Friday, 17 April 2015

राम ने किया था कांवड यात्रा परंपरा का प्रारंभ
महाशिवरात्रि पर विशेष

शिव पार्वती विवाह आयोजन की है परंपरा
उपेन्द्र कश्यप, दाउदनगर (औरंगाबाद) मंगलवार को महाशिवरात्रि है। हर हर महादेव का दिन। भगवान शंकर की अराधना होती है इस दिन। पं.लालमोहन शास्त्री ने बताया कि हिंदू समाज इस दिन गांव शहर के शिव मंदिरों में दर्शन पूजन कर खुद को सौभाग्यशाली मानते हैं। इसी वेला में लंकाधिपति रावन ने तान्दव कर भगवान शंकर को प्रसन्न किया था। इसके बाद मां पार्वती का प्रिय कामना लिंग उसे मिला। इसे ले कर लंका जा रहा था रावण कब लघुशंका लगा। छद्मधारी विष्णु को लिंग दे कर स्वयं शंका करने लगे। यह दीर्घ शंका में बदल गया। लिंग यहीं रखा दिया और उसकी स्थापना भी करनी पडी। लाख प्रयास के बावजूद भी रावण उसे उखाड नहीं सका। रावण ने हरिद्वार से गंगा जल लाकर शिवलिंग पर चढाया। यह स्थान देवघर था। जो अब झारखंड में है। इसके बाद राम ने सुल्तान गंज से गंगा जल लाकर जलाभिषेक किया। इस स्थान का तब नाम जहांगडा था। यही पर्ंपरा बन गई और सुल्तानगंज से कांवड यात्रा का शुभारंभ हुआ जिसे सावन मास में देखा जा सकता है। शिवपुराण के अनुसार महाशिवरात्रि में ही शिव ज्वाला रुप में उत्पन्न हुए। वही द्वादश लिंग के रुप में भारत की चारों दिशाओं में बारह स्थानों पर पूजे जा रहे हैं।मैथिल कोकिल कवि विद्यापति ने इस महत्वपूर्ण अवसर पर शिव पार्वती विवाह महोत्सव को प्रोत्साहित किया था जो अब संपूर्ण बिहार में मनाया जाता है। मगध की परंपरा में श्री पंचमी बसंत पंचमी को भगवान शंकर को तिलक चढाया जाता है। भक्त होली गायन प्रारंभ करते हैं।शिवबारात निकाला जाता है। शिवरात्रि का पारण महिलाएं चुदा दही खा कर करती हैं। 



शिव मंदिरों से होता है गांव का दिशा ज्ञान
अनुमंडल के महत्वपूर्ण शिव मंदिर
श्रीराम ने किया है शिवलिंग की स्थापना
दाउदनगर (औरंगाबाद) प्राय: हर गांव में शिव मंदिर मिल जायेंगे। इससे ग्रामीणों को दिशा का ज्ञान होता है। मंदिर में स्थापित शिवलिंग का जब जलाभिषेक होता है तो वह हमेश औत्तर दिशा की ओर ही बहता है। शिव अर्घ्य की धारा उत्तर की ओर ही बहती है इसीलिए इसे दिशायंत भी कहा जाता है। कीकट प्रदेश में छ: महत्वपूर्न तीर्थ स्थल हैं, जिसमें च्यवनाश्रम (देवकुंड) भी शामिल है। यहां भगवान श्री राम ने शिवलिंग की स्थापना किया था। पं.लालमोहन शास्त्री के अनुसार महाकालेश्वर के उप ज्योतिर्लिंग होने के कारण इसे दुग्धेश्वर महादेव कहा जाता है। उन्होंने ही पुनपुन और मदाड के संगम स्थल भरारी (गोह) में विशाल शिवलिंग की स्थापना किया था जिसे मन्दारेश महादेव कहा जाता है। ओबरा के देवकली में अनेक शिवलिंग हैं। यहां एक ही कतार में कई मंदिर दर्शनीय लगते हैं। शांति महसूस होती है। अदरी और पुनपुन के संगम पर भी शिवमन्दिर है जो जीर्ण शीर्ण है। दाउदनगर के काली स्थान में स्वयंभू बाबा भूतनाथ विराजमान हैं। पुराना शहर में बुढवा महादेव के अतिरिक्त शुक्र बाजार, मौलाबाग, चावल बाजार समेत कई स्थानों पर शिव मन्दिर हैं। गया रोड में सिहाडी के में हेमनाथ मंदिर है। चुनार गढ से इसे बनाअ बनाया लाया गया था। इसके विकास में रानी अहिल्याबाई औ5र स्थानीय कायस्थ जमीनदार परिवार की भुमिका रही है। अहिल्याबाई ने ही देवहरा में पुनपुन तट पर शिव मन्दिर बनाया था। कोइलवां में गांव के चारों तरफ शिवमन्दिर हैं। गोह में च्यवनेश्वर महादेव, बाबा प्रसन्नी नाथ प्रसन्नीनाथ  मन्दिर हैं। गोरकट्टी में महर्षि भृगु ने शिवलिंग की स्थापना किया था। इसे गरीबनाथ के नाम से पूजा जाता है। देवी भागवत के अनुसार 108 सिद्ध पीठों में 20 पीठ मरही धाम है, जिसके भैरव विल्वकेश्वर महादेव भुकुंडा गोह में स्थित हैं। इनकी पूजा करने से मां भगवती विल्वपत्रिका सिंह वाहिनी प्रसन्न होकर भक्तों की मनोकामना पूर्ण करती हैं। इन मन्दिरों के अलावा भी जितने शिव मन्दिर हैं, उनमें आज महाशिवरात्रि का पर्व धुम धाम से मनाया जा रहा है।

-- तस्मयी का खास प्रसाद
 शुक्र बाजार स्थित शिव मन्दिर की अपनी विशेषता है। यहां धीरेन्द्र कुमार रत्नाकर द्वारा इस दिन पूजा अर्चना के बाद श्रद्धालुओं के बीच दूध चावल से बनी स्वादिष्ट तस्मयी प्रसाद के स्वरुप वितरित किया जाता है। हर वर्ष मन्दिर की सफाई कर धुम-धाम से पूजा अर्चना की जाती है। चावल बाजार, पुरान शहर, मौलाबाग समेत तमाम शिव मन्दिरों में आज ‘ओइम नम: शिवाय’ की गूंज वातावरण को भक्तिमय बना रहा है। 
    


प्रेम को समग्रता में देखें, संकीर्णता में नहीं

उपेन्द्र कश्यप दाउदनगर(औरंगाबाद) आज वेलेंटाईन डे है। प्रेम-दिवस। मौका समाज के सबसे अहम भावनाओं की विभिन्न पहलुओं पर विचार करने का। जिस देश में पुरा पौराणिक आख्यान ही प्रेम से पगा हुआ है। चाहे पौराणिक पात्र हों, भगवान मान लिए गए पात्र हों, भक्तिकाल हो या रीति काल। ऐतिहासिक काल में भी स्त्री-प्रेम, देश प्रेम, सम्बन्ध-प्रेम, के किस्से भरे पडे हैं। अब तो जाती-प्रेम हावी हो गया है या दैहिक सम्बन्ध तक सिमट गए प्रेम के प्रतिफल में हथकडियों की कडक आवाज सुनाई पडती है। उस देश में इस मुद्दे पर चर्चा नैतिक नहीं माना जाता है। मगर यह टूट रहा है। भगवान प्रसाद शिवनाथ प्रसाद बीएड कालेज के जिन चार युवक युवतियों से बात की गई उनके विचार में एक समानता है कि प्रेम को प्रेमी युगल तक नहीं समग्रता में देखा जाना चाहिए।
साहित्य से अलग समाज का रवैया-पूजा
बीएड कर रही भखरुआं की पूजा का कहना है कि भारतीय साहित्य और संस्कृति में प्रेम जिस रुप में उपस्थित है उससे अलग है समाज का रवैया। इस नजरिये में बदलाव लाना चाहिए। यह दिवस प्रेम का प्रतीक है। प्रेम सिर्फ युगल के बीच नहीं होता। किसी भी संबंध को जीवंतता प्रेम से ही प्राप्त होती है। इसे अभिव्यक्त गुलाब के फुल देकर या कोई भी गिफ्ट देकर किया जा सकता है।
वासना की दृष्टि से देखना गलत-रंजू देवी

तरारी की रंजू देवी बीपीएससी बीएड कालेज की छात्रा हैं। विवाहित हैं। कहा कि ढाई अक्षर के शब्द प्रेम का अर्थ कितना व्यापक है, इसकी कल्पना नहीं की जा सकती। मगर इसे वासना की दृष्टि से देखा जाता है। यह युवा पीढी के लिए घातक है। शिक्षा का अभाव मुख्य कारण है। नजरिया बदलना होगा। निरंतर आयोजन होना चाहिए जिससे यह धारण टूट सकती है कि यह दिवस सिर्फ कपल के लिए नहीं है। मां, पिता, भाई, बहन, किसी भी रिस्तेदार से, दोस्त से देश से प्रेम सबसे किया जाना चाहिए।
पवित्रता और मौलिकता हो-प्रवीण

महावर के प्रवीण कुमार का कहना है कि प्रेम वासना रहित होना चाहिए। इसमें फुहडता की जगह नहीं। इसमें शुद्धता, पवित्रता, मौलिकता, वैज्ञानिकता होना चाहिए। सकारात्मक आयोजन होने चाहिए। असामाजिक तत्व उसे गंदा न कर सकें, यह आवश्यक है। उद्देश्य सामाजिक सौहार्द होना चाहिए। जिससे प्रेम ऐ उसके साथ वेलेंटाइन डे मनाएं। दूसरे को तंग नहीं करना चाहिए।
प्रेम तो किसी से हो सकता है-विनिता कुमारी
शिक्षक बनने की ओर अग्रसर बीएड की छात्रा कलेर की विनिता कुमारी का मत है कि प्रेम किसी से किया जा सकता अहि। ईश्वर से, समाज से, गरीब से। हर वक्त प्रेम बांटना चाहिए। प्रेम को बान्ध कर नहीं रखा जा सकता।   



 कौन थे संत वेलेंटाइन ?
14 फरवरी 269 ई0 को रोम के तत्कालीन सम्राट क्लाडियस ने अपने क्रुर राजाज्ञा की खिलाफत करने के आरोप में संत वेलेनटाइन को फांसी पर चढा दिया था।अपने इस विश्वास के कारण कि स्त्री संसर्ग करने से व्यक्ति की शारीरिक शक्ति क्षीण होती है,इस सम्राट ने राज्य की सुरक्षा व्यवस्था में तैनात सैनिकों के विवाह को निषिद्ध कर दिया था।इसकी खिलाफत करते हुए पादरी वेलेंटाइन ने सैनिकों का विवाह उअनकी प्रेमिकाओं से कराते थे।बस यही अपराध सज़ा का कारण बना।
---------प्रेम पर चुनिन्दा विचार
*”प्रेम के लिए स्त्री के पास एक ही कारण होता है,पुरुष को बेवकुफ बनाने की चाहत।“* अनेक लडकियां ठगी न जांए,इसलिए प्रेम नहीं करती”।–द सेकेण्ड सेक्स में सिमोन द बोउवा।
*औरत जब प्यार करती है तभी औरत होती है।–नित्से
* औरत के जीवन में पहली बात होती है प्रेम-बाल्जाक
*प्रेम सबसे करो, भरोसा कुछ पर करो और नफरत किसी से न करो -ईसा मसीह
*पुरुषों का प्रेम आंखों से और महिलाओं का प्रेम कानों से शुरू होता है -अज्ञात
*किसी दुश्मन को पूरी तरह बर्बाद करने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि उससे प्रेम करना शुरू कर दो -अब्राहम लिंकन
*प्रेम सीधी-साधी गाय नहीं है, खूंखार शेर है, जो अपने शिकार पर किसी की आंख नहीं पड़ने देता - मुंशी प्रेमचंद
*प्रेम से भरा हृदय अपने प्रेम पात्र की भूल पर दया करता है और खुद घायल हो जाने पर भी उससे प्यार करता है -महात्मा गांधी
प्यार की छुअन से हर कोई कवि बन जाता है -प्लेटो

अंधा बनाता है काम: प्रो. कामेश्वर
 प्रेम पर चर्चा बिना काम के पूर्ण नहीं होता। इस विषय का यह एक महत्वपूर्ण आयाम है। जब प्रेम में काम की भावना उद्वेलित करती है तब समस्या उत्पन्न होती है। दाउदनगर महाविद्यालय में मनोविज्ञान के प्रो.डा. कामेश्वर शर्मा फ्रायड को उद्धृत करते हैं। जब हम कामकी नशा में आते हैं, तब हमें इसकी पूर्ति के सिवा कुछ दिखाई नहीं पड़ता। सेक्स, भूख और प्यास मौलिक जैविक (बायोलोजिकल) प्रेरणा हैं। इसमें सर्वाधिक बलवती सेक्स की प्रेरणा है। जब यह जागृत होता है तब इसकी पूर्ति या संतुष्टि के लिए व्यक्ति किसी भी प्रकार का मान्य रास्ता छोड़कर, उम्र, धर्म, जाति, सौंदर्य को भूलकर जघन्य से जघन्यतम कर्म करने को आतुर हो जाता है। मनोविज्ञान इसके लिए वजह मानता है। एकाकीपन को, समाज से हट कर सोचने को, सेक्स के समुद्र (नेट, दृष्ट, चित्र) में डुबकी लगाने को। मनोविज्ञान में इन विषयों पर लंबी व्याख्या हो सकती है।



..जब गान्धी की हत्या की सुचना के लिए जगे रात भर
फोटो-12दडीएन आर02 रेडियो सुनते अयुब अंसारी
विश्व रेडियो दिवस पर विशेष रिपोर्ट
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66 साल से रेडियो सुन रहे अयुब अंसारी
10 साल पूर्व तक समाचार के लिए सिर्फ रेडियो
कई कार्यक्रम हैं अब भी लोकप्रिय
उपेन्द्र कश्यप, दाउदनगर(औरंगाबाद) आज समाचार के कई माध्यम हैं। अखबार, रेडियो, टीवी, इंटरनेट। लेकिन पिछले दशक तक रेडियो ही गांव से शहर तक इसका माध्यम हुआ करता था। आज रेडियो शहर में भले ही कम दिखता हो लेकिन ग्रामीण क्षेत्र में इसकी आवाज ही सुचना से लेकर मनोरंजन तक का माध्यम है। खेल,कृषि,राजनीति,अपराध,मौसम,शिक्षा के सम्बन्ध में तमाम जानकारी रेडियो से ही मिलती थी। एक बार फिर ‘मन की बात’ के जरिये प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश में रेडियों का बाजार और महत्व दोनों बढा दिया है। 80 वर्षीय अयुब अंसारी को वह दिन याद है जब महात्मा गान्धी की हत्या की सुचना रेडियो पर मिली थी।लोग दिन भर रेडियो पर चिपके रहे।हत्यारे के बारे में जानकारी के लिए लोग रात भर जगे रहे।ऐसे ही कई अवसर पिछले 66 साल में आए।इन्होंने बताया कि तब इस शहर में काफी कम रेडियो थे। खास मुहल्ले में इनके अलावा डा0काशीनाथ पुष्टी के पास ही रेडियो था।लोग प्रादेशिक समाचार सुनने के लिए सुबह –शाम जुटते थे।लोगों में हर बडी घटना और राजनीतिक फैसले की सुचना के बाद विस्तार से जानने  की उत्सुकता रहती थी,इकट्ठा होते थे।प्रादेशिक समाचार ,चौपाल,बीबीसी,क्रिकेट कमेंट्री सुनने को लोग जुटते थे।इन्होंने बताया कि प्रथम लोकसभा चुनाव(1952) के वक्त अखबार शहर में बिकना शुरु हुआ था,लेकिन तब भी रेडियो से अधिक वह लोकप्रिय नहीं हो सका था।दो दशक पूर्व टीवी भी घर-घर पहुंचा तो चित्र-आवाज़ एक साथ होने के कारण आकर्षक लगा।इसके ग्लैमर के कारण रेडियो की लोकप्रियता घटी,लेकिन अब भी कई कार्यक्रमों के लिए रेडियो ही बेहतर है।रेडियो की सबसे बडी खासियत है कि इसका आनन्द लेते हुए भी हर कार्य  सहजता से किया जा सकता है क्यों कि आंखें काम पर लगाना आसान होती है ,जबकि टीवी के साथ यह सहजता सम्भव नहीं।रेडियो ने क्रिकेट,फुटबाल,,राजनीति को घर-घर पहुंचाया है।
रेडियो से जुडी जानकारी
कब से रेडियो दिवस
सन्युक्त राष्ट्र संघ (यूनेस्को) ने सन् 2011 में ही विश्व-स्तर पर रेडियो दिवस मनाने का निर्णय लिया। 13 फ़रवरी का दिन 'विश्व रेडियो दिवस' के रूप में इसलिए चुना गया क्योंकि 13 फ़रवरी सन् 1946 से ही रेडियो यू०एन०ओ० यानी संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा अपने रेडियो प्रसारण की शुरुआत की गई थी। रेडियो दुनिया का सबसे सुलभ मीडिया है। दुनिया के किसी भी कोने में बैठकर रेडियो सुना जा सकता है। अनपढ़ लोग भी, वे लोग भी, जो पढ़ना-लिखना नहीं जानते रेडियो सुनकर सारी जानकारियाँ पा जाते हैं। आपातकालीन परिस्थितियों में रेडियो सम्पर्क-साधन की भूमिका भी निभाता है और लोगों को सावधान और सतर्क करता है। कोई भी प्राकृतिक दुर्घटना होने पर बचाव-कार्यों के दौरान भी रेडियो बड़ी महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। यूनेस्को ने रेडियो के उस महत्त्व को रेखांकित करने के लिए 'विश्व रेडियो दिवस' मनाना शुरु किया है, जो पिछले सौ सालों से वह मानवजाति के हित में करता रहा है।
यूनेस्को के संचार और सूचना विभाग की प्रमुख मीर्ता लॉरेन्सो के अनुसार दुनिया के 95 प्रतिशत निवासी आज भी रेडियो सुनते हैं।
रेडियो कब से ?
24 दिसंबर 1906 की शाम कनाडाई रोगिनाल्द फेसेंडेन ने जब अपना वॉयलिन बजाया और अटलांटिक महासागर में तैर रहे तमाम जहाजों के रेडियो ऑपरेटरों ने उस संगीत को अपने रेडियो सेट पर सुना, वह दुनिया में रेडियो प्रसारण की शुरुआत थी।
सबसे पहले जगदीश चन्द्र बसु ने भारत में तथा गुल्येल्मो मार्कोनी ने सन 1900 में इंग्लैंड से अमेरिका बेतार संदेश भेजकर व्यक्तिगत रेडियों रेडियो संदेश भेजने की शुरुआत कर दी थी।


दाउदनगर के निर्माण थी रामनरेश सिंह की भुमिका

फोटो रामनरेश सिंह की
रामनरेश की जयंती पर विशेष
कई बार गए ज़ेल,लगा था आर्थिक दण्ड भी

दाउदनगर अनुमण्डल के गोह प्रखण्ड में बुधई ग्राम में 11 फरवरी, 1912 को जन्मे राम नरेश सिंह ने न सिर्फ आजादी की लड़ाई में अपने आंचलिक क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया बल्कि आजादी के बाद भी अपनी कर्मभूमि दाउदनगर के नवनिर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1952 के पहले आम चुनाव में ये सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर दाउदनगर विधानसभा क्षेत्र से चुन लिए गए। इन्हीं के प्रयास से दाउदनगर-गया और दाउदनगर-पटना सड़क के पक्कीकरण का काम 1957 में शुरू हो सका। दाउदनगर राश्ट्रीय उच्च विद्यालय तथा राश्ट्रीय मध्य विद्यालयकी स्थापना कराकर इन्होंने क्षेत्र में शिक्षा के विकास पर पूरा ध्यान दिया।  1967 में पुनः दाउदनगर से ही प्रजा सोषलिस्ट पार्टी के टिकट पर विधायक निर्वाचित हुए,और महामाया बाबू के मुख्यमंत्रित्व काल में स्वास्थ्य राज्यमंत्री बने। दाउदनगर मेन रोड स्थित नगरपालिका मार्केट में वे रहा करते थे और यहीं इनका कार्यालय भी रहा। 23 फरवरी 1978 को लम्बी बीमारी के कारण इस महान क्षत्रप का निधन पी. एम.सी.एच. में हो गया। स्वतंत्रता संग्राम में तथा दाउदनगर के नव-निर्माण में इनका योगदान अविस्मरणीय है।प्राथमिक शिक्षा गोह और माध्यमिक शिक्षा राजकीय हाई स्कूल, टेकारी से प्राप्त किया। उतकर्ष-2011 के अनुसार 1930 में नमक आंदोलन में इन्हें गिरफ्तार करके 4 महीने की सजा दी गई। यह उनके स्वतंत्रता-संघर्ष में जेल जाने की शुरूआत थी। गोलमेज सम्मेलन की असफलता के बाद तत्कालीन गवर्नर विलिंगटन ने गाँधी-इरविन समझौते को तोड़ना शुरू किया और विरोध करने पर क्रुरता-पूर्वक दमन करना शुरू कर दिया। इस दमन के विरोध में राम नरेश बाबू भी गिरफ्तार हुए और 1934 में फुलवारी शरीफ जेल में रखे गए।बाबू बद्री सिंह को सहयोग करते हुए इन्होंने दाउदनगर में नहर किनारे स्थित चैरम ग्राम में एक आश्रम की स्थापना 1936 में की।1942 में इनके क्रांतिकारी भाषण से प्रभावित उग्र भीड़ गोरी सरकार के खिलाफ नारे लगाती हुई स्थानीय गर्ल्स स्कूल के निकट आबकारी गोदाम पर हमला कर दिया और इसी के पीछे अवस्थित शिफ्टन उच्च विद्यालय (अब अषोक उच्च विद्यालय) में तोड़-फोड़ की। ओबरा पोस्ट आफिस जला दिया गया, हिंसक घटनाओं को देखते हुए ब्रिटिश सरकार ने इस क्षेत्र के इस अगुआ पर 5000 रू0 का इनाम रख दिया। वे गिरफ्तार कर लिए गए लेकिन जल्द ही अंग्रेज पदाधिकारी मिस्टर आईक की गलती का फायदा उठाते हुए जेल से भाग निकले और आंदोलनकारियों को गुप्त रूप से नेतृत्व प्रदान करते रहे। 1943 में इन्हे आल इण्डिया डिफेन्स एक्ट नजरबंदी कानून के तहत गिरफ्तार कर लिया गया और गया के सेंट्रल जेल में 14 नं0 सेल में रखे गए। जेल में रहते हुए इन्होनें कई महापुरूषों की जीवनियां पढ़ीं और अपनी अधूरी पड़ी शिक्षा को पूरा किया। जेल से भागने के जुर्म में तथा गुप्त रूप से नेतृत्व प्रदान करने के कारण इस बार इनपर कई मुकदमे लाद दिए गए थे। फल यह हुआ कि आजादी के बाद ही ये जेल से रिहा हो सके। 
गुलामसेठ चौक का वजूद हुआ खत्म
अब बन गया इन्दिरा गांधी चौक
निखिल कुमार का युवा मंच ने किया सम्मान
अनावरण के लिए  खबर ने बनाया दबाव

दाउदनगर (औरंगाबाद) पुराना शहर से गुलाम सेठ चौक का वजूद सोमवार को खत्म हो गया। कांग्रेस ने यहां तीन साल पूर्व इंदिरा गांधी की प्रतिमा लगाया था। उसका अनावरण पूर्व राज्यपाल निखिल कुमार ने किया। पार्टी द्वारा इस आयोजन को लेकर जारी पोस्टर में इस स्थान का नाम “इंदिरा गांधी चौक” बताया गया है। बडी सहजता से एक नाम बदल गया। पता बदल गया और शहर के एक प्रतिष्ठित व्यक्ति का नाम जो स्थल के रुप में जिंदा था उसका वजूद खत्म कर दिया गया। इस अनावरण के लिए दैनिक जागरण में छपी खबर-बोरे से बंधी इंदिरा का घुट रहा दम-ने कांग्रेस को दबाव में ला दिया था। इसी कारण शीघ्रता की गई, और तीन साल से लंबित मामला एक महीने में निपटा दिया गया। पार्टी के पूर्व प्रखंड एवं स्मारक समिति के अध्यक्ष डा.संजय कुमार सिंह ने इसे स्वीकार किया। दरअसल मंच से वरिष्ठ नेता अरविंद शर्मा ने भी कहा कि खबर ने दबाब बनाया था। श्री सिंह ने बताया कि खबर छपते ही शाम में बैठक की गई। चर्चा हुई और बात आगे बढा दी गई। खबर की चर्चा पटना तक हुई और फिर तैयारी शुरु कर दी गई। केरल के पूर्व राज्यपाल निखिल कुमार का स्वामी विवेकानंद राष्ट्रीय युवा मंच ने सोमवार को स्वागत किया। संस्था के राष्ट्रीय संयोजक अनुज पांडेय ने उन्हें स्वामी विवेकानंद की तस्वीर भेंट किया। प्रभात छोटु, विकास मिश्रा शामिल रहे। वरिष्ठ नेता अरविंद शर्मा ने कहा कि कांग्रेस ने शहादतें दी हैं। गरिमापूर्न परंपरा रही है। अध्यक्षता व संचालन पूर्व प्रखंड कांग्रेस अध्यक्ष डा. संजय कुमार सिंह ने किया तथा समारोह को जिला कांग्रेस अध्यक्ष अरविन्द सिंह, रामविलास सिंह, राशिद अली खान, राघवेन्द्र प्रताप सिंह, महेन्द्र यादव, गणेश कुशवाहा, इरफानुल हक, राजेश्वर सिंह, आर.पी.सिंह ने भी सम्बोधित किया। इस अवसर पर जिला सरपंच संघ के संरक्षक रविन्द्र सिंह, हाफिज खुर्शीद, श्रीनिवास कुमार, विश्वनाथ मिश्र, मो.औशाफ, शाहिद हुसैन समेत अन्य लोग मौजूद थे। 
सोच यह कि देश मेरा है और सरकार मेरे लिए
स्वत: कटता है टैक्स, वह भी 40 फिसदी
पश्चिम का मुकाबला बहुत मुश्किल
80 साल हैं हम पीछे, गति कमजोर
पश्चिम ताक रहा भारत के अध्यात्म की ओर
उपेन्द्र कश्यप, दाउदनगर (औरंगाबाद) आज प्रवासी भारतीय दिवस है। दो युवाओं से जागरण ने यह जानना चाहा कि भारत क्यों विकासशील से विकसित देश नहीं बन पा रहा है? इसकी वजह क्या है?
आस्ट्रियन इंस्टीच्युट  आफ टेक्नोलौजी और नानयांग टेक्निकल यूनिवरसिटी सिंगापुर से संयुक्त रुप से वियना में रह कर पीएचडी कर रहे नित्यानंद शर्मा ने कहा कि पश्चिमी देश आगे हैं क्योंकि उनमें काम की प्रबल भावना है। सरकार की विकास परक नीतियां हैं। शिक्षा के माध्यम से यह भाव पैदा किया जाता है कि हमें देश के लिए परिश्रम करना चाहिए। प्रशासनिक ढांचे को जनता की सेवा के लिए है। लोग समझते हैं की देश मेरा है और सरकार मेरे लिए है। सरकारी संसाधनों का दुरुपयोग नहीं करते। शमशेरनगर के अनिल कुमार के पुत्र और विवेकानंद मिशन स्कूल के छात्र रहे नित्यानन्द ने कहा कि भारत भी विकास के मार्ग पर चला है परन्तु अभी काफी दूर जाना होगा। भारतीय दूसरे देशों में जाकर अपनी बुद्धिमत्ता का डंका बजाए हुए हैं। मंगलयान का सफल प्रक्षेपण भारतीय बुद्धि और तकनीक का ज्वलंत उदाहरण है। अंधाधुंध बाजारीकरण के दुष्प्रभाव से पश्चिमी देशों में सामाजिक ह्रास हुआ है। पुरा पश्चिम आज भारत की आध्यात्मिक संस्कृति को जानना चाहता है। हमें आज जरूरत है की अपने आध्यात्मिक धरोहर के साथ औद्योगिक विकास करने का। लंदन से इंटरनेशनल बिजनेश मैनेजमेंट करने के बाद पारिवारिक कारण से यहां प्रसाद मेडिकल स्टोर चला रहे अशोक कुमार के बेटे एवं विवेकानंद मिशन स्कूल के छात्र रहे हेमंत कुमार ने कहा कि पश्चिम बीस साल बाद की सोच कर योजना बनाता है ताकि कोई घटना न घटे, सडकों पर जाम नहीं लगता। वहीं भारत घटना के बाद सोचता है। कहा कि हर महीने अंतिम तारीख को व्यक्ति के खाते से टैक्स का पैसा कट जाता है। वह भी न्यूनतम 22 और अधिकतम 40 प्रतिशत की दर से। कहा कि अधिकतम ढाई मिनट के काल पर पुलिस आपके दरवाजे पर पहुंच जाती है। जबकि कहीं आपको खडी नही6 दिखेगी। बताया कि सोच का फर्क है। आप एक तरफ इस्तेमाल किया हुआ कागज पर कोई भी आवेदन दे सकते हैं। भारत में अधिकारी इसे स्वीकर नहीं करते और समाज हीन भावना से देखता है। जब कि ऐसा ही कर लाखों वृक्ष बचा लेते हैं और पर्यावरण भी। कचडा कहीं नहीं दिखता। कोई कायदा कानून नहीं तोडता। दसवीं के बाद अगर कोई पढना नहीं चहता तो उसे नौकरी करनी होगी। क्यों कि पिता माता को पैसे देने होते हैं। इसलिए नहीं कि उनका खर्च चलाना है इसलिए कि इससे लडका कमाएगा तो व्यस्त रहेगा। सकारात्मक सोचेगा। बताया कि वहीं का संस्कार है कि प्लास्टिक इसतेमल नहीं करता। कागज को दोनों तरफ इस्तेमाल करता हूं।

अब सवाल है कि क्या हम ऐसा करते हैं? नहीं तो फिर पश्चिम से तुलना क्यों करते हैं? हेमंत ने कहा हम 80 साल पीछे हैं और जब जितना आगे बढेंगे वह भी अपनी रफ्तार से आगे बढेगा। बहुत फासला है। लेकिन उस स्तर तक पहुंचने के लिए हमें दृढ निश्चयी होना होगा। जाति और धर्म से उपर उठकर योजनाएं और नीतियां बनानी होगी। वोत बैंक और सांप्रदायिकता-धर्मनिरपेक्षता से उपर उठकर।  
मानसिक स्थिति बदलेगी तभी होगा बड़ा बदलाव
चीन के मुकाबले कभी खडा नहीं हो सकते
नयी सोच के लिए भारत में दरवाजे हैं बंद
लकीर का फकीर बने रहते हैं एशियायी
वहां सेवा फर्ज है तो यहां अहसान
उपेन्द्र कश्यप,  दाउदनगर (औरंगाबाद) : आज प्रवासी भारतीय दिवस है। हम विदेशों के बारे में काफी कुछ सुनते, देखते और जानते हैं। अपने देश के बारे में भी। ज्ञान की इस प्राप्ति के क्रम में कभी आत्महीनता का बोध होता है, तो कभी खुद पर खीझ आती है। खुद से सवाल पूछना पड़ता है कि हम मानव विकास सूचकांक के किस पायदान पर खड़े हैं? कई सवाल आपके जेहन में उठते होंगे। कई पहलुओं पर हमने दो प्रवासी भारतीयों से बात की तो बहुत कुछ फर्क समझ में आया। हमारी और उनकी मिट्टी में ही भिन्नता है।
प्रवासी भारतीय अमरेश मोहन का मानना है कि भारत में नई सोच के आगमन के लिए दरवाजे लगभग बंद रहते हैं। खुलते भी हैं तो देर से, बडी मुश्किल से। सेवा निवृत प्रो.बीके गुप्ता और शिक्षिका निर्मला गुप्ता के पुत्र सिंगापुर में पेपाल के रिस्क मैनेजमेंट एशिया पेसेफिक के निदेशक हैं। यह कंपनी 120 देशों में नेट पर खरीद बिक्री करने वालों के बीच विश्वास कायम करता है। सुरक्षा और सहुलियत के लिए जाना जाता है। विश्व में ऐसा काम करने वाली मात्र दो कंपनी है। इन्होंने विद्या निकेतन से प्राथमिक शिक्षा ग्रहण किया है। बताया कि भारत में समस्या यह है कि नयी सोच के लिए दरवाजे बंद है। आरबीआई का हवाला दिया कि जब भारत में इस तरह के व्यवसाय हेतू बात के लिए गया तो अधिकारी ने कहा मुझे पता है क्या करना है, मेरे कनिष्ठ से बात करिए। जबकि तमाम देशों के अधिकारी पेपाल में सीखने आते हैं। कहा कि हम चीन के मुकाबले कभी खडा नहीं हो सकते। यह संभव नहीं है। काफी फासला है। सिंगापुर हमसे बहुत बाद आजाद हुआ लेकिन आज अपने परिश्रम और अनुशासन के कारण हमसे आगे है। भारत की शिक्षा व्यवस्था में खामिया है। जब विदेशों में शिक्षक को स्टुडेंट अच्छे नहीं बताते तो उन्हें पढाने के कार्य से अलग कर दिया जाता है। पश्चिमी देशों में यह महत्वपूर्ण है कि क्या नया किया जा रहा है। नयी सोच को बढाया जाता है, जबकि एशिया में लकीर का फकीर बने रहने को महत्वपूर्ण माना जाता है। 

स्वीटजरलैंड के ज्यूरिक शहर में विप्रो के सेंट्रल यूरोप मानव संसाधन विभाग के प्रमुख कीर्ति आजाद ने ने फोन पर बताया कि हम कानून, नियम, तरीके तोड़ने में गर्व महसूस करते हैं। बड़ा बदलाव तभी आएगा जब मानसिक स्थिति बदलेगी। सरकार सब कुछ नहीं सुधार सकती। कहा कि यहां विरोधाभासी विकास है, समुचित नहीं। यूरोपीय कंट्री में एक सिस्टम है जो काम करता है। भारत में ऐसा नहीं है। डिलवरी सिस्टम सही ढंग से कार्य नहीं करता। हर जगह भीड़ है, समय की बाध्यता नहीं है। वरिष्ठ चिकित्सक डा. बीके प्रसाद के छोटे पुत्र और विद्या निकेतन के छात्र रहे कीर्ति बताते हैं कि पोलैंड जैसे गरीब और छोटे देश में भी भारत से बेहतर सिस्टम है। ट्रेन-बसें समय से चलती है। वहीं भारत विश्व की चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश है, अंतरिक्ष विज्ञान समेत कई क्षेत्र में तरक्की हुई है लेकिन एक इंडिया है तो दूसरा भारत। जहां न पर्याप्त स्कूल है, न भोजन भर आय का साधन। यहां विरोधाभास है। वहां सेवा बेहतर है क्योंकि इसे फर्ज समझा जाता है और भारत में एहसान का अहसास कराया जाता है।