Friday, 28 February 2025

आधुनिक मशीनों के साथ न बढ़ने से बंद हो गया बर्तन उद्योग

 बदलता शहर 19





अब सुनाई नहीं देता कभी सोन तक जाने वाला ठक-ठक का समृद्धि गीत 

वर्ष 1920 से 1960 के दशक में यहां बनते थे बड़े पैमाने पर बर्तन

कभी शहर में लगाए गए थे तीन बेलन मिल

उपेंद्र कश्यप, जागरण ● दाउदनगर (औरंगाबाद) : उत्तर प्रदेश में मिर्जापुर की तरह ही कभी समृद्ध हुआ करता था दाउदनगर का पीतल बर्तन उद्योग। यह आज पूरी तरह समाप्त हो गया है, जबकि बिहार के ही आरा के नजदीक परेव में बर्तन उद्योग बड़े स्तर का है। वास्तव में समय के साथ मशीनीकरण के दौड़ में पीछे रह जाने के कारण बर्तन उद्योग पिछड़ता चला गया और अंततः समाप्त हो गया। बदलते दौर और मिजाज के साथ न चल पाने का खामियाजा इस उद्योग को भुगतना पड़ा। दाउदनगर में पूर्व दिशा से दो जातियां आई थीं। कसेरा जो पीतल का काम करते थे और ठठेरा जो कासकूट (लोटा) बनाने का काम करते थे। यहां तमेढ़ा जाति की बसावट नहीं है। यह जाति तांबा का काम करती है। यहां तांबा का बर्तन नहीं बनता था। शुक्र बाजार ठाकुरबारी से लेकर नगर पालिका तक और पूर्व में बम रोड तक कसेरा एवं ठठेरा बसे हुए थे। अब भी हैं। बम रोड में भी कभी इनकी आबादी थी, अब नहीं है। यहां का इतिहास देखें तो एक जमाना ऐसा था खासकर वर्ष 1920 के बाद से लेकर 1960 के दशक तक यहां का बर्तन उद्योग चरम पर था। बर्तन बनने से उपजने वाली ठक-ठक की आवाज कहते हैं सोन उस पर नासरीगंज तक सुनाई रात में पड़ती थी। अब ऐसी आवाज ही नहीं निकलती क्योंकि काम ही नहीं होता है। वर्ष 1965 में जब भारत चीन युद्ध हुआ था तब सैनिकों के लिए भी यहां के बने बर्तन भेजे गए थे। वर्ष 1910 में सिपहां में संगम साहब राम चरण राम आयल एंड राइस मिल की स्थापना हुई थी। उसी के बाद यहां तीन रोलिंग या बेलन मिल लगाया गया था। शुक बाजार में उमाशंकर जगदीश प्रसाद रोलिंग मिल, हनुमान मंदिर के नजदीक श्री राम बेलन मिल और चावल बाजार में संगम साहब रामचरण साव रोलिंग मिल लगाया गया था। इससे बर्तन निर्माता को काफी सहूलियत हुई और बर्तन उद्योग यहां कुटीर उद्योग बन गया था। इसकी काफी चर्चा रही है। लेकिन अब सब बर्बाद हो गया तो कई बार इसे बेहतर या समृद्ध करने की राजनीतिक कोशिश हुई लेकिन वह हमेशा अपर्याप्त ही साबित हुई।


30 दुकानदार, 20 करोड़ का कारोबार 

शहर में बर्तन बिक्री की लगभग 30 दुकान हैं। अब यह दुकानदार यहां पीतल व कांसा के बर्तन आरा के समीप स्थित परेव, उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर और हरियाणा के जगाठरी एवं अन्य स्थानों से खरीद कर बिक्री के लिए लाते हैं। बर्तन दुकानदारों की मानें तो एक साल में लगभग 20 करोड रुपये का कारोबार दाउदनगर में बर्तन व्यवसायी करते हैं।


एक निर्माता, चार पालिश कर्ता  

शहर में बर्तन उद्योग खत्म हो गया लेकिन भोला कसेरा अभी भी ऐसे हैं जो हांडी (पीतल का तसला) बनाते हैं। इनके अलावा कृष्णा कसेरा, टना लाल, विष्णु कसेरा, और बेनी लाल ऐसे हैं जो पुराने बर्तनों को पालिश कर चमकाने का काम करते हैं।




पटवट से गगनचुंबी हुआ मंदिर, बढ़ी धार्मिक गतिविधियां

 बदलता शहर 18




76 वर्ष में परिवर्तित हो गया धार्मिक वातावरण

शहर में धर्म, कर्म व ऊर्जा का केंद्र बन गया हनुमान मंदिर 

उपेंद्र कश्यप, जागरण ● दाउदनगर (औरंगाबाद) : 76 वर्ष अर्थात लगभग आठ दशक में शहर की धार्मिक गतिविधियों, वातावरण और आस्था के केंद्रों में काफी परिवर्तन हुआ है। शहर में धर्म, कर्म और सकारात्मक ऊर्जा का केंद्र बिंदु बनकर उभरा है बाजार स्थित शहर का मुख्य हनुमान मंदिर। यहां प्रतिदिन निरंतर श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ती जा रही है और उसी अनुपात में आस्था भी। शहरी ही नहीं बल्कि आसपास के बड़े क्षेत्र के लोग जब दो पहिया, चार पहिया या कोई भी नया वाहन खरीदने हैं तो यहां उसकी पूजा अर्चना करते हैं। जन्मदिन हो या विवाह का वर्षगांठ, सपरिवार लोग यहां आकर ईश्वर के आगे श्रद्धा नवत होते हैं और ईश्वर से आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। यहां हनुमान मंदिर का निर्माण तो 1949 में ही हो गया था। तब पटवट था। बीते 76 वर्ष में काफी कुछ परिवर्तित हो गया। मंदिर अब गगनचुंबी हो गया। पटना हनुमान मंदिर की अनुकृति है यह मंदिर। अब सिर्फ यहां बजरंगबली नहीं बल्कि मां दुर्गा, राधा-कृष्ण, शिव-पार्वती, लक्ष्मी-नारायण, काली मां की अष्टभुजी, भगवान धन्वंतरि की प्रतिमाएं धीरे-धीरे कर श्रद्धालुओं ने स्थापित कर दी। मंदिर का पूरा स्वरूप ही अब बदल गया है। इस मंदिर के ठीक सामने की जगह में भी निर्माण का काम हो रहा है। मंदिर संचालकों की योजना बड़ी है और जिस दिन यह मूर्त रूप होगा पाएगा, उस दिन आस्था के इस केंद्र का महत्व और भव्य व विराट हो जाएगा।



स्थापित की जानी है ये प्रतिमाएं


हनुमान मंदिर कमिटी के सचिव व मुख्य पूजा व्यवस्थापक पप्पू गुप्ता बताते हैं कि मंदिर के सामने भी निर्माण कार्य हो रहा है। इसमें प्रथम तल पर राम दरबार की प्रतिमाएं और भूतल पर गणेश की प्रतिमा इसी वर्ष अगस्त के बाद कभी भी स्थापित की जानी है। आगे चलकर दूसरे तल पर महर्षि बाल्मीकि और संत तुलसीदास की प्रतिमा स्थापित की जानी है। 



ऐसे आरंभ हुई मंदिर निर्माण की बात


यहां पहले से जो हनुमान मंदिर था वह पटवट का था। ऊपर तले पर करकट लगा हुआ था। मंदिर जीर्णोद्धार की बात चली तो किसी ने कहा कि मंदिर निर्माण की बात वही करेगा जो 125 रुपये का चंदा देगा। मंदिर निर्माण को लेकर तब सक्रिय सुनील केसरी बताते हैं कि यमुना प्रसाद स्वर्णकार, नंदलाल प्रसाद, रामजी प्रसाद केसरी, लक्ष्मीनारायण स्वर्णकार, कुमार नरेंद्र देव, रमेश कुमार, राजा राम प्रसाद, नारद प्रसाद, बीरेंद्र प्रसाद सर्राफ, सत्यनारायण प्रसाद उर्फ मुनमुन और अन्य लोग जुटे। कृष्णा प्रसाद स्वर्णकार और कुमार नरेंद्र देव को मंदिर का नक्शा बनाने की जिम्मेदारी दी गई। शिलान्यास कार्यक्रम के लिए चंदा इकट्ठा किया गया और फंड जुटाने के लिए सिनेमा हाल में चैरिटी शो हुआ। फिर बात आगे तक चली गई।



खानदानी कोठीवाल थे मंदिर निर्माता बाबा हरिदास


विक्रम संवत 2006 यानी वर्ष 1949 के अक्षय तृतीया तिथि को बाबा हरिदास ने हनुमान मंदिर की स्थापना करायी थी। इनके खानदान और मंदिर कमेटी से जुड़े सुरेश कुमार गुप्ता ने बताया कि बाबा हरिदास के पिताजी का नाम गणेश प्रसाद कसौंधन था। वह शुक बाजार के स्थाई निवासी थे। खानदानी कोठीवाल थे। यानी हुंडी और बिल का काम करते थे। बचपन से ही वे बैरागी स्वभाव के थे इसलिए उन्होंने विवाह नहीं किया। जिस जमीन पर मुख्य मंदिर स्थापित है वह जमीन इनकी खानदानी जमीन थी। बंटवारा में मंदिर की जमीन किसी के हिस्से नहीं लगी। जो जमीन बाबा हरिदास जी के हिस्से में थी उसे बेचकर मंदिर बनाने के लिए खर्च कर दिया था। काफी समय तक बाबा हरिदास ही मंदिर के पुजारी रहे थे। 



22 फरवरी 1988 को जीर्णोद्धार


वर्तमान भव्य मंदिर के जीर्णोद्धार के लिए 22 फरवरी 1988 को आइपीएस अधिकारी किशोर कुणाल ने आधारशिला रखी थी। 

उन्होंने पहले ना कहा कहते हुए कहा कि लोग विवादित जमीन पर शिलान्यास करा लेते हैं जिससे उनकी बदनामी होती है। इसके बाद जब उन्हें पूरी बात बताई गई तो आश्वस्त हुए और तब वे समय दे सके। तब कुमार नरेंद्र देव वाहन लेकर श्री कुणाल को लेने पटना गए थे। बाइक रैली निकाली गई। लखन मोड़ पर ही वे महिलाओं के आग्रह पर वाहन से नीचे उतर कर मंदिर स्थल तक पैदल गए और शहर में ‘जब तक सूरज चांद रहेगा कुणाल तेरा नाम रहेगा’, किशोर कुणाल अमर रहे जैसे नारे बुलंद होते रहे।






Tuesday, 25 February 2025

सवारियों को हाथ रिक्शा नहीं अब ढ़ो रहा ई रिक्शा

 बदलता शहर 17



शहर में आवागमन के लिए तकनीकी सुविधाएं बढ़ी

हर घर से कुछ दूरी पर ई रिक्शा उपलब्ध

 उपेंद्र कश्यप, जागरण ● दाउदनगर (औरंगाबाद) : शहर में कभी हाथ रिक्शा ही सवारी ढ़ोने का इकलौता उपलब्ध साधन हुआ करता था। चाहे बस पकड़ने के लिए बस स्टैंड जाना हो या स्वास्थ्य सुविधा के लिए अस्पताल जाना हो। या फिर किसी अन्य काम से शहर के एक हिस्से से दूसरे हिस्से जाना हो। रिक्शा ही शहर में एकमात्र साधन हुआ करता था। हाथ रिक्शा से जुड़े कई किस्से भी शहर में आज भी लोग चर्चा करते हैं। जब धीरे-धीरे परिवहन के क्षेत्र में विकास हुआ, आधुनिकता आई तो पहले आटो ने शहर में आकर हाथ रिक्शा को रिप्लेस कर दिया। लगभग हाथ रिक्शा विलुप्त होते चले गए। बीते दशक में यह परिवर्तन ऐसा हुआ, ऐसा छा गया ई रिक्शा कि आज शहर में एक भी हाथ रिक्शा देखने के लिए भी नहीं मिलता। कुछ रिक्शावानों ने भी ई-रिक्शा खरीद ली। अब हर गली मोहल्ले में या घर से बमुश्किल आधा किलोमीटर की दूरी पर ई रिक्शा शहर में बहुत ही सहजता से उपलब्ध है।



सुविधा के साथ कठीनाई भी बढ़ी


आधुनिक विकास के साथ शहर में यातायात मुश्किल होती गयी। ई रिक्शा वाले बड़ी समस्या बनकर शहर में उभर गए हैं। स्थिति यह है कि जहां भी सड़क से टी बनाती हुई कोई संपर्क पथ है, वहीं पर ई रिक्शा खड़ा कर देते हैं। हर मोड़ पर ई-रिक्शा रोक कर सवारी चढ़ाते उतारते हैं। नतीजा दुर्घटना की आशंका बनी रहती है। आना जाना कठिन होता चला गया। बाइक वालों को संभल कर चलना होता है, अन्यथा दुर्घटनाएं प्रायः हो सकने का खतरा होता है। 


ई रिक्शा वालों पर नियंत्रण में प्रशासन नाकाम


ई रिक्शा वालों पर नियंत्रण में प्रशासन नाकाम रहा है। जब यहां अनुमंडल पदाधिकारी के रूप में कुमारी अनुपम सिंह पदस्थापित थी तो उन्होंने कई बार ई रिक्शा वालों के साथ बैठक की। उन्हें चेतावनी दी। ड्रेस कोड लागू करने, लाइसेंस लेने, ई-रिक्शा पर चालक का नाम और मोबाइल नंबर लिखने की बात की गयी। लेकिन यह सब कभी भी अमल में नहीं आ सका। नतीजा ई रिक्शा चालकों के पास ना कोई ड्रेस कोड है ना उनकी कोई पहचान बताती आई कार्ड या ई रिक्शा पर नाम और पते या मोबाइल नंबर लिखे हुए हैं।


अभियान चलाकर होगी कार्रवाई

एसडीओ मनोज कुमार ने कहा कि ई-रिक्शा वालों के खिलाफ यातायात बेहतर करने के उद्देश्य से अभियान चलाया जाएगा। जागरूक करने का प्रयास किया जाएगा। कानून सम्मत कार्रवाई भी की जाएगी।




दाउदनगर और नासरीगंज को सोनप से मिला आर्थिक संबल

 बदलता शहर 16



1100 करोड रुपये की परियोजना में 600 करोड सिर्फ भूमि अधिग्रहण पर खर्च 

रोहतास और औरंगाबाद के क्षेत्र में बढ़ी व्यापारिक गतिविधियां

पशुलालकों, किसानों, फल, दूध, शब्जी समेत अन्य सामग्री आते हैं बेचने

 उपेंद्र कश्यप, जागरण ● दाउदनगर (औरंगाबाद) : वर्ष 2019 में दाउदनगर नासरीगंज सोनपुल का निर्माण कार्य हुआ। इससे दाउदनगर के साथ नासरीगंज यानी रोहतास और औरंगाबाद के बड़े हिस्से को आवागमन की बड़ी सुविधा मिली। पहले दाउदनगर और नसीरगंज के बीच यातायात का एकमात्र साधन नाव यातायात हुआ करता था। या फिर दाउदनगर से बारुण व डेहरी होकर नासरीगंज जाना आना पड़ता था। इससे सिर्फ रिश्तेदारियां निभाई जाती थी। व्यापारी गतिविधियां अमूमन नहीं होती थी। जब पुल का निर्माण हुआ, आवागमन की सुविधा सहज हुई तो व्यापारी गतिविधियां भी बढ़ गई। दाउदनगर का बाजार हो या नासरीगंज का बाजार दोनों बाजारों की रौनक बढ़ गई। लगभग 1100 करोड रुपये इस पुल और संपर्क पथ निर्माण की परियोजना पर खर्च हुआ। इसमें लगभग 600 करोड रुपये तो सिर्फ भू अर्जन पर खर्च हुआ। यह राशि निश्चित रूप से उनको मिली जिनकी जमीनों से कुछ हिस्सा पुल और संपर्क पथ निर्माण के लिए लिया गया। निश्चित रूप से यह लोग स्थानीय हैं। स्वाभाविक है कि जब 600 करोड रुपये की राशि किसानों के पास गई तो बाजार को भी इसका एक हिस्सा प्राप्त हुआ। लगभग 10 किलोमीटर की दूरी के कारण नासरीगंज के व्यवसाई दाउदनगर से व्यापार करने लगे। जो पहले डेहरी या अन्यत्र बाजार जाते थे। इससे दाउदनगर बाजार को काफी आर्थिक मजबूती मिली। शहर में और इसके आसपास से सवारी वाहन हो या चार पहिया वाहन उनकी आवाजाही तो बढ़ी ही मालवाही ट्रकों का भी आवागमन काफी बड़े पैमाने पर शुरू हुआ। खासकर बालू का व्यापार इस के जरिए होने लगा। पुल के दोनों किनारों पर बाजार सज गए। और इससे लोगों को न सिर्फ रोजगार मिला बल्कि अच्छी आमदनी का यह पुल स्रोत भी बन गया। स्थिति यह है कि या शहर में हर आयोजन में इस रास्ते रोहतास के नजदीकी क्षेत्र से लोग पहुंच कर यहां के कार्यक्रमों, उत्सवों, समारोहों में शामिल होते हैं। इससे बाजार को नई गति, ऊर्जा और ताकत मिल रही हैं। पशुपालकों, किसानों के साथ फल, शब्जी, दूध समेत कई सामग्री बेचने वाले दाउदनगर सोन पुल पार कर आते हैं और कमाई करते हैं।




सोन पर यहां बना है पुल

बिहार शरीफ से डुमरांव तक जाने वाली 92 किलोमीटर लंबी एनएच 120 पर दाउदनगर और नासरीगंज के बीच सोन पुल का निर्माण हुआ है। यह निर्माण बीआरपीएनएल (बिहार राज्य पुल र्निर्माण निगम लिमिटेड) द्वारा कराया गया है। 



इस पथ का नाम एनएच 120 इसलिए


बिहार में राष्ट्रीय उच्च पथ 20 बख्तियारपुर से उड़ीसा के सातभाया तक जाती है। यह 658 किलोमीटर लंबी है। इसी एनएच की शाखा सड़क है एनएच 120 जो बिहार शरीफ से डुमरांव तक जाती है। क्योंकि एनएच 20 की यह शाखा मार्ग है इसीलिए इसका नाम एनएच 120 है। एनएच 120 कुल 92 किलोमीटर यानी 57 मील लंबा है। जो बिहार शरीफ से शुरू होकर डुमरांव तक पहुंचता है। इसमें बिहार शरीफ के बाद नालंदा, राजगीर, हिसुआ, गया, दाउदनगर, नासरीगंज, काराकाट, बिक्रमगंज, नारायणपुर, मलिहाबाद और नवानगर प्रमुख स्थान पढ़ते हैं।


55 वर्ष बाद हुआ उच्च शिक्षा का सपना पूरा

 बदलता शहर 15




इकलौता अंगीभूत कालेज है दाऊदनगर महाविद्यालय 

पांच विषयों में जुलाई से होगी पढ़ाई 

बहुजनों तक उच्च शिक्षा की बढ़ी पहुंच

उपेंद्र कश्यप, जागरण ● दाउदनगर (औरंगाबाद) : यह किसी सपने के पूरा होने से कम नहीं है। जब दाउदनगर कालेज में आने वाले सत्र से पांच विषयों में पीजी की पढ़ाई प्रारंभ होगी। आमतौर पर नए सत्र का प्रारंभ एक जुलाई से मगध विश्वविद्यालय में होता है। उम्मीद की जा रही है कि इसी तिथि से पांच विषयों में पढ़ाई प्रारंभ हो जाएगी। लेकिन यह यात्रा अभी पूरी नहीं होगी। कला की पढ़ाई की सुविधा तो मिली लेकिन विज्ञान में एक सिरे से शून्यता अभी बरकरार है। आने वाले वक्त में विज्ञान में भी पीजी की पढ़ाई हो सकेगी। इसकी उम्मीद भर की जा सकती है। क्योंकि जब इन विषयों के उद्घाटन से संबंधित समारोह में क्षेत्रीय सांसद राजाराम सिंह को संबोधन का मौका मिला तो उन्होंने इस ओर इशारा किया। कहा-कला के बिना विज्ञान समृद्ध नहीं हो सकता। और उनकी ओर देखते हुए कुलपति डा.शशि प्रताप शाही मुस्कुरा भर गए। जरा कल्पना करिए कि जब शहर में माध्यमिक शिक्षा की व्यवस्था अपर्याप्त थी, तभी दो सितंबर 1970 को शहर के नौजवानों ने एक सपना देखा था और महाविद्यालय स्तर पर पढ़ाई की व्यवस्था आरंभ की थी। आज उनके सपने साकार हो रहे हैं तो प्रतिदान में दाउदनगर महाविद्यालय भी उन्हें कुछ दे रहा है। महाविद्यालय के प्रिंसिपल एम शम्सुल इस्लाम ने घोषणा की है कि एक से दो महीने के अंदर महाविद्यालय परिसर में भगत सिंह के साथ महाविद्यालय की बुनियाद में शामिल डा. राम परीक्षा यादव और डा. शमसुल हक की प्रतिमा स्थापित की जाएगी। अनुमण्डल के एकमात्र अंगीभूत महाविद्यालय की स्थापना डा. रामपरीखा यादव, डा. शमशुल हक, डा. श्याम देव प्रसाद, ऋकेश्वर प्रसाद एवं अन्य ने दो सितम्बर 1970 को किया था। तब बाजार स्थित हमदर्द दवाखाना मैदान में स्थित बरियार साहब के मकान (अभी यहां यश एकेडमी चलता है) में शुरु किया गया। बिहटा कालेज में लेक्चरर गजबदन शर्मा पहले प्राचार्य बने जो पिसाय के निवासी थे। उन्होंने यहां डा.(अब स्व.) श्याम देव प्रसाद को कालेज खोलने के लिए प्रेरित किया, तत्पश्चात तत्कालीन प्रोजेक्ट एक्सक्युटिव आफिसर जुबैर अहमद ने भी रूचि ली और कालेज वजूद पा गया। सत्येन्द्र नारायण सिंहा ने उद्घाटन किया था। वे बाद में मुख्यमंत्री बने थे। यहां से कालेज नीमा में धरणी सिंह के घर में चला। फिर 1976 में प्रार्चाय प्रो. रूपनारायण सिंह के प्रयास से वर्तमान निजी भवन की आधारशीला रखी गयी। 



तब ग्रेजुएट बनना था बहुत बड़ा सपना

बहुजनों तक उच्च शिक्षा पहुंचाने का यह प्रथम प्रयास था। इससे पहले यहां के लोगों के लिए ग्रेजुएट बनना सपना था। समृद्ध तबका औरंगाबाद, गया, पटना या अन्यत्र स्थानों पर जाकर उच्च शिक्षा ग्रहण किया करता था। इस कालेज की स्थापना ने बड़ी जनसंख्या के लिए उच्च शिक्षा का मार्ग प्रशस्त किया। 


अब तीन और डिग्री कालेज

अब शहर में मगध विवि से स्थायी संबद्धता प्राप्त महिला महाविद्यालय के अलावा, प्रस्वीकृति प्राप्त के.के.मंडल साइंस कालेज और प्रस्वीकृति प्राप्त व बिहार सरकार से मान्यता प्राप्त रामरति सुंदर शीला महाविद्यालय अंछा संचालित होता है। इससे बड़ी आबादी तक ग्रेजुएट स्तर की शिक्षा पहुंचने लगी।


Sunday, 23 February 2025

लगभग 300 साल प्राचीन है शुकबाजार का शिव मंदिर

महाशिवरात्रि को लेकर शिवालय का हो रहा है रंग रोगन 



कई बार सड़क निर्माण से मंदिर में उतरने की बनी स्थिति 

संवाद सहयोगी, जागरण ● दाउदनगर (औरंगाबाद) : 26 फरवरी को महाशिवरात्रि है। इसे लेकर तमाम शिवालयों के रंग रोगन और मरम्मत या सुंदरीकरण के कार्य होने लगे हैं। शहर के शुक बाजार स्थित शिव मंदिर का भी रंग रोगन हो रहा है। यह मंदिर कितना पुराना है या बताता हुआ कोई शिलालेख मंदिर में नहीं है। दावा किया जाता है कि मंदिर शहरी क्षेत्र का सबसे पुराना मंदिर है। महत्वपूर्ण है कि दाउदनगर 17 वीं सदी का शहर है और नई शहर में यह मंदिर है। इसे लगभग 300 साल पुराना माना जा सकता है। कई बार सड़क पर सड़क निर्मित होते रहने के कारण कभी सतह से ऊंचा रहा मंदिर आज जमीन में धंसा हुआ दिखता है। अभी सीढ़ी के जरिए मंदिर में नीचे उतरना पड़ता है, जबकि पहले सीढ़ी से मंदिर पर चढ़ना पड़ता था। इसके पुजारी धनंजय कुमार मिश्रा हैं और इनके पिता दादा भी यहां पुजारी रह चुके हैं। कहा जाता है कि इस मंदिर में पूरी तरह शुद्ध और पवित्र आत्मा रखकर श्रद्धालु जो भी मांगता है वह पूरा होता है। यहां स्थापित महादेव की महिमा दूर-दूर तक है। लोग आते हैं और उनकी मांगे पूरी होती हैं।


मंदिर निर्माण की यह विशेषता 


 इस शिवालय की विशेषता यह है कि इसकी दीवारें काफी मोटी मोटी हैं। आम तौर पर शहर में इतनी मोटी दीवारें अन्य मंदिरों की नहीं हैं। लगभग 30 इंच, अर्थात ढाई फ़ीट। ये दीवारें चुना सुर्खी से गधेड़ीया इंट को जोड़कर बनाई गई है। इसे मुगलकालीन इंट भी माना जाता है। ये आकार में पतली होती हैं।



तसमई की खास परंपरा 

मंदिर की देख रेख लड़ने वाले धीरेंद्र कुमार रत्नाकर बताते हैं कि प्रत्येक महाशिवरात्रि को तसमई का प्रसाद वितरण करने की उनकी परंपरा है। 


18 साल से कर रहे रंग रोगन 

मंदिर की देखरेख करने वाले धीरेंद्र कुमार रत्नाकर कहते हैं कि बीते 18 साल से निरंतर वह मंदिर का रंग रोगन कर रहे हैं। उनकी श्रद्धा और आस्था मंदिर से जुड़ी हुई है। इस क्रम में किसी से वह सहयोग नहीं मांगते। कोई देते हैं तो वह स्वीकार्य है। उनसे पहले भी कई लोग आपसी सहयोग कर मंदिर का रंग रोगन करते रहे हैं।


अब भी हैं गुलामी की प्रतीक नील कोठियों के खंडहर

 बदलता शहर 14



शहर में थी तीन, बची हैं दो नील कोठियां

नील का काम होने के कारण मुहल्ले का नाम- नीलकोठी

उपेंद्र कश्यप, जागरण ● दाउदनगर (औरंगाबाद) : 

जब नहरें बनी तो आवागमन आसान हुआ। स्टीमर चलने लगे और पटना आना जाना सहज हो गया। नतीजा अंग्रेजों ने नील उत्पादन के लिए खेती से निर्माण तक का काम करना शुरू किया। नील उत्पादन को शोषण के रूप में ही देखा माना गया है। निलहे आंदोलन की याद आ जाती है। ये गुलामी की प्रतीक हैं। शहर में तीन नील कोठियां बनाई गई थी। वर्तमान वार्ड संख्या छह में नील कोठी मुहल्ला का नाम है। स्वाभाविक है यहां नील उत्पादन का कार्य होता होगा। भखरूआं में बीआरसी. भवन से पूरब वार्ड संख्या 27  और बुधु बिगहा प्राथमिक स्कूल से पूरब एवं बम रोड देवी मंदिर से पश्चिम वार्ड संख्या 16 में बड़ी पक्की नील कोठियों के दो अवषेश स्मृति के रूप में बचे हुए हैं। गड़ही पर भी कहते हैं, एक नील कोठी हुआ करता था, जिसका वजूद अब नहीं बचा है। जमींदोज हो गया है, स्मृति के लिए भी शेष नहीं बचा। वार्ड संख्या 16 में स्थित खंडहर की मापी इस संवाददाता ने स्वयं की है। साथ दिया था तब अनंत प्रसाद ने। दक्षिण से उत्तर करीब 120 फीट लंबा तथा करीब 35 फीट चौड़ा पक्का निर्माण है यहां। पतली लाल ईंटों और चूना-सुर्खी से निर्मित है। कुल चार हौदा साढ़े सोलह फ़ीट के बने हैं। इसी समान आकार में इस निर्माण से करीब चार फीट नीचे भी चार हौदा बना हुआ है। ऊंचाई वाले हौदों में संभवत: 'हचकल’ लगाने के लिए रिंग की तरह का पक्का निर्माण हैं, जो शायद गाद को हिचकोड़ने के लिए इस्तेमाल किया जाता था। इन चारों हौदों से सटे करीब पांच फीट ज्यादा ऊंचा 44 गुणा 36 फीट में बड़ा गहरा हौदा है, जो नाले के जरिए अपने से सटे हौदों से जुड़ा हुआ है। बुजूर्ग बताते हैं कि कभी बगल में चार कमरों की छावनी थी। बगल में एक कुंआ था। यहीं से नीलकोठी का संचालन होता था। दाऊदनगर गया रोड से उत्तर बीआरसी भवन से पूरब विशाल नीलकोठी का वजूद है। यहां दो कतार में कुल नौ-नौ हौदा पन्द्रह गुणा पन्द्रह आकार के हैं। यहां उत्तर से दक्षिण की ओर यह निर्माण करीब 220 फीट लंबा एवं 40 फीट चौड़ा है। यहां अमीन विजय स्वर्णकार एवं अवधेष कुमार के साथ इस संवाददाता ने मापी की है। छोटे आकारों के हौदों के माथे पर 16 गुणा 48 फीट का विशाल ऊंचा, गहरा हौदा है। दोनों नील कोठियों की निर्माण शैली में थोड़ा अंतर है। नौ-नौ समानांतर हौदों के बीच बड़ा नाला है। ऊंचे-बड़े हौदे से पूरब करीब 100 फीट दूर बड़ा कूंआ है। इस दूरी को पूलों पर टीका बड़ा नाला पाटता है। एक गढढा बगल में है, जिसमें संभवत: बड़ा हौदा जब ओवरफ्लो होता होगा तो तरल रसायन उसके सहारे बहता होगा।



निलकोठियों का निर्माण काल ज्ञात नहीं

बहुत कोशिश के बावजूद इन नील कोठियों के निर्माण से संबंधित तारीख या अन्य सूचना संबंधित शिलालेख नहीं मिला है। इसलिए यह पक्के तौर पर ज्ञात नहीं है कि ये नीलकोठियां वास्तव में बनी कब हैं। इसके लिए व्यापक शोध की जरूरत है। कहीं यह निर्माण 13 सितम्बर 1872 के बाद का तो नहीं, जब मुख्य पटना कैनाल का उदघाटन हुआ था? क्योकिं गोरों के व्यापार का मुख्य रास्ता इन्द्रपुरी-पटना कैनाल ही था। कब तक ये नील कोठिययां गुलजार रहीं, यह भी ज्ञात नहीं है। संभवत: आजादी से पूर्व ही, जब जर्मनी ने कृत्रिम नील का आविष्कार कर लिया था। तभी ये कोठियां गुलजार रही होंगी, कुछ वर्ष बाद तक भी।




नई पीढ़ी को देखने समझने की जरूरत

शहर में बची हुई दो नील कोठियों के अवशेष को इस रूप में विकसित किया जाना चाहिए कि नई पीढ़ी के लोग उसे देख और समझ सके। नीलहे आंदोलन से लेकर नील की खेती और निर्माण को लेकर अंग्रेज भारतीयों का खूब शोषण करते थे। शहरियों का यह सौभाग्य है कि उन्हें इस नील की उत्पादन की पूरी प्रक्रिया को समझने के लिए उनके पास दो नील कोठियां उपलब्ध है। लेकिन वह खंडहर में तब्दील है। यदि उन्हें इस रूप में विकसित किया जाए कि लोग उसे देख सके तो उन्हें समझने का मौका मिलेगा। इन्हें संरक्षित भी किया जा सकता है और पर्यटन के रूप में भी विकसित किया जा सकता है।