Sunday, 30 April 2023

एक पखवाड़े में तीन युवकों की हत्या से सनसनी

 


पुलिस के हाथ सिर्फ एक गिरफ्तारी 

नन्हकू पांडेय को पुलिस ने भेजा जेल

राजेंद्र साव हत्याकांड में तीन ने किया था आत्मसमर्पण 

पूर्व विधायक हत्याकांड में कोई गिरफ्तारी नहीं 

संवाद सहयोगी, दाउदनगर (औरंगाबाद) : बीते एक पखवाड़े में तीन व्यक्तियों की हत्या हो चुकी है। पुलिस के पास इन हत्याकांड को लेकर कहने को बहुत कुछ नहीं है। सिर्फ एक मामले में गिरफ्तारी हुई है। एक मामले में उपलब्धि शून्य है तो एक मामले में तीन ने आत्मसमर्पण किया है। 15 अप्रैल को दाउदनगर के पटवाटोली बम रोड में राजेंद्र साव की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई थी। इस मामले में उनकी पत्नी द्वारा कराई गई प्राथमिकी में नौ व्यक्तियों को नामजद आरोपी बनाया गया। लेकिन बीते 15 दिन में कोई गिरफ्तारी नहीं हुई है। इस मामले में पुलिस दबिश के कारण तीन आरोपितों ने व्यवहार न्यायालय में आत्मसमर्पण कर दिया है। मुख्य आरोपित राजेंद्र प्रसाद तांती, उनके भाई बसंत कुमार और बसंत कुमार के पुत्र नितेश कुमार ने 17 अप्रैल को अनुमंडल व्यवहार न्यायालय दाउदनगर में आत्मसमर्पण कर दिया है। इसे पुलिस दबिश का नतीजा बताया गया। इसके अलावा पुलिस के हाथ कोई उपलब्धि नहीं लगी है। न कोई गिरफ्तारी हुई है न कोई कुर्की जब्ती की कोई कार्रवाई।


इसी दिन हिच्छन बिगहा में अरवल के पूर्व विधायक राजद नेता रविंद्र सिंह के पुत्र कुमार गौरव उर्फ दिवाकर की हत्या गोली मारकर कर दी गई थी। मां उषा शरण में अपने पति पूर्व विधायक रविंद्र सिंह पर ही बेटे की हत्या करवाने का आरोप लगाया था प्राथमिकी आवेदन में उन्होंने कहा है कि पूर्व विधायक रविंद्र सिंह ने सुनियोजित तरीके से योजना बनाकर अपने गुर्गों से हत्या करवाया है। पूर्व विधायक के अलावा विनय कुमार सिंह, सुधांशु, रोशन उर्फ बमड, रवि और सत्येंद्र महतो को नामजद आरोपित बनाया गया है। सभी आरोपित हिच्छन बिगहा के निवासी बताए जाते हैं। इस मामले में भी पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की है। एसडीपीओ कुमार ऋषि राज कहते रहे हैं कि विभिन्न प्रकार की जांच हो रही है। जांच रिपोर्ट के बाद कार्रवाई हो सकेगी। एक पखवाड़े में भी स्थिति नहीं बदली है।

 शुक्रवार को शमशेर नगर में मनोरंजन शर्मा की गोली मारकर हत्या कर दी गई है। इस मामले में हालांकि त्वरित कार्रवाई करते हुए पुलिस ने पटना स्थित एम्स से मुख्य आरोपी जदयू के प्रदेश सचिव नन्हकू पांडे को गिरफ्तार करने में कामयाब रही। शनिवार को उनको जेल भेज दिया गया। भारी मात्रा में गोली और दो राइफल बरामद किए गए हैं। लेकिन इस मामले के भी अन्य नामजद आरोपित की गिरफ्तारी दूसरे दिन तक भी करने में पुलिस सफल नहीं रही है। एसडीपीओ कुमार ऋषि राज ने बताया कि शनिवार को भी वे इसी मामले में पटना में कार्रवाई कर रहे हैं।



चार दिन पूर्व घरों की ली गयी थी तलाशी 

हिच्छन बिगहा हत्याकांड में कोई गिरफ्तारी न होने के सवाल पर थाना अध्यक्ष अंजनी कुमार ने बताया कि 25 अप्रैल को कुमार गौरव हत्याकांड के सभी आरोपितों के घर छापेमारी की गई थी। इनके सगे संबंधियों के घर भी तलाशी की गई। छापामारी उन्हीं के नेतृत्व में की गई थी। हालांकि इस मामले में कोई उपलब्धि पुलिस हासिल नहीं कर सकी। राजेंद्र साव हत्याकांड के मामले में उन्होंने कहा कि तीन ने आत्मसमर्पण किया है। अन्य फरार हैं। पुलिस लगातार छापेमारी कर रही है।




पिता द्वारा हत्या कराने की आशंका व्यक्त कर चुके थे कुमार गौरव 



सात माह पूर्व दिया वीडियो बयान हो रहा वायरल

रोते हुए कह रहे-तीनों को हो सजा, मां को मिले इंसाफ

फोटो- कुमार गौरव उर्फ दिवाकर 

संवाद सहयोगी, दाउदनगर (औरंगाबाद) : हिच्छन बिगहा में 15 अप्रैल को हुई कुमार गौरव इर्फ़ दिवाकर की हत्या हुई थी। अब उनका एक वीडियो सोशल मीडिया में खूब वायरल हो रहा है। गत 10 अगस्त 2021 का यह वीडियो है। ऐसा वीडियो में वह खुद बोल रहे हैं। इस वीडियो में उन्होंने कहा है कि उनके पिता कभी भी उनकी हत्या करवा सकते हैं या गायब करवा सकते हैं। वे वीडियो में बोल रहे हैं कि पिता ने घर से बाहर निकालने एवं जान से मारने की धमकी दी थी। पिता पूर्व विधायक रविंद्र सिंह मार सकते हैं या गायब करवा सकते हैं। वे कुछ भी करा सकते हैं यह मैं जानता हूं। दिवाकर ने कहा कि इसमें पिता की एक बहन का बेटा और उनके भगिना का बेटा मिलकर कुछ भी कर सकते हैं। कल अगर वे मार दें तो मेरी मौत का सबूत किसी के पास रहे इसलिए यह वीडियो बनाकर भेजा हूं ताकि मां को पता रहे कि उसके बेटे का हत्यारा कौन है। वीडियो में वे बोल रहे हैं कि यदि उनकी हत्या कर दी जाती है तो तीनों को सजा हो और मां को इंसाफ मिलना चाहिए। 




भूमि से जुड़े मामूली विवाद में गई जान 

फोटो-घटना स्थल स्थित भूमि जिसे लेकर है विवाद



नन्हकू पांडे बोले-सादे कागज पर पुलिस ने करा लिया है हस्ताक्षर

संवाद सहयोगी, दाउदनगर (औरंगाबाद) : शमशेर नगर में जमीन से संबंधित जुड़े मामूली विवाद में मनोरंजन शर्मा की हत्या हुई है और उनके पिता घायल होकर इलाज करवा रहे हैं। इस मामले में जिस भूमि से विवाद जुड़ा है वह घायल उपेंद्र शर्मा के पूर्वजों की है। उनके पिता तीन भाई थे। बैजनाथ शर्मा, राजनाथ सिंह और नथुनी सिंह। यह प्लाट 18 कट्ठा का है। तीनों का छह छह कट्ठा का हिस्सा इसमें था। इस जमीन के सामने लगभग दो कट्ठे में गैरमजरूआ सार्वजनिक जमीन है जिसमें पोखरा खुदा हुआ है और इसका तीनों ही पाटीदार इस्तेमाल करते हैं। उपेंद्र शर्मा के चाचा राजनाथ सिंह के पुत्र चंद्रेश शर्मा के पुत्र विक्की शर्मा से दो कट्ठा जमीन हरे कृष्ण शर्मा ने लगभग पांच माह पूर्व खरीदा था। इस जमीन के सामने जो गैरमजरूआ जमीन है जिसे चाट कहा जाता है, उसमें हरे कृष्ण मिट्टी भरकर अपना रास्ता बना रहे थे। जिसका दूसरा पक्ष विरोध कर रहा था और इसी विवाद को लेकर मारपीट हुई और फिर गोली चली। नन्हकू पांडे के पक्षकारों का कहना है कि जमीन के सामने रास्ता के लिए मिट्टी भरने का कार्य कर रहे थे ताकि निर्माण का कार्य हो सके ना कि पूरा पोखरा भर रहे थे या उस पर दावा कर रहे थे। नन्हकू पांडे के पक्षकारों का कहना है कि इस मारपीट में नन्हकू पांडे, कृष्णा पांडे और हरेकृष्ण पांडे घायल हुए हैं। नन्हकू पांडे को इलाज के दौरान एम्स से गिरफ्तार किया गया है और शनिवार को उनको दाउदनगर उपकारा भेज दिया गया। नन्हकू पांडे ने बताया कि सादे कागज पर पुलिस ने उनका जबरदस्ती हस्ताक्षर कराया है। इस मामले में एसडीपीओ कुमार ऋषि राज ने कहा कि यह आरोप निराधार है। किसी भी सादे कागज पर उनका हस्ताक्षर नहीं कराया गया है।



Thursday, 27 April 2023

सोन का शोक 8 : 1400 वर्षों में 25 किलोमीटर तक पश्चिम खिसका सोन

 




मुख्य धारा का सिमटता जा रहा पाट

1766 में दाउदनगर से बारूण तक 30 किलोमीटर तक था घना जंगल

 18 वीं सदी में दाऊद नगर से बारुण तक था घना जंगल 

250 वर्ष लगभग में 90 वर्ग किलोमीटर का जंगल हो गया खत्म

फ्रांसीसी अभियंता लुई फेलिक्स व बेल्गर ने की थी यात्रा

उपेंद्र कश्यप, दाउदनगर (औरंगाबाद) :

करीब 1400 बरस में सोन 10 से 25 किलोमीटर पश्चिम खिसक गया। लेकिन बीते तीन से चार दशक में ही करीब दो से तीन किलोमीटर पश्चिम खिसक गयी सोन की धारा। खिसकने के क्रम में सोन जो जमीन छोड़ रहा है उस पर भले खेती हो रही है, लेकिन आने वाले समय में यह नाला से अधिक नहीं रह पाएगा। जबकि कभी विकराल रूप सोन का हुआ करता था। उसका बाढ़ हुल्लड़ कहलाता था और दाउदनगर में महादेव स्थान के बाद डिल्ला शुरू होता था और उसके बाद जलधारा। जहां आज धोबी घाट बन गया है और पानी घुटने भर भी नहीं रहता। अब सोन में स्नान करना हो या सूर्य को अर्घ्य देना हो दो से तीन किलोमीटर अधिक पश्चिम की दिशा में यात्रा करनी पड़ती है। 

दाउदनगर और उसके दक्षिण बारुण तक का इलाका घने जंगल से भरा हुआ था। 1766 में फ्रांसीसी अभियंता लुई फेलिक्स द ग्लास ने लिखा है कि “इस इलाके में सर्वेक्षण करना नितांत असंभव है। अभेद्य वनाच्छादित प्रदेश है। न सडक है न पगडंडी ही”। यानी इस इलाका में तब घनघोर जंगल हुआ करता था। बारूण से दाउदनगर करीब तीस किलोमीटर है, और पूर्व से पश्चिम सोन का इलाका में तीन किलोमीटर मान लें तो करीब 90 वर्ग किलोमीटर में फैला घनघोर जंगल था। तब दाउदनगर का वजूद नहीं था। यह सब जंगल कट गए। खत्म हो गए सब पेड़। आज या तो खेती होती है या आबादी बस गयी है। विशेषज्ञ कहते हैं कि पुनपुन नदी जो वर्तमान में फतुहा में गंगा में मिलती है वह नौबतपुर (पटना के दक्षिण-पश्चिम में) के आगे फतुहा में गंगा में मिलने तक बाल्मिकी कृत रामायणकालीन सोन के पाट का अनुसरण करती है। फल्गु जब गंगा के समानांतर बहना शुरु करती है तो धोवा नाम धारण करती है। सोन की धोवन होने की वजह से ही। सोन जो आज कोइलवर में गंगा में मिलता है उसका प्राचीन प्रवाह और पूरब दिशा से होता था और वर्तमान पटना शहर के बीच से होते हुए गंगा में मिलता था। पूरब में सोनउरा-सोनपुर-मोरहर-दरघा-धोवा-हरोहर से आगे पूरब को सोन कभी नहीं गया। इसी तरह वह पश्चिम में अपने वर्तमान पाट से कुछ पश्चिम तक जा कर रुक गया। 


'बह' और 'तरार' सोन के बहाव के प्रमाण


बाणभटट की कादम्बरी की रचना सोन नद के किनारे स्थित प्रीतिकूट में की गयी थी। इसे स्वयं बाण ने अपना गृह बताया है। यह प्रीतिकूट कोई दूसरा नहीं बल्कि औरंगाबाद जिले के हसपुरा का पीरू गांव ही माना जाता है। ध्यान दें, हर्षवर्धन काल में सोन वर्तमान देवकुण्ड-रामपुर चाय होते हुए प्रवाहित होता था, जिसे दाउदनगर में ‘बह’ कहा जाता है। हर्षवर्धन-वाणभट्ट काल (सातवीं सदी का पूर्वार्ध) में सोन का मार्ग हुआ करता था। वाण के काल का लगभग 1400 वर्ष हो गया। ‘बह’, जहां निरंतर पानी बहा करे। यहां इसे सोन का छाडन कहा जाता है। यानी सोन का बहाव छठी-सातवीं सदी में देवकुंड के निकट था। वहां से लगभग 1400 वर्ष में यह दस से 15 किलोमीटर दाउदनगर के पश्चिम खिसक गया। जे.डी.बेल्गर ने बह का उल्लेख किया है। उसके शब्दों में-‘अधिकारियों द्वारा प्राप्त सूचनाओं और अपने व्यक्तिगत अवलोकन निरुपण के आधार पर मेरा विचार है कि सुदूर अतीत में दाउदनगर के पास तराढ (तराड) गांव के निकट से सोन दक्षिण-पूरब को बहता था। देवकुंड या देवकुढ के टांड की बिल्कुल बगल से होता हुआ रामपुर चाइ और केयाल के सटे आगे बहता था। तराढ या तरार (आर तर या आर पर) का हिन्दुस्तानी में अर्थ होता है नदी की उंची कगार पर बसा हुआ। नाम से ही स्पष्ट है कि यह गांव पहले किसी नदी के उंचे तीर या तट पर बसा हुआ था।


नहर की खोदाई में मिला सोन का पाट 

तराढ से बिल्कुल सटे और इसके तथा दाउदनगर के बीच में सोन नहर के लिए हाल की खुदाई से बिल्कुल साफ हो गया है कि यह इलाका पहले की किसी बडी नदी का पाट था। चाइ और केयाल में पानी के बडे-बडे गड्ढे आज भी मौजूद हैं-संभवतः वे प्राचीन सोन के अवशिष्ट हैं। देवकुंड में हर साल एक मेला लगता है। मैं समझता हूं कि केयाल से सोन उत्तर-पूरब को लगातार बहते हुए सोनभदर गांव के पास पुनपुन का वर्तमान पाट धर लेता था।“ बेल्गर आगे लिखता है- ‘यह स्पष्ट है कि सुदूर अतीत से बुद्ध के निर्वाणकाल तक मेरे इंगित किए हुए रास्ते से बहता हुआ सोन फतुहा के पास गंगा में मिल जाता था।‘ 



फतुआ के निकट गंगा में गिरता था सोन का पानी


उन्नीसवीं सदी में पटना प्रमंडल का अभियंता रह चुका और सडकें बनवाने के सिलसिले में पटना- गया इलाकों के आभियांत्रिक लक्षणों का पूरा ज्ञान हासिल करने वाले एम.पी.बी.डुएल का मत है कि-‘सोन अरवल और दाउदनगर के बीच से अपना पाट छोडकर पटनावाली सडक पार करने के बाद मसौढी के उत्तर पुनपुन का पाट धर लेता था। वहां से उसका कुछ पानी फतुहा के निकट गंगा में मिल जाता था और कुछ पानी मैथवान (वर्तमान नाम-महतमैन) नदी से होकर मुंगेर की ओर बढा जाता था।‘ कौल के मत को ध्यान रखते हुए डुएल के मत में इतना सुधार किया जा सकता है कि फतुहा के निकट का पानी गिरने (या, बेल्गर के मतानुसार, सोन-गंगा-संगम) की स्थिति बुद्धकालीन हो सकती है, बाल्मीकि कालीन नहीं। उनदिनों फतुहा के उत्तर का राघोपुर-दियारा टापू नहीं, मगध की तत्कालीन भूमि का एक खंड था। 




Wednesday, 26 April 2023

कचरा और अतिक्रमण पहचान, महिला शौचालय की जरूरत

 


वार्ड नंबर 11 का हाल

जागरण आपके द्वार



शहर के बीच हृदय के रूप में स्थित है वार्ड नंबर 11 

मंदिर, मस्जिद, जीमूतवाहन चौक व चूड़ी बाजार पहचान

संवाद सहयोगी, दाउदनगर (औरंगाबाद) : दाउदनगर शहर की मुख्य पहचान है हनुमान मंदिर और इसके सामने का इलाका वार्ड नंबर 11 का हिस्सा है। जिसमें बाजार का मुख्य मस्जिद, यहना की सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा जीमूत वाहन भगवान का मंदिर और कई राजनीतिक सामाजिक बैठकों का गवाह बना हमदर्द दवाखाना मैदान इसकी पहचान है। यानी बाजार का जो मुख्य पथ है उसके दक्षिण का एक हिस्सा वार्ड नंबर 11 के तहत आता है। मुख्य पथ पर गंदगी साफ-साफ दिखती है। चूड़ी बाजार जो मुख्य व्यवसायिक स्थल है वहां गंदगी दिखती है। चलंत शौचालय रखा गया है लेकिन उसका इस्तेमाल संभव नहीं हुआ। यहां कचरे का ढेर भी लगा रहता है। तमाम तरह की समस्याएं हैं और इसका समाधान संभव नहीं दिखता क्योंकि वार्ड पार्षद प्रमोद सिंह से मिलना व बात करना कठिन है। 



कोई बड़ी समस्या नहीं


रणधीर कुमार उर्फ भोलू ने कहा कि  वार्ड में कोई बड़ी समस्या नहीं है। हालांकि सफाई की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। जितनी सफाई होनी चाहिए उतनी सफाई यहां नहीं होती। जबकि शहर का यह मुख्य व्यवसायिक स्थल है और धार्मिक महत्व के भी कई स्थान यहां हैं।



मुख्य नाली रहता है जाम 


गोपाल सोनी ने कहा कि वार्ड पार्षद का कोई ध्यान नहीं रहता है। सफाई नहीं होती है। जनता प्रतिनिधि से दूर हो गई है। मुख्य पथ का नाली जाम रहता है। बाजार है और शौचालय नहीं है। जिससे ग्रामीण इलाके से आई महिलाओं को काफी मुश्किल का सामना करना पड़ता है। हमदर्द दवाखाना मैदान और पंजाब होटल के पास बेतरतीब वाहन लगे रहते हैं। जिससे आवागमन में असुविधा होती है।



कचरा का लगा रहता है अम्बार 


वार्ड में संचालित यश ई स्कूल के निदेशक शंभू कुमार बताते हैं कि हमदर्द दवाखाना मैदान परिसर में हमेशा कचरा का अंबार लगा रहता है। सफाई पर ध्यान नहीं रहता है। 




चावल बाजार में फेंकना पड़ता है कचरा

महफूजुल हक अकबर ने कहा कि नली गली की सफाई नहीं होती है। कूड़ा उठाने कोई नहीं आता। घर दुकान का कूड़ा फेंकने उन्हें चावल बाजार जाना पड़ता है। पेशाब खाना और शौचालय नहीं है। जिससे महिलाओं को काफी दिक्कत होती है।



स्ट्रीट लाइट की कमी 

रोहित कुमार का कहना है कि चूड़ी बाजार में महिला शौचालय का नहीं होना बड़ी समस्या है। इसके अलावा वार्ड क्षेत्र में प्रतिदिन सफाई की समस्या है। नाली जाम रहता है। हर पोल पर बल्ब नहीं है। स्ट्रीट लाइट की कमी है। वार्ड कमिश्नर गायब रहते हैं। मिलना मुश्किल होता है।




राजनीतिक विशेषता

वार्ड नंबर 11 से वर्ष 2002 में विजेता बनी रोहिणी नंदिनी नगर पंचायत के उप मुख्य पार्षद बनी थी। उसके बाद हुए 2007 और 2012 के चुनाव में व्यवसाई संजय कुमार वार्ड पार्षद बने। इसके बाद 2018 में जब पहली बार नगर परिषद का चुनाव हुआ तो प्रमोद कुमार सिंह उर्फ मंटू वार्ड पार्षद बने।

सोन का शोक : सोन के सूखे पाट को किसानों ने बनाया उर्वर, उपज रही शब्जी व अनाज




सोन के पेट में हजारों एकड़ में हो रही है खेती 

किसान बनाते हैं सूखी जमीन को उर्वर अपनी क्षमता के अनुसार कब्जा कर करते हैं खेती 

उपेंद्र कश्यप, दाउदनगर (औरंगाबाद) : इंद्रपुरी बराज से नीचे पटना तक की यात्रा में सोन सूखता, सिकुड़ता चला गया है। उसकी चौड़ाई कम होती गई और जो जमीन सूख गई, बंजर हो गई, उसे हाड़ तोड़ मेहनत कर सोन तटीय क्षेत्र के किसानों ने उर्वर बनाया और उस पर अनाज और सब्जी उपजा रहे हैं। कहीं यह आंकड़ा उपलब्ध नहीं है कि कितना लंबा-चौड़ा यह क्षेत्रफल होगा और कितने एकड़ में खेती होती होगी। लेकिन एक अनुमान के मुताबिक लगभग 120 किलोमीटर लंबा और 2 से 3 किलोमीटर चौड़ा सोन का जो पाट बंजर रह गया, बलुआही मिट्टी रह गया, उसे हाड़ तोड़ मेहनत कर किसानों ने उपजाऊ बनाया और उस पर खेती कर रहे हैं। सोन द्वारा छोड़ी गई इस जमीन पर गेहूं की फसल भी लहलहाती है। आलू, बैगन, टमाटर, मटर, परवल, करेला, कद्दू, नेनुआ की फसल लह लहाती है। सूत्रों के अनुसार किसान अपनी क्षमता के अनुसार दो बीघा से लेकर 10 बिगहा तक या इससे अधिक भी जमीन को अपने कब्जे में लेकर उसे खेती लायक उर्वर बनाते हैं और फिर उसमें फसलों को लगाते हैं। इससे जीविकोपार्जन भर कमा लेते हैं।



मत्स्य विभाग करता था नीलामी

 प्राप्त जानकारी के अनुसार पहले मत्स्य विभाग के माध्यम से सोन तटीय खेती को सैरात के रूप में बंदोबस्ती की जाती थी। लेकिन अब यह सब होना बंद हो गया है। पहले किसानों को बंदोबस्ती की रसीद भी कटती थी। अब ऐसा नहीं होता। बताया गया कि किसान अपनी क्षमता के अनुसार जमीन को खेती के लायक उपयोग बनाते हैं और खेती करते हैं। इस मामले में एक अंचल अधिकारी ने बताया कि नियम बदल गया है और अधिक जानकारी इस बारे में नहीं है।



विद्युत व्यवस्था हो तो और बेहतर होगी खेती 

वार्ड संख्या 10 के निवासी दीपक निषाद सोन द्वारा छोड़ी गई दो बीघा जमीन पर खेती करते हैं। वह बताते हैं कि गुमा, सिपहां, महमदपुर, दाउदनगर, बालूगंज, अंछा मौजा में इलाका बंटा हुआ है। अंचल द्वारा बंदोबस्ती की जाती थी। गुमा मौजा में सिंचाई मुश्किल हो गई है। बिजली की सुविधा उपलब्ध नहीं है। डीजल से सिंचाई करना पड़ता है। डीजल इतना महंगा है कि पर्याप्त सिंचाई करना मुश्किल है। हर एक दिन बाद सिंचाई की जरूरत होती है। पर्याप्त सिंचाई नहीं कर पाते नतीजा खेत की क्षमता जितनी फसल नहीं लगा पाते।



जंगल साफ कर जमीन को बनाते हैं उपजाऊ 

अमृत बिगहा के निवासी विनय पासवान भी सोन में खेती करते हैं। उनसे यह सवाल था कि सोन द्वारा छोड़ी गई जमीन को खेती के लायक कैसे बनाते हैं। उन्होंने बताया कि जंगल को साफ करना पड़ता है। पतेला, काश, झूर को उखाड़ कर जड़ समेत फेंक दिया जाता है और फिर जोत कोड कर उपजाऊ बनाया जाता है। जमीन उर्वर हो जाती है। जो व्यक्ति जितना खेत बनाता है वह उतना पर फसल लगाता है। सब के बीच आपसी सामंजस्य होता है।



पहचाननी पड़ती है फसल लायक जमीन 


सोन में खेती करने वाले किसानों की मानें तो जिस जमीन की ऊपरी सतह पर बालू है और नीचे मिट्टी होती है उस जमीन पर किसान पर परवल, कद्दू, करेला, नेनुआ जैसी सब्जी का उत्पादन करते हैं। और जहां सिर्फ मिट्टी है, वहां गेहूं, प्याज, हरी मिर्च और टमाटर होते हैं। सोन में जब कभी बाढ़ आता है तो वह अपने साथ मिट्टी भी लाता है और जिस जमीन पर मिट्टी छोड़ जाता है वहां का जंगल साफ कर किसान खेती बना लेते हैं।



सोन का शोक : सोन क्षेत्र की सड़कों पर चलने से हो रही आंख व श्वास की बीमारी



कणों से यात्रा मुश्किल बीमारी के साथ मौत का भी खतरा 

रोहतास, औरंगाबाद, अरवल, आरा, पटना के हालात मुश्किल

उपेंद्र कश्यप, दाउदनगर (औरंगाबाद) : रोहतास जिले में सोन पर इंद्रपुरी में बराज बना हुआ है। इसके नीचे पटना तक जहां सोन गंगा में मिल जाता है, वहां तक सोन के बाएं और दाएं पड़ोस की सड़कों पर चलना काफी मुश्किल भरा काम है। सड़कों पर बालू की सतह जमा होना आम बात है। इतने धूल उड़ते हैं कि उससे बीमारी और दुर्घटना की संभावना बनी रहती है। लोगों का फेफड़ा व आंख बर्बाद हो रहे हैं। रोहतास जिला में डेहरी और उसके ठीक सामने औरंगाबाद में, अरवल, आरा, पटना के वे क्षेत्र जो सोन के सीमावर्ती हैं, वहां दो-तीन से पांच किलोमीटर की यात्रा करना भी मुश्किल होता है। बारूण से नबीनगर चले जाएं या बारुण से दाउदनगर की तरफ, डेहरी में इंद्रपुरी की तरफ जाएं चाहे नासरीगंज तक आएं या फिर दाउदनगर से नहर के रास्ते शमशेर नगर की ओर होते पटना तक जाएं या दाउदनगर नासरीगंज सोनपुल की तरफ यात्रा करें काफी कठिनाई का सामना करना पड़ता है। सोन तटीय इलाके में सड़क हो या पुल बालू के आवागमन के कारण उन पर बालू जमा रहता है। जिससे खासकर बाइक चालकों के फिसल कर गिरने का डर रहता है। यह धूल कण आंखों में समा जाते हैं। जिससे बचना मुश्किल होता है। कभी-कभी बालू और कीचड़ इतना अधिक होता है कि उसमें बाइक फंस जाता है। उसे निकालना मुश्किल होता है। 


आंख और फेफड़ा हो रहे बर्बाद, हो रही कई बीमारी

फोटो- डा. विनोद कुमार और डा.महेंद्र शर्मा 

सड़कों और पुलों पर जमे धूल, बालू से लोग बीमार पड़ रहे हैं। आंख और फेफड़ा बर्बाद हो रहा है। इस मामले में आंख विशेषज्ञ डा. विनोद कुमार कहते हैं कि धूल का कण आंख में पढ़ने से कोर्निया पर फर्क पड़ता है। वह गड़ते रहता है। उसमें जख्म हो जाता है। कोर्नियल पलसर हो सकता है। बराबर आंख में धूल और बालू के कण पड़ते रहने से बुरा प्रभाव पड़ता है और गंभीर बीमारी होती है। जिससे डिजनरेटेड चेंज होता है और इससे बड़ी परेशानी होती है।

 हृदय रोग विशेषज्ञ डाक्टर महेंद्र शर्मा कहते हैं कि फेफड़ा बर्बाद हो रहा है। सीओपीडी नाम की बीमारी हो रही है। फेफड़ा हवा लेने के लिए बना है ना कि बालू और धूल। इससे फेफड़ों में सूजन होता है। उसकी मुलायमियत और उसके स्वभाव में परिवर्तन होता है। फैलाव कम होने लगता है। दबाव अधिक पड़ता है। जिससे हांफने की बीमारी होती है। खांसी होती है और एक वक्त आता है जब फेफड़ा खराब हो सकता है।




खबर बनती है तो उठाया जाता है रेत 

 दाउदनगर नासरीगंज सोनपुल हो या डेहरी स्थित रेलवे ओवर ब्रिज या बारूण दाउदनगर पथ में रेलवे अंडर पास उसकी सफाई तभी होती है जब रेत जमा होने की खबर अखबारों में छापी जाती है। अन्यथा रेत के कारोबार से जुड़े कारोबारी हों या अवैध रूप से बालू से कमाई करने वाले माफिया हों, या सड़क से संबंधित विभाग वे इसकी सफाई करने को लेकर जागरूक नहीं रहते हैं। उनके कान पर जू तक नहीं रेंगता है।



सड़क से बालू हटाना घाट की जिम्मेदारी 

बालू घाट से जुड़े सूत्रों के अनुसार सड़क या पुल पर बालू ढुलाई के कारण जो रेत जमा होता है उसको साफ करने की जिम्मेदारी बालू घाट संचालकों की है। एक बालू घाट संचालक ने कहा कि खनन विभाग का काम ही यही सब देखरेख करना है। लेकिन खनन विभाग बालू घाट संचालकों पर दबाव नहीं डाल पाता। इसके कारण सड़कों या पुलों पर रेत जमा रहता है।



नगर परिषद को कराना पड़ा था साफ़ 

बालू घाट संचालकों और विभाग की लापरवाही इस हद तक है कि छठ के अवसर पर भी सड़क और पुलों से बालू नहीं हटाए गए थे। अंततः दाउदनगर नगर परिषद द्वारा रेत हटाने का काम किया गया था।



Monday, 24 April 2023

सोन का शोक : वैध-अवैध का चक्कर, पर रोजगार मिलता जमकर

 


2000 लोगों से अधिक के लिए रोजगार की संभावना

फिलहाल साढ़े छह सौ व्यक्तियों को मिला हुआ है काम

वैध-अवैध रूप से लगभग 17 हजार लोगों को रोजगार

लेबर से लेकर स्टाफ तक कमाते हैं 15 से 20 हजार रुपये तक महीना 

उपेंद्र कश्यप, दाउदनगर (औरंगाबाद) : औरंगाबाद में अंधाधुंध बालू खनन से सोन भले बर्बाद हो रहा हो लेकिन इसका दूसरा पक्ष यह है कि इसने काफी रोजगार का सृजन किया है। सोन में कुल 37 बालू घाट हैं। जिसमें नया भी शामिल है। जिला खनन पदाधिकारी पंकज पासवान के अनुसार 11 घाट संचालित हैं। घाट संचालकों के अनुसार एक घाट पर औसतन 50 से 60 व्यक्ति काम करते हैं। जिसमें मजदूर भी शामिल है। इस हिसाब से देखें तो लगभग साढ़े छह सौ व्यक्ति अभी काम कर रहे हैं, जबकि इस संख्या में ट्रक ड्राइवर और सह चालक शामिल नहीं है। इसके अलावा यदि सभी घाट संचालित होने लगे तो 2000 से अधिक लोगों को रोजगार मिलेगा। यदि अवैध रूप से चल रहे लगभग 5000 ट्रैक्टरों को भी जोड़ लें तो 15000 लोगों को अवैध रूप से संचालित ट्रैक्टर से रोजगार मिल जाता है। बालू घाटों पर काम करने वालों को महीना तो मिलता ही है उसके अलावा प्रति ट्रक भी कुछ पैसे मिलते हैं। वह श्रमिक जो बालू को ट्रक पर लादने का काम करता है वह भी लगभग 15000 रुपये तक महीने की आमदनी कर लेता है जबकि अन्य व्यवस्था से जुड़े कर्मचारी बीस हजार रुपये महीना तक आमदनी कर लेते हैं। एक बालू घाट संचालक ने बताया कि एक घाट पर न्यूनतम 35 से 40 व्यक्ति को रोजगार मिलता है। लेकिन चूंकि इस काम में विवाद होते रहता है इसलिए अधिकतर घाटों पर 50 से 60 व्यक्ति विभिन्न तरह के काम करते हैं। बालू घाट दिन-रात संचालित होते हैं। यह बंद नहीं होते। इसलिए दो शिफ्ट में काम करने के लिए अलग अलग व्यक्ति रखे जाते हैं। बताया गया कि बालू ट्रक पर लादने में जो मशीन इस्तेमाल होता है उस पर एक आपरेटर, एक सहायक के अलावा दो और व्यक्ति काम करते हैं। कैशियर और चालान काटने का काम भी कई लोग करते हैं। बताया गया कि एक बालू घाट पर लगभग 50 से 60 व्यक्तियों को रोजगार मिलता है। बताया गया कि बालू घाटों पर प्रत्येक काम करने वाले व्यक्ति को तय रकम बतौर महीना मिलता है। इसके अलावा प्रति ट्रक भी पैसा मिलता है। 



अवैध रूप से 5000 से अधिक ट्रैक्टर को मिल रहा काम

15 हजार से अधिक को मिला है रोजगार

बालू खनन से लगभग पांच हजार ट्रैक्टर जुड़े हुए हैं। बारुण से लेकर शमशेर नगर तक। जिनके ड्राइवर और उप चालक का भी रोजगार इससे जुड़ा हुआ है। एक ट्रैक्टर से न्यूनतम तीन व्यक्ति को रोजगार प्राप्त हो रहा है। यानी पंद्रह हजार लोगों को काम मिला हुआ है। ये ट्रैक्टर औरंगाबाद जिला में सोन घाट से बालू ढ़ोने का काम करते हैं। इस तरह से देखें तो रोजगार का बड़ा साधन बालू घाट उपलब्ध कराते हैं। लेकिन ये अवैध हैं। अवैध कार्य में संलिप्त हैं। पुलिस इनके खिलाफ जब तब कार्रवाई करती है लेकिन हालात नहीं बदल रहे। दरअसल एक ट्रैक्टर बालू वैध रूप से 2000 से 2200 में मिलेगा लेकिन अवैध ट्रैक्टर से सिर्फ 1000 से 1200 रुपये में मिल जाता है। इस कारण जनता का एक हद तक समर्थन प्राप्त होता है। दूसरी तरफ बालू के वैध घाट वाले ट्रैक्टर से बालू नहीं बेचते। क्योंकि इसमें उनको परेशानी समझ में आती है।

Sunday, 23 April 2023

सोन का शोक : तीन दशक में खत्म हो सकता है सोन का वजूद

 




 40 से 120 ट्रक तक रोज एक घाट से निकलते हैं बालू 

10 साल में खत्म हो गया काली सोन घाट 40 किलोमीटर तक सोन के वजूद पर संकट 

2013 से ट्रक से अन्यथा पहले ट्रैक्टर से होती थी बालू की ढुलाई

बालू के अंधाधुंध खनन ने बना दिया है खतरनाक गड्ढे 

उपेंद्र कश्यप, दाउदनगर (औरंगाबाद) : सोन के पेट से बालू निकालने का काम ट्रैक्टर से होता था। लालू-राबड़ी देवी के राज में घाटवार नीलामियां होती थीं और इससे गरीब कमजोर आय वर्ग के लोग घाट लिया करते थे। ट्रैक्टरों से बालू की ढुलाई होती थी। सोन में मजदूर बालू का खनन कर ट्रैक्टर भरते थे। राजग की सरकार जब बिहार में आई तो विकास के साथ सोन के संदर्भ में विनाश की भी पटकथा लिखी जानी शुरू हुई। वर्ष 2013 से ट्रकों से बालू ढुलाई की प्रक्रिया शुरू हुई और 10 साल में कालीघाट जैसे मशहूर बालू घाट का वजूद पूरी तरह खत्म हो गया। ऐसे कई उदाहरण हो सकते हैं। बारुण से लेकर शमशेर नगर पंचायत तक लगभग 40 किलोमीटर लंबे सोन के वजूद पर संकट है। बालू के धंधे से जुड़े लोगों की मानें तो 10 चक्के वाले एक ट्रक बालू की कीमत 12000 रुपये है। दाउदनगर नासरीगंज सोनपुल से नान्हू बिगहा बालू घाट तक करीब 300 ट्रक प्रतिदिन बालू निकलते हैं। बारुण से नान्हू बिगहा तक 40 किलोमीटर में 1,000 से अधिक ट्रक बालू प्रतिदिन लगभग निकलते हैं। उत्तर प्रदेश में सोन के बालू की काफी मांग है। अब बक्सर और उत्तर बिहार भी बालू जा रहा है। अनुमान लगा सकते हैं कि सोन के पेट से कितना तेजी से बालू निकाला जा रहा है। एक दशक में कालीघाट खत्म हो गया, उस हिसाब से माना यही जा रहा है कि आने वाले तीन दशक में सोन पूरी तरह बर्बाद हो जाएगा। उसकी क्षमता ट्रैक्टर से भी बालू निकालने की शायद न बच सके। बताया जाता है कि मशीनों से अंधाधुंध बालू खनन के कारण नान्हू बिगहा के तरफ बड़े-बड़े गड्ढे बन गए हैं।  यह 40 से 50 फिट तक गहरे होने के साथ 500 फीट से लेकर 1000 फीट तक लंबा लंबा है। मौत का कुआं बन गए हैं और सोन की धारा नाला की तरह बनकर रह गई है। ऐसे में सवाल यही है कि आखिर सोन को किस हद तक बर्बाद करने पर सरकार तुली हुई है।




शमशेर नगर से केरा तक बन गए हैं कई तालाब 


अंकोढ़ा पंचायत के पूर्व मुखिया कुणाल प्रताप कहते हैं कि शमशेरनगर से केरा तक मशीनों से बालू के खनन के कारण बड़े बड़े तालाब और कुआं बन गए हैं। इनकी संख्या एक दर्जन से अधिक है और आश्चर्य की बात यह है कि मशीन से खनन के कारण यह गड्ढे बने हैं और घाट संचालकों को पर्यावरणीय स्वीकृति भी आसानी से मिल जाती है। पर्यावरण बचाने का प्रयास करने का दावा किया जाता है और सोन को देखकर साफ लगता है कि पर्यावरण से सरकार को कोई मतलब नहीं है। यहां पर्यावरण कहीं नहीं दिखता। सोन बचा ही नहीं है। सोन के पेट में सिर्फ बड़े-बड़े गड्ढे बन गए हैं, जो तालाब व कुएं से अधिक गहरा और खतरनाक हैं।


खत्म हो गया है सोन का वजूद 

शमशेर नगर निवासी प्रवीण कुमार उर्फ बबलू शर्मा के नाम भी सोन का बालू घाट रहा है। वह बताते हैं कि बारुण से नान्हू बिगहा तक के 40 किलोमीटर में सोन खत्म हो गया है। बड़े-बड़े गड्ढे बन गए हैं। बालू के खेल में बड़े पैमाने पर धांधली होती है। दूसरे जिला के घाट वाले सोन का बालू उठाव कराते हैं और इसमें प्रशासन की भी मिलीभगत साफ साफ दिखती है। अगर सरकार समय रहते नहीं चेतती है तो सोन के किनारे आबाद बस्तियों को भी जरूरत भर बालू नसीब नहीं होगा और सोन एक खतरनाक इलाका बन जाएगा। जहां मनुष्य से लेकर जानवर तक की मौत बालू खनन से बने गड्ढों में डूबने से होती रहेगी।




स्वत: भरते रहते हैं गड्ढे : खनन पदाधिकारी 

जिला खनन पदाधिकारी विकास पासवान ने इस पूरे मामले में कहा कि 31 घाट पहले से चल रहा है। अब नया मिलाकर 37 हो गए हैं। फिलहाल 11 घाट संचालित हैं। उन्होंने बताया कि एक 3के मीटर के तीन लेयर में बालू निकाला जाता है इसलिए तीन मीटर से अधिक गड्ढा नहीं हो सकता है। इसके भरे जाने के नियम को लेकर उन्होंने कहा कि ऐसा कोई नियम नहीं है। अपने आप गड्ढा भरता रहता है और बाढ़ आने पर भी भर जाता है। उत्तर प्रदेश बालू भेजे जाने के मामले पर उन्होंने कहा कि अब यह लंबे समय से बंद कर दिया गया है। बिहार में कहीं भी बालू भेजा जा सकता है।