंग, सेक्सुअल ह्रासमेंट, चोरी जैसे अपराध करने पर पंचायत जुटाए जाते हैं। हड़िया-बर्तन बन्द, मतलब घर खाना नहीं खाने, जाति से निकाल देने के फैसले होते हैं। आर्थिक सजा भी सुनाई जाती है। दोष सिद्ध होने पर सजा देने और मुक्त करने का प्रावधान है। आर्थिक दंड लगाया जाता है। छोटी गलती के लिए कम अर्थ दंड। एक लाख रुपये तक का भी दंड हो सकता है। जब स्थिति कठीन होती है, समझौता मुश्किल होता है, वाद-प्रतिवाद तीखा हो तो सजा के रूप बदल जाते हैं। यह तब होता है जब सजा सुनने वाला खुद को निर्दोष बताने पर अडिग हो। वह पंचायत के फैसले को खारिज करने के लिए स्वयं को निर्दोष बताता हो। ऐसे में उसकी परीक्षा ली जाती है। जैसे सीता ने अग्नि परीक्षा दिया था। आग में जले तो दोषी, न जले तो पतिव्रता, शुद्ध स्त्री। इस सन्दर्भ में तीन तरीके प्राय: आजमाए जाते हैं-




न्याय - सजा के तीन ख़ास तरीके:-

01-खनता लकड़ी काटने वाला एक औजार होता है। करीब सवा किलो वजन का। इसे एकदम गर्म लाल कर आरोपित के हाथ पर पीपल या आम का दो पत्ता रखकर उस पर रख दिया जाता है। इसके बाद वह व्यक्ति तीन बार एक ही स्थान पर परिक्रमा कर आगे सात कदम या डेग चलता है। शर्त यह है कि हाथ पर फोड़ा नहीं पड़ना चाहिए। यदि ऐसा हुआ तो हार माना जायेगा। इसके लिए एक पारंपरिक पूजा विधान है। खनता जिसके हाथ पर रखा जाना है उसको बिना सिला एक कपड़ा में ही रहना है। भूखे एक दिन पहले। ब्राह्मण पूजा कराएगा। वेद पुराण पढ़ने के लिए। मान्यता है कि ब्राह्मण के के वाणी से सब शुद्ध हो जाता है। खनता की पूजा करते हैं। कूल देवी की पूजा करते हैं। उनको ही साक्षी मान कर हाथ पर खनता रख दिया जाता है। कलयुग में कोई विश्वास नहीं करेगा लेकिन यहां यह सत्य माना जाता है।

  

02- आरोपित को नहर में पानी के अंदर तब तक रहना है जब तक दूसरा व्यक्ति 150 कदम आगे जा कार पीछे उसके पास न लौट जाए। यानी 300 कदम दूसरे व्यक्ति को चलना है और तब तक आरोपित को पानी के अन्दर रखना है। ऊपर दिखे तो दोषी माना जायेगा। यानी सांस रोके रखना है तब तक। 


03- एक किलो गर्म खौलते तेल में एक सिक्का डाला जाता है। उसे आरोपित को निकालना है। यदि हाथ जला तो दोष सिद्ध माना जायेगा। नहीं जला तो माना आजायेगा कि आरोपित का कथन ही सत्य है। वह निर्दोष है। 



न्याय-व्यवस्था-प्रणाली के इन तीन तरीकों को सभ्य समाज कतई स्वीकार नहीं करेगा, किन्तु इनकी यही अपनी परंपरागत न्याय व्यवस्था है। शायद न्याय-व्यवस्था के इस तरह न्याय-संगत न होने के कारण ही, कभी दहेज़-ह्त्या की घटना अंजाम नहीं पाती। खुले आसमान के नीचे, बिना दरवाजे वाली झुग्गियों में रहते हुए भी दुष्कर्म, छेड़खानी की घटना नहीं घटती है। फिर भी कोइ खारिज करता रहे, इनको परवाह नहीं। कोइ तर्क नहीं मानते ये। यह भी तो संभव है कि निर्दोष का हाथ गर्म दपदप खनता रखने से जल जाए, जल में स्वयं को डूबाये रखते वक्त मौत हो जाए, गर्म खौलते तेल से सिक्के निकालने से हाथ जल जाए? नहीं इस समाज में यह तर्क नहीं चलेगा। कोइ सुनने को तैयार नहीं। वास्तव में इनकी न्याय व्यवस्था-प्रणाली धार्मिक आस्था पर टिकी है, चमत्कार पर, और बिना चमत्कार धर्मं का वजूद नहीं होता। आपकी वे नहीं मान सकते, इसलिए हम ही मान लेते हैं कि, जो निर्दोष है वह, इनकी तय अग्नि परीक्षा से बिना जले बाहर निकला जाता होगा। खैर...


हिन्दू समाज की अन्य जातियों की तरह ही इन जातियों/ जन जातियों में शामिल हर एक जाति में सात कुड़ी या पारिछ होता है। सब एक दुसरे से स्वयं को ऊपर यानी श्रेष्ठ बताते हैं। जातीय सोपान एक तरह से गोल है। सब एक दुस्सरे से नीचे भी और ऊपर भी। यह गिनने वाले पर निर्भर करते है, गिनती कहाँ से किस ओर शुरू करता है। कुछ जातियां यथा- लाठौर या नट, गोही, कोडरिया, बको, कोंगड, तुरकेल, गुलाम, उमराहा, मणिकपुरिया, गदही, ओआण, छाता साथ रहते हुए भी अलहदा रहते हैं। सब एक दूसरे से खुद को व्यवसाय और खान-पान में अलगाव का आधार मानकर श्रेष्ठ और नीच का निर्धारण करते हैं। अन्य हिन्दू परंपराएं भी ये पालन करते हैं किन्तु मृत्यु बाद के संस्कार अलग हैं। वे शव को जलाते नहीं दफना देते हैं। बच्चा मरने पर जमीन में गाड़ दिया जाता है, जैसा प्राय: हिन्दू परिवार करता है। उम्रदराज की मौत पर जलाते नहीं दफनाते हैं। दशकर्म, भोज बरखी होता है। नेवता हँकारी देना पड़ता है। सबको बुलाना पड़ता है। अपने एक्शामता के अनुसार खाने-पीने की व्यवस्था जात-समाज-हित-नाता के लिए करना पड़ता है। जब कोइ बच्चा जन्म लेता है तो  सोहर गाते हैं लोग-

जुग जुग जियसु ललनवा, भवनवा के भाग जागल हो
ललना लाल होइहे, कुलवा के दीपक मनवा में आस लागल हो॥

आज के दिनवा सुहावन, रतिया लुभावन हो,
ललना दिदिया के होरिला जनमले, होरिलवा बडा सुन्दर हो॥

नकिया त हवे जैसे बाबुजी के,अंखिया ह माई के हो
ललन मुहवा ह चनवा सुरुजवा त सगरो अन्जोर भइले हो॥

सासु सुहागिन बड भागिन, अन धन लुटावेली हो
ललना दुअरा पे बाजेला बधइया, अन्गनवा उठे सोहर हो॥

नाची नाची गावेली बहिनिया, ललन के खेलावेली हो
ललना हंसी हंसी टिहुकी चलावेली, रस बरसावेली हो॥

जुग जुग जियसु ललनवा, भवनवा के भाग जागल हो
ललना लाल होइहे, कुलवा के दीपक मनवा में आस लागल हो॥


नाच गाना होता है। शंकर बाबा को पूजते हैं। छठी, सतईसा होता है। जिसके घर अधिक वर्ष पर पुत्र रत्न प्राप्त होता है, वहां तब खाने पीने का समारोह होता है। छह दिन प्रसूति से घर का कोइ बर्तन नहीं छुआयेगा। खाना अलग से फूल पीतल नहीं तो स्टील के बर्तन में उसे दिया जाता है। यहाँ भी हिन्दू परिवारों में प्रचलित रस्म का पालन दिखता है। 

शादी-विवाह में बाजा-नाच में कमी नहीं होती है। लोग अपनी क्षमता के अनुसार आयोजन-खर्च करते हैं। बनारस, जौनपुर, हरिहरगंज, दौलतपुर, संजीवन बिगहा, दूर-दूर तक रिश्तेदारी है। खाना पीना खूब होता है। दहेज़ का रोग यहाँ भी है-5 से 30 हजार रुपये तक दहेज नगदी दिया जाता है। बर्तन, मशाला जो सम्भव हो सका राजी खुशी से दिया जाता है। 

दहेज प्रताड़ना या हत्या की घटना कभी नहीं। वधु से मांगने, मारपीट करने, हत्या करने की घटना कभी नहीं घटी। यदि ऐसा हो जाए तो जिस लड़की के साथ घटना कारित किया गया, उसके परिजन, रिश्तेदार और जाति-समाज के लोग वर पक्ष के घर धावा बोल देते हैं। आरोपित के खिलाफ पंचायत लगेगी, कारर्वाई होगी, कभी-कभी यह हिंसक हो जाती है और आरोपित की हत्या तक कर दी जाती है। शिक्षा का इस समाज में घोर अभाव है। 200 की एक बस्ती में इस लेखक को इंटर फाइनल किया हुआ एकमात्र लड़का कुंदन मिला। उसकी दो बहन मैट्रिक, दो बहन इंटर और एक बहन बीए किये हुए है। बाकी सब के सब असाक्षर हैं। कुछ बच्चे समीप के विद्यालय जाने लगे हैं। लेकिन शिक्षा की उनकी यात्रा अभी शुरू हुई है, आजादी की आधी सदी बाद। कुंदन दो सांढ़, एक भैंसा, एक भैंस और एक कड़िया रखा है। गर्भ धारण करने की स्थिति में पहुंचे जानवर को पाल दिलाने का काम करता है। 200 या 300 रुपये तक एक जानवर मालिक से लेता है। अब यह धंधा सीमेन देने की मशीनी व्यवस्था से चौपट हो गया है। जिस धंधे में लाभ दिखा कर लेते हैं। खाद्यान मांगकर जमा कर लेते हैं। कटनी नहीं करते। कृषि कार्य नहीं करते। कुछ अपवाद भले हैं। अब आबादी का एक हिस्सा कृषि मजदूर बन रहा है। मणि बटैया पर खेती करने को कुछ लोग तैयार होने लगे हैं। ये जनजातियां सब दिन मांसाहार भोजन कर सकती हैं। हिन्दू परंपरा की तरह मंगलवार, गुरूवार या शुक्रवार, रविवार को मांसाहार न करने को यहाँ वर्जित नहीं है। एक्कादुका लोग शाकाहारी मिलेंगे। मुर्गा, मछली, खस्सी के अलावा भेड़ी, भेड़ा, गदहा, बिलार, सुअर भी खाने वाले लोग इन जातियों में हैं।  


अंत में बस इतना कि..

बाबू भैया कहकर, मांग खा कर जीने वाले ये लोग आरोपित हैं। जन्मजात या आदतन अपराधी नहीं। लोगों को नजरिया बदलना होगा। इनका प्रश्न है-अगर हमारी जाति अपराधी होती तो एक ही स्थान पर 60 बरस से कैसे रहती? सरकारी जमीन पर कैसे बसे रहते? लोग भगाने नहीं आते? समाज में घुल मिलकर रहते हैं। मांग चांग कर खाते हैं। भारत के हर हिस्से में घूम कर मांगते खाते हैं। इस प्रश्न का जवाब जो आप देंगे, वही हकीकत है।


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Saturday, 16 July 2022

बिहार में उग्रवाद का क्या था मूल कारण

(नक्सल आंदोलन के बिहार में जन्म, विस्तार, प्रभाव, परिणाम और ख़ात्मे की पूरी यात्रा का विश्लेषण)

० उपेंद्र कश्यप ०

 लेखक- 'आंचलिक पत्रकारिता के तीन दशक

(श्रम, संघर्ष, अपेक्षा और परिवर्तन)'

और-"श्रमण संस्कृति का वाहक-दाउदनगर" 


नक्सल आंदोलन बंगाल की देन थी। बंगाल के नक्सलबाड़ी से खेतिहर मजदूरों का, श्रमिकों का जो भू-पतियों और सत्ता के खिलाफ आक्रोश पनपा और एकजुट होकर जो आंदोलन शुरू हुआ था वह नक्सलबाड़ी आंदोलन के नाम से जाना गया। भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी के नेता चारु मजूमदार और कानू सान्याल ने जो सशत्र विद्रोह 1967 में शुरू किया था, वही नक्सलबाड़ी आंदोलन बिहार में नक्सल आंदोलन कहा गया और बाद में नक्सलियों के व्यवहार में आये बदलाव ने उन्हें उग्रवादी की संज्ञा दिला दी। तब वे उद्देश्य से भटक गए। बिहार में इसके जन्म, विस्तार, प्रभाव, परिणाम और ख़ात्मे की पूरी यात्रा हिंसात्मक रही, नतीजा बिहार के खेत खलिहान लहू लुहान होते रहे और बुद्ध के शांति संदेश के लिए जाने गए बिहार को नई पहचान मिली-नरसंहारों का इलाका। इलाका विस्तार, इसके लिए खूनी संघर्ष, वर्ग शत्रु, जन अदालत, खस्सी-बकरी को जिस तरह कसाई रेत कर मारते हैं, उस तरह से आदमी जबह किये जाने लगे। हत्या के क्रूर से क्रूरतम तरीके अपनाए गए।


खैर, नक्सलबाड़ी आंदोलन के जनक पश्चिम बंगाल का ही एक हिस्सा हुआ करता था बिहार। तब उड़ीसा भी इसके साथ था। बाद में इसी बंगाल से उड़ीसा और बिहार अलग हुआ और बाद में बिहार से झारखंड अलग हुआ। बिहार (जब झारखंड साथ था) बंगाल की सीमा से सटा प्रदेश था। अब भी बिहार से बंगाल दूर नहीं है। बंगाल में जो आंदोलन 1970 के दशक में हो रहे थे, उसका कहीं ना कहीं बिहार के समाज पर मानसिक प्रभाव पड़ रहा था। और उससे प्रभावित हो रहे थे जमीन और मजदूरी के संघर्ष से जूझ रहे खेत मजदूर। वामपंथियों ने पीड़ितों को एकजुट किया। बाद में अति वामपंथी इसमें आए और फिर नक्सलवाद उग्रवाद के रूप में बदल गया। नतीजा यह हुआ कि न सिर्फ वर्गीय शत्रु की पहचान कर हत्या करने बल्कि आपसी गुटों में भी नक्सली संगठनों में हो रहा टकराव हत्या के सिलसिले को अंजाम देने लगा। इसमें एमसीसी (मार्क्सवादी कम्युनिस्ट सेंटर) पार्टी यूनिटी, मजदूर किसान संग्राम समिति जैसे अनेक संगठन एक ही उद्देश्य को लेकर साथ चलते हुए एक दूसरे की हत्या करने तक विरोध में खड़ा हो गए क्योंकि सत्ता और शक्ति व्यक्ति को निरंकुश महत्वाकांक्षी बना देता है, चाहे सत्ता छोटे इलाके की हो या बड़े इलाके की। इसीलिए हम देखते हैं कि बिहार में इलाका विस्तार के लिए हुए संघर्ष में काफी नक्सली मारे गए। 




बिहार में नक्सलवाद के उभार के बाद और पतन तक के दौर का करीब साढ़े तीन दशक का दौर रहा है। यदि इसमें देखें तो जहां बर्बादी की कहानी शुरू हुई वहां नक्सल पंथ पनपने लगा और अंततः सबको उग्रवाद की चपेट में ले लिया। वहीं जहां विकास की धारा बहनी शुरू होती है वहां नक्सलवाद खत्म होता चला जाता है। 70 के दशक में जब बिहार में नक्सल का प्रभाव पैर जमाना शुरू किया था बिहार में विकास की बात करनी भी लोगों के लिए मुश्किल होती थी। और जब नक्सल पंथ बिहार के संदर्भ में 1990 और 2000 के दशक तक तो चरम पर रहा। तो विकास शब्द से लोगों की इतनी दूरी बढ़ती चली गई कि बिहारी यह मान चुका था कि बिहार में विकास चांद मामू की तरह काफी दूर है जिसे देखा तो जा सकता है उसे जमीन पर नहीं उतारा जा सकता। विकास का नक्सलवाद से कितना गहरा नाता है यह इस संदर्भ में आप आकलन कर सकते हैं। धीरे-धीरे नक्सल पनपना शुरू हुआ और लालू राबड़ी काल में चरम पर पहुंचा। जिसके जवाब में रणवीर सेना ने भी हत्याओं का दौर शुरू किया और दर्जनों नरसंहार में सैकड़ों निर्दोष लोगों की हत्या कर दी गई। चाहे वह स्वर्ण की गर्दन कटे या दलित की खोपड़ी व गर्भ को उड़ा दिया जाए। मारे तो हमेशा निर्दोष लोग ही गए। कभी रणवीर सेना वालों ने नक्सली संगठनों के प्रमुख कर्ताधर्ताओं के विरुद्ध अपनी गोलियां नहीं बरसाई। बंदूक की नाली नहीं ताना। ठीक इसी तरह नक्सलियों के संगठनों द्वारा भी रणवीर सेना के प्रमुख कर्ताधर्ताओं के गर्दन नहीं काटे गए। दोनों पक्षों ने हमेशा निर्दोष लोगों को मारा। बर्बरता की ऐसी इंतहा हो चली थी कि आप कल्पना करिए कि रणवीर सेना के मुखिया ब्रह्मेश्वर मुखिया ने क्या कहा था। उन्होंने एक इंटरव्यू में खुलेआम कहा था कि हम निर्दोष दलितों की हत्या इसलिए करते हैं कि इन्हीं के हित की बात नक्सली संगठन करते हैं। नक्सली मिलते नहीं तो वे जिस के हित में खड़े हैं, हम उसकी हत्या कर देते हैं, ताकि कोई दूसरा नक्सली इस जमात से ना निकले। 



ध्यान रखें कि बिहार में रणवीर सेना बनाम नक्सली संगठनों के संघर्ष में जो नरसंहार हुए हैं उसमें पिछड़े नहीं मारे गए और जब पिछड़ा मारा गया तो बिहार में नरसंहार का सिलसिला थम गया। रणवीर सेना ने नक्सलियों के बड़े नेताओं और समर्थकों के ना मिलने के कारण दलितों की हत्या की बात कही थी, लेकिन पिछड़ी यादव जाति के नेतृत्व में संचालित माने गए मार्क्सवादी कम्युनिस्ट सेंटर एमसीसी ने सेनारी में 18 मार्च 1999 को 35 की हत्या गर्दन रेतकर बर्बरता पूर्वक कर दी, तो इसके जवाब में रणवीर सेना द्वारा सेनारी से कुछ दूरी पर स्थित औरंगाबाद जिले के मियांपुर में 16 जून 2000 की रात दबंग पिछड़ी यादव जाति के लोगों की चुन चुन कर हत्या कर दी। जिसमें अकेले यादव जाति के 26 व्यक्ति मारे गए। बाकी मारे गए आठ व्यक्ति भी दूसरी पिछड़ी जाति के ही थे। इसमें कोई दलित नहीं मारा गया और इसके बाद बिहार में नरसंहार का सिलसिला खत्म हो गया। रणवीर सेना के जन्म से पहले फरवरी 1980 से लेकर अप्रैल 1994 तक जो 13 नरसंहार हुए उसमें कुल 164 व्यक्ति मारे गए। जबकि रणवीर सेना के उभार के बाद अप्रैल 1995 से लेकर मियांपुर नरसंहार (16 जून 2000) तक कुल हुए 30 नरसंहार में 321 की हत्या हुई।

यहां यह मौजू सवाल है कि नरसंहारों के लिए बदनाम बिहार का आखिरी नरसंहार मियांपुर क्यों बना? क्या एमसीसी के आधार जाति वाले जब मारे गए तो एमसीसी मांद में घुस गई? रणवीर सेना के इस बात का समर्थन नहीं किया जा सकता की हत्या के बदले हत्या करना उचित है। यहां नक्सली जिसकी आवाज उठाते हैं उसकी हत्या की जाए, यह कभी भी जायज नहीं ठहराया जा सकता। लेकिन एक कहावत याद रखिए लोहे को लोहा ही काटता है। तो क्या यह माना जाए कि नक्सली संगठनों के नेताओं और कर्ताधर्ताओं के विरुद्ध जिस रणवीर सेना की बंदूकें गरजती नहीं थी उसने जब बंदूकों का मुंह नक्सली संगठनों में कुख्यात एमसीसी का लीडरशिप जिस जाति से आता था उस जाति के खिलाफ चुन चुन कर हत्या करने की आक्रामक रणनीति बनाई तो वह नरसंहारों के लिए अंतिम कील साबित हुई। हमेशा इस बात का आप ध्यान रखिए कि यही रणवीर सेना जब लक्ष्मणपुर बाथे पहुंचता है जहां 31 दिसंबर 1997 को भारतीय नक्सल आंदोलन इतिहास के सबसे बड़े नरसंहार को अंजाम देते हुए 61 निर्दोषों की हत्या करता है तो इस बात को सुनिश्चित करता है कि इसमें यादव जाति का कोई व्यक्ति ने मारा जाए। यह सुनिश्चित करने के लिए लक्ष्मणपुर बाथे में रणवीर सेना द्वारा यादवों के घर चिन्हित कर बाहर से कुंडी लगा दिया गया था, ताकि गोलियों की बौछार से होने वाली हड़बड़ी में कोई यादव जाति का व्यक्ति घर से बाहर न निकले और मारा न जाए। उपरोक्त बातों को जानने और समझने के बाद यह नहीं लगता कि कहीं ना कहीं बिहार में हो रहे नरसंहारों का सिलसिला सामाजिक बुनावट और विसंगतियों से अधिक राजनीतिक लाभ लेने के स्वार्थ के कारण चल रहा था? क्या राजनीतिक संरक्षण नहीं था? बिहार में यह खुला सच है कि चाहे रणवीर सेना हो चाहे कोई दूसरा नक्सली संगठन, सब को राजनीतिक सत्ता का संरक्षण प्राप्त रहा है और राजनीति जब जरूरत समझती थी नरसंहार हो जाता था। क्योंकि नरसंहार करने के लिए निर्देश तो राजनीति से ही दिया जाता था। बिहार में नरसंहारों का प्रमुख कारण राजनीति ही रही है। राजनीति ने नरसंहार को अपने नफा नुकसान को देखकर निर्देशित किया और उसका लाभ लिया। ठीक वैसे ही जैसे वोट बैंक की राजनीति होती है। बिहार में नरसंहारों की राजनीति भी रही है। 




यहां यह प्रश्न मौजू है कि नरसंहारों की स्थिति क्यों बनी? इसकी मूल वजह क्या है? राजनीति तो यहां भी है। राजनीति के कारण ही समाज में कई तरह की विसंगतियां पैदा हुई। जिसके कारण खेत किसान मजदूर एकजुट हुए और वह सामंत और जमींदारों के खिलाफ एकजुट होकर हल्ला बोलने की मुद्रा में खड़े हो गए। जिसका नेतृत्व करने वाले वामपंथी रहे। वामपंथियों ने गांव-गांव जाकर कृषि मजदूरों को एकजुट करना शुरू किया तब बिहार में तीन किलो बन मिलता था। यानी दिनभर की मजदूरी तीन सेर चावल मिलता था। यहां हमेशा ध्यान रखें कि एक किलो से कम की मात्रा एक सेर है। ऐसे में कृषि मजदूरों की हालत बहुत बदतर थी। स्थिति इतनी बदतर थी कि मझोले और बड़े जोतदार कृषि मजदूरों को मजदूरी देने के लिए प्रताड़ित करते थे। शाम के धुंधलके में या रात में कृषि मजदूरों को मजदूरी लेने के लिए अपनी पत्नी को भेजने के लिए कहते थे या कोई दूसरी महिला रिश्तेदार को। स्वाभाविक है कि शाम के धुंधलके में या रात के अंधेरे में एक पुरुष किसी स्त्री को क्यों बुलाता है? कृषि मजदूरों को जब वामपंथी संगठन एकजुट करने लगे तो उनके आत्मसम्मान को कुरेदा गया। और वामपंथियों ने उन्हें यह समझाया कि मजदूरी से ज्यादा जरूरी सम्मान होता है और इसी सम्मान को हासिल करने के लिए कृषि मजदूर एकजुट हुए और वे मझोले और बड़े जोतदारों के खिलाफ हल्ला बोल की मुद्रा में खड़े हो गए। बिहार सामंती सोच वाला प्रदेश रहा है यहां बड़ी मात्रा में ऐसे ऐसे जमींदार रहे हैं जिनकी सोच कबीलाई संस्कृति की तरह रही है। मजदूरों के साथ दुर्व्यवहार करना, उनकी बेटी, बहनों, बहुओं पर हवस की नजर गड़ा कर रखना, कम मजदूरी देना, बात बात पर मजदूरों को पीटना, भूखे रखना, पेड़ में बांधकर पीटना, समय पर पैसा ना देना, पैसे ब्याज पर लेने के लिए मजबूर करना, यह सब हथकंडे अपनाए जाते थे। बंधुआ मजदूर आखिर बिहार के इस इलाके में क्यों रहे? कारण, यही सामंती सोच थी। वामपंथी संगठन जब कृषि मजदूरों को संगठित करने लगे और बदलाव की इबारत जब लिखी जाने लगे तो सामंती सोच वाले बड़े-मंझोले जोतदार और किसान संघर्ष के मुद्रा में खड़े हो गए। वे टकराव में उतरे ना कि बदलाव को अंगीकार किया। नतीजा दोनों तरफ से हथियार उठने लगे। एक तरफ गोला बारूद वाले बंदूक थे तो दूसरी तरफ हंसिया, खुरपी और लाठी थे। सामंतों के सामने मुकाबले में खड़ा रहना मुश्किल हो गया। यह पीड़ा उन्हें सालती थी। तब तक दलितों का ही नरसंहार होता था। समाजशास्त्री आंद्रे बेंते ने अपना विचार व्यक्त करते हुए तब कहा था- 'बिहार में हरिजनों की हो रही हत्याएं बेशक दुखद है। पर साथ ही इस बात का संकेत है कि हरिजनों में चेतना तेजी से आ रही है। इनकी उभरती चेतना इनकी हत्या का कारण बन रही है' 


 और फिर वह दौर शुरू हुआ जब बड़े घरों से और पुलिस वालों से नक्सली संगठन हथियार लूट कर इकट्ठा करने लगे। जब कृषि मजदूरों की लड़ाई लड़ रहे हैं वामपंथी संगठनों के हाथ में भी गोला-बारूद और बंदूक आ गए तो फिर हिंसक झड़पें अधिक होने लगी। तब समाज शास्त्रियों ने इसे संज्ञा दी- बैलेंस ऑफ टेरर का, यानी आतंक का संतुलन। जब वामपंथी संगठन स्वर्ण की हत्या करते थे तो बदले में रणवीर सेना दलितों की हत्या करती थी। बदला लेने की इस प्रवृत्ति के कारण नरसंहारों का सिलसिला लंबे दौर तक चला। शायद इसीलिए बैलेंस और टेरर शब्द का जन्म हुआ। लेकिन यहां एक बात साफ-साफ समझ लें कि सवर्णों की हत्या का मतलब सवर्ण जातियां नहीं थी। सिर्फ एक जाती थी जिसे बिहार में भूमिहार कहा जाता है। रणवीर सेना इसी भूमिहार जाति का लीडर संगठन बन गया था। ठीक वैसे ही जैसे एमसीसी यादवों का संगठन माना गया था। इसी एमसीसी ने बिहार के औरंगाबाद जिले के दलेल चक बघौरा में 27 मई 1987 को 57 राजपूतों की हत्या कर दी थी। इसके पहले 11 राजपूतों की हत्या इसी औरंगाबाद जिला में एमसीसी ने की थी। इसके बाद किसी नरसंहार में राजपूत नहीं मारे गए। तब सत्येंद्र नारायण सिन्हा (जो 1989 में मुख्यमंत्री बने थे) समेत राजपूत नेताओं ने राजपूतों को संघर्ष में न जाने के लिए मनाया और बदली परिस्थिति को स्वीकार लिया। नतीजा दलेलचक बघौरा के बाद किसी नरसंहार में राजपूत नहीं मारे गए। जबकि भूमिहार रणबीर सेना के बैनर तले संघर्ष में रहे। भूमिहार संघर्ष करते रहे और नतीजा सवर्णों में सबसे अधिक नक्सलियों द्वारा उन्हीं की हत्या हुई। इसी रणवीर सेना ने मियांपुर को अंजाम दिया। आपसी खूनी संघर्ष की परिणति का चरम था मियांपुर। जिसके बाद नरसंहारों का सिलसिला खत्म हो गया। 




बिहार में 2000 में हुए मियांपुर नरसंहार के बाद भले ही नरसंहार ना हुए हों लेकिन नक्सलवाद खत्म नहीं हुआ। मारपीट, एकाधिक केव हत्या जैसी छिटपुट घटनाएं घटती रहती हैं, लेकिन नरसंहार नहीं। और जब 2005 में बिहार की सत्ता से लालू राबड़ी बेदखल कर दिए गए और नीतीश कुमार की सत्ता आई और उन्होंने विकास का जो रास्ता चुना तो बिहार से नक्सलवाद लगभग सफाया हो गया। अब बिहार में नक्सली सक्रियता है, ना नरसंहार है, ना बदले की कार्रवाई में कोई रणवीर सेना की गोलियां बरसती ही दिख रही हैं। मामला पूरी तरह शांत हो गया है। यह सब बताता है कि विकास से सोच भी बदली जा सकती है और संघर्ष को शांति के रास्ते पर भी ले जाया जा सकता है। इसलिए पहली, दूसरी और तीसरी जरूरत अगर समाज, प्रदेश और देश को है तो उसका नाम विकास है। विकास के जरिए हम तमाम समस्याओं का समाधान कर सकते हैं। बुद्ध की धरती जब लहू लुहान होने के बावजूद शांत हो गई तो कुछ भी शांत हो सकता है। और अशांत रहते हुए विकास तो नहीं प्राप्त किया जा सकता है। इसलिए जरूरी है कि बुद्ध की धरती मगध ने नरसंहारों के बाद शांति का जो संदेश दिया उसे पूरा देश और विश्व स्वीकार करे।


Sunday, 3 July 2022

बिहार प्रदेश गठन से एक वर्ष पुराना है पानी से चलने वाला मिल



फोटो-सिपहां स्थित पानी से चलने वाला मिल






बिहार का गठन वर्ष 1911 में और मिल बना 1910 में


इंगलैण्ड से टरबाइन लाकर रखी औद्योगिकीकरण की नींव


बर्मिंघम शहर से मशीन ला रचा दो उद्यमियों ने इतिहास


उपेंद्र कश्यप । दाउदनगर (औरंगाबाद)


पानी से तेल निकालना कहावत है, जिसे दाउदनगर शहर ने सही साबित किया है। जी हां, इसने पानी से तेल निकालना न सिर्फ सीखाया बल्कि इसे अभी तक संचालित रखे हुए है। जिसे विस्तार देकर राज्य और केंद्र की सरकारें उर्जा के क्षेत्र में नया अध्याय लिख सकते हैं। यह सोच थी दो उद्यमियों की। वर्ष-1911 में सन्युक्त प्रांत से अलग बिहार राज्य के गठन से एक वर्ष पूर्व संगम साव रामचरण राम आयल एण्ड राइस मिल सिपहां में खोला गया था। औधोगिक घरानों को जहां शोषक माना जाता रहा है वहीं इस मिल की व्यवस्था आदर्श रही है। सोन नहर का निर्माण होने के बाद सन-1910 में नासरीगंज (रोहतास) के उधमी संगम साव एवं दाउदनगर के रामचरण राम ने पानी से चलने वाली मिल की स्थापना किया। याद करें ठीक उसी समय जब भारत में प्रथम इस्पात कारखाने की आधारशिला जमशेदपुर में रखी गई थी। यहां इंगलैण्ड के बर्मिंघम शहर से आए टरबाइन की दरातें जब पानी के बहाव से घुमी तो विकास का पहिया भी तेजी से घुमा। मालिकों में शामिल तीसरी पीढ़ी के डा. प्रकाश चन्द्रा को याद है कि इंगलैण्ड का ही बना हुआ एक गैस इंजन है जो क्रुड आयल से चलता था। यह अभी अवशेष के रूप में बचा हुआ है। इस मिल का गौरव और वैभव बड़े इलाके तक फैला था। रामसेवक प्रसाद की मृत्यु (वर्ष 1967) के बाद और बदले औद्योगिक परिवेश के कारण इस अनुठे उद्योग का पतन प्रारंभ हो गया। कभी 150 कर्मचारी यहां रहते थे। अब मात्र 22 हैं। । 48 की जगह अब सिर्फ 16 कोल्हू चलते हैं। राजस्थान के गंगापुर से प्रतिदिन एक ट्रक न्यूनतम राई आता था। अब सिर्फ महीने में एक ट्रक लाया जाता है। टरबाईन की तकनीकी खराबी दूर करने में काफी परेशानी होती है। कलकता तक जाकर मैकेनिक लाना पड़ता है। सरकार इस तरह के तकनीक को परिमार्जित कराकर नहरी क्षेत्रों में लघु उधोग के रूप में स्थापित करने हेतु अगर प्रोत्साहित करे तो जल-उर्जा से नहरी इलाकों में लघु-उधोग का जाल बिछाया जा सकता है। तरक्की की नई राह खुल सकती है। दूर्दशा से मुक्ति प्राप्त हो सकती है।


 सरसों नहीं राई की होती है पेराई

डा.प्रकाशचंद्रा कहते हैं कि शुद्धता व गुणवत्ता के लिए यहाँ सरसों नहीं राई की पेराई होती है। इसलिए बाजार में मूल्य प्रतिष्पर्धा करना मुश्किल होती है। बाजार में टिके रहने के लिए नई तकनीक इस्तेमाल करना होगा, स्पेलर बिठाना होगा किन्तु तब मील का मूल स्वरूप बदल जाएगा। पारिवारिक बंटवारा के कारण पूंजी निवेश को लेकर उदासीनता भी है।


 लगाए जा रहे हैं 12 कोल्हू-उदय शंकर

मील संस्थापकों की तीसरी पीढ़ी के डेहरी में रह रहे उदय शंकर बताते हैं कि यहां अब फिल्टर लगा दिया गया है। शुद्धता की गारंटी है। और 12 कोल्हू लगाए जा रहे हैं। दो को इंस्टाल कर दिया गया है। दस शीघ्र ही इंस्टाल किया जाएगा। इसके बाद आठ कोल्हू और लगाए जाएंगे। पुराने कोल्हू की क्षमता कम हो रही है। इसलिए नया लगाया जा रहा है।

अब भी 23 रुपये वार्षिक शुल्क देय

यहां एक मौसम में एक लाख मन सरसो तेल का उत्पादन होता था। नहर में पानी ग्यारह महीने उपलब्ध होता था। अंग्रेजों के शासन में गया के तत्कालीन कलक्टर से मिल मालिकों का जो समझौता हुआ था, उसके अनुसार मात्र 23 रूपये वार्षिक सिंचाई विभाग को बतौर कर देना पड़ता था। इसके बदले पानी आपूर्ति तथा नहर की उड़ाही की जिम्मेदारी सरकार की थी। यह बाधित है अब। पैसा उतना ही लगता है। सौ साल पुराना दर क्योंकि समझौता अनुसार जब तक यह उद्योग चलेगा पैसा नहीं बढ़ाया जा सकता। पानी अब चार महीने ही मिल पाता है।

Sunday, 31 January 2021

पूर्व में आया है 04 बार अविश्वास प्रस्ताव : रोचक राजनीति और परिणाम जानिए



बिहार में नगर निकाय का चुनाव 1983 में होने के बाद 19 साल तक नहीं हुआ था। वर्ष 2002 में जब राबड़ी देवी मुख्यमंत्री थी तो नगर निकायों का चुनाव शुरू हुआ था। तब तक दाउदनगर नगरपालिका के नाम से जाना जाता था और चुनाव के वक्त वह नगर पंचायत का नाम पाया। वर्ष 2002 से शुरू चुनावी राजनीति में शनिवार 30 जनवरी 2021 से पहले चार बार अविश्वास प्रस्ताव सदन में लाया जा चुका है। जब चुनाव हुआ तो सबसे पहले आयहां 2002 में नारायण प्रसाद तांती और रोहिणी नंदिनी क्रमश: चेयरमैन और वाइस चेयरमैन बने। तब नगर पंचायत में कुल 18 वार्ड पार्षद हुआ करते थे। अप्रैल 2005 में अविश्वास प्रस्ताव आया और नारायण प्रसाद तांती की सत्ता चली गई।  09 जून 2005 को चुनाव हुआ और सावित्री देवी चेयरमैन बन गई। तब रोहिणी नंदिनी लगातार 5 साल तक वाइस चेयरमैन की कुर्सी पर डटी रही। 09 जून 2007 को परमानंद प्रसाद चेयरमैन और अजय कुमार पांडे उर्फ सिद्धि पांडे वाइस चेयरमैन बने। जून 2009 में दोनों के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पारित हो गया। दोनों की सत्ता चली गई लेकिन फिर दोनों क्रमशः चेयरमैन और वायस चेयरमैन बने। 21 सितंबर 2011 को इनके खिलाफ फिर अविश्वास प्रस्ताव आया। दोनों मिल गए और नतीजा परिणाम को अपने पक्ष में लाने में सफल रहे। तब अविश्वास प्रस्ताव गिर गया और दोनों की कुर्सी पूर्ववत बची रही। फिर जब चुनाव हुआ तो 9 जून 12 को धर्मेंद्र कुमार चेयरमैन और कौशलेंद्र कुमार सिंह उप मुख्य पार्षद बने। सिर्फ धर्मेंद्र के खिलाफ जून 2014 में अविश्वास प्रस्ताव आया और यह पारित हुआ। तब 27 जून 14 को परमानंद प्रसाद पुनः मुख्य पार्षद बन गए और कौशलेंद्र कुमार सिंह बिना अविश्वास प्रस्ताव का सामना किये हुए ही दोनों के साथ उप मुख्यपार्षद बने रहे। दोनों ने अपना तय कार्यकाल पूरा किया।



मात्र दो मुख्य पार्षदों को अविश्वास से पड़ा है हटना :

अविश्वास प्रस्ताव को ले कुछ रोचक किस्से 

अप्रैल 2005 में अविश्वास प्रस्ताव सिर्फ नारायण प्रसाद तांती के खिलाफ आया था जो तब चेयरमैन थे, लेकिन रोहिणी नंदनी जो वाइस चेयरमैन थी उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव नहीं आया था। अप्रैल 2005 से चेयरमैन बनी सावित्री देवी के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव कभी नहीं आया। चूंकि अविश्वास प्रस्ताव लाने के लिए 2 वर्ष का कार्यकाल का होना जरूरी है और यह भी शर्त है कि 5 साल की कार्य अवधि पूरी होने के 6 माह पहले तक अविश्वास प्रस्ताव लाया जा सकता है, 06 माह अवधि शेष रहने पर नहीं। इन दोनों शर्तों के कारण सावित्री देवी अविश्वास प्रस्ताव की राजनीति से बची रही। नारायण प्रसाद तांती के समय वाइस चेयरमैन रोहिणी नंदिनी को कभी अविश्वास प्रस्ताव का सामना करना ही नहीं पड़ा। वह श्री तांती के साथ सावित्री देवी के समय भी उप मुख्य पार्षद बनी रही। दो बार अविश्वास प्रस्ताव झेल चुके परमानंद प्रसाद और अजय कुमार पांडे उर्फ सिद्धि पांडे से जुड़ी घटनाएं सबसे रोचक रही हैं। दोनों के बीच टकराव भी रहा और दोनों अविश्वास प्रस्ताव की राजनीति में विजेता बनकर उभरते रहे। नारायण प्रसाद तांती के अलावा सिर्फ धर्मेंद्र कुमार ही ऐसे मुख्य पार्षद रहे जो अविश्वास प्रस्ताव से हटाए गए। दो दशक की इस राजनीतिक यात्रा में इन्हीं दो को अपनी कुर्सी अविश्वास प्रस्ताव के कारण गंवानी पड़ी , वरना रोहिणी नंदिनी तथा कौशलेंद्र कुमार सिंह को अविश्वास प्रस्ताव का सामना ही नहीं करना पड़ा। अजय कुमार पांडेय ने सामना दो बार किया और और दोनों बार विजेता बनकर निकले।



01 बनाम 04 के समर्थन की खूब चर्चा

30 जनवरी 21 को आये अविश्वास प्रस्ताव में एक रोचक घटना घटी जिसकी चर्चा और व्याख्या लोग अपने अपने तरीके से कर रहे हैं। मुख्य पार्षद को एक यानी सिर्फ स्वयं का तो उप मुख्य पार्षद को कुल 04 वार्ड पार्षदों का समर्थन मिला। यह बहुत कुछ कहता है। माना जा रहा है कि अंदरखाने भी आपस में असंतोष हो सकता है। लोग इसकी चर्चा चटखारे लेकर कर रहे हैं। विरोधियों या विपक्षियों का कहना है कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि एक मत मात्र मिला। दूसरे को चार मत मिलने का मतलब है कि आपसी तनाव हो सकता है, खुद को बचाने का एक पक्ष द्वारा अधिक प्रयास किया गया होगा।



विकास जो भी हुआ वह पूर्व बोर्ड का : कौशलेंद्र 


अविश्वास प्रस्ताव लाने वाले पूर्व उप मुख्य पार्षद कौशलेंद्र कुमार सिंह ने परिणाम के बाद मीडिया से बात करते हुए कहा कि विकास कार्य में यह बोर्ड असफल रहा था। विकास कार्यों में लूट और निर्माण कार्य में गुणवत्ता की खराबी के कारण जनाक्रोश काफी था। उन्होंने कहा कि जितने विकास कार्य हो रहे हैं वह सब पूर्व के बोर्ड का की देन है। नाला, सड़क का निर्माण हो, मुख्यमंत्री निश्चय योजना के तहत कार्य हो या बिजली पानी का मामला हो, सभी पूर्व में जो बोर्ड था उसके लिए गए निर्णय के आधार पर काम हो रहे हैं।

क्या पुलिस बड़ों का देती है साथ, कुछ करते हैं गलत काम, एसडीपीओ से जानिए


सामान्य जनता नहीं दुष्कर्मियों में पुलिस का हुआ है भय कम : राजकुमार तिवारी 

फोटो- एसडीपीओ राजकुमार तिवारी 


सब इंस्पेक्टर से एसडीपीओ के पद तक पहुंचे, 32 साल तक पुलिस सेवा में रहे दाउदनगर के एसडीपीओ राजकुमार तिवारी रविवार को सेवा निवृत्त हो गए। उनका स्पष्ट मानना है कि दुष्कर्मियों में पुलिस का भय कम हुआ है। पुलिस की सेवा तपस्या के स्तर पर होनी चाहिए। जनता सूचनाओं एवं व्यवहार का आदान प्रदान करेगी तभी अपराधों के निरोध में पुलिस को सहयोग मिलेगा। कुछ पुलिस अधिकारी भी गलती करते हैं। दैनिक जागरण संवाददाता उपेंद्र कश्यप ने विभिन्न मुद्दों पर उनसे बातचीत की। प्रस्तुत है अंश…


प्रश्न:- पुलिस हमेशा बड़ों के साथ रहती है, कमजोर के साथ नहीं।

उत्तर- अधिकारी के व्यक्तित्व पर यह निर्भर है। अपराध होने के बाद तत्काल प्रतिक्रिया क्या रही। पुलिस को जो सूत्र प्राप्त है उस पर अनुसंधान को विस्तार किया गया कि नहीं। पुलिस पदाधिकारी निष्पक्ष होकर कार्य करता है तो मुझे नहीं लगता कि आरोप लग सकता है। वैसे समाज में कुछ पूर्वाग्रही लोग रहते हैं। उन पर कुछ नहीं कहना। वैसे लोग भी आरोप लगाते हैं जिनके विरुद्ध कभी पुलिस कार्रवाई की हुई होती है। कुछ पुलिस पदाधिकारी भी गलती करते हैं जो जनमानस में गहरे पैठ जाता है।


 प्रश्न -लगातार हत्या और लूट की घटनाएं बढ़ रही हैं ऐसा क्यों है। 

उत्तर-अपराधों को श्रेणियों में वर्गीकृत करने की जरूरत है। आदतन अपराधी द्वारा अपराध, संपत्ति मूलक अपराध, सुपारी के लिए योजना बनाकर हत्या, आपसी विवाद में हत्या। पुलिस पहले से संपत्ति मूलक, योजना और आपसी विवाद वाली हत्याओं पर नियंत्रण प्राप्त नहीं कर सकती, लेकिन आदतन होने वाले अपराध पुलिस के लिए चुनौती होती है। पुलिस सतत प्रयास करती है कि इस पर नियंत्रण पाया जाए। विगत वर्ष में नियंत्रण हुआ भी। मेरा मानना है कि अन्य कारणों से होने वाली हत्या में वृद्धि दिखती है, इसके लिए कई सामाजिक कारण है, जो बदलते परिवेश में इनकी वृद्धि में सहयोगी हैं। जहां तक गिरफ्तारी की बात है, पुलिस नामित, चिन्हित और वांछित अपराधियों को गिरफ्तार करने के लिए सतत प्रयास करते रहती हैं। प्रोवैबिलिटी सबसे महत्वपूर्ण होता है।



 प्रश्न- पुलिस का इकबाल खो गया है, इसलिए अपराध बढ़ रहे हैं और पुलिस पर लोग विश्वास नहीं कर रहे हैं।

 उत्तर -पुलिस की कार्यशैली में गिरफ्तारी महत्वपूर्ण है। एक पुलिस पदाधिकारी के प्रभाव को चिन्हित करने वाला यह तत्व है, यह कर्तव्य का अंश है। हालांकि अनुसंधान अपने आप में सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। पुलिस अपराधियों के लिए बनी है और संज्ञेय अपराधों को परिभाषित करते हुए अधिकार दिया गया है कि पुलिस बिना वारंट के गिरफ्तार कर सकती है। संज्ञेय अपराधों को रोकने से पुलिस का कर्तव्य शुरू होता है। मेरा मानना है कि विगत वर्षों में पुलिस पदाधिकारियों द्वारा गिरफ्तारी उतनी प्रभाव नहीं रही है। यही कारण है कि सामान्य जनता नहीं सिर्फ दुष्कर्मियों में पुलिस का भय कम हुआ है। प्रश्न -32 वर्ष का अनुभव है, पुलिस के लिए क्या कहेंगे।

 उत्तर- कर्तव्य के दौरान जो जीवन भोगा है, उसके मुताबिक चिकित्सक और पुलिस दोनों की सेवा तप के धरातल पर आधारित है। पुलिस पदाधिकारी जब अपने कर्तव्यों के सौ प्रतिशत निर्वहन की स्थिति में होता है तो उसकी सेवा तपस्या के स्तर पर दिखाई पड़ती है। अपने कर्तव्य की अवधि में मैंने अनुसंधान के लिए बीहड़ों में समय गुजारा। कई ऐसे स्थान रहे जहां 3 से 4 दिन तक खाने, पीने, रहने की सुविधा नहीं थी। तब भी लखीसराय के अजय सिरोहा अपहरण कांड, सुमन वर्मा हत्याकांड, बैजनाथ खेमका अपहरण कांड, जिनोरिया बैंक डकैती कांड का अनुसंधान किया। अनुसंधान के दौरान यदि विश्राम कर लिया जाता तो वैसी सफलता नहीं मिलती जैसी मिली। 


प्रश्न -पुलिस और जनता के लिए संदेश।

उत्तर- संदेश है कि आप बिल्कुल व्यवसायिक और तप ले स्तर तक सेवा करने का माद्दा उत्पन्न करें तो जनता हाथों हाथ लेगी। पुलिस पदाधिकारी भी समाज के ही बीच के लोग होते हैं। वह आपकी सुरक्षा व सहयोग के लिए हैं। उनके साथ सूचनाओं एवं व्यवहार का आदान प्रदान करें ताकि अपराधियों के निरोध में पुलिस को सहयोग मिले। कई बार प्रशासन व सरकार के स्तर पर सूचनाओं को सही ढंग से नहीं लिया जाता है या कभी कारगर कार्रवाई नहीं हो पाती है लेकिन तब भी सूचना ही है जो अपराधों के निरोध में महत्वपूर्ण है। जैसे 2000 में राजधानी ट्रेन लूटने के लिए जुटे धावा पुल पर डकैतों के साथ मुठभेड़ के पश्चात उजागर हो गया था कि कुछ अपराधी व नक्सली राजधानी ट्रेन गिराने के लिए प्रयासरत हैं। लेकिन उस पर उनके स्थानांतरण के बाद किसी ने ध्यान नहीं दिया और बाद में राजधानी ट्रेन पलटने की घटना हुई।

Saturday, 30 January 2021

किन कारणों से गिरी दाउदनगर नप की सत्ता

 


968 दिन में बाहरी व्यक्ति के हस्तक्षेप के कारण गंवानी पड़ी सत्ता 

सशक्त स्थाई समिति की राजनीति भी महत्वपूर्ण 

विकास कार्यों में मनमानी से शर्मसार हो रहे थे वार्ड पार्षद 

जन आक्रोश और जन दबाव भी सत्ता के विरुद्ध गोलबंदी का कारण 


उपेंद्र कश्यप । दाउदनगर (औरंगाबाद)

नगर परिषद की सत्ता गंवाने वाली मुख्य पार्षद सोनी देवी और उप मुख्य पार्षद पुष्पा देवी 9 जून 2018 को सत्ता हासिल करने में सफल रही थी। तमाम तरह के आरोपों, विवादों और चर्चाओं के बावजूद सत्ता चली आ रही थी। क्योंकि दो वर्ष का कानूनी लॉकिंग पीरियड रहता है। कायदे से 9 जून 2020 के बाद कभी भी अविश्वास प्रस्ताव लाया जा सकता था। पूर्व में कौशलेंद्र कुमार सिंह द्वारा अविश्वास प्रस्ताव लाने की कोशिश भी की गई थी लेकिन सफलता नहीं मिली। अब 968 वें दिन उनको कामयाबी मिली और दोनों के हाथ से सत्ता चली गई। शहर में इस बात की चर्चा जोर शोर से है कि सत्ता गई तो क्यों गई। जबकि मुख्य पार्षद सोनी देवी के ससुर यमुना प्रसाद पूर्व में चेयरमैन रह चुके हैं और खुद बहुत ही प्रभावशाली और प्रतिष्ठित व्यक्ति माने जाते हैं। एक अधिकारी के अनुसार नगर परिषद के कर्मचारियों और तमाम वार्ड पार्षदों द्वारा उन्हें काफी मान सम्मान दिया जाता रहा और उनकी प्रतिष्ठा का ख्याल रखता हुआ हर कोई दिखता था। सवाल है कि फिर भी सत्ता क्यों चली गई। नगर परिषद परिसर में शनिवार के दिन जो चर्चा रही उसके मुताबिक इसकी सबसे बड़ी वजह बाहरी व्यक्तियों की दखल रही। बाहरी व्यक्तियों की मनमानी, रौबदार दखल, किसी भी वार्ड पार्षद को झिड़क देना, पार्षदों को कोई अपेक्षित सम्मान नहीं देना, कुछ पार्षदों के साथ अभद्रता के साथ पेश आना प्रमुख कारण बना। असंतोष की चिंगारी यहीं से राख के नीचे जमा होती गयी और अंततः विस्फोटक बन गया। नगर परिषद परिसर में हुई चर्चा के मुताबिक सशक्त स्थाई समिति के दो सदस्यों तारिक अनवर और सुमित्रा साव से मौखिक वादा किया गया था कि उन्हें ढ़ाई साल तक इस पद पर बने रहने दिया जाएगा, लेकिन करीब 2 महीना पूर्व दोनों को हटा दिया गया और इनकी जगह सीमन कुमारी और हसीना खातून को सशक्त स्थाई समिति का सदस्य बना दिया गया। महत्वपूर्ण है कि तारिक अनवर और उनकी मां शकीला बानो वार्ड पार्षद हैं। इस कारण उनकी ताकत किसी भी वार्ड पार्षद से दोगुणा है। सुमित्रा साव विपक्ष की राजनीति में उप मुख्य पार्षद संभावित है। इसलिए दोनों कौशलेंद्र सिंह के पाले में चले गए। अविश्वास प्रस्ताव पर हुआ मतदान यह बताता है कि सीमन कुमारी और हसीना खातून ने भी मुख्य पार्षद को अपना समर्थन नहीं दिया। संभव है दोनों ने उप मुख्य पार्षद को भी अपना समर्थन न दिया हो, हालांकि इसकी पुष्टि नहीं की जा सकती, क्योंकि उप मुख्य पार्षद को चार मत जबकि मुख्य पार्षद को मात्र एक मत ही प्राप्त हुआ है। कुछ पार्षदों के अनुसार विकास कार्यों में मनमानी होती थी  विभागीय कार्य में लूट मचा हुआ था। एक वार्ड पार्षद ने बजाप्ता पचाकठवा सड़क का उदाहरण दिया। काम की गुणवत्ता खराब होने के कारण जनता में आक्रोश था। एक वार्ड पार्षद का कहना था कि जिस तरह से कार्य किए जा रहे थे और सोशल मीडिया से लेकर मौखिक बातचीत में जनता जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल करती थी उससे पार्षदों को अपनी प्रतिष्ठा बचानी मुश्किल हो गई थी। संभव है यही कारण रहे हों कि मुख्य पार्षद और उप मुख्य पार्षद के विरुद्ध गोलबंदी इस हद तक हुई कि परिणाम देखकर कई तरह के सवाल उठने लगे हैं।



 दो मतपत्र अवैध का रहस्य क्या 

नगर परिषद में मुख्य पार्षद और उप मुख्य पार्षद दोनों के ही खिलाफ लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर हुए मतदान में 1-1 मतपत्र अवैध घोषित किए गए। यह मानना कठिन है कि यह अज्ञानता वश हुआ हो। चर्चा के अनुसार यह नफरत का परिणाम है। दोनों मतपत्र पर प्राप्त जानकारी के अनुसार अविश्वास प्रस्ताव के पक्ष में और विपक्ष में भी मत दिया गया, इस कारण दो मत रद्द घोषित हुआ। माना यह जा रहा है कि यह नफरत की वजह से हुआ और साथ रहते हुए भी साथ न देने का उदाहरण है।


 विकास जो भी हुआ वह पूर्व बोर्ड का : कौशलेंद्र 

अविश्वास प्रस्ताव लाने वाले पूर्व उप मुख्य पार्षद कौशलेंद्र कुमार सिंह ने परिणाम के बाद मीडिया से बात करते हुए कहा कि विकास कार्य में यह बोर्ड असफल रहा था। विकास कार्यों में लूट और निर्माण कार्य में गुणवत्ता की खराबी के कारण जनाक्रोश काफी था। उन्होंने कहा कि जितने विकास कार्य हो रहे हैं वह सब पूर्व के बोर्ड का की देन है। नाला, सड़क का निर्माण हो, मुख्यमंत्री निश्चय योजना के तहत कार्य हो या बिजली पानी का मामला हो, सभी पूर्व में जो बोर्ड था उसके लिए गए निर्णय के आधार पर काम हो रहे हैं।

चली गई नगर परिषद में मुख्य पार्षद और उप मुख्य पार्षद की कुर्सी

 

दोनों के विरुद्ध आया अविश्वास प्रस्ताव हुआ पारित 

मुख्य पार्षद को


एक तो उप मुख्य पार्षद को मिला 4 का समर्थन

27 सदस्यीय सदन में उपस्थित हुए मात्र 19 पार्षद 


नगर परिषद के मुख्य पार्षद सोनी देवी और उप मुख्य पार्षद पुष्पा देवी की कुर्सी चली गई। दोनों के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव शनिवार को पारित हो गया। जिला पदाधिकारी द्वारा नियुक्त पर्यवेक्षक एसडीओ कुमारी अनुपम सिंह की देखरेख में कार्यपालक पदाधिकारी जमाल अख्तर की उपस्थिति में सदन की कार्यवाही 1:00 बजे शुरू हुई। वार्ड पार्षद बसंत कुमार के प्रस्ताव पर और अन्य वार्ड पार्षदों की सहमति से अविश्वास प्रस्ताव लाने वाले कौशलेंद्र कुमार सिंह की अध्यक्षता में सदन की कार्यवाही हुई। अविश्वास प्रस्ताव में लगाए गए आरोप को अध्यक्ष सोनी देवी ने निराधार और बेबुनियाद बताते हुए खारिज कर दिया। मासिक बैठक ना बुलाए जाने के आरोप पर उन्होंने कहा कि कोरोना संक्रमण के कारण मासिक बैठक नियमित नहीं की जा सकी। इसके बाद कार्रवाई को आगे बढ़ाते हुए सबसे पहले मुख्य पार्षद के खिलाफ लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर मतदान हुआ और फिर उप मुख्य पार्षद के विरुद्ध लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर मतदान हुआ। पर्यवेक्षक एसडीएम कुमारी अनुपम सिंह ने बताया कि मुख्य पार्षद को हटाए जाने के पक्ष में 17 और विपक्ष में एक मत पड़ा जबकि एक मत अवैध घोषित किया गया। इसी तरह उप मुख्य पार्षद पुष्पा देवी को हटाए जाने के पक्ष में 14 और विपक्ष में 4 मत पड़े। एक अवैध हुआ। बताया कि अध्यक्षता कर रहे कौशलेंद्र कुमार सिंह ने भी अपना एक दिया था।



27 में ये 19 वार्ड पार्षद रहे उपस्थित 

दाउदनगर नगर परिषद में कुल 27 वार्ड पार्षद हैं। मुख्य पार्षद सोनी देवी (18) और उप मुख्य पार्षद पुष्पा देवी (25) समेत मात्र 19 वार्ड पार्षद ही इस अविश्वास प्रस्ताव को लेकर होने वाली बैठक में शामिल हुए। इसमें हसीना खातून (08), सुशीला देवी (14), रीना देवी (20), लीलावती देवी (17), ललिता देवी (16), ममता देवी (15), मीनू सिंह (12), सुमित्रा साव (09), सीमन कुमारी (02), बसंत कुमार (05), नंदकिशोर चौधरी (22), प्रमोद कुमार सिंह (11), राजू राम (07), सतीश कुमार (27), शकीला बानो (04) और कौशलेंद्र कुमार (24) उपस्थित रहे। कोष्ठक में वार्ड संख्या अंकित है।


अविश्वास व्यक्त करने वाली एक पार्षद अनुपस्थित 

मुख्य पार्षद और उप मुख्य पार्षद दोनों के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव लाने वाले पत्र पर 12 वार्ड पार्षदों के हस्ताक्षर थे। जिसमें से वार्ड संख्या 01 की और सबसे वयोवृद्ध पार्षद जागेश्वरी देवी सदन की कार्यवाही में शामिल नहीं हुईं। वे अनुपस्थित रहीं। इनके अलावा सभी 11 पार्षद इस सदन में उपस्थित रहे।


टाइम लाइन

12.20 बजे कार से आये कौशलेंद्र कुमार सिंह एवं बसंत कुमार मास्क लगाए हुए।

( एक कर्मी का कमेंट- ना का बोलेंगे आज?)

12.26 बजे नारायण प्रसाद तांती तीन वार्ड पार्षद को लेकर परिसर में स्कॉर्पियो से आये

12.40 बजे एसआई अमरेंद्र कुमार के नेतृत्व में पहुंची पुलिस

12.55 में एसडीओ कुमारी अनुपम सिंह परिसर में आईं। 

1.00 बजे प्रधान सहायक राम इन्जोर तिवारी ने दरवाजे के बाहर तक जाकर एलान किया कि यदि कोई पार्षद हों, तो आ जाएं। कार्रवाही शुरू होने वाली है।

1.01 बजे सीमन कुमारी और हसीना खातून आईं। कुल 19 पार्षद सदन में उपस्थित हुए।

1.03 बजे एसडीओ कुमारी अनुपम सिंह ने कहा-लगातार वीडियोग्राफी करते रहना।

1.05 बजे सदन की कार्रवाई शुरू

1.15 बजे सीओ स्नेहलता देवी नप परिसर में आईं। 

2.20 बजे मुख्य पार्षद के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पारित। मतपत्र सील की प्रक्रिया पूरी।

2.45 बजे उप मुख्य पार्षद के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पारित, मतपत्र सील।