Friday, 19 July 2019

शहर गढ़ने के गवाह डॉक्टर बीके प्रसाद सर नहीं रहे, उनको श्रद्धांजलि


अभिभावक चिकित्सक की दूसरी पीढ़ी समाप्त
उनसे मिलते वक्त का उनका चेहरामुस्कानस्फूर्ति  और संवाद मस्तिष्क में पैबंद हो गए। सब पूर्ववत ही तो थे। इसमें कहीं से भी खतरे का संकेत कतई नहीं था। लगा ही नहीं कि वे थोड़ा भी अस्वस्थ हैं। अचानक से उनके नहीं रहने की सूचना ने इसी कारण चौंका दिया। वे अभिभावक चिकित्सक की पीढ़ी के अंतिम किरदार थेजो अब नहीं रहे।
    0 उपेंद्र कश्यप 0
प्रायः देर रात और अहले सुबह मोबाइल के रिंग बेचैन करते हैं। क्योंकि अक्सर इस अवधि में बुरी सूचना ही आती है। शुक्रवार की सुबह 5:32 बजे मोबाइल ने शोर किया। अस्वस्थ हूँ, इस कारण स्फूर्ति गायब है। देखा, नम्बर गुलाम रहबर के नाम से शेव था। आवाज आई-भैया, सर नहीं रहे। डॉक्टर बीके प्रसाद सर को लेकर यह सूचना बेचैन करने से अधिक चौंका गई। कल यानी 18.9.2019 दिन गुरुवार को पूर्वाह्न ही दाउदनगर से डेहरी आते वक्त उनसे मिला था। बीमार था तो एक कफ सिरफ दिया और पहले की परची पर एक एंटीबायटिक लिखा। भाई राजीव उर्फ बबलू की दवा दुकान से दवा ली और चल दिया था। उनको पहली बार मैंने कुछ महंगी दवा दी, जो मैंने खरीदा था किन्तु इस्तेमाल सब नहीं कर सका था। उनको यह कह कर दिया कि किसी को यह दवा काम आयेगी, उनको दे दीजिएगा। वह दवा शायद अब उनके सामने के टेबल पर ही पडा रहा गया। तब मिलते वक्त का उनका चेहरा, मुस्कान, स्फूर्ति  और संवाद मस्तिष्क में पैबंद हो गए। सब पूर्ववत ही तो थे। इसमें कहीं से भी खतरे का संकेत कतई नहीं था। लगा ही नहीं कि वे थोड़ा भी अस्वस्थ हैं। अचानक से उनके नहीं रहने की सूचना ने इसी कारण चौंका दिया। वे अभिभावक चिकित्सक की पीढ़ी के अंतिम किरदार थे, जो अब नहीं रहे। डॉ. राम परिखा बाबू को हमने पिछले साल खोया था। वे पहली पीढ़ी के चिकित्सक थे। उनके पास गुलाम भारत से लेकर 2010 के दशक तक की यात्रा के संस्मरण थे। दिमाग में किसी डिक्सनरी या इनसाइक्लोपीडिया की तरह सुरक्षित। इसी कारण मैंने उन्हें "दाउदनगर का इनसाईक्लोपीडिया" की संज्ञा दी थी। स्वतंत्रता संग्राम से लेकर बाद के दिनों तक के किसी 'समय यात्रा' और उसके 'सारथी' या 'यात्री' से संबद्ध पूरा विवरण उपलब्ध करा देते थे। इसी तरह 1980 के दशक (जब वे दाउदनगर आये) से लेकर अपने निधन के वक्त तक का इतिहास डॉ.बीके सर के पास उपलब्ध था। इन्होंने दाउदनगर के बनने और गढ़ने के वक्त को जिया था। एक बड़ी घटना की एक कड़ी इनके सरकारी आवासीय क्लिनिक से जुड़ी, जो दाउदनगर के लिए ऐतिहासिक रही। व्यापक सामाजिक, राजनीतिक प्रभाव उसका शहर ने देखा था। लेकिन इस घटना का विवरण मैं सार्वजनिक नहीं कर सकता। यह 1990-2000 के दशक की घटना है। खैर।


डॉ. ब्रज किशोर प्रसाद (बीके बाबू) शहर के लिए एक एसेट थे। अब उनके बिना शहर इस सन्दर्भ में चिकित्सक विहीन लगता है, कि उन पर यह भरोसा था लोगों को कि दाउदनगर में उनका इलाज अंतिम है। स्वस्थ हुए तो ठीक अन्यथा रेफर। उनसे न जाने कितनी बार मेरा साक्षात्कार हुआ। उनके बारे में अखबार में काफी कुछ लिखा। उनके राजनीतिक सामाजिक मुद्दों से संबद्ध विचार मैंने सार्वजनिक किया। अखबार में काफी जगह ली उन्होंने। आज कई घंटे फाइल ढूंढता रहा। कुछ मिला, अधिकतर नहीं मिला। उनके बारे में जनता को, बीमार को आश्वस्ति थी, कि रेफर कर दिया तो फिर औरंगाबाद तक इलाज कतई संभव नहीं। राजधानी और वाराणसी या दिल्ली ही ठाँव मिल सकता था। इसके अलावा कोई कितना भी प्रतिष्टित हो, बड़ा आदमी हो, इनके सामने नतमस्तक ही रहा। कोई लफंगा हो तब भी वह इनके क्लिनिक में इनके सामने सभ्यता से ही पेश आता था। इनको लेकर काफी कुछ लिखा जा सकता है। लिखा भी हूँ। अब शहर में अनुभवी चिकित्सक कम ही बचे हैं। तीसरी पीढ़ी के चिकित्सकों को अब शहर के स्वास्थ्य की जिम्मेदारी अपने कंधे पर ढोनी होगी, जिसमें डॉ. महेंद्र शर्मा, डॉ. रंजू, डॉ. विनोद कुमार जैसे चिकित्सक शामिल हैं। इनके बाद की चिकित्सक पीढ़ी को अभी बहुत कुछ देखना-समझना शेष है। 

                                    अंत में एक संस्मरण:-
डॉ.बीके प्रसाद सर के पुत्र डॉ.संजीव कुमार का साखात्कार, फोटो में गुलाब रहबर भी
एक बार मुझे चिकेन पॉक्स हुआ था। मैं उनके वर्तमान वाले क्लिनिक गया। सफेद हल्का चादर ओढ़े। देखते ही कहा- जाओ, मैं इलाज नहीं करूंगा। करीब-करीब भगा दिया। मुझे अपने घर वापस आ जाना पड़ा। फिर डॉ. महेंद्र शर्मा सर को फोन किया तो वे स्वयं घर आये और इलाज किया। मैं समझ नहीं सका था, ऐसा क्यों किया? खैर, कभी कभी व्यक्ति किसी कारण से उखड़ जाता है। मैं यही सोच खामोश हो गया। आश्चर्य इस बात का था कि वे मेरी माँ को और ममहर को जानते-पहचानते थे। जब मां के साथ गया था तो उनका व्यवहार अलग था। मेरे साथ वाले व्यवहार से एकदम उलट। उनको बाद में मेरी पृष्ठभूमि का ज्ञान हुआ। हालांकि बाद में इतना करीब हुए हम कि गप्पे लड़ाने के लिए शाम को बैठा करता था। 
भगवान उनकी आत्मा को शांति दे। भाई बबलू समेत पूरे परिवार को दुख सहने का संबल दे। बस यही ईश्वर से कामना करता हूँ।

Tuesday, 11 June 2019

नहीं रहे ओबरा का राजनीतिक चरित्र बदलने वाले सरदार लक्षमणधारी सिंह


मतदाताओं को बूथ तक जाने से रोक दिया जाता था कभी या साहस नहीं कर पाते थे

दाऊदनगरियों को बूथ तक जाने का साहस दिया था

उपेन्द्र कश्यप 0
(उनकी कमियां अपनी जगह, क्योंकि उनकी कमियों का कोई  दुष्प्रभाव ओबरा-विधान सभा क्षेत्र में नहीं था, इसलिए वे क्या थे, कैसे थे, इससे महत्वपूर्ण हमारे लिए यह है कि ओबरा विधान सभा चुनाव में उनका क्या योगदान था, कि मैं लिख रहा हूँ। उनका इस इलाके से संबन्ध बस भर चुनाव तक था। वे हैबस पुर नरसंहार के आरोपी थे। राजबाला वर्मा ने उनके घर कुर्क किया था। वे बर्बाद हो गए थे बाद के दिनों में और अंततः गरीबी में बीमारी से मर गए।)

खैर, पढ़िए इतिहास को, जानिए क्या था दाउदनगर-ओबरा। इस बहाने चुनावी गतिविधियों का इतिहास....

ओबरा विधान सभा क्षेत्र समाजवादियों का गढ़ रहा था। ओबरा और दाउदनगर प्रखंड को मिलाकर इसका परिसीमन किया गया था। बीच में वर्ष 1995 और 2000 में राजाराम सिंह के जरिये वामपंथ का झंडा बुलंद हुआ था। यह क्यों और कैसे हुआ था? इस राजनीतिक चरित्र बदलाव में एक अहम भूमिका सरदार लक्षमण धारी सिंह की रही थी। कोई माने या ना माने। तब बड़ी आबादी उनकी थी जो यह मानते हैं कि यदि सरदार नहीं होते तो राजाराम सिंह नहीं जीतते। हालांकि जितने अंतर से वर्ष 1995 के चुनाव में जीते थे, उस गैप में यह बात बहुतों ने खारिज भी की थी। तब करीब 45 हजार वोट राजाराम को मिले थे और करीब 20 हजार से अधिक वोट के अंतर से जीते थे। तब दाउदनगर की परिस्थिति भयावह थी। दबंगता थी। शांति से रहना, अपना व्यवसाय करना और यहां तक की अपना मतदान करना भी मुश्किल का काम था। बाबा बिहारी दास के संगत में तब व्यवसायियों ने बैठक की थी। गुण्डई के खिलाफ एकजुटता का आह्वाहन किया था। बाजार की स्थिति यह थी कि भय व्यापत हो जाता था, चुनाव के वक्त। बनिया चरित्र के इस शहर में बनिया वोट देने से डरता था। एक राजनीतिक विचारधारा वालों का तब इतना खौफ़ हुआ करता था। उंगली पर गिने जा सकने वालों की प्रॉक्सी हुकूमत शहर पर चलती थी। एक-दो की इच्छा ही आदेश मान लिया जाता था। खास कर शहर में। कहते हैं तब यह कहावत चली थी-लाश पर टैक्स। इसके व्यापक संदर्भ और मायने हैं। जो मेरी पत्रकारिता-इतिहास के चिप्स में कैद है। एक ही केंद्र विंदु हुआ करता था। जिसके इर्द-गिर्द सत्ता और प्रशासन घुमा करता था। समाजिक, राजनीतिक और आर्थिक गतिविधियां एक विंदु से संचालित या प्रभावित होती थीं। कोई चुनौती देने वाला तब नहीं था। इस बीच 1995 को आना था, वह आया। विधान सभा चुनाव की घोषणा हुई। कई बार चुनाव हार चुके आईपीएफ़ (तब यह भाकपा माले का खुला मंच था और भाकपा माले प्रतिबंधित संगठन) जिसे आम लोग नक्सली पार्टी या लाल सलाम वाली पार्टी कहा करते थे, से राजाराम सिंह चुनाव लड़ रहे थे। उनका चुनाव चिन्ह था-सीढ़ी। पहले से स्थापित के विरुद्ध राजाराम खड़ा हुए। दो खेमे बने, दोनों ने हरवे हथियार जमा किये। बाजार में कुछ स्थान आईपीएफ के सेल्टर बने। कारण था मतदान से वंचित किये जाने की कोशिश होने की आशंका। बिहार पीपुल्स पार्टी (बीपीपा या बीपीपी) के आनंद मोहन बिहार में हीरो बन चुके थे। आरोप तो यह तक लग रहा था कि इनको हेलीकॉप्टर से लालू यादव ही बिहार भ्रमण करा रहे हैं। राजनीतिक उद्देश्य था-सवर्णों का वोट कटवाना ताकि वैलेट बॉक्स से उनके दावे मुताबिक जिन्न निकल सके। हालांकि बिहार में तो निकला, ओबरा में जिन्न दूसरे के कंधे से ऐसा लटका कि तीसरा बाजी मार ले गया।

बाजार में हरवे हथियार के जमावड़े और मतदाताओं में भय (सिर्फ बनिया, वैश्य समुदाय ही नहीं बल्कि अन्य कमजोर जातियों के मतदाता जो डर से वोट नहीं करते थे) को दूर करने के लिए आगे आये थे सरदार लक्षमण धारी सिंह। उनके साथ युवाओं की फौज थी। खास कर स्वजातीय युवाओं की कतार उनके साथ लगी रहती थी। पक्की जीत सबको लगती है, चाहे वह कोई भी प्रत्याशी हो। यदि वह डमी कैंडिडेट नहीं हो। सरदार को भी लगता होगा कि वे जीतेंगे। उनके प्रचार का स्टाइल आकर्षक हुआ करता था। दबंगता साफ साफ झलकती थी। हरवे हथियार लेकर चलना उन दिनों बिहार में स्टेटस सिंबल हुआ करता था। जिसके पास जितने हथियार और आदमी, वह उतना ही ताकतवर माना जाता था। पहली बार दाउदनगर में हथियारों की आवाजाही की स्थिति तीन तरफा हुई। एकदम से ओपन सीक्रेट। कौन कौन किसके पक्ष में, हथियार लेकर चल रहा है, यह काफी लोग जानते थे। सरदार बड़ी ताकत की पृष्ठभूमि के साथ दबंग छवि के आनन्द मोहन का टिकट लेकर आये थे। यह इलाके के लिए पहला अनुभव था।खुलेआम चुनौती, धमकी और प्रदर्शन।

कमजोर वोटरों को दबंग डराया करते थे, बूथ लूटे जाते थे, वोटरों को बूथ तक पहुँचने से रोका जाता था। उनकी उनके इलाके में तूती बोलती थी। हठा कट्ठा रौबदार छवि। उन्हें यह अहसास हो गया होगा कि उनकी जीत लगभग असंभव है। ऊपर से सत्ता संरक्षित लोगों ने उनके अहं को ठेस पहुंचाया। चुनौती दी। सरदार जो अपना धर्म हिन्दू और अपनी जाति भूमिहार छोड़कर सिक्ख बन गये थे, अहम के टकराव ने शायद उनको मतदान से वंचित किये जाते रहे लोगों का रहनुमा बना दिया। सबको मतदान करने का संबल मिला, लोग घरों से निकले और मतदान केंद्र तक पहुंचे। बूथ लूटने वाले, बूथ तक मतदाताओं को पहुंचने से रोकने वाले सब के सब अपने बिल में घुस गए थे। उनकी लाठियां रखी रह गई थी। हरवे हथियार तो निकालने का साहस तक तत्कालीन सुरमा नहीं कर सके थे, कारण बस सरदार थे। हालांकि आईपीएफ भी ताकतवर थी। उसके अपने भूमिगत संगठन भाकपा माले का हथियारबंद दस्ता हुआ करता था। लेकिन यह शहरियों के आंख से ओझल था। ग्रामीण इलाकों में तो लोगों ने दस्ता को देखा था, किन्तु शहरियों के लिए यह सिर्फ सुनने और अखबारों में पढ़ने भर तक का मामला तब था। खैर, शहरियों में मतदान केंद्र तक पहुंचने का साहस सरदार के कारण ही बना। वरना तो कहा जाता था-बनिया सार वोट देवे जतथु सो, एगो बम पटक देबे तो सब भाग जटथु सो। इस धारणा को लोगों ने बदला। कोई राजाराम सिंह को वोट नहीं दिया था तब, सबने (शहर के संदर्भ में) नकारात्मक वोटिंग उनके पक्ष में सत्ता के रसूखदार को हराने के लिए किया था। हर कोई बस यही कहता था-जो, सीढ़ी चढ़ जो। यानी सीढ़ी छाप पर वोट देना है। वोट देने की होड़ मची थी, सीढ़ी चढ़ने की होड़। नतीजा इस होड़ ने कमाल कर दिया। ऐसी सीढ़ी मतदाताओं ने चढ़ी कि समाजवादी किला ढह गया। वह भी रिकार्ड मतों के अंतर से। आज तक वह रिकॉर्ड नहीं टूट सका है। और उतना वोट आज तक राजाराम सिंह को नहीं मिला सका है। इसके पहले 1985 में भाजपा के बीरेंद्र सिंह ने ओबरा में दक्षिणपंथ का झंडा लहराया था। इन चुनावों से पहले कांग्रेसी वर्चस्व वाले आजादी की खुमार में लिपटे भारत में भी यहां बैलों की जोड़ी, और छोकरी पर टोकरी की जीत होती रही थी। सरदार ने ऐसा असर किया कि फिर बाजार के बनियों को बम पटक कर बूथ तक जाने से रोकने की सोच भी मर गयी। अब तो युवाओं की ऐसी फौज शहर में है जो रोकी नहीं जा सकती। बाजार के युवा वोटरों को या उनको जो 1995 के बाद वोटर बने हैं, उनको सरदार का योगदान समझ में नहीं आएगा।
सरदार क्या थे, क्या हो गए यह और बात है। असली बात ओबरा के संदर्भ में यही है कि वे आये थे विधायक बनने और हर मतदाता को साहसी बना गए। यह साहस बड़ी अजीब शै है। इसके बिना इंसान कोई काम नहीं कर सकता। न सीढ़ी चढ़ सकता है, न चक्र तोड़ सकता है, न ताला-चाभी लगा सकता है।

Wednesday, 5 June 2019

विश्व पर्यावरण दिवस पर क्या बोले ग्लोबल प्रोफेसर डॉ. सुरेश बोहिदार

चेतिये अन्यथा ऑक्सीजन मिलना भी हो जाएगा मुश्किल-डॉ. सुरेश बोहिदार
फोटो-उपेन्द्र कश्यप, डॉ. बोहिदार और भाई रंजन
विश्व पर्यावरण दिवस पर वनोषधियों के जंगल में गोष्ठी

ग्लोबल प्रोफेसर, लेखक, पर्यावरणविद व आयुर्वेदाचार्य शामिल

विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर बुधवार को दाउदनगर अनुमण्डल के देवकुंड स्थित नीलकोठी बाघोई में एक गोष्ठी का आयोजन किया गया। इस आयोजन की विशेषता यह रही कि गोष्ठी किसी एयर कंडीशन या कूलरों के बीच नहीं, बल्कि वनोषधियों के जंगल के बीच विचार-विमर्श किया गया। जहां करीब दो सौ प्रकार के वनोषधि हैं, और आयुर्वेदिक दवाइयां तैयार करने का इंतजाम। आरसीई रुड़की के निदेशक ग्लोबल प्रोफेसर डॉ. सुरेश बोहिदार, लेखक उपेंद्र कश्यप, आयुर्वेदाचार्य डॉ. राधेश्याम यादव, पर्यावरणविद भाई रंजन, आयुर्वेद औषधि के जानकार अरविंद तिवारी, वनोषधियों का जंगल रेत के खेत में तैयार करने वाले मदन किशोर सिंह, भोला सिंह एवं अन्य किसान शामिल हुए। गोष्ठी का निष्कर्ष यह निकला कि प्रकृति में कोई रोग नहीं है। दोष व्यवस्थापक का है। जब सोन के छाडन में रेत पर जंगल तैयार हो सकता है तो पर्यावरण संरक्षण बहुत मुश्किल काम नहीं है। आवश्यकता इस बात की है कि लोग जागरूक हों, अपनी जिम्मेदारी समझें और मानव समाज के लिए अपना योगदान दें, अन्यथा आने वाले वक्त में ऑक्सीजन लेकर चलना मजबूरी होगी, जल मिलना मुश्किल होगा। मानव जीवन के वजूद पर खतरा होगा। इसके लिए प्राथामिक स्कूल के बच्चों से जागरूकता की शुरुआत करना आज अति आवश्यक है।


प्राण विद्या पीठ के अध्यक्ष डॉ. सुरेश चंद्र बोहिदार ने कहा कि प्रकृति और पर्यावरण आपस में जुड़े हुए हैं। ये जाहिर है कि जब तक पर्यावरण का हम सुधार न करेंगे तब तक प्रकृति भी नहीं सुधरेगी, जिसका मनुष्य एक अंश है। पर्यावरण के लिए लोगों को जागरूक करना आवश्यक है। बच्चों से लेकर वृद्धों तक, प्राइमरी से ही पर्यावरण के बारे में शिक्षा आवश्यक होना चाहिए। यह भी जाहिर है कि पर्यावरण को हम इग्नोर करेंगे तो आगे चल कर पानी और फिर ऑक्सीजन भी मिलना मुश्किल हो जायेगा। जल संचय भी जरूरी है। ग्लोबल लेबल पर जो वार्मिग देखने को मिल रहा है, गर्मी बढ़ रही है हर वर्ष, यह विश्व के लिए चेतावनी है। अभी से चेतना आवश्यक है। प्रयास जारी रखे हैं और रखेंगे।

लेखक उपेन्द्र कश्यप ने कहा कि पर्यावरण की जागरूकता के लिए बच्चों को टारगेट करना होगा। नई पीढ़ी ने पूर्व के मौसम और जल की सहज उपलब्धता को देखा नहीं है, इसलिए उसे संकट समझ में नहीं आता। इसलिए मिडिल स्कूल से लेकर इंटर के बच्चों को बदलते मौसम के मिजाज, बढ़ती गर्मी, जल संकट के बारे में बताना होगा, आगाह करना होगा। तभी सफलता मिलेगी।

पर्यावरणविद रंजन भाई ने कहा कि पर्यावरण दिवस पर प्राण विद्या पीठ के सभी सदस्यों ने जन जन को जागरूक करने का संकल्प लिया है। जनसंख्या पर नियंत्रण और पेड़ पौधे का सम्मान करना होगा अन्यथा जीवन नहीं बचेगा। पूर्वज नदी में पानी देखा, हम बोतल में आने वाली पीढ़ी के लिए पानी देखना मुश्किल होगा। ऑक्सीजन का सिलेंडर लेकर चलना पड़ेगा। धरती का जीवन 90 साल और है। नहीं सुधरे और चेते तो मानव जीवन का अंत हो सकता है।

आयुर्वेदाचार्य डॉ. राधेश्याम यादव ने कहा कि प्रकृति में कोई रोग नहीं है। व्यवस्थापक दोषी है। व्यवस्थापक सरकार है। हमारा आहार-विहार, रहन सहन, खान पान बदल गया है। अशुद्ध हो गया है। जरूरत है कि आम जनता की चेतना जगाई जाए। पेड़ पौधे, जलाशय की व्यवस्था की जाए तो कुछ दिन में जलवायु पर नियंत्रण पाया जा सकता है, किन्तु शर्त यह है कि यह जनहित में हो।

अरविंद तिवारी ने कहा कि पर्यावरण संरक्षण मानव जीवन के लिए आवश्यक है। हम पर्यावरण से ही बने हैं। इसका संरक्षण नहीं करेंगे तो हम नष्ट हो जाएंगे। गर्भ काल से लेकर मृत्यु तक पर्यावरण पर ही निर्भर हैं हम। हमको संतुलित रहना होगा। अन्यथा बर्बाद होना तय है। पर्यावरण संरक्षण से आहार की संस्कृति कायम कर ग्राम स्वावलंबन का प्रयास कर रहे हैं। कहा कि यहां वनोषधियों का परंपरागत उपयोग किया जा रहा है। फूड कल्चर में शामिल किया जा रहा है।


मदन किशोर सिंह ने कहा कि
आयुर्वेद आहार है और आहार में ही औषधि है। उसका मेडिसिन में प्रयोग कर आयुर्वेद को मारने की कोशिश की गई है। मरीज जो आते हैं, उनको उनके इस्तेमाल के लायक औषधि दिया जाता है। सेवा से सेवा का समन्वय बनाया जाता है।
कहा कि औषधीय और फलदार वृक्ष हैं। मकसद है पर्यावरण और समाजहित। दिव्य औषधियों को जीवित करना। मजदूर- किसान- संस्था साझेदार होंगे। अर्थव्यवस्था मिलीजुली होगी। समाज को निरोग बनाने के लिए काम कर रहे हैं।

Thursday, 25 April 2019

गरीबी में जाति या जाति में गरीबी नहीं ढूंढते हैं सुपर-30 वाले आनंद सर


उदंड शिष्य के लिए दोष शिक्षक का
सुपर थर्टी के हीरो का साक्षात्कार
० उपेंद्र कश्यप ०
विजन ने दाउदनगर के शैक्षणिक इतिहास को बुधवार के दिन एक नया आयाम दिया। इस दिन सुपर थर्टी के हीरो विश्व विख्यात शख्सियत आनंद कुमार का आगमन हुआ। 
भगवान प्रसाद शिवनाथ प्रसाद बीएड कॉलेज के सचिव डॉ.प्रकाशचंद्रा ने सबका स्वागत किया। सभी को फिर अपने कार्यालय ले गए। उन्होंने आनंद सर की खासियतों और उनके सामाजिक योगदान को बताया। मंच से आयोजक संस्था के निदेशक अरविंद कुमार धीरज ने कुछ प्रश्न पूछे और उसका “दिल से जवाब” उन्होंने दिया। उन्होंने समयाभाव के कारण यह साफ़ कर दिया कि अलग से कोइ संबोधन नहीं, इन्हीं प्रश्नों में वे हर बात कह देंगे। उनसे सबसे रोचक और चौंकाने वाला प्रश्न पूछा गया-गरीबी में जाति या जाति में गरीबी ढूंढते हैं? जवाब दिया-हर समाज में गरीब होते हैं। हर जरूरतमंद को हम मदद करें तो बिहार बदल जायेगा। बगैर जाति का मतदान करें, चुनाव और चयन करें। देश बदल जायेगा। इससे पूर्व उनसे पूछा गया था-सुपर 30 का संचालन आप करते हैं। बच्चों का चयन आप किस आधार पर करते हैं? मानवता, जाति या टैलेंट के आधार पर? बोले- सुपर थर्टी और उनके बारे में भ्रम फैलाया जा रहा है। सुपर 30 में हर जाति धर्म के बच्चे लिए जाते हैं। ज्योतिष कुमार को सामने लाकर उदाहरण दिया। वे दाउदनगर कॉलेज में लेक्चरर बने। बोले-गरीब थे ज्योतिष, मानवता भी चयन का आधार है।

आनंद और धीरज के सवाल-जवाब:-
प्रश्न-एक विद्यार्थी जब अपेक्षा के अनुकूल सफल न होकर फ्रस्टेड हो जाये तो शिक्षक क्या करे?
जवाब-बच्चे को हतोत्साहित न करे शिक्षक। समझाए कि परिश्रम करोगे तो अवश्य सफल होंगे। उदाहरण दें कि अमुक सफल व्यक्ति असफल हुआ था और फिर सफल हुआ। आत्म विश्वास बढ़ाने का काम शिक्षक का है। यह दायित्व यदि शिक्षक नहीं निभा पाता तो शिक्षक खुद को समझे। शिक्षक को कहना चाहिए कि बेटे बेटी मुझमें ही कोई कमी रह गई होगी, इस कारण आप सफल नहीं हुए।

प्रश्न-आईआईआईटी जीईई बनने से बच्चे कतरा रहे हैं। वे ऐसा सेक्टर चुन रहे हैं जिसमें जल्द नौकरी और पैसा मिले। अभिभावक कहते हैं हर दूसरा इंजीनियर सड़क पर हैं।
जवाब-नौकरी की संभावना उतनी नहीं है जितनी चाहिए। पढ़ने का मकसद ही आर्थिक होता है। पढ़ने के दूसरे मकसद बाद में होते हैं। देश गरीब है, संघर्ष कर रहा है। जिस देश का भविष्य सुनहला है, उसमें इंजीनियरों का योगदान काफी होता है। जो बनें उसमें उत्कृष्टता के साथ करें, सफलता मिलेगी। अच्छा काम करिये, सबसे बेहतर बनने का काम करियेगा तो वह बुरा नहीं है। संभावना उसमें कम नहीं है।

प्रश्न-राजनीतिक दबाब शिक्षा क्षेत्र में महसूस कर रहे हैं?


जवाब-सुपर थर्टी के लिए किसी से पैसा नहीं लिया। पीएम, सीएम, और कई उद्योगपति आर्थिक सहयोग करना चाहे किन्तु नहीं लिया। ख्याति कुछेक को नहीं पची। बड़ी फिल्म बननी शुरू हुई तो कुछ लोग साजिश कर सुपर 30 को बदनाम करने के लिए साजिश रचे। पहले सब ठीक था। लेकिन फ़िल्म बनने के लिए शुरू हुआ तो साजिश रची गई। जब हर तरफ से निराश हुआ तो प्रमोद चंद्रवंशी आगे आये और पहली पहचान हुई। डीजीपी ने उच्च स्तरीय जांच कराया तब उस बच्चे को जमानत मिली जिसे सिर्फ संबंध होने के कारण फंसाया गया। 
प्रश्न-सबसे कठीन पल, जब आप रोये हों।
जवाब-दर्दनाक पल रहा, दिल से बता रहा हूँ। ट्रक भाई पर चढ़ाया गया और मेरे से संम्बंध के कारण एक लड़के को जेल भेजा गया। फंसाया गया। वह सबसे खतरनाक पल था। खुशकिस्मत रहा कि प्रमोद चंद्रवंशी ने साथ दिया।
प्रश्न-किस व्यक्तित्व से आप प्रेरणा लेते हैं?
जवाब-सच है कि बहुत सारे लोग हैं। लेकिन छोटे लोग भी होते हैं जो प्रेरणा देता हैं। जो कुछ मदद नहीं कर सकता वह भी आकर संबल दिए। ताकत बढ़ाया। प्रेरणा दिया। 
प्रश्न-आदर्श व्यक्ति कौन?
जवाब-पिता जी। फ़िल्म में उनका कैरेक्टर देख कर पता चलेगा। किसी का बुरा मत सोचो। किसी से बदला मत लो। 
प्रश्न-विद्यार्थियों की उदंडता का कोई गणितीय फार्मूला है क्या?
जवाब-कोई बच्चा तो अभी तक आपका उदंड नहीं दिखा। जब बच्चा उदंड हो तो शिक्षक से पूछना चाहिए कि वह क्यों बच्चे को नहीं सीखा पा रहा है। इसके लिए दोष शिक्षक का बच्चे से अधिक है।
प्रश्न-दो बड़ी कार फिर नैनो से क्यों चलते हैं?
जवाब-दूर के लिए स्कार्पियो। जरूरत के अनुसार उपयोग करें। दुरुपयोग और फिजूलखर्ची नहीं करनी चाहिए। 

बोले-सफल होने के लिए चार बात का ध्यान रखें-
1.प्रबल प्यास-दिन रात सोचिए। सोते जागते सोचिए।
2.सकारात्मक सोच-हमेशा पोजेटिव सोच रखिये। ऐसा मत सोचिये कि पैसा नहीं तो इतिहास नहीं रच सकता। छोटा शहर है यहां क्या कर सकते हैं, यह मत सोचिए।
3.अथक प्रयास-प्रयास करना आवश्यक है। सफलता के लिए बिना थके हारे बिना आराम किये काम करिये।  
4.असीम धैर्य-धैर्य आवश्यक है। फिर प्रयास फिर प्रयास करिये। सफलता अवश्य मिलेगी।

भारत रत्न मिले आनन्द कुमार को-प्रमोद चंद्रवंशी
जदयू नेता और विजन के 10 वें वार्षिकोत्सव पर यहां आनन्द कुमार को लाने वाले प्रमोद चंद्रवंशी ने मांग की कि आनंद कुमार को भारत सरकार भारत रत्न की उपाधि दी। कहा कि कई ऐसे लोगों को भारत रत्न मिला है जिनकी पहचान जिला और राज्य स्तर तक ही सीमित है, जबकि आनन्द कुमार की पहचान वैश्विक है। इन्होंने जो योगदान समाज के लिए दिया है वह सम्मान का हकदार है। प्रमोद सिंह चंद्रवंशी ने कहा कि आनन्द कुमार ने देश नहीं विश्व में बिहार की प्रतिष्ठा स्थापित करने का काम किया है। कहा कि बच्चों में प्रतिभा की कमी नहीं है, उसे प्रेरित करने, सही मार्गदर्शन देने की जरूरत है। बच्चे स्वयं मील का पत्थर रख देंगे। विजन अपने संकल्प लगा रहे, हम सब साथ हैं। अभी तकनीकी ज्ञान जिनके पास नहीं है, वह अज्ञानी माना जाता है।कहा कि एमएलए एमपी बनना चुनाव लड़ने का मकसद नहीं है। जनता ने जो प्यार दिया है, वह महत्वपूर्ण है। हम विकास का कार्य करते रहेंगे, और यह कर रहे हैं। करते रहेंगे।

समय बदल रहा है, राजा का बेटा नहीं, हकदार ही राजा बनेगा-रहमान
रहमान थर्टी के संचालक उबैदुल रहमान ने कहा कि कुछ लोग नहीं चाहते कि गरीब पढ़े। उनकी कोशिश है। छोटे भाई का पैर टूटा, लेकिन हौसला नहीं टूटा। जो लोग गरीब को पढ़ने देना नहीं चाहते वे सफल नहीं होंगे, जब तक आनन्द कुमार जैसे लोग हैं। इनके संघर्ष और योगदान पर फ़िल्म बन रही है। जुलाई में रिलीज होने वाली है फ़िल्म- सुपर थर्टी। कहा- समय बदलने वाला है, अब राजा का बेटा राजा नहीं होगा, राजा वही बनेगा जो इसका हकदार होगा, यह डायलॉग चर्चित होगा। आवाम की जुबान पर होगा।फ़िल्म इतिहास लिखने वाली होने जा रही है। मालूम हो कि रहमान सऊदी अरब में बिहार फाउंडेशन के अधिकारी रहे हैं। उन्होंने 2010 में आनन्द कुमार को वहां बिहार दिवस के अवसर पर बतौर मुख्य अतिथि बुलाया था। सुपर थर्टी से प्रभावित था जब आनंद कुमार से प्रभावित हुआ तो बिहार आ गए और रहमान 30 शुरू किया। कहा कि वे सिर्फ बच्चों का चयन करते हैं, आनंद पढ़ाते हैं। अपने बच्चों की तरह। मुस्लिम समाज के लिए जो त्याग और योगदान आनन्द कुमार का है वह काबिले तारीफ है। श्री रहमान ने कहा कि बिहार और भारत के बाहर बिहार की एक पहचान बन गए हैं आंनद कुमार। बुद्ध और अन्य की तरह ही।

सिकंदर बना विजन चैंपियन का सिकंदर:-

विजन द्वारा आयोजित विजन चैंपियन का विजेता सिकंदर आलम बना। उसे संस्थान के निदेशक अरविंद कुमार धीरज द्वारा हस्ताक्षरित 10000 रुपये का चेक आनंद कुमार द्वारा दिलाया गया। सिकंदर के पिता फिरोज आलम ऑटो और टेम्पू बनाने का काम करते हैं। माता वहीदा खातून गृहिणी हैं। ओबरा के द इंडियन कोचिंग सेंटर का छात्र है। भाई है जो पढ़ाई में हेल्प करता है और खुद भी पढ़ाई करता है। सपना, सपना है इसका  आईएएस बनना। प्रति दिन 5 से 6 घंटे की पढ़ाई करता है। सफलता का श्रेय भाई को देता है। कार्यक्रम में कंप्यूटर पर सुरेंद्र कुमार मेहता, मेराज अख्तर और अभिमन्यू भारती ने सहयोग किया। व्यवस्था में राहुल कुमार, उदय कुमार, अमन कुमार, संजय किशोर, शंकर, वंदना, अमिता, माधुरी, सतेंद्र, बिजय, बिनय, गिरी ने अहम भूमिका निभाई। सांस्कृतिक कार्यक्रम में गोविंदा ने सहयोग किया और कला प्रभा संगम द्वारा खूबसूरत प्रस्तुति दी गई।

Wednesday, 17 April 2019

दाऊ-द-नगर के 'द' में बहुत दम है, इसके बिना "दाऊ नगर" बेदम होगा

उपेंद्र कश्यप
सुन रहा नहीं, फेसबुक पर देख रहा हूँ। रामनवमी
के बाद अचानक से एक मुद्दा उछाला गया। दाऊदनगर का नाम बदलने वाला है। कोई इसे बलदाऊ से जोड़ रहा है। एक साध्वी आईं और नाम बदलने वाला भाव जगा गईं। एक पोस्ट में इसे मुंबई के माफिया डॉन रहे पाकिस्तान के शरण में जी रहे दाऊद इब्राहिम से इस करीब साढ़े तीन सौ साल पुराने शहर को जोड़ दिया। क्या तर्क और कुतर्क गढ़े और कहे जा रहे हैं।
अब पता नहीं कौन लोग इसे हवा दे रहे हैं, और कितने लोग नाम परिवर्तन के साथ हैं। मेरा किसी से व्यक्तिगत बातचीत इस मुद्दे पर नहीं हुई है। करीब डेढ़ बजे रात्रि में ट्रेन के बर्थ पर जब फेसबुक देखा तो जो अमूभूति हुई, वह बयान करना मुश्किल है। अपने 45 वर्ष की उम्र का 25 साल दाउदनगर में पत्रकारिता पर खर्च किया। मेरी पुस्तक-"श्रमण संस्कृति का वाहक-दाऊदनगर"- में दाऊदनगर के जन्मने से लेकर, विस्तारित होने, वर्तमान तक का तथ्यात्मक विवरण है। क्यों बसा दाउदनगर? किसने, कब और क्यों बसाया? किसके कहने पर किस खासियत या विवशता के कारण बसाया इस शहर को? बाद में किस किस ने इस कस्बे को नगर बनाया? वह भी क्यों और कब बनाया? क्या जरूरत तब महसूस की गई थी इसकी? बहुत सारे पन्ने इतिहास के दर्ज हैं, इस किताब में। और हां मेरा दावा है -300 साल पूर्व लिखी गई -तारीख-ए-दाऊदिया-से कई गुणा अधिक जानकारी दाउदनगर के बारे में इस पुस्तक में मैंने दी ही। 
मेरा व्यक्तिगत विचार यह है कि नाम परिवर्तन मुश्किल से अधिक कठिन है, और फिर निरर्थक भी। यह बिना मतलब का ऐसा पचड़ा वाला मुद्दा (यदि मुद्दा मानें तो, वरना यह है फालतू गॉसिप) है जो शहर को बहुत कुछ खोने पर विवश कर देगा। पहले ही दंगे के दंश में शहर बहुत कुछ खो चुका है। अब और खोने का मतलब है सदा के लिए आफत को आमंत्रित कर स्थापित करना। अभी ही हर धार्मिक आयोजन पर शहर की सांसें खाकी वालों के बूट और सूट में कैद कसमसाती हुई, घुटती हुई महसूस होती है। दाऊद खां के बसाए शहर को दाउदनगर ही नाम रहने देने में क्या नुकसान है, किसको नुकसान है भला?
और 'दाऊ-द-नगर' के एकदम मध्य की मात्रा 'द' हटा देने से विकास का कौन सा काम हो जाएगा, जो इस 'द' के कारण नहीं हो पा रहा है। इस द में दम है। इसे दमदार बनाइये तो पूरा दाउदनगर दमदार बन जायेगा, अन्यथा बिन 'द' वाला लूला-लंगड़ा दाऊ नगर में शांति-सौहार्द बनाये रखना मुश्किल होगा।
यह मुद्दा पहले भी उठाया गया था। इसका जिक्र मेरी पुस्तक्- "श्रमण संस्कृति का वाहक-दाउदनगर" में है। जहां मैं खुलकर इस बात की हिमायत करता हूँ कि यह दाऊ नगर नहीं बल्कि दाउदनगर ही है। इसे दाउदनगर ही रहने दीजिये। वैसे मैं किसी को रोकने वाला कौन हूँ? बस लिखने की बीमारी है, इसलिए लिख रहा हूँ। मेरे लिखे को हर कोई नहीं पचा पाता है। यह भी बहुतों को नहीं पचेगा, यह जानता हूँ। हालांकि लिखे का आनन्द तभी है जब वह कुछ को पचे नहीं। अपच हो, ताकि कुछ नया लिखने की ऊर्जा मिलती रहे।
अब दाउदनगर की पत्रकारिता से मतलब नहीं रहा अन्यथा जहां लिखता था, वहां अवश्य इस मुद्दे को उठाता। लिखता, और जमकर लिखता। मेरा अब वहां न लिखना कुछ को अच्छा लगता है, और बहुतों को अखरता है।

जूता खाइए, टिकट पाइए, और फिर इसके बाद....

जूता खाइए, टिकट पाइए, और फिर इसके बाद....
(चुनावी चक्कलस और जन संवाद-3)
*उपेंद्र कश्यप*

बहुत शोर है। हर तरफ चर्चा एक बात की हो रही है कि आखिर नेतृत्व को क्या सूझता है, वह किस कारण से, किस आधार पर किसी को प्रत्याशी बनाता है? कोई तो आधार होगा? जनाधार वाले को ही जन प्रतिनिधि बनाये जाने की वकालत की जाती है। ऐसा नहीं हो तो फिर जनाधार हीन को भी जनाधार वाला नेता माना और बताया जाता है, भले ही वह किसी संयोग, दुर्योग, लहर या कोई बात (मुद्दा नहीं) क्लिक कर जाए और कोई प्रत्याशी जीत जाए। इधर की चुनावी चर्चाओं में एक सुर्खियां खूब प्रभावी बन/दिख रही है। एक प्रत्याशी का चुनाव (कहिए चयन) सुर्खियों में है। सवाल लोग उठा रहे हैं कि जब किसी व्यक्ति पर तीन-तीन स्थानों पर जूता/चप्पल चला हो, शरीर पर हालांकि नहीं, एकाधिक बार गवाह शीर्ष नेतृत्व हो, तो उसे आखिर प्रत्याशी क्यों बनाया गया? क्या जूता देखना भी प्रत्याशी बनाये जाने का आधार हो सकता है? जबकि इसे इसका सबूत माना जाता रहा है कि जनता विरोध में है। विरोध दर्ज कराने के लिए ही जनता हो या कोई, सामने वाले पर जूते/चप्पल उछालता है। फिर जब जूते उछाले जाने को टिकट देने का आधार पार्टियां बनाने लगेंगी तो जनता अपने विरोध के इस तरीके पर भी पश्चाताप करने लगेगी। क्योंकि जूते/चप्पल देखने वाला जब प्रत्याशी बन जायेगा तो यह तो विरोध से अधिक मशहूर बनाने वाली बात हो जाएगी न। चर्चा में यह सवाल सबको परेशान कर रहा है कि आखिर जूते खाने, टिकट लेकर हारने वाले को कोई दल प्रत्याशी क्यों बनाया? जनता में विरोध जारी है। एक जगह तो यह तक कहा गया कि अभी इन्सल्ट करेंगे, फिर बाद में वोट करेंगे। सवाल एक ने उठाया-इस भावना का ख्याल रखने में कहीं माहौल बिगड़ा तो क्या होगा? हार पक्की हो जाएगी, तो जीत के लिए हालात संभालना मुश्किल हो जाएगा। सबसे बड़ी बात लोग खुन्नस निकाल रहे हैं। संभव है अंत में सब एक हो जाएं। वैसे नेता जी पैसे खर्च करने से खुद को बचा रहे हैं। क्या वे यह मान रहे हैं कि जीत की राह मुश्किल से अधिक कठीन है? साथ वाले लोग भी इस राह को मुश्किल करेंगे, यह आशंका बलवती है, तो यह भी सच दिख रहा कि सामने मुकाबले में खड़े प्रत्याशी के साथ रहने वाले भी उसे हराने में विरोधी के साथ खड़े होने का संकेत दे रहे हैं, किन्तु चुपके-चुपके। बहरहाल, जूते उछालने वाला पत्रकार नौकरी से निकाला गया था, जबकि जूते उछालने वाले व्यक्ति (भीड़ का हिस्सा) के खिलाफ कुछ नहीं हुआ, उसकी तो पहचान तक नहीं हुई। अब देखिए चुनाव परिणाम कैसा आता है। साथ वाले लोग तो जीताने और हराने वाले खेमे में बंटे हुए हैं। हालांकि वक्त वक्त की बात है। वक्त पर संभव है सब एक हो जाएं। बताएंगे-जनता के और देश के हित में यही सही है।

Monday, 25 March 2019

करीब 05 वर्ष महंत रहे थे विराट व्यक्तित्व और ज्ञान के धनी अखिलेश्वरानन्द पुरी

देवकुंड विवाद से सम्बद्ध चौथी और अभी तक ह्त्या की आख़िरी घटना थी वह
अब कन्हैयानन्द पुरी के नेतृत्व में शान्ति व विकास का नया अध्याय लिख रहा
० उपेंद्र कश्यप ०
03 मार्च को देवकुंड महंत रहे अखिलेश्वरानंद पुरी की पुण्यतिथि है। उनकी ह्त्या वर्ष 2010 में इसी दिन की गयी थी। वे वर्ष 2005 में देवकुंड मंदिर/ मठ के महंत बन कर आये थे। उनकी ह्त्या के बाद 14 मार्च 2010 को इनके पुत्र कन्हैयानंद पुरी ने महंथी की गद्दी संभाली। अखिलेश्वरानन्द पुरी की देवकुंड विवाद से सम्बद्ध चौथी और अभी तक ह्त्या की आख़िरी घटना थी। इनके पूर्व 1974 से महंत रहे स्वामी केदारनाथ पुरी की ह्त्या 1990 में की गयी थी, यह भूमि विवाद को लेकर नक्सल आन्दोलन और जातीय हिंसा के उभार से बनी परिस्थिति के बीच पहली ह्त्या थी। इसके बाद मैनेजर राम दहीन सिंह की हत्या 1991 में की गयी। वर्ष 1995 में मठ के बराहिल रहे कृष्णा राम की ह्त्या की गई थी। अभी महंत अखिलेश्वरानन्द पुरी की नौवीं पुण्यतिथि मनाई जा रही है। इनके पुत्र महंत कन्हैयानन्द पुरी की एक बात की दाद देनी होगी कि इनकी गद्दी संभालने के बाद के नौ वर्षों में ह्त्या या मारपीट की बड़ी घटना नहीं घटी है। यह इस तथ्य के सन्दर्भ में अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है कि उनकी गद्दी संभालने के साथ उनकी ह्त्या किये जाने की आशंका प्रबल थी। उनके महंत बनने का विरोध भी हो रहा था। लेकिन पिता के उलट पुत्र ने ऐसी रणनीति बनाया कि देवकुंड में शान्ति स्थापित हो गयी। फिलहाल यही स्थिति है कि देवकुंड शान्ति और विकास का नया अध्याय कन्हैयानन्द पुरी के नेतृत्व में लिख रहा है।
पिता के चित्र पर पुष्पांजली करते कन्हैयानन्द पुरी (फोटो-आशुतोष मिश्रा)

अब बात उनकी जिनकी है पुण्यतिथि:-
अखिलेश्वरनन्द पुरी से मेरा कई बार मिलना हुआ, ख़ास कर दाउदनगर के डीएवी पब्लिक स्कूल में और कुमार ब्रदर्स पेट्रोल पंप पर उनके आगमन के समय। विद्यालय के तत्कालीन प्राचार्य श्री डॉ.आरके दूबे उन्हें प्राय: स्वतंत्रता दिवस और गणतन्त्र दिवस पर आमंत्रित करते थे। वे आते और उनके संबोधन सुनने और उनसे बातचीत करने का अवसर मिलता। कुमार ब्रदर्स पेट्रोल पंप पर श्री अंजनी कुमार प्रसाद सिंह और उनके पुत्र बब्लू जी उनको खूब प्यार करते थे। जब भी मिलना होता भारतीय अध्यात्म और संस्कृति पर व्यापक चर्चा होती। उनके संबोधन में जो ओजस्विता दिखती थी, वह काबिल-ए-तारीफ़ थी। अध्यात्म और संस्कृति पर उनका व्यापक ज्ञान था। उनको सुनते वक्त लोग मंत्रमुग्ध हो जाते थे।