Friday, 4 October 2019

मुखिया सुदेश सिंह ह्त्या काण्ड : साजिश अब तक अज्ञात : एक श्रद्धांजलि


गोली लगाने के बाद पीएचसी दाउदनगर में इलाजरत सुदेश बाबू
ठीक 07 साल पहले 04 अक्टूबर 2012 को जिनोरिया निवासी मुखिया सुदेश सिंह जी की ह्त्या कर दी गयी थी। आज अचानक फेसबुक ने स्मरण करा दिया। तब सोशल मीडिया का ज़माना नहीं था। उनसे व्यक्तिगत रिश्ता काफी बेहतर था। एक अच्छे इंसान, सहृदय भाई, प्राय: चावल बाजार स्थित स्टूडियो यादें में मेरे पास बैठने आते। गपशप होता। राजनीतिक-सामाजिक मुद्दों पर चर्चा होती। कभी उन्होंने यह आशंका व्यक्त नहीं किया कि उनका जीवन ढलान की और है, ह्त्या हो सकती है। उनसे कई मुलाक़ात उनके घर पर भी हुई। इतना सहृदय, व्यवहारकुशल, सादगी पसंद नेता कम ही मिला है पत्रकारिता जीवन में। 
एक घटना स्मरण हो आया, जब यह लिख रहा हूँ। एक बार बेटे को लेकर वाराणसी गया। लाला अमौना के विजय भाई (मुखिया प्रतिनिधि) ने कहा कि वहां मेरे मित्र कुंदन के घर चले जाइयेगा, सब व्यवस्था हो जायेगी। कॉल किया तो बीएचयू गेट पर कोइ  लेने आया। देर रात कुंदन से मुलाक़ात में बोला कि आपके मित्र विजय ने कहा था। वे बोले-कोइ विजय मेरा मित्र नहीं रहा है। मैं चकरा गया। फिर कैसे यहाँ मै आ गया? दरअसल ये वाले कुंदन सुदेश भाई के पुत्र हैं, जो वाराणसी में ही एक्सिस बैंक में सेवारत हैं। उनका नम्बर शेव था, और वे मुझे ह्त्या के दिन से अधिक ख़ास रूप से जानते थे। खैर
सुदेश भाई की ह्त्या का रहस्य आज तक नहीं खुला। स्मरण हो आया, तो अपना आर्काइव खंगाल लिया। तब दैनिक जागरण में प्रकाशित कुछ रिपोर्ट्स के टेक्स्ट फ़ाइल मिले तो आपके लिए साझा कर रहा हूँ। यह इतिहास है और भविष्य में ख़ास कर पत्रकारों के काम आने वाला इतिहास। 

                                               ०उपेंद्र कश्यप०

हेरा गइले सुदेश जी प्रधनवां..
मुंह पर तमाचा जड़ दिहले सामंत के ओढ़ी ललकी कफनवां ..
दैनिक जागरण में तब प्रकाशित मेरी रिपोर्ट
दुश्मनवा के पकड़ब जा, हम रहके का करबई
घर में पत्नी बेसुध, बहनों का हाल बुरा
 परदेस में बेटा-बेटी का हाल बेहाल
 पिता के शव नहीं देख सकती इकलौती बेटी
उपेन्द्र कश्यप, दाउदनगर (औरंगाबाद)

व्यक्ति की लोकप्रियता उसकी मृत्यु के बाद ही पता चलता है। पैमाने पर ऊंचाई की रेखा कितनी गहरी है, यह तभी दिखती है। गीत लिखना एक रचनात्मक कार्य है, जो तुंरत नहीं होता। यदि यह होता है तो लेखक ऐसा तभी कर सकता है जब वास्तव में मृतक को बहुत अच्छा मानता है। भखरुआं में जन संस्कृति मंच के जिला अध्यक्ष कामता यादव गाते हैंहेरा गइले सुदेश जी प्रधनवा, सरनवां भइल ये बिरना। .. सच्चा सिपाही रहले किसान के, मुंह पर तमाचा जड़ दिहले सामंत के, ओढ़ी ललकी कफनवा, सपनवा भइल ये बिरना। दल और जाति की सीमाएं गुरुवार की शाम से जो टूटना प्रारंभ हुआ वह शुक्रवार को दिन भर लगातार बना रहा। जिनोरिया में घर पर मातम छाया हुआ है। शोक में डूबा परिवार, समाज, समर्थक सभी सुदेश की हत्या की सूचना के बाद से रो रहे हैं। घर के आंगन में बेसुध पड़ी पत्नी उर्मिला देवी को महिलाएं पंखा ङोल रही हैं। उन्हें कुछ पता नहीं कि उनके सामने प्लास्टिक के थैले में बर्फ के शिला के बीच उनका सुहाग सदा के लिए सो गया है। भला कौन समझा सकता है उनको, जिनका मंगलसूत्र टूट चुका है। हाथ की चूड़ियां टूट गयी हैं, मांग का सिंदूर धूल गया है। बहनों की दहाड़ सुन हर कोई फफक पड़ रहा है। वे कहती हैंआइहो भइया, हम रह के का करबई, हमरो लेते चल। वह अपनी भाभी को बेसुध छोड़ भतीजा प्रमोद और साथी देवेंन्द्र सिंह के पास दौड़ी आती है और बोलती हैदुशमनवां के ना पकड़ब जा, खाली यही रहब जा। उधरपरदेस में रह रहे बेटे-बेटी का हाल बेहाल है। बड़ा बेटा चंदन चेन्नई में होटल मैनेजमेंट करता है। वह जब से सुना है तब से अपना आपा खो चुका है। उसके मित्र उसे संभालकर यहां ला रहे हैं। दूसरा बेटा कुन्दन पुणो में इंजीनियरिंग कर रहा है। वह भी रहा है। पारिवारिक सूत्रों ने बताया कि बेटे ने कह दिया कि पापा का दर्शन नहीं कर सके तो जीना संभव नहीं रह जाएगा। बेटी पिंकी कुमारी पिता का अंतिम दर्शन नहीं कर सकेगी। वह अपने पति के साथ डेनमार्क में रहती है। बिटिया संभवत: शनिवार को यहां पहुंचेगी। पिता माधव सिंह सदमा में शांत पड़ गए हैं, जुबान नहीं खुल पा रही है। परिवार को राजनीतिक क्षेत्र में बुलंदी देने वाला उनका बेटा खामोश जो पड़ा हुआ है। भाई त्रिवेणी सिंह रांची में प्रखंड आपूर्ति पदाधिकारी हैं, बीमार हैं। परिवार के सदस्य खामोश हैं। जिनोरिया में शुक्रवार को पूरे दिन सन्नाटा रहा। ग्रामीणों की रुलाई से हर कोई रो रहा था।

सुदेश भाई की शव यात्रा
औरंगाबाद में मुखिया की गोली मार हत्या

Updated on: Thu, 04 Oct 2012 08:34 PM (IST)
दाउदनगर (औरंगाबाद), जाप्र : बेखौफ अपराधियों ने गुरुवार की शाम लगभग 6 बजे दाउदनगर थानांतर्गत औरंगाबाद-पटना मुख्य मार्ग पर डीएवी स्कूल के समीप करमा पंचायत के मुखिया सह दाउदनगर व्यापार मंडल के अध्यक्ष सुदेश कुमार सिंह की गोली मार हत्या कर दी। मुखिया तरार गांव में बिन्देश्वरी मंडल के घर से श्राद्ध (भोज) खाकर वापस अपने गांव जिनोरिया लौट रहे थे कि रास्ते में अपराधियों ने गोलीबारी शुरू कर दी। मुखिया की बांह में दो गोलियां लगीं। जिससे वे सड़क पर गिर पड़े। साथ रहे गांव के जनेश्वर सिंह ने उन्हें इलाज के लिए दाउदनगर प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र में भर्ती कराया। चिकित्सकों ने प्राथमिक उपचार के बाद बेहतर इलाज हेतु मुखिया को पटना रेफर कर दिया। किंतु रास्ते में ही उनकी मौत हो गई। शव लेकर ग्रामीण थाने पहुंच गये हैं। जहां हजारों की भीड़ जमा हो गई है। समाचार प्रेषित किये जाते समय तक भीड़ पूर्व केन्द्रीय मंत्री कांति सिंह के नेतृत्व में हत्या के खिलाफ प्रदर्शन कर रही थी। एसडीपीओ अनवर जावेद अंसारी ने घटना की पुष्टि करते हुये बताया कि मुखिया की हत्या की जांच की जा रही है। अपराधियों की शिनाख्त गिरफ्तारी के लिए छापेमारी चल रही है।
मुखिया की हत्या से भड़के ग्रामीण, तोड़फोड़
शव यात्रा में शामिल तब के एसडीओ कमल नयन जी एवं एसडीपीओ अनवर जावेद जी
दाउदनगर (औरंगाबाद), जागरण प्रतिनिधि : दाउदनगर प्रखंड के करमा पंचायत के मुखिया सह व्यापार मंडल अध्यक्ष सुदेश कुमार सिंह की हत्या के खिलाफ ग्रामीणों का आक्रोश गुरुवार की रात्रि एवं शुक्रवार सुबह फूट पड़ा। उग्र ग्रामीणों ने औरंगाबाद-पटना मुख्य पथ एनएच 139 जाम कर प्रदर्शन किया। ग्रामीणों ने दर्जन भर वाहनों के शीशे तोड़ डाले। उन्होंने दाउदनगर अस्पताल में भी जमकर तोड़फोड़ की। जाम में सैकड़ों वाहन फंसे रहे। हत्याकांड के विरोध में बाजार भी बंद रहा। ग्रामीणों ने पूर्व मंत्री रामविलास सिंह के पुत्र उमेश सिंह एवं उसके साला ओबरा प्रखंड के मरवतपुर गांव निवासी रवीन्द्र सिंह को गिरफ्तार करने की मांग की है।
मृतक के भतीजा प्रमोद सिंह के अनुसार बाइक पर सवार पूर्व मंत्री के पुत्र उमेश यादव एवं उसके साला रवीन्द्र यादव ने गुरुवार की शाम में मुखिया सुदेश कुमार सिंह की हत्या की। उमेश ने ही सुदेश को गोली मारी। इस हत्या के खिलाफ में भाकपा माले एवं राजद नेताओं ने भखरुआं मोड़ पर सड़क जाम कर प्रदर्शन किया। माले के पूर्व विधायक राजाराम सिंह, राजद के सत्यनारायण सिंह, संजय मंडल, माले के अनवर हुसैन के नेतृत्व में प्रदर्शन किया गया। नेताओं ने अपराधियों को शीघ्र गिरफ्तार करने, हत्या की जांच एसआइटी टीम से कराने की मांग रखी। प्रदर्शन के दौरान गुरुवार रात्रि पुलिस जीप पर ग्रामीणों ने पथराव किया तथा इंसपेक्टर परशुराम थानाध्यक्ष को खदेड़ दिया। हत्याकांड के विरोध में सड़क जाम बवाल का दौर शुक्रवार को भी जारी रहा। एसपी एसपी दलजीत सिंह ने बताया कि अभियुक्तों की गिरफ्तारी के लिए छापेमारी की जा रही है। उन्होंने ग्रामीणों से इसके लिए मोहलत देने की अपील की है। प्रेषण तक एसपी तथा एसडीओ कमल नयन एसडीपीओ अनवर जावेद अंसारी मुखिया के पैतृक गांव जिनोरिया में कैंप किए हुए हैं।

विधायक के खिलाफ फूटा ग्रामीणों का गुस्सा
Updated on: Fri, 05 Oct 2012 09:08 PM (IST)
दाउदनगर (औरंगाबाद), जागरण प्रतिनिधि :
क्षेत्रीय विधायक सोमप्रकाश सिंह के खिलाफ गुरुवार शाम ग्रामीणों का गुस्सा फूट पड़ा। हुआ यह कि मुखिया सुदेश कुमार सिंह के समर्थक थाने का घेराव कर पुलिस के खिलाफ नारेबाजी कर रहे थे। अचानक विधायक पर नजर पड़ते ही लोग उबल पड़े। आक्रोशित ग्रामीणों ने कहा कि विधायक बनने के बाद पहली बार मुंह देख रहा हूं। यह सब जानता है, युवा का नेता है, गोली युवा ही चलाता है। कहां गया नौजवान सभा का जोश और इमानदारी का भाषण। लोगों ने पूछा कि युवा को साथ लेकर जोश दिखाने को कहता थे, कहां गया जोश। सब साजिश है। खामोश खड़े विधायक किंकर्तव्यविमूढ़ होकर भीड़ को देखते सुनते रहे। वहां से अचानक विधायक चले गये और फिर कभी नजर नहीं आए। मुखिया के घर गये सड़क पर दिखे। कोई बयान मीडिया को दिया।
25 लाख मुआवजा के साथ नौकरी की मांग
Updated on: Fri, 05 Oct 2012 09:08
दाउदनगर (औरंगाबाद), जागरण प्रतिनिधि :
 विभिन्न संगठनों एवं नेताओं ने मुखिया सुदेश कुमार सिंह के परिजनों को 25 लाख रुपये मुआवजा एवं नौकरी दिए जाने की मांग किया है। मुखिया संघ के अध्यक्ष वीरेन्द्र सिंह, अनिल कुमार, भगवान सिंह, अरविंद कुमार, अशोक कुमार, परशुराम प्रसाद, नागेन्द्र, दया प्रसाद, हरि चौधरी, राजकुमार ने मुआवजा एवं नौकरी की मांग की है। भाकपा माले नेता अनवर हुसैन, मुख्य पार्षद धर्मेन्द्र कुमार, बिरजु चौधरी एवं अन्य ने एसआइटी गठित कर एक सप्ताह के अंदर अभियुक्तों को गिरफ्तार करने की मांग रखी है। उधर पुलिस ने बताया कि अभियुक्त बनाये गये उमेश यादव के बाजार समिति एवं अहियापुर गांव स्थित घर पर छापामारी की गयी, लेकिन सफलता नहीं मिली।



मुखिया हत्याकांड के अभियुक्तों का आत्मसमर्पण
घटनास्थल 
Updated on: Mon, 08 Oct 2012 11:02 PM (IST
दाउदनगर (औरंगाबाद), जागरण प्रतिनिधि :
 सुदेश मुखिया हत्याकांड के दोनों अभियुक्तों ने सोमवार को दाउदनगर व्यवहार न्यायालय में आत्मसमर्पण कर दिया है। सोमवार को अनुमंडल न्यायिक दंडाधिकारी पीसी अनल के समक्ष सरेंडर किया। आज ही दोनों के खिलाफ स्थानीय पुलिस कुर्की जब्ती का आदेश कोर्ट से हासिल करने वाली थी। आत्मसमर्पण के बाद उमेश सिंह यादव एवं इनके साला रवीन्द्र कुमार ने खुद को निर्दोष बताया। उमेश ने कहा कि मृतक मुखिया मेरे मित्र थे और उनके सगे संबंधियों से अधिक हत्या का सदमा मुझे लगा है। कहा कि मामले की जांच खुद एसपी करें या सीबीआई से जांच करायी जाए। न्याय और कानून व्यवस्था में विश्वास के कारण ही स्वेच्छा से समर्पण कर रहा हूं कि अगर मैं दोषी नहीं हूं तो क्यों भागता रहूं। उन्होंने कहा कि मेरी राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक हैसियत को बर्बाद करने के लिए एक साजिश के तहत आरोपी बनाया गया है। मानहानि करने के लिए गैर सामाजिक तत्वों ने मीडिया, पुलिस और आम जनता के साथ उन्हें भी परेशान किया। डीएम एवं एसपी से अपना और रवीन्द्र सिंह के परिवार को सुरक्षा मुहैया कराने की मांग रखी।
हत्याभियुक्त की पत्नी ने मांगी सुरक्षा
Updated on: Thu, 11 Oct 2012 08:39 PM (IST)
दाउदनगर (औरंगाबाद), जागरण प्रतिनिधि :
 मुखिया सुदेश कुमार सिंह की हत्या के मामले में नामजद अभियुक्त बने उमेश सिंह यादव की पत्नी शारदा देवी ने पति और अपने भाई के घर की सुरक्षा की मांग की है। उन्होंने अपने आवास पर कहा कि हमारा और हमारे भाई (रवीन्द्र यादव) का परिवार असुरक्षित महसूस कर रहा है। कभी भी अप्रिय घटना घट सकती है। सरकार और प्रशासन से सुरक्षा की मांग किया है। सीबीआई जांच के साथ पुलिस की जांच प्रक्रिया तेज करने की मांग करते हुए कहा कि सच्चाई जल्द सामने लाया जाए ताकि मृतक के परिवार और अभियुक्तों के परिवारों को न्याय मिल सके। कहा कि घटना के तुरंत बाद उमेश सिंह ने मुझसे कहा था कि मुखिया की किसी ने हत्या कर दी यह विश्वास नहीं हो रहा है। समाजवादी नेता स्व. रामविलास बाबू और संत पदारथ बाबू की पृष्ठभूमि का हवाला देते हुए कहा कि राजनीतिक साजिश के तहत लगाया गया आरोप घिनौना है।
(Hindi news from Dainik Jagran, news state Bihar  Aurangabad Desk)

Saturday, 28 September 2019

जिउतिया पर जब छपी थी यह रंगीन खबर तो मचा था तहलका-उपेंद्र कश्यप



पहली बार आयी थी इलेक्ट्रोनिक मीडिया, वह भी इंटरनेशनल
फिर तो तांता लगा रहा कुछ साल इलेक्ट्रोनिक मीडिया का
                        0 उपेंद्र कश्यप 0
"लोक संस्कृति का अनूठा उत्सव" इस शीर्षक से चार पन्ने की यह सामग्री जब 17 सितंबर 2000 को पटना से प्रकाशित पाक्षिक पत्रिका “न्यूज ब्रेक” छपी थी, तो मीडिया जगत में तहलका मच गया था। इसके संपादक थे-(अब स्वर्गीय) चंदेश्वर विद्यार्थी सर, जहां श्री सुरेन्द्र किशोर सर और श्री नवेंदु सर से कई मुलाक़ात/बात हुई। तब इस पत्रिका की करीब 100 कॉपी दाउदनगर में चावल बाजार स्थित ‘छात्र युवा एकता संघ’ द्वारा आयोजित नकल प्रतियोगिता के मंच से बांटी गई थी। यह पहला अवसर था, जब जिउतिया की रंगीन तस्वीर छपी थी, साथ में शोधपरक विस्तृत रिपोर्ट। नतीजा इस रिपोर्ट का व्यापक प्रभाव हुआ और जिउतिया अपने कस्बे, जिले से बाहर व्यापक रूप में जाना गया। इस रिपोर्ट के प्रकाशित होने के दिन ही एएनआई (ANI-एशियन न्यूज इंटरनेशनल) के बिहार ब्यूरो प्रशांत झा जी का कॉल आया। तब लैंड लाइन का जमाना था। विवेकानन्द स्कूल ऑफ एजुकेशन (बाजार समिति के सामने) गया, प्रतीक्षा किया और शाम में आने के कारण उनको चावल बाजार में जगन भाई के लैंड लाइन का नम्बर उनको दे दिया। कार्यक्रम तय हुआ और ANI की टीम आई। पहली बार दाउदनगर में जिउतिया को कवरेज करने के लिए टीवी पत्रकार और फोटोग्राफर आये थे, वह भी इंटरनेशनल ब्रांड के लोगो के साथ। यह एजेंसी है, जिसे आप अक्सर टीवी पर रिपोर्ट के वक्त माइक पर ANI लिखा देखते होंगे। इसने कवरेज किया तो टीवी पर कस्बे से लेकर महानगर तक में लोगों ने "दाउदनगर जिउतिया लोकोत्सव" के विभिन्न पक्षों को जिज्ञासा से देखा, समझा। इसके बाद ही औरंगाबाद से वर्ष 2002 में भाई संजय सिन्हा जी (तब ई टीवी, अब न्यूज18) आये और फिर तो कई साल तक टीवी रिपोर्टर आते रहे। सहारा के लिए संतोष भाई और कई चैनल के लिए भाई प्रियदर्शी किशोर श्रीवास्तव आये। जिउतिया के उत्थान में यह एक मील का पत्थर बना। "न्यूज ब्रेक" ने जो ब्रेक जिउतिया लोकोत्सव को दिया, उसने मेरे संपर्क-क्षेत्र को समृद्ध किया।

अब ज़माना बदल गया है। नया दौर है, आभासी-युग है। डिजिटल ज़माना है। सोशल मीडिया मजबूत हो रहा है। अखबार के पन्ने बढ़ गए हैं, रंगीन हो गये हैं। इस बार काफी कवरेज प्रिंट मीडिया में भी दिखा। कंटेंट अलग मुद्दा है। आशा है-आगे भी कवरेज दिखेगा। कुछ लोग मुगालते में जीते हैं, कुछ अपनी क्षमता का आकलन किये बिना मतिभ्रम के शिकार होते हैं। कुछ पूर्ववर्ती या समकालीन को अपने से बेहतर न मानने की जिद-पालन में गलत लिख देते हैं, गलत बताते हैं। उनकी परवाह क्या करना? समय उनको उस किनारे लगा देगा, जहां जा कर उनको कोइ नहीं परखेगा। ऐसे लोग व्यंग्य करते रहेंगे, क्योंकि वे किये हुए काम को नकारने में जुटे हैं ताकि उनको महत्त्व मिलता रहे। ऐसा नहीं होता, यह भी वे नहीं जानते। 
खैर,

(“श्रमण संस्कृति का वाहक-दाउदनगर” में प्रकाशित आलेख की अविकल प्रस्तुति)

जिउतिया का लोक-उत्सव जैसा आप देख रहे हैं, उससे बहुत बेहतर था साल-2000 तक का जिउतिया। छात्र युवा एकता संघ के बैनर तले चावल बाजार में नकल अभिनय प्रतियोगिता के माध्यम से पुरस्कार का वितरण कराया करता था। तब  अनुमंडल स्तरीय तमाम पदाधिकारी एवं ओबरा के विधायक इस मंच की शोभा बढ़ाते थे। विश्व को प्रभावित करने वाली एक घटना इस बीच घटी। अमेरिका स्थित ट्विन टावर को अल कायदा ने ध्वस्त कर पूरी दुनिया को आश्चर्यचकित कर दिया। ठीक उसी वक्त (9/11) यहां जिउतिया समारोह में दो आयोजकों के बीच मारपीट तीसरे पक्ष के कारण हुई और एक युवक की मौत हो गई। इस पूरे मामले में जहां राजनीति को संस्कृति का ख्याल रखते हुए सकारात्मक कदम उठाना चाहिए था, वहीं घटिया राजनीति की गई। एक शख्स ने मुझे इस हत्या कांड में फंसाने की कोशिश की और भाकपा माले ने इसे- यादवों के गुंडा गिरोह द्वारा की गई हत्या- बता कर अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने का अवसर बना लिया। जब कि इस हत्याकान्ड में आरोपी बनाये गये छः में मात्र तीन यादव थे और अन्य तीनों भाकपा माले के वैसे सदस्य जो उसकी गोपनीय बैठक तक में शामिल होते थे। जिस तरह की राजनीति की गई उससे वितृष्णा का जन्म हुआ और फिर खुद को इस लोकोत्सव से अलग कर लिया। अपना दायरा समेट लिया और उसे सिर्फ लेखन तक सीमित कर दिया। नतीजा जिस जिउतिया को चरम तक ले जाने की मैनें कोशिश की उसे ही किंकर्तव्यविमूढ़ हो कर सिमटते देखता रहा। इससे आत्मिक कष्ट होने लगा। इससे राजनीतिक, सामाजिक जटिलताओं को समझने का अवसर मिला। पुलिस के दलालों (तीन) ने मेरा यह ज्ञानवर्धन किया कि वास्तव में दलाल किसी के नहीं होते। मेरे साथ सच का साथ देने को खडे़ थे कुछ प्रशासनिक अधिकारी और पुलिस अधिकारी। कुछ प्रबुद्ध लोग और अन्य। तब मेरे पास पुख्ता सबूत थे कि मैं घटना के वक्त पटना से आये एशियन न्यूज इंटरनेशनल (एएनआई) के बिहार ब्यूरो प्रशांत झा के साथ था, और घटना की सूचना मैंने ही मध्य रात्रि को जिला प्रशासन को दिया था। खैर, इस दौर में कई रोज भूमिगत जीवन जीना पड़ा। उसकी पीड़ा मेरे इतिहास की थाती है, उसे अभी नहीं छेड़ना। दिल कचोटता था और अंततः खुद को रोक न सका और फिर धीरे-धीरे सक्रिय भूमिका निभाने लगा।
वर्ष- 2000 मील का पत्थर मात्र नहीं वरन, जिउतिया के ऐसा पड़ाव बन गया है, जिसकी चर्चा के बिना जिउतिया लोकोत्सव का इतिहास नहीं लिखा जा सकता। पहली बार पटना से प्रकाशित हिन्दी साप्ताहिक न्यूज ब्रेकके 17 सितंबर 2000 के अंक में इस संस्कृति को व्यापक कवरेज मिला। मेरी चार पन्ने की 
स्टोरी दाउदनगर का विशिष्ट जिउतिया त्योहार-लोक संस्कृति का अनुठा उत्सव- प्रकाशित हुई। इससे पहले रंगीन और इस स्तर का कवरेज कभी नहीं मिला था। इसने पटना में इलेक्ट्रोनिक मीडिया को काफी हद तक प्रेरित किया और इसी कारण ए.एन.आई की टीम यहां मेरे पास जिउतिया उत्सव को कवरेज करने आयी। इसके बाद ही ई.टीवी, सहारा जैसे क्षेत्रीय चैनल यहां कई बार कवरेज करने आये। साल 2000 में ए.एन.आई का आना और न्यूज-ब्रेक का कवरेज करना खासा महत्वपूर्ण था। तब इतना सहज और सुलभ उपलब्ध नहीं था मीडिया जितना कि आज है। तब दैनिक जागरण का प्रकाशन बिहार से प्रारंम्भ नहीं हुआ था। इसके आगमन के बाद ही अखबारों का स्थानीयकरण प्रारंभ हुआ, 12 पेज वाले अखबार 16 पेज के हो गये और रंगीन भी। अन्यथा रंगीन सिर्फ साप्ताहिक परिशिष्ट ही हुआ करते थे। आजके ताना-बाना और दृष्टि जैसे रंगीन परिशिष्ट में मेरे कई आलेख प्रकाशित हुए। तब बिहार में हिन्दुस्तान और आज ही प्रमुख अखबार थे, आर्यावर्त की जगह नहीं बन सकी थी, यद्यपि उसने भी मेरे आलेख प्रकाशित किये। इससे यह स्थापित करने में मदद मिली कि जिउतिया भले ही पूरे हिन्दी पट्टी में मनाया जाता है किंतु दाउदनगर का खास है। इसमें सबसे बड़ी भूमिका दैनिक जागरण अखबार की रही। 2001 से प्रकाशन प्रारंभ हुआ और इसी साल इसके परिशिष्ट अपना प्रदेश में करीब आधे पन्ने पर -11 सितंबर 2001 को मेरा आलेख- जिउतिया के अवसर पर सांस्कृतिक कार्यक्रम आज भी जीवंत- शीर्षक से प्रकाशित हुआ। पूरे बिहार में। ऐसे कई अवसर इस अखबार के माध्यम से मिला। बाद में तो शायद ही कोई साल रहा होगा जब जिउतिया के अवसर पर दैनिक जागरण से अधिक किसी ने इस संस्कृति को कवरेज दिया हो। निरंतर दस-बारह आलेख, खबरें प्रकाशित होते रही है। एक वाकया बताता हूं। जब 1996 में मैं इस संस्कृति पर आधारित लोकयान के निष्कर्ष पर कसा हुआ एक खोजी आलेख लेकर हिन्दुस्तान के पटना कार्यालय गया था। वहां जिउतिया पर आलेख दिया तो साहित्य संपादक अनिल विभाकर ने कहा कि जिउतिया तो पूरे हिन्दी पट्टी में होती है फिर तुम क्या खास इस पर लिखोगे। उन्होंने नोटिस नहीं ली। हालांकि बाद में मैं लगातार लिखता रहा, और राज्य के तमाम अखबारों में मेरे आलेख हर साल छपते थे। हिन्दुस्तान छोड़कर। हां, यहां यह बता दें कि हिन्दुस्तान में भी मेरे दर्जन भर आलेख प्रकाशित हुए हैं, जिसमें जिउतिया पर केन्द्रित आलेख शामिल नहीं है। दैनिक जागरण की आपत्ति के बाद हिन्दुस्तान के लिए प्रासंगिक या समीचीन विषयों पर लिखना छोड़ दिया था।

यह सब उपलब्धि यूं ही नहीं मिली थी। मेरी पत्रकारिता की यात्रा 1994 अक्टूबर में प्रारंभ हुई थी। जब 1995 में जिउतिया का पर्व आया तो मुझे प्रेरणा मिली कि यह मेरे लिए अवसर हो सकता है। आश्विन कृष्ण पक्ष की अष्ठमी तिथि को जिउतिया मनाया जाता है। यहां यह पहली तिथि से प्रारंभ हो जाता है। मैं कई सप्ताह पूर्व गलियों में घुमने निकला। जमीन पर जिउतिया खोज रहा था। लोहा जी” ( लोहिया जी) समेत कई बूजूर्गों से मिला। उनसे बात की। इधर रोजाना लोक संस्कृतियों पर साहित्य का अध्ययन करता रहा। जिसमें बडी दृष्टि मिली सापेक्ष के लोक संस्कृति विशेषांक से। इसके बाद पहली बार 1995 में डाल्टनगंज से प्रकाशित दैनिक अखबार राष्ट्रीय नवीन मेलमें आठ कालम में आधे पेज का मेरा विश्लेषण प्रकाशित हुआ। इसके बाद ही इस लोकोत्सव में फोकलोट के सभी चार आयामों की प्रचुरता से उपस्थिति को मान्यता मिली। यह पहला अवसर था जब इस लोक संस्कृति के सभी चार आयामों यथा लोक कला, लोक साहित्य, लोक व्यवहार एवं लोक विज्ञान की विवेचना की गई। इसके बाद हर साल यह काम होता रहा। नई नई बातें सामने लाता। अन्यथा मात्र बम्मा देवी, प्लेग और आयोजन से अधिक गहरे उतरने की कोशिश कभी नहीं दिखी थी।
आज जिउतिया जो है उसे पुनः वर्ष 2000 से बेहतर स्थिति में लाना शायद मुश्किल है, लेकिन इसे लाना होगा। इमली तल विद्यार्थी चेतना परिषद जैसे पुराने संगठन हों या एकदम नया आयोजक बने पुराना शहर का ज्ञान दीप समिति के प्रयास, इसे और आगे ले जाना होगा। जैसे नकल अभिनय प्रतियोगिता के आयोजकों ने इस संस्कृति से फुहड़पन और अश्लीलता को न्यूनतम किया है वैसे ही इसे परिष्कृत करने के साथ और उंचाई तक ले जाने का प्रयास निरंतर जारी रखना होगा। 

Saturday, 21 September 2019

जिउतिया मतलब दाउदनगर का लोकोत्सव : ऐसा और कहीं नहीं

जिउतिया, जितिया या जीवित्पुत्रिका व्रत यूं तो हिंदी पट्टी का एक पर्व है, जो आश्विन कृष्ण पक्ष अष्टमी तिथि (इस बार 22 सितंबर 2019) को मनाया जाता है किन्तु, बिहार ही नहीं अपितु पुरे भारत में इस पर्व को जिस तरह औरंगाबाद जिले के दाउदनगर शहर में मनाया जाता है, वैसा अन्यत्र कहीं नहीं होता है। इस बार इस लोकोत्सव पर शोध करने, किताब लिखने और नयी ऊँचाई-पहचान देने वाले लेखक-उपेंद्र कश्यप-से बातचीत पर आधारित मीडिया दर्शन की विशेष प्रस्तुति-


*जितिया जे अईले मन हुलसईले, नौ दिन कईले बेहाल रे जितिया....*

जिउतिया या जीवित्पुत्रिका व्रत माताएं अपने संतान की दीर्घायु होने की कामना को लेकर मनाती हैं। बिहार के औरंगाबाद जिला का दाउदनगर शहर इसे लोकोत्सव के रूप में मनाता है, न कि सिर्फ व्रत या पर्व के रूप में। इसका ऐसा स्वरूप और कहीं नहीं मिलता, जैसा दाउदनगर में है। यहाँ इसे नकल, या कहें स्वांग-समारोह के रूप में मनाया जाता है। लगता है जैसे पूरा शहर ही भेष बदलो अभियान पर निकल चुका। क्या बच्चे और क्या बूढ़े, किसी में कोइ फर्क नहीं रह जाता। सब नया रूप धर कर सामने आते हैं। राजस्थान की स्वांग कला को यहाँ के कलाकार मात देते दिखते हैं। ऐसी-ऐसी प्रस्तुतियां जिसे देखकर दर्शक दांतों तले उंगली दबा लेते हैं। आँखें आधी प्यासी रह जाती हैं, और देखने की ललक बढ़ जाती है। खतरनाक प्रस्तुतियां भी होती हैं। शहर इसीलिए तो गाता है–‘धन भाग रे जिउतिया, तोरा अइले जियरा नेहाल रे जिउतिया, जे अइले मन हुलसइले, नौ दिन कइले बेहाल, रे जिउतिया ...” और जब पर्व खत्म होने को होता है तो लोग विरह की वेदना महसूस करते हैं-“देखे अइली जिउतिया, फटे लागल छतिया, नैना ढरे नदिया समान। जान तोहे बिन घायल हूं पागल समान...।“ यह बताता है कि दाउदनगर वासियों के लिए जिउतिया क्या है? यहाँ गाये जाने वाला झूमर बताता है कि जिउतिया जिउ (ह्रदय) के साथ है-

दाउदनगर के जिउतिया सरेनाम हई गे साजन

दाउदनगर के जिउतिया जिउ के साथ हई गे साजन,

कहाँ के दिवाली, कहाँ के दशहरा गे साजन,

कहवाँ के जिउतिया कइले नाम हई गे साजन

दिल्ली के दिवाली, कलकता के दशहरा गे साजन

दाऊदनगर के जिउतिया कइले नाम हई गे साजन

 बिहार को प्रतिनिधि संस्कृति की खोज: श्रमिक जातियों की श्रमण संस्कृति से परहेज:-
'बिहार के विभाजन के बाद छउ नृत्य झारखंड की प्रतिनिधि संस्कृति बन गई। बिहार अब भी किसी लोक संस्कृति को यह दर्जा नहीं दे सका है। उसे छठ संस्कृति में ही यह क्षमता दिखती है। सरकार को बहुजनों की श्रमण संस्कृति में प्रतिनिधित्व का गुण नहीं दिखता। जबकि बहुजनों की इस लोक संस्कृति में वह क्षमता है।' यह दावा “श्रमण संस्कृति का वाहक-दाउदनगर” में उसके लेखक उपेंद्र कश्यप ने किया है। कहा कि-'चूँकि इस लोकोत्सव में श्रमण संस्कृति से जुड़ी जातियां, अर्थात श्रमजीवी समाज की सहभागिता होती है, शायद इसी कारण इस ओर कोइ ध्यान नहीं देता। दाउदनगर जिउतिया लोकोत्सव को राजकीय दर्जा दिलाने की मांग को लेकर प्रयास जारी है।' स्वयं उपेंद्र कश्यप ने मंत्री, विभागीय सचिव तक को ज्ञापन दिलवाया है। धर्मवीर फिल्म एंड टीवी प्रोडक्शन के निर्देशक धर्मवीर भारती ने कला संस्कृति संसदीय समिति के सदस्य सह सांसद राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव (अब पूर्व) से मिलकर क़रीब डेढ़ घंटे की लंबी चर्चा की। उन्हें उपेन्द्र कश्यप लिखित ‘श्रमण संस्कृति का वाहक दाउदनगर' के साथ दो पेज में इस संस्कृति का सिंहावलोकन और राष्ट्रीय स्तर के फ़िल्म फेस्टिवल में स्पेशल ज़्यूरी अवार्ड विजेता डाक्यूमेंट्री फ़िल्म "जिउतिया : द सोल ऑफ कल्चरल सिटी दाउदनगर" की डीवीडी भेंट की। बिहार के मंत्री शिवचंद्र राम को भी ज्ञापन दिया गया था।

नगर पंचायत की कोशिश को नगर परिषद लगा रहा पलीता:-
नगर पंचायत दाउदनगर ने 2016 में “दाउदनगर जिउतिया लोकोत्सव” का आयोजन किया था। उपेंद्र कश्यप की पहल पर तत्कालीन मुख्य पार्षद परमानंद प्रसाद, उप मुख्य पार्षद कौशलेन्द्र कुमार सिंह और कार्यपालक पदाधिकारी विपिन बिहारी सिंह ने यह आयोजन कराया था। जिसमें वार्ड पार्षद बसंत कुमार और (अब स्वर्गीय) मुन्ना नौशाद ने महती भूमिका निभाया था। इसके बाद नगर पालिका का वजूद ख़त्म हो गया। वर्ष 1885 में नगर पालिका बना शहर तब नगर पंचायत था। नगर परिषद् में उत्क्रमित होने के साथ स्थिति बदल गयी। बोर्ड भंग हो गया और चुनाव न होने की स्थिति में अनुमंडल पदाधिकारी अनीश अख्तर ने रूचि नहीं ली। लोक संस्कृति से जुड़े तमाम लोग उनसे आग्रह करते रहे किन्तु वे अपनी जिद पर अड़े रहे, नतीजा 2016 में आगाज परंपरा की गर्भ में ही ह्त्या कर दी गयी और फिर आया 2017 का साल। जून में नगर परिषद् का गठन हुआ, चुनाव हुआ, बोर्ड बना, लेकिन आयोजन से इनकार कर दिया गया। मंच से घोषणा की गयी कि 2019 में आयोजन अवश्य होगा, किन्तु नहीं किया जा रहा। चर्चा तो है कि दो या इससे अधिक लोगों की जिद के कारण आयोजन नहीं हो रहा है। एक तरह से बोर्ड ही हाइजैक हो गया है। दुखद यह है कि जो इस संस्कृति का हिस्सा हैं, उनकी बहुसंख्या उनके आगे नतमस्तक है जिनकी कोइ भागीदारी इस लोकोत्सव में होती ही नहीं है। यदि नगर परिषद लोकोत्सव का आयोजन करते रहता तो एक दिन सरकार को भी आगे आना पड़ता। प्रतिनिधि संस्कृति का दर्जा न भी मिलता तो हम राजकीय समारोह तक की यात्रा पुरी कर सकते थे। किन्तु जब घर के ही लोग विरोध में टांग खींचने को खड़े हों तो बाहर वाले से क्या अपेक्षा कर सकते हैं?

159 साल से अधिक पुराना है दाउदनगर की जिउतिया संस्कृति:-
एक लोक गीत बताता है कि जिउतिया लोक संस्कृति कितनी पुरानी है। किसी भी लोक संस्कृति का प्रारंभ किन लोगों ने कब किया यह ज्ञात शायद ही होता है। मगर जिउतिया संस्कृति के मामले में कुछ अलग और ख़ास है।“ आश्विन अन्धरिया दूज रहे, संबत 1917 के साल रे जिउतिया। जिउतिया जे रोपे ले हरिचरण, तुलसी, दमडी, जुगुल, रंगलाल रे जिउतिया। अरे धनs भाग रे जिउतिया...।“ कसेरा टोली चौक पर गाया जाने वाला यह गीत स्पष्ट बताता है कि पांच लोगों ने इसका प्रारंभ किया था। किन्तु, सवाल यह है कि क्या वास्तव में किसी लोक संस्कृति का ऐसे प्रारंभ होता है? बीज तो कहीं और होगा? स्वयं कसेरा समाज के लोग यह मानते हैं कि उनके पूर्वजों ने इमली तल का नकल किया था। यानी संबत 1917 या इसवी सन 1860 से पहले इमली तल जो होता था उसका देखा देखी कांस्यकार समाज ने अपने मोहल्ले में शुरू किया। तब यह समाज आर्थिक रूप से संपन्न था। स्वाभाविक रूप से यह संभव दिखता है कि तब शिक्षा भी इस समाज में पटवा, तांती समाज के अपेक्षाकृत अधिक होगी। नतीजा यहाँ साहित्य रचा गया और बाद में कभी यह गीत लिखा गया कि-जितिया जे रोप ले हरिचरण, तुलसी, दमड़ी, जुगुल, रंगलाल रे जितिया.. । लोक संस्कृति के रूप में कोइ भी बीज धीरे-धीरे सामूहिक प्रयासों और लोक सहभागिता से विकसित होता है। आज इस संस्कृति ने कई प्रकार के निरंतर प्रयासों से अपनी पहचान स्थापित किया है।

कैसे हुआ संस्कृति का बीजारोपण:-
इस संस्कृति का बीजारोपण कैसे हुआ होगा? लोक स्मृतियों में जो रचा बसा है उसके अनुसार- कभी प्लेग की महामारी को शांत करने की तत्कालीन समाज की चेष्टा से इस संस्कृति का जन्म हुआ। इसमें कामयाबी भी मिली। लेकिन तब एक महीना तक जो जागरण हुआ वह निरंतरता प्राप्त कर संस्कृति बन गई। पूरा वृत्तांत आप “श्रमण संस्कृति का वाहक-दाउदनगर” पुस्तक में पढ़ सकते हैं। तब तत्कालीन समाज ने दक्षिण या पश्चिम भारत से ओझा, गुणियों को आमंत्रित किया, दैवीय प्रकोप माने गए प्लेग की महामारी को रोकने के लिए। वे आये और इसे शांत किया, जिसमें जादू-टोना, समेत कई कर्म किये गए। एक माह तक चले इस प्रयास ने परंपरा को जन्म दिया जो कालान्तर में संस्कृति बन गयी। बाद में यह नौ दिन और अब मात्र तीन दिवसीय संस्कृति में सिमट गया। यह हर साल आश्विन कृष्णपक्ष अष्ठमी को मनाया जाता है। यहां लकडी या पीतल के बने डमरुनूमा ओखली रखा जाता है। हिन्दी पट्टी में इस तरह सामूहिक जुटान पूजा के लिए कहीं नहीं होता। यहां शहर में बने जीमूतवाहन के मात्र चार चौको (जिउतिया चौक) पर ही तमाम व्रति महिलायें पूजा करती हैं। इस संस्कृति में फोकलोट अर्थात लोकयान के सभी चार तत्व यथा लोक साहित्य, लोक कला, लोक विज्ञान और लोक व्यवहार प्रचुरता में उपलब्ध हैं। तीन दिन तक होने वाली प्रस्तुतियों में इसे देखा जा सकता है। सरकार बहुजनों की इस लोक संस्कृति के उत्थान के लिए कुछ भी नहीं कर रही है। सिर्फ प्रोत्साहन देने की आवश्यकता है। लोक अपने तंत्र (सरकार) से कुछ नहीं लेती। न सुरक्षा मांगती है न साधन। न तनाव देती है न बवाल। लोग अपने में मस्त रहते हैं, मस्ती करते हैं और दूसरों को इतना मस्त कर देते हैं कि वे मन-मस्तिष्क को तृप्त किये बिना ही लौट जाते हैं। दूर-दूर से लोग यहाँ जिउतिया देखने आते हैं।                                       

कौन थे भगवान जीमुतवाहन ?
दाउदनगर में जिस जीमूतवाहन की पूजा बहुजन करते हैं वास्तव में वे राजा थे। उनके पिता शालीवाहन हैं और माता शैब्या। सूर्यवंशीय राजा शालीवाहन ने ही शक संवत चलाया था। इसका प्रयोग आज भी ज्योतिष शास्त्री करते हैं। इस्वी सन के प्रथम शताब्दी में 78 वे वर्ष में वे राज सिंहासन पर बैठे थे। वे समुद्र तटीय संयुक्त प्रांत (उडीसा) के राजा थे। उसी समय उनके पुत्र जीमूतवाहन की पत्नी से भगवान जगन्नाथ जी एवं इनके वाहन गरुण से आशीर्वाद स्वरुप जीवित्पुत्रिका की उत्पत्ति हुई। इसी का धारण महिलायें अपने गले में करती हैं।

 पटना के उइया रे सूइया, गया के हइ दरजिया इयार:-
दाउदनगर जिउतिया लोकोत्सव एक मामले में काफी समृद्ध है कि इसे अपना अलोक साहित्य उपलब्ध है। जिउतिया के गीत बडे सरस हैं। इसमें स्थानीय इतिहास, भूगोल और विशेषताओं को भी प्रयाप्त जगह मिली है। साहित्य इस्द लोकोत्सव के बारे में बहुत कुछ बता देता है। झूमर में गाते हैं- -दाऊदनगर के जिउतिया सरनाम हई गे साजनदाऊदनगर के जिउतिया जीव के साथ हई गे साजन! कहाँ के दिवाली, कहाँ के दशहरा गे साजन, कहवाँ के जिउतिया कइले नाम हई गे साजन दाऊदनगर..दिल्ली के दिवाली, कलकता के दशहरा गे साजन, दाऊदनगर के जिउतिया कइले नाम हई गे साजन, दाऊदनगर के ..... झूमर में विविधाता होती है, रंगीनी होती है और मधुरता भी- -दूर देसे नोकरिया के रे जइहें के जइहें हाजीपुर, के जइहें पटना, के रे जइहें, दूर देसे नोकरिया के रे जइहें बाबा जइहें हाजीपुर, भइया जइहें पटना, सइयाँ जइहें, दूर देसे नोकरिया सइयाँ जइहे, के लइहें बाजूबंद, के लइहें कंगना, के रे लइहें, छतिया दरपनवा के रे लइहें, बाबा लइहें बाजूबंद, भइया लइहें कंगना, सइयाँ लइहें, छतिया दरपनवा सइयाँ लइहें। यहां का परवर काफी मशहूर है। तब भी था और हाजीपूर तक की मंडियों में इसे बेचने यहां के लोग जाते थे। तब पटना नहर में स्टीमर की यात्रा होती थी। देखिये-- ए राजा जी परवर बेचे जायम हाजीपुर परवर बेच के पायल गढ़ायम, पायल हम पहिरम जरूर, ए राजाजी परवर बेचे जायम हाजीपुर एक रंगीन मिजाज का झूमर देखिये। तब भी समाज किस तरह खूला हुआ था जब प्रेम की बातें भी खूब होती थी। -नैना बिदुल हे कहवाँ से आवेला इयार, कहवाँ से आवेला बारि बियहुआ, बारि बियहुआ नैना बिदुल हे कहवाँ से आवेला इयार, पूरबा से आवेला बारि बियहुआ, बारि बियहुआ, नैना बिदुल हे पछिमा से आवेला इयार, श्यामसून्दर बनिया के जा (बेटी), हई रे मनीजरवा, एहि परि गंगा, ओहि पारे जमुना, के मोरा घइला अलगा, हई रे मनीजरवा, घोड़वा चढ़ल आवे राजाजी के बेटवा, ओहि मोरा घइला अलगा, हई रे मनीजरवा,क हवाँ के उइया रे सूइया, कहवाँ के दरजिया इयार, पटना के उइया रे सूइया गया के हइ दरजिया इयार। अइसन चोलिया सीलिहें दरजिया, दूनो मोरवा करे गोहार, पटना के उइया रे सूइया, गया के हइ दरजिया इयार।

 जातीय पहचान से जुडी है चौकें:-
शहर में जिउतिया के सभी चार चौकें जातीय पहचान से जुडी हुई हैं। सबसे पुराना इमली तल पटवा टोली में है। इससे तांती समाज की पहचान जुडी हुई है। इसई तरह कसेरा टोली चौक से कसेरा जाति की। यहां आयोजक भी यही जातियां हैउं और संरक्षक भी। इसी तरह पुरानी शहर चौक जो पुराना सोनारपट्टी है से इस जाति के लोग जुडे हैं। बाजार चौक व्यवसायिक गतिविधियों का अड्डा है सो इससे वैश्य समाज जुडा हुआ है। पुराना शहर और बाजार चौक से दूसरी जातियों की भी सहभागिता है। दोनों जगह आयोजन में मिश्रित जातियां शामिल हैं।