Monday, 30 January 2023

एक ही भवन में रहते हुए सबको अलग अलग दिखाने का आग्रह

 


पक्का मकान वाले भी कच्चा लिखवाने पर देते थे जोर

जाति आधारित गणना में सामने आया समाज की सोच का यह सच

दाउदनगर (औरंगाबाद) :

जनगणना का पहला चरण सम्पन्न हो गया है। सामान्य प्रशासन विभाग बिहार सरकार द्वारा कराए जा रहे जाति आधारित गणना का कार्य अनुमण्डल के पोषक क्षेत्रों में संपन्न कराया गया। प्रथम चरण में मकान नंबरी करण का कार्य हुआ। नजरी नक्शा का निर्माण किया। घर घर जाकर एक एक व्यक्ति से संपर्क स्थापित कर मकान नंबर का कार्य किया। लोगों में यह जिज्ञासा है कि आखिर इस दरम्यान किस तरह से कार्य किये गए। क्या समस्या आई होगी कर्मियों को। आम लोगों की तरफ से क्या सवाल किए जाते थे। यह जानने के लिए इस कार्य में लगे कई कर्मियों से दैनिक जागरण ने बातचीत की। समाज का सच खुल कर सामने आया। कुछ ने तथ्य तो बताया किंतु नाम न छापने का आग्रह भी किया। बताया गया कि लोगों का जोर था कि उनके पक्का मकान को भी कच्चा मकान नजरी नक्शा में प्रदर्शित किया जाये और भाई-भाई को एक ही भवन में अलग-अलग दिखाया जाए। इस दबाव में जो कर्मी आये उन्होंने सामने वालों की इच्छानुसार सर्वे कागज पर लिखा। तभी घर परिवार के मुखिया ने उस दस्तावेज पर हस्ताक्षर किया। लोगों का कहना था कि रहते तो है एक ही भवन में लेकिन चुल्ला अलग अलग जलता है। 



प्रगणकों पर बनाया गया दबाव


मकसद सरकारी योजनाओं का लाभ लेना

प्रगणक मकान में जितने परिवार रहते थे उनके मुखिया का नाम लिखते हुए उनका सदस्यों की संख्या का आकलन किया। परंतु लोगों ने दबाव बनाया गया कि परिवार को अलग-अलग परिवार बनाकर गणना किया किया जाए। इतना ही नहीं अपने माता-पिता को भी अलग परिवार मानकर गणना कराने के लिए दबाव बनाया। जबकि यह नियम के विरुद्ध था। इसके लिए कई स्तरों पर  शिकायतें भी की गई। स्थल निरीक्षण कर उसका समाधान किया गया। इस तरह  पढ़ने लिखने के बावजूद सरकारी लाभ प्राप्त करने के लिए निजी स्वार्थ में अपने अनुसार कार्य कराने के लिए दबाव बनाया गया।



सीमावर्ती क्षेत्र में अलग समस्या

कुछ चुनौतियां नगर परिषद क्षेत्र के पंचायत से लगे सीमा पर आई कि यह इलाका नगरीय क्षेत्र का है या ग्रामीण। प्रपत्र पर हस्ताक्षर कराने में भी समस्या आयी। कुछ ग्रामीणों द्वारा हस्ताक्षर करने से इनकार किया जा रहा था। तर्क यह कि मुझे गणना नहीं कराना है। बुद्धिजीवियों, जनप्रतिनिधियों व स्थानीय लोगों के सहयोग से समझा-बुझाकर उनसे हस्ताक्षर लिया गया।



मिला अच्छा व नया अनुभव



सुनील बाबी ने बताया कि मकान गणना कार्य का एक प्रगणक के रुप में काफी सुखद अनुभव रहा। लोगों का जनगणना के प्रति विचार जानने और वार्ड के प्रत्येक घर तक पहुंच कर लोगों से मिलकर अच्छा लगा  लोगों ने भी सहयोगात्मक पहल की। कार्य क्षेत्र के वार्ड का नजरी नक्शा बनाने के लिए हर गली और मकानों तक कई बार जाकर देखना और फिर नक्शा तैयार करने का अनुभव काफी अच्छा रहा।



ब्लाक व उप गणना ब्लाक बनाना चुनौतीपूर्ण

फोटो


-रामाकान्त सिंह

नगर परिषद क्षेत्र में गणना कार्य करने वाले शिक्षक रामाकान्त सिंह ने बताया कि विभिन्न ब्लाक एवं उप गणना ब्लाक को बांटना एक बड़ी चुनौती थी। प्रत्येक वार्ड में जाकर वार्ड सदस्यों से संपर्क स्थापित कर अपने पूरे दल के साथ विभिन्न वार्डों को विभिन्न ब्लाकों में विभक्त किया। प्रत्येक ब्लाकों में प्रगंणकों की प्रतिनियुक्ति की गई।



परेशानी को किया गया ऐसे नियंत्रण

मकान गणना के प्रारम्भिक समय में थोड़ी परेशानी तो हुई लेकिन प्रखंड कार्यालय और प्रवेक्षक के सहयोग से कार्य आसान हो गया। प्रखंड मुख्यालयों में इसको लेकर कन्ट्रोल रुम बनाया गया था और ह्वाट्सएप ग्रुप भी। कोई समस्या आने पर ग्रुप में मैसेज करने पर शीघ्र ही मदद मिलता था कर्मियों को।


11 साल में गोह प्रखंड की बढ़ी मात्र 50000 आबादी

 



42698 घरों में रहते हैं 58207 परिवार 

गोह में रहते हैं कुल 284214 लोग 

वर्ष 2011 में थी 234400 आबादी

प्रखंड में है कुल 286 वार्ड, बेघर परिवारों की संख्या मात्र 19 

संवाद सहयोगी, दाउदनगर (औरंगाबाद) : दाउदनगर अनुमंडल के प्रखंड गोह में कुल 42698 घर है। जिसमें 58207 परिवार रहते हैं। जबकि 284214 यहां की कुल आबादी है। गोह प्रखंड में 19 ऐसे परिवार हैं जो बेघर हैं। बिहार सरकार द्वारा कराए जा रहे ताजा जातीय जनगणना में निकलकर यह आंकड़ा सामने आया है। यदि 2011 की जनगणना के मुकाबले इसे देखें तो लगभग मात्र 50 हजार की आबादी इस प्रखंड में बढ़ी है। 2011 की जनगणना के अनुसार गोह प्रखंड की आबादी 234400 थी। गोह में कुल 158 गांव हैं।



वर्ष 2011 की जनगणना का प्रमुख आंकड़ा


वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार गोह प्रखंड की जनसंख्या 234,400 है। इसमें 121939 पुरुष और 112461 महिलाएं हैं। कुल साक्षर लोग 77070 हैं, जिसमें 125784 पुरुष और 48714 महिला हैं। कुल 16811 किसान कृषि खेती पर निर्भर हैं। कुल 14316 पुरुषों द्वारा खेती की जाती है जबकि 2495 महिलाएं खेती करती हैं। गोह में 24010 लोग कृषि भूमि में श्रम के रूप में काम करते हैं। इसमें पुरुष 18016 और 5994 महिलाएं हैं।



जाति आधारित गणना 2022 का आंकड़ा

 पंचायत का नाम-वार्ड या गणना ब्लाक की संख्या- कुल मकानों की संख्या- कुल परिवारों की संख्या- परिवार में कुल सदस्यों की संख्या

अमारी- 14 -1999- 2778- 13780 बक्सर- 14- 2016- 2989 -14964 बनतारा- 12- 1889- 2652- 13143 बर्मा खुर्द -15- 2203- 3111- 14552 बाजार वर्मा -15- 2215- 3092- 12465 

बेरका- 14- 2031- 2654- 13484 भुरकुंडा- 15- 2277- 2883- 14256 चापुक- 15- 2039- 2646- 13668 

दधपी- 14- 2026- 2657- 12906 देवहरा- 15 -2310- 3172- 13908 डिहुरी -14- 2116- 2854- 13325 फाग-15- 2272- 3112- 14570 

गोह- 15- 2293- 3059 -14356 हसनपुर- 14- 2104 -2487 -13499 हथियारा- 13- 2020- 2969- 15483 झिकटिया- 15 -2281- 3225- 15718 

मलहारा- 14 -2151- 2902- 14797 मीरपुर- 15- 2271- 3113- 14224 

तेयाप- 14- 2105- 2968- 15655 उपहारा- 14 -2080 -2855 -14773 कुल- 286- 42698- 58207 -284214

फोटो-जाति जनगणना का कार्य करते प्रगणक

42698 घरों में रहते हैं 58207 परिवार 

गोह में रहते हैं कुल 284214 लोग 

वर्ष 2011 में थी 234400 आबादी

प्रखंड में है कुल 286 वार्ड, बेघर परिवारों की संख्या मात्र 19 

संवाद सहयोगी, दाउदनगर (औरंगाबाद) : दाउदनगर अनुमंडल के प्रखंड गोह में कुल 42698 घर है। जिसमें 58207 परिवार रहते हैं। जबकि 284214 यहां की कुल आबादी है। गोह प्रखंड में 19 ऐसे परिवार हैं जो बेघर हैं। बिहार सरकार द्वारा कराए जा रहे ताजा जातीय जनगणना में निकलकर यह आंकड़ा सामने आया है। यदि 2011 की जनगणना के मुकाबले इसे देखें तो लगभग मात्र 50 हजार की आबादी इस प्रखंड में बढ़ी है। 2011 की जनगणना के अनुसार गोह प्रखंड की आबादी 234400 थी। गोह में कुल 158 गांव हैं।



वर्ष 2011 की जनगणना का प्रमुख आंकड़ा


वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार गोह प्रखंड की जनसंख्या 234,400 है। इसमें 121939 पुरुष और 112461 महिलाएं हैं। कुल साक्षर लोग 77070 हैं, जिसमें 125784 पुरुष और 48714 महिला हैं। कुल 16811 किसान कृषि खेती पर निर्भर हैं। कुल 14316 पुरुषों द्वारा खेती की जाती है जबकि 2495 महिलाएं खेती करती हैं। गोह में 24010 लोग कृषि भूमि में श्रम के रूप में काम करते हैं। इसमें पुरुष 18016 और 5994 महिलाएं हैं।



जाति आधारित गणना 2022 का आंकड़ा

 पंचायत का नाम-वार्ड या गणना ब्लाक की संख्या- कुल मकानों की संख्या- कुल परिवारों की संख्या- परिवार में कुल सदस्यों की संख्या

अमारी- 14 -1999- 2778- 13780 बक्सर- 14- 2016- 2989 -14964 बनतारा- 12- 1889- 2652- 13143 बर्मा खुर्द -15- 2203- 3111- 14552 बाजार वर्मा -15- 2215- 3092- 12465 

बेरका- 14- 2031- 2654- 13484 भुरकुंडा- 15- 2277- 2883- 14256 चापुक- 15- 2039- 2646- 13668 

दधपी- 14- 2026- 2657- 12906 देवहरा- 15 -2310- 3172- 13908 डिहुरी -14- 2116- 2854- 13325 फाग-15- 2272- 3112- 14570 

गोह- 15- 2293- 3059 -14356 हसनपुर- 14- 2104 -2487 -13499 हथियारा- 13- 2020- 2969- 15483 झिकटिया- 15 -2281- 3225- 15718 

मलहारा- 14 -2151- 2902- 14797 मीरपुर- 15- 2271- 3113- 14224 

तेयाप- 14- 2105- 2968- 15655 उपहारा- 14 -2080 -2855 -14773 कुल- 286- 42698- 58207 -284214

Sunday, 6 November 2022

पहली बार व्यापार मंडल अध्यक्ष की कुर्सी अंछा को मिली

 


फ़ोटो-व्यापार मंडल का नया-पुराना गोदाम

08 बार कुर्मी, 04 बार राजपूत व एक बार यादव जाति से बने अध्यक्ष

उपेंद्र कश्यप । दाउदनगर (औरंगाबाद)

व्यापार मंडल के अध्यक्ष पद का चुनाव परिणाम जब आया तो अंछा गांव उछल पड़ा। कारण स्पष्ट है कि पहली बार इस गांव के किसान नेता को यह कुर्सी मिली और जातीय संदर्भ में चौथी बार राजपूत जाति से कोई व्यक्ति अध्यक्ष बना। इसके पहले सिर्फ जिनोरिया निवासी सुदेश सिंह ही इस जाति से इस पद पर रहे हैं। वे तीन बार अध्यक्ष रहे हैं। 1983 के चुनाव से अब तक का इतिहास जो ज्ञात है, उसके अनुसार उप चुनाव और कार्यकारिणी द्वारा अध्यक्ष चुने जाने समेत 13 बार अध्यक्ष बने हैं। चुन्नू 12 वें अध्यक्ष बने थे। 13 वें अध्यक्ष राम बचन सिंह बने। व्यापार मंडल पर कुर्मी जाति का एकाधिकार रहा है। आठ बार कुर्मी जाति के नेता अध्यक्ष बने हैं। जबकि चार बार राजपूत और एक बार यादव जाति से। 1978 में तरारी से मुखिया बने बेलाढी निवासी दिनेश सिंह कुर्मी थे। वे 1983 और 1986 में व्यापार मंडल का अध्यक्ष बने। इनके बाद 1989, 1992 और 1995 में लगातार तीन बार संसा के हीरालाल सिंह अध्यक्ष बने। वे भी कुर्मी थे। उसी तरह 1998 और 2001 में गोरडीहां निवासी मुखिया रहे भगवान सिंह अध्यक्ष बने। वे भी कुर्मी हैं। 04 जनवरी 2016 को बेलाढी निवासी दीपक सिंह अध्यक्ष बने, वे भी कुर्मी थे। बताया कि कार्यकारिणी से उन्हें कार्यकारी अध्यक्ष तब बनाया गया था। जब सुदेश सिंह की हत्या से यह कुर्सी खाली पड़ी हुई थी। बीच में सिर्फ सुदेश सिंह ही ऐसे सवर्ण नेता रहे जो तीन बार अध्यक्ष बने। वे जाति से राजपूत थे, जिनोरिया के निवासी। करमा पंचायत के मुखिया भी रहे हैं। 2004 में कार्यकारिणी ने उनको अध्यक्ष चुना था। 2007 में चुनाव जीत कर अध्यक्ष बने और फिर तीसरी बार अगस्त 2012 में अध्यक्ष बने थे। 04 अक्टूबर 2012 को हत्या होने तक वे इस पद पर रहे। सुदेश सिंह भी पिछड़ा और राजद की राजनीति करके ही व्यापार मंडल का अध्यक्ष बने थे। वर्ष 2017 में पहली बार हुआ था जब चुन्नू यादव व्यापार मंडल के अध्यक्ष बने। अब वे हार गए हैं और राम बचन सिंह अध्यक्ष बने हैं।


  



पिताजी की दुर्घटना के कारण हार : पूर्व अध्यक्ष

फोटो-चुन्नू यादव

पराजित व्यापार व्यापार मंडल अध्यक्ष चुन्नू यादव ने बताया कि सेवानिवृत्त शिक्षक पिता ललन सिंह के दुर्घटनाग्रस्त होने के कारण उन्हें किसानों के बीच जाने का वक्त कम मिला। वे उनके इलाज में व्यस्त व तनावग्रस्त रहे। जब मिले भी तो तनावपूर्ण स्थिति में रहे। इसका प्रभाव पड़ा। बेहतर कार्यालय ना बनवा सकने का सपना जहां अधूरा रह गया वहीं जीतने के बाद किसानों को पहली बार बताया कि व्यापार मंडल धान भी खरीदता है। किसानों को लाभ पहुंचाया।



हार जीत की समीक्षा कर रहे नेता व समर्थक

 राम बचन सिंह व्यापार मंडल के अध्यक्ष बन गए और इस कुर्सी से विदा हो गए सुजीत कुमार सिंह उर्फ चुन्नू यादव। जिस चुन्नू यादव को पक्के तौर पर विजेता मान लिया गया था उनकी हार की वजह क्या है। राजनीतिक प्रेक्षकों का मानना है कि लगभग 450 मतदाता अंछा गांव के हैं। इसके बाद बड़ी संख्या में लगभग 250 या इससे अधिक मतदाता करमा पंचायत के हैं। 125 से 150 तक मतदाता बेलवां, चौरी और नगर परिषद क्षेत्र में है। राजनीतिक प्रेक्षकों का मानना है कि पिछले चुनाव में अंछा के मतदाता रामबचन सिंह के साथ खड़े न होकर चुन्नू यादव के साथ खड़े हुए थे। इस बार उन्होंने रामबचन सिंह का समर्थन किया और इस कारण चुनाव परिणाम प्रभावित हुआ। जो वर्ग प्रखंड प्रमुख के चुनाव के वक्त की गयी कथित जातीय राजनीति का आरोप लगा रहा था वह अब परिणाम से उत्साहित है। ऐसे समूह की मंशा पूरी हो गई है। जिसकी चर्चा इलाके में है। मण्डली से घिरे होने को भी लोग कारण बता रहे लेकिन इस तरह के आरोपको चुन्नू यादव ने खारिज कर दिया है।



Thursday, 3 November 2022

आज मिलेगा व्यापार मंडल को 13 वां अध्यक्ष

 


मतदान बाद तुरन्त मतगणना व परिणाम आज

12 मतदान कर्मियों ने किया योगदान

2 पदों के लिए होना है चुनाव 10 पदों पर निर्विरोध निर्वाचन



दाऊदनगर व्यापार मंडल के अध्यक्ष का आज चुनाव होना है। 1983 में हुए पहले चुनाव से अब तक का 12 बार चुनाव हो चुका है। इसमें उप चुनाव और कार्यकारिणी द्वारा अध्यक्ष चुना जाना शामिल है।

शुक्रवार को व्यापार मंडल अध्यक्ष और प्रबंध कार्यकारिणी समिति के एक सदस्य के लिए मतदान होना है। प्रबन्ध कार्यकारिणी के लिए 12 पदों का चुनाव होता है। इसमें 10 का निर्विरोध चुनाव हो चुका है। प्राप्त जानकारी के अनुसार प्रथम वर्ग से सदस्य के छह पदों में से पांच पदों के लिए निर्विरोध निर्वाचन हो चुका है। जबकि एक पद रिक्त रह गया है। द्वितीय वर्ग के सदस्य के छह पदों में से पांच पदों पर निर्विरोध निर्वाचन हो चुका है। अनुसूचित जाति वर्ग के सदस्य के एक पद के लिए मतदान होगा। जिसके लिए तीन उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं। चुनाव के लिए प्रशासनिक तैयारियां पूरी कर ली गई है। बताया गया कि 12 मतदानकर्मियों ने योगदान किया है। टेंट वगैरह लगा दिया गया है।



अध्यक्ष व सदस्य के लिए तीन-तीन प्रत्याशी

दाउदनगर व्यापार मंडल के चुनाव में 1959 मतदाता हैं। इसमें प्रथम वर्ग (सहकारी समितियां) से 15 व द्वितीय वर्ग (व्यक्तिगत किसान) से 1944 मतदाता हैं। प्रखंड कार्यालय परिसर में बनाए गए तीन मतदान केंद्रों पर कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच ये मतदान करेंगे। बीडीओ सह प्रखंड निर्वाचन पदाधिकारी योगेंद्र पासवान ने बताया कि चुनाव की सारी तैयारियां पूरी कर ली गई है। 

अध्यक्ष पद के लिए निवर्तमान अध्यक्ष सुजीत कुमार सिंह उर्फ चुन्नु यादव, पूर्व पैक्स अध्यक्ष रामवचन सिंह एवं राजद प्रखंड अध्यक्ष देवेंद्र कुमार सिंह मैदान में हैं। जबकि द्वितीय वर्ग से अनुसूचित जाति के एक पद के लिए तीन प्रत्याशी मैदान में है। इसके लिए विदेश राम, शम्भू पासवान एवं केदार पासवान के बीच मुकाबला है। 




प्रथम वर्ग का एक पद रह गया खाली 

सदस्य के बारह पदों में से 10 पर निर्विरोध निर्वाचन हुआ क्योंकि यहां दूसरे ने नामांकन ही नहीं किया। प्रथम वर्ग का एक पद अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है। जिस पर कोई नामांकन नहीं हुआ। यह पद खाली ही रह गया और बाद में भी इस पर चुनाव कराया जाना संभव नहीं रहा। सूत्रों के अनुसार प्रथम वर्ग से दाउदनगर के सभी 15 पैक्स अध्यक्ष में से ही नामांकन कोई पैक्स अध्यक्ष कर सकते हैं। लेकिन अनुसूचित जाति का कोई पैक्स अध्यक्ष दाउदनगर प्रखंड में है ही नहीं। इसलिए अनुसूचित जाति के सदस्य पद के लिए कोई नामांकन हुआ ही नहीं। नियम यह है कि इस वर्ग के अनुसूचित पद पर 15 पैक्स अध्यक्ष में से ही किसी को नामांकन करना है। 




ये हुए निर्विरोध निर्वाचित

प्रथम वर्ग के पांच सदस्य पदों पर निर्विरोध निर्वाचन हुआ है। इसमें सुभाष यादव, जितेंद्र शर्मा, सहजानंद शर्मा, मृत्युंजय शर्मा एवं डेजी कुमारी शामिल हैं। 

द्वितीय वर्ग से अनुसूचित जाति के एक पद के लिए चुनाव होना है। शेष का।निर्विरोध निर्वाचन हुआ। द्वितीय वर्ग में महिला सामान्य से मालती देवी, अन्य सामान्य सीट से सुरेंद्र कुमार शर्मा एवं नागेद्र कुमार निर्विरोध निर्वाचित कर दिए गए। अति पिछड़ा पद से कमलेश राम और पिछड़ा वर्ग से सिकंदर मेहता निर्विरोध निर्वाचित हुए। इन पदों के विरुद्ध एक से अधिक नामांकन ही नहीं हुआ। 



खुद को दोहरा रहा व्यापार मंडल चुनाव का इतिहास




फ़ोटो-दैनिक जागरण में प्रकाशित रिपोर्ट

मैदान में चुन्नू यादव, रामबचन सिंह एवं देवेंद्र सिंह 

पांच साल पहले भी तीनों ही थे एक दूसरे के प्रतिद्वंदी

ना पहले था ना अब है कोई चौथा प्रत्याशी

 0 उपेंद्र कश्यप 0

इतिहास कभी-कभी खुद को दोहराता है। खासकर राजनीति में जब इतिहास का दुहराव होता दिखता है तो उसकी चर्चा व्यापक पैमाने पर होती है। दाउदनगर व्यापार मंडल अध्यक्ष के चुनाव को लेकर भी ऐसी ही स्थिति है। यह विचित्र संयोग है कि पांच साल पहले की लड़ाई का दुहराव फिर हो रहा है। पांच साल पहले जब चुनाव हुआ था तब भी जो तीन व्यक्ति प्रत्याशी बने थे वही तीन व्यक्ति इस बार भी प्रत्याशी हैं। न पिछली दफा कोई चौथा प्रत्याशी था और ना ही इस बार कोई चौथा व्यक्ति प्रत्याशी बना है। प्राप्त आंकड़ों के मुताबिक पिछली दफा सुजीत कुमार उर्फ चुन्नू यादव को 481 मत मिले थे और चुनाव जीतकर वह व्यापार मंडल के अध्यक्ष बने। दूसरे स्थान पर अंछा के तत्कालीन पैक्स अध्यक्ष राम बचन सिंह रहे थे। जिनको 358 वोट मिला था और तीसरे स्थान पर देवेंद्र सिंह राजद प्रखंड अध्यक्ष रहे थे, जिनको 315 वोट मिला था। आंकड़ों के अनुसार विजेता ने अपने निकट प्रतिद्वंदी को 123 मत से हराया था। जबकि तीसरे स्थान पर रहे देवेंद्र सिंह पहले स्थान पर रहे सुजीत सिंह के मुकाबले 166 वोट कम ला सके थे। इस बार फिर तीनों प्रत्याशी हैं। तीनों की स्थिति लगभग एक सी है। सुजीत सिंह पैक्स अध्यक्ष के साथ व्यापार मंडल के निवर्तमान अध्यक्ष हैं। रामबचन सिंह अब पूर्व पैक्स अध्यक्ष और देवेंद्र सिंह राजद के अभी भी प्रखंड अध्यक्ष हैं। इतिहास खुद को दोहराता हुआ दिख रहा है। चुनाव परिणाम में भी इतिहास कहां खड़ा होगा यह शुक्रवार को तब स्पष्ट होगा जब मतदान के बाद मतगणना होगा और कौन बना व्यापार मंडल का अध्यक्ष यह साफ होगा।



मतदान व मतगणना की तैयारी पूरी

व्यापार मंडल चुनाव के लिए मतदान चार नवंबर को सुबह 7:00 बजे से 4:30 बजे तक होगा। मतदान केंद्र प्रखंड कार्यालय परिसर स्थित सभाकक्ष में और मनरेगा भवन में बनाया गया है। तीन मतदान केंद्र हैं। मतदान के तुरंत बाद प्रखंड कार्यालय सभाकक्ष में ही मतगणना का कार्य संपन्न होगा और इसी दिन परिणाम घोषित किया जाएगा। उम्मीद की जा रही है कि परिणाम आने तक रात हो जाएगी। मतदान व मतगणना की तैयारी लगभग पूरी कर ली गयी है।



दो श्रेणी के हैं कुल 1959 मतदाता 

प्रखंड विकास पदाधिकारी सह निर्वाचन पदाधिकारी योगेंद्र पासवान ने बताया कि व्यापार मंडल के लिए होने वाले चुनाव में कुल मतदाताओं की संख्या 1959 है। प्रथम वर्ग में 15 मतदाता हैं, जो आवश्यक रूप से पैक्स अध्यक्ष हैं। दूसरे वर्ग में 1944 मतदाता किसान वर्ग से हैं। बताया गया कि प्रखंड कार्यालय से मतदान केंद्र की दूरी लगभग 500 मीटर है। जारी सूचना के अनुसार अध्यक्ष का पद अनारक्षित है।


Tuesday, 1 November 2022

व्यापार मंडल के चुनाव को लेकर बिछने लगी है गोटियां

  


प्रखंड प्रमुख चुनाव की राजनीति का पड़ेगा प्रभाव 


जातीय राजनीति में जाति साधने की जुगत


संवाद सहयोगी । दाउदनगर (औरंगाबाद)

व्यापार मंडल के अध्यक्ष का चुनाव होना है। शुक्रवार को इसके लिए मतदान होगा और इसी दिन चुनाव परिणाम भी घोषित हो जाएगा। चुनावी बिसात पर सब कोई मोहरा बिछाने में लगे हुए हैं। जातीय राजनीति में जाति साधने की जुगत की जा रही है। बड़ा प्रश्न यह है कि क्या प्रखंड प्रमुख के चुनाव को लेकर जिस तरह की जाती की राजनीति की गई थी उसका प्रभाव व्यापार मंडल के चुनाव पर भी पड़ेगा। इस पर राजनीतिक प्रेक्षकों की नजर है। व्यापार मंडल अध्यक्ष के चुनाव के लिए तीन प्रत्याशी चुनाव मैदान में हैं। निवर्तमान अध्यक्ष सुजीत कुमार सिंह उर्फ चुन्नू यादव, अंछा के पूर्व पैक्स अध्यक्ष रामबचन सिंह और राजद के प्रखंड अध्यक्ष देवेंद्र सिंह चुनाव मैदान में है। एक धड़ा ऐसा है जो यह कह रहा है कि इस बार प्रखंड प्रमुख के चुनाव में जिस तरह से जातीय राजनीति हुई उसका बदला लिया जाएगा। लेकिन इनकी ताकत कितनी है, यह चुनाव परिणाम बताएगा। फिलहाल सबकी नजर इस बात पर है कि इस बार कौन विजेता बनेगा। तीनों प्रत्याशी अपने-अपने दावा कर रहे हैं और किसानों मतदाताओं के बीच जा रहे हैं। सबके अपने दावे और वादे हैं, लेकिन अंतिम निर्णय तो मतदाताओं को ही लेना है और वह अपना फैसला शुक्रवार को सुनाएंगे।


किसानों का उत्थान की कोशिश : चुन्नू यादव 


 व्यापार मंडल के निवर्तमान अध्यक्ष सुजीत कुमार सिंह उर्फ चुन्नू यादव का कहना है कि किसानों के उत्थान के लिए उनको समर्थन मूल्य दिलाने का काम करेंगे। खाद की किल्लत खत्म कर सबको खाद उपलब्ध कराने का प्रयास करेंगे। दावा यह कि-चुनाव निश्चित जीत रहे हैं, क्योंकि किसानों के साथ रहकर उनकी हर समस्या का समाधान करने का हर संभव प्रयास किया। हर परिस्थिति में उनके साथ रहा। जाति वर्ग धर्म का भेदभाव कभी नहीं किया।


समस्या से त्रस्त किसान पक्ष में : राम बचन सिंह 


 रामबचन सिंह कहते हैं कि किसान पक्ष में है क्योंकि वह समस्या से ग्रस्त और त्रस्त हैं। खाद किसानों को नहीं मिला। धान की खरीदारी हुई तो पैसा नहीं मिला। किसी को पैसा मिला तो समय पर नहीं मिला। इसलिए जनता और किसान दोनों त्रस्त होकर समर्थन में हैं।



कोई दावा वादा नहीं : देवेंद्र सिंह 


राजद प्रखंड अध्यक्ष देवेंद्र सिंह कहते हैं कि उनका कोई दावा और वादा नहीं है, जैसा कि उनका स्वभाव है। अपने व्यक्तित्व, चरित्र और स्वभाव के बल पर जनता और किसानों का समर्थन मांग रहे हैं। पूरी उम्मीद है कि किसान समर्थन करेंगे।

Monday, 10 October 2022

सजा भुगत रही अंगरेजी हुकूमत के विद्रोहियों की पीढियां

 

          


(घुमंतू जनजातियां - समाज का उपेक्षित वर्ग राजस्थानी ग्रंथागार से प्रकाशित पुस्तक में प्रकाशित मेरा आलेख)



  ० उपेंद्र कश्यप ० 



विश्व की यह पहली ऐसी घटना थी जब अंग्रेजों ने भारत के करीब 200 जन जातियों को जन्मना अपराधी घोषित कर दिया था। क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट 1871 के तहत जन्मजात अपराधी घोषित इन जातियों को आजाद भारत में 31 अगस्त 1952 को इस काले कानून से भारत सरकार ने मुक्त कर दिया तो इन्हें विमुक्त जनजातियां कही जाने लगी। इन जातियों के साथ जो दुर्भाग्य अंग्रेजी हुकूमत के समय जुड़ा था, उसे भारत सरकार ने जारी रखा और यह अब भी इनका पीछा नहीं छोड़ रहा। इन घुमन्तु-विमुक्त जन जातियों को जन्मजात अपराधी के कलंक से मुक्त करते हुए भारत सरकार ने नये काले कलंकित एक दुसरे क़ानून के खूंटे से इनको बांध दिया। अंग्रेजों के काले कानून से यह कम काला और कलंकित करने वाला कानून नहीं है। इसे आजाद भारत सरकार ने नाम दिया था- हैबिचुअल ओफेंडर्स एक्ट। यानी ‘जन्मजात अपराधी’ घोषित जातियों को आजादी मिली तो उनके लिए नया कलंक-शब्द दिया गया-‘आदतन अपराधी’। अर्थात 81 वर्ष बाद जब विमुक्त हुए तो दूसरे कम कलंकित खूंटे से इनको सदा के लिए बांध दिया गया। अंग्रेजों के काले क़ानून के कारण इन जातियों को रोज थाने में तीन से चार बार हाजिरी लगानी पड़ती थी। चितौडगढ़ जिला के कपासन के मेंदा कोलानी में कंजड जाति के लिए पुलिस चौकी 1934 में खोला गया था। जहां रोज समुदाय के लोगों को हाजरी देनी पड़ती थी। मांग कर खाने वाले इस समुदाय को पुलिस चोर बताती थी, कच्ची शराब बनाने-बेचने के आरोप में प्रताड़ित करती थी। यह हाल तक स्थिति रही। समाज इन जातियों को, जो प्राय: खानाबदोश या बंजारा माने-समझे जाते हैं को चोर समझता है, शक की निगाह से देखता है। इसके लिए समाज नहीं, वह सरकार और क़ानून जिम्मेदार है जो बच्चे को धरती पर आते ही उसे अपराधी मान लेता है। धीरे-धीरे भारतीय समाज ने भी इनको अपराधी जाति मान लिया। पुलिस में भर्ती होने वाले जवानों को इनके बारे में पढ़ाया जाने लगा। प्रशिक्षण के दौरान उन्हें बताया जाता था कि ये जनजातियां पारंपरिक तौर से अपराध करती आई हैं। नतीजा इनको हर जगह अपराधियों के तौर पर देखा जाने लगा। पुलिस को उनका शोषण करने के लिए अपार शक्तियां दे दी गईं। देशभर में लगभग 50 ऐसी बस्तियां बनाई गईं जिनमें इन जनजातियों को जेल की तरह कैद कर दिया गया। इन बस्तियों की चारदीवारी के बाहर हर वक्त पुलिस का पहरा लगता था। बस्ती के बच्चों से लेकर हर सदस्य को बाहर आते-जाते वक्त पुलिस को अनिवार्य रूप से सूचना देनी होती थी या उपस्थिति दर्ज करानी पड़ती थी। इनकी किस्मत का फैसला पुलिस अधिकारियों के हत्थे छोड़ दिया गया। इनको अदालतों में अपने ऊपर लगे आरोपों के विरुद्ध पैरवी का अधिकार नहीं दिया गया। इनकी बस्तियां खुले जेल की तरह थीं। बिजनौर के नजीबाबाद किले के भातुओं को सुधारने के नाम पर अनोखा प्रयोग हुआ। इसकी प्रतिक्रिया के फलस्वरूप वहां से भागा साधारण सुल्ताना इतना बड़ा डाकू बन गया कि उसे पकड़ने के लिए तीन साल तक संयुक्त प्रांत की फ़ौज को लगाना पड़ा था। गौरतलब है कि 2008 में संसद में एक एप्रोप्रियेशन बिल पास हुआ था जिसमें विमुक्त जातियों के हालात पर सांसदों ने कुछ तथ्यात्मक बातें रखी थीं। तब ओडिशा के सांसद ब्रह्मानंद पांडा ने ज़िक्र किया था कि उनके निर्वाचन क्षेत्र का लोधा समुदाय जो वास्तव में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे, उन्हें आज भी समाज एवं शासन सत्ता पर बैठे लोग जन्मजात अपराधी ही मानते हैं। इस सबके कारण ही स्थिति ऐसी बनी कि छोटे कस्बे या शहर में छोटा-मोटा कोइ अपराध होता है तो पुलिस तंबू गाड़ कर रहने वाले बंजारों, खानाबदोशों को पकड़ कर ले आती है और घटना की लीपापोती कर देती है। जब सरकार और उसकी व्यवस्था का व्यवहार अपने ही वंचित नागरिकों के साथ ऐसा होगा, तो स्वाभाविक है जनता भी उसी तरह ट्रीट करेगी।



विमुक्त का अर्थ है-आजाद, स्वतन्त्र। दूसरा अर्थ है-छोड़ा गया और तीसरा अर्थ है-कार्यभार से मुक्ति। इन तीनों अर्थों के निकष पर यदि परखें तो इन जातियों/जनजातियों के हिस्से क्या लगा, भारत की आजादी मिलने से। वे 31 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस मनाते हैं, किन्तु तब भी ये कितने स्वतन्त्र हैं भला? जन्मजात और आदतन में बहुत महीन अंतर है। इनको न 1947 में आजादी मिली, न 1952 में। इनको 31 अगस्त 1952 को “जन्मजात अपराधी” के खूंटे से खोल कर “आदतन अपराधी” के खूंटे से बांध दिया गया। जिनके साथ अंग्रेजों ने और फिर भारत सरकार ने ऐसा किया। उनकी आबादी देश में 2011 की जनगणना के अनुसार 15 करोड़ और वर्तमान में 20 करोड़ होने का अनुमान है। इतनी बड़ी आबादी जो समाज के मुख्यधारा से अलग, हाशिये पर खड़ी होकर बिना गुनाह किये अपराधी मानी जाती है, इस कलंक के साथ जीना कितना दुष्कर है, इस पीड़ा को खुद कलंकित हो कर ही समझा जा सकता है। वो देहात में कहते हैं न-जाके न फटी बेवाई, वो का जाने पीर पराई। यही स्थिति इनके मामले में है। सवाल उठता है कि आखिर क्या वजह थी, जो अंग्रेजों ने इनको जन्मजात अपराधी माना?  



वास्तव में इन जनजातियों ने अंग्रेजों के छक्के छुडा दिए थे। इतिहास की पुस्तकें यूं ही आरोपित नहीं हैं। इनके पन्नों पर जहां इन जन जातियों को तवज्जो मिलनी चाहिए थी, एक सिरे से इनकी चर्चा तक नदारद है। विमुक्त जनअधिकार संगठन कार्यकर्ता बीके लोधी ने लिखा है कि घुमन्तु जनजातियाँ वास्तव में भारतीय (हिन्दू) संस्कृति की रक्षक थीं और हैं। राज्यसभा में वरिष्ठ पत्रकार अरविंद कुमार सिंह ने योजना जनवरी 2014 में एक लेख-नयी रौशनी की तलाश में घुमंतू जनजातियाँ- में लिखा कि यह समुदाय युद्धकला में प्रवीण थीं। मुगलों को खूब छकाया तो सन 1857 की क्रान्ति में इनकी अग्रणी भूमिका रही है। भारत सरकार ने कुछ आयोग एवं कमेटियों का गठन किया था। उन्होंने भी यह माना था कि विमुक्त समुदाय को ब्रिटिश विद्रोह के कारण जन्मजात अपराधी के रूप में कलंकित होना पड़ा। विभिन्न शोधकर्ता, इतिहासकार एवं विद्वान स्पष्टत: यह स्वीकार करते हैं कि विमुक्त जातियां ब्रिटिश हुकूमत की सशस्त्र विद्रोही थीं, ये वास्तविक स्वातंत्र्य योद्धा थे। स्थानीय कृषक जातियों/जनजातियों ने अपने-अपने स्तर और क्षमता के अनुसार सशस्त्र विद्रोह किया था। तब 53 देशों में शासन करने वाले अंग्रेजों ने आखिर सिर्फ भारत में ही क्यों क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट लागू किया था? इसकी पृष्ठभूमि में अंग्रेज़ों की धारणा यह थी कि जिस तरह से भारत में जातिगत व्यवसाय होते हैं, जैसे लोहार का लड़का लोहार होता है, बढ़ई का लड़का बढ़ई, चिकित्सक का लड़का चिकित्सक, इसी तरह अपराधी की संतानें अपराधी ही होती हैं।

इसलिए भारत की लड़ाकू जातियों की संतानों को भी अनिवार्य रूप से जन्मजात अपराधी मान लिया गया था। बीके लोधी कहते हैं-यदि जीविका के लिए चोरी-चकारी जैसे छोटे अपराधों के कारण क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट लागू करना होता तो अंग्रेज़ों ने 1857 के पहले ही कर दिया होता। सच्चाई यह है कि 1857 की क्रांति विफल होने के पश्चात जब महारानी विक्टोरिया ने कंपनी सरकार से शासन अपने हाथ में ले लिया और उन तमाम विद्रोहियों को क्षमा कर दिया, जिन्होंने क्षमा याचना कर ली थी। किन्तु कुछ जन समुदाय ऐसे थे जो समझौता परस्ती को कायरता समझते थे और प्रतिशोधात्मक कार्रवाई के लिए सदैव तत्पर रहते थे। ऐसे ही समुदायों की पहचान करने के लिए क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट 1871 लागू किया गया था। हकीकत यह है कि यह वह समुदाय है जिसने हथियार बनाने, साजो-सामान जुटाने, सन्देश पहुंचाने से लेकर कई अन्य तरीके से क्रांतिकारियों की मदद की थी। इस समुदाय के बारे में कहा गया है कि ये प्राचीनकाल से व्यापार करते रहे हैं, तब से जब कारवां चला करता था। भारत में रेल आयी तो इनकी कारोबारी ताकत बढ़ी। बन्दरगाहों से सामानों को देश के अन्य भीतरी हिस्से तक पहुंचाने की जिम्मेदारी इनके कन्धों पर ही थी। लेकिन दुर्भाग्यवश इनको अंग्रेजों ने देशभक्ति और विद्रोह के कारण अपराधी जाति घोषित कर दिया और आजाद भारत की सरकार ने आदतन अपराधी।



न्याय की आग्रही विमुक्त जातियों की अजब न्याय व्यवस्था


अंग्रेजों द्वारा जन्मजात अपराधी का दर्जा देने और फिर भारत सरकार द्वारा आदतन अपराधी का दर्जा देने का दुर्भाग्य झेल रहा घुमंतू-विमुक्त समुदाय भारत सरकार से और अपने अपने राज्य सरकारों से न्याय का आग्रही है। इन जन जातियों को न्याय चाहिए ही चाहिए। किसी भी सभ्य समाज में यह स्वीकार्य अपेक्षा होती है। किन्तु दूसरी तरह इन जनजातियों की न्याय व्यवस्था विचित्र और उलझी हुई है। पारंपरिक व्यवस्था ही चली आ रही है। किसी तरह के मामले में कोइ थाना-पुलिस नहीं जाता। पंचायत बैठती है और दोनों पक्षों की बात सुन कर किसी निर्णय पर पहुँचती है। किसी विवाद पर पहले पंचायत बैठता है। विचार विमर्श के बाद सजा तय किया जाता है। कोइ विरोध नहीं कर सकता। सजा जो भी हो, जितना भी कठीण हो, आरोपित को स्वीकारना पड़ता ही है। चाहे आर्थिक दंड हो या शारीरिक प्रताड़ना का दंड। जिस जाति के स्त्री-पुरुष पर आरोप लगता है, उस जाति के अगल-बगल के कई गाँवों के स्वजातीय जुटते हैं। तब सुनवाई होती है। परखा जाता है कि आरोपित सही बोल रहा है या गलत। प्रेम प्रसंग, सेक्सुअल ह्रासमेंट, चोरी जैसे अपराध करने पर पंचायत जुटाए जाते हैं। हड़िया-बर्तन बन्द, मतलब घर खाना नहीं खाने, जाति से निकाल देने के फैसले होते हैं। आर्थिक सजा भी सुनाई जाती है। दोष सिद्ध होने पर सजा देने और मुक्त करने का प्रावधान है। आर्थिक दंड लगाया जाता है। छोटी गलती के लिए कम अर्थ दंड। एक लाख रुपये तक का भी दंड हो सकता है। जब स्थिति कठीन होती है, समझौता मुश्किल होता है, वाद-प्रतिवाद तीखा हो तो सजा के रूप बदल जाते हैं। यह तब होता है जब सजा सुनने वाला खुद को निर्दोष बताने पर अडिग हो। वह पंचायत के फैसले को खारिज करने के लिए स्वयं को निर्दोष बताता हो। ऐसे में उसकी परीक्षा ली जाती है। जैसे सीता ने अग्नि परीक्षा दिया था। आग में जले तो दोषी, न जले तो पतिव्रता, शुद्ध स्त्री। इस सन्दर्भ में तीन तरीके प्राय: आजमाए जाते हैं-




न्याय - सजा के तीन ख़ास तरीके:-

01-खनता लकड़ी काटने वाला एक औजार होता है। करीब सवा किलो वजन का। इसे एकदम गर्म लाल कर आरोपित के हाथ पर पीपल या आम का दो पत्ता रखकर उस पर रख दिया जाता है। इसके बाद वह व्यक्ति तीन बार एक ही स्थान पर परिक्रमा कर आगे सात कदम या डेग चलता है। शर्त यह है कि हाथ पर फोड़ा नहीं पड़ना चाहिए। यदि ऐसा हुआ तो हार माना जायेगा। इसके लिए एक पारंपरिक पूजा विधान है। खनता जिसके हाथ पर रखा जाना है उसको बिना सिला एक कपड़ा में ही रहना है। भूखे एक दिन पहले। ब्राह्मण पूजा कराएगा। वेद पुराण पढ़ने के लिए। मान्यता है कि ब्राह्मण के के वाणी से सब शुद्ध हो जाता है। खनता की पूजा करते हैं। कूल देवी की पूजा करते हैं। उनको ही साक्षी मान कर हाथ पर खनता रख दिया जाता है। कलयुग में कोई विश्वास नहीं करेगा लेकिन यहां यह सत्य माना जाता है।

  

02- आरोपित को नहर में पानी के अंदर तब तक रहना है जब तक दूसरा व्यक्ति 150 कदम आगे जा कार पीछे उसके पास न लौट जाए। यानी 300 कदम दूसरे व्यक्ति को चलना है और तब तक आरोपित को पानी के अन्दर रखना है। ऊपर दिखे तो दोषी माना जायेगा। यानी सांस रोके रखना है तब तक। 


03- एक किलो गर्म खौलते तेल में एक सिक्का डाला जाता है। उसे आरोपित को निकालना है। यदि हाथ जला तो दोष सिद्ध माना जायेगा। नहीं जला तो माना आजायेगा कि आरोपित का कथन ही सत्य है। वह निर्दोष है। 



न्याय-व्यवस्था-प्रणाली के इन तीन तरीकों को सभ्य समाज कतई स्वीकार नहीं करेगा, किन्तु इनकी यही अपनी परंपरागत न्याय व्यवस्था है। शायद न्याय-व्यवस्था के इस तरह न्याय-संगत न होने के कारण ही, कभी दहेज़-ह्त्या की घटना अंजाम नहीं पाती। खुले आसमान के नीचे, बिना दरवाजे वाली झुग्गियों में रहते हुए भी दुष्कर्म, छेड़खानी की घटना नहीं घटती है। फिर भी कोइ खारिज करता रहे, इनको परवाह नहीं। कोइ तर्क नहीं मानते ये। यह भी तो संभव है कि निर्दोष का हाथ गर्म दपदप खनता रखने से जल जाए, जल में स्वयं को डूबाये रखते वक्त मौत हो जाए, गर्म खौलते तेल से सिक्के निकालने से हाथ जल जाए? नहीं इस समाज में यह तर्क नहीं चलेगा। कोइ सुनने को तैयार नहीं। वास्तव में इनकी न्याय व्यवस्था-प्रणाली धार्मिक आस्था पर टिकी है, चमत्कार पर, और बिना चमत्कार धर्मं का वजूद नहीं होता। आपकी वे नहीं मान सकते, इसलिए हम ही मान लेते हैं कि, जो निर्दोष है वह, इनकी तय अग्नि परीक्षा से बिना जले बाहर निकला जाता होगा। खैर...


हिन्दू समाज की अन्य जातियों की तरह ही इन जातियों/ जन जातियों में शामिल हर एक जाति में सात कुड़ी या पारिछ होता है। सब एक दुसरे से स्वयं को ऊपर यानी श्रेष्ठ बताते हैं। जातीय सोपान एक तरह से गोल है। सब एक दुस्सरे से नीचे भी और ऊपर भी। यह गिनने वाले पर निर्भर करते है, गिनती कहाँ से किस ओर शुरू करता है। कुछ जातियां यथा- लाठौर या नट, गोही, कोडरिया, बको, कोंगड, तुरकेल, गुलाम, उमराहा, मणिकपुरिया, गदही, ओआण, छाता साथ रहते हुए भी अलहदा रहते हैं। सब एक दूसरे से खुद को व्यवसाय और खान-पान में अलगाव का आधार मानकर श्रेष्ठ और नीच का निर्धारण करते हैं। अन्य हिन्दू परंपराएं भी ये पालन करते हैं किन्तु मृत्यु बाद के संस्कार अलग हैं। वे शव को जलाते नहीं दफना देते हैं। बच्चा मरने पर जमीन में गाड़ दिया जाता है, जैसा प्राय: हिन्दू परिवार करता है। उम्रदराज की मौत पर जलाते नहीं दफनाते हैं। दशकर्म, भोज बरखी होता है। नेवता हँकारी देना पड़ता है। सबको बुलाना पड़ता है। अपने एक्शामता के अनुसार खाने-पीने की व्यवस्था जात-समाज-हित-नाता के लिए करना पड़ता है। जब कोइ बच्चा जन्म लेता है तो  सोहर गाते हैं लोग-

जुग जुग जियसु ललनवा, भवनवा के भाग जागल हो
ललना लाल होइहे, कुलवा के दीपक मनवा में आस लागल हो॥

आज के दिनवा सुहावन, रतिया लुभावन हो,
ललना दिदिया के होरिला जनमले, होरिलवा बडा सुन्दर हो॥

नकिया त हवे जैसे बाबुजी के,अंखिया ह माई के हो
ललन मुहवा ह चनवा सुरुजवा त सगरो अन्जोर भइले हो॥

सासु सुहागिन बड भागिन, अन धन लुटावेली हो
ललना दुअरा पे बाजेला बधइया, अन्गनवा उठे सोहर हो॥

नाची नाची गावेली बहिनिया, ललन के खेलावेली हो
ललना हंसी हंसी टिहुकी चलावेली, रस बरसावेली हो॥

जुग जुग जियसु ललनवा, भवनवा के भाग जागल हो
ललना लाल होइहे, कुलवा के दीपक मनवा में आस लागल हो॥


नाच गाना होता है। शंकर बाबा को पूजते हैं। छठी, सतईसा होता है। जिसके घर अधिक वर्ष पर पुत्र रत्न प्राप्त होता है, वहां तब खाने पीने का समारोह होता है। छह दिन प्रसूति से घर का कोइ बर्तन नहीं छुआयेगा। खाना अलग से फूल पीतल नहीं तो स्टील के बर्तन में उसे दिया जाता है। यहाँ भी हिन्दू परिवारों में प्रचलित रस्म का पालन दिखता है। 

शादी-विवाह में बाजा-नाच में कमी नहीं होती है। लोग अपनी क्षमता के अनुसार आयोजन-खर्च करते हैं। बनारस, जौनपुर, हरिहरगंज, दौलतपुर, संजीवन बिगहा, दूर-दूर तक रिश्तेदारी है। खाना पीना खूब होता है। दहेज़ का रोग यहाँ भी है-5 से 30 हजार रुपये तक दहेज नगदी दिया जाता है। बर्तन, मशाला जो सम्भव हो सका राजी खुशी से दिया जाता है। 

दहेज प्रताड़ना या हत्या की घटना कभी नहीं। वधु से मांगने, मारपीट करने, हत्या करने की घटना कभी नहीं घटी। यदि ऐसा हो जाए तो जिस लड़की के साथ घटना कारित किया गया, उसके परिजन, रिश्तेदार और जाति-समाज के लोग वर पक्ष के घर धावा बोल देते हैं। आरोपित के खिलाफ पंचायत लगेगी, कारर्वाई होगी, कभी-कभी यह हिंसक हो जाती है और आरोपित की हत्या तक कर दी जाती है। शिक्षा का इस समाज में घोर अभाव है। 200 की एक बस्ती में इस लेखक को इंटर फाइनल किया हुआ एकमात्र लड़का कुंदन मिला। उसकी दो बहन मैट्रिक, दो बहन इंटर और एक बहन बीए किये हुए है। बाकी सब के सब असाक्षर हैं। कुछ बच्चे समीप के विद्यालय जाने लगे हैं। लेकिन शिक्षा की उनकी यात्रा अभी शुरू हुई है, आजादी की आधी सदी बाद। कुंदन दो सांढ़, एक भैंसा, एक भैंस और एक कड़िया रखा है। गर्भ धारण करने की स्थिति में पहुंचे जानवर को पाल दिलाने का काम करता है। 200 या 300 रुपये तक एक जानवर मालिक से लेता है। अब यह धंधा सीमेन देने की मशीनी व्यवस्था से चौपट हो गया है। जिस धंधे में लाभ दिखा कर लेते हैं। खाद्यान मांगकर जमा कर लेते हैं। कटनी नहीं करते। कृषि कार्य नहीं करते। कुछ अपवाद भले हैं। अब आबादी का एक हिस्सा कृषि मजदूर बन रहा है। मणि बटैया पर खेती करने को कुछ लोग तैयार होने लगे हैं। ये जनजातियां सब दिन मांसाहार भोजन कर सकती हैं। हिन्दू परंपरा की तरह मंगलवार, गुरूवार या शुक्रवार, रविवार को मांसाहार न करने को यहाँ वर्जित नहीं है। एक्कादुका लोग शाकाहारी मिलेंगे। मुर्गा, मछली, खस्सी के अलावा भेड़ी, भेड़ा, गदहा, बिलार, सुअर भी खाने वाले लोग इन जातियों में हैं।  


अंत में बस इतना कि..

बाबू भैया कहकर, मांग खा कर जीने वाले ये लोग आरोपित हैं। जन्मजात या आदतन अपराधी नहीं। लोगों को नजरिया बदलना होगा। इनका प्रश्न है-अगर हमारी जाति अपराधी होती तो एक ही स्थान पर 60 बरस से कैसे रहती? सरकारी जमीन पर कैसे बसे रहते? लोग भगाने नहीं आते? समाज में घुल मिलकर रहते हैं। मांग चांग कर खाते हैं। भारत के हर हिस्से में घूम कर मांगते खाते हैं। इस प्रश्न का जवाब जो आप देंगे, वही हकीकत है।


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