Monday, 10 February 2025

दाउदनगर : चार वार्डों की संख्या से शुरू यात्रा पहुंची 27 तक

 


1910 में हुआ था वार्डों का शहर में गठन 

25 वर्ष नगर पालिका गठन के बाद गठित हुए थे वार्ड 

उपेंद्र कश्यप, जागरण ● दाउदनगर (औरंगाबाद) :

140 वर्ष पूर्व जब वर्ष 1885 में नगर पालिका का गठन हुआ था उसके पहले भी दाउदनगर मगध और शाहाबाद क्षेत्र में चट्टी के रूप में मशहूर था। तब और अब में काफी कुछ महत्वपूर्ण परिवर्तन हुआ है। प्रशासनिक तौर पर कई बार पुनर्गठन हुआ। वार्डों की संख्या क्रमशः बढ़ती चली गई। 

जब नगर पालिका का गठन हुआ था तब शहर में कोई वार्ड का गठन नहीं हुआ था। करीब 25 वर्ष बाद पहली बार 1910 में शहर में वार्डों का गठन किया गया था। तब मात्र चार वार्ड का गठन किया गया था। इसके बाद 1925 में शहर में छह वार्ड बने और फिर 1971 में 12 वार्ड गठित किए गए। 1983 में 13 वार्ड बना। इसके बाद कोई चुनाव नहीं हुआ। जब 2002 में पुनः चुनाव की प्रक्रिया शुरू हुई तो वार्डों का पुनर्गठन किया गया और यहां 13 से 18 वार्ड बन गए। 2007 में यहां 23 वार्ड गठित हुए और जब 2018 में नगर परिषद में नगर पंचायत प्रोन्नत हुआ तो यहां कुल 27 वार्ड गठित किए गए। अभी यहां 27 वार्ड हैं।


मत से नहीं, हाथ उठाकर होता था चुनाव 

नगर पालिका बनने के साथ यहां अध्यक्ष के लिए चुनाव की प्रक्रिया शुरू नहीं हुई थी। तब सिंचाई विभाग के पदेन एसडीओ यहां के चेयरमैन होते थे और जनता से वाइस चेयरमैन का मनोनयन होता था। यहां जनता से पहला चेयरमैन 1938 में सूर्य नारायण सिंह मनोनीत किए गए। तब वार्ड पार्षदों का चुनाव जनता बैलेट के जरिए नहीं, बल्कि हाथ उठाकर करती थी। वार्ड के 20 से 25 माननीय लोग वार्ड पार्षद का चयन कर लेते थे। वर्ष 1986 के बाद 2001 तक चुनाव नहीं हुआ। 2002 से नियमित चुनाव की प्रक्रिया शुरू हुई। इसके बाद 2017 में भी चुनाव नहीं हुआ जब नगर पंचायत को नगर परिषद में प्रोन्नत किया गया। वर्ष 2018 से यहां नगर परिषद का चुनाव हो रहा है। वार्ड पार्षद ही चेयरमैन बनाते थे। वर्ष 2018 में नौ जून को अध्यक्ष बनी सोनी देवी और फिर चार मार्च 2021 को इस पद पर काबिज हुई मीनू सिंह। वर्ष 2023 में सरकार में नई व्यवस्था लागू कर दी। सीधे जनता को यह अधिकार मिला कि वह अपने मत से चेयरमैन व वायस चेयरमैन का निर्वाचन करे। नतीजा जनता ने पहली बार अपनी पसंद से इन दो पदों के लिए भी वार्ड पार्षद के साथ मतदान किया। और फिर 27 जून 2023 को नगर परिषद के लिए अध्यक्ष व उपाध्यक्ष का शपथ ग्रहण हुआ। और अंजली कुमारी चेयरमैन व कमला देवी उप मुख्य पार्षद बनीं।



छह वार्ड से चुने जाते थे 15 पार्षद 

नगर पालिका में जब तक वार्डों की कुल संख्या छह थी, तब तक 12 वार्ड पार्षद जनता द्वारा चुने जाते थे, और तीन वार्ड पार्षद सरकार मनोनीत करती थी। जिसमें एक चिकित्सक, एक सामाजिक कार्यकर्ता और किसी भी राजनीतिक दल का एक प्रतिनिधि वार्ड पार्षद मनोनीत किया जाता था।


तब डेढ़ रुपये दे कर बनते थे मतदाता 

तब व्यवस्था यह थी कि जो व्यक्ति न्यूनतम डेढ़ रुपये नगर पालिका को टैक्स देता था वही मतदाता होता था। दूसरे लोग वोट का अधिकार नहीं रखते थे। तब डेढ़ रुपये का कितना महत्व था इससे समझ सकते हैं कि तब एक किरानी को सरकार मात्र 30 रुपये महीना वेतन देती थी। 


अभी पुनर्गठन की योजना नहीं


मुख्य पार्षद अंजली कुमारी बताती हैं कि फिलहाल वार्डों के विस्तार की कोई योजना नहीं है। सरकार का जब निर्देश प्राप्त होगा तभी वार्डों का पुनर्गठन होगा। अभी ऐसा कोई निर्देश सरकार से प्राप्त नहीं हुआ है।


Sunday, 9 February 2025

1885 में जितनी आबादी थी उससे अधिक निर्मित हो गए घर

 बदलता शहर


8225 घर थे जब बना था नगर पालिका 

8644 मकान हो गए हैं अब शहर में निबंधित 

अनिबंदित घरों की भी संख्या शहर में कम नहीं

10 फरवरी 1885 को नगरपालिका बना था दाउदनगर

उपेंद्र कश्यप, जागरण ● दाउदनगर (औरंगाबाद) :

दाउदनगर सोन के तट पर बसा हुआ एक महत्वपूर्ण शहर है। कभी यह कस्बा हुआ करता था। वर्ष 1881 में यहां की जनसंख्या मात्र 8225 थी। एक कहावत है- शहर में सासाराम और चट्टी में दाउदनगर। यह काफी मशहूर चट्टी हुआ करता था। उद्योग भी यहां थे। बादशाह औरंगजेब के सिपहसालार दाऊद खान द्वारा 17 वीं सदी में बसाया गया यह शहर है। यहां के लोगों में तब छटपटाहट थी और इसे नगर का दर्जा देने के लिए प्रयास हुआ। अंततः 10 फरवरी 1885 को तत्कालीन उड़ीसा, बिहार और बंगाल की सरकार ने इसे नगर पालिका का दर्जा दे दिया। महत्वपूर्ण तथ्य है कि 22 मार्च 1912 को बिहार और उड़ीसा को बंगाल से अलग करके बिहार और उड़ीसा प्रांत बनाया गया था। और फिर एक अप्रैल 1936 को बिहार और उड़ीसा को अलग-अलग प्रांत बना दिया गया था। तब से यह शहर काफी कुछ बदल गया। तब की आबादी से आठ गुना शहर की आबादी हो गई। वर्ष 2023 में हुए जाति सर्वे के अनुसार शहर की जन संख्या 65543 है। तब जितनी आबादी थी उससे अधिक तो अब शहर में घर बन गए हैं। नगर परिषद में आज 8644 घर निबंधित है। बताया जाता है कि शहर में अनिबंधित घरों की भी संख्या कम नहीं है। धीरे-धीरे विकास होता गया और शहर में घर बनते चले गए। यह आंकड़ा 2017-18 का है। उसके बाद अपडेट नहीं हुआ है। अपडेट करने के लिए सर्वे की आवश्यकता है और अभी सर्वे नहीं हुआ है।



सबसे अधिक वार्ड 16 में, 

सबसे कम चार में घर


शहर में कुछ इलाके काफी सघन है तो कुछ इलाके काफी खुले हुए है। वार्ड वार अगर निर्मित घरों का आकलन करें तो सबसे अधिक घर 565 वार्ड संख्या 16 में है। इसके बाद 562 घर वार्ड संख्या 23 में और 526 घर वार्ड संख्या 15 में है। सबसे कम घर वाले तीन वार्डों में 156 घर के साथ वार्ड संख्या चार शीर्ष पर है। जबकि 209 घर के साथ वार्ड संख्या एक है दूसरे स्थान पर। कुल 245 घर के साथ वार्ड संख्या 18 तीसरे स्थान पर है।



कार्यपालक बोले- शीघ्र होगा सर्वे

फोटो-ऋषिकेश अवस्थी

कार्यपालक पदाधिकारी ऋषिकेश अवस्थी ने बताया कि होल्डिंग सर्वे के लिए एजेंसी तय कर लिया गया था। लेकिन कुछ वार्ड पार्षदों के अनावश्यक हस्तक्षेप से मामला लटक गया। अब विभाग ने नया एजेंसी भेज दिया है। उस एजेंसी ने कोई सर्वे अभी तक नहीं किया है। नगर परिषद ने विभागीय निर्देश प्राप्त कर लिया है। होल्डिंग सर्वे एक से डेढ़ माह में कार्य आरंभ हो जाएगा। अगर विभाग सर्वे नहीं किया तो नप कराएगी। 




इस प्रकार वार्डों में बने हैं घर 

वार्ड संख्या - होल्डिंग की संख्या एक-209

दो-356 

तीन-387 

चार-156 

पांच-278 

छह-359 

सात-251 

आठ-359 

नौ-481 

10- 249 

11-320 

12-386 

13-427 

14-451 

15-526 

16-565 

17-307 

18-245 

19-479 

20-440 

21-498

22- 353 

23-562 

कुल- 8644



Wednesday, 22 January 2025

जहां आए थे बोस, वह बने प्रेरणा स्थल तो पीढियां होंगी प्रेरित


 लंबे प्रयास के बाद बनी प्रतिमा, विकास की आस अधूरी 

1939 में नौ और 10 फरवरी को चौरम थे सुभाष चंद्र बोस 

चतुर्थ गया जिला कांग्रेस सम्मेलन में लिए थे भाग 

प्रेरणा स्थल के रूप में किया जाना चाहिए विकसित


 उपेंद्र कश्यप, जागरण ● दाउदनगर (औरंगाबाद) : वर्ष 1939 में नौ और 10 फरवरी को यहां के चौरम में चतुर्थ गया जिला कांग्रेस सम्मेलन का आयोजन किया गया था। सुभाष चंद्र बोस शामिल हुए थे। उन्होंने यहीं से तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा का नारा बुलंद किया था और जवाहरलाल नेहरू को एक पत्र लिखा था। इन यादों को संरक्षित करते हुए यहां सुभाष चंद्र बोस की प्रतिमा स्थापित की गई है। वर्ष 2021 में जब यहां वंदना कुमारी मुखिया बनी तब उन्होंने यहां उनकी आदमकद प्रतिमा स्थापित की। इसके पहले लंबे समय तक यह कोशिश चलती रही। विकास की आस अभी अधूरी है। वास्तव में इस स्थल को युवाओं के लिए प्रेरणा स्थल बनाया जा सकता है। जिससे पीढियां प्रेरित होकर राष्ट्रभक्ति के जज्बे से सराबोर हो सकेंगे। यहां तब बड़े-बड़े नेताओं का जुटान हुआ था। यदि चौरम खेल मैदान की चारदीवारी कर इसे प्रेरणास्थल के रूप में विकसित किया जाए, यहां बड़ा पुस्तकालय का निर्माण हो, जिसमें सुभाष चंद्र बोस की जीवनी से संबंधित पुस्तक हो, तब आयोजित चतुर्थ गया जिला कांग्रेस सम्मेलन से जुड़ी यादें रखे जाएं तो यहां आने वाली पीढियों को प्रेरित कर सकेगा। उनमें राष्ट्रवाद का जज्बा भर सकेगा। लेकिन यह उम्मीद कब पूरी होगी या पूरी होगी भी कि नहीं, फिलहाल यह कहने की स्थिति में कोई नहीं है। इसी पंचायत के विकास कुमार कहते हैं कि जनप्रतिनिधियों ने स्टेडियम बनाने का वादा तो किया लेकिन इस दिशा में कोई काम नहीं हुआ।




होता है बड़े खेल आयोजन, बने स्टेडियम 

विकास कुमार कहते हैं कि इसे बड़े स्टेडियम का आकार दिया जाना चाहिए। यहां कई अंतरराज्यीय फुटबाल और क्रिकेट टूर्नामेंट हो चुका है और प्रायः आयोजन होते रहते हैं। दूर-दूर से यहां खिलाड़ी आ चुके हैं। यदि इसे बड़े स्टेडियम के रूप में विकसित किया जाए तो युवाओं को बेहतर माहौल और खेल परिसर मिल सकता है।




हो राजकीय समारोह, बने पुस्तकालय 

श्री सुभाष चंद्र बोस संघर्ष समिति चौरम के अध्यक्ष मनु कुमार ने कहा कि वे जयंती कार्यक्रम करते हैं। लेकिन यहां चारदीवारी व स्टेडियम बनाया जाना चाहिए। बड़े पुस्तकालय की आवश्यकता है। यह ऐतिहासिक महत्व का स्थल है। जिस तरह से ऐतिहासिक धरोहरों को सरकार संरक्षित करती है, उसके विकास का काम करती है वैसा यहां नहीं हो रहा। यहां राजकीय समारोह किए जाने की जरूरत है।

23 जनवरी 2025 को दैनिक जागरण में प्रकाशित 



Sunday, 31 March 2024

एनडीए के उपेंद्र कुशवाहा के खिलाफ लड़ेंगे इंडी के राजा राम सिंह



एक बार सांसद बन चुके हैं राजग प्रत्याशी 

भाकपा माले प्रत्याशी को राजद व कांग्रेस का समर्थन

सभी तीन चुनाव लड़कर हार चुके हैं राजाराम सिंह

उपेंद्र कश्यप

शनिवार को भाकपा माले ने ओबरा से दो बार विधायक रहे राजाराम सिंह को काराकाट से अपना प्रत्याशी घोषित किया है। इनसे पहले उपेंद्र कुशवाहा राष्ट्रीय लोक मोर्चा के घोषित प्रत्याशी हैं। अब यह लगभग तय हो गया है कि मुख्य भिड़ंत इन्हीं दोनों के बीच होगी। कोई अन्य दल से कोई बड़ा नाम बतौर प्रत्याशी आ जाये तो खेल बदल सकता है। एनडीए और इंडिया दोनों ही गठबंधन के प्रत्याशी एक ही जाति से हैं। दोनों ही गठबंधनों के बीच सीधी टक्कर की संभावना है क्योंकि इतिहास यही बता रहा है। भाजपा नीत राजग के गठबंधन ने राष्ट्रीय लोक मोर्चा के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा को काराकाट से प्रत्याशी बनाया है। जबकि इंडिया गठबंधन ने भाकपा माले के नेता राजा राम सिंह को प्रत्याशी बनाया है। वे ओबरा विधान सभा क्षेत्र से दो बार बतौर भाकपा माले प्रत्याशी 1995 व 2000 में विधायक रहे हैं। पहले काराकाट से तीन बार प्रत्याशी रहे लेकिन तीनों बार हार गए। इस बार उनको राजद व कांग्रेस का भी समर्थन प्राप्त है। इसलिए पूर्व की अपेक्षा काफी मजबूत प्रत्याशी माने जा रहे हैं।



चार वर्ष पूर्व तय था माले के लिए काराकाट

वर्ष 2020 में बिहार विधानसभा का जब चुनाव हुआ तो राजद ने वामपंथी दलों के साथ गठबंधन किया। तब ओबरा सीट राजद के खाते में चली गयी थी। जबकि माले नेता राजराम सिंह यहां से दो बार विधायक रह चुके हैं। तभी यह चर्चा हो गई थी कि ओबरा विधानसभा क्षेत्र से राजाराम सिंह के चुनाव नहीं लड़ने का कारण एक मात्र है कि डा. कांति सिंह ने अपने पुत्र ऋषि कुमार के लिए ओबरा सीट को लेकर विशेष आग्रह किया था। राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद ने इस आग्रह को स्वीकार कर लिया था। ऋषि कुमार चुनाव लड़कर विधायक बन गए। उसी समय चर्चा थी कि यह समझौता सिर्फ इसलिए हुआ है कि लोकसभा के चुनाव में काराकाट सीट राजाराम सिंह को दी जाएगी। यानी जो चर्चा चार साल पहले हुई थी, वह अब जाकर सत्य साबित हुई।



आम चुनाव 2019 में प्रदर्शन

प्रत्याशी- पार्टी- प्राप्त मत- वोट प्रतिशत 

महाबली सिंह - जदयू- 398408- 45.86

उपेंद्र कुशवाहा-रालोसपा-313866- 36.13

राजाराम सिंह-भाकपा माले-24932 2.87


वर्ष 2014 में प्रदर्शन


उपेंद्र कुशवाहा -रालोसपा -338892- 39.01

महाबली सिंह-जदयू-76709- 8.83

संजय केवट-बसपा-45503 -5.24

राजा राम सिंह-भाकपा माले- 32686- 3.76


वर्ष 2009 में प्रदर्शन

महाबली सिंह-जदयू- 196946 - 22.67


राजा राम सिंह-भाकपा माले- 37493- 4.32


Friday, 22 March 2024

काराकाट लोकसभा : कुशवाहा लैंड में भगवा-लाल जंग की सजी बिसात

 


कुशवाहा लैंड में मुख्य भिड़ंत कुशवाहों में तय

उपेंद्र कुशवाहा के खिलाफ इंडी के राजा राम प्रत्याशी 

एक बार सांसद बन चुके हैं राजग प्रत्याशी उपेंद्र कुशवाहा 

सभी चुनाव लड़कर जमानत गवां चुके हैं राजाराम सिंह 

उपेंद्र कश्यप, दाउदनगर (औरंगाबाद) : काराकाट लोक सभा क्षेत्र से सभी चुनाव में कुशवाहों की जीत हुई है। इस कारण इसे कुशवाहा लैंड कहा जाता है। इस लोकसभा चुनाव में भी कुशवाहों के बीच ही मुख्य भिड़ंत होगी। अभी तक जिन प्रत्याशियों के नाम स्पष्ट हो चुके हैं उससे यह साफ है कि एनडीए और इंडिया दोनों ही गठबंधन के प्रत्याशी कुशवाहा जाति से हैं। दोनों ही गठबंधनों के बीच सीधी टक्कर की संभावना है क्योंकि इतिहास यही बता रहा है। भाजपा नीत राजग के गठबंधन ने राष्ट्रीय लोक मोर्चा के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा को काराकाट से प्रत्याशी बनाया है। जबकि इंडिया गठबंधन ने भाकपा माले के नेता राजा राम सिंह को प्रत्याशी बनाया है। 2008 के परिसीमन के वक्त काराकाट वजूद में आया और 2009, 2014 और 2019 में हुए लोकसभा चुनाव में जीत कुशवाहा जाति के नेताओं की हुई है। 2009 में राजद के डा. कांति सिंह को जदयू के महाबली सिंह ने हराया तो 2014 के चुनाव में राजग का गठबंधन की तरफ से रालोसपा के प्रत्याशी बने उपेंद्र कुशवाहा ने जीत दर्ज की और तब राजद की डा. कांति सिंह चुनाव हार गईं। तब जदयू के महाबली सिंह तीसरा स्थान पर थे। जबकि कुशवाहा जाति के ही राजा राम सिंह भी पांचवे स्थान पर थे। इनसे अधिक मत बसपा प्रत्याशी संजय केवट लाने में सफल रहे थे। फिर 2019 में जब चुनाव हुआ तो राजग की तरफ से जदयू प्रत्याशी महाबली सिंह ने तत्कालीन महागठबंधन का हिस्सा रहे राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के उपेंद्र कुशवाहा को हराया। राजाराम सिंह का प्रदर्शन तीनों ही चुनाव में खराब रहा है। जब तीनों दल भाजपा, जदयू व राजद अलग-अलग थे तब भी। महाबली सिंह से खराब प्रदर्शन राजाराम का रहा है। तीनों चुनाव में राजाराम सिंह अपनी जमानत तक नहीं बचा सके हैं। अब इस बार आमने-सामने की टक्कर में माना जा रहा है कि पूर्व की अपेक्षा राजाराम सिंह का प्रदर्शन बेहतर होना तय है। परिणाम चाहे जो हो।




आम चुनाव 2019 में प्रदर्शन

प्रत्याशी- पार्टी- प्राप्त मत- वोट प्रतिशत 

महाबली सिंह - जदयू- 398408- 45.86

उपेंद्र कुशवाहा-रालोसपा-313866- 36.13

राजाराम सिंह-भाकपा माले-24932 2.87


वर्ष 2014 में प्रदर्शन


उपेंद्र कुशवाहा -रालोसपा -338892- 39.01

महाबली सिंह-जदयू-76709- 8.83

संजय केवट-बसपा-45503 -5.24

राजा राम सिंह-भाकपा माले- 32686- 3.76


वर्ष 2009 में प्रदर्शन

महाबली सिंह-जदयू- 196946 - 20483


राजा राम सिंह-भाकपा माले- 37493- 4.32



कुशवाहा लैंड में कुशवाहा ने किया कुशवाहा का पत्ता साफ

उपेंद्र कुशवाहा के आने से दो बार के सांसद हुए बेटिकट 

वर्ष 2014 में हो चुका है उपेंद्र और महाबली में मुकाबला 


चुनाव जीतने की रणनीति पर काम कर रहे थे महाबली

उपेंद्र कश्यप, दाउदनगर (औरंगाबाद) : भाजपा ने सीट शेयरिंग फार्मूला के तहत काराकाट की सीट राष्ट्रीय लोक मोर्चा को दी है। इस पार्टी से अधिक चर्चा इस बात की है कि भाजपा ने उपेंद्र कुशवाहा को यह सीट दिया है। इससे यह साफ संदेश जा रहा है कि काराकाट लोकसभा सीट से एनडीए के प्रत्याशी उपेंद्र कुशवाहा ही होंगे। लगातार कुशवाहा जाति के व्यक्ति के सांसद बनने से इसे कुशवाहा लैंड कहा माना जाने लगा है। ऐसी स्थिति बनते ही दो बार के सांसद रह चुके जदयू के नेता महाबली सिंह बेटिकट हो गए। जबकि वह लगातार परिश्रम कर रहे थे और चुनाव जीतने की रणनीति पर काम कर रहे थे। सूत्रों के अनुसार महाबली सिंह ने अपने खास कार्यकर्ताओं को सक्रिय भी कर दिया था और चुनावी मैनेजमेंट के सभी आयामों पर काम करने का निर्देश दे रखा था। लगातार इलाके का दौरा कर रहे थे। सब कुछ उस वक्त धराशाई हो गया जब एनडीए में उपेंद्र कुशवाहा के लिए काराकाट सीट देने के लिए जदयू ने अपने सीटिंग सीट से समझौता कर लिया। महत्वपूर्ण है कि उपेंद्र कुशवाहा पहली बार सांसद बने तो काराकाट के मतदाताओं के कारण। वर्ष 2008 में अस्तित्व में आये इस सीट पर जब 2009 में चुनाव हुआ तो राजग गठबंधन से जदयू के प्रत्याशी महाबली सिंह सांसद बने और राजद के कांति सिंह को यहां हार मिली थी। वर्ष 2014 में जब नरेंद्र मोदी भाजपा के प्रधानमंत्री चेहरा घोषित किए गए तो जदयू अलग हो गई और तब यहां से राजग का सहयोगी बनकर राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के उपेंद्र कुशवाहा चुनाव लड़ते हैं। महाबली सिंह जदयू से प्रत्याशी रहते हैं और राजद से डा.कांति सिंह। पहली बार इसी चुनाव में उपेंद्र कुशवाहा को जीत मिली और वह लोकसभा पहुंच सके। फिर 2019 के चुनाव में रालोसपा राजद के साथ जुड़ गई और दो बार हार के कारण राजद ने डा. कांति सिंह की जगह उपेंद्र कुशवाहा को टिकट दे दिया और राष्ट्रीय लोक समता पार्टी से वह चुनाव लड़ कर हार जाते हैं। इस चुनाव में महाबली सिंह जदयू के टिकट पर चुनाव लड़ते हैं और चुनाव जीत जाते हैं। अब जब फिर से उपेंद्र कुशवाहा सामने आ गए हैं तो महाबली सिंह का टिकट कट गया। उनकी सारी रणनीति धरी की धरी रह गई। उनका विश्वास टूट गया।




Friday, 8 March 2024

औरंगाबाद व काराकाट में महिला नेत्रियों की भूमिका प्रभावी नहीं

 


औरंगाबाद से दो महिला पहुंची हैं संसद 

काराकाट में मंत्री रहते हार चुकी हैं डा.कांति सिंह

सिर्फ ललीता राज लक्ष्मी व श्यामा सिंह बन सकी सांसद


ललिता राज लक्ष्मी


उपेंद्र कश्यप, दाउदनगर (औरंगाबाद) : वर्ष 1914 से विश्व में आठ मार्च को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाता है। भारत में 1951-52 में पहली लोकसभा और विधानसभा चुनाव हुआ था। तब से अब तक का इतिहास यह बताता है कि महिला जनप्रतिनिधियों की सहभागिता लगभग नगण्य रही है। कभी प्रभावी भूमिका में महिला प्रतिनिधि नहीं दिखी। औरंगाबाद लोकसभा क्षेत्र में दो बार महिलाओं को प्रतिनिधित्व का मौका मिला। लेकिन काराकाट लोकसभा क्षेत्र से मंत्री रहते डा. कांति सिंह चुनाव हार गयीं। यहां से कोई महिला संसद न जा सकी है। ओबरा विधानसभा क्षेत्र का भी यही हाल है। जहां से कभी महिला विधायक नहीं बनी। हालांकि कुसुम यादव ने एक प्रयास किया था। प्राप्त विवरण के अनुसार 1962 में स्वतंत्र पार्टी की ललिता राज लक्ष्मी और 1999 में कांग्रेस से श्यामा सिंह औरंगाबाद लोकसभा क्षेत्र से लोकसभा पहुंचने में कामयाब रही हैं। श्यामा सिंह वर्ष 1989 में पहली बार जब चुनाव लड़ी थी तो उन्हें 212411 मत मिला था लेकिन तब जनता दल के रामनरेश सिंह 239493 मत लाकर चुनाव जीत गए थे। यह वह दौर था जब कहा जाता था कि सत्येंद्र नारायण सिंह किसी को भी खड़ा कर देंगे तो वह चुनाव जीत जाएगा। लेकिन उनकी पुत्रवधू ही यह चुनाव हार गई। वर्ष 1999 में श्यामा सिंह तब जीती जब कांग्रेस के साथ राजद का गठबंधन हुआ और वह 317418 मत लाकर चुनाव जीत गई।


पहली बार आरा और उसके बाद दो बार बिक्रमगंज से सांसद रही डा. कांति सिंह केंद्र में मंत्री रहते हुए वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव में बतौर राजद उम्मीदवार काराकाट से चुनाव हार गई। इसके बाद 2014 में भी चुनाव हार गई। वह वर्ष 2004 से 2006 तक केंद्रीय राज्य मंत्री, मानव संसाधन विकास मंत्रालय और 2006 से 2009 तक केंद्रीय राज्य मंत्री, भारी उद्योग रही हैं। इनके अलावा कोई महिला नेत्री काराकाट लोक सभा क्षेत्र से महत्वपूर्ण उपस्थिति दर्ज कराने में कामयाब नहीं रही।



बोलते आंकड़े :-


वर्ष - लोकसभा क्षेत्र- विजेता- पार्टी- प्राप्त मत-उप विजेता-पार्टी- प्राप्त मत

1962 -औरंगाबाद-ललिता राज लक्ष्मी -स्वतंत्र पार्टी- 64552-रमेश प्रसाद सिंह-आईएनसी- 54791


1989 -औरंगाबाद- रामनरेश सिंह-जनता दल- 269493-श्यामा सिंह-आईएनसी-212411


1999-श्यामा सिंह-आईएनसी-317418-सुशील कुमार सिंह-जनता दल यू-247002


2009-काराकाट-महाबली सिंह-जद यू-196946-कांति सिंह-राजद-176463


2014-काराकाट-उपेंद्र कुशवाहा                        रालोसपा-338892-कांति सिंह-राजद-233651

(ध्यातव्य:- काराकाट लोक सभा क्षेत्र का गठन व प्रथम चुनाव 2009 में हुआ था)



1985-ओबरा विधान सभा-कुसुम यादव--कांग्रेस-13395 मत


ओबरा से कभी महिला नहीं बन सकी विधायक 


ओबरा विधानसभा क्षेत्र से कभी कोई महिला विधायक नहीं बन स्की। वर्ष 1985 में इंडियन नेशनल कांग्रेस से कुसुम देवी चुनाव लड़ी थी। तब उन्हें 13395 वोट मिला था और तीसरे स्थान पर रही थी। इस चुनाव में लोक दल से रामविलास सिंह चुनाव जीते थे और भाजपा के वीरेंद्र प्रसाद सिंह दूसरे स्थान पर रहे थे। वे 1980 में विधायक बने थे। ओबरा क्षेत्र की राजनीति में कुसुम देवी चर्चित चेहरा रही हैं। इन्हीं के नाम पर तरारी में कुसुम कुसुम यादव कालेज चलता है। इसके अलावा कभी कोई महत्वपूर्ण उपस्थिति महिला प्रतिनिधित्व की ओबरा विधानसभा क्षेत्र में नहीं रही।

श्यामा सिंह