Saturday, 22 February 2025

नहर से आई समृद्धि, लोगों ने किया यशोगान

 



रोजगार से लेकर कृषि क्षेत्र को किया समृद्ध

लोगों ने कहा- परजा के पालन को नहर खुदवाया

ऐसा जलस्त्रोत जिसने यातायात व पेयजल, सिंचाई सुविधा दी

उपेंद्र कश्यप, जागरण ● दाउदनगर (औरंगाबाद) :

दाउदनगर चट्टी था और शहर बनने के लिए छटपटा रहा था। तभी नहर की खुदाई प्रारंभ हुई। नहर ने यहां के लोगों को काम दिया और एक बड़ी आबादी इससे कमाने लगी। एक बड़े वर्ग को मिट्टी कटवा कहा गया। शायद यह नाम नहर खुदाई के कारण ही मिला था। सिंचाई के लिए नहर का निर्माण हुआ। लोगों को काम मिला और जब नहर से खेतों को पानी मिलने लगा तो सिंचाई की सुविधा उपलब्ध हो गई। इससे अकाल की चिंता से मुक्ति मिली। स्वाभाविक है कि नहर की खुदाई और उससे सिंचाई की सुविधा उपलब्ध होने के कारण समृद्धि भी आई। जब नहर प्रणाली का कार्य पूरा हो गया तो दिसंबर 1878 में नौपरिवहन के लिए इसे खोल दिया गया। इससे सिंचाई के साथ साथ नौपरिवहन से यातायात सुगम हो गया। इससे यहां रोजगार मिला। व्यापार आसान हो गया।  नतीजा लोगों ने नहर खुदाई को गीत बनाकर गाया। दाउदनगर की संस्कृति जिउतिया की संस्कृति है। इतना बड़ा सामूहिक उत्सव दूसरा नहीं होता। लोक की इसमें व्यापक पैमाने पर भागीदारी होती है। और उसी लोक उत्सव में एक लावणी गया जाता है- प्रजा के पालन को नहर को खुदवाया है। यह बताता है कि नहर के प्रति दाउदनगर के लोगों ने कितनी श्रद्धा व्यक्त की। उसका यशोगान किया। क्योंकि नहर एक कैसा जल स्रोत है जिसने नहर के इस और उस पार की आबादी के बीच आवागमन, पीने के लिए पानी, पशुओं के लिए जल स्त्रोत और खेतों के लिए भी पानी उपलब्ध कराया। ऐसे में उसका यशोगान करना सनातन संस्कृति की आम प्रवृत्ति की तरह ही मानी जाएगी। जिसमें कुछ भी देने वाले के प्रति श्रद्धा का भाव व्यक्त करने की परंपरा रही है।


नहर का विचार 1853 में फौजी अभियंता की


तत्कालीन शाहाबाद में सिंचाई के लिए इस नहर प्रणाली का विचार 1853 में फौजी अभियंता लेफ्टिनेंट सी.एच.डिकेंस ने किया था। जो बाद में जनरल बने। उसने कैमूर पहाड की ढलान से बहने वाले जल के संचय का प्रस्ताव इस्ट इंडिया कंपनी के सामने रखा। जलाशयों से नहरें निकाल कर सिंचाई की योजना बनायी -थी। अधिक छान बीन के बाद 1855 में उसने अपनी नयी रपट पेश की, जिसमें उसने सोन को ही मूलाधार बनाया। यह योजना नक्कारखाने में तूती की आवाज की तरह गुम हो गई। 1860 में उसे फिर आदेश मिला कि वह सारा जिला घुम कर किसानों की आवश्यक्ता अनुसार रपट पेश करे। नये आदेश के बाद 1861 में जो प्रस्ताव सामने रखा उसी को आधार बना कर सोन-नहर-परियोजना बनी। वर्ष 1878 में पूरी सोन नहर सिंचाई प्रणाली बन कर तैयार हो गई। 



नाम पटना बड़ी नहर, लंबाई 57.6 किमी

इंद्रपुरी सोन बराज से निकल कर उत्तर की ओर सोन के लगभग समानांतर ‘पटना बडी नहर’ पटना तक की कुल 57.6 किलोमीटर की यात्रा दाउदनगर, अरवल होते हुए उत्तर-पूरब की तय करती है। सैदाबाद से वह कुछ अधिक पूरब हो जाती है और बिक्रम, नौबतपुर होते हुए बांकीपुर-दानापुर के बीच में दीघा के पास गंगा में अपना बचा खुचा पानी उडेल कर अपनी यात्रा पूरी कर लेती थी। 



जिउतिया में गाया जाने वाला लावणी


परजा के पालन करने को नहर को खुदवाया है

मशहुर है नहर ये लम्बी अंगरेजों का लाया है

पहले तो दूरबीन लगाकर सर्व राह को देख लिया

दूसरे में कम्पास लगार बेलदारो ने चास किया

हरिद्वार से नक्शा लाकर नहर खोदना शुरू किया

जगह-जगह पर साहबों ने ठेकेदारों को ठेका दिया

देखो-देखो चौड़ी नहर खोदन करने आया है

मशहूर है नहर ...........

सोलह फुट गहरा करवाया, बावन फुट चौड़ाई है

पटरी उपर वृक्ष लगाया सुन्दर अति सोहाई है।

नहर से नहरी जो निकली,  नहरी से जो पैन भाया,

पैनों से जो निकली नाली वही जल खेतों में गया

तीन कोस पर लख दो तरफा पुलों से पटवाया है

मशहूर है नहर ........


नहर प्रणाली का विवरण

इस नहर प्रणाली से आठ शाखा नहरें और 12 उपवितरणी या फीडर निकली हुई है। इस नहर का ग्रास कमांड क्षेत्र (जीसीए) 89073 हेक्टेयर और कल्चरेबुल कमांड क्षेत्र (सीसीए) 73000 हेक्टेयर है। सिंचाई का लक्ष्य 65000 हेक्टेयर है जो प्राय: प्राप्त हो जाता है। 


Thursday, 20 February 2025

शहर की सफाई पर खर्च होता है 38 करोड़ 40 लाख रुपये

बदलता शहर -12




कलेक्टिंग प्वाइंट खत्म करने की है आवश्यक्ता

120 कर्मी करते हैं सफाई के काम

शहर को स्वच्छ रखने को करने होंगे कई और कार्य

उपेंद्र कश्यप, जागरण ● दाउदनगर (औरंगाबाद) : शहर की सफाई की जिम्मेदारी नगर परिषद के पास है। नगर परिषद यह काम स्वयं सेवी संस्था तरक्की से करवाता है। शहर में सफाई की स्थिति जो फिलहाल है उस पर 32 लाख रुपये महीने का खर्च आता है। अर्थात वार्षिक तीन करोड़ 40 लाख रुपये शहर की सफाई पर ही खर्च हो जाता है। तब भी शहर में कई जगह गंदगी की शिकायतें हैं और शहर को और स्वच्छ बनाने के लिए कई स्तर पर काम किए जाने की आवश्यकता बताई जाती है। अभी 120 सफाई कर्मी और आठ सुपरवाइजर हैं। खर्च की राशि अभी और बढ़नी तय है। शहर को और बेहतर तरीके से स्वच्छ रखने के लिए लैंडफिल साइड की जरूरत है जो है नहीं। इसके लिए सरकारी जमीन की तलाश जारी है। हालांकि कार्यपालक पदाधिकारी ऋषिकेश अवस्थी बताते हैं कि एमआरएफ यानी मटेरियल रिकवरी फैसिलिटी उपलब्ध है और कचड़ों को वहीं जमा किया जाता है, जहां से उसकी छटनी होती है। शहर में सात से 12 स्थान ऐसे हैं जहां हाथ ठेला से गली मोहल्लों के कचरे इकट्ठे कर रखे जाते हैं। इसे कलेक्टिंग प्वाइंट कहा जाता है। यह जहां भी हैं वहां प्राय: दिन भर गंदगी लगी हुई रहती है। इसे खत्म करने की कोशिश करनी होगी।



हटाए जाएंगे कलेक्टिंग प्वाइंट 

 कार्यपालक पदाधिकारी ऋषिकेश अवस्थी ने बताया कि शहर में जहां भी कलेक्टिंग प्वाइंट हैं उन्हें हटाया जाएगा, ताकि उस स्थान पर गंदगी देर तक ना रहे। इस व्यवस्था के लिए तीन ट्रैक्टर टेलर और खरीदे जा रहे हैं। शीघ्र ही नगर परिषद को यह ट्रैक्टर उपलब्ध हो जाएंगे। और भी कई उपकरण खरीदे जाने हैं। शहर को स्वच्छ बनाने रखने के लिए जो भी आवश्यक संसाधन होगा उसका क्रय किया जाएगा।


नगर परिषद के पास उपलब्ध संसाधन 

प्राप्त जानकारी के अनुसार नगर परिषद के पास टंकी साफ करने के लिए दो सक्सन मशीन, बड़े नाला साफ करने के लिए एक सुपर सकर, एक जेसीबी, एक स्कीड लोडर, तीन ट्रैक्टर, सभी वार्डों के लिए ठेला गाड़ी उपलब्ध है। पांच ट्रीपर है, जिसमें दो खराब है और तीन कार्य कर रहे हैं।


Wednesday, 19 February 2025

1885 का शहर है बस स्टैंड से अब तक वंचित

 बदलता शहर - 11





निर्माण छूटा अधूरा, मामला न्यायालय में लंबित 

निर्माण के लिए 40 लाख रुपए नप के खाते में शेष

रोहतास, बारुण, औरंगाबाद या पटना के लिए नहीं खुलती है बसें

उपेंद्र कश्यप, जागरण ● दाउदनगर (औरंगाबाद) :

10 साल पूर्व शहर में बस स्टैंड का निर्माण कार्य पासवान चौक के पास प्रारंभ हुआ था। भू स्वामित्व से जुड़ा एक मामला न्यायालय में पहुंचा और कार्य बंद हो गया। नतीजा आज तक इसका निर्माण पूरा नहीं हुआ। लाखों रुपये की राशि इसके निर्माण पर बर्बाद हो गयी। इसे लेकर बिहार विधानसभा में भी प्रश्न उठाए गए लेकिन समाधान नहीं निकला। बस स्टैंड के चलते शहर में कई जगह वाहन लगाए जाते हैं। आटो, ई रिक्शा या चार पहिया वाहन के लिए कोई निश्चित और व्यवस्थित स्थान नहीं है। शहर में इसकी आवश्यकता है। इसके अभाव में दाउदनगर बारुण रोड पर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के पास बस लगते हैं। यहां से बसें बारुण के लिए खुलती हैं। अगर बस स्टैंड की सुविधा हो तो संभव है कि शहर से बसें पटना, औरंगाबाद और रोहतास जिले के विभिन्न स्थानों के लिए खोले जाने लगें। क्योंकि दाउदनगर नासरीगंज सोनपुल का निर्माण होने और संपर्क पथ एनएच 120 पर दाउदनगर बारुण रोड से सीधे एनएच 139 पर पहुंचने के लिए जो निर्माण का कार्य हुआ है उससे शहर से बसें कहीं भी आसानी से बिना आबादी के बीच जाम में फंसे गुजर सकती है। लेकिन बस स्टैंड नहीं होने के कारण शायद वाहन मालिक इस दिशा में नहीं सोच रहे। नगर परिषद के पास बस स्टैंड के निर्माण के लिए 40 लाख रुपये अभी भी पड़े हुए हैं। 




स्थिति अनुकूल तो होगा निर्माण

नगर परिषद के कार्यपालक पदाधिकारी ऋषिकेश अवस्थी ने बताया कि मामला न्यायालय में चल रहा है। जैसे ही स्थित अनुकूल होगी, बस स्टैंड का निर्माण कार्य प्रारंभ कर दिया जाएगा। शहर के लिए बस स्टैंड आवश्यक है और इसके निर्माण के लिए नगर परिषद इच्छुक है।



सरकार ने कहा था- दूसरी जगह होगा निर्माण


 क्षेत्रीय विधायक ऋषि कुमार ने बिहार विधानसभा में संवंधित मंत्री से यह प्रश्न पूछा था कि नगर परिषद क्षेत्र में बस पड़ाव स्थापित करने के लिए कार्यपालक पदाधिकारी नगर परिषद के पत्रांक तीन दिनांक चार जनवरी 2022 द्वारा अंचल कार्यालय दाउदनगर को जमीन उपलब्ध कराने के लिए पत्र लिखा गया था। लेकिन आज तक बस पड़ाव निर्माण के लिए जमीन उपलब्ध नहीं कराया गया है। सरकार कब तक बस पड़ाव के लिए भूमि उपलब्ध कराते हुए बस पड़ाव का निर्माण करने का विचार रखती है। नहीं तो फिर क्यों। प्रश्न के जवाब में मंत्री द्वारा तब कहा गया था कि नगर परिषद द्वारा प्रतिवेदन दिया गया कि स्वीकृत बस स्टैंड निर्माण का कार्य प्रारंभ किया गया था। परंतु भूमि विवाद के कारण उक्त स्थल पर निर्माण करने पर न्यायालय द्वारा रोक लगा दी गई। जिसके कारण अन्य स्थल पर बस स्टैंड निर्माण के लिए जगह चिन्हित करने का अनुरोध अंचल अधिकारी से नगर परिषद ने किया है। गत 25 नवंबर 2024 को विभाग द्वारा नगर परिषद क्षेत्र में बस स्टैंड निर्माण के लिए भूमि उपलब्ध कराने का अनुरोध जिला पदाधिकारी से किया गया है। भूमि उपलब्ध होते ही बस स्टैंड का निर्माण कार्य पूर्ण कर दिया जाएगा। मंत्री के जवाब से अब तय है कि पासवान चौक के पास निर्माणाधीन बस स्टैंड में अब निर्माण का कार्य नहीं होगा। अब जिला पदाधिकारी अंचल के द्वारा जो जमीन उपलब्ध कराएंगे उस पर निर्माण का कार्य हो सकेगा। 



मामला न्यायालय क्यों गया था

वर्ष 2014-15 में बस स्टैंड पासवान चौक के समीप बनाया जाना शुरू हुआ था। निर्माण स्थल पर अपनी भूमि होने का महिला कालेज ने दावा किया था। इसके बाद मामला न्यायालय में चला गया और निर्माण का कार्य अधूरा रह गया। इसमें लाखों रुपये खर्च किए गए और यह बेकार पड़ा रह गया। अब यह ऐसा स्थान बन गया है जिसमें पानी जमा रहता है, जिससे आसपास के लोग परेशान होते हैं।


पहले भी सदन में उठ चुका है मामला


मार्च 2016 में तत्कालीन विधान पार्षद डा.उपेंद्र प्रसाद ने सदन में इस सम्बंध में सवाल पूछा था। तब बताया गया था कि एक करोड़ 57 लाख 70 हजार रुपये आवंटित किया जा चुका है। बुडको द्वारा निर्माण कराया जा रहा था। उन्होंने यह प्रश्न पुरानी शहर निवासी निशांत राज के कहने पर पूछा था। 



140 साल पुराने शहर में मनोरंजन के साधन नहीं

 बदलता शहर - 10




एक पार्क बने तो दूसरे के लिए बात आगे बढ़े 

फोटो-कान्दू राम की गड़ही स्थित निर्माणाधीन पार्क स्थल

निर्माण कार्यों में राजनीति डालती रही अड़ंगे

कामयाब नहीं हो रही स्वस्थ समाज बनाने की कोशिशें 

उपेंद्र कश्यप, जागरण ● दाउदनगर (औरंगाबाद) :

140 साल पहले चट्टी के रूप में मशहूर दाउदनगर को नगर पालिका का दर्जा प्राप्त हुआ था। तब से आज तक इस शहर में एक अदद पार्क तक का निर्माण नहीं हो सका। नगर पालिका फिर नगर पंचायत और फिर नगर परिषद की यात्रा के क्रम में प्रायः जन प्रतिनिधियों ने यह सब्जबाग दिखाने की कोशिश की कि वह पार्क बनाएंगे। लेकिन इसका निर्माण कभी नहीं हो पाया। पार्क न सिर्फ मनोरंजन के स्थल बनते हैं बल्कि जो नया विचार पार्क निर्माण को लेकर आया है वह मनुष्य को स्वस्थ बनाने और स्वस्थ बनाए रखने में बड़ा योगदान करता है। पार्क में अब ओपन जिम का कान्सेप्ट आया है। यानि हरियाली के बीच तनाव कम करते हुए शरीर को स्वस्थ बनाने के लिए वहां व्यायाम करने को कई उपकरण मौजूद होंगे। लेकिन यह विचार कभी जमीन पर नहीं उतर सका। नागरिकों को स्वस्थ बनाए रखना की अब तक की तमाम कोशिश असफल रही हैं। राजनीति कई बार अलंगे डालती रही है। जब 2023 में नगर परिषद के अध्यक्ष व उपाध्यक्ष पद के लिए सीधे चुनाव हुआ तो नई उम्मीद जगी। एक कोशिश यह हो रही है कि शहर में कम से कम तीन पार्क का निर्माण हो जाए। स्थल चयन हो गया। लेकिन बात वही है कि राजनीति अच्छे कामों में कभी-कभी अड़ंगा डाल देती है। एक पार्क बने तब बात आगे बढ़े। अभी स्थिति यह है कि वार्ड संख्या 11 स्थित कान्दू राम की गड़ही मुहल्ला में 25 डिसमिल में पार्क का निर्माण होना है। यहां चारदीवारी का निर्माण कार्य लगभग पूरा हो चला है।


एक महीने में जनता को सुपुर्द होगा पार्क 

मुख्य पार्षद अंजली कुमारी बताती है कि चार दीवारी निर्माण का काम लगभग पूरा हो गया है। एक से डेढ़ महीने में पार्क पूरी तरह तैयार हो जाएगा। तमाम बाधा खत्म कर दी गई है। जल्दी पार्क का निर्माण पूरा कर इसे नागरिकों को सुपुर्द कर दिया जाएगा।


तीन जगह बनने हैं शहर में पार्क 

वार्ड संख्या 11 में पार्क का निर्माण लगभग पूर्ण हो चला है। इसके निर्माण के बाद वार्ड संख्या 16 में और फिर सोन नद क्षेत्र में काली स्थान के पास पार्क का निर्माण किया जाना है। इन दोनों पार्क निर्माण के लिए भी जमीन का चयन कर लिया गया है। मुख्य पार्षद अंजली कुमारी व कार्यपालक पदाधिकारी ऋषिकेश अवस्थी ने बताया कि एक बन जाये तो आगे की कोशिश शुरू करें।


चमन बन जाएगा गंदा स्थान 

कार्यपालक पदाधिकारी ऋषिकेश अवस्थी बताते हैं कि जिस जगह पर पार्क बनाया जा रहा है वहां गंदगी काफी रहती थी। जल जमाव रहता था। लोगों के लिए समस्या खड़ी होती थी। अब इस जगह पर बेहतर पार्क का निर्माण किया जा रहा है। ओपन जिम और चिल्ड्रन पार्क होगा। बच्चों के खेलने कूदने के समान होंगे। युवक युवतियों के लिए व्यायाम के उपकरण होंगे। पैदल टहलने के लिए ट्रैक होगा। बैठने के लिए कुर्सियां लगी होंगी।



Tuesday, 18 February 2025

श्रमिकों ने बनाई है जिउतिया लोक संस्कृति

 बदलता शहर - 09




राजकीय महोत्सव का दर्जा दिलाने की है पुरानी मांग 

कलाकारों को गढ़ती और संवारती है यह संस्कृति

उपेंद्र कश्यप, जागरण ● दाउदनगर (औरंगाबाद) :

दाउदनगर में श्रमिकों की बसावट तो साफ-साफ दिखती ही है, यहां की संस्कृति भी श्रमिकों ने ही गढ़ी और उसे संपन्न बनाया है। यहां की सांस्कृतिक पहचान जिउतिया लोक संस्कृति है। जिसने यहां के कलाकारों को ऐसा गढ़ा और संवारा कि लोग कहने लगे कि यहां के कण कण में कला बसती है। दरअसल इस अवसर पर लोक कलाओं की जो प्रस्तुति होती है वह खासा महत्वपूर्ण है। वह प्रस्तुतियां यहां के अनगढ़ कलाकारों को गढ़ती है, संवारती है। नतीजा बड़े-बड़े मंचों पर भी वे सफल होते हैं। अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाने में सफल होते हैं। आश्विन कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को यह व्रत मनाया जाता है। यूं तो यह प्रायः सभी सनातन धर्मावलंबियों के घर में मनाया जाता है, लेकिन नौ दिन यहीं मनाया जाता है। और दो से तीन दिन पुरस्कार वितरण बड़े-बड़े मंच करते हैं। यहां के लोक कलाकार अप्रशिक्षित होते हैं, अनगढ़ लोग हैं वह लगातार अपनी कला प्रस्तुत करते-करते उसमें अनुभवी हो जाते हैं। कई खतरनाक प्रस्तुतियां है जो देखने के बाद लोग दांतों तले उंगली दबा लेते हैं। लोक संस्कृति का कोई आयाम ऐसा नहीं है जो यहां आपको देखने को ना मिले। इसे राजकीय दर्जा दिलाने का प्रयास लगातार दैनिक जागरण करते रहा है। इस संवाददाता ने कई मंचों पर इससे संबंधित विवरण और आवेदन उपलब्ध कराया है। जिउतिया के पुरस्कार मंचों पर आने वाले तमाम नेता इसे राजकीय दर्जा दिलाने के लिए प्रयास करने की घोषणा करते हैं और मंच से उतरते ही इसे भूल जाते हैं। जहां छोटे-छोटे आयोजन होते हैं उन्हें भी बिहार सरकार ने राजकीय दर्जा दे दिया है। लेकिन दाउदनगर का इससे अभी भी अछूता है। सबको इस बात की प्रतीक्षा है कि इसमें सफलता कब मिलेगी।



राजकीय दर्जा देने को डीएम को लिखा पत्र 

नगर परिषद के कार्यपालक पदाधिकारी ऋषिकेश अवस्थी ने बताया कि जिउतिया को राजकीय दर्जा दिलाने के संबंध में उन्होंने जिला पदाधिकारी को पत्र लिखा है। पत्र में कहा गया है कि इस लोक उत्सव के दौरान बिहार के विभिन्न जिलों से ही नहीं बल्कि निकटवर्ती कई प्रदेशों से लोग आते हैं। इसमें युवा, बच्चे, बुजुर्ग महिलाएं सभी अनूठा करतब दिखाते हैं। स्वांग रचते हैं। कई खतरनाक प्रस्तुति देते हैं। कई मंच सर्वश्रेष्ठ प्रतिभागियों को सम्मानित करते हैं। यदि इस लोक उत्सव को राजकीय दर्जा प्राप्त हो जाता है तो इसका प्रचार प्रसार दाउदनगर से बाहर दूर तक हो सकेगा। कार्यपालक ने इस पत्र में यह भी कहा है कि जिले में मनाये जाने वाले अन्य उत्सवों को जिस तरह राजकीय दर्जा दिया गया है उसे आधार बनाकर जिउतिया लोकोत्सव को भी राजकीय दर्जा दिया जाए, ताकि यह उत्सव और भी जीवंत हो सके।


जिउतिया के कारण मिल रहे अभिनय के काम

कई फ़िल्म व धारावाहिक में काम करने वाले कलाकार विकास कुमार कहते हैं कि किसी भी शहर की पहचान उसकी सभ्यता व संस्कृति से होती है। यह जिउतिया लोकोत्सव पर लागू होता है। आज मैं फिल्म और टीवी के क्षेत्र मे जो भी मुकाम हासिल किया हूं, उसमें इसी संस्कृति का योगदान है। विभिन्न मंचों पर अभिनय करने का मौका जो मिला उससे अभिनय में निखार आया। जिसके कारण नाटक के क्षेत्र में पहचान बनी। फिल्म और टीवी में काम मिला। 



जिउतिया के मंचों ने कलाकार बनाया

कलाकार और फ़िल्म निर्माण से जुड़े चंदन कुमार ने बताया कि जिउतिया कलाकारों को संवारने का काम करता है। आज हम अगर माइक पर बोलते हैं तो इसमें सबसे बड़ा योगदान जिउतिया का है। जिउतिया कलाकारों को एक अलग पहचान दिलाता है। यहां के कलाकार अब फिल्मो में काम करने लगे हैं तो इसी संस्कृति से जुड़े लोक उत्सव पर मंचीय प्रस्तुति करने से। जिउतिया कलाकारों की जननी है।


Sunday, 16 February 2025

जातियों के नाम पर बने हैं शहर के मोहल्ले

 बदलता शहर - 08



कामगार जातियों से जुड़े हैं मोहल्लों के नाम

कई मोहल्लों के नाम से होता है व्यक्ति और वस्तु का बोध

नाम बताते हैं यहां की संस्कृति है श्रमण 

उपेंद्र कश्यप, जागरण ● दाउदनगर (औरंगाबाद) : दाउदनगर श्रवण संस्कृति का शहर है। यह यहां के बसावट वाले मोहल्ले के नाम से स्पष्ट होते हैं। आमतौर पर यहां जो जातियां बसी हैं वह बाहर से तब बुलाए गए थे जब यहां दाऊद खान ने शहर बसाना आरंभ किया था। कई मामलों में इस शहर की बसावट अद्भुत है। यहां की संस्कृति श्रमिकों की संस्कृति है। हर गली, मुहल्ले की हालत एक सी है। यहां की बसावट, उनका पेशा, उनकी जीवन शैली, उनके व्यवहार पूरी तरह श्रमिकों की है। यहां की आबादी मूल नहीं है। या तो सतरहवीं सदी में दाउद खां ने बुलाकर बसाया है या फिर रोजगार की तलाश में कहीं से आये और फिर यहीं के हो कर रह गए। जितनी जातियां, और जातियों के नाम पर मुहल्लों के नाम हैं, उतना शायद ही किसी दूसरे कस्बे में आपको मिलेगा। शहरी क्षेत्र में न्यूनतम 44 मुहल्ले ऐसे हैं। उमरचक, पटेलनगर, शीतल बिगहा, गौ घाट, बुधन बिगहा, पिलछी, मौलाबाग, ब्लौक कालोनी, न्यू एरिया, अफीम कोठी, चुड़ी बाजार, कान्दु राम की गड़ही, पांडेय टोली, गड़ेरी टोली, अफीम कोठी, खत्री टोला, मल्लाह टोली, चमर टोली, पटवा टोली, दबगर टोली, ब्राहम्ण टोली, कुम्हार टोली, नाई टोली, लोहार टोली, महाबीर चबुतरा, थाना काॅलोनी, हास्पिटल कालोनी, यादव टोली, डोम टोली, कसाई मुहल्ला, नालबन्द टोली, कुर्मी टोला, दुसाध टोली, अमृत बिगहा, बुधु बिगहा, रामनगर, अनुप बिगहा, रामनगर, नोनिया बिगहा, माली टोला, जाट टोली, यादव टोली, ब्राह्मण टोली और बालु गंज। इन मुहल्लों में शामिल सभी जाति सूचक मुहल्ले पुरातन हैं। एक ही नाम के दो-दो, तीन-तीन मुहल्ले भी हैं। व्यक्ति के नाम सूचक और अन्य नाम नगरपालिका के विस्तार के साथ जुड़े इलाकों के नाम हैं। जिन जातियों का ज्ञान इन मुहल्ला नामों से होता है, उसके अलावा भी कई श्रमिक जातियां यहां रहती हैं। रंगरेज, डफाली, कुंजडा, अंसारी, मुकेरी, सुड़ी, सौंडिक, तेली, धुनिया, रोनियार, अग्रवाल समेत तमाम तरह की श्रमिक जातियां यहां हैं। सोनार पट्टी जैसे नाम तारीख-ए-दाउदिया में हैं, जो अब लापता हो गए। यहां श्रम करने वाली जातियों ने अपना समाज गढ़ा। अपनी साझा संस्कृति बनाई। 



काम से भी जुड़े हैं गली मोहल्ले 


शहर में कई गली ऐसे हैं जो वहां होने वाले काम का बोध कराते हैं। यथा गुड़ चावल फरही बाजार, शुक बाजार, सूतहट्टी गली, धनकुट्टा बाजार। यह ऐसे नाम है जिनके संबोधन से ही यह पता चल जाता है कि यहां कौन सा काम होता होगा।



दाउदनगर है मध्यकालीन शहर


मुगलकालीन या मध्यकालीन नगर है दाउदनगर। महत्वपूर्ण है कि सिलौटा बखोरा या दाउदनगर परगना अंछा का एक इलाका है। जमीन खरीद फरोख्त के दस्तावेजों में हाल तक हाल-मोकाम के बाद परगना अंछा ही लिखा जाता रहा है। अंछा, गोह और मनौरा तीन महत्वपूर्ण परगना मुगलकाल में थे। इन तीनों परगनाओं को औरंगजेब ने दाउद खां को लाखिराज दे दिया था। यानि भेंट किया था। जब 1659 में औरंगजेब ने अपने सिपहसलार दाउद खां को बिहार का नया सुबेदार नियुक्त किया था। उसने इलाका विस्तार का अभियान 1660 में प्रारंभ किया था। इसमें उसने जब वर्तमान जिला गया का कोठी, औरंगाबाद जिला का कुंडा, और देवगन राज को फतह कर पलामु भी फतह कर लिया तो बादशाह ने उसे इन तीन परगनाओं को भेंट किया था। इसके बाद ही दाउद खां ने सिलौटा बखौरा को आबाद किया और नगर बसाया।


Saturday, 15 February 2025

18 तख्तों में बंटा हुआ था दाउदनगर

 बदलता शहर 07



1901 में जब हुआ सर्वे तो बसावट वाला क्षेत्र रहा वंचित

लंबाई को अरज, चौडाई को तुल तथा क्षेत्र के लिए कट्ठा शब्द का इस्तेमाल 

डिस्मिल शब्द कारा नवाब के बंटवारे में इस्तेमाल किया गया

उपेंद्र कश्यप, जागरण ● दाउदनगर (औरंगाबाद) : दाउदनगर को बसाने वाले दाऊद खां के नाम के साथ नवाब विशेषण जुड़ा हुआ है। जमीन से भी नवाबियत और जमींदारी, इसीलिए कहा जाता है कि यह नवाबों का शहर है। ठाट-बाट में पले-बढ़े दाउदनगर के मालिकाना हक की कहानी बड़ी दिलचस्प है। कई जमींदारों या नवाबों की मिलकियत थी यहां। शहर दाउद खां कुरैशी का बसाया हुआ था तो स्वाभाविक तौर पर इस भूगोल पर उनके वंशजों का हक था। कालांतर में उनके वंशज इस काबिल नहीं रह गये थे। नतीजा पूरा शहर कारा इस्टेट के नियंत्रणाधीन हो गया। संभवतः हसन इमाम नवाब थे। इन्हें शहर हसनु बाबु के नाम से जानता था। कहा जाता था -हसनु बाबु का तख्ता। शहर में कई लोगों की मिलकियत थी। इस कारण तख्ता भी कई थे। नवाब और उनकी बेटी (शायद) खुदैतुल कुबरा के बीच बंटवारा 1928 में हुआ। नौ आना और सात आना। इससे पहले इनके अधीन के अठारह जमींदारों (वास्तव में वे जमींदार नहीं थे, उनकी मिल्कियत कुछ रकबे की थी) के अधीन पुरानी शहर था। इन सबने 1896 में बंटवारा सुट दाखिल किया था। इन्हें उर्दु में सायल (प्रार्थी, फरियादी) कहा जाता है। जिस पर फैसला 1899 में हो चुका था। रैयती खतियान बना कर दिया गया था। इसे तख्ते बंदी बंटवारा कहा जाता है। इसके साथ एक नजरी नक्शा बना हुआ था। इसमें लंबाई के लिए अरज एवं चौडाई के लिए तुल तथा क्षेत्र के लिए कट्ठा शब्द का इस्तेमाल किया गया है। डिस्मिल शब्द कारा नवाब के बंटवारे में इस्तेमाल किया गया है। यहां लक्ष्मी बाबु का तख्ता, गोमती प्रसाद का तख्ता, सोहन मिश्रा का तख्ता, सिताब लाल मंगल बाबु का तख्ता, मनहरण लाल का तख्ता हुआ करता था। अर्थात इनके अधीन कई-कई बिगहा जमीनें हुआ करती थी। सोहन मिश्रा के तख्ता में बालुगंज, मलाह टोली, डफाली टोली एवं बरादरी का हिस्सा आता था। सराय रोड सोलेने साहब के तख्ता के अधीन था। वे अंग्रेज थे। एक महिला भी ऐसी ही जमींदार थी। सभी ओझाइन का तख्ता के नाम से जानते थे। इसी ओझाइन के तख्ते का वारिश बन गये थे दीपन तिवारी। जो मूलतः रोहतास के एकडारा से यहां आये थे। ओझाइन के तख्ता में माली टोला, जाट टोली का हिस्सा आता था। 


12 इस्टेट की हुआ करती थी हिस्सेदारी 


पांडेय टोली के बैजनाथ पांडेय (अब स्वर्गीय) ने इस संवाददाता को बताया था कि उनके पूर्वज उन्हें बताते थे कि इस शहर में 12 इस्टेट की हिस्सेदारी हुआ करती थी। कारा इस्टेट, बंगाली इस्टेट, युरोपीयन सोलोनो इस्टेट, काली प्रसाद अग्रवाल, सूरज प्रसाद अग्रवाल, संस्कार विद्या के सीईओ सुरेश प्रसाद गुप्ता के पूर्वज विशेश्वर नाथ, लियाकत हुसैन, कयुम हुसैन एवं इकबाल हुसैन के पूर्वज, गुदानी लाल, मनहरण लाल, यदुनंदन साव, राम कृपाल प्रसाद एवं रामबिलास बाबु स्वर्णकार के पूर्वज सखीचंद साव, स्वतंत्रता सेनानी जगदेव प्रसाद के पूर्वज अनंत लाल, रामेश्वर पांडेय, रामेश्वर पूरी, सोमारु साव, केशव प्रसाद की शहर की जमीनों में हिस्सेदारी हुआ करती थी। समय के साथ जमींदारी चली गई। काफी जमीनें अन्य के कब्जे में चली गई। 

 

1934 में हुआ छह व दस आना का बंटवारा

जमीन के मामलों के जानकार अनन्त प्रसाद बताते हैं कि दाउदनगर के इस्टेट की संख्या सत्रह थी। कलक्टरी बंटवारा 1934 में मालिकों के बीच हुआ। छह आना मालिकों को और दस आना कारा इस्टेट के जिम्मे रहा।

7331 नया तौजी बनाया गया यह दाउदनगर के जमींदारों का हुआ। खाता प्लाट रैयत का और तौजी जमींदार की पहचान बताता था। छह आना पांडेय, पूरी और कायस्थ समेत अन्य इस्टेट थे। दस आना में कारा इस्टेट जिसका तौजी नम्बर 191 था। कारा इस्टेट ने अपनी जमींदारी भी बाद में बेची जिसे नवाबों ने खरीदा था। 



1912 के सर्वे में शहर बेलगान

अनंत प्रसाद बताते हैं कि 1912 में जब इस क्षेत्र में भूमि सर्वे हुआ तब शहर में महामारी थी। नतीजा आबादी वाले क्षेत्र का सर्वे ही नहीं हुआ। सर्वे करने वालों ने बसावट वाले क्षेत्र को बेलगान लिख दिया। इसीलिए आज शहर की बेशकीमती बसावट वाली जमीन बेलगान हैं। किसी ने इसे न्यायालय में चुनौती नहीं दी। जो लोग स्थिति को समझते थे, उन्होंने कई स्तर पर समझौता किया, चुनौती भी न्यायालय में दी और जमाबंदी कायम कर लिया। फिर शहर में 1985 में नया सर्वे हुआ जिसे अब जाकर स्वीकृति मिली है।