Tuesday, 8 December 2015

पंचायत चुनाव आरक्षण को ले बढी बेचैनी


दाउदनगर में हैं कुल 15 पंचायत
आरक्षण का आधार 2011 की जनगणना
उपेन्द्र कश्यप, दाउदनगर (औरंगाबाद) पंचायत चुनाव का रण सजने लगा है। सरकार और निर्वाचन आयोग त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में पदों के आरक्षण की स्थिति स्पष्ट करने में जुटी हुई है। हर तरफ इसकी चर्चा है और वर्तमान मुखिया, सरपंच, पंचायत सचिव और जिला पार्षदों में बेचैनी है। इसकी वजह है कि किस सीट का आरक्षण किस रुप में होगा, यह अभी स्पष्ट नहीं हो सका है। एक तबके में संभावना के साथ उत्साह भी है कि उनकी किस्मत जग सकती है, क्योंकि यह तय है कि जो सीट गत दो चुनाव में जिस वर्ग के लिए आरक्षित रहा है, इस बार उसकी स्थिति बदलेगी। अर्थात जो पंचायत या सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित रहा है वह इस बार या तो सामान्य होगा या फिर दूसरे वर्ग के लिए आरक्षित या अनारक्षित होगा। जो महिला के लिए आरक्षित रहा है वह इस बार इससे मुक्त हो कर दूसरे रुप में आरक्षित होगा या अनारक्षित रहेगा। बेचैनी इसी कारण है। आरक्षण का आधार 2011 की जनगणना को माना जाना है। इसी आधार पर पंचायत चुनाव की आरक्षित सूची तैयार होनी है। त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव के जितने भी पद हैं, उसके संभावित प्रत्याशी और वर्तमान प्रतिनिधि बेचैन हैं।    

वर्तमान सीट छोड दूसरी सीट होगी आरक्षित
आरक्षण का यह है फार्मुला
दाउदनगर (औरंगाबाद) आरक्षण के लिए फार्मुला तैयार किया गया है। सूत्रों ने बताया कि जिस पंचायत में जिसकी आबादी अधिक होगी वह उस वर्ग के लिए आरक्षित होगा। जिस पंचायत में अनुसूचित जाति की संख्या अधिक होगी उसे अजा के लिए आरक्षित किया जाना है। किंतु, वर्तमान आरक्षित सीट को छोडकर। दाउदनगर पंचायत में बेलवां, अंछा और सिन्दुआर इस वर्ग ले लिए आरक्षित है। इनको छोड कर दूसरी तीन पंचायतें इनके लिए आरक्षित होंगी। इसी तरह जिन पंचायतों में अतिपिछडा आबादी अधिक होगी उनको इस वर्ग के लिए आरक्षित करनी है, किंति वर्तमान में इस वर्ग के लिए आरक्षित सीट शमशेरनगर, कनाप और संसा को छोड कर। इन्हीं आरक्षित सीटों में से एक-एक इसी वर्ग की महिला के लिए आरक्षित होगी। और वह सीट वही होगी जिसमें महिला संख्या अधिक होगी। सामान्य वर्ग के लिए भी यही फार्मुला लागु होता है।


शमशेरनगर, तरारी, अरई पर संकट
दाउदनगर (औरंगाबाद) नयी आरक्षण लागू होने में शमशेरनगर, अरई, तरारी और महावर पर संकट दिख रहा है। सूत्रों के अनुसार 2011 की जनगणना के अनुसार इन पंचायतों में अनुसूचित जाति की संख्या अधिक है। नतीजा इन्हीं चार में तीन इस वर्ग के लिए आरक्षित हो सकते हैं। चौरी, तरार, गोरडीहां, करमा में से किसी तीन को अतिपिछडा वर्ग के लिए आरक्षित किया जा सकता है। इन्हीं पंचायतों में इस वर्ग की आबादी अधिक है

दाउदनगर प्रखंड में पंचायतों की आरक्षण स्थिति

दाउदनगर (औरंगाबाद) अंछा और सिन्दुआर अनु.जाति और बेलवां अजा महिला के लिए आरक्षित है। कनाप और संसा अति पिछडा और शमशेरनगर अपि महिला के लिए आरक्षित है। मनार, तरारी, तरार और चौरी महिला सामान्य के लिए आरक्षित है। गोरडीहां, अंकोढा, महावर, अरई और करमा पंचायत अनारक्षित हैं। अब इनकी स्थिति बदलने वाली है।  

Saturday, 21 November 2015

भाकपा माले का वोट तो बढा किंतु...


फोटो-राजाराम सिंह और चुनाव चिन्ह
करीब साढे चार हजार अधिक मिला मत
उपेन्द्र कश्यप
 बिहार विधान सभा चुनाव में भाकपा माले के प्रत्याशी पूर्व विधायक को 22801 मत मिला। गत विधान सभा चुनाव 2010 में उन्हें मात्र 18463 मत मिला था। अर्थात गत की अपेक्षा 4338 मत अधिक मिला। इस लिहाज से प्रदर्शन को बेहतर कहा जा सकता है किंति इसके बावजूद खराब बात यह रही कि उनका जमानत नहीं बच सका। दो बार पूर्व विधायक रहने के बाद ऐसी स्थिति में आना खुद और पार्टी की सेहत के लिए बेहतर नहीं माना जा सकता है। इस अधिक मत आने की भी खास वजह है। इसमें पार्टी के प्रति जनता के विस्वास से अधिक महत्वपूर्ण भूमिका राजद प्रत्याशी बीरेन्द्र कुमार सिन्हा और रालोसपा प्रत्याशी चंद्रभुषण वर्मा के विरोधियों की मानी गयी है। मुकाबले में भाकपा माले और सोम प्रकाश को भी बताये जाने के कारण मत की संख्या बढी है। वैसे इस पर राजाराम सिंह ने कहा कि यह मत कई बार राजनीतिक माहौल से घटता-बढता है। एनडीए सरकार के खिलाफ गुस्सा और महागठबन्धन के कारण भी मत बढा है। पूरे बिहार में वामपंथ के प्रति जनता की उम्मीद बढी है। कहा कि माले का बेसिक जनाधार भी है। महत्वपूर्ण है कि पूरे परिदृष्य में माले का जनाधार लगातार घटता जा रहा है। 2015 इसके उलट एक उम्मीद जगा गयी है।


सर्वाधिक 48 हजार मत 1995 में
सबसे कम 2010 में 18463 मत

भाकपा माले ने मत का चरमोत्कर्ष भी देखा है। 1990 के विधान सभा चुनाव में आईएपीएफ (तब माले भूमिगत पार्टी थी) के बैनर तले जब राजाराम सिंह चुनाव लडने उतरे तो उन्हें 29048 मत मिला था। यह दौर बिहार में सामंतवाद के खिलाफ समाजवाद का झंडा बुलन्द होने का था। सामाजिक परिवर्तन का दौर था और पहली बार पिछडे लालु यादव को बिहार का मुख्यमंत्री बनाने तक पहुंच गया था। बाद में स्थानीय असंतोष ने 1995 में माले को 48089 मत दे कर विजेता बना दिया। अपार मत से विजय। यह स्थानीय लहर थी जद प्रत्याशी राम बिलास सिंह को हराने के लिए। 2000 में मत घट गया, मिला- 37650 मत तब भी जीत मिली। 2005 फरवरी में उन्हें 34700, अक्टूबर 2005 में 24023 मत और फिर 2010 के चुनाव में 18463 मत मिला। लगातार घटते मत के बीच ताजा प्रदर्शन ने माले की उम्मीद जगा दी है।


Sunday, 15 November 2015

एनडीए के अध्यक्षों को घर में मिली मात


सिर्फ भाजपा अध्यक्ष की बची लाज
महागठबन्धन का हर अध्यक्ष “जीता”

उपेन्द्र कश्यप
एनडीए के घटक दलों लोजपा, रालोसपा और हम के प्रखंड अध्यक्षों के पंचायतों में एनडीए प्रत्याशी को हार का सामना करना पडा है। दूसरी तरफ महागठबन्धन के घटक राजद और कांग्रेस प्रखंड अध्यक्षों के पंचायत में राजद प्रत्याशी की जीत हुई है। समीकरण जातियों की बहुलता और रालोसपा प्रखंड अध्यक्ष संजीव कुमार के संसा में सर्वाधिक 1624 मत से हार मिली। यहां उसे 794 मिला तो राजद को 2428 मत। हम के प्रखंड अध्यक्ष संजय पासवान के पंचायत बेलवां में 982 मत मिला तो हार 740 मत से हुई। राजद को यहां 1722 मत मिले हैं। लोजपा प्रखंड अध्यक्ष केदार यादव और भाजपा जिलाध्यक्ष सुबोध शर्मा के पंचायत गोरडीहां में 1600 से हार मिली है। यहां एनडीए को 767 तो राजद को 2367 मत मिला है। इन तीन प्रखंड अध्यक्षों की पोल खूल गयी तो वहीं भाजपा प्रखंड अध्यक्ष अश्विनी तिवारी के पंचायत अरई में वे 685 मत से जीत मिली। भाजपा को 1286 और राजद को 601 मत यहां मिला है। दूसरी तरफ राजद प्रखंड अध्यक्ष देवेन्द्र सिंह के घर में महागठबन्धन को 1510 मत की बढत मिली है। रालोसपा को करमा में 632 तो राजद को 2150 मत मिला है। कांग्रेस प्रखंड अध्यक्ष राजेश्वर सिंह के अंछा में भी 353 से बढत मिली है। जदयू का कोई प्रखंड अध्यक्ष ही नहीं था। इस पद से इस्तीफा दे चुके बीस सूत्री अध्यक्ष जीतेन्द्र नारायण सिंह के पंचायत मनार में महागठबन्धन को 608 मत की बढत मिली है। यहां एनडीए को 823 तो राजद को 1431 मत मिला है। हालांकि पार्टी ने उनका इस्तीफा स्वीकार नहीं किया था।  

Saturday, 14 November 2015

एनडीए प्रत्याशी को अपने घर में मिली हार


एनडीए के तमाम नेता अपने पंचायत में हारे
सिर्फ अरई और महावर में ही मिली जीत
उपेन्द्र कश्यप, दाउदनगर (औरंगाबाद) ग्रामीण इलाके से एनडीए के पांव उखड गये हैं। प्रखंड से 15 में सिर्फ दो अरई और महावर पंचायत में ही एनडीए के प्रत्याशी को बढत मिल सकी जबकि अन्य 13 में उसे हार का सामना करना पडा। एनडीए के लिए काम कर रहे नेताओं की स्थिति स्पष्ट हो गयी है। खुद प्रत्याशी चंद्रभुषण वर्मा अपने पंचायत तरार में 162 मत से हार गये। यहां एनडीए को 1209 और राजद को 1373 मत मिला। दूसरी ओर अपने अंकोढा पंचायत में महागठबन्धन प्रत्याशी बीरेन्द्र कुमार सिन्हा 712 मत से जीते। उन्हें 1618 और एनडीए को 906 मत मिला। इस पंचायत में भाजपा के वरिष्ठ नेता जगन्नाथ शर्मा का घर नीमा में है। लोजपा नेता महेन्द्र पासवान और भाजपा पंचायत अध्यक्ष अनुप मनोहर के महावर में इन्हें 934 और राजद को 518 मत मिला। रालोसपा से टिकट की दौड में शामिल सत्येन्द्र कुशवाहा के अंछा पंचायत में 353 से हार मिली। कुल 893 मत मिला जबकि राजद को 1248 मत। सम्राट युवा मंच चला रहे रालोसपा नेता संजय मेहता के चौरी में पार्टी 225 से हारी। उसे 1440 और राजद को 1663 मत मिला। शमशेर नगर से जदयू नेता ब्रजकिशोर शर्मा बीस सूत्री अध्यक्ष रहे हैं। यहां रालोसपा को 1686 और राजद को 2211 मत मिला। बढत रही 525 मत। भाजपा पंचायत अध्यक्ष बब्लु शर्मा का घर भी शमशेर नगर ही है। भाजपा प्रवक्ता विनोद शर्मा और रालोसपा के टिकटार्थी विकास कुमार के पंचायत कनाप में 573 से पार्टी हारी। यहां उसे 1268 तो राजद को 1863 मत मिला है। भाजपा नेता और पूर्व प्रमुख राजेन्द्र पासवान के तरारी में 455 से हार मिली। रालोसपा को 1468 और राजद को 1923 मत मिला है। भाजपा के कर्णधार कहे जाने वाले राममनोहर पांडेय और रवीन्द्र शर्मा के सिन्दुआर में 392 से पार्टी हारी। रालोसपा को 927 तो राजद को 1319 मत मिला।    


     



राजद बनाम भाजपा की दूरी घटी


शहर में हैं चार सहायक समेत 31 बूथ
एनडीए को 6337 तो राजद को 4902 मत
उपेन्द्र कश्यप, दाउदनगर (औरंगाबाद) राजद बनाम भाजपा की दूरी शहर में घट रही है। इस बार विधान सभा चुनाव ने यह साफ कर दिया है। शहर में पुराना शहर स्थित एक नंबर बूथ से लेकर राष्ट्रीय इंटर स्कूल भखरुआं में बूथ संख्या 26 और 27 तक के बूथ हैं। इसमें चार सहायक बूथ मिलाकर कुल 31 होते हैं। इन बूथों पर प्राय: भाजपा और राजद (एनडीए बनाम महाग़ठबन्धन) के बीच पूर्व में काफी अंतर रहा है। गत विधान सभा चुनाव 2010 में राजद प्रत्याशी को जदयू के प्रत्याशी से करीब 6000 कम मत मिला था। तब जदयू भाजपा के साथ थी। इस बार शहर में यह अंतर मात्र 1435 मत का रह गया है। एनडीए के घटक रालोसपा प्रत्याशी चंद्रभुषण वर्मा को 6337 मत और राजद प्रत्याशी बीरेन्द्र कुमार सिन्हा को 4902 मत मिला है। तब राजद को करीब दो हजार मत ही मिल सके थे। इसकी वजह कई हो सकते हैं, किंतु दो प्रमुख वजह माना जा रहा है। प्रथम भाजपा या कहें एनडीए प्रत्याशी चन्द्रभुषण वर्मा के प्रति उदासीनता और दूसरा नीतीश कुमार के विकास से संतोष और अधिक की अपेक्षा। भाजपा का प्रत्याशी न होना और न ही बडे कद का सक्रिय नेता होना भी भाजपा की कमजोर कडी है। इस मतदान प्रवृति का एक पक्ष यह भी हो सकता है कि शहर में भाजपा का गढ होने का मिथक टूट सकता है।

संगठन बनाम समीकरण का फर्क

दाउदनगर (औरंगाबाद) एनडीए बनाम महागठबन्धन के बीच दूरी कम होने की वजह राजनीतिक दल से जुडे लोग राजनीतिक समीकरण और संगठन का फर्क मानते हैं। भाजपा प्रखंड अध्यक्ष अश्विनी तिवारी का कहना है कि एनडीए कार्यकर्ता तो सक्रिय रहे किंतु समर्थक और मतदाता शिथिल रहे। राजद प्रत्याशी बीरेन्द्र कुमार सिन्हा का शहर से सटे बसे बगवान बिगहा का निवासी होना और शहर में कई लोगों से उनका व्यक्तिगत लगाव होना भी एक कारण था। रालोसपा प्रत्याशी चंद्रभुषण वर्मा के साथ उनके संगठन का न होना और इस पार्टी के शहर में रहने वाले राज्य स्तरीय नेता राजीव कुमार उर्फ बबलु का चुनाव लडना भी एक कारण रहा। दूसरी तरफ जदयू के किसान प्रकोष्ठ के प्रदेश उपाध्यक्ष अभय चंद्रवंशी का कहना है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का विकास और राज्य अतिपिछडा आयोग के सदस्य प्रमोद सिंह चंद्रवंशी की लगातार सक्रियता, विकास के किए गये कार्य और लोगों का उनमें विश्वास इस फर्क की प्रमुख वजह बनी। राजद प्रखंड अध्यक्ष देवेन्द्र सिंह का कहना है कि समीकरण का हर मतदाता आक्रामक अन्दाज में मत दिया और प्रत्याशी का शहर से व्यक्तिगत संबन्ध, लगाव ने भी भूमिका निभाया है। कहा कि विधायक ने भी कहा है कि शहर में समर्थन मिला है, इसी कारण शहर में विजय जुलूस भी नहीं निकाला गया।     


दोनों प्रखंडों से जीता महागठबन्धन

दाउदनगर (औरंगाबाद) ओबरा विधान सभा क्षेत्र में दो प्रखंड हैं- दाउदनगर और ओबरा। इस बार के चुनाव में दोनों प्रखंडों से महागठबन्धन को अधिक मत मिला है। फाइनल रिजल्ट सीट से प्राप्त जानकारी के अनुसार दाउदनगर प्रखंड में एनडीए को 22354 मत मिला तो महागठबंधन को 29337 मत मिला। 6983 मत अधिक। ओबरा में एनडीए को 22292 मत मिला तो महागठबन्धन को 26705 मत। कुल 4413 मत अधिक। महागठबन्धन की जीत 11396 मत से हुई है। इस आंकडे में पोस्टल बैलेट की संख्या भी शामिल है। राजद प्रखंड अध्यक्ष देवेन्द्र सिंह ने कहा कि इस जीत में दोनों प्रखंडों ने अपनी भूमिका निभाया है। सभी जनता को इसके लिए आभार व्यक्त किया। 

जगेश्वर दयाल ने बनाया कमजोर को मजबूत


                फोटो-दैनिक जागरण में प्रकाशित मेरी खबर (14.11.2015)
’हिच्छन बिगहा के गांधी’ की संघर्ष गाथा
        कई आन्दोलनों में लिया था हिस्सा
दो साल जेल की काटी थी सजा
उपेन्द्र कश्यप, दाउदनगर (औरंगाबाद) आज पूरा देश जब जवाहर लाल नेहरू का जन्म दिन “बाल दिवस” के रुप में मना रहा है तो “हिच्छन बिगहा के गान्धी” को स्मरण करना भी प्रासंगिक है क्योंकि इस स्वतंत्रता सेनानी का जन्म दिवस भी 14 नवंबर ही है। जिन्हें इतिहास ने भूला दिया है। जी हां, जागेश्वर दयाल सिंह को यह संज्ञा पटना विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के अध्यक्ष प्रो.( डा.)रामबचन राय ने दिया है। इसी नाम से एक किताब लिख कर। जिसमें प्रमाणिक तथ्यों के आधार पर बताया गया है कि कैसे उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लिया, संघर्ष किया, समाज को जागरुक किया, अगडे-पिछडों की लडाई को मुकाम दिया। वे मानते थे कि समाज में शिक्षा का आभाव है और राजनीतिक प्रशिक्षण की जरुरत है। सन 14 नवम्बर 1889 में जन्मा यह “गांधी” समाज को जगाते-जगाते अंतत: 9 जनवरी 1995 को सो गया। सन 1952 में कौंग्रेस छोडकर कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्यता ली, और 1957 में दाउदनगर से विधानसभा का चुनाव लडकर हार गए। सामाजिक कार्यों को गति देने के लिए ही उन्होंने “बिहार राज्य कमजोर जनता मंच” का गठन किया था। इसकी एक सभा दाउदनगर में 1980 में की गयी थी जिसकी अध्यक्षता खुद की और इसमें बतौर मुख्य अतिथि सोनपुर के तात्कालीन विधायक लालु प्रसाद यादव आए। इनकी बेटी रोहिणी की शादी जागेश्वरदयाल सिंह के पुत्र राव रणविजय सिंह के पुत्र समरेश के साथ 24 मई 2002 को हुई है। यहां के निवासी रवीन्द्र सिंह दो बार अरवल से विधायक बने।
संघर्ष का योद्धा 
सन 1821 से 1922 तक देश में महात्मा गान्धी के आह्वाहन पर असहयोग आन्दोलन चला। इस दरमयान वे औरंगाबाद गेट हाई स्कूल में पढते थे। सन 1919 में कक्षा का बहिस्कार किया, 12 स्वयंसेवकों का जत्था तैयार किया, और अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ लोगों को जगरुक करने लगे। गया कौंग्रेस पार्टी कार्यालय में उन्हे रख लिया गया। गया में शराब दूकानों की बन्दोबस्ती की खिलाफत में वे आगे रहे। 12 सत्यग्रहियों के जत्थे का उन्हें नायक बनाया गया। पुलिस ने मार मार कर शरीर लहूलुहान कर दिया। 5-6 दिन इलाज चला। उन्होंने गया कौंग्रेस कार्यालय में बाबा खलिल दास के सानिध्य में राजनीतिक करियर की शुरुआत की। आन्दोलन के लिए जब सूची बनाया जा रहा था, तब उन्होंने अपना नाम भी लिखाया और खूब ओजपूर्ण भाषण दिया, नतिजा पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। 2 माह की सज़ा हुई। औरंगाबाद ज़ेल से फुलवारी शरीफ ज़ेल ले जाने के क्रम में उन्होंने हर मौके पर जनता को सम्बोधित करते हुए आन्दोलन में शामिल होने के लिए प्रेरित किया, हर बार पीटे गए, लेकिन झुके नहीं। फुलवारी शरीफ ज़ेल में उनकी मुलाकात स्वामी सहजानन्द सरस्वती और यदुनन्दन शर्मा से हुई।

Friday, 13 November 2015

चकनाचूर हो गया सोम प्रकाश का जादू

फोटो- दैनिक जागरण में प्रकाशित खबर
काठ की हांडी दूबारा नहीं चढी
नवनेर मुठभेड समेत कई मामले पर कार्रवाई
उपेन्द्र कश्यप, दाउदनगर (औरंगाबाद) खाकी उतार कर खादी का चोला पहन और देश में स्वराज लाने को संकल्पित सोमप्रकाश का तिलस्म चकनाचूर हो गया। 2010 का हीरो पांच साल में कहीं नजर नहीं आया और जब चुनाव में नजर आये तो परिणाम ने कहीं का नहीं छोडा। अपनी पार्टी बनाकर राज्य में बडा बदलाव लाने की तमन्ना भी धाराशायी हो गयी। काठ की हांडी दूबारा नहीं चढती वाली कहावत चरितार्थ होने की चर्चा की जा रही है। ओबरा में थानेदार बन कर आये सोमप्रकाश विधानसभा क्षेत्र का जातीय समीकरण देख कर राजनीतिक महत्वाकांक्षा पाल बैठे। फिर थानेदारी कम और राजनीति अधिक करने लगे। नवनेर में नक्सली बनाम पुलिस मुठभेड हो या अन्य कई मामलों को लेकर उनके खिलाफ विभागीय कारर्वाई शुरु की गयी। शैक्षिक जागृति मंच के जरिये शिक्षा का अलख जगाने निकले। नक्सल क्षेत्र में स्कूल खोल कर ख्याति बटोरी। मीडिया का जमकर इस्तेमाल किया। जब स्थानांतरण कर दिया तो तत्कालीन विधायक सत्यनारायण सिंह ने अपने वोटरों में उत्साह जगाने के लिए “ईमानदारी बचाओ” आन्दोलन चलाया। काफी जन धन का इस्तेमाल किया गया। बाद में बख्तियारपुर के थानेदार रहते इस्तीफा देकर ओबरा चुनाव लडने आ गये। नामांकन खारिज न हो जाये इसके लिए पत्नी का भी नामांकन कराया। चुनाव हुआ तो 36815 मत लाकर भाजपा-जदयू की आन्धी में भी निर्दलीय जीत गये। बिहार में इमानदारी का डंका बजाया। अपनी इमानदारी की खबर बिहार के बाहर के अखबारों में प्रकशित करा अपनी छवि बेहतर बनाने की कोशिश की। इधर इनसे मात्र 800 मत से पराजित प्रमोद सिंह चंद्रवंशी ने न्यायालय में इनके खिलाफ मुकदमा किया कि इनका नामांकन ही अवैध है। सुप्रिम कोर्ट तक मामला गया और 2015 में चुनाव से कुछ समय पूर्व फैसला इनके पक्ष में गया। तब भी विधान सभा द्वारा इनकी सदस्यता बहाली की अधिसूचना जारी नहीं की जा सकी है। इस बार जब चुनाव लडे फिर भावुक चर्चा उठाया कि कानूनी लडाई के कारण काम करने का अवसर नहीं मिला। चार करोड प्रमोद सिंह चंद्रवंशी के कारण नहीं मिला तो विकास प्रभावित हुआ। जनता एक बार फिर झांसे में आने से रही और उसने महागठबन्धन के पक्ष में खुलकर मतदान किया। खाकी से खादी पहने सोम प्रकाश को मात्र दस हजार मत आ सका। जितना लाकर जीते थे उसका 1/3 से भी कम मत कुल 10031 मिला। जमानत तक नहीं बचा सके। इस हार की चर्चा तरह तरह से की जा रही है।